वापसी

वही पुराना ढोंढ़ का मकान था। सरकंडों वाले मोढ़े सहन में जर्जर जटायु के पंखों की मानिंद बिखरे पड़े थे, टीन की कुर्सियों के पेंदे भी गल चुके थे। एक नजर उसने पूरे ढूह पर डाली और आगे बढ़ गया।

उस विराट फालतूपन से वह भीतर ही भीतर उखड़ गया। सामने के ओसारे से पिताजी टायर के सोलवाली चप्‍पलें घसीटते आ रहे थे। उसने आगे बढ़ कर उनके पैर छू लिए। उन्‍होंने जल्‍दी से नीचे झुक कर उसे बाँहों में ले लिया। पिता का चेहरा उसने देखा, जिस पर कई रोज की बढ़ी दाढ़ी के बावजूद सघन झुर्रियाँ दिखाई पड़ रही थीं। ऐनक ढीली पड़ गई थी और एक तरफ की कमानी धोखा दे गई थी, जिसमें उन्‍होंने जनेऊ के सूत की डोरी बाँध ली थी। धोती भी खासी मैली लग रही थी। रुई का सलूका भी कम से कम आठ-दस साल पुराना होगा ही।

वह जोर लगा कर बलगमी आवाज में बोले, ‘धीरेंद्र की माँ, देखो कौन आया है?’

उसके पीछे उसकी पत्‍नी और बच्‍चे नि:शब्‍द आ कर खड़े हो गए थे। पत्‍नी ने सिर का आँचल जरा आगे की तरफ खींच लिया था। पिता ने उसकी छोटी बच्‍ची को, जो माँ की गोद में ऊँघ रही थी, आगे बढ़ कर अपनी गोद में खींच लिया। दोनों बड़े बच्‍चे अब भी सहमे-से एक ओर खड़े थे। एक के हाथ में प्‍ला‍स्टिक की कंडिया थी और दूसरा हाथ में अटैची उठाए इधर-उधर की टोह ले रहा था।

इसी समय रिक्‍शा-चालक एक हाथ में सूटकेस और दूसरे में बिस्‍तर लटकाए सहन में घुसा। उसकी पत्‍नी और बच्‍चे कमरे की दिशा में बढ़ गए और वह पीछे मुड़ कर रिक्‍शावाले को किराया चुकाने लगा। रिक्‍शावाले को विदा करके वह भी कमरे की देहरी पर जा कर खड़ा हो गया। उसने अपनी माँ की कराहट सुनी – शायद वह चारपाई पर बैठने की कोशिश में कराह रही थी।

भीतर जा कर उसने देखा, कमरे की अवस्‍था भी अच्‍छी नहीं थी। दोनों तरफ की खिड़कियाँ बंद थीं। माँ अँधेरे में ढीली-सी चारपाई पर लेटी हुई थी और छोटी बहन रेखा माँ की सूखी पिंडलियों पर तेल की मालिश कर रही थी। इस कमरे में भी घर का टूटा-फूटा और अंगड़-खंगड़ वह सामान पड़ा था, जिसे अब तक घूरे पर पहुँच जाना चाहिए था।

कुल मिला कर पूरे माहौल में एक अजीब-सी उदासी और विपन्‍नता फैली हुई थी। घर में माँ-बाप और जवान बहन की उपस्थिति के बावजूद सब तरफ मौत का सन्‍नाटा छाया हुआ था।

सह‍सा उसे याद आया कि इस घर में कई पीढ़ियों से अच्‍छी-खासी भीड़-भाड़ चली आ रही थी, लेकिन अब पुराने दरों-दीवारों के साथ घर के आदमी भी जंग खा रहे थे।

उसने रजाई का किनारा हल्‍के से सरका कर माँ के पाँव छुए और उनके पास ही बहुत आहिस्‍ता से अदवाइन पर बैठ गया। माँ के चेहरे पर आते-जाते भावों का उसे कोई अनुमान नहीं हो पा रहा था। माँ का चेहरा उस टूटे-फूटे दर्पण जैसा था, जिसका पानी कई स्‍थानों से गायब हो गया हो और उसमें कोई आकृति, चाहे वह कैसी भी हो, सिवाय विद्रूप के कुछ और नजर न आए।

माँ ने अपने पाँव सिकोड़ कर उठने की कोशिश की। शायद वह उठ कर उसके सिर पर हाथ फेरना चाहती थीं लेकिन उसने उनके पाँव दबा कर उन्‍हें उठने से रोक दिया और उनकी वह आवाज सुनी, जिसे अपने कानों और चेतना में वह आसानी से नहीं झेल सकता था। वह अपने कंठ की चीख बरबस दबा कर रो रही थीं। वह चीत्‍कार उस बीमार बच्‍चे का रुदन जैसा था, जिसकी रो सकने की शक्ति भी जवाब दे गई हो।

