हैलियोफोबिक

वह उसी कैंप से आता था। वह सुंदर था। बहुत सुंदर। लड़के कहाँ इतने सुंदर होते हैं।

कैंप भयंकर और निर्दयी लोगों की बस्ती था। गरीबी और भुखमरी के कारण पागल और लुटेरे बने निर्मम लोग। जहाँ किसी का मरना खुशी लाता था। लोग हत्या और लूट के लिए हमेशा तैयार रहते। इस कैंप को देख कर यकीन करना मुश्किल था, कि ये सब लोग अच्छे घरों से थे। शांत और अच्छे घरों वाले लोग, जो छोटी-छोटी इच्छाएँ पालते हैं और यकीन करते हैं, कि वे और उनके माँ, बाप, भाई, बहन… कभी मरेंगे नहीं। पर यहाँ उनकी औरतों और बच्चों को कुत्तों की भाँति लाठियों से पीट कर मार डाला जाता था और उन्हें इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। कुछ लोग आत्महत्या कर लेते, ज्यादातर नए लोग… पर अधिकतर ऐसा नहीं कर पाते थे।

वे 1988 की गर्मियाँ थीं। मैं उस दिन पाकिस्तान में पेशावर के पास था।

कैंप में दूर-दूर तक लगे मटमैले, फटे और जोड़ कर खड़े किए गए तंबू, जो धूल भरी गर्म हवा की फुफकार के साथ कँपकँपाते थे और कभी-कभार लाइनों से गिर जाते एक बेतरतीब, मनहूस और निर्मम बस्ती की तरह थे। दूर-दूर तक, जहाँ धुआँ और धूल के कारण दिखना खत्म हो जाता था, उससे भी आगे, सूखे, नंगे पथरीले टीलों तक ये तंबू अस्त-व्यस्त से लगे थे, जैसे शहरों के बाहर कचरा फेंकने की जगह होती है, दूर तक रंगहीन हवा में कँपकँपाता कागज, पॉलीथिन, रद्दी अखबार, फटे कपड़े, गत्ता, प्लास्टिक शीट्स, केले के छिलके… मटमैले बदबू मारते घिसे हुए रंग, जिन्हें घिन के साथ फेंक दिया गया हो ।

हर तंबू में कुछ लोग हैं। ज्यादातर अकेले। कुछेक अपनी बीवी बच्चों के साथ। अपने साथ कोई किसी को रखना नहीं चाहता, जब तक कि कोई मजबूरी ना हो। पर कुछ लोग अपने रिश्तेदारों के साथ हैं। बहुत कम, इक्का दुक्का… उनके कुछ परिचित जो अब तक लड-झगड़ कर अलग नहीं हुए हैं।

एक से लोग, रूखे बाल, धूप में जल कर लाल-काले हुए गोरे चेहरे, तार-तार होते कपड़े जिनमें से ज्यादातर गहरे ब्राउन रंग के मोटे लबादे थे, जो पाकिस्तान की सरकार ने बांटे थे। ज्यादातर नंगे पैर और कुछ घिसी-पुरानी चमड़े की जूतियाँ, गले या बाँह पर कोई ताबीज, एक मात्र ऐसी चीज जो मरने के बाद उनके साथ कब्र तक जाती है, बाकी सब लोग नोच लेते हैं पर ताबीज से डर लगता है, सपाट भावहीन चेहरे ना हँसी, ना खुशी, ना पश्चाताप, ना उम्मीद… बस दो पलक झपकाती आँखें… यंत्रवत।

यहाँ जीवन रगडे खाने की औकात है। कमजोर और बीमार… याने मौत। इसलिए यहाँ बच्चे बहुत कम हैं… कहीं-कहीं इक्का दुक्का, ज्यादातर अपनी पर्दानशीं माँ से चिपके हुए… रोते-झींकते ।

मुझे बताया गया है, कि ये लोग लगभग डेढ लाख हैं।

रोज सुबह दस बजे ये सब लोग लाखों की तादात में, पत्थरोंवाले टीले के पार जहाँ पेशावर से आनेवाली रोड गुजरती है, इकट्ठा हो जाते हैं। रंगबिरंगे और तरह-तरह की चमकीली चीजों से अटे पड़े पेशावर सूबे के पाकिस्तानी ट्रकों का एक हुजूम इन लोगों के लिए खाने के पैकेट लाते है। नार्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट की पुलिस और पाकिस्तानी आर्मी के सैनिक जो ज्यादातर पख्तून हैं या लोकल बाशिंदे रोज बेदर्दी से जानवरों की तरह इस अनियंत्रित भीड़ पर लाठियाँ ले कर टूट पड़ते हैं। वे भीड़ को, जो खाने के पैकेट के लिए बुरी तरह लड़ती झगड़ती है, नियंत्रित करने की बेजान सी कोशिश करते हैं।

भीड़ में फटे-पुराने अफगानी नीले लबादे-बुरके से सिर से पाँव तक ढकी चीखती-चिल्लाती औरतें, एक दूसरे को लात-घूँसा मार कर आगे बढ़ते आदमी, जिन पर मुश्टंडे सिपाहियों की लाठियाँ भी बेअसर हो जाती हैं। यहाँ यह सब रोज होता है। बच्चे लाखों की दम घोंटू भीड़ से अलग रोते-चीखते खड़े होते हैं। उनकी माएँ लगभग उन्हें फेंक कर, भीड़ में लड़ती झगड़ती समा जाती हैं। इस कातिलाना भीड़ में कभी-कभी कोई कुचल कर-दब कर मारा जाता है। ज्यादातर कोई औरत या बूढ़ा जिसका शरीर धूल भरी जमीन पर बिखरा हुआ सा पड़ा रह जाता है। सब चले जाते हैं …बस एक या दो बेजान शरीर छूट जाते हैं, जिसके पास से किसी के सिसकने की, या किसी बच्चे की चीख-चीख कर रोने की आवाज आती रहती है। फिर रात घिरती है और आवाजों को बंद होना पड़ता है। कुछ लोग जिन्हें खाने का पैकेट मिल जाता है, खुश होते हैं…ज्यादातर आदमी जो लूट खसोट में कामयाब रहते हैं, जो पुलिस की काफी लाठियाँ सह सकते हैं… वे एक भय के साथ दमकते चेहरे लिए तंबू पहुँचते हैं, तंबू की औरतें, आदमी और बच्चे उस पर टूटते से गिड़गिड़ाते हैं। यह यहाँ रोज होता है। पूरा दिन सिर्फ तीन काम जिंदा बने रहने के लिए जोरमजस्ती, खाने की लूट और अकसर कुछ लोगों की मौत… सिर्फ तीन काम।

वह इन्हीं लोगों के बीच से आता था। वह किसी बड़े अमीर घर में पैदा हुआ था। लगता नहीं था, कि वह इसी भीड़ का हिस्सा है।

मरे हुए लोगों को दफनाना यहाँ एक बड़ा काम है। यह सरकारी पुलिस करती है। एक मुल्ला जिसकी यहाँ ड्यूटी है, दफनाने के समय फातेहा पढ़ता है। कभी-कभी किसी को दफनाते समय उसका कोई अपना वहाँ पहुँच जाता है। कभी-कभी वहाँ पहुँचनेवाला सिसकता है, रोता है… पुलिस कागजों पर उसका अँगूठा लगवाती है। कभी कोई सिपाही सिसकते-रोते आदमी के कंधे पर हाथ रख देता है, पर वह औरतों के साथ ऐसा नहीं कर सकता। यहाँ औरतों को छूना हराम माना जाता है। इसकी सख्त मनाही है।वह औरतों से कुछ कह भी नहीं पाता है क्योंकि ज्यादातर औरतों को पख्तूनी, अंग्रेजी या उर्दू नहीं आती है, ज्यादातर औरतें पढ़ी लिखी नहीं है, और ठेठ अफगानी बोलती समझती हैं।

