आत्म हंता की डायरी

मैं भ्रांत हो कर इधर-उधर घूमता रहा हूँ। जिस किसी से मिलता हूँ, वह बहुत मीठा व्‍यवहार करता है। सौंदर्यकला, साहित्‍य पर देर तक बौद्धिक चर्चा करता है और चाय-सिगरेट से खातिर करता है। मगर यह सौहार्द कुछ घंटों तक ही सीमित होता है। जब मैं ऐसे किसी बड़े भारी विद्वान, दिग्‍गज पुरुष के पास से उठ कर बाहर आता हूँ तो सोचने लगता हूँ कि उसमें कितनी नफासत है, वह कितने अच्‍छे ढंग से रहता है, व‍ह कितना अध्‍ययन करता है और… हाँ, उसका ड्राइंगरूम कितना सुसज्जित है। उसकी लाइब्रेरी भी तो कीमती किताबों से भरी हुई है। ओह! कितना सुरुचि-संपन्‍न है! उसकी खुशी से चमकती हुई आँखें, उसकी सुजनता मिलनेवालों पर अमिट छाप छोड़ती है।

बँगले, कोठी या आलीशान अंग्रेजी नामधारी ‘विला’ से बाहर निकल कर सड़क पर मैं बदहवास हो कर ऊँची-ऊँची दुकानों को देखता सड़क की भीड़ में खोया चलता हूँ और यो ही न जाने कब तक चलता रहता हूँ और फिर एकाएक मेरे मस्तिष्‍क में एक फूहड़ विचार बिजली की तरह कौंधता है – मैं अपने से पूछने लगता हूँ कि ये उपलब्धियाँ आखिर कैसे संभव हुई? मैंने इतना पढ़ा-लिखा और मेरे सोचने और बातें करने का ढंग भी वही है जो मेरे आधे घंटे के पहले मेजबान का था, मगर संसार में बिल्‍कुल नि:संग और अनपेक्षित हूँ। मैं एक कोठरी तक नहीं जुटा पाया। विशाल बँगले और कोठी की बातों का तो कहना ही क्‍या… मेरे कमरे में शायद एक मोमबत्‍ती या लालटेन भी तभी होती है जब मैं किसी दूसरे के कमरे का साझीदार हो कर रहता हूँ (कहना न होगा कि उस कमरे का मालिक वही दूसरा साझीदार होता है और वह दयावश या मेरे मित्र होने के प्रायश्चितस्‍वरूप मुझे अपने साथ रहने देता है।)

