मारिया

सभी एक दूसरे से आँखें चुरा रहे थे।

अजब-सा माहौल था। हर इनसान पत्र-पत्रिकाओं को इतना ऊँचा उठाए पढ़ रहा था कि एक दूसरे का चेहरा तक दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ कपड़ों से अंदाजा होता था कि कौन एशियन है और कौन ब्रिटिश, वर्ना चेहरे तो सभी के ढके हुए थे। और जो मुजरिम थे वो शांत और बेफिक्र बैठे थे, जैसे उन्होंने कोई जुर्म किया ही न हो। मुजरिम पैदा करने वाली तो बस माँएँ थीं।

कुछ सिरफिरे तो यहाँ तक कह देते थे कि भगवान का भी तो यह जुर्म ही है जिसने इस सृष्टि की रचना की। क्या मिला उसे? क्या हासिल हुआ? हर पल हर लम्हा अपने विद्रोही बंदों के हाथों जलील ही तो होता रहता है! हर घड़ी उसे चुनौती दी जाती है, ललकारा जाता है। कितने लोग सच्चे दिल और बिना किसी स्वार्थ के उसे याद करते हैं? सिर्फ शिकायतें, फरियादें और मुसीबत ही में उसे याद किया जाता है।

बिल्कुल उसी तरह मारिया की माँ मार्था भी अपनी बेटी के समय से पहले माँ बनने की घड़ी से शर्मिंदा-शर्मिंदा, भारी-भारी कदमों से, क्लिनिक से बाहर निकल रही थी। जाते-जाते अपनी ही तरह की दो तीन माँओं से उसकी मुठभेड़ हो गई। सबने नजरें झुका लीं। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे सभी कब्रिस्तान में मुर्दे दफन करने जा रहे हों। सबके चेहरे उदास-उदास, बेरौनक, मुरझाए-मुरझाए से लग रहे थे। जैसे सब कुछ लुट गया हो – कुछ न बचा हो।

मार्था भी जिधर को कदम उठे चल दी। कुछ अंदाजा ही नहीं था कि किधर जा रही है। पतली-सी एक पगडंडी थी जिसके दोनों ओर शाह-बलूत के पेड़ अपने हरे-हरे पत्तों से मुक्ति पा चुके थे। काली-काली शाखें लिए नंग धड़ंग, लजाए-लजाए, शर्मिंदा-शर्मिंदा से खड़े थे। पीले और आग के रंग में रंगे हुए पत्ते मार्था के कदमों के नीचे दब-दब कर ऐसे कराह रहे थे जैसे किसी बच्चे का गला घोंटा जा रहा हो। जो हाथ बढ़ा-बढ़ा कर सहायता माँग रहा हो, गिड़गिड़ा कर प्रार्थना कर रहा हो कि मुझे बचाओ, मुझे बचाओ। मेरा क्या कुसूर है? मैंने क्या अपराध किया है? मुझे किस बात की सजा दी जा रही है?

मार्था घबरा कर तेज-तेज और लंबे-लंबे कदम उठाने लगी, किंतु आवाज भी वैसी ही तेज होती चली गई। मार्था का गला रुँध गया। कदम रुक गए और वह पास ही पड़ी एक बेंच पर बैठ गई। आँखें डबडबा आईं और फिर सबकुछ धुँधला-धुँधला नजर आने लगा। आँखों से मोटे-मोटे और गरम-गरम आँसू गालों पर बहने लगे। जैसे उसके आँसुओं में सारा संसार डूब गया हो, गर्क हो गया हो। आँखें बंद थीं पर सब कुछ देख रही थीं। दरख्तों की ओट से क्लिनिक की इमारत दिखाई दे रही थी। किंतु मार्था बार-बार इस भवन से आँखें चुरा रही थी कि कहीं कोई यह न समझ जाए कि मारिया को उसने वहाँ छोड़ा हुआ है। फिर हर व्यक्ति के दिमाग में हजारों प्रश्न उठेंगे। होंठों तक आएँगे और उनका इजहार किया जाएगा।

मार्था किस किस को जवाब देगी? कितने झूठ बोलेगी? एक झूठ से दसियों सवाल और पैदा होते हैं। अगर एक बार हिम्मत करके सच बोल दिया जाए, तो सिर्फ एक ही जवाब तमाम सवालों का जवाब हो जाता है। किंतु सच बोला कैसे जाए? बेहद कड़वा सच! चुभने वाला सच कैसे होठों तक लाया जाए? कैसे अदा किया जाए? बेचारी मार्था इसी उधेड़बुन में बैठी रोती रही, सिसकती रही। पतझड़ की मार खाए पत्तों को कुचलते हुए राहगीर आते रहे जाते रहे। मार्था बैठी, पत्तों की चीख पुकार सुनती रही। घड़ी देखी, अभी बहुत समय बाकी था। क्या करे? किधर जाए?

