कोलंगुट में सूर्यास्त
कोलंगुट में सूर्यास्त

बीच समुद्र में 
हवाओं की रस्सियों के झूले पर 
झूल रहा है सूरज

सूरज के हृदय की उमंगें 
समुद्र में उठते ज्वार की तरह 
दौड़-दौड़ कर आ रही हैं 
तट की ओर 
तट तक आते-आते 
उमंगों में आ जाती है थकान 
और पसर जाती है 
अनंत बालुकाराशि पर

सूरज फिर भी झूल रहा होता है 
बीच समुद्र में 
हवाओं की रस्सियों के झूले पर 
हम देख रहे हैं 
झूलते-झूलते सूरज के चेहरे पर 
फैल रही है थकान 
एक क्षण सुस्ता लेने के लिए वह 
खोज रहा है 
अपनी थकी आँखों से 
कोई निरापद जगह

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बीच समुद्र में 
जहाँ हवाओं का झूला लगा है 
हम देख रहे हैं 
एक ऊँची चट्टान 
अनंत ज्वार भाटाओं के बीच 
समाधिस्थ 
निर्विकार।

सूरज ने इसी चट्टान पर 
फैला दी है अपनी चादर 
और आप झूल रहा है 
हवाओं की रस्सियों के झूले पर

लो, अचानक टूट गया 
रस्सी का एक छोर 
लटकने लगा है सूरज 
इसी के सहारे 
ठीक समुद्र की लहरों के ऊपर 
असहाय, निरुपाय 
झटपट उठा ली है 
चट्टान पर से लाल चादर 
लग रहा है 
सूरज अब डूबा 
कि तब डूबा 
लगता है 
इसके साथ 
डूब जाएगा 
हमारा भी मन

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हम यह सोच ही रहे हैं 
कि अचानक 
‘चुभ्’ से डूब गया वह 
उन उठी हुई लहरों में 
और हाथ से 
छूट गई है चादर

यह लाल चादर 
वहाँ से, 
जहाँ सूरज डूबा है 
पसर रही है 
हमारे पाँव की ओर 
हमारे पाँव को 
आकर छू गई है 
फिर, समुद्र की नन्हीं लहर, 
पैरों के गिर्द 
फैल गई है वही 
सूरज की चादर 
और वहाँ, 
ठीक वहाँ, जहाँ से यह चादर 
आई है हमारे पैरों तक 
फैल गया है 
सघन अंधकार, 
उदासी फैल गई है 
चारों ओर

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लेकिन हमारा मन 
अचानक प्रदीप्त हो उठा है। 
सूरज की चादर की लाली 
हमारे पैरों से 
चढ़ रही है ऊपर 
हमारी आत्मा की चट्टान तक

वहाँ यह फिर फैलेगी 
फिर, फिर 
सूरज फिर झूलेगा 
बीच समुद्र में 
हवाओं की रस्सियों के झूले पर।

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