मेरे हिस्से की धूप

गरमी और उस पर बला की उमस!

कपड़े जैसे शरीर से चिपके जा रहे थे। शम्मो उन कपड़ों को सँभाल कर शरीर से अलग करती, कहीं पसीने की तेजी से गल न जाएँ। आम्मा ने कह दिया था, “अब शादी तक इसी जोड़े से गुजारा करना है।”

जिंदगी भर जो लोगों के यहाँ से जमा किए चार जोड़े थे वह शम्मो के दहेज के लिए रख दिए गए – टीन के जंग लगे संदूक में कपड़ा बिछा कर। कहीं लड़की की ही तरह कपड़ों को भी जंग न लग जाए।

अम्मा की उम्र इसी इंतजार में कहाँ से कहाँ पहुँच गई कि शम्मो के हाथ पीले कर दें। शादी की खुशियाँ तो क्या, बस यही ख्याल खुश रखता था कि शम्मो अपने डोले में बैठे तो बाकी लड़कियाँ जो कतार लगाए प्रतीक्षा कर रही हैं, उनकी भी बारी आए। अम्मा के फिक्र और परेशानी तभी तो खत्म हो सकते है।

शम्मो को देखने तो कई लोग आए मगर किसी ने पक्के रंग की शिकायत की तो किसी को शम्मो की नाक चिपटी लगी। यहाँ तक कि किसी किसी तो शम्मो की बड़ी बड़ी काली आँखें भी छोटी लगीं। हर ग्राहक के जाने के बाद शम्मो अपने आपको घंटों टूटे हुए आईने में देखा करती।

कभी अपनी नाक को चुटकी से पकड़ पकड़ कर ऊँचा और पतला करती या कभी आँखें खींच खींच कर और बड़ा करने का प्रयास करती। और नहीं तो साबुन से रगड़ रगड़ कर मुँह ही घिसना शुरू कर देती। फटे तौलिए से, जिसके रोंए पोंछ पोंछ कर झड़ चुके थे, जूते की तरह चमकाने की कोशिश करती। इस सारी प्रक्रिया से थक जाती तो गहरी साँस लेते हुए धम से पलंग पर गिर जाती।

बेचारा पलंग – इसे पलंग कहना इलजाम ही माना जा सकता था। हाँ इसे झिलंगा कहा जा सकता था। उसके लेटते ही पलंग जमीन से जा लगता। शायद अम्मा ने पलंग भी शम्मो के जन्म के आसपास ही खरीदा होगा। बेचारा अभी भी झकोले दे रहा था।

शम्मो घन्टों बेसुध सी पड़ी रहती और बेचैन माँ को इधर से उधर चलता फिरता देखती रहती। इसी तरह पड़े पड़े आँख लग जाती जब तक कि मच्छर आक्रमण न कर देते। सारे मच्छर एक सुर में भुनभुनाते हुए जब हमला करते तो कभी अपने कानों पर हाथ मारती या कभी दुपट्टे से मुँह ढाँपने का प्रयास करती। दुपट्टे के बड़े बड़े सुराखों से ताक झाँक करते हुए मच्छर एक बार फिर शम्मो को बेचैन कर देते।

काश! उसके घूँघट से भी कोई ऐसे ही ताक-झाँक करता। वह शरमाती, लजाती, इकरार के अंदाज में इनकार करती और फिर… फिर अपने आपको किसी को सौंप देती। किंतु वह कब आएगा? क्या उसके सपने बिना किसी राजकुमार के आए ही टूट जाएँगे?

कब तक इसी तरह इसी घर में अम्मा के बच्चों की देखभाल करती रहेगी? वह गहरी और बेफिक्र नींद भी न सो पाती क्योंकि अम्मा से अधिक स्वयं उसको अपने छोटे भाई बहनों का ख्याल रहता। इसी तरह के हजारों ख्यालों से उलझती रहती और न जाने कब नींद की गोद में पहुँच जाती। दिन भर बैल की तरह काम करके शरीर फोड़े की तरह दुख रहा होता। सोने में हलके हलके कराहने की आवाज आती रहती। आनन फानन में मुर्गों की बाँग मस्जिद के मुल्लाओं से मुकाबला करने लगती और शम्मो और जोर से मुँह ढाँप लेती; कानों को तकिए से दबा कर बंद करने की नाकाम कोशिश करती। किंतु तकिया भी पैबंदों की ज्यादती और रुई की गुठलियों के कारण कानों को चुभता।

