चाँद चाहता था, कि धरती रुक जाये

गाँव में अँधेरा था। बस्तर के नक्शे पर आज भी उस गाँव का नाम नहीं दीखता। वहाँ अँधेरा है।

गाँव जंगल में था। जंगल गाँव में था। दोनों के अँधेरे एक-दूसरे में थे। दोनों अपने अँधेरों को बाँटते थे। वहाँ अँधेरों की कोई लड़ाई नहीं थी। वह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। वहाँ अँधेरे बाँटने का शऊर था।

हम रात का आकाश ताकते। आकाश रौशनी लाता। चाँद के साथ बढ़ती और घटती रौशनी। पिता कहानी सुनाते कि बहुत दूर एक लोक है। इसी धरती पर। वहाँ बिजली नाम की चीज है। दीवार पर एक छोटा सा खटका दबाओ और फिर चाँद भी फीका पड़ जाय। रात दिन हो जाय। पिता की बात हमें गप्प लगती। गाँव में मेरा कोई सहपाठी नहीं मानता कि ऐसा होता है कि आकाश के अलावा भी कहीं से रौशनी आती है। कैसी निरी गप्प।

ठण्ड में बाहर आग जलती। माँ थोड़ी देर के लिए ढिबरी जलाती। ढिबरी किसी बिंदु की तरह दिखती। घना अँधेरा उसे बिंदु बना देता। आग अँधेरे में घुलती जाती। रात को बाहर बैठा मैं आग का अँधेरा होना बहुत गौर से देखता।

जंगल में अँधेरा बहुत पहले से था।

जंगल के अँधेरे का कहीं कोई इतिहास नहीं। कहते हैं संसार में अँधेरे की शुरुआत बस्तर के जंगलों से हुई। अबूझमाड़ में एक अनाम जगह है, जहाँ जंगल के लोगों के अलावा कभी कोई जा नहीं पाया। बस वहीं से अँधेरा फूटा था। फिर वह फैलता गया। कहते हैं रात के काले आकाश से लेकर आज के वैज्ञानिक जिस ब्लैक होल की बात करते हैं वह वहीं से आया है। यकीन करें बस्तर के जंगल न होते तो यह दुनिया हमेशा के लिए अँधेरों से वंचित हो जाती।

किस्सा यूँ है, कि यहीं से जंगल के लोगों का पहला देवता आया। उसका नाम आंगा देव था। उसकी पीठ पर सारे संसार का अँधेरा रह आया है। एक बार मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि मैं उसे गौर से देखूँ। मुझे उससे दूर तक फैलती अँधेरे की लकीरें दिखाई दीं। बाद में वह मुझसे पूछता रहा, कि मैंने क्या देखा? मैंने वह अँधेरा उसे नहीं बताया।

कहते हैं आंगा देव हर छोटी से छोटी रौशनी को देख सकता है। सुई की नोंक से भी छोटी और एक तुच्छ तारे से भी कम शक्तिवाली रौशनी भी उसकी नजरों से नहीं चूकती। कहते हैं हर पाप के साथ एक रौशनी होती है। हर दुष्कर्म के साथ एक प्रकाश चलता रहता है। आंगा देव सब देख लेता है। जंगल के लोग अँधेरे को पूजते हैं। उसको शराब का तर्पण करते हैं। बलि चढ़ाते हैं। उन्हें नहीं पता कि वे संसार में एकमात्र ऐसे लोग हैं, जो अँधेरे को भगवान जानते हैं। जंगल का आदमी बताता है,कि जब दुनिया में कुछ भी नहीं था तब एक चीज थी। उसका नाम अँधेरा था। अँधेरा उससे भी गहरे अँधेरे से निकला था और यह जंगल के लोग ही जान पाये कि यही अँधेरा घनीभूत होता गया और आज की दुनिया बनी। कहते हैं आंगा देव न होता तो काला रंग न होता। पता नहीं कैसे तो वह जान गया था, कि भविष्य में उदास आँखों, पतले साँवले चेहरेवाला एक कवि होगा और उसे लिखनी होगी एक कविता ‘अँधेरे में’। उसे पता था, लाखों साल बाद संजय लीला भंसाली को बनानी होगी ‘ब्लैक’। उसे नहीं पता कि अगर वह ना होता, तो ना होती छाया, न शीतल छाया, न रात…। माड़िया जबान में अँधेरे के लिए असंख्य शब्द हैं।