कैंप से दूर पत्थरोंवाले टीले के पार, रोड और टीले के बीच फैली हजारों कि.मी. लंबी बंजर जमीन पर सिपाहियों के टेंट लगे है। ज्यादातर सिपाही पाकिस्तानी आर्मी के सैनिक या रेंजर हैं और कुछ स्थानीय पुलिस स्टेशनों के वर्दीधारी। पर सभी लोग एक ही शब्द से जाने जाते हैं – दरोगा, अगर अलग-अलग जानना हो तो ‘बड़ा दरोगा’ और ‘छोटा दरोगा।’ इन्हीं टेंटों के किनारे एक टपरेनुमा ढाबा है – ‘भिश्ती बाबा का होटल’ …यह उर्दू में लिखा है और उर्दू ना जानने के कारण काफी दिन बाद मुझे पता चला कि खालिद भाई की दुकान का नाम भिश्ती बाबा पर है, एक सूफी बाबा जिसकी एक अनजान और तुच्छ सी मजार यहाँ से पास ही है ।

इस कैंप में आए हुए पूरा एक सप्ताह हो गया है। मैं यहाँ आने के बाद सिपाहियों के टेंट के पास ही रहने लगा। इस तरह रोज पेशावर से आने की झंझट और यहाँ की बेहतर कवरेज, बेहतर कहानियाँ, बेहतर फोटो मैं अपने पेपर के लिए पा सकता था। फिर यह सुरक्षित भी था। खालिद भाई के होटल में ही मेरी एक खटिया लग जाती। खालिद एक पहाड़ी है, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट के पूर्व में पहाड़ों पर रहनेवाले पुराने लोग। रात को होटल में सिपाहियों का हुजूम होता। ज्यादातर दारू पिए होते ओर अनर्गल बातें करते रहते। वहाँ हर रात बकरा, भेड, मुर्गा या गाय का माँस पकाया खाया जाता। वे उजड्ड और गँवार किस्म के सिपाही थे। उनके चेहरे निर्दयी और पथरीले से लगते। यद्यपि मुझे धीरे-धीरे पता चला कि उनमें से ज्यादातर का अपना परिवार है, बच्चे हैं और वे अपने परिवारों के बारे में अकसर बातें करते हैं। यह एक अजीब सा मेल था निर्मम और उजड्ड से लंबे तगड़े, लाल-लाल आँखोंवाले, दरिंदो की तरह मांस और दारू पीनेवाले ये सिपाही अपने घर-परिवार की बातें बड़ी संजीदगी से करते थे।

इस कैंप में दूसरे शरणार्थियों का आना अकसर होता था। सामान्यतः वे किसी ट्रक में या मिलिट्री की भारी भरकम गाड़ी में लाए जाते। उनके साथ कुछ सैनिक होते। कभी-कभी एक या दो ट्रक भर कर सौ-डेढ़ सौ लोग, तो कभी कोई एक मात्र परिवार आदमी-औरत और दो-तीन बच्चे, तो कभी कोई अकेला आदमी या औरत या बच्चा। सबसे पहले पुलिस के टेंट में उन सबके नाम लिखे जाते। एक तगड़ा सा पख्तून जो अफगानी जानता था, उनके नाम पूछता, फिर उन्हें कुछ चीजें दी जातीं तंबू का कपड़ा, एक दो हिंडालियम के बर्तन, कत्थई रंग का लबादा एक आदमी को एक के मान से, कुछ दवाएँ बुखार और उल्टी दस्त के लिए, तंबू बाँधने की मोटी रस्सी… कुल जमा आठ या दस सामान जिसे ले कर वे पथरीले टीले के पार फैले गँदले और बेदम इलाके में गुम हो जाते। इस बस्ती का एक नाम भी है… जखूदी जिसका मतलब है – महफूज इलाका।

नए आनेवाले लोगों को यहाँ हिकारत से देखा जाता है। नए आनेवालों को यहाँ दुत्कारा जाता है। या तो उनका सामान छीन लिया जाता है या उन्हें मारा पीटा जाता है। पर फिर भी नए लोग कहीं और नहीं जा सकते, सो उन्हें वहीं कहीं अपना तंबू लगाना पड़ता है। अकसर नए लोग अपने साथ कोई छोटा-मोटा सामान लाते हैं, ज्यादातर टीन की पेटी, चमड़े का बैग, कपड़े की पुटरिया, सुतली या जूट से बँधा गठ्ठा… ऐसा कुछ जिसमें तरह-तरह का सामान होता है – औरतों के बचे हुए जेवर, कुरान, सुन्नत या हदीस जैसी किताब, कुछ तस्वीरें, इत्र, शीशा, रंग-बिरंगे कपड़े के टुकड़े, गोश्त काटने का चाकू, काजल की डिब्बी, कुछ अफगानी नोट आदि, जिस पर बस्ती के दूसरे आदमी औरतें गिद्ध की तरह नजर गड़ाए रहते हैं और मौका पाते ही लूट लेते। थोड़ी देर शोरगुल मचता। कोई औरत चीखती-रोती। फिर सब शांत हो जाता।

वह इसी बस्ती से आता था ।

उसका नाम नहीं पता। जब वह इस कैंप में आया था, तब रूस ने पहली बार अफगानिस्तान पर हमला किया था। तब वह तीन साल का था और उसे उसका नाम नहीं पता था। उसे उसकी बस्ती के ही कुछ लोग अपने साथ ले आए थे। उसका पूरा परिवार माँ-बाप और दो बहनें लड़ाई में मारी गई थीं। रूस के लड़ाकू जहाजों ने उसकी बस्ती पर बम गिराए थे। पत्थरों की चिप और लोहे से बना उसका पूरा घर एक धमाकेदार आवाज के साथ गिर गया था। चारों ओर लाल-पीली रौशनी तैर गई थी।

मानो दिन निकल आया हो और भयानक किस्म की चीख-पुकार के बीच वह जाने कहाँ मलबे में देर तक दबा रहा। कुछ लोगों ने जब उसका घर खोदा तब वह उसमें मिला था। एक धुँधली सी स्मृति आज भी उसके भीतर चीत्कारती है। वह जब याद करता है, तो कुछ बौखला जाता है और पागलों जैसी हरकत करने लगता है। उसने पहली बार देखा था कि किस तरह मरे हुए लोगों को हडबड़ाए, डरे और चीखते पुकारते लोग गड्ढों में गाड़ कर भागते हैं। वह बुरी तरह डरा था, जब उसके बाप, माँ और बहनों को घसीट कर एक ही गड्ढे में फेंका गया था। जैसे कचरा फेंकते हैं। वह अपनी बड़ी बहन को यूँ फेंकते वक्त बुरी तरह से चीखा था। यह उसकी आदत थी। वह चीखता था, जब कोई उसकी बहन को चिढ़ाता या मारता था। उस दिन उसने उसकी बहन को फेंकनेवाले आदमी का हाथ अपने पैने दाँतों से काट दिया था और उसे अजीब लगा था, जब उस अदमी ने उसे थप्पड़ मारने कि बजाय अपने लबादे में भर लिया था।