See also  बगावत | अशोक कुमार

प्रकृति का तमाशा भी खूब है। सृजन में समय लगता है जबकि विनाश कुछ ही पलों में हो जाता है। दम घुटा जा रहा था। खुले आसमान के नीचे भी साँस लेना दूभर हो रहा था। मार्था का जी घबराने लगा और बेइख्तियार जी चाहने लगा कि दौड़ कर किसी अँधेरे कमरे में जा कर, किसी की बाँहों में मुँह छुपाकर अपने सारे दुख उसकी सफेद टी-शर्ट की आस्तीन में खुश्क कर दे। वह अपना दायाँ हाथ मार्था के बालों में फेरता रहे, पेशानी पर प्यार करता रहे और कहता रहे, “सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक हो जाएगा।”

मार्था की अनिश्चित गहरी गहरी साँसें और आहें सुन-सुन कर सीने से लगा ले और हल्की-हल्की डाँट के अंदाज में अपनी नर्म और कानों में शहद घोलती आवाज में कहे, “तुम तो पागल हो।” किस कदर इंतजार रहता था उसके मुँह से पागल शब्द सुनने का। जब वह पागल कहता तो मार्था भी कहती, “तुम दीवाने हो!” वह और जोर से गले लगा लेता और प्यार करता।

मार्था साँस रोके उसकी आगोश में बच्चों की तरह लेटी रहती। सुरक्षा का अहसास किस कदर यकीन पैदा करता है! प्यार में कितनी परिपक्वता पैदा हो जाती है! चाहत किन हदों को छूने लगती है! यह केवल दो सच्ची मुहब्बत और एक दूसरे से खुलूस बरतने वाले और एक दूसरे पर यकीन रखने वाले ही समझ सकते हैं। कभी मार्था का सिर उसके कंधों पर होता और कभी उसका सिर मार्था के पहलू में। ऐसा महसूस होता जैसे उसका अपना बच्चा गोदी में छुपा हुआ हो। भाई हो, बाप हो, पति हो या प्रेमी – नारी तो एक माँ होती है। वह समय असमय ममता न्यौछावर करने को मजबूर होती है। बिल्कुल इसी तरह कभी-कभी सारी रात उसका घने और चमकदार बालों वाला खूबसूरत सिर अपने पहलू में छुपाए पड़ी रहती। बालों में उँगलियाँ फेरती, पेशानी चूमती और ठोड़ी और गर्दन को महसूस करती।

कभी-कभी वह सोते में आवाज देता। मार्था जवाब में प्यार करके अपने अस्तित्व का अहसास दिलवा कर बिल्कुल बच्चों की तरह उसके सिर को और जोर से भींच कर सुला देती। वह फिर एक मासूम बच्चे की तरह इत्मिनान कर लेता कि मार्था गई नहीं है, और फिर गहरी नींद सो जाता। अचानक अलार्म की घंटी से दोनों जाग जाते और एक दूसरे से लिपट जाते कि यह जुदाई की घड़ी कैसे बरदाश्त करेंगे। थोड़ी देर में कार रवाना हो रही होती और वह खिड़की में से झाँक कर हाथ हिला रहा होता – एक कैदी की तरह। चाहते हुए भी वह उसको विदा नहीं कर पाता था। अँधेरे में मार्था को जाते देखता तो घबरा जाता और मिन्नत करता कि थोड़ी और रोशनी हो जाने दो फिर चली जाना। वह जिस रोशनी की बात करता वह तो केवल उसके व्यक्तित्व से थी। जहाँ वह होता, रोशनी ही रोशनी होती। उससे दूरी ही अँधेरा पैदा करती। चाहे सूरज कितनी भी तेज रोशनी क्यों न फैला रहा हो। यदि वह नहीं तो कुछ नहीं। और गाड़ी सड़क पर फिसलती चली जाती।

