हरी दूब की कच्ची सुगंध

“क्यों इतना काम करते हो?” “परिवार के लिए…!” “जो भी कमाते हो हमारे परिवार के लिए काफी है। “शीना मैं तुमको बहुत सुखी और हँसता मुस्कुराता देखना चाहता हूँ।” “मैं खुश रहूँगी जब तुम ये लैपटॉप और उसका काम ऑफिस में छोड़ कर आया करोगे।” “अरे यार कैसी बात करती हो? ये ऑफिस का थोड़े … Read more

सीप में बंद घुटन

आज वह घुट रही थी कि रवि चुप क्यों है -!! जब रवि की बड़ी बड़ी शरबती आँखों में शीला की गहरी काली काली आँखों ने झाँका था तो रवि ने अपनी आँखें ऐसे बंद कर ली थीं जैसे उसने शीला के पूरे वजूद को अपनी लंबी लंबी पलकों वाली आँखों में समाँ लिया हो… … Read more

साँकल

क्या उसने अपने गिरने की कोई सीमा तय नहीं कर रखी? सीमा के आँसुओं ने भी बहने की सीमा तोड़ दी है…। इनकार कर दिया रुकने से…। आँसू बेतहाशा बहे जा रहे हैं…। वह चाह रही है कि समीर कमरे में आए और एक बार फिर अपने नन्हें मुन्ने हाथों से सूखा धनिया मुँह में … Read more

मारिया

सभी एक दूसरे से आँखें चुरा रहे थे। अजब-सा माहौल था। हर इनसान पत्र-पत्रिकाओं को इतना ऊँचा उठाए पढ़ रहा था कि एक दूसरे का चेहरा तक दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ कपड़ों से अंदाजा होता था कि कौन एशियन है और कौन ब्रिटिश, वर्ना चेहरे तो सभी के ढके हुए थे। और जो … Read more

मेरे हिस्से की धूप

गरमी और उस पर बला की उमस! कपड़े जैसे शरीर से चिपके जा रहे थे। शम्मो उन कपड़ों को सँभाल कर शरीर से अलग करती, कहीं पसीने की तेजी से गल न जाएँ। आम्मा ने कह दिया था, “अब शादी तक इसी जोड़े से गुजारा करना है।” जिंदगी भर जो लोगों के यहाँ से जमा … Read more

बाबुल मोरा

“माँ मैंने कह दिया, मैं यह घर नहीं छोड़ूँगी।” “क्यों नहीं छोड़ेगी और कैसे नहीं छोड़ेगी…?” “क्योंकि यह मेरा भी घर है।” “यह किसने कह दिया तुझ से…?” “यह मेरे डैड का घर है…!” “मैं तुझे यहाँ नहीं रहने दूँगी क्योंकि तू फिल के साथ नहीं रहने को तैयार है।” “मैं क्यों रहूँ उसके साथ…? … Read more

बस एक कदम

“नहीं मैं नहीं आऊँगी।” शैली को अपनी आवाज में भरे आत्मविश्वास पर स्वयं ही यकीन नहीं हो पा रहा था…। और वह खामोश हो गई। टेलिफोन के दूसरे छोर से आवाज छन छन कर बाहर आ रही थी, “हलो, हलो, फोन बंद मत कीजिए… प्लीज!” “नहीं, मैं फोन बंद नहीं कर रही… मगर… मैं आऊँगी … Read more

बेचारी ईडियट

लाल पीली और नीली रोशनियाँ… गोल गोल छोटे बड़े रंगीन शीशे के चहुँ ओर लटकते हुए कुमकुमे… कमरे में बैठे सभी पुरुषों एवं महिलाओं के जीवट ठहाके… और उनके कपड़ों में बस दो ही रंग मुख्य रूप से उभरते दिखाई दे रहे थे… लाल और काला! औरतों के लाल ब्लाउज, तिकोने नीचे कट वाले गले … Read more

ढीठ मुस्कुराहटें

“अरे भई रानी मेरी एड़ी को गुदगुदा क्यों रही हो… क्या करती हो भई… ये क्या हो रहा है… यह गीला गीला क्या है… अरे अब तो जलन भी हो रही है… उठो जागो भी, देखो क्या हो गया है…!” रानी ने अंगड़ाई लेते हुए करवट बदली और फिर से मुँह ढक कर सो गई। … Read more

कच्चा गोश्त

बित्ते भर का कद और दस गिरह लंबी जबान…! और जब यह जबान कतरनी की भाँति चलती तो बृज बिहारी बहादुर भी बगलें झाँकते दिखाई देते। भिड़ के छत्ते को छेड़ने से पहले सोचना चाहिए था न कि पंचायत के सरपंच बने बैठे हैं। और दबदबा ऐसा कि परिंदा भी पर मारते डरे। फिर मदन … Read more