वह किसी के साथ घिसटता सा चल रहा था। चारों ओर धमाकों के साथ आतिशबाजी सी छूट रही थी। वह उस आतिशबाजी को देख कर खुश हुआ था, फिर थोड़ी देर बाद माँ को पुकार कर रोने लगा था। फिर एक धुँधली सी सुबह याद है, वह चितराल (उत्तर पूर्वी पाकिस्तान का एक शहर) था एक बड़े से घास के मैदान में कुछ लोग पोलो खेल रहे थे। उसके साथ के बाकी सब खुश थे… यह पाकिस्तान था, एक पराया मुल्क खुशी की बात तो थी ही…। फिर वे किसी ट्रक से आए थे, सिपाहियों से भरा ट्रक… रास्ते से गुजरता एक गाँव जहाँ साँड़ों की दौड़ हो रही थी… चीखता चिल्लाता हुजूम। उसे उन दिनों का कुछ और याद नहीं…।

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वह बहुत सुंदर दिखता था। लड़के कहाँ इतने सुंदर होते हैं। नीली-हरी बड़ी-बड़ी आँखें, संगमरमर सा गोरा रंग, ब्राउन पतले हवा में उड़ते बाल, …जब वह धूप में भटकता तो उसके चेहरे का गुलाबी रंग थोड़ा बदल कर चिकना और गहरा हो जाता। कैंप की सारी गंदगी, धूल, लूट-खसोट… रेत भरी हवा बुरी तरह उस पर चिपकती, उसे रोज और गँदला कर देती, पर पिछले कई सालों से वह ऐसा ही सुंदर दीखता रहा है… वह इस बस्ती का बाशिंदा ना हो कर, मानो कहीं और से आया हो। उसे देख कर मुझे फरिश्तों की कहानियों पर यकीन करने का मन करने लगता।

‘खान ऊपर देख।’

सिपाही अकसर उससे चुहल करते रहते। उससे कहते आकाश की तरफ देख, पर वह नहीं देखता, ढीठ सा खड़ा रहता। उसका कोई नाम नहीं था, सो सब सिपाही उसे खान कहते थे। सिपाही उससे बार-बार ऊपर देखने को कहता और वह लगातार उस सिपाही को घूरता।

‘अबे देख…।’

‘देख तो कैसा नीला आकाश है…।’

सिपाही ने उसका चेहरा पकड़ कर आकाश की ओर घुमा दिया।

‘कादिर…! कादिर…!’

उसने सिपाही को धक्का दिया, अपना चेहरा उसके हाथों से छुड़ाया और पथरीले टीले की और दौड़ पड़ा। सिपाही हँसने लगे। लड़के को लगा जैसे वह एकदम से कादिर के लबादे में धँस सकता है।

लोग ‘या खुदा’ कहते हैं और यह कादिर… कादिर…।’

एक सिपाही ने मुँह बनाते हुए कहा। बाकी सब हँस दिए।

कादिर का पूरा नाम कादिर-उल-अली है। वह एक अफगानी लडाका है। एक तालिबानी। अल-कायदा का नया मुरीद। वह अनपढ़ है, पर उसे कुरान के बहुत से पाठ और आयतें याद हैं। वह अकसर अपने लाव-लश्कर जिसमें पाँच-छह लड़ाके, कुछ हथियार ढोनेवाले अफगानी टट्टू और कई किस्म के हथियार होते हैं, के साथ इस जगह आ धमकता है। कैंप के फटीचर से दिखनेवाले लोग कादिर के लाव-लश्कर के इर्द-गिर्द मधुमक्खी की तरह भिनभिनाते रहते हैं। लोग अफगानी में चिल्लाते से उससे पूछते हैं और वह एक ही बात बार-बार कह कर लोगों को बहलाता है… एक स्वप्न, जो वह बार-बार कहता है… जब उनकी जमीन, उनके गाँव, नके लोग, उनके घर उनको वापस होंगे… जब वे वापस अपने मुल्क जाएँगे… एक दिन तालिबान रूसी काफिरों से उनकी जमीन छुड़ा ही लेगा… तो क्या हुआ अगर तालिबान पर बेहतर हथियार नहीं हैं… खुदा उन्हीं पर मेहरबान होगा, जंग खत्म होगी और तालिबान उनकी जमीन का सुल्तान हो जाएगा… कादिर चीख-चीख कर उन्हें यकीन दिलाता… वह पिछले आठ सालों से यह यकीन दिलाता आया है… पर लोग हर बार उससे बुरी तरह चिपक जाते हैं… और फिर वह अपनी क्लैश्नेकौफ (रूसी मशीनगन जैसा हथियार) आकाश की ओर करके आधे-एक घंटे तक गोलियाँ चलाता रहता है… उसके दूसरे साथी भी दनादन गोलियाँ दागते हैं… चारों ओर कानफोड़ू आवाज होती है… लोग पगलाए से खुशी में चीखते हैं… कुछ हाथ आकाश में उठा कर दुआएँ माँगते हैं… हाँ अबकी बार जरूर, हाँ इस बार पक्का उन्हें उनका घर और उनके लोग मिल जाएँगे… लड़का आकाश की ओर लपकती मशीनगनों की आग और गोलियों को देखता है… वह पागलों सा चिल्लाता है… उसे यकीन है कादिर के हथियार एक दिन आकाश को खत्म कर देंगे… आकाश से खून निकलेगा और आकाश हमेशा के लिए मर जाएगा…। सिपाही पथरीली पहाड़ियों से यह तमाशा देख कर हँसते।

कादिर की सिपाहियों से गजब की दोस्ती है। याराना। वह उनके लिए सूखे मेवे और बहुत सारे पैसे लाता है और बदले में उसे कुछ और नए हथियार मिल जाते हैं। पेशावर के पास ही एक शहर है डेरा। डेरा में हर तरह के हथियार बनते हैं। लोग डेरा से आलू प्याज की तरह हथियार खरीदते हैं। डेरा के बंदूकचियों ने कादिर की क्लैश्नेकौफ की नकल कर कई क्लैश्नेकौफ बनाई हैं, जो कादिर के दूसरे गुर्गों के पास हैं। सिपाही कादिर के लिए दुआ माँगते हैं और कुछ हाथ उसकी पीठ थपथपाते हैं… वह खून के आखरी कतरे तक लड़ेगा… वह पहाड़ पर खड़ा चिल्लाता है, एलान करता है।

‘खान सिपाहियों का बड़ा खास है।’

खालिद ने मुझे बताया।

‘कुछ ना कुछ खाने पीने को दे देते हैं। गोश्त रोटी या कुछ और… इसी से इधर आता है। खाने को कुछ मिलता नहीं, सो नियतखोर की तरह रोज आता है।’

‘खान इसका नाम है ।’

‘यहाँ काफी लोग बेनाम हैं। उन्हें नाम देना पड़ता है। पुलिस उनको नंबर दे देती है। जब बेनामी आते हैं, ज्यादातर छोटे बच्चे-बच्चियाँ तब एंट्री के समय पुलिसवाले नंबर देते हैं। बताते हैं यही शऊर है।’

‘इसका क्या नंबर है?’

‘पता नहीं। बस खान कहते है। नंबर जरूर होगा, जब यह आया था तब तीन साल का था। नंबर तो जरूर होगा।’

‘बहुत पुराना नंबर।’

‘हाँ ओर छोटा नंबर भी। जो लोग पहली-पहल खेप में दस ग्यारह साल पहले आए थे, उनके नंबर छोटे थे, अब बड़े नंबर मिलने लगे हैं। किसी को क्या पता था, कि लोगों की भीड़ हो जाएगी…।’

‘खान तो फिर यहाँ की जबान बोलता होगा।’

‘शायद।’

‘क्यों तुमने नहीं सुना?’