See also  ‘पवित्र’ सिर्फ एक शब्द है | विमल चंद्र पांडेय

मार्था शीशा उतार कर हाथ हिलाती। हाथों से इशारा करके चुंबनों की बौछार करती। जब तक वह नजरों से ओझल न हो जाती वह हाथ हिलाता रहता और दूसरे ही लम्हे टेलिफोन की घंटी बजती। सोई-सोई-सी आवाज कानों में रस घोल रही होती। “अब कहाँ तक पहुँच गईं?… कैसी हो? …ठीक हो? …डर तो नहीं रहीं?”

मार्था अपनी आवाज में विश्वास पैदा करते हुए कहती, “नहीं, डर किस बात का? तुम जो साथ हो!”

जब तक घर न पहुँच जाती वह फोन पर हिम्मत बढ़ाता रहता। गाना सुनाता रहता और बार-बार मालूम करता कि अब वह कहाँ तक पहुँच गई?”

मार्था बताती कि वह घर के अंदर जा रही है। वह फौरन उदास हो जाता और कहता, “तुम बहुत याद आ रही हो। और जिद करता कि छोड़ कर मत जाया करो, बस अब हमेशा के लिए आ जाओ।”

मार्था उसे दिलासे देती, बहलाती, प्यार से चुमकारती और घर में दाखिल हो कर तुरंत सो जाने की हिदायत देती। रुँधी-रुँधी आवाज में शुभरात्रि कहती और फोन बंद कर देती।

जब भी दोनों मिलते एक-एक लम्हा जी भर कर प्यार करते। मार्था तो उस पर वारी-वारी जाती। और जब बिछड़ते तो जी भर कर उदास हो जाते। एक अनिश्चित अहसास कि मालूम नहीं कि अब कल क्या होगा? इसी तरह दोनों ने बरसों साथ साथ गुजार दिए थे। और आज जब मार्था अकेली है, बगैर पत्तों के दरख्तों के नीचे तन्हा और उदास बैठी थी। यह दरख्त भी मार्था को अपनी जिंदगी का प्रतिबिंब दिखाई दे रहे थे। जो जिंदगी की बहारें देखने के बाद पतझड़ के हत्थे चढ़ चुके थे। जिनकी खूबसूरती और जवानी पतझड़ की भेंट हो चुकी थी। अब केवल पीले, सुनहरे, भूरे और नारंगी पत्ते ही बहार गुजर जाने की कहानी कह रहे थे।

मार्था बेचैनी से मारिया का इंतजार कर रही थी। इंतजार की तड़प के साथ-साथ रह-रह कर उसका खयाल आ रहा था। उसकी कसक महसूस कर रही थी। उसका अकेलापन खाए जा रहा था। वह कितना मजबूत सहारा होता जब-जब वह मुश्किल में होती। कोई भी परेशानी होती तो वह कहता, “तुम क्यों परेशान होती हो? …मैं जो हूँ।” और आज जब मार्था को एक चाहने वाले सहारे की आवश्यकता है तो वह कितनी अकेली है!

मारिया, जो उसकी साथी होती, जिसको माँ हमेशा अपना दोस्त, अपनी साथी और अपना सहारा समझती रही, वह माँ को बताए बगैर सबकुछ कर गुजरी। माँ के भरोसे को किस कदर ठेस पहुँचाई। इस तड़प को केवल वही समझ सकता। मार्था को फिर वह याद आने लगा। और आँसू बंदिशों को तोड़ कर बाहर आने के लिए बेताब हो गए।

अचानक जो घड़ी पर नजर पड़ी, तो वक्त हो गया था। मार्था तेजी से उठी और तेज-तेज कदम बढ़ाती क्लिनिक की तरफ रवाना हो गई। अब यह पत्ते तड़प-तड़प कर खामोश हो गए थे। मार्था कि चाल में भी ठहराव आ चुका था। आँसू भी काफी हद तक थम गए थे। क्लिनिक की घंटी बजाते ही दरवाजा खुल गया, और मार्था ने दाखिल होते ही रिसेप्शन पर बैठी एक अनुभवी नर्स से पूछा, “मारिया कहाँ है, कैसी है, वह ठीक है न? क्या उसने स्वयं मारिया को देखा है?” मार्था लगातार सवाल करती गई, बोलती गई। उस नर्स को जवाब देने का अवसर तक नहीं दिया।

See also  क्रिकेट मैच | मनमोहन भाटिया

थोड़ा-सा अंतराल मिला तो नर्स ने पूछा, “मारिया का पूरा नाम क्या है? …और उम्र क्या है?”