फिर मेरे दिमाग में उन महानुभावों की तस्‍वीरें उभर उठती है जो कल्‍पना के लोक में डूबते-उतराते ‘यूटोपिया’ बघारते है, गर्म बहसों में मशगूल होते हैं और मझे बिल्‍कुल भूल जाते हैं उनमें से किसी नए व्‍‍यक्ति से यदि संयोग से कोई मेरा परिचय कराता है तो वह अपने चश्‍मे से घूर कर एक क्षण देखते रहते हैं और चेहरे पर भरस‍क बनावटी मुस्‍कान ला कर कहते हैं, ‘हें-हें-हें, आप हैं… मैंने आपका नाम कहीं देखा तो था… (मैं जानता हूँ कि वह सरासर झूठ बोलते हैं, क्‍योंकि मेरा नाम अखबारों में तभी छपा था जब मैंने एक के बाद एक कई परीक्षाएँ पास की थीं)। इतना कहने से उनका दायित्‍व समाप्‍त हो जाता है। मुझे उनके चेहरे से लगता है कि उन्‍हें मुझसे परिचय करके ग्‍लानि हुई है। उन्‍होंने शायद अनधिकृत व्‍यक्तित्‍व को पहचानने का सुमेरु-भार उठाया है। शायद इसीलिए वह अपने ऊपर से उस अप्रिय परिचित भार को उतार फेंकने के लिए फौरन सिगरेट-केस निकाल कर सिगरेट सुलगा लेते हैं और फिर उन्‍हें कुछ शायद याद आता है तो सिगरेट-केस बढ़ा कर पूछ लेते हैं, ‘आप सिगरेट तो पीते ही होंगे?’ फिर उनके स्‍वर से ही एक स्‍वचालित क्रिया मुझमें होती है। अभी तो उनके स्‍वर के संयम और काठिन्‍य का अनुभव करके मैं संकुचित हो कर हाथ जोड़ देता हूँ और कभी बहुत लज्जित-सा हो कर, गर्दन झुका कर सिगरेट-केस से काँपते हाथों से एक सिगरेट निकाल लेता हूँ। ऐसी अवज्ञा पर मुझे बड़ी आत्‍म-ग्‍लानि होती है और मैं सोचता हूँ, काश, मैं, यहाँ न होता। फिर मैं अपनी दोनों हथेलियों को फैला कर देखता हूँ, मानो अपनी भाग्‍यरेखाओं की परीक्षा कर रहा हूँ। मेरे हाथ बुरी तरह पसीजे हुए होते हैं। मैं लोगों की चर्चा में योगदान देना चाहता हूँ मगर मेरा गला फँस-सा जाता है और मुझे अपना स्‍वर बड़ा असंयत और अस्‍वाभावि‍क-सा लगता है। जब मैं बिल्‍कुल मूक रहता हूँ तो लोग मुझसे भी पूछ लेते हैं कि मेरा क्‍या विचार है (यद्यपि ऐसा कम ही होता है)। मैं जो कुछ कहता हूँ (मैं आज तक नहीं जान पाया कि ऐसे अवसर पर मैं क्‍या कहता हूँ) वह इतना प्रभा‍वहीन और व्‍यर्थ होता है कि सब लोग शालीनता के कारण सुनते तो जरूर रहते हैं किन्तु अंत में एक-दूसरे की ओर इस दृष्टि से देखते हैं कि आखिर कहा क्‍या गया है?

हाँ, तो मैं कह रहा था कि जब मैं सड़क पर चलता होता हूँ तो बहुत ही चकित हो कर कुछ सोचता और विस्‍फारित आँखों से देखता हूँ कि लंबी-चौड़ी सड़क के दोनों ओर ये कई-कई मंजिलों के विशाल भवन कैसे बन गए है? मीलों तक चले गए इन भवनों का निर्माण क्‍या कोई दानव एकाएक किसी रात में सबकी दृष्टि बचा कर जादुई प्रताप से कर गया है और इन दुकानों में भरा हुआ विपुल सामान और इतना आडंबर और समारोह किसके लिए हो रहा है? मैं सोचता हूँ… सच तो यह है कि मैं कुछ नहीं सोचता, मैं केवल प्रिमिटिव होता जा रहा हूँ और सभ्‍यता के गतिच‍क्र को उल्‍टा घुमाना चाहता हूँ। ट्रांजिस्‍टरों और माइक्रोफोन की कानफोड़ आवाजों से सारी फिजा भर जाती है। ऐसे शोर में मन थोड़ी देर के लिए भीतर के कोलाहल से मुक्‍त हो जाता है और आँखें चकित हो कर चारों ओर फैले अपरिचित लोक को देखती रहती हैं। विचित्र-विचित्र प्रसाधनों और परिवेशों से लैस हो कर बूढ़े-बच्‍चे, युवक और युवतियाँ जाने कितनी बातें उच्‍छ्वसित और उमंग में तरंगायित हो कर कहते चले जाते हैं। मगर मेरी समझ में यह व्‍यापार जरा भी नहीं आता। मैं तमाशवीन हो कर मूढ़ की भाँति देखता रहता हूँ। और जब मुझे अपना ध्‍यान होता है तो मैं आबादी से बिल्‍कुल बाहर पहुँच गया होता हूँ, किन्‍तु असंख्‍य चेहरे, भीमाकार इमारतें और अस्‍फुट ध्‍वनियाँ अ‍ब मुझे चारों ओर से दिखाई और सुनाई पड़ती रहती हैं।

