ऐसी भी क्या जल्दी थी...
ऐसी भी क्या जल्दी थी...

मन रुकता है तो
ठिठुर सा जाता है
ठंड से नहीं
भय से नहीं
भूख से नहीं
सोचता हूँ ऐसी भी क्या जल्दी थी…

सुंदर तुम थीं या तुम्हारे सपने
अधखुली पलकों में घनेरी रात का काजर
सुबह की उजली भोर
कौन जानता था इन दोनों के बीच
एकदम से संधि की कोमलता को
जला देगा निर्मोही…
चलो सूरज से ही पूछ लेता हूँ
क्या महसूस किया है तुमने कभी वेदनाओं का ताप
धुधुआकर सुलगना तुम्हारी नियति नहीं
मेरे अंदर बिना धुएँ के आग नहीं है
इसी लिए सोचता हूँ
ऐसी भी क्या जल्दी थी
यूँ ही चले जाने की

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अभी-अभी
जैसे तुमने किया था ब्याह
अभी कल ही तो तुमने ओढ़ी थी चूनर
वो फूलों की महक
अभी बासी नहीं हुई है भाई की छाती पर
जो तुमने फूलमाला पहनाई थी
अभी तो तुम्हारी महक पूरे घर में
गमकती है
तुम अभी कल ही तो माँ बनी थीं
प्रेमचंद की ‘संपूर्ण स्त्री’
फिर…
मन के अज्ञात पन्ने पर
तुम्हारे हिलते-काँपते ओष्ठ और अधर
जैसे कभी न मिलने की बात कहकर
ठिठुर कर खामोश हो गए
सोचता हूँ ऐसी भी क्या जल्दी थी…
यूँ ही चले जाने की।

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