उसने दाएँ-बाएँ देखा, शायद पिता माँ के आर्तनाद को ले कर कुछ कहें, लेकिन उसने पाया कि वह आसपास कहीं भी नहीं हैं। उसकी बहन ने संभवत: उसकी आँखों की खोज को पढ़ लिया। वह तेल की कटोरी जंगले में टिका कर उठते हुए बोली, ‘बप्‍पा दूध लेने गए हैं। मैं चाय बना कर लाती हूँ।’ वह फुर्ती से उठी और रसोई के दरवाजे पर पहुँच कर बोली, ‘माई आपको कई दिन से पूछ रही थीं।’

उसे बहन के शब्‍दों से ऐसा आभास मिला, मानो वह माँ की दिशा में झपटती किसी अव्‍यक्‍त गति की ओर संकेत कर रही हो। वह एकाएक सिहर उठा और उनके सिरहाने पहुँच कर उनके सिर पर हाथ फेरने लगा। माँ के सिर पर मुट्ठी-भर बाल भी मुश्किल से रह गए होंगे। यही माँ कभी अच्‍छी-खासी लंबी-तड़ंगी थी, जब वह चोटी करती थी, तब इतने बाल तो टूट कर कंघी में ही अटके रह जाते थे।

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वह माँ के सिर पर हाथ फेरता रहा और उनकी आँखों से ढर-ढर पानी बहता रहा। उसके पास सांत्‍वना देने के लिए जो शब्‍द थे, उन्‍हें एक साथ इतने रास्‍तों से ग्रहण लग गया कि वह केवल एक दीर्घ आह खींच कर रह गया। रो कर जब माँ का मन कुछ हल्‍का हो गया तब उन्‍होंने कष्‍ट से करवट बदली और धोती के पल्‍ले से नाक पोंछ ली। उन्‍हें खाँसी का दौरा-सा पड़ गया। वह बेचैन हो कर उठने लगीं तो वह उनका आशय समझ गया। उन्‍हें कंधों से सहारा दे कर उसने पाटी के नजदीक किया और चारपाई के नीचे से मिट्टी का कसोरा उठा कर उनके मुँह से सटा दिया।

वह सोचने लगा, अपनी पारिवारिक व्‍यस्‍तताओं में मैं इतना गर्क रहता हूँ कि मुझे अपने इस टूटते-ढहते घर का कभी ख्‍याल नहीं आता। बहन शादी के लिए तैयार बैठी है, माँ अपाहिज हो चली है, पिता मिडिल स्‍कूल की हेडमास्‍टरी से रिटायर हो चले हैं, जिन्‍हें अब सिर्फ अट्ठाइस रुपए माहवार की पेंशन मिलती है। माना कि दादाओं का बनवाया हुआ, बराएनाम यह घर उनके पास है, लेकिन अब तो यह भी सदियों पुराना लगने लगा है। मरम्‍मत की बेहद जरूरत है। इसमें सब तरफ मनहूसियत व्‍याप्‍त हो चली है। हालत यही रही तो दो-चार बरस में दीवारें और छतें अपनी जगह टिकी नहीं रहेंगी।

दोपहर को रेखा ने जो खाना उसे परसा, वह देखने में सद्गृहस्‍थ का ठीक-ठाक सामान्‍य भोजन था, लेकिन घर की नाव को जिन डाँवाडोल परिस्‍थतियों में डगमगाते देख रहा था, वह उसे परसे हुए भोजन के प्रति स्‍वस्ति प्रदान नहीं कर पा रही थी। वह पिता को कुछ ऐसा नहीं दे पाता था जिसे गनीमत कहा जा सके। फिर यह भी कि नियमित तो वह कभी कुछ दे ही नहीं पाता था। आज के जमाने में सत्‍तर-पचास का मतलब क्‍या होता है और वह भी महने-दो-दो महीने के अंतराल पर! उसे भोजन की थाली के सामने बैठ कर अपने उस घमंड को ले कर गैरत महसूस हुई जो वह पिता को मनीआर्डर भेजने के बाद किया करता था। यह कितनी हया की बात है कि उसके द्वारा भेजी गई राशि से पूरे महीने की एक जिन्‍स भी पूरी मिकदार में नहीं खरीदी जा सकती।