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कहीं वीराने में या किसी पार्क की खाली बेंच या लान पर बैठ कर मैं सोचने लगता हूँ कि इस समस्‍त व्‍यापार में मैं कहाँ हूँ। मैं प्रत्‍येक देश के विचारक और लेखक के गहरे से गहरे मजाक और ग‍हरी से गहरी संवेदना को अनायास ही समझ लेता हूँ मगर यह चारों ओर फैला व्‍यापार – जिसमें शायद सोचने-समझने को बहुत अधिक नहीं है – मैं बिल्‍कुल ही नहीं समझ पाता। कितने ही वर्ष हो गए जब मैं करोड़ों और लाखों रुपयों के हिसाब कक्षा में बैठ कर लगाया करता था; साझेदारी के वे सवाल मैं बात की बात में हल कर दिया करता था। मगर आज तक अपने समस्‍त प्रयत्‍नों के बावजूद कभी दस रुपए एकत्रित करके जेब में नहीं रख पाया। उधार माँग कर किताबें पढ़ता हूँ, मित्रों की कलम से लिखता-पढ़ता हूँ और जब डाक का खर्च न जुटा सकने के कारण किसी कहानी या उपन्‍यास की पांडुलिपि किसी प्रकाशक के पास ले कर पहुँचता हूँ तो वह उसको देखने कि कौन कहे, देर तक तो वह मेरी ओर भी आँखें नहीं उठाता और मेज पर फैले कागजों में अत्‍यधिक व्‍यस्‍त होने का नाटक रचता है। आखिर कभी तो मेरी ओर देखना ही पड़ता है। ऐसे अवसर पर वह अत्यंत व्‍यावहरिक और ‘पेटेंट’ वाक्‍य दुहराता है, ‘कहिए! आपकी क्‍या सेवा कर सकता हूँ, बंधु?’ मैं बहुत ही क्षीण स्‍वर में उससे अपनी बात कहता हूँ। अपनी बात कहते-कहते मुझे पसीना आ जाता है और ऐसी दुर्बलता महसूस होती है कि मैं मेज या कुर्सी का सहारा ले लेता हूँ और जैसे-तैसे अस्‍फुट स्‍वरों में अपनी बात पूरी करता हूँ।(एक बार तो ऐसे ही एक प्रकाशक महोदय की गोल मेज मेरी कँपकँपी से उलटते-उलटते रह गई।) खैर, वह ध्‍यान से मेरी बातें सुनता है और फिर मेज पर बिखरे कागजों पर झुक जाता है। न जाने क्‍या सोच कर फिर सिर ऊपर उठाता है और दीवार पर टँगे कैलेंडर पर यों ही कहीं शून्‍य में दृष्टि केंद्रित कर लेता है। एक हाथ में खुला कलम ले कर तथा दूसरे हाथ के नाखून को दाँतों से कुतरता हुआ कहता है, ‘हम नए लेखकों की रचनाएँ नहीं छापते।’ बड़े-बड़े दो-चार नाम गिना कर कहता है, ‘बुरा न मानना, आजकल तो हर तीसरे आदमी ने लिखने का धंधा पकड़ लिया है…’ लेक्‍चर यहीं खत्‍म नहीं होता, मगर इससे अधिक मैं कुछ नहीं सुन पाता। मैं दूर कहीं खो जाता हूँ और अनायास कुर्सी पर बैठ जाता हूँ। एकाध टूटा फिकरा सुनाई पड़ जाता है, मसलन, ‘लिखे जाओ, लिखे जाओ…’ या ‘नए लेखकों का कोई गिल्‍ड होना चाहिए।’