आंगा देव कभी रौशनी ढूँढ़ने निकलता है। हर पाप के साथ लुकती-छिपती, दुनिया को भरमाती रौशनी। हर तरह की रौशनी, जिसने संसार को दुख दिये। वह अपने आप चलता। कुछ लोग उसे कंधे पर उठाते हैं और वह चल पड़ता है। किसी बहुत छोटी-सी रौशनी को वह अचानक ढूँढ़ लेता है। कोई रौशनी उससे छिपती नहीं। जब वह आता है रोड़ें सूनी हो जाती हैं। बस्तियाँ वीरान। असंख्य रौशनियों को छिपाये घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। आंगा देव अचानक किसी दरवाजे के सामने रुकता है। कोई दरवाजा खोलता है। भीतर से वह बाहर आता है। वह सारी दुनिया से माफी माँग लेता है। रौशनी की दुनिया बेनकाब होती जाती है।

जंगल से बहुत दूर दिल्ली के एक बहुत प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर छात्रों को ऐंथ्रोपोलॉजी का एक पाठ पढ़ा रहा था।

‘सो माई डियर फ्रेंड्स। वी विल कंटीन्यू द रिमेनिंग चैप्टर। यूथ डार्मेटरीज। इन बस्तर इट इज काल्ड घोटुल। इट्स ए बिग हॉल। एवरी यूथ इज द मेंबर ऑफ घोटुल। एन ओल्ड मैन लुक आफ्टर इट। ही गाइड्स एंड टीच्स दोज यूथ्स। इट्स ए काइंड ऑफ टीचिंग इंस्टीट्यूट टू एनहाँस एंड इन्हैरिट द बेसिक प्रिंसपिल्स एंड मोराल्स ऑफ देयर वर्ल्ड। बट दे आर मच डिफरेंट फ्राम द टीचिंग पैटर्न व्ही हैव। द प्रापर वे ऑफ वर्शिपिंग, द स्किल्स ऑफ ईटिंग, डुइंग पीजेंट्री, एंड ईवन जॉब्स लाइक मेकिंग हट्स एंड प्रिपेयरिंग फूड आर द मेन टारगेट्स। दे ईवन लर्न एबाउट बेसिक स्किल्स ऑफ सर्वाइवल इन एडवर्सरीज ऑफ डीप एंड डेंजरस-फारेस्ट। मैडिसन्स एंड एलमेंट्स ऑर अदर थिंग, व्हिच आर टॉट एंड प्रेक्टिस्ड…।’

एक लड़का तेजी से नोट्स बना रहा था। उसे अंदाज था, कि इस बार फाइनल इग्जाम में यह प्रश्न आ सकता है। उसे द यूथ डॉरमेटरीज इन बस्तर को याद करना ही था। बाद में उसने खूब रट्टे लगाये। यह पाठ उसे आसान लगने लगा।

जंगल हमेशा से खड़ा था। छाती फुलाये। उसके भीतर उसका अँधेरा था। अँधेरेवाला संसार का पहला देवता भी। अँधेरेवाले जंगल को किसी से डर नहीं लगता था।

वह बुजुर्ग आदमी बहुत गहरे जंगल में रहता था। वह एक बड़े घोटुल की देखभाल करता था।

घोटुल में दूर-दूर के जंगली लड़के-लड़कियाँ रहते थे। वे शाम को एक अजीब से देवता की पूजा करते। उसका नाम लिंगो था। फिर रात को घोटुल के सामने आग जलाई जाती। ऊँची विशाल आग। लड़के-लड़कियाँ छककर महुआ की रासी या लांदा पीते। नशे में सब कुछ खो देने की हद तक। देर रात तक आग के चारों ओर वे सब नाचते। लड़के अपने सिर पर जंगली भैंसे के सींग लगाते। चेहरे पर नदियों के किनारों से बटोरी गई कौड़ियों की माला डालते। कोई मादर बजाता, कोई भोंगा, कोई जमीन पर पैर से थाप देता, कोई तरह-तरह की आवाज करता, कोई ताली बजाता, बाकी जोर जोर से गाते। लड़का-लड़की एक-दूसरे के कमर में हाथ डालकर लंबी लाइन बनाते। आग के चारों ओर वह लाइन गोल-गोल घूमती। लड़का-लड़की के पाँव एक साथ उठते, एक साथ गिरते। पहले यह सब धीरे-धीरे होता, और फिर धीरे-धीरे तेज होता जाता। आग की रोशनी में सारा जंगल चमक उठता। एक-दूसरे के कमर में हाथ डाले अर्धनग्न… माफ करें अर्धनग्न फिर एक झूठा शब्द। झूठ के सिवाय कुछ भी तो नहीं। …तो अर्धनग्न। इस तरह मदमस्त नाचते जैसे कोई मशीन चल रही हो। जो बिना थके, बिना रुके बरसों तक ऐसे ही चलती रहेगी।