वह खाने से निवृत्‍त हो कर उस लंबे-से कोठे में जा कर लेट गया, जहाँ वह विद्यार्थी-जीवन में रहा करता था। दीर्घकाल तक उन दीवारों और छत का साक्षी रहने के कारण वह तब और अब के अंतर को एक क्षण में जान गया। फर्श में जगह-जगह से चूना उखड़ गया था और छत चिटक कर दरार-दरार हो गई थी। छत के बीचों-बीच लोहे के कुंडे में जो रस्‍सी गाँठ-दर-गाँठ बँधी थी, वह उसके उस बचपन की साक्षी थी। जब वह झूले के लिए मचल उठता था। रस्‍सी झुरझुरी हो चली थी, लेकिन किसी ने उसे यहाँ से निकाला नहीं था, गोया अव्‍यक्‍त ढंग से उस कोठे में ऐसा कुछ छोड़ दिया गया था जो उसकी देह-गंध से खाली नहीं था।

उसका ध्‍यान बच्‍चों के शोर-शराबे से टूट गया। उसने महसूस किया कि उसके तीनों बच्‍चे घर में उन्‍मुक्‍त हो कर खेल-कूद रहे हैं और सारे सहन में किलकारी मारते घूम रहे हैं। उसका अपना फ्लैट अच्‍छा और आकर्षक है। शहर में आज दिन इतना बड़ा फ्लैट कोई हँसी-खेल नहीं है। मगर इस लंबे-चौड़े मकान के मुकाबिले वह क्‍या है? कहने को उसके पास पूरे दो कमरे हैं, मगर उनमें चार चारपाइयों की समाई भी नहीं है। अगर बाहर से दो मेहमान आएँ तो एक मुसीबत-सी खड़ी हो जाती है। उसे हजार रुपए से ऊपर तनखाह मिलती है, पर महीने की पंद्रह तारीख से ही काटा किल-किल शुरू हो जाती है। वह लोगों के सामने इस तरह रोता है, जैसे वह लंबे वक्‍त से बेरोजगार हो। वह जानता है, लोग आधे माह के बाद रुपए को इस हसरत से याद करते हैं, गोया कोई बहुत नजदीकी उम्र से पहले ही गुजर गया हो। और इस घर में आने वाली मात्र अट्ठाइस रुपए की पेंशन! इसे तीस-इकतीस दिनों में बाँटने वाला गणितज्ञ अभी शायद पैदा ही नहीं हुआ। इस घर में तीन प्राणी हैं और उनकी सीमाएँ ही सीमाएँ हैं; सामर्थ्‍य नाम की कोई चीज उनके पास नहीं है। कोई अर्थशास्‍त्री भी अट्ठाइस रुपए और तीन आदमी की पहेली नहीं सुलझा सकता।

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खाने से निवृत्‍त हो कर पिता अपना हुक्‍का ले कर उसके पास आ बैठे और गंभीर चेहरे पर मुस्‍कान लाने का प्रयास करके बोले, ‘सो जा लल्‍ला!’

उसने उनको कोई उत्‍तर नहीं दिया, चारपाई पर उठ कर बैठ गया। वह भी कुछ नहीं बोले, बस चुपचाप हुक्‍का गुड़गुड़ाते रहे। कुछ देर बाद उसे लगने लगा कि वह उससे भीतर ही भीतर वार्तालाप कर रहे हैं। उनकी चुप्‍पी अनायास नहीं लगती थी। उसने बातचीत के लिए कोई मुद्दा सोचने का प्रयास किया, पर उसे हर विषय बहुत नाजुक लगा। पिता के लिए घर-परिवार की चिंताओं के अतिरिक्‍त अन्‍य कोई विषय महत्‍वपूर्ण नहीं है। उनकी चेतना में रेखा की शादी को ले कर गहरा द्वंद्व है। एकमुश्‍त रुपया एकत्र कर पाने की स्थितियों में वह कभी नहीं रहे और आज रुपया ही एकमात्र उपायकरण है। उसने कनखियों से उनकी ओर देखा – माथे पर सलवटें ही सलवटें थीं और चेहरा सघन झुर्रियों से रेखागणित बन कर रह गया था।

तीन दिन निकल गए। उसे दिनों के बीतने का कोई खास अहसास नहीं हुआ। वह इस दौरान घंटों माँ के पास बैठता रहा। पिता भी उसके पास आ कर बैठ जाते थे और शहर के फैलते चले जाने पर चिंता प्रकट करने लगते थे। महँगाई बढ़ने का कारण उनकी नजर में शहरों की बढ़ती आबादी थी वह कई बार कहते थे, ‘गाँव शहर हो गए अब तो! पता नहीं इतनी खलकत कहाँ से अर्रा पड़ी! यही हाल रहा तो पता नहीं दुनिया कहाँ समाएगी!’

इन तीन दिनों में वह बहुत कम वक्‍त के लिए ही बाहर निकला। साथ पढ़नेवाले और बचपन के संगी-साथी उसी की तरह शहर को छोड़ कर इधर-उधर जा चुके थे। जो सामान्‍य ढंग से परिचित थे, उनसे कोई अंतरंग वार्तालाप संभव नहीं था, महज औपचारिक-सी बातें हो कर रह जाती थीं। मसलन किस नौकरी में हो? क्‍या पड़ जाता है वगैरह! उसकी तनख्‍वाह को ले कर कोई-कोई अचरज भी प्रकट करता। कस्‍बे में इतनी तनख्‍वाह मिलती भी किसे थी? इन तीन दिनों में बच्‍चे गलियों में रम गए। रेखा उसकी पत्‍नी को ले कर कई घरों में घूम आई। औरतों की भी आवाजाही लगी रही और उसे पहली बार इस घर में रहते यह अहसास हुआ कि वह मशीनी दिनचर्या से मुक्‍त है।

जब चौथे दिन वह घर से जाने लगा तब माँ ने उसके तीनों बच्‍चों को अपने पास बुलाया। उन सबके सिर सूँघ कर प्‍यार किया और अपने गूदड़ तकिए के नीचे से एक चिथड़ा निकाला। वह काँपते हाथों से देर तक गाँठें खोलती रहीं। उसने देखा कि माँ ने मुड़े-तुड़े मगर साफ नोट बच्‍चों को दिए। वह सोच भी नहीं सकता कि इन बीहड़ परिस्थितियों में कोई किसी को कुछ दे सकता है। वह तीन दिन से लगातार सोचता चला आ रहा था कि लौटने का किराया बचा कर वह घर से जाते वक्‍त सारे रुपए माँ को दे देगा लेकिन अब माँ द्वारा बच्‍चों को रुपए दिए जाने के बाद उसे यह काम मुश्किल लगने लगा। उसने तय किया कि घर से बाहर निकल कर वह रुपया किसी को दे देगा – पिता तो बाहर द्वार पर होंगे ही।

जिस समय उसका सामान रिक्‍शे पर लद रहा था उसने देखा, बच्‍चों के साथ पिता और रेखा भी बाहर आ गए हैं। रेखा उसकी छोटी बच्‍ची को गोद में उठाए हुए थी। उसने रेखा के नजदीक जा कर बहुत नामालूम ढंग से रुपए उसे पकड़ाते हुए फुसफुसाहट में कहा, ‘माँ की किसी अच्‍छे डॉक्‍टर से दवा कराना। मैं पहुँच कर रुपए तुरंत भेजूँगा।’ रेखा ने रुपयों की ओर देखा तक नहीं। उन्हें मुट्ठी में दाबे बोली, ‘रास्‍ते में जरूरत पड़ेगी। कमी न पड़ जाए। फिर भेज देते।’ उसने रेखा की बात का उत्‍तर नहीं दिया, व्‍यस्‍तता से अपनी पत्‍नी मालती को पुकारने लगा।

उसकी पत्‍नी सास के पैर छू कर लौटी तो उसे लगा उसके चेहरे पर उदासी है। उसने पिता के पाँव छुए और रिक्‍शे की तरफ बढ़ लिया। रेखा ने बच्‍ची को मालती की गोद में दे दिया और बच्‍चे पीछे हुड पर चिपक कर बैठ गए। रिक्‍शा जब गली पार कर गया तब मालती भरे कंठ से बोली, ‘अम्‍मा की हालत अच्‍छी नहीं है। आप साथ ले चलते और वहीं इलाज कराते तो शायद ठीक हो जातीं।’

‘सोचता तो कई बार मैं भी यही हूँ, पर वहाँ इनके लिए भागदौड़ बहुत करनी पड़ेगी। यह अकेले आदमी का काम नहीं है। फिर एक बात यह भी है कि वह हमारे साथ चलने को राजी नहीं होंगी।’

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‘सब हो जाएँगी राजी, आप कहते तो… हमारा फर्ज तो है उनके लिए।’

उसने मालती से स‍हमति जतलाई, ‘चलो, कोई बात नहीं। वहाँ जा कर पिता जी को लिख दूँगा। कुछ दिनों के लिए सभी लोगों को अपने पास बुला लेंगे।’

‘ऐसा ही करना,’ कह कर मालती चिंतामुक्‍त हो गई, किंतु वह गंभीरता से सोचने लगा कि क्‍या ऐसा संभव हो सकता है कि सारे लोगों को अपने पास बुला ले और मरणासन्‍न माँ का भरोसे का इलाज करा ले जाए?

सोचते-सोचते रिक्‍शा स्‍टेशन पर जा पहुँचा, किंतु वह तय नहीं कर पाया कि उसे माँ का ढंग से इलाज कहाँ और कब कराना चाहिए। स्‍टेशन की गहमागहमी ने उसकी सोच को अवरूद्ध कर दिया।

रिक्‍शा चालक ने सामान उतार कर स्‍टेशन की सीढ़ियों पर रख दिया। उसने जेब में हाथ डाल कर पर्स निकाला तो उसने देखा, उसमें एक रुपए का कोई नोट नहीं है। उसने रिक्‍शेवाले की ओर पाँच रुपए का नोट बढ़ा दिया। वह बोला, ‘बाबू जी, मेरे पास छुट्टा नहीं है। आप एक रुपए का नोट दे देओ।’ पत्‍नी के पर्स में भी छुट्टे के नाम पर महज एक अठन्‍नी ही निकली।

वह अभी पाँच का नोट तुड़ाने की सोच ही रहा था कि उसका बड़ा बच्‍चा समीर बोला, ‘मेरे पास दादी अम्‍मा का दिया हुआ जो रुपया है, उसे दे दूँ?’ और यह कहने के साथ ही उसने अपनी जेब से चार तह में मुड़ा हुआ नोट निकाल कर रिक्‍शेवाले की तरफ बढ़ा दिया।

बेटे की सहज अभिव्‍यक्ति ‘दादी अम्‍मा का दिया हुआ रुपया’ उसके कानों में गूँजते हुए सर्वांग में एक लहर की माफिक दौड़ गई। एक विचित्र-सी सिहरन अनुभव करते हुए उसने रिक्‍शेवाले के हाथ से नोट वापस ले‍ लिया और पत्‍नी, बच्‍चों और रिक्‍शा-चालक को वहीं छोड़ कर कहीं लपक गया।

बच्‍चों के लिए बिस्‍कुट का पैकेट खरीद कर उसने पाँच रुपए का नोट तुड़वा लिया और समीरवाले एक रुपए के नोट को पर्स की भीतरी जेब में डालते हुए वह बच्‍चों की तरफ लौट आया। रिक्‍शा चालक को किराया चुकाने के बाद उसने धातु का एक रुपया समीर की ओर बढ़ाया, ‘लो दादी अम्‍मा के रुपए के बदले तुम यह चाँदी का रुपया ले लो।’

‘पर दादी का रुपया कहाँ गया पापा?’ समीर ने जिज्ञासु भाव से पूछा। किंतु उसने बेटे की बात को कोई उत्‍तर नहीं दिया। व्‍यस्‍तता से कुली को आवाज लगाने लगा।

गाड़ी प्‍लेटफार्म पर लग चुकी थी। उसने अफरा-तफरी में बच्‍चों और सामान को ट्रेन के अंदर पहुँचाया और कुली को पैसे चुकाने के लिए जेब से पर्स खींच लिया। समीर के दिए हुए नोट को सर्तकता से बचाते हुए उसने कुली को भाड़ा चुकाया और हथेली से माथे का पसीना पोंछने लगा। सब तरफ से निश्चिंत होने के बाद उसे फिर उस रुपए का ध्‍यान आया जो उसकी माँ ने उसके बेटे समीर को आशीर्वाद स्‍वरूप दिया था। पता नहीं उसके मन-मस्तिष्‍क में क्‍या बवंडर-सा उठा कि उसने जेब से पर्स निकाल कर पर्स से वह तुड़ा-मुड़ा नोट खींच लिया और पत्‍नी की ओर बढ़ाते हुए धीरे से फुसफुसाया, ‘इसे खर्चना मत, पूजा की थाली में रख देना है।’

पत्‍नी उसका चेहरा हैरत से देखने लगी। उस बेचारी की समझ में कुछ नहीं आया। वह उस चार तहों में मुड़े हुए नोट को मूढ़ भाव से देखती रही। वह पत्‍नी के प्रश्‍नों से बचने की गरज से खिड़की के सामने से खिसक कर आगे बढ़ गया। इस समय उसकी संपूर्ण चेतना उस कोठे में केंद्रित हो गई, जहाँ उसकी रूग्‍ण माँ निरीह-निशब्‍द लेटी केवल मुक्ति की प्र‍तीक्षा कर रही थी। उसने अपने भीतर उमड़ती एक विवश रुलाई को बरबस दबा लिया और पत्‍नी-बच्‍चों की तरफ लौट गया।

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