इतना कहते-कहते शायद उसकी अंतरात्‍मा करवट बदलती है और वह अपने खद्दर के खूब श्‍वेत लिबास की ओर देख कर सोचता है कि उसने हिंसा कर दी है; वह चाहे शब्‍दों द्वारा ही क्‍यों न हुई हो। वह पश्‍चाताप के स्‍वर में कहता है, ‘स्‍पष्‍टवादिता के लिए क्षमा करना मित्र! मेरी बात को अन्‍यथा न लेना। आप शायद समझते नहीं होंगे, प्रकाशन का काम कितने रिस्‍क और जिम्‍मेदारी का है।’ और शायद यह काफी होता है। आगे इसलिए वह मुझ पर दृष्टि डालना जरूरी नहीं समझता। मेज पर फैली फाइलों को पढ़ने में जुट जाता है या किसी को आवाज दे कर व्‍यस्‍तता से बुलाने लगता है। इसका स्‍पष्‍ट ही यह अर्थ होता है – दूसरा दरवाजा देखो। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ है कि पुराने प्रकाशकों से एकदम निराश हो कर मैं कुछ नए प्रकाशकों के पास पांडुलिपियाँ ले कर गया हूँ। मगर उन्‍होंने वर्ष-छह मास उन्‍हें अपने पास पड़े रहने दे कर अंत में सधन्‍यवाद वापस कर दिया है। जाहिर है कि उन्‍होंने पांडुलिपि को देखा तक नहीं होगा, क्‍योंकि पांडुलिपि वापस करने के लिए भी उन्‍होंने मुझे कई-कई दिनों तक हैरान किया है। वह यह तक भूल गए होते हैं कि वह पांडुलिपि कहाँ रख दी गई है और एक प्रकाशक ने तो यहाँ तक सदाशयता बरती कि अनेक बार अपने यहाँ चक्‍कर कटवाए लेकिन मेरी ‘बकवास’ का कोई पता-ठिकाना नहीं मिला और अंत में निराश हो कर मैंने उनके यहाँ जाना ही छोड़ दिया, क्‍योंकि इस बार-बार के अयाचित प्रवेश से वह तंग आ गए थे और उन्‍होंने अपने चढ़े हुए मुँह पर यह ‘नोटिस’ लगा दिया था, ‘ऐसी कौन-सी अमर रचना थी जिसके खो जाने से विश्‍व-साहित्‍य किसी अमूल्‍य कृतित्‍व से वंचित रह जाएगा। अरे साहब! ऐसा ‘कूड़ा’ हमारे पास हर रोज ढेर-सी तादाद में आता है। हम उसे कहाँ तक साज-सँभाल कर रखें।

एक कहावत है – सच्‍चे को इतनी दफा झूठा कहो कि अंत में वह स्‍वयं को झूठा ही समझने लगे। इसमें कुछ सच्‍चाई हो या न हो मगर अब तो मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है कि वास्‍तव में मैं व्‍यर्थ ही प्रयास करता हूँ। कोई न कोई धोखा आदमी अपने साथ निरंतर रचता ही रहता है तभी तो मैं भी स्‍वयं को किसी न किसी धोखे से बहला ही देता हूँ। मैं कहता हूँ, मुझमें जरूर कुछ है वर्ना ऐसा कई बार क्‍यों होता है कि महानतम विचारकों, कवियों और साहित्‍यकारों से मेरे विचार आश्‍चर्यजनक रूप से सादृश्‍यमूलक होते हैं। मसलन मैंने कोई विश्‍लेषण या चित्रण आज किया है – उसी चित्रण को किसी नए उपन्‍यास में देखता हूँ तो मेरे मन में सहसा एक हूक-सी उठती है और साथ ही एक आशा भी करवट लेती है और मैं अपने-आपसे कहने लगता हूँ, यदि मुझे अवसर मिलता तो क्‍या मैं इस बहुविज्ञापित रचना से पहले ही प्रकट न हो गया होता।