मारिया का नाम जैसे मार्था के हलक में अटक गया हो। जैसे उसका जी चाह रहा हो कि मारिया का नाम छुपा ले। कहीं यहाँ बैठी सारी औरतों को न मालूम हो जाए कि मारिया ने क्या किया है। और उम्र के बारे में तो सोचते ही जैसे उस पर बेहोशी-सी छाने लगी थी। पंद्रह साल की कुँवारी माँ! मार्था एक बार फिर काँप उठी। शर्म से पानी पानी होने लगी। वह नर्स मारिया को लेकर आ चुकी थी। माँ बेटी की नजरें मिलीं। दोनों की आँखें नम हो उठीं। दोनों ने नजरें झुका लीं।

मारिया ने माँ के कंधे पर सिर रख दिया। माँ ने उसके हाथ पकड़ लिए। हाथ बिल्कुल ठंडे बर्फ हो रहे थे। माँ अपने हाथों से जल्दी-जल्दी उसके हाथ मल-मल कर गरम करने लगी। माँ को महसूस हुआ कि मारिया का रंग संगमरमर की तरह सफेद हो रहा है। होंठो का गुलाबी रंग उड़ चुका है। घने सुनहरे बाल उलझे हुए कंधों पर पड़े हुए हैं। मारिया में माँ की सी पवित्रता पैदा हो चुकी थी। माँ उसको पकड़ कर धीरे-धीरे चलाती हुई कार तक लाई। मार्था स्वयं को इतना कमजोर महसूस कर रही थी जैसे कार चलाने की ताकत ही न हो। उसने हिम्मत करके मारिया से मालूम किया कि ऐसा कौन था जिसके लिए मारिया यह कुर्बानी दे गुजरी। मारिया ने माँ को कोई जवाब नहीं दिया और उसकी गोद में मुँह छुपा लिया।

माँ और अधिक उदास हो उठी। उसको फिर उसका खयाल आ गया। वह भी मार्था की गोद में ऐसे ही मुँह छुपा लेता था। घंटों उसकी गोद में सिर रख कर लेटा रहता और कहता, “मेरा जी चाहता है कि वक्त यहीं ठहर जाए।”

मार्था की गोद में उसे बेहद सुकून मिलता। मार्था भी उसको लिटाए घंटों एक ही स्थान पर बैठी रहती। हिलती भी नहीं थी।

मारिया के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए माँ ने दोबारा पूछा, “मारिया ऐसा कौन था जिसकी मुहब्बत में तूने अपने आपको बरबाद कर लिया?”

मारिया ने चेहरे को और ज्यादा अंदर घुसाते हुए घुटी आवाज में कहा, “माँ जिसके पास तुम जाती थीं!”

Leave a Reply

अलग-अलग पोज़ में अवनीत कौर ने करवाया कातिलाना फोटोशूट टीवी की नागिन सुरभि ज्योति ने डीप नेक ब्लैक ड्रेस में बरपया कहर अनन्या पांडे की इन PHOTOS को देख दीवाने हुए नेटिजेंस उर्फी जावेद के बोल्ड Photoshoot ने फिर मचाया बवाल अनन्या पांडे को पिंक ड्रेस में देख गहराइयों में डूबे फैंस Rashmi Desai ने ट्रेडिशनल लुक की तस्वीरों से नहीं हटेगी किसी की नजर ‘Anupamaa’ ब्लू गाउन में, Rupali Ganguly Pics Farhan-Shibani Dandekar Wedding: शुरू हुई हल्दी सेरेमनी Berlin Film Festival: आलिया ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ स्टाइल में PICS अवनीत कौर प्रिंटेड ड्रेस में, बहुत खूबसूरत लग रही हैं Palak Tiwari ने OPEN ब्लेजर में कराया BOLD फोटोशूट साड़ी के साथ फ्लावर प्रिंटेड ब्लाउज़ में आलिया भट्ट
%d bloggers like this: