सिलसिला

रात को वह देर तक जागता रहा। पता नहीं कब आंखें लगीं। पर वह आश्‍वस्‍त था कि अगली सुबह बच्‍चों से मुंह नहीं छिपाना पड़ेगा। वह एक मित्र से बीस रुपये उधार लेने में सफल हो गया था। हालांकि इन रुपयों को लेते समय बीस तरह के रोने और पचास किस्‍म के झूठ बोले गये … Read more

संबंध के पीछे

‘आपको गायत्री का कोई मंत्र याद है?’ किसी महिला का स्‍वर सुन कर उसने तिरछे हो कर अपनी दाईं तरफ देखा। कई स्‍त्री-पुरुष मुँह लटकाए सामने की ओर देख रहे थे। उसने सिर हिला कर श्‍लोक याद न होने की विवशता जाहिर कर दी। मंत्र की बात करनेवाली औरत ने एक लंबी साँस खींची और … Read more

स्पर्श

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शान्‍ता घर में रहकर प्राइवेट बी.ए. की परीक्षा की तैयारी कर रही थी। चाचा-चाची नौकरी पर चले जाते थे और उनके बच्‍चे भी स्‍कूल चले जाते थे। बाद में घर पर वही अकेली रह जाती थी। उसे यानी शान्‍ता को गली-मोहल्‍ले के लोग बहुत दिनों तक एक नौकरानी के रूप में जानते थे। जब तक … Read more

वापसी

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वही पुराना ढोंढ़ का मकान था। सरकंडों वाले मोढ़े सहन में जर्जर जटायु के पंखों की मानिंद बिखरे पड़े थे, टीन की कुर्सियों के पेंदे भी गल चुके थे। एक नजर उसने पूरे ढूह पर डाली और आगे बढ़ गया। उस विराट फालतूपन से वह भीतर ही भीतर उखड़ गया। सामने के ओसारे से पिताजी … Read more

यादों के चिराग

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कपड़े बदलकर जब अपने होटल से वह बाहर निकला तो उसकी ऊब और अकेलापन बहुत कुछ कम हो गया था। हाथ घड़ी उसने निश्चिन्‍तता की सांस ली-अभी भी कान्‍फ्रेस में कई घंटे की देर थी। दायें-बायें दुकानों के बोर्ड पढ़ते हुए वह आगे बढ़ने लगा और समय काटने की गरज से एक किताबों की बड़ी-सी … Read more

यथावत

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उसे देखकर यह विश्‍वास करना कठिन था कि वह किसी दफ्तर में बाबू हो सकता है। देह इतनी दुर्बल थी गोया उसे वर्षों से भरपेट भोजन न मिला हो। हाथ पैर दरख्‍त की पतली टहनियों के मानिंद थे। दाढ़ी कभी दस-बारह दिन से पहले नहीं कट पाती थी। सिर पर यों तो घले बाल थे … Read more

मोहभंग

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शुक्‍ल जी अपनी बात स्‍पष्‍ट करने के लिए हथेली में उँगली गड़ाते हुए बोले, भाई साहेब, जनतंत्र, में अखबार की शक्ति आप नहीं जानते! आपने ‘चाँद’ का ‘फाँसी अंक’ शायद नहीं देखा! ओ एक ही अंक ऐसा रहा कि अंगरेज बहादुर का छक्‍का छूट गया!’ शुक्‍ल जी लगभग बीस वर्ष कलकता में र‍हे थे। वैसे … Read more

भविष्यवादी

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अभी ”हम लोग एक-दो साल और भी यहीं रह सकते हैं-जहां सात बरस गुजारे-दो-तीन और सही। आखिर लोग रहते ही हैं।” पिता ने गम्‍भीरता कायम रखते हुए अपनी बात पूरी की और हम लोगों को चश्‍मों से घूरने लगे। अपनी बात कहने के बाद वह खुश्‍क होंठों पर जीभ फिराकर उन्‍हें गीला कर लेते हैं … Read more

बीतने का एहसास

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किसने सोचा था कि इतने जिन्‍दादिल और मसखरे दीखने वाले व्‍यक्ति की मौत ऐसी भयानक होगी। मुझे तो शायद और भी पता न चलता अगर मेरे पास आने वाले एक व्‍यक्ति ने यह न कहा होताः ”वकील साहब, क्‍या वजह है कि आपके कोर्टयार्ड में घुसते ही यह मालूम पड़ता है, जैसे एक मुर्दा सड़ … Read more

पैबंद

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मनीष ने अपनी खटारा साइकिल बहुत नामालूम ढंग से दीवार के सहारे टिका दी और कमरे में पड़ी एकमात्र कुर्सी पर जा कर धम्‍म से बैठ गया। हलकी-फुलकी टीन की कुर्सी उसके बोझ से बुरी तरह डगमगा गई पर चलो खैर हुई, कुर्सी उलटी नहीं। दूसरे कमरे में बच्‍चे चीख-चीख कर अंग्रेजी की राइम रट … Read more