खालिद कई बार मेरी बातों से चिढ़ जाता था। मैं हर बात को, हर कहानी को… विस्तार से जानना चाहता। वह काम जिसके लिए मैं यहाँ आया था। अपनी पत्रिका के लिए बेहतर कहानी और कवरेज ढूँढ़ने। खालिद को कैंप की बजाय दर्रे के पार उसके पहाड़ों की बात बताना ज्यादा पसंद था। वह अकसर पहाड़ों जिन्हें वह अपना मुल्क कहता था, की बातें बड़ी तल्लीनता से बताता। उसने मुझे खोवर (पाकिस्तान की पहाड़ों की भाषा) के बारे में बताया। वह शेंडूर पास में चितराल और गिलगित के बीच हर साल खेले जानेवाले पोलो मैच के बारे में मुझे बताता, खैबर लाइनवाली रेलों के बारे में, किसी अता-मोहम्मद-खान नाम के कबीला सरदार के प्रिंस मलिक के किले की तर्ज पर बने विशाल संगमरमर के महल के बारे में जहाँ वह पहले काम करता था, पेशावर सूबे से लगे सूखे पहाड़ी इलाकों के लोग… जहाँ मेहमाननवाजी और बदला लेनेवाले खून खच्चर की ढेरों कहानियाँ हैं…, पाकिस्तान के पहाड़ों पर रहनेवाले कलश नाम के आदिवासी जो खुद को सिकंदर की संतान मानते हैं… और भी बहुत कुछ। पर खान में उसे दिलचस्पी नहीं थी। उसके बारे में बात करना उसे बोर करता था। शायद उसको पता था, कि उस बात में मेरा कोई स्वार्थ है। पर फिर मेरी खालिद से जुगत हो गई। जितनी ज्यादा बातें वह बताएगा उतने ज्यादा पैसे मैं उसे दूँगा। वह बताते हुए बोर हो जाता, पर पैसे के लालच से बताना बंद नहीं करता। उन दिनों छोटे-हैंडी टेप नहीं होते थे, सो मैं उसकी हर बात को शार्ट हैंड नोट करता जाता और रात-बेरात अपनी डायरी में लिख लेता।

‘खान कुछ कहे, तब ना सुनें। पर जानता जरूर होगा। बस्ती में जो तीन-चार साल से रह रहा है, उर्दू जुबान तो बोल लेता है। फिर यह तो दस साल से है। कुछ लोग तो माशा अल्ला पख्तूनी भी जानते हैं।’

‘कुछ तो बोलता ही होगा। कोई ऐसे कैसे रह सकता है।’

‘बात तो सौ फीसदी ठीक है। पर मैंने नहीं सुना। सिपाहियों ने सुना होगा।’

‘बहुत सुंदर दिखता है। है, ना।’

‘खुदा की रहमत है। पर किस्मत…।’

खालिद ने नाक सिकोडते हुए कहा।

‘इसके घरवाले।’

‘कहते हैं, सब खत्म हो गए। शायद पैंसठ की लड़ाई में। पूरा नहीं मालूम, बस इतना ही पता है। यह अकेला था। तीन साल का, बस्ती के एक जवान के साथ आया था। इधर चितराल के रास्ते।’

‘बस्ती का नाम पता है।’

‘बताते हैं कांधार के पास ही थी। मुझे नहीं मालूम।’

‘किसी बड़े घर का रहा होगा ।’

‘शकल सूरत से तो ऐसा ही लगता है ।’

उस उजाड कैंप में बड़े घर की बात करना काफी बेतुका था। मैं जब यहाँ नया-नया आया था, तब उस ट्रांसलेटर को जो पुलिस के पास एंट्री करवाता था, अपने साथ लिए कैंप में भटकता था। यहाँ के बाशिंदे जो चीख-पुकार, गाली-गलौच, रोने-पीटने के अलावा ज्यादातर चुप रहते हैं, उनसे बात करता था। उनसे उस घर की बात पूछता जो अफगानिस्तान में था। मुझे लगता कि इस तरह सबसे मार्मिक कहानी निकल सकती है। घर और परिवार काफी भावनात्मक मामला होता है। पर मुझे ज्यादातर निराशा ही मिलती। बुजुर्ग अवश्य घर की बात में दिलचस्पी लेते, पर ज्यादातर जवान आदमी, औरत इस विषय पर ज्यादा बात नहीं करते। उन्हें घर की बात करने की उत्सुकता नहीं होती थी। वे बस इसी फिराक में रहते कि, मैं उनके लिए क्या लाया हूँ? विशेषकर खाने की कोई चीज। कुछ औरतें सजने-धजने की चीज माँगती। मैंने शायद ही इनमें से किसी औरत का चेहरा देखा हो, पर सुना जरूर था कि अफगानी औरतों को सजने का बड़ा शौक होता है। हमेशा नीले कपड़े से अपना पूरा शरीर ढका होने के बाद भी, वे खूब सजती हैं। उन्हें कोई देख नहीं पाता है और यूँ वे खुद के लिए सजती हैं। उन्होंने खुद के लिए सजने की खुशी को बहुत सँभाल कर अपनी बेटियों को दिया है। मैं उनके लिए काँच की चूड़ी, काजल की डिब्बी, कोई सस्ती सी क्रीम या ऐसा ही कुछ ले जाता। बच्चों के लिए बिस्कुट जो मुझे सिपाहियों से मिल जाते थे, ले जाता था। पर कुछ भी काम नहीं आता। अफगानिस्तान का पुराना घर उन्हें उत्सुक नहीं करता था।

मुझे ऐसा भी लगा कि वे सब उन यादों से छुटकारा पाने की फिराक में रहते थे। आगे क्या होगा, यह उनकी बातों का मुख्य विषय होता। पर ऐसे कुछ इक्का-दुक्का बूढ़े, जो मार-पीट और लूट-खसोट के बाद भी जिंदा बचे थे, पुरानी बातें बड़ी लगन से बताते थे। उनकी भाषा समझ नहीं आती थी, पर वे कहना जानते थे। उनके कहने को भाषा नहीं लगती थी। वह ट्रांसलेटर कभी मेरे साथ होता, तो कमी नहीं… पर मैं उनसे उनके घर की उनके परिवार की बात कर पाता। उनको सुन पाता। उन बूढ़ी आँखों में छलक आनेवाला पानी मुझे मेरे अपने देश के बूढ़ों की याद दिलाता था। उनकी चुप्पी घर की बात पर, बाँध की तरह टूटती थी और मैं शार्ट हैंड में उसे समेट नहीं पाता था। कुछ था जो छूट जाता था। कुछ था जिसे लिखते नहीं बनता था। कुछ ऐसा जिसे हम कभी भी लिख नहीं पाए। उनमें से कुछ बड़े घरों से थे और कुछ छोटे घरों से पर घर के बड़े होने या छोटे होने की बात उनकी बात में नहीं होती थी। इस बात को पता करना पड़ता था। वे अपने घरों को बड़े घर या छोटे घर के रूप में नहीं जानते थे। इस तरह जानना वे भूल चुके थे।

खान की बातों ने मुझे उत्सुक किया था। उसका घर, उसकी कहानी…।

‘मैंने इतना सुंदर लड़का पहले कभी नहीं देखा।’

खालिद हँसने लगा।

‘सिपाही इसके साथ मजे करने के चक्कर में रहते हैं।’

‘क्या मतलब।’

‘इसे पकड़ लेते हैं और…।’

उसने आँख मारते हुए कहा। मुझे मतली सी आई… एक अजीब सी ऐंठन जैसे गीली रस्सी आग में जलते समय गुड़मुड़ी होती जाती है… एक नोचने वाला हिच… कि अब क्या?

‘यहाँ यह सब बहुत होता है। पर्दानशीं औरतों को छू नहीं सकते, वरना गदर हो जाए। सो लड़कों की पकड़-धकड़ हो जाती है। फिर खूबसूरती सबकी कमजोरी है।’

‘पर वह तो अकसर यहाँ आता है।’

‘गोश्त और रोटी की नीयत। भूखे को क्या चाहिए? बस कुत्ते की तरह सूँघता-साँघता चला आता है।’

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‘उसके बारे में और कोई बता सकता है।’

मुझे रिपोर्टिंग के लिए कहानी मिलने लगी थी।

‘वो ही लोग जो उसे यहाँ लाए थे।’

‘तुम जानते हो।’

‘पुलिस के रिकार्ड में होगा। एक-दो तो बूढ़े लोग थे, शायद मर खप गए हों, पर मालुमात हो सकता है।’

अगले दिन बड़ी मन्नतों के बाद बड़े दरोगा ने मुझे पुराने रिकार्ड दिखाए। इतनी पुरानी जानकारी पाने के लिए उसकी काफी लल्लो-चप्पो करनी पड़ी। घूस भी देनी पड़ी। उसने मेरे सामने मोटे रजिस्टरों का बंडल सा रख दिया। एक दूसरा सिपाही ढूँढ़ने लगा। पूरे रजिस्टर में हर पन्ना किसी एक शरणार्थी की जानकारी से भरा था। कुछ के नाम थे, तो कुछ के नाम की जगह नंबर लिखे थे। सारी जानकारी उर्दू में। बहुत मशक्कत के बाद वह पन्ना मिला। उसमें एक तीन साल के लड़के का हुलिया उर्दू में दर्ज था। नाम 3364, नीली-हरी आँखें, गोरा रंग… निशान बाएँ हाथ की छोटी उँगली आधी कटी हुई। खान की भी बाएँ हाथ की छोटी उँगली कटी हुई है…।

‘हाँ बस यही।’

सिपाही उन लोगों के नाम बताने लगा जो इस तीन साल के लड़के को यहाँ लाए थे। मैंने उनके नाम और सारे मालुमात नोट कर लिए। खालिद सही कहता था, खान का घर कंधार के पास का एक छोटा सा कस्बा जाबेह था। उसके साथ आए लेागों को ढूँढ़ने में मुझे खासी मशक्कत करनी पड़ी। इतने बड़े कैंप में जहाँ सब कुछ बेतरतीब और लाखों लोगों की भीड़ से अटा पड़ा था, यह एक दुश्कर काम था। मैं सबसे पुरानीवाली खेप को जहाँ बसाया गया था, उस हिस्से में तीन दिनों तक ढूँढ़ता रहा और अंत में मुझे वह आदमी मिला उसका नाम हबीबुल था, उम्र लगभग पचपन साल। उसने एक साँस में जो कुछ पता था, बताया –

‘उसका बाप शफीक उल्लाह ऊन का धंधा करता था। पूरे कंधार में मशहूर था। क्या देसी, क्या विलायती, सब तरह की ऊन, पश्मीना, खुर्दब से ले कर विदेशों की बारीक सिल्की ऊन तक सब कुछ। वल्लाह बड़ा अमीर सौदागर था। मैं उसका मुख्तयार था, सारे कोर्ट कचहरी के मामलों से ले कर सौदागरी के हिसाब तक सब कुछ मेरे हवाले। हम सब खुश थे। जाबेह एक खुशमिजाज बस्ती थी। जाबेह की शबे बारात की बड़ी तारीफ थी। पर सब मिट्टी में मिल गया। लोग बताते हैं, अब सिर्फ पुराने घरों की कुछ दीवारें रह गई हैं, जहाँ मुजाहेदीन जंग करते हैं। हमारी औलादें खाक हो गईं। हमारा घर जल गया। मैं ही इसे यहाँ लाया था। पर लगता है, गलत किया। वहीं मरने छोड़ देता तो उसे यह हिकारत भरा दिन तो ना दिखता। उसका कोई नहीं। मैं उसको मरने के लिए नहीं छोड़ पाया। खान तीन साल का था, और मुझे पहचानता था। जब भी हम शफीक उल्लाह की बारादरी में बैठते वह मेरे पास आ कर बैठ जाता…। मैं उसे मरने के लिए नहीं छोड़ पाया।’

हबीबुल दूसरे शरणार्थियों से अलग नहीं था। वही फटेहाल, खाने के लिए मारामारी, वही धूल और गंदगी, वही गंदी सी बदबू… पर वह बोलता था, कुछ ज्यादा ही। उसके चेहरे पर एक अदेखी और अनहोनी सी हताशा हमेशा दीख पड़ती थी।

‘खान खामोश रहता है। इधर तीन साल के बच्चे को बचे रहने काफी गुर सीखने होते हैं। शुरू-शुरू में जब वो पाँच एक साल का था, लोगों से खूब मार खाता था। कई बार इतनी मार कि उसका दम निकलने को होता और उसे कोई बेहोश हालत में कैंप से बाहर पटक आता। पर वह नहीं मरा। वह जान गया एकदम से झपटने और माँगने से कुछ नहीं मिलता। पहले जुगत बैठानी पड़ती है। मतलब सामनेवाले का मूड कैसा है, पहले जान लो फिर उसी के मुताबिक चलो। अगर कमजोर है, बूढ़ा है और चेहरे से बीमार दिखता है, तो छीन सकते हो और अगर जवान है, दुरूस्त है तो देखो कि मूड कैसा है। मूड के माफिक उससे माँगो…। इधर कुछ लोग सुअर की तरह खाना खाते हैं। बस नाक घुसाए घिघियाते रहेंगे। ऐसे लोगों से दूर रहो। अगर खान यह ना सीखता तो एक रोज सही में किसी लुटेरे के हाथ हलाक हो जाता, और सिपाही उसे मिट्टी में दफना आते। पर जो आइडिया जान जाए, वो थोड़े मरेगा। एक तरह से मैंने ही उसे यह सब सिखाने की शुरुआत की। लूटना, छीनना और रिरयाना, पहले घूर लो… फिर आगे चलो। ट्रेनिंग माशा अल्लाह दुरुस्त रही…।’

वह मुस्कराया। पचपन साल की उम्र में वह फिर से मुस्कराना सीख रहा है।

‘वह बात करता है। हकलाता है और डरता भी है, पर बात कर लेता है। यहाँ किसी से क्या बात करो। सब मारामारी है। लोग बोलना भूल गए लगता है। खान अच्छा बोलता है। पर उसका डर, उसकी घिघ्घी, उसकी बेशरमी, उसका ढीठपना, सब कुछ अगर तुम थोड़ा कम कर पाए, तो वह बोलेगा।’

हबीबुल सही था। खान बात करता था। अभी कुछ ही दिनों पहले वह कादिर से बतिया रहा था।

खान को कादिर अच्छा लगता है। एक रहनुमा की तरह। उसकी जुबान, जमीन और तहजीबवाला आदमी। वह उसे उस दिन से और अच्छा लगने लगा जब उसने उसे उसके गाँव जाबेह की और उसके अब्बू की कुछ बातें बताईं।

‘वह तालिबान का खैरख्वाह था। पक्का मुसलमान।’

‘अब्बू को तुम जानते थे।’

‘क्या बंदा था, वह…।’

‘अब्बू से तुम्हारी दोस्ती थी।’

‘वह खुदगर्ज नहीं था। जब रूसी काफिर हमारे मुल्क के, हमारे अफगानिस्तान के दूसरे शहरों में बम बरसा रहे थे, उसने तब से तालिबान का साथ दिया। कभी रकम तो कभी असद। उसने नहीं सोचा कि उसका शहर तो महफूज है, फिर क्या लेना-देना दूसरे शहरों से…।’

‘तुमने अब्बू को देखा था?’

‘खूब… कई बार। वह कई बार हमारे खेमे पर हमसे मिलने आता था।’

‘मुझे बस अब्बू थोड़ा-सा याद है।’

खान ने अपनी उँगलियों के बीच जरा सी जगह बना कर कहा –

‘बस इतना… बस इतना ही।’

कादिर मुस्करा दिया। उँगलियों के बीच की वह जगह थोड़ी देर तक बनी रही… खान थोड़ी देर तक उस जगह को देखता रहा। कादिर ने अचानक मुस्कराना बंद कर दिया।

‘कादिर भाई, तुम अच्छे हो।’

‘क्यों?’

‘तुम मुझे गाली जो नहीं देते हो… पागल जो नहीं कहते हो।’

‘क्यों और कहते हैं, क्या?’

‘हाँ। कहते हैं मेरे अब्बू के कारण ही जाबेह तबाह हुआ। मेरे अब्बू के कारण ही रूसी काफिरों ने बम गिराया था। मेरा अब्बू जाबेह के लिए नासूर था…।’

‘अपने मुल्क की खातिर, अपने घर, अपने लोगों के खातिर यह फर्ज होता है। उसने निभाया…।’

‘कादिर मुझे डर लगता है।’

‘क्यों ?’

‘अगर रूसियों को यह पता चल गया कि अब्बू का एक लड़का जिंदा है, तो वे मुझे मार डालेंगे। है ना…।’

‘अरे नहीं वो यहाँ नहीं आ सकते।’

‘क्यों ?’

‘यह दूसरा मुल्क है।’

‘पर इसमें पूरे जाबेह का क्या?’

‘जाबेह ही क्या? पूरे अफगानिस्तान का क्या? हमने इनका क्या बिगाड़ा था, जो ये हमारे लोगों को मारने को पिल गए…। बताओ…।’

खान को लगा जैसे पुराने दिन लौट आएँगे, कादिर लौटा लाएगा उन सारे दिनों को। उसे लगा कि वह कादिर को बता सकता है, कि वह क्यों पागलों की तरह और डरा हुआ रहता है… अकसर जब उसे अब्बू, माँ और बहनों के अधजले बदबू मारते और कचरे की तरह गड्ढे में फेंके जाते शरीर याद आते हैं, जिसका मतलब वह बहुत दिनों बाद जान पाया था… तब उसे कुछ हो जाता है। अकसर जब सिपाही उसका चेहरा पकड़ कर उसे आकाश दिखाते हैं तो वह पागल-सा हो जाता है। डॉक्टर अब्राहम ने उसे कुछ कहा था… अंग्रेजी बीमारी…। पर वह कादिर से कह नहीं पाया। उसे लगा वह फिर से पागलों जैसा करने लगेगा…। वह हडबड़ा कर कादिर से लिपट गया। शायद उसके लबादे से आज भी अब्बू की खुशबू आती हो…।

‘हर कोई दुश्मन हो गया है। हमारे ये लोग भी।’

कादिर ने कैंप की ओर इशारा करके कहा।

‘हमारे अपने ही लोगों को हमारा दुश्मन बना डाला।’

‘कादिर मुझे डर लगता है।’

उसने कादिर से लिपटे हुए कहा। कादिर ने अपनी पोटली खोली। उसमें बहुत से हथियार रखे थे। उसने एक डेरा में बनी क्लैश्नैकौफ निकाली और खान को थमा दी… अब मत डरना… यह कहते हुए कादिर के चेहरे से पत्थर निकल आया।

‘सब दुश्मन हैं… सब।’

‘सिपाही भी दुश्मन हैं।’

‘ना खान। सिपाही तो दोस्त हैं।’

खान चुप हो गया।

‘क्यों तुझे किसी ने मारा। बता कौन है… आज ही स्साले को ठीक करता हूँ।’

‘ना। ऐसी बात नहीं है।’

खान चुप्पी लगा गया। उसे अपनी जाँघों के बीच कुछ घुसता हुआ महसूस हुआ। गोश्त और रोटी का लालच उसे चुप करा देता है।

यू.एन.ओ. (संयुक्त राष्ट्र संघ) की सफेद गाड़ियाँ जो किसी बड़ी जीप की तरह होती हैं, अपने पूरे हुजूम के साथ यहाँ चक्कर लगाती हैं। सिपाहियों के टेंटों में से तीन टेंट यू.एन.ओ.वालों के हैं। दो टेंटों में तरह-तरह का सामान, दवाएँ, चद्दरें, डिब्बाबंद खाना, कपड़े, टार्च आदि बेतरतीब तरीके से पड़े हैं। एक टेंट में डॉक्टर एब्राहिम रहते हैं। डॉक्टर एब्राहिम मूलतः बेल्जियम के हैं। अंग्रेजी जानते हैं। हफ्ते में एक दो दिन कैंप में चक्कर लगा आते हैं। आगे-आगे डॉक्टर एब्राहिम और पीछे-पीछे दवाओं का बैग पकड़े एक सिपाही। बहुत कम लोग एब्राहिम तक आ पाते हैं, सो वे ही यहाँ आ जाते हैं। टेंट में अकसर वे खाली रहते हैं… ज्यादातर कोई नावेल पढ़ते हुए।

‘इट्स टू हाट टुडे…।’ उस दिन सुबह ही मिल गए। रोड पर चहलकदमी करते हुए।

‘इट्स काल्ड लू… ए हाट विंड… आलमोस्ट बर्निंग।’ डॉक्टर अब्राहिम से मेरी मुलाकात हाल ही हुई। वे यहाँ दो सालों से हैं।

‘लू।’

‘इट्स ए सीजनल विंड हॉट एंड ड्राय।’

‘हाउ लांग इट बी हियर।’

‘एबाउट टू मंथ्स मोर।’

‘व्हाट ए हेल… आई हैव अप्लाइड फार ए लीव। ए लांग वन…।’ मैंने अपनी उत्सुकता एब्राहिम के साथ बाँटनी चाही। मुझे खान की कहानी जो पूरी करनी थी।

‘हैव यू सीन खान?’

‘दैट व्हाइट टाल गाय।’

‘या… द सेम।’

‘ही इज माई पेशेंट।’

‘पेशेंट…।’

‘यस… एक्चुअली ही इज सिडिरोफोबिक एंड आलसो हैलियोफोबिक…।

‘व्हाट…।’

‘इट्स ए मैंटल डिसआर्डर। ए काइंड आफ ल्यूनैटिक पर्सनैलिटी…।’

ल्यूनैटिक…।’

मुझे अजीब लगा। मैंने कभी खान को इस तरह नहीं देखा था, कि वह पागल है। खान पागल है… एब्राहिम ने सहजता से कहा और मेरे अचरज को भाँप गया।

‘इट कैन बी सैड…

उसने बात को थोड़ा सा आल्टर कर दिया… इट कैन बी…।

…एक्चुअली सिडेरोफोबिक इज वन हू फियर द नाइट स्काई… एंड स्टार्स। फोबिया मीन्स फियर एंड सिडेरोस इट्स ए ग्रीक ओरिजिन सिनानिम आफ स्टार्स…।’

‘अमेजिंग… आई नेवर हर्ड दिस।’

डॉक्टर एब्राहिम मुस्करा दिए। मैंने कभी नहीं सोचा था, कि इनसान आकाश से डर सकता है और साइकाइट्रिक्स में यह एक बीमारी है। रात के तारों भरे आकाश से डरना याने सिडेरोफोबिया। डॉक्टर इब्राहम ने यह भी बताया कि खान को हैलियोफोबिया भी है। इस बीमारी का मरीज दिन के आकाश और सूरज से डरता है। खान को दोनों बीमारियाँ हैं। यहाँ खान बहुत से लोगों के लिए नई और अजीबोगरीब बीमारी को जानने का तरीका है। मुझे बेदर्दी से आकाश की ओर खान का चेहरा घुमाते हुए सिपाही और उसके गुलाबी चेहरे पर उतरने वाला काँपता काला डर याद आया…। मैंने सोचा मैं उन्हें रोकूँगा। ‘आइ हैव गिवेन हिम सम एलमेंट्स ड्रग्स… बट नो यूज। फ्राम टू इयर्स आइ एम हियर बट अनेबल टू गेट देअर फेथ इन द टास्क आइ एम डुइंग…

एब्राहिम के चेहरे पर एक थकान उतर आई और वह उस फटेहाल कैंप की तरफ देखने लगा… एक उम्मीद जो अब गुस्से में बदल रही है।

…व्हाट द हैल आइ एम डुइंग हियर… दीज पीपुल नेवर अंडरस्टैंद मी नेवर… या नेवर।’

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थोड़ी देर बाद हम दोनों अपने-अपने रास्ते चल दिए। लौटते समय मैंने देखा कुछ फटीचर से धूल भरे बदबू मारते बच्चे खेल रहे थे। एक अजीब सा खेल। एक पुतला जिस पर रूसी और अफगानी में कुछ लिखा था और लाल गेरु से उस पर खून के निशान बनाए गए थे। वे उस पुतले को लकड़ी और पत्थरों से मार रहे थे।

‘मारो… काफिर रूसी काफिर… मारो-मारो… रूसी मारो…।’

दूर खड़ा एक बुजुर्ग उन्हें देख कर मुस्करा रहा था। क्या दिन बदलेंगे… क्या अपने लोग फिर से मिलेंगे… क्या… उस बूढ़े को उस खेल को देखना संजीदगी के साथ सुहा रहा था।

उस दिन मैं खालिद की दुकान पर चाय पी रहा था। तभी खान वहाँ आ गया। वह मुझे घूरने लगा। मैंने उसे एक कप चाय दी वह डरता सा चाय पीता रहा। उसके गुलाबी होंठो से लगा काँच का गिलास काँप रहा था। काँच के गिलास पर नीला आकाश थरथरा रहा था। मुझे डॉक्टर एब्राहिम की बात याद आई… खान बीमार है… हैलियोफोबिया, एक बीमारी जिसका मरीज आकाश से, सूरज से डरता है।

मैंने उसे चबूतरे पर बैठने को कहा। गिलास पर से नीला आकाश हट गया। मैंने उससे पूछा, उसे और चाहिए। उसने हाँ में सर हिलाया… और इस तरह चार कप चाय पी गया।

‘तुम्हारा नाम खान है।’

उसने गर्दन हिलाई, याने – हाँ।

‘पता है जब तुम चाय पी रहे थे तो गिलास के काँच पर आकाश काँप रहा था ….।’

वह होटल की दीमक खाए लकड़ी के फट्टे पर धो कर रखे काँच के गिलासों को देखने लगा। फिर अपना चेहरा घुमा कर सिपाहियों के टेंटों की ओर देखने लगा। दूर तक धूल और रेत पर बहती गर्म हवा पानी की तरह दिख रही थी और टेंट के तंबू उसमें लहरा रहे थे। टेंट के पार बैरन, उदास, कठोर और पथरीला टीला था। वह उसी तरफ टकटकी लगाए था।

‘आकाश बहुत जरूरी है। आकाश ना हो तो बरसात ना हो, सूरज ना हो, चाँद ना हो, दिन और रात ना हो ….बताओ पंछी फिर कहाँ उड़ेंगे। हवा कैसे बह पाएगी बताओ… बताओ। पता है अगर आकाश नहीं होता तो हम सब भी नहीं होते। कहते हैं आकाश ना होने से सारे आदमी मर जाते। आकाश बहुत जरूरी है।’

वह मेरी बात अपनी आँखों से सुनने लगा। मानो मैं कोई उसे गहरा राज बता रहा हूँ। कोई कहानी जिसे सुनने की जिद उसने अपनी माँ से की हो और ना सुन पाया हो और हक्का-बक्का रह गया हो, जब पता चले कि यह कहानी एक अजनबी जानता है। कहानी जो अजनबी जानता है, कहानी जो उसकी माँ सुना नहीं पाई थी, छुटपन की कहानी… पता नहीं यह किसकी कहानी है… अजनबी की या माँ की…। उसकी आँखें अब कह रही थीं, उन्होंने सुनना बंद कर दिया।

‘तुम आकाश की ओर क्यों नहीं देखना चाहते।’

वह मुझे घूरने लगा। तभी दो वर्दीधारी सिपाही वहाँ आ गए और चाय पीने लगे। उन्हें देख कर खान खड़ा हो गया। लगा वह वहाँ से भाग जाना चाहता है।

‘मियाँ, इसे क्या गुर सिखा रहे हो।’

एक सिपाही ने मुझे चोर आँख से देखते हुए कहा।

‘जानना चाहता हूँ, आकाश की ओर क्यों नहीं देखता है यह। क्यों आकाश से डरता है। आकाश कोई डरने की चीज नहीं।’

दोनों सिपाही खिलखिला कर हँस दिए। उनमें से एक ने मुझसे धीरे से कहा –

‘साला बुरी तरह डरता है ।

‘आकाश से।’

‘हाँ। पागल है… पागल ।’

वह तेजी से खान के पास गया और उसका चेहरा अपने हाथ में पकड़ लिया। खान काँपने लगा। उसने खान का चेहरा आकाश की ओर घुमा दिया। खान की आँखें बंद हो गईं।

‘अबे देख। देख।’

‘न… न… नहीं। छोड़ो…।’

मैंने पहली बार खान की आवाज सुनी। सिपाही हैवान की तरह हँस रहा था।

‘अबे आँख खोल…।’

‘जाने दो दरोगा जी।’

‘अबे खोल।’

‘आज नहीं बोल रहा कादिर… कादिर।’

‘अबे देख ले। देख ले इस आकाश को। कब तक आकाश से डरेगा। यह पाकिस्तान का आकाश है, अफगानिस्तान का नहीं कि दनदना के रूसी जहाज घुसे आएँ और बस्तियों को जला कर तबाह कर दें… इस आकाश में कोई रूसी जहाज नहीं आ सकता। रूस ऐसी हिम्मत नहीं कर सकता। यह तेरे कांधार का आकाश नहीं है, जिसका कोई खैरख्वाह नहीं। हाँ तेरे मुल्क के आकाश का कोई खैरख्वाह नहीं… कभी रूस, तो कभी अमेरिका, तो कभी यू.एन.ओ., तो कभी पाकिस्तान और अब तालिबान भी फिराक में है। कोई भी चढ़ाई कर सकता है जैसे कोई भी सिपाही तुझ पर चढ़ सकता है। तेरे मुल्क का आकाश भी तेरी तरह ही है… जिसे पकड़ कर जिस पर कोई भी… कर सकता है। तेरे मुल्क का आकाश राँड़ है… राँड़। तेरी तरह…। पर यह… पाकिस्तान का आकाश देख इसे… इससे पाक कुछ नहीं… बारिश के पानी की तरह पाकीजा…। इसे देख ले…। देख ले हरामी…।’

मैं उठ कर खड़ा हो गया। मैंने उस सिपाही का हाथ पकड़ लिया। उससे गुजारिश की। उसने खान को झकझोर दिया। खान ने पल भर को अपनी आँखें खोली। वह नीला आकाश बस झपकी भर, एक मिचमिची भर उसकी नीली आँखों में काँप गया…। खान के चेहरे पर डर और पागलपन एक साथ उतर आया। उसने गिरते पड़ते अपने को सिपाही के हाथ से छुड़ाया और पथरीले टीलों की और भाग खड़ा हुआ। वह बुरी तरह से चीख रहा था।

‘…अबकी बार आकाश में बड़े-बड़े जहाज आएँगे और खूब आग गिरेगी। सब खत्म हो जाएगा…। सब मर जाएँगे। सारे जहाज जो आकाश में रहते हैं और घरों को लोगों को जला देते हैं…

वह भागता हुआ मुड़ मुड़ कर सिपाही और मेरी तरफ देख रहा था।

…सब खत्म। हाँ सब कुछ खत्म…

उसकी आँखों से बेतरह पानी बह रहा था। वह अपनी बाँहों से अपनी बहती नाक और आँखें पोंछ रहा था। उसका चीखना दूर तक सुनाई दे रहा था।

…तुम झूठ बोलते हो। सब आकाश एक है। इधर का भी और कंधार का भी… सब आकाश एक हैं। हाँ सब। देखना वो जहाज इधर भी आएगा इधर के आकाश में भी आएगा… बहुत सारे जहाज… जो आकाश में रहते हैं। वो आकाश के रास्ते आएँगे। देखना… तुम देखना….। मुझे आकाश से निकलनेवाली आग से डर लगता है… वह सबको जला देगी, सब लोगों को… तुम्हारे अपने घर के लोगों को भी…

वह मेरी ओर इशारा कर चिल्लाने लगा।

तुम भी झूठे हो…

वह किसी जल्लाद की तरह मेरी ओर देखने लगा ।

…ये सब रोटी और गोश्त देते हैं और तुम चाय पिलाते हो… कहते हो मैं बहुत सुंदर हूँ…

वह मुझे गालियाँ देने लगा।

…आकाश ना होता तो हवा ना होती, आदमी ना होता, पंछी ना होते, सूरज चाँद ना होते… आकाश जरूरी है। मेरे को चूतिया समझा है क्या…

वह फिर से मुझे गाली देने लगा। मैं हकबकाया सा उसे गिरता पड़ता, चीखता, रोता दूर तक जाता देखता रहा। खालिद और वे दोनों सिपाही बुरी तरह से हँस रहे थे।

‘पागल। अबे पागल। आज रात आना… तेरे को गोश्त-रोटी भी दूँगा और…’

उस रात मैंने अपनी डायरी में खान की कहानी का अंतिम भाग लिखा।

एक लड़का जिसके लिए आकाश का मललब है, बम गिराते जहाजों का खतरनाक अड्डा, कंधार के पास की एक खुशमिजाज बस्ती को जला कर राख करती दिन की तरह चमकीली लाल-पीली लपटें… आकाश का मतलब है बिखर कर कचरा बनते घर रोते-चीखते लोग… जिसके लिए आकाश वह है जिसकी वजह से उसके माँ, अब्बू और बहनों के अधजले, लटकते, बिखरते, खून से लथपथ और कचरे की तरह फेंके जाते शरीर उसने देखे…। आकाश खून और बरबादी की उबसे बड़ी वजह है। खान के घर को आकाश ने ही खाक किया था, आकाश ने ही उसे पागल बना दिया है… आकाश से खान को बहुत डर लगता है।

मैंने मान लिया खान पागल नहीं है। डॉक्टर एब्राहिम का डायग्नोसिस, इलाज और साइकियाट्रिक्स के स्थापित नियम सब गलत हैं। खान हैलियोफोबिक नहीं है। उस दिन मैंने फिर से मान लिया कि वह पागल नहीं है…।

कुछ दिनों बाद मैं वहाँ से लौटने की तैयारी कर रहा था। मुझे अगले दिन वापस दिल्ली जाना था। उस दिन शाम के खाने के ट्रक पर जबरदस्त हंगामा मचा था। आदमी, औरतों और इक्का दुक्का बूढ़ों का एक दूसरे को निर्ममता से कुचलता, चीखता और एक दूसरे पर चढ़ता हुजूम… लाखों लोगों का पागल और खतरनाक हुजूम। पुलिसवालों के दो टेंट भी गिर गए। पुलिस जानवरों की तरह लोगों को डंडो से पीटती रही। मैं इस आवाज का अभ्यस्त था, पर उस दिन की चीख पुकार और बेरहमी से कुचले पिटनेवालों की आवाज भयंकर थी। पता चला दो दिन से खाने के ट्रकों की संख्या कम हो गई है। दो सौ पैंतीस ट्रकों से घट कर एक सौ पचहत्तर। यू.एन.ओ. के अधिकारियों ने पाकिस्तान पुलिस और लोकल अधिकारियों को जबरदस्त फटकार लगाई है।

काफी देर बाद सब कुछ शांत हो गया। रात घिर आई थी। सिपाहियों के टेंट और रोड के बीच जहाँ छह घंटे गदर और बेरहम लूटपाट मची थी, वहाँ से किसी के सिसकने की आवाज आ रही थी। कोई नीले बुरकेवाली अफगानी औरत थी, जो किसी आदमी के कुचल कर मरे शरीर के पास बैठी सुबक रही थी। मैंने अपना कैमरा उठाया उसमें फ्लैश अटैच किया और इस दृश्य की फोटो लेने चल पड़ा। ऐसे दृष्य मेरी आमदनी के सबसे अच्छे स्रोत हैं… पत्रिका का संपादक इसके लिए खासे पैसे देता है। बेरहम दृष्यों में मुझे नोटों की गड्डियाँ दीखती हैं।

सिपाही खाना खा कर सो चुके थे। किसी टेंट से पियक्कड सिपाहियों के हँसने और गालियाँ देने की आवाज आ रही थी। पास ही अँधेरे में कोई चपर-चपर कर कुछ खा रहा था। जब मैं उस अँधेरे के पास से गुजरा तो वह चपर-चपर बंद हो गई। उस तरफ अँधेरा था। एक छाया सी दिखती थी। गौर से देखने पर उस छाया की दो आँखें दीखती थीं… जिस पर चाँद का काँपता सा बिंब था। वे आँखें मुझे घूर रही थीं। मुझे खालिद की बात याद आई, खान इस तरफ रोज रात आता है। गोश्त और रोटी का लालच…। मैंने धीरे से पुकारा – खान।

वे आँखें यथावत रहीं। मुझे बचपन में हमारे घर में पले खूँखार लेब्रेडोर कुत्ते की याद आ गई। जब वह खाने के बरतन में मुँह घुसा कर चपर-चपर खाता था, तब उसके पास जा कर खड़ा होना काफी खौफनाक था। वह खाना छोड़ कर अपनी आँखों को चौड़ा कर घूरता…। उसके ऊपरी जबड़े से दो नुकीले दाँत बाहर निकल आते, उसके दोनों खड़े कानों के बीच की खाल पर गहरी सर्पाकार नालियाँ सी बन जातीं और उसके गुर्राने की हल्की पर खैफनाक आवाज आती… मुझे खान की आँखें देख कर डर लगने लगा। वे अब पागल की, हैलियोफोबिक की आँखें नहीं थीं… उन्हें मैंने अब तक कुछ और नहीं जाना था। लगा जैसे कुत्ते की तरह लपक कर वह मेरी गर्दन में अपने नुकीले दाँत घुसा देगा…। मैं डर के मारे उल्टे पाँव खालिद के होटल वापिस आ गया।

उस रात मुझे नींद आने तक उस औरत के सुबकने की आवाज सुनाई देती रही।

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