हैलियोफोबिक

वह उसी कैंप से आता था। वह सुंदर था। बहुत सुंदर। लड़के कहाँ इतने सुंदर होते हैं। कैंप भयंकर और निर्दयी लोगों की बस्ती था। गरीबी और भुखमरी के कारण पागल और लुटेरे बने निर्मम लोग। जहाँ किसी का मरना खुशी लाता था। लोग हत्या और लूट के लिए हमेशा तैयार रहते। इस कैंप को … Read more

लॉर्ड इर्विन ने इग्नोर किया

जंगल के आदमी और औरत बाहर की आवाज सुन चुके थे। आदिम आदमी और आदिम औरत। नग्न आदमी और औरत। …मित्रों नग्न एक क्रूर शब्द है। बर्बर और कातिलाना। जंगल को देखता हूँ तो लगता है, इसे हिंदी से बाहर खदेड़ दिया जाय। …तो आदमी और औरत। सिर्फ आवाज और पुकारवाले आदमी और औरत, जिनकी … Read more

रोना

गाँव में गमी हुई थी। पूरे गाँव की औरतें जुटी थीं। औरतों का रोना चल रहा था। यह ठीक-ठीक पता नहीं कि वे रो रही थीं या नहीं, पर उसे रोना माना जाता था। किशन अपने मकान में लेटा था। उसे औरतों का रोना सुनाई दे रहा था। रोने की आवाज पूरे गाँव में सुनाई … Read more

भूगोल के दरवाजे पर

जब तक मैंने वहाँ के बाशिंदों को नहीं देखा था, पहले-पहल वह गाँव ठेठ ही लगा। यह बात थी उन्नीस सौ अस्सी की। वह गाँव इतना ठेठ लगा था, कि लगता है वह आज भी जस का तस है। रुका हुआ और अ-बदला। छत्तीसगढ़ में वह समुद्र तल से सबसे अधिक ऊँचाई पर बसी जगह … Read more

दादी, मुल्तान और टच इन गो

उस शहर की स्मृतियाँ किराए पर थीं और एक दिन मकान मालिक ने घर से निकाल दिया। वह बेगाने हक वाली स्मृति थी और हमें पता नहीं था, कि हमें इससे बेदखल किया जाएगा। बचपन के किसी कोने में कबाड़ इकठ्ठा है। रेस कोर्स का छोटा घास का मैदान जहाँ हम शाम को खेलते थे। … Read more

द रॉयल घोस्ट

‘…चल-चल आज तो दिखा ही दे, क्या है उस ट्रंक में। मान जा यार।’ पिता बिट्टो बुआ से निवेदन कर रहे थे। बिट्टो बुआ को पता था कि यह निवेदन पहले जिद में और फिर उन्हें धमकाने तक बढ़ेगा। इसका अंत हमेशा की तरह पिता, दोनों बुआओं और चाचा की झुँझलाहट से होगा – ‘जाने … Read more

चाँद चाहता था, कि धरती रुक जाये

गाँव में अँधेरा था। बस्तर के नक्शे पर आज भी उस गाँव का नाम नहीं दीखता। वहाँ अँधेरा है। गाँव जंगल में था। जंगल गाँव में था। दोनों के अँधेरे एक-दूसरे में थे। दोनों अपने अँधेरों को बाँटते थे। वहाँ अँधेरों की कोई लड़ाई नहीं थी। वह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। वहाँ अँधेरे बाँटने … Read more

गुलमेहँदी की झाड़ियाँ

उस दिन धूप बहुत तेज थी। सुबह से ही लू चल रही थी। रेलवे ब्रिज की रोड से उठती गर्म हवा सड़क के ऊपर दीख रही थी। मानो कोई पारदर्शक पर्दा हवा में डोल रहा हो। गर्मी के कारण रोड पर जगह-जगह पानी गिरे होने का भ्रम हो रहा था। डामर पिघल कर फिसलन भरी … Read more

गुणा-भाग

चंपालाल उसे लगातार घूर रहा था…। कच्चे फर्श पर उसे लिटाया गया था। उसके गर्दन तक एक चादर पड़ी थी। चादर के बाहर दो काले, आड़ी-टेढ़ी उँगलियोंवाले, गहरी बिवाइयाँ और मिट्टी से सने पैर निकले हुए थे। उसके दाहिने पैर में टखनों के ऊपर सफेद कपड़े की पट्टी बँधी थी, जिसके भीतर पत्थर जैसी चीज … Read more