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अभी उस दिन कई प्रबुद्धचेता बातें कर रहे थे। एक अत्‍यंत थुलथुल सज्‍जन, दुग्‍धश्‍वेत वस्‍त्र पहने, मुँह में पान के दो बीड़े कचरते और निर्द्वंद्व हो कर सिगरेट का धुआँ फेंकते हुए बोले, ‘आह! असफलताओं का इतिहास भी कितना मर्मस्‍पर्शी होता है। विश्‍व में सफलता प्राप्‍त करने वालों के मु‍काबिले में मुझे हमेशा वही लोग न जाने क्‍यों अच्‍छे लगते हैं जो सारी योग्‍यता और जीनियस के बावजूद ठोकर खाते मर गए हैं।’ मेरा अंतर्मन एक अव्‍यक्‍त पीड़ा से झनझना उठा। मैंने चाहा कि इस मिथ्‍यावादी के मुँह पर कस कर चपत जड़ दूँ। यह स्‍थूलदेह और स्‍थूल बुद्धिवाला व्‍यक्ति जो पाँच व्‍यक्तियों के बराबर अकेला खाता है, इसे असफल लोगों से दिली हमदर्दी है? लगता है, हमदर्दी की बातें करना भी इन दिनों फैशन की बात हो गई है। सुंदर वेशभूषा और व्‍यवस्थित आर्थिक मर्यादाओं से सुरक्षित रह कर टूटेपन, बेचारेपन और असफलताओं के प्रति हमदर्दी जाहिर करना किसे अच्‍छा नहीं लगेगा? करुणाजनक दृश्‍यों के प्रति विलगित होना बड़ा ‘रोमांटिक’ मालूम पड़ता है बशर्ते कि किसी आदमी को जीवन की पूरी-पूरी सुविधाएँ उपलब्‍ध हों।

लगता है कि मैं धीरे-धीरे जड़ होता जा रहा हूँ। ऐसा जड़ जो प्रत्‍येक बात की समीक्षा करता है। प्रत्‍येक क्षण के प्रति सजग रहता है। जिसकी चेतना एक क्षण के लिए भी मूर्छित नहीं होती। किंतु जो चिर दिन के लिए बेचारा बन कर रह जाता है। और अपने फैशन की भूख शांत करने के लिए लोग जिसके प्रति सहानुभूति का व्‍यवहार करते हैं। लोग कहते हैं कि मैं कटु हो गया हूँ। लोग कौन? यह दूसरा कोई नहीं है – भला लोगों को मेरे से क्‍या लेना? यह कहनेवाला मेरा वही साथी होता है जिसके कमरे में मैं मुफ्त का साझीदार होता हूँ और अपनी ही दृष्टि में ‘पैरासाइट’ (परोपजीवी) बन जाता हूँ।

यह भी सोचता हूँ कि क्‍या यह संभव नहीं हो सकता था कि मैं किसी प्रकार से यह ‘गुर’ सीख लेता कि चार पैसे कैसे कमाए जाते हैं? इस समस्‍त बौद्धिक चर्चा और भाव-संपदा से क्‍या मिला? अपने भविष्‍य के बारे में अधिक सोचना और मंथन करना कितने क्‍लेश की बात है? इसे मैं किसी प्रकार समझा भी तो नहीं सकता। एकाध ट्यूशन कभी मिला भी है तो मेरे ‘शेबी’ होने के कारण छूट गया है। मेरे जैसे ही गरीब मित्र बारी-बारी से मुझे अपने पास रख कर जीवित रख रहे हैं। पता नहीं वह ऐसा क्‍यों करते हैं? मैं हृदय से चाहता हूँ कि अपने पूर्व इतिहास, महत्‍वाकांक्षाओं और स्‍वप्‍नों को निर्ममता से तोड़ कर अलग हट जाऊँ और कुछ न हो सकूँ तो अपने इन मित्रों जैसा तो हो ही जाऊँ ताकि सुख की साँस ले कर एक बार तो कह सकूँ – यह मेरा प्राप्‍य है। मैं इसके बल पर जीवित हूँ। मेरे पौरुष का भी कोई अंश मेरे जीवन में है। परंतु लगता है कि ऐसा कभी नहीं होगा। दो-चार रुपए हाथ में होने पर उन्‍हें मैं एकदम से खर्च कर देता हूँ यानि एक प्रकार से फेंक ही देता हूँ और फिर खाली हाथ होने पर बड़े आश्‍चर्य से सोचता रह जाता हूँ कि कोई ऐसा भी तरीका है जिससे मैं एक पैसा भी कमा सकूँ। इस क्रियाशील संसार में मुझे एक भी उपाय ऐसा नहीं दिख पड़ता जिससे मैं चार पैसे अर्जित करके अपनी उपलब्धि, अपने अस्तित्‍व को सिद्ध कर सकूँ। मेरे मित्र-परिचित मेरी सीमाओं को शायद खूब समझते हैं, इसीलिए तो मुख पर कभी भी शैथिल्‍य या उपेक्षा का भाव नहीं लाते और मेरे लटके-सूखे चेहरे को देख कर कहते हैं, ‘अरे यार… दूसरों के सामने तुम्‍हारा नाम ले कर तो हम अपना मुख उजला कर लेते हैं। तुमसे और कमाने-खाने से क्‍या मतलब? मुझे वे एकदम खाट पर नहीं गिर जाने देते, जबरदस्‍ती मुँह धुलवाते हैं, चाय पिलाते हैं और उन बातों को बचा कर बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं जो मेरी दुखती रगें हैं। मगर उनकी प्रत्‍येक बात से मेरा मन कातर हो जाता है और मुझे संसार का समस्‍त व्‍यापार फीका लगने लगता है।

