औरत जो नदी है – Jayashree Roy

मार्च का महीना – हमेशा की तरह उदास और उलंग… धूल के अनवरत उठते बवंडर के बीच पलाश की निर्वसन डालों पर सुलगते रंगों की अनायास खुलती गाँठें और हवा में उड़ते सेमल के रेशमी फूलों के दिन – सपनों के अँखुआने और निःशब्द झर जाने का वही वेमुरव्वत मौसम… ये सिरे से उदास हो … Read more

आदिग्राम उपाख्यान | Kunal Singh |Hindi Novel | हिंदी उपन्यास

“The time has come,” the Walrus said, “To talk of many things.”                                          – Alice in Wonderland मलबे का मालिक कोई नहीं था। जंगल में खूँखार जानवर रहते हैं – यह कहने की शुरुआत कब से हुई ? … Read more

मेरा पता कोई और है

राजेंद्र जी के लिए जिनका होना मेरे लिए आश्वस्ति है… मैं जहाँ हूँ सिर्फ वहीं नहीं, मैं जहाँ नहीं हूँ वहाँ भी हूँ मुझे यूँ न मुझमें तलाश कर कि मेरा पता कोई और है शीर्षक के लिए प्रसिद्ध शायर राजेश रेड्डी का आभार आभार साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, धर्मवीर भारती, अज्ञेय और सुधीर सक्सेना का भी जिनकी … Read more

अगन-हिंडोला

कांधार के रोह प्रदेश का आकाश महीनों से अपना रंग बदल रहा है। वह रंग नीला नहीं है, धूसर और भूरा है। तेज सर्द हवाओं का झोंका रह रह कर दरख्तों के वजूद को हिला रहा है। ऐसा जान पड़ता है अब बादल घिर आएँगे और बड़ी-बड़ी बूँदे गिरेंगी। सुलेमान पहाड़ की तलहटी में बसा … Read more

गरजत-बरसत अध्याय 5

रात तीन बजे के आसपास अक्सर कोई जाना पहचाना आदमी आकर जगा देता है । किस रात कौन आयेगा? कौन जगायेगा? क्या कहेगा यह पता नहीं होता। जाग जाने के बाद रात के सन्नाटे और एक अनबूझी सी नीरवता में यादों का सिलसिला चल निकलता है। कड़ियां जुड़ती चली जाती है और अपने आपको इस … Read more

गरजत-बरसत अध्याय 4

रात तीन बजे के आसपास अक्सर कोई जाना पहचाना आदमी आकर जगा देता है । किस रात कौन आयेगा? कौन जगायेगा? क्या कहेगा यह पता नहीं होता। जाग जाने के बाद रात के सन्नाटे और एक अनबूझी सी नीरवता में यादों का सिलसिला चल निकलता है। कड़ियां जुड़ती चली जाती है और अपने आपको इस … Read more

गरजत-बरसत अध्याय 3

अब्बा और अम्मां नहीं रहे। पहले खाला गुजरी उसके एक साल बाद खालू ने भी जामे अजल पिया। मतलू मंज़िल में अब कोई नहीं रहता। खाना पकाने वाली बुआ का बड़ा लड़का बाहरी कमरे में रहता है। मल्लू मंजिल का टीन का फाटक बुरी तरह जंग खा गया है। ऊपर बेगुन बेलिया की जो लता … Read more

गरजत-बरसत अध्याय 2

मैं सिगरेट खरीदकर मुड़ा ही था कि मोहसिन टेढ़े के दीदार हो गये। दिल्ली की बाज़ार में कोई पुराना मिल जाये तो क्या कहने। मोहसिन टेढ़े ने भी मुझे देख लिया था और उसके चेहरे पर फुलझड़ियां छुट रही थीं।यार तुम कहां रहते हो. . .कसम खुदा की बड़ा गुस्सा आता है तुम्हारे ऊपर।” मोहसिन … Read more

गरजत-बरसत अध्याय 1

मेरे रंग-ढंग से सबको यह अंदाज़ा लग चुका था कि दिल्ली ने मेरी कमर पर लात मारी है और साल-डेढ़ साल नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरने के बाद मैं घर लौटा हूं। अपमानित होने का भाव कम करने के लिए मैं लगातार ऊपर वाले कमरे में पड़ा सोचा करता था या ‘जासूसी दुनिया` पढ़ा … Read more

गोरा अध्याय 20

अपने यहाँ बहुत दिन उत्पीड़न सहकर आनंदमई के पास बिताए हुए इन कुछ दिनों में जैसी सांत्‍वना सुचरिता को मिली वैसी उसने कभी नहीं पाई थी। आनंदमई ने ऐसे सरल भाव से उसे अपने इतना समीप खींच लिया कि सुचरिता यह सोच ही नहीं सकी कि कभी वे उससे दूर या अपरिचित थीं। न जाने … Read more