जंगल आँखें फाड़ पागलों की तरह नाचती उन देहों को घूरता। बेखून देखता। धरती सैकड़ों किलोमीटर तक काँप जाती। मादर पर पड़ती सख्त लकड़ी की चोट और जमीन पर एकसाथ पड़ते धूल के गुबार उठाते दसियों मजबूत पैर… धरती हर थाप पर बेतरह काँपती। धरती का भयानक कंपन जंगल के हजारों हज़ार पेड़ों को कँपकँपा देता। डालियाँ, पत्तियाँ कँपकँपातीं। पेड़ों पर सोते पंछी अचानक उड़ जाते। चाँद फटी-फटी आँखों से संसार के गहनतम अँधेरे का वह मादक और पागलपन की हद तक उत्तेजित कर देनेवाला दृश्य देखता। उसे लंबे उलझे पसीने से भींग कर कंधों और गरदनों पर टकराती और पसीने की बूँदें झटकारती बेखौफ और नशे में चूर बालों की लटें दीखतीं। चारों ओर फैलती, झटकती, अटकती, चूती बेतरतीब आवारा काली धूल भरी लटें। आग की लौ में चमचमा जाती काली मजबूत देहें, देहों की सटीक खूबसूरत लाइनें, गोलाइयाँ…। चाँद आज ढलकना नहीं चाहता। वह चाहता है कि धरती रुक जाये और वह वहीं टँगा टँगा इस मांसल मादकता का भोग करता रहे।

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ताल, आवाज और मादकता बढ़ती जाती। जाँघों तक धूल से सने मजबूत काले पैर जमीन को रौंद डालते। धूल के गुबार अँधेरों को चीरते चारों ओर फैलते, झाड़ियों पर, पेड़ों पर, आकाश पर। जिस्म के हर नंगे हिस्से पर धूल की परत पर परत चढ़ती जाती, पसीने में घुलकर बहती, जमीन पर चूती। एक ही गीतमय आवाज को बार बार बेतरह दुहराते सैंकड़ों कंठ। छाती हिला देनेवाली मादर की बेलौस थाप और थर्राती भोंगे की आवाज पर सुधबुध खो चुके जवान जिस्म मशीन होकर लगातार नाचते जाते, अंतहीन और उत्तेजक। चारों ओर पसीने, धुएँ और शराब की गंध फैलती। पसीने की गंध बहुत गहरे जंगल तक जाती। जंगली भैंसे और कुछ खूँखार जंगली जानवर उस गंध को सूँघते वहाँ खिंचे चले आते। पेड़ों के पीछे डर कर छिपकर वे इस कामोत्तेजक नृत्य को घूरते।

…मैंने एक बार उन्हें बेतरह देखा था और बाद में दुनिया घूमते हुए बहुत सी जगह उन्हें तलाशता रहा, रिओ-डी-जेनिरो के समुद्री किनारों से लेकर यूरोप के मादक स्ट्रिपटीज तक। ऐसी फड़फड़ाती देह कहीं और देखने को नहीं मिलीं फिर। मिट्टी और अँधेरे की देह। सूत दर सूत तराशी गई देह। जिसका जरा-सा भी माँस इधर से उधर होकर दैवीय रेखाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता।

बुजुर्ग के पास एक बाहरी आदमी बैठा है। सबसे उत्सुक बाहरी आदमी, जो जंगल आया है। जो जंगल की जबान समझता है। एक अजीब-सा वाकया हुआ, जिसे बुजुर्ग और वह बाहरी आदमी भर जानते हैं। उसके बाद से बुजुर्ग उस बाहरी आदमी से डरता है। बाहरी आदमी उनकी दुनिया की आवाज को बूझता है। बुजुर्ग उसकी बात नहीं समझ पाता।

‘अगर अभी नहीं सँभले तो एक दिन वे सब तुम्हें जंगल से खदेड़ देंगे। देखना तुम। जंगल की सीमा तक तो वे आ ही चुके हैं।’

‘सुना है बाहर के आदमी को जो चाहिए वह हमारे पास नहीं। वह क्यों खदेड़ेगा?’

‘दुनिया बहुत क्रूर है। तुम लोगों को नहीं मालूम। जंगल से बाहर निकलो तो कुछ पता भी चले।’

बाहरी आदमी पिछले बीस सालों से यही सब इन लोगों को समझा रहा है। पर लोग समझ नहीं पा रहे हैं। उसकी बात एक अजीब-सी बात पर पहुँच कर खत्म होती है।

‘हम सब एक साथ चलेंगे, लाल किले पर यह लाल झंडा फहराने, तुम लोगों का तब साथ होना बहुत जरूरी होगा।’

बुजुर्ग मन ही मन सोचता है, वह क्यों जाये? जाने कहाँ है, लाल किला और पता नहीं क्यों वहाँ पर यह लाल कपड़ा फहराना है। वह उस लाल कपडे और उसमें लिपटे उस हथियार को देखता है, जिसे वह बाहरी आदमी गन कहता है। जंगल के लोग उसे आगवाला धनुष कहते हैं। एक बार वह बुजुर्ग को साथ ले गया था, बहुत गहरे जंगल। उसके साथ बहुत अंदर का एक दूसरा जंगली आदमी भी था, जिसके लिए लाल किला और लाल कपड़ा बेहद बेतुकी चीज थी। वह उसे बुजुर्ग से भी ज्यादा बेतुका मानता था। उस दिन उस बाहरी आदमी को उस दूसरे जंगली आदमी पर इतना गुस्सा आया कि उसने उसे गोली मार दी। बुजुर्ग के सामने वह खून से लथपथ गिर पड़ा। बुजुर्ग वहाँ से भाग आया। तबसे बुजुर्ग उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगा है।

बुजुर्ग उसकी बात समझ नहीं पाता। जब वह उसे बताता है, कि एक देश है भारत, तुम्हारा जंगल भी उसी देश में आता है, उस देश में अमीर लोग गरीबों का शोषण करते हैं, कि तुम लोग भी गरीब हो, कि तुम्हारा भी शोषण होगा। वह गरीब शब्द को ठीक-ठीक नहीं समझ पाता। क्या जंगल से कभी खाने को कुछ ना मिल पाना गरीबी है? अगर गरीबी का यह मतलब है, कि कपड़े ना हों तो इससे क्या अंतर पड़ता है, ना हों तो ना हों, बिना कपड़ों के कौन सा कष्ट…। बुजुर्ग को पता है, कि जंगल की नग्नता कपड़ों से बेहतर है, फिर क्यों खुद को गरीब कहा जाये। जरूरी नहीं कि मकान हो, बताओ भला मकान किसके पास है, फिर रहने को कितनी जगह चाहिए, …कितना तो अजीब शब्द है गरीब। बुजुर्ग को सही सही पता है, कि बाहर की दुनिया को जो चाहिए उसमें से कुछ भी उनके पास नहीं, फिर वे उन्हें क्यों परेशान करेंगे। बाहरी आदमी कहता कि वे तुम्हारा पूरा जंगल काट लेंगे… वह अंतहीन जंगलों को घूरता, उसका मन मुस्कुराने को होता पर फिर उसे लगता कि वह आदमी उसे भी गोली मार सकता है।

वह आदमी एक गीत गाता है और उनकी आवाज में उस गीत का मतलब बताता है – हम होंगे कामयाब, एक दिन, मन में है विश्वास…। वह पूछना चाहता है, कौन सी कामयाबी, कौन सा दिन और कौन सा विश्वास…। वह चुप्पी लगा जाता है। उस आदमी को घूरता है। कितने तो अजीब हैं, इस आदमी के कायदे।

पर उस दिन उस आदमी की बात सुनकर वह बेतरह डर गया।

…घोटुल का बंद होना जरूरी है।’

‘मतलब।’

‘घोटुल तुमको तुम्हारी जड़ से जोड़े रखता है। जड़ मतलब नर्क। तुम्हारा नर्क…।’

‘यह पाप हो जायेगा।’

‘यही तो तुम लोग नहीं समझते हो। जब यह बंद होगा तभी तुम समझ पाओगे कि गरीबी और शोषण क्या है ?’

‘गरीबी।’

‘हाँ गरीबी। घोटुल के बंद होने से ही यह शब्द तुम समझ पाओगे। तुम्हारा नर्क तुम्हें यह शब्द नहीं समझने देता है।’

‘नर्क कुछ नहीं होता।’

‘होता है। जरूर होता है। तुम्हारी दुनिया नर्क है। घोर नर्क… क्योंकि, क्योंकि इसमें विचार के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं।’

बाहरी आदमी ने घृणा से लिंगो के देवस्थान और उस बुजुर्ग को देखा। उसके चेहरे पर थकान के ऊपर तैरता गुस्सा था। बुजुर्ग डर गया। उसने डरते, झिझकते हुए पूछा। वह ना पूछता अगर मामला घोटुल का ना होता।

‘विचार !’

विचार एक पहेली। कितनी अजूबी और बेठौरी आवाज है विचार। विचार एक उलझा हुआ डर। विचार, कितना तो अबूझ, बूझ सके तो बूझ। विचार जिसे जानने के लिए कितना हताश और उतावला घोटुल का बुजुर्ग।

‘तुम… (उसने एक भद्दी सी गाली दी), शताब्दियों से एक सा काम करते आये हो, तुम क्या समझोगे विचार। जब कुछ नया करने का जतन ही नहीं, सलीका ही नहीं तो तुम… (उसने फिर एक भद्दी सी गाली दी) खाक समझोगे इसे।’

‘फिर भी, बताते तो ठीक रहता।’

उसने घृणा और क्रोध से उसे देखा। फिर कुछ सोचा। उसे खुद पर कोफ्त हुई, जाने वह किसे और क्या तो समझा रहा है। पिछले कितने तो दशकों से समझा रहा है। हर बार हार उसकी ही होती है।

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‘…हर चीज की जड़ है पैसा। तुम्हारी… (इस बार वह भद्दी-सी गाली देते देते रुक गया), दुनिया में संपत्ति तो है नहीं। बिना संपत्ति के विचार आये भी तो कहाँ से। ‘

अब बुजुर्ग विचार से पहले संपत्ति को समझना चाहता था। पर चुप रहा। उस बाहरी आदमी ने जैसे जान लिया कि वह क्या समझना चाहता है।

‘संपत्ति याने जो चीज जरूरत से थोड़ा ज्यादा हो। थोड़ी-सी भी। पर तुम लोग तो पेट भर गया तो बचा माँस फेंक दोगे। जंगल से कुछ बटोरा जितनी जरूरत हुई प्रयोग किया और बाकी फेंक दिया। अरे जब तक बची हुई फालतू की चीजों को इकट्ठा नहीं करोगे, तुम्हारे पास संपत्ति कैसे आयेगी। पूरा (उसने फिर से ‘माँ’ से शुरुआत होनेवाली एक भद्दी सी गाली दी) लफड़ा ही यही है। संपत्ति ना हो तो क्या हो मुद्दे का और अगर मुद्दा ना हो तो क्या हो विचार का और विचार ना हो तो क्या हो लाल किले पर झंडे का…।’

‘अगर हम भी पैसा पा जायें तो संपत्ति हो जायेगी क्या?’

बुजुर्ग ने चहकते हुए कहा। बाहरी आदमी को बुजुर्ग पर जोर का क्रोध आया। उसने खुद को संयत करते हुए उसे धमकाते हुए कहा।

‘अच्छा छोड़ो यह सब बकवास बातें। घोटुल बंद करने की तैयारी करो, समझे…।’

उसने, बुजुर्ग को हिकारत से घूरा।

बुजुर्ग उसे भोकवे की तरह ताकता। वह बाहरी आदमी लाल पीला होता। बैठे ठाले बिना कुछ बोले लाल पीला होता रहता और अचानक अपनी बंदूक उठा लेता। बुजुर्ग डर जाता। घोटुल के कुछ जवान लड़कों को उसने बंदूक थमाई। चलाना सिखाया। लड़कों को बंदूक चलाने में मजा आया। पेड़ से फल गिरा लो, चिड़िया मार लो, शिकार को पलक झपकते चित्त कर दो। बंदूक बड़ी मस्त चीज है। पर बुजुर्ग को अंदेशा था कि बंदूक किसी और चीज के लिए लाई गई है, वरना उस दिन उस आदमी को यह बाहरी आदमी गोली क्यों मारता। एक दिन डरते-डरते बुजर्ग ने उससे पूछ ही लिया।

‘किसको मारना है?’

उसको इस तरह से पूछना बड़ा अजीब लगा। जब मारने की वजह ना हो तो यह कितना तो अजीब होता है। कितना कितना तो आत्मग्लानि। कितना तो पीड़ित।

‘अबे मारना नहीं है। क्रांति। क्रांति।’

क्रांति फिर एक अबूझ शब्द। कितनी बार सुना पर जैसे हर बार नया, कितना अर्थविहीन। पता नहीं इसके मायने बुजर्ग कभी समझे भी या नहीं। वह सोचता, बाहर की दुनिया के शब्द कितने कितने तो अबूझ हैं। उनकी आवाजें कितनी कितनी तो अस्पष्ट। बुजर्ग को बाहर की दुनिया पर दया आ गई। उसे लगता कि ना जाने बाहर की दुनिया की औरतें और बच्चे ऐसी बुझौव्वल भाषा में कैसे बात करते होंगे। बुजर्ग को लगता है जैसे क्रांति कोई जंतु है, जिसे बंदूक से मारना होगा। जाने वह कैसा होगा?

बाहरी आदमी पर दशकों से उतरती हताशा अब गुस्सा होकर तारी हो रही है। उसे एकबारगी लगता रहता है, कि जंगल का अब कुछ हो नहीं सकता। अगले दिन सुबह बाहरी आदमी ने हंगामा कर दिया। बुजुर्ग चुपचाप बैठा रहा। वह लगातार घोटुल के लड़कों और लड़कियों को धमकी भरे अंदाज में समझाता रहा। बकता रहा। अंतिम बात बस एक ही थी, कि घोटुल बंद हो जाना चाहिए।

लड़के चले गये। जब लौटे उनके हाथ में वे चार बंदूकें थीं, जो उस आदमी ने उन्हें दी थीं। आदमी खड़ा था। वे चारों आदमी के पास आये और उसके सामने वे बंदूकें जमीन पर पटक दीं। आदमी उन सभी पर लाल पीला होता वहाँ से चला गया। कह गया जब अबकी बार आयेगा उसके साथ और भी साथी होंगे और तब कोई भी हथियार नहीं पटकेगा। तब सबको मानना पड़ेगा कि घोटुल निरर्थक है। घोटुल को बंद करना समतामूलक समाज के लिए निहायत ही जरूरी है।

वह देर रात थी। लड़का-लड़की थककर घोटुल में सो गये थे।

घोटुल में एक ही कमरा है। एक विशाल कमरा। वे सब वहीं फर्श पर सो जाते हैं। सारे लड़के। सारी लड़कियाँ। किसी की कोई जगह तय नहीं। वह फर्श सबका है। वह बिस्तर साझा है। उनकी साँसों और छाती से चिपककर धड़कनेवाला बिस्तर। दायराविहीन बिस्तर। वह उस तरह बिस्तर नहीं, जैसे वे होते हैं।

आग बुझ जाती है। चाँद लुढ़क जाता है। सारा जंगल संसार के गहनतम अँधेरे से ढक जाता है। घोटुल के उस कमरे में फिर रौशनी का एक बिंदु भी कभी घुस नहीं सकता।