कभी-कभी मेरे पाँव अनायास ही मुझे सारे कोलाहल से दूर ले जाते हैं और मैं ऐसे स्‍थान पर पहुँच जाता हूँ जो सुंदर नगर के लिए श्राप या दुर्वचन-सा लगता है। अर्ध अँधेरी बस्‍ती सोई-सी पड़ी रहती है। दूर तक छोटी-छोटी कच्‍ची कोठरियाँ बनी हैं, उनके सामने टीनें पड़ी हुई हैं। कहीं-कहीं बकरी और उनके मेमने बँधे हुए दिखाई देते हैं। उमस इस कदर होती है कि लोग टीन की छतों से बाहर – फुटपाथ पर खाटें निकाल लेते हैं। इतनी शिद्दत की गर्मी में भी कोठरियों या टीन की छतों के नीचे चूल्‍हे सुलगे होते हैं। सारी कोठरियाँ धुएँ से एकदम काली हो गई हैं, उनकी छतों में धूल और मकड़ियों के जाले तने हुए हैं। एक आले में मरणासन्‍न, बुरी तरह धुआँती ढिबरी टिमटिमाती रहती है और गृहिणी चीख-चीख कर बच्‍चों को पीटती या कोसती हुई रोटियाँ थपथपाती रहती है और सड़क की बत्‍ती कभी ईद-बकरीद जल उठती है। ये लोग इस जीवन के इतने अभ्‍यस्‍त हो गए हैं कि इन्‍हें आक्रोश का इसमें कोई कारण ही खोजे नहीं मिलता। वे इन सारी कटुताओं को सहज रूप में सहन करते चले जाते हैं और भाग्‍य के नाम दो-चार सुंदर अश्रव्‍य शब्‍दों का प्रयोग करके कभी हँस भी लेते हैं, कभी रोष भी व्‍यक्‍त कर लेते हैं – ‘धत्‍तेरे की साली फूटी हुई तकदीर की।’ मगर फिर भी दिन कटते चले जाते हैं। किसी-किसी की रात ऐसे ही किसी चपरासी या तीस-चालीस रुपए पानेवाले प्राइमरी के मुदर्रिस मित्र के यहाँ फुटपाथ में खाट पर पड़ा मैं दूर-दूर तक निरभ्र आकाश पर फैले तारे देखता रहता हूँ जो मैंने आज, इस क्षण तक व्‍य‍तीत किया है। उस जीवन के विषय में भी सोचता हूँ जिसका मैंने बहुत दिनों तक स्‍वप्‍न देखा था और समझा था कि मजबूरियाँ और परिस्थितियाँ कुछ नहीं होतीं, व्‍यक्ति चाहे तो क्‍या नहीं कर सकता। मगर वह वलवले और उत्‍साह आज दम तोड़ चुके हैं। मैं और भी मूक हो कर एक दीर्घ आह भरता हूँ और आकाश के तारों के व्‍यर्थ प्रयास हो कर गिनने की कोशिश करने लगता हूँ।