अम्मा की आवाज कानों में नश्तर की तरह चुभती, “उठ शम्मो बेटी! गुड्डू को गुसलखाने ले जा, वरना सुबह होते होते बिस्तर भिगो देगा।” शम्मो लेटे लेटे सोचती कैसा बिस्तर? क्या एक बोसीदा चादर जो सुराखों की कसरत से जाली बन गई है, चादर कहलाए जाने कि हकदार भी है? अगर गुड्डू भिगोने का प्रयास भी करे तो भिगो नहीं पाएगा, क्योंकि सब कुछ छन जाएगा। अम्मा की आवाज फिर से आती, “अरे शम्मो, उठ न बेटी, अभी तक पड़ी सोए जा रही है! सूरज सर पर चढ़ा आ रहा है, और तू है कि तेरी नींद ही नहीं टूटती। तेरी उम्र में तो तेरे समेत मेरे चार बच्चे हो चुके थे और अल्लाह रक्खे, आखिरी दो तो तेरे ही लगते हैं। अब उठ भी जा बेटी, उठ जा!”

शम्मो यह सोचती रहती कि अम्मा ने अपनी शादी तो मजे से कम उम्र में रचा ली; और अब मेरी बारी आई है तो इन्हें कोई वर ही नहीं मिलता। फिर वह अपने पक्के रंग को दोष देने लगती। इसमें अम्मा का क्या दोष, यह तो अल्लाह की मर्जी है।

बेचारी शम्मो! उसे क्या मालूम कि उसके सलोने हुस्न में जो कशिश है वह दुनिया के किसी और रंग में नहीं है। इस कृष्ण रंग में वह कूवत है जो मुहब्बत की गर्मी और दूसरों की मुसीबतें जज्ब कर लेने की ताकत रखता है। किंतु इसके लिए राधा और मीरा जैसी मन की आँखों की जरूरत पड़ती है। हर आने वाला शम्मो की ऊपरी कमजोरियों को देखता; उसके मन के भीतर की थाह लेने की जरूरत महसूस नहीं करता।

बेचारी शम्मो! जब रात गए लेटती, कोठरी की छत से चूती बारिश की फुहारें उसको भिगोती रहती। वह बिस्तर के हर कोने, हर पट्टी में पनाह ले कर थक जाती तो उसके गले से गुनगुनाहट उभरने लगती –

अम्मा मेरे भइया को भेजो री कि सावन आया

अम्मा मेरे भइया को भेजो री कि सावन आया

कि सावन आया

कि सावन आया

कि सावन……

और फिर पलंग की बेढंगी खुरदरी मोटी सी पट्टी से लिपट कर नींद के आगोश में गुम हो जाती। जवानी की नींद भी तो कितनी मस्त होती है। तमाम दुख और दर्द सिमट कर नींद की भेंट चढ़ जाते हैं। अम्मा को शम्मो की बेसुध जवान नींद से खासी चिढ़ थी। पर अम्मा जैसे अपनी जवानी की नींद भूल ही गई थी। इसी नींद ने तो बच्चों की एक फौज खड़ी कर दी थी।

अब्बा ने तो कभी अम्मा को बेसुध सोने का ताना नहीं दिया। वह तो खुश होते थे जब अम्मा हाथ पैर ढीले छोड़ कर दुपट्टे की गठरी बना कर सिर के नीचे रख लेती और सो रहती। शरीर का हर अंग अब्बा को निमंत्रण दे रहा होता। माँ झिलंगे पलंग पर पड़ी बड़े सुर में खर्राटे ले रही होती और चंद महीनों बाद ही हम बड़े भाई बहनों को खुशखबरी सुनाती, “सुनो बच्चों, तुम्हारा नन्हा मुन्ना सा भाई या बहन आने वाला है। अब मुझे परेशान न करना और अपने तमाम काम आप ही करने की कोशिश करना, क्योंकि मुझसे अब नहीं होते यह काम काज। काम करूँ या बच्चे पैदा करूँ? मुझे गाय भैंस समझ लिया है तुम्हारे बाप ने! हर साल गाभिन कर देता है, जानवरों की तरह।”

शम्मो सोचती अम्मा को क्या फर्क पड़ता है। मजे उड़ाती है आप और रोब मारती है हम पर। सारा काम तो मुझे ही सँभालना पड़ता है। यह भी नहीं कि बच्चे सुंदर ही पैदा कर दे, कि किसी राह चलते की हम पर नजर पड़े तो मुस्कुरा ही दे। हम चार दिन तो उसको सोच सोच कर खुश हो लेते। उसके ख्वाब देख लिया करते। फिल्मी गाना गाते समय उसी से सब कुछ जोड़ लिया करते। यह सोचते ही शम्मो के शरीर में रोमांच हो उठा।

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ऐसा लगता जैसे शम्मो बेचारी पर जवानी तो आई ही नहीं। सीधे बचपन से उठ कर प्रौढ़ा बन गई। जैसे किसी जहीन बच्चे को डबल प्रमोशन दे दी गई हो, और बच्चा अपने साथियों से बिछड़ जाने के दुख में न तो रो सके और न ही आगे बढ़ जाने की खुशी में हँस सके। गरीब की जिंदगी भी कुछ यों ही आगे बढ़ती जाती है।

शम्मो को कभी समझ नहीं आया कि वह अपनी छोटी बहन रानी का क्या करे। वह उससे बस एक ही साल छोटी है। लेकिन उसके शरीर का उठान शम्मो के मुकाबले कहीं ज्यादा जरखेज, रंग जरा खिलता हुआ पर नक्श वही नकटे, चिपटें। उसकी अदाएँ निराली थीं – न किसी से डर, न खौफ। बिंदास – छोटी छोटी आँखों को टेढ़ी करके बात किया करती; बात बात पर खिलखिला कर हँस देती; और हँसते हुए झूल सी जाती। वो जो कपड़े पहने होती, ऊँचे नीचे, बेमेल से, कहीं कहीं से सिलाई खुले हुए उन कपड़ों से जवानी झाँक रही होती। वह एक ऐसी बेरी थी जिसके कारण घर में कंकरों की आमद बनी रहती। मुहल्ले के हर लड़के को रानी जानती थी, हर लड़का उसका दोस्त था, उसका दीवाना था।

शम्मो इस मामले में भी उसकी माँ का किरदार निभाती थी। ऊँच-नीच समझाती। पर रानी की चंचल तबीयत को कौन लगाम देता? पारे की तरह अस्थिर और चंचल! घर के भीतर तो घुटन का माहौल तनाव पैदा करता। माँ बेटियाँ चुप चुप, परेशान परेशान, हर समय लेक्चर। फिक्र यही रहती कि अगले वक्त पकेगा क्या। रानी को यह सब बेकार लगता – बोरिंग! वह तो एक छलावा थी, कभी यहाँ कभी वहाँ। किस समय किसकी झुग्गी में बैठी बातें बघार रहीं होगी, यह मालूम करना मुश्किल हो जाता।

अम्मा कह कह कर थक गई थी, “रानी, तू नाक कटाएगी – नाक!” रानी एक नहीं सुनती। सारा दिन लड़के लड़कियों के साथ बाहर घूमना – खाना और खेलना, बस यही उसकी दिनचर्या थी। बेफिक्री की वजह से रंग निखरता जा रहा था और बदन गदराने लगा था। हफ्तों पहले धुले बाल भी उलझे उलझे, काले काले, चमकदार हुए रहते थे। बदबू से क्या होता है? बदबू भी तो जवान थी। जवानी की बदबू को गली के लड़के खूब अच्छी तरह समझते थे। रानी का तो काम ही था हर वक्त बोलते रहना – फिल्मी डायलॉग भी बोल लेती और गाने गाती लहक लहक कर।

अम्मा का पेट अकसर फूला और जी काँपता रहता कि वह दूसरी लड़कियों को कैसे सँभालेगी। अगर रानी को लगाम न लगा सकी तो होगा क्या? चुन्नी-मुन्नी तो पैदा होते ही पोलियो की मार खा गईं। आजतक घिसट घिसट कर चल लेती हैं, तो वो भी अल्लाह मियाँ की कृपा ही है। वर्ना इन चारों टाँगों की भी देखभाल करनी पड़ती। कौन देता पहरा इतनी सारी लड़कियों की किस्मत पर? लड़कियों के तो देखते ही देखते पंख निकल आते हैं – चिड़ियों की तरह आजाद उड़ना चाहती हैं। पता भी नहीं चलता कि कब और क्या हो गया। इन अभागिनों को भगवान ने भाई भी दिया तो एक ही। वह अभागा तो अपनी उम्र से ज्यादा ही छोटा और मासूम है। उस पर तो कोई जिम्मेदारी भी नहीं डाली जा सकती। और बेचारी अम्मा! उसके पास समय ही कहाँ बचता था – बच्चों की भूख मिटाती या उनकी देखभाल करती? अब्बा तो बच्चों की पलटन खड़ी कर, अम्मा के हवाले कर खुद जन्नत में जाकर घर बसा लिया। अम्मा को जिंदगी और मौत के बीच हिचकोले खाने के लिए अकेला छोड़ गए। अम्मा किसको देखती! किस किस का ख्याल रखती? हालाँकि सामने खड़ी फौज के सभी सिपाही उसकी अपनी कोख के जाए थे।

