औरत जो नदी है | जयश्री रॉय

औरत जो नदी है | जयश्री रॉय

औरत जो नदी है | जयश्री रॉय – Aurat Jo Nadi Hai औरत जो नदी है | जयश्री रॉय मार्च का महीना – हमेशा की तरह उदास और उलंग… धूल के अनवरत उठते बवंडर के बीच पलाश की निर्वसन डालों पर सुलगते रंगों की अनायास खुलती गाँठें और हवा में उड़ते सेमल के रेशमी फूलों … Read more

आदिग्राम उपाख्यान | कुणाल सिंह

आदिग्राम उपाख्यान | कुणाल सिंह

आदिग्राम उपाख्यान | कुणाल सिंह – Adigram Upakhyan आदिग्राम उपाख्यान | कुणाल सिंह “The time has come,” the Walrus said, “To talk of many things.”                                          – Alice in Wonderland मलबे का मालिक कोई नहीं था। जंगल में … Read more

मेरा पता कोई और है | कविता

मेरा पता कोई और है | कविता

मेरा पता कोई और है | कविता – Mera Pata Koi Aur Hai मेरा पता कोई और है | कविता राजेंद्र जी के लिए जिनका होना मेरे लिए आश्वस्ति है… मैं जहाँ हूँ सिर्फ वहीं नहीं, मैं जहाँ नहीं हूँ वहाँ भी हूँ मुझे यूँ न मुझमें तलाश कर कि मेरा पता कोई और है … Read more

अगन-हिंडोला

कांधार के रोह प्रदेश का आकाश महीनों से अपना रंग बदल रहा है। वह रंग नीला नहीं है, धूसर और भूरा है। तेज सर्द हवाओं का झोंका रह रह कर दरख्तों के वजूद को हिला रहा है। ऐसा जान पड़ता है अब बादल घिर आएँगे और बड़ी-बड़ी बूँदे गिरेंगी। सुलेमान पहाड़ की तलहटी में बसा … Read more

गोरा अध्याय 20 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 20 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 20 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adyay 20 गोरा अध्याय 20 | रविंद्रनाथ टैगोर अपने यहाँ बहुत दिन उत्पीड़न सहकर आनंदमई के पास बिताए हुए इन कुछ दिनों में जैसी सांत्‍वना सुचरिता को मिली वैसी उसने कभी नहीं पाई थी। आनंदमई ने ऐसे सरल भाव से उसे अपने इतना समीप खींच लिया कि … Read more

गोरा अध्याय 19 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 19 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 19 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adhay 19 गोरा अध्याय 19 | रविंद्रनाथ टैगोर गोरा आजकल अलस्सुबह ही घर से निकल जाता है, विनय यह जानता था। इसीलिए सोमवार को सबेरे वह भोर होने से पहले ही गोरा के घर जा पहुँचा और सीधे ऊपर की मंजिल में उसके सोने के कमरे में … Read more

गोरा अध्याय 18 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 18 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 18 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adhay 18 गोरा अध्याय 18 | रविंद्रनाथ टैगोर हरिमोहिनी ने पूछा, ”राधारानी, तुमने कल रात को कुछ खाया क्यों नहीं?” विस्मित होकर सुचरिता ने कहा, ”क्यों, खाया तो था।” हरिमोहिनी ने रात से ज्यों का त्यों ढँका रखा खाना दिखाते हुए कहा, ”कहाँ खाया? सब तो पड़ा … Read more

गोरा अध्याय 17 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 17 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 17 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adhay 17 गोरा अध्याय 17 | रविंद्रनाथ टैगोर आनंदमई से विनय ने कहा, ”देखो माँ, मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, जब-जब भी मैं मूर्ति को प्रणाम करता रहा हूँ मन-ही-मन मुझे न जाने कैसी शर्म आती रही है। उस शर्म को मैंने छिपाए रखा है- बल्कि उल्टे … Read more

गोरा अध्याय 16 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 16 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 16 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adhay 16 गोरा अध्याय 16 | रविंद्रनाथ टैगोर विनय यह समझ गया था कि ललिता के साथ उसके विवाह की बातचीत करने के लिए ही सुचरिता ने उसे बुलाया है। उसने यह प्रस्ताव अपनी ओर से समाप्त कर दिया है, इतने से ही तो मामला समाप्त नहीं … Read more

गोरा अध्याय 15 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 15 | रविंद्रनाथ टैगोर

गोरा अध्याय 15 | रविंद्रनाथ टैगोर – Gora Adhay 15 गोरा अध्याय 15 | रविंद्रनाथ टैगोर परेशबाबू ने कहा, ”विनय, ललिता को एक मुसीबत से उबारने के लिए तुम कोई दुस्साहस पूर्ण काम कर बैठो, ऐसा मैं नहीं चाहता। समाज की आलोचना का अधिक मूल्य नहीं है, जिसे लेकर आज इतनी हलचल है, दो दिन … Read more