See also  शिकंजा | नीला प्रसाद

ऐसी बात नहीं कि मेरे जाननेवाले यही चपरासी और प्राइमरी स्‍कूल के मास्‍टर हैं; मेरे जानने वाले, जाननेवाले ही क्‍यों बचपन से ले कर ऊँची डिग्रियाँ लेने तक साथ रहने वाले कई ऊँचे अफसर और लेखक-कवि भी हैं। मगर उनकी हार्दिकता से भी मुझे अब भय लगने लगा है। उनके साथ हो कर तो मैं उनके ठंडे लहजे और अतिशय विनम्रता और मर्यादा की रक्षा में उन्‍हें व्‍यस्‍त देख कर इतना संकुचित हो उठता हूँ कि मुझे लगता है कि मैं नग्‍न ही हो उठा हूँ। उनके संपर्क में मुझे इतनी घबराहट होती है कि मैं उनकी ‘कंपनी’ से हट कर दूर किन्‍हीं ऐसे आदमियों के बीच चले जाना चाहता हूँ जो मुझे बिल्‍कुल न समझते हों। वे मुझे पागल भी समझेंगे तो क्‍या है – कम से कम मेरी असफलताओं की इतनी निर्ममता और विद्रूप से खिल्‍ली तो न उड़ाएँगे। मैं इन सिविलियन मित्रों से कितना डरने लगा हूँ जो लच्‍छेदार भाषा के सहारे अत्यंत निष्‍करुण हो कर अपनी हँसी को जबरन दबा कर पूछते हैं, ‘कहिए कैसे हैं? हाँ भई, बड़े आदमी हो… यार, हमें मत भूल जाना, हम तो तुम्‍हारे कितने अंतरंग हैं…’ इस काठिन्‍य की यही सीमा नहीं होती। वह ठहाके लगा कर यह भी कहने से बाज नहीं आते, ‘अरे भाई, और कुछ नहीं तो हमें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी ही बना लेना… इस टुच्‍ची नौकरी में भला क्‍या रखा है, मौलिकता तो यहाँ मर ही जाती है। कुछ भी हो यार, हम तो तुम पर फख्र करते हैं।’

मैं इन सब चाबुकों को अत्यंत सहिष्‍णु हो कर सहन कर लेता हूँ और रोने से भी बदतर हँसी हँस कर एक ओर को चल देता हूँ और अचेतन में ही नगर की कोढ़ जैसी इस उजाड़ बस्‍ती में पहुँच जाता हूँ। यहाँ बहुत थोड़े पढ़े-लिखे, बहुत मामूली लोग मुझे बैठा लेते हैं और बहुत-सी बातें करते हैं। वे राजनीति की सतही बातें करते हैं, सिनेमा या किसी बड़े लीडर की चर्चा होती है और मेरे किसी भी वाक्‍य को वह बड़े ध्‍यान से सुन कर कहते हैं, ‘इसीलिए तो पढ़े-लिखे आदमी की कद्र होती है। हम लोग तो पशु हैं… कैसी लाजवाब बात कही है बाबू ने, भई वाह!’ और ऐसे समय कोई भी व्‍यक्ति – यह भूल कर कि मैं बीड़ी नहीं पीता – मेरी ओर एक बीड़ी बढ़ा देता है और बिना जली बीड़ी को हाथ में ले कर मैं बेसाख्‍ता यह सोचने लगता हूँ कि क्‍या मैं कहीं भी समझा जा सका हूँ? जिन लोगों ने बगैर पढ़े मेरी पांडुलिपियाँ वापस की हैं, उन्‍होंने भी मेरे मर्म को समझने की चेष्‍टा नहीं की और मेरे ये अपढ़ और अर्ध शिक्षित दोस्‍त मेरे अत्यंत ऊपरी और जबरदस्‍ती ग्रहण किए हुए स्‍तर को वास्‍तविकता समझ कर मेरी सराहना करते हैं। शायद व्‍‍यक्ति से यह बात देर तक छिपी नहीं रहती कि उसको न समझा जाना ही उसकी सबसे बड़ी सजा है – सबसे कठोर निर्वासन!

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