रानी बस्ती वालों को हैरान किए रखती थी। रोजाना उसकी शिकायतें सुन सुन अम्मा परेशान रहती। कई बार तो कह भी देती, “अगर तू न पैदा हुई होती, कलमुँही, तो दुनिया में क्या कमी रह जाती?” वैसे किसी न किसी समय तो अम्मा अपनी सभी बेटियों के बारे में यही सोचती। उसका पूरा जीवन अपने बेटे पर ही केंद्रित था। बच्चियाँ! करें भी तो क्या? क्या पढ़ाई करें? क्या उम्मीद रखें इस बस्ती के स्कूलों से? स्कूल तो वैसे ही परेशान बच्चों का जमघट लगते थे। ऊपर से अध्यापक बच्चों से भी अधिक परेशान और दुखी लगते। उनके चेहरों पर चिंता और उलझनों की लकीरें साफ दिखाई देती थीं। शायद उनके अपने घरों की भी वही समस्या थी; फिर बेचारे बच्चों को क्या खाक पढ़ाते!

रानी बता रही थी कि हिसाब की मिस का चक्कर भूगोल के टीचर से चल रहा है। यह सुन कर अम्मा ने सिर पकड़ लिया और रानी की खूब पिटाई लगाई थी, “करमजली, अपने उस्तादों के बारे में ऐसी ऊल-जलूल बातें नहीं करते – अरे वो तो अल्लाह के बंदे होते हैं। पर अम्मा को क्या मालूम कि हर घर में एक शम्मो बसती है। चक्कर चला कर शायद हिसाब वाली मिस अपना हिसाब चुकाने का प्रयास कर रही हो। वर्ना गरीब की लड़कियों का जोड़ा तो शायद भगवान के यहाँ ही बैठा रह जाता है; और लड़कियाँ बैठे बैठे गीली लकड़ियों की तरह सुलगती रहती हैं।

रानी ने अपनी इन हरकतों से कई जोड़े बनवाए और कई बनते जोड़े टूट भी गए। छेड़-छाड़ उसकी आदत थी। जहाँ किसी लड़के को किसी लड़की से बात करते देखा और ले उड़ी। सारे मुहल्ले में आजकल के पत्रकारों की तरह झूठी सच्ची खबर आग की तरह फैला देती। जिस किसी के दिल में गुदगुदी न भी हुई होती, रानी की बातें सुन होने लगती। और ऐसा ही हुआ; बहुत दिनों बाद उस बस्ती में जवान लड़के लड़की का विवाह हुआ और हिसाब की’मिस’ भूगोल के’सर’ के साथ विदा हो गई। रानी को खुशी हुई कि उसे अब दोनों विषयों को पढ़ने से छुटकारा मिल जाएगा। वैसे रानी को फर्क कहाँ पड़ता था। वह तो हर कक्षा में पीएच।डी। करके ही आगे बढ़ती। पंद्रह की हो गई थी, मगर किसी भी तरह बस तीसरी जमात में पहुँच पाई थी।

चंचल रानी एक शाम अम्मा से छेड़छाड़ करती रही कि अम्मा ने इतना दहेज जमा कर लिया है मगर लड़के ही नहीं मिलते। रानी थी बहुत तिगड़मी। बचपन से सारे मुहल्ले की इंस्पेक्शन करना उसका प्रिय शुगल था। घर घर के समाचार मालूम करना, फिर उनका प्रचार – वह अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्य समझती थी। अम्मा को बताए बिना अंकल जी के यहाँ उसने बरतन माँजने की छोटी सी नौकरी कर ली थी। यों तो अंकल जी की आड़ में तो आजकल बहुत कुछ होने लगा था। सिर्फ अंकल जी कह देना होता था… बस! अंकल जी को पासपोर्ट मिल जाता था कहीं भी जाने का।

