मेरे मन का शतरंज

मेरे मन का शतरंज

मेरे मन का शतरंजचौसठ खानों के बीचउलझा हुआहाँ और ना मेंकभी अमावस्या मेंपूर्णिमा का अहसास तो कभी पूर्णिमा मेंअमावस्या का अहसास।तरंगों के प्यादे आगे बढ़ाने मेंकभी समान तरंगों के प्यादे सेअहं के ऊँट को निगलते हुएहाथी की चाल से मात देते हुएमन के घोड़े को दौड़ाती चली गई कि अपने प्रेम के वजीर से जीत … Read more

फिर हो जाएँगी जल

फिर हो जाएँगी जल

जल होता ही हैशुद्ध, शीतल, निर्मलरंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन वो होता ध्यान में लीन तपस्वी सानर्मदा, गंगा, यमुना सा पवित्र। फिर पानी जिसे नहाने योग्यपीने योग्यबनाने की कवायदपानी का खौलानाएक चित्त की असहमतिजो खारिज करती है,अंतस की कुलबुलाहट कोफिर भीखौलते पानी की कुछ बूँदें आश्वस्ति हैंकि वो भाप बन फिर हो जाएँगी जल।

दर्द के साथ वसंत

दर्द के साथ वसंत

कमरे मेंबिल्कुल सन्नाटासाथ थीसिर्फ ऊबकितने जतन के बाद भीजा ही नहीं रही तभी हल्की सिहरन के साथठंड का स्पर्शखुशबू एक देह कीहल्की ठंड कीएक परतहटानी हैदर्द होगा तभी तोवसंत आएगा।

ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग

मेरे फेफड़े परजम गई है काई, फिसल रहा है खूनजब साँस लेती हूँ तबसाँसों में आ जाते हैंकटे पेड़ों की आत्मा, जब छोड़ती हूँतो जलने लगती है धरतीपिघलती है बर्फ, पहले सूर्य की किरणेंधरा को छू के लौट जाती थीवैश्वीकरण की कुल्हाड़ी परअब किरणें सोख लेती है धरती, सूर्य और धरती केरिश्तों की गर्माहटवार्मिंग से … Read more