गाँव बेचकर शहर खरीदा

गाँव बेचकर शहर खरीदा

गाँव बेचकर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।बेचा है ईमान धरम तब, घर में शानो शौकत आई है।संतोष बेच तृष्णा खरीदी, देखो कितनी मंहगाई है।। बीघा बेच स्कवायर फीट, खरीदा ये कैसी सौदाई है।संयुक्त परिवार के वट वृक्ष से, टूटी ये पीढ़ी मुरझाई है।।रिश्तों में है भरी … Read more

कुर्सीनामा | गोरख पाण्डेय

कुर्सीनामा | गोरख पाण्डेय | हिंदी कविता | लोकसभा

जब तक वह ज़मीन पर थाकुर्सी बुरी थीजा बैठा जब कुर्सी पर वहज़मीन बुरी हो गई। उसकी नज़र कुर्सी पर लगी थीकुर्सी लग गयी थीउसकी नज़र कोउसको नज़रबन्द करती है कुर्सीजो औरों कोनज़रबन्द करता है। महज ढाँचा नहीं हैलोहे या काठ काकद है कुर्सीकुर्सी के मुताबिक़ वहबड़ा है छोटा हैस्वाधीन है या अधीन हैख़ुश है … Read more

ग़म की अंधेरी रात में | जाँ निसार अख़्तर

ग़म की अंधेरी रात में | जाँ निसार अख़्तर

ग़म की अंधेरी रात में दिल को ना बेक़रार कर सुबह ज़रूर आयेगी सुबह का इन्तज़ार कर दिल की लगी बुझा न दे दिल की लगी से प्यार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर Jan Nisar Akhtar (जाँनिसार अख्तर) जन निसार अख्तर उर्दू ग़ज़लों और नज़्मों के एक भारतीय कवि थे, और प्रगतिशील … Read more

मंडी हाउस में एक शाम | अंकिता रासुरी

मंडी हाउस में एक शाम | अंकिता रासुरी

मंडी हाउस में एक शाम | अंकिता रासुरी मंडी हाउस में एक शाम | अंकिता रासुरी वह सोचता रहा, उसने तो कहा थागिटार बजाते हुए लड़केउसे आ जाया करते हैं पसंद अक्सरझनझनाते रहे तार और वह गाता रहाएक हसीना थी…किसी गुजरी हुई शाम की याद में और वह खींचती रही आड़ी तिरछी रेखाएँफाइल के पन्नों … Read more

क्या साल पिछला दे गया | हरिवंशराय बच्चन

क्या साल पिछला दे गया | हरिवंशराय बच्चन

क्या साल पिछला दे गया | हरिवंशराय बच्चन क्या साल पिछला दे गया | हरिवंशराय बच्चन कुछ देर मैं पथ पर ठहर, अपने दृगों को फेरकर, लेखा लगा लूँ काल का जब साल आने को नया! क्या साल पिछला दे गया? चिंता, जलन, पीड़ा वहीजो नित्य जीवन में रही,नव रूप में मैंने सही,पर हो असह्य … Read more

मधुशाला | हरिवंशराय बच्चन

मधुशाला | हरिवंशराय बच्चन

मधुशाला | हरिवंशराय बच्चन मधुशाला | हरिवंशराय बच्चन मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,जीवन की मधुता … Read more

कवि की वासना | हरिवंशराय बच्चन

कवि की वासना | हरिवंशराय बच्चन

कवि की वासना | हरिवंशराय बच्चन कवि की वासना | हरिवंशराय बच्चन कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा! सृष्टि के प्रारम्भ मेंमैने उषा के गाल चूमे,बाल रवि के भाग्य वालेदीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के अरुण दृगचूम कर मैने सुलाए, तारिका-कलि से सुसज्जितनव निशा के बाल चूमे, वायु के रसमय अधरपहले सके छू … Read more

लो दिन बीता, लो रात गई | हरिवंशराय बच्चन

लो दिन बीता, लो रात गई | हरिवंशराय बच्चन

लो दिन बीता, लो रात गई | हरिवंशराय बच्चन लो दिन बीता, लो रात गई | हरिवंशराय बच्चन मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।पर मैं कृतज्ञ उसका इस … Read more

जीवन की आपाधापी में | हरिवंशराय बच्चन

जीवन की आपाधापी में | हरिवंशराय बच्चन

जीवन की आपाधापी में | हरिवंशराय बच्चन जीवन की आपाधापी में | हरिवंशराय बच्चन जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिलाकुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँजो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखामैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,हर एक यहाँ पर एक … Read more

झरते हैं शब्द-बीज | बुद्धिनाथ मिश्र

झरते हैं शब्द-बीज | बुद्धिनाथ मिश्र

झरते हैं शब्द-बीज | बुद्धिनाथ मिश्र झरते हैं शब्द-बीज | बुद्धिनाथ मिश्र आहिस्ता-आहिस्ताएक-एक करझरते हैं शब्दबीजमन के भीतर। हरे धान उग आतेपरती खेतों मेंहहराते सागर हैंबंद निकेतों मेंधूप में चिटखता हैतन का पत्थर। राह दिखाते सपनेअंधी खोहों मेंद्रव-सा ढलता मैंशब्दों की देहों मेंलिखवाती पीड़ा हैहाथ पकड़कर। फसलें झलकें जैसेअँकुरे दानों मेंआँखों के आँसूबतियाते कानों मेंअर्थों … Read more