रानी को इतने पैसे मिल जाते थे कि चाट खा लेती, सुर्ख़ी खरीद लेती; कभी मोटे मोटे गोल गोल होंठों को लाल लाल रंग लेती; कभी नाखूनों की हदों से बाहर को फैली हुई ऊबड़ खाबड़ नेल पॉलिश पोते जवानों व बूढ़े मर्दों के ईमान डगमगाती रहती। धड़ल्ले से घर घर की खबर व खैरियत मालूम किया करती।

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अंकलजी और आंटी जी दोनों ही उसके स्वभाव से बहुत खुश रहते। मजबूत बाजुओं से पतीलियाँ चमाचम चमका दिया करती। अंकल जी की आँखें उसको देख कर पतीलियों से भी कहीं अधिक चमक जातीं। आंटी जी रोज-ब-रोज उसके काम बढ़ाती जातीं पर मजदूरी न बढ़ातीं। बदले में रात की बासी रोटी पर दाल रख कर खाने को दे देतीं। रानी के लिए वही दाल मल्टी-विटामिन का काम करती। ऐसी निखरी जा रही थी कि दूसरी बहनें उसे सिंड्रेला समझ कर जलने लगी थीं।

एक दिन मौका देख कर अंकल जी ने उसकी उम्र पूछ ही ली। साढ़े अट्ठारह साल! अंकल जी ने कुछ हिसाब लगाया। उँगलियों पर नहीं – मन ही मन। आँखें नचाईं और रानी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “तेरे घर में आईना है?” रानी को आँखों के आईने में सब कुछ नजर आ गया। जरा इतरा कर बोली, “अंकल जी मुझे आंटी जी बहुत अच्छी लगती हैं। कितनी जवान भी हैं। आपसे तो बहुत छोटी हैं।”

“अरे तो क्या हुआ? मर्द को उम्र से नहीं जाँचा जाता।”

“फिर कैसे जाँचा जाता है?” रानी ने जबान ऐंठा कर कहा, जैसे मजाक उड़ा रही हो।

अंकल जी लड़खड़ा गए। उम्र का अहसास होते ही बोल पड़े, “तुम्हारी कोई बड़ी बहन भी है क्या?”

“हाँ, है तो…!” रानी ने’तो’ को इतना लंबा खींच दिया, और फिर छोटी छोटी काली काली आँखों से, जिनमें ये काजल बाहर को उबला पड़ रहा था, घुमा कर झपक कर टेढ़ी करते हुए दोबारा आवाज लगाई, “अंकल जी, बोलो न! कहाँ खो गए?”

अंकल जी तो उलझ गए थे। खोए कहाँ थे? रानी के कंधे पर रखा हाथ इतना हल्का पड़ गया था कि महसूस ही नहीं हो रहा था कि कहाँ गया उनका वह हाथ।

रानी ने सारे मुहल्ले में घूम घूम कर दोस्तियाँ बना बना कर और दोस्ती न निभा कर जो पीएच।डी। की थी – तजुरबे की पीएच।डी। – उस पर अंकल जी जैसे कई एक कुरबान किए जा सकते थे। गरीब लड़की जिन जिन राहों से जितनी मंजिलें तय करती है, हर मंजिल की अपनी एक कहानी होती है।

न जाने ऐसी कितनी कहानियों से रानी गुजर चुकी थी। अब तो उसको एक ही धुन थी – शम्मो की शादी! बाजी रास्ते से हटे तो उसका काम बने! रानी ने फट से शम्मो की बातें शुरू कर दीं, “बाजी के नक्श बहुत तीखे हैं, रंग खुलता हुआ साँवला है, लंबी और पतली हैं मेरी बाजी, सिलाई बहुत अच्छी करती हैं – खाना भी बहुत स्वाद पकाती हैं! मेरे इकलौते भाई को भी उसी ने पाला है – बच्चे अच्छे पाल लेती है।”

अंकल जी तो काली छोटी छोटी चमकती आँखों, भरे भरे मोटे मोटे होंठ और काले काले बालों में उलझ गए थे पर वह भी तजुरबेकार थे, “तुम्हारी बाजी की… उम्र क्या होगी भला?”

“यही कोई पच्चीस साल।”

“शादी क्यों नहीं हुई अभी तक?” डूबती हुई आवाज अंकल के हलक से बाहर आई।

“अरे अंकल, अगर उसकी शादी हो जाती तो फिर भाई की देखभाल कौन करता?”

“भाई कितना बड़ा है?”

“बीस का होगा?”

“क्या करता है?”

“बहुत अच्छे लोगों की सोहबत में पड़ गया है। उसे पढ़ा रहे हैं और ऊपर से खर्च करने को पैसे भी देते हैं। माँ… उसके लाए पैसों से ही हमारा दहेज बना रही है। …बाजी के लिए चार ही दिन पहले टीन का चमकता हुआ संदूक भी आ गया है। …भाई जब पैसे लाएगा, तो बर्तन खरीदेगी माँ।” मिनटों में रानी ने अपनी कैंचीदार जबान से घर की तमाम पोल खोल दी; और अंकल जी को गौर से देखती रही कि कहीं खिसक न जाएँ, बदल न जाएँ। अंकल जी ने बाजी की उम्र पर ऐतराज करते हुए दूसरी शादी कर लेने का अहसान रानी के कंधों पर डाल दिया। बहुत दूर की सोच ली थी अंकल जी ने – शादी के बाद रानी का आना जाना भी तो लगा रहेगा – कभी न कभी तो पकड़ में आ ही जाएगी। आंटी जी को तो जैसे भूल ही गए थे।

रानी खुद हैरान थी कि आंटी जी को कैसे समझाएँगे… क्या बताएँगे? …क्या ये सचमुच की शादी करेंगे भी या यों ही कह रहे हैं। वह बेचैन थी अम्मा को यह खुशखबरी सुनाने को… मगर कहेगी क्या? घबरा कर बोली, “अंकल जी, आप अम्मा से खुद ही बात कर लीजिए न…!”

अंकल जी की आवाज जैसे किसी गहरे कुएँ में से बाहर आई, “अच्छा!” उन्होंने कह तो दिया, परंतु लगा जैसे कुएँ में झाँकते हुए गहराई से आवाज गूँज कर बार बार कानों से टकरा रही है, और पानी में खिचड़ी बाल, चेहरे की गहरी लकीरें भी नजर आ रही हैं। रंग अपने चेहरे का दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि कुएँ के अँधेरे में घुलमिल गया था।

रानी को आंटी जी पर रहम आने लगा, “अंकल जी फिर आंटी जी का क्या होगा?”

“अरे होना क्या है, पहली बीवी के तमाम हक तो उन्हें मिलेंगे ही।”

“तो फिर बाजी…?”

वह बात पूरी भी नही कर पाई थी कि अंकल जी ने ऐसे सिर को लहराया कि उनके बालों के चमकते हुए सिर में लगे तेल से रानी की आँखें चौंधिया गईं। रानी मुस्कुरा दी। अंकल जी शरमा गए। माथे पर आए पसीने को रुमाल निकाल कर पोंछने लगे। रानी को जल्दी पड़ी थी माँ को खुशखबरी सुनाने की। आखिर उसने बाजी के लिए वर ढूँढ़ ही लिया। जी तो चाह रहा था कि अम्मा से कहे, “बाजी के लिए लड़का ढूँढ़ लिया है!” अंकल जी चाहे जैसे हैं आखिर हैं तो इनसान का बच्चा। अब यह अलग बात है कि अंकल जी अपने बच्चों के घर भी बसा चुके हैं।

आज बहुत दिनों बाद माँ के मुरझाए चेहरे और सूखी आँखों में चमक महसूस हुई। माँ अंकल जी से मिलने को बेचैन सी थी। वह चाह रही थी कि शम्मो आज जल्दी सो जाए तो वह रानी से पूरी कथा सुन सके। अगर शम्मो ने साफ मना कर दिया तो मुश्किल हो जाएगी। किंतु शम्मो आज किसी और वजह से परेशान है, “अम्मा, मुझे नहीं पसंद भैया का व्यवहार। अचानक इतनी देर रात तक गायब रहने लगा है। ठीक है लोग अच्छे हैं पैसे भी देते हैं, मगर माँ परिवार को भुला तो नहीं देना चाहिए न!”

अम्मा उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देती। उसको तो जल्दी पड़ी है कि शम्मो सो जाए तो वह रानी से कानाफूसी शुरू कर सके। तीनों छोटी लड़कियाँ अपने हालात से बेखबर पड़ी सो रही थीं। सोने में हँसती भी थीं और रोती भी। अभी रानी की तरह उनको फिक्र नहीं होती थी हाथ पीले कराने की। बस एक ही तमन्ना थी – अच्छा पहनने को मिल जाए और पेट भर खाना नसीब हो जाए।

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अम्मा ने मौका ढूँढ़ कर रानी से अंकल जी के बारे में मालूम किया और पेशानी की लकीरें कुछ और गहरी हो गईं। सोच कर बोलीं, “अगर अलग घर ले कर रखें तो क्या बुरा है? बेचारी शम्मो कब तक झिलंगे पलंग की बाँध तोड़ती रहेगी। शम्मो निकले तो तेरा रास्ता खुले। मैं भला कब तक बैठी रखवाली करती रहूँगी जवान बेटियों की? …तुम बहनें अपने अपने घर जाओ तो बहू घर लाने की सोचूँ। …और फिर नए रिश्ते बनते हैं तो नए नए चेहरे भी सामने दिखाई देने लगते हैं। अब तो गुड्डू भी जवान है, भला कब तक बहनों की खिदमत करता रहेगा बेचारा।”

“कैसी खिदमत!”, सोच रही थी रानी। कल तक तो उसे गुसलखाने जाने की तमीज नहीं थी। बस दो सालों से ही तो कहीं से पैसे लाने लगा है। …वैसे अजीब सा बद-तहजीब भी हो गया है। जब देखो बहनों को भाषण देना शुरू कर देता है। अम्मा खुश हैं। उनका बेटा कमाऊ जो हो गया है। “रहने दो अम्मा, अभी तक किताबें कहाँ ठीक से पढ़ पाता है।” रानी बीच में टपक ही पड़ी। अम्मा भला गुड्डू के विरुद्ध कहाँ कुछ सुन सकती थीं। बस एक हत्थड़ पड़ा रानी की पीठ पर – चटपटा सा!

अंकल जी की बेचैनी उनके नियंत्रण से बाहर होती जा रही थी। शम्मो ने भी हाँ कर दी थी। वह भी जीवन की पगडंडी बदलने को तैयार थी। थक गई थी अपनी बदरंग जिंदगी से – बस एक ही काम था, सेवा, सेवा, सेवा…

घर में अचनाक उजाला फैल गया था। इसका दुख किसी को नहीं था कि उन सबका ध्यान रखने वाली बहन अपने से दोगुनी उम्र वाले अंकल जी की आंटी नंबर दो बनने जा रही थी। अभी से सोचा जाने लगा कि शम्मो के पलंग पर कौन सोएगा।

अम्मा को भी यह ख्याल नहीं आया था कि घर का चूल्हा चौका, सिलाई बुनाई, सफाई धुलाई और टूटे हुए ट्रांजिस्टर से घर में संगीत का वातावरण कौन बनाएगा। शम्मो की साँवली सलोनी रंगत, घने काले बाल, बड़ी बड़ी सोचती आँखें – सब कुछ यहाँ इस छोटी चार-दीवारी के घर से उठ कर’अंकल जी’ के आँगन में जा बसेगी।’अंकल जी’ को जवानी भी मिलेगी और एक ट्रेंड नौकरानी भी। एक मजबूत बदन नौकरानी जो सोचती अधिक है और बोलती कम।

शम्मो का किसी को भी ध्यान नहीं आया कि उसके दिल के भीतर क्या कुछ घटित हो रहा है। उसे सबसे अधिक चिंता अपने पुत्र-समान भाई की हो रही थी। चिंता तो उसके जीवन का एक अहम हिस्सा थी। अगर शम्मो इस घर को माँ बन कर न सँभालती, तो अम्मा तो बस बच्चे पैदा करने की मशीन ही बनी रहती। वो तो ऊपर वाले का भला हो जिसने अब्बा को याद कर लिया।

शम्मो गुड्डू के लिए बेचैन रहती। जब से बाहर निकलना शुरू किया है, पैसे को कमाकर लाने लगा है। ईमान भी पुख्ता हो गया है। बहनों पर नजर रखने लगा है – खास तौर पर रानी की चंचलता पर। शम्मो की शादी के भी पक्ष में था, “तो क्या हुआ अगर अंकलजी की दूसरी पत्नी बन रही है। इसकी तो पूरी इजाजत है हमारे मजहब में।” शम्मो हैरान! जिस बच्चे को अपने हाथों से खिलाया, नहलाया, धुलाया, समझाया आज वही उसकी किस्मत का फैसला करने बैठ गया क्योंकि मजहबी हो गया था।

गुड्डू ने शम्मो के हाथ में रुपयों की गड्डी देते हुए कहा, “बाजी, यह सारा पैसा सिर्फ शादी के कामों में ही खर्च होगा। …हाँ मैं आज रात जरा घर आने में लेट हो जाऊँगा।”

शम्मो ने अपने जीवन में कभी इतने रुपए हाथ में नहीं पकड़े थे। उस नोटों की गड्डी का स्पर्श ही उसको’अंकल जी’ के आँगन में ले उड़ा। दुल्हन बन गई वह। अपनी आँखों में आप ही अपने को’अंकल जी’ की बाँहों में समर्पित कर दिया। बार बार सोचती कि वह रुपए अम्मा के हाथों में दे दे या सिर्फ शादी के कामों के लिए रख ले। सोचते सोचते आँख लग गई और आज वही झिलंगा पलंग उसके लिए दुल्हन की सेज बन गया।

सारी रात दुल्हन की सेज पर पड़ी शम्मो आज सूरज चढ़ने के बाद जागी तो घर में सभी चलते फिरते नजर आए। रानी सवेरे ही अपनी इंस्पेक्शन ड्यूटी निभाने जा चुकी थी। शम्मो सोच रही थी – काश! मैं भी रानी की तरह दूसरे नंबर पर जन्म लेती तो मेरा जीवन भी ऐसा चंचल, लापरवाह सा होता। रानी कितनी भाग्यवान है उस पर कोई रोक टोक नहीं; जो चाहे जैसा चाहे वही हो जाता है। रानी है भी तो इतनी प्यारी बहन। और फिर आज उसी के कारण मेरा भी तो घर बसने वाला है। मैं दुल्हन बनूँगी… अंकल जी के आँगन में जा बसूँगी… साफ सुथरा घर होगा मेरा… सबको वहीं बुला कर मिल लिया करूँगी… अंकल जी के पास, उन्हीं के साथ, उन्हीं के चरणों में जीवन बिता दूँगी… बस।

आज शम्मो का घर के काम में दिल नहीं लग रहा। बेदिली से रसोई में काम कर रही है। हर आहट पर चौंक चौंक जाती है। कभी मुस्कुराती है तो कभी पेशानी पर बल से पड़ जाते हैं। झुँझला कर छलनी हुई ओढ़नी सिर पर खींच कर डाल लेती है। सोचने लगती है… शरमा जाती है… जब रसोई में अंकल जी के लिए नाश्ता बनाएगी तो वह स्वयं आकर रसोई में उसका हाथ बँटाएँगे। हाथ पकड़ कर कमरे में चलने को कहेंगे… सारा काम छोड़ कर उनसे लिपट जाएगी… उसके हाथ में पकड़ी पतीली धड़ाम से गिरती है और जैसे सारे बर्तन इकट्ठा चिल्लाने लगते हैं… शोर मचाने लगते हैं। …क्या हुआ? …क्या हुआ? …शम्मो शरमा जाती है… कैसे बताए कि वह उनकी बाँहों में गई और यह हादसा हो गया।

दरवाजे पर पड़ती थाप सबको चौकन्ना कर देती है। अम्मा जानती है कौन होगा। अंकल को देखने की चाह में जल्दी से दरवाजा खोलती है। कुछ समझ में नहीं आता। पलट कर रसोई की तरफ देखती है। शम्मो तो वहीं खड़ी है। फिर अंकल जी के साथ घूँघट काढ़े कौन खड़ी है? अंकल जी बोस्की का कुर्ता और सफेद पाजामा पहने सहन के बीचो बीच आ खड़े होते हैं… पसीने से सराबोर… घबराई आवाज में अम्मा से आशीर्वाद देने को कहते हैं।

हमेशा की तरह माँ कुछ भी सोच नहीं पा रही। शम्मो सब समझ जाती है। एक बार फिर वही अम्मा की ड्यूटी अंजाम देती है। घूँघट उठा कर रानी के सिर पर हाथ फेरते हुए घुटी आवाज में कहती है, “हमेशा खुश रहो।”

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