Category Literature

औरत जो नदी है – Jayashree Roy

मार्च का महीना – हमेशा की तरह उदास और उलंग… धूल के अनवरत उठते बवंडर के बीच पलाश की निर्वसन डालों पर सुलगते रंगों की अनायास खुलती गाँठें और हवा में उड़ते सेमल के रेशमी फूलों के दिन – सपनों…

मेरा पता कोई और है

राजेंद्र जी के लिए जिनका होना मेरे लिए आश्वस्ति है… मैं जहाँ हूँ सिर्फ वहीं नहीं, मैं जहाँ नहीं हूँ वहाँ भी हूँ मुझे यूँ न मुझमें तलाश कर कि मेरा पता कोई और है शीर्षक के लिए प्रसिद्ध शायर…

अगन-हिंडोला

कांधार के रोह प्रदेश का आकाश महीनों से अपना रंग बदल रहा है। वह रंग नीला नहीं है, धूसर और भूरा है। तेज सर्द हवाओं का झोंका रह रह कर दरख्तों के वजूद को हिला रहा है। ऐसा जान पड़ता…

गरजत-बरसत अध्याय 5

रात तीन बजे के आसपास अक्सर कोई जाना पहचाना आदमी आकर जगा देता है । किस रात कौन आयेगा? कौन जगायेगा? क्या कहेगा यह पता नहीं होता। जाग जाने के बाद रात के सन्नाटे और एक अनबूझी सी नीरवता में…

गरजत-बरसत अध्याय 4

रात तीन बजे के आसपास अक्सर कोई जाना पहचाना आदमी आकर जगा देता है । किस रात कौन आयेगा? कौन जगायेगा? क्या कहेगा यह पता नहीं होता। जाग जाने के बाद रात के सन्नाटे और एक अनबूझी सी नीरवता में…

गरजत-बरसत अध्याय 3

अब्बा और अम्मां नहीं रहे। पहले खाला गुजरी उसके एक साल बाद खालू ने भी जामे अजल पिया। मतलू मंज़िल में अब कोई नहीं रहता। खाना पकाने वाली बुआ का बड़ा लड़का बाहरी कमरे में रहता है। मल्लू मंजिल का…

गरजत-बरसत अध्याय 2

मैं सिगरेट खरीदकर मुड़ा ही था कि मोहसिन टेढ़े के दीदार हो गये। दिल्ली की बाज़ार में कोई पुराना मिल जाये तो क्या कहने। मोहसिन टेढ़े ने भी मुझे देख लिया था और उसके चेहरे पर फुलझड़ियां छुट रही थीं।यार…

गरजत-बरसत अध्याय 1

मेरे रंग-ढंग से सबको यह अंदाज़ा लग चुका था कि दिल्ली ने मेरी कमर पर लात मारी है और साल-डेढ़ साल नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरने के बाद मैं घर लौटा हूं। अपमानित होने का भाव कम करने के…

गोरा अध्याय 20

अपने यहाँ बहुत दिन उत्पीड़न सहकर आनंदमई के पास बिताए हुए इन कुछ दिनों में जैसी सांत्‍वना सुचरिता को मिली वैसी उसने कभी नहीं पाई थी। आनंदमई ने ऐसे सरल भाव से उसे अपने इतना समीप खींच लिया कि सुचरिता…