‘घोटुल इज एन एकनॉमिक एंड सोशल नीड ऑफ द एबॉरिजिनल सोसायटी ऑफ बस्तर। इट मे हैड सम पॉलिटिकल टारगेट्स, एस व्ही नो हाऊ ए हायरारकी इन प्रिमिटिव सोसाइटी एजिक्जस्टस। व्ही कैन से दैट एन एडमिनिस्ट्रेटिव स्किल हैड बीन एराइज्ड इन प्रिहिस्टॉरिक टाइम्स। घोटुल हैड…।’

प्रोफेसर बरसों से कही जानेवाली एक सी बात उगले जा रहा था। लड़का बड़ी तेजी से नोट्स बना रहा था। लड़का एंथ्रोपोलॉजी बड़ी गंभीरता से पढ़ता था। भारत में यह एक नया विषय था। सिविल सर्विस के एक्जाम के लिए तय प्रॉस्पेक्टस में अत्यंत संक्षिप्त, लघुतर। सबसे छोटा सिलैबस। उसे लगता है, आई.ए.एस. बनने के लिए इस विषय से अच्छा कुछ नहीं। कितना आसान कि बस, चार वाक्य रटो बस्तर का पूरा घोटुल याद हो जाता है।

बुझी आग के पास एक लड़की उस बुजुर्ग के सामने बैठी है। उसे कई दिनों से खून नहीं आया है। उस लड़की को तय करना है कि वह किससे गर्भवती हुई है।

पूर्णिमा आयेगी। पूरी रौशनी की रात। आंगा देव उस रात संसार के सबसे बड़े पाप को बेनकाब करेंगे और लड़की एक लड़के का नाम तय कर लेगी। लड़की उलझी हुई है। वह तय नहीं कर पा रही है कि वह किस लड़के का नाम ले। लड़की खुश है। उसके भीतर एक ऊँची लहर बार-बार किनारे पर गिरकर फेन बिखरा रही है। वह सोचती है, वह उन लड़कों को गौर से देखेगी, किसी भी समय। कितना तो समय है। कितनी-कितनी तो बेफिक्रियाँ। जब वे नदी में निर्वस्त्र नहा रहे होंगे, रात को बेतरह मशीन होकर नाच रहे होंगे, जंगल से कोई शिकार अपने कंधे पर लटकाये सीटियाँ मारते, चीखते-चिल्लाते आ रहे होंगे, लिंगो के सामने एक झटके में किसी बड़े से जानवर की गर्दन उसके धड़ से अलग कर टपकते खून को मिट्टी की हाँडी में इकट्ठा कर रहे होंगे… तब वह उन सबको ठीक से देखेगी। जी भर कर घूरेगी और अगली पूर्णिमा को जब सब आग के चारों ओर इकट्ठा होंगे वह घोषणा कर देगी कि उसे कौन चाहिए और इस तरह वह हमेशा के लिए उसका हो जायेगा। बेदावा उसका। वह उसे अपने साथ ले जायेगी। अभी समय है। वह तय करेगी।

उसे नाज है वह लड़की है। उसे नाज है कि सिर्फ वही तय कर सकती है। उसके भीतर से एक हूक उठेगी और वह नाम, वह देह, वह आत्मा उसकी हो जायेगी। उसे उसकी होना पड़ेगा। लड़की का तय किया जंगल का उसूल।

जंगल के कायदे लड़की की बानगी। लड़की की बात, जंगल-जंगल रास्ता। लड़की की नींद, जंगल का मनचाहा सपना। जंगल, जंगल की लड़की का गीत।

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…उसने तय कर लिया। वह सबसे ज्यादा उसके लिए धड़कती है। उसका बाप और लड़की का बाप भाई-भाई हैं। जंगल में कुछ वर्जनाएँ कभी नहीं बनेंगी। वे जंगल की वर्जना भी तो नहीं। वहाँ कुछ भी नहीं टूटता। प्यार बेतरह समुद्री ज्वार होकर फैलता रहता है। जंगल की मादकता और भड़कता प्यार महासागर का प्यार है, जहाँ तट रेखा नहीं बन पाई है।

बाहरी आदमी लौटा। अबकी बार वे सात लोग थे। सबके हाथ में हथियार थे। उन्होंने बुजुर्ग को कहा कि उसे समझना होगा और अगर वह समझ नहीं पाता है तो भी समझ ले कि समझना ही है, समझ के अलावा अब कोई और समझ नहीं। वे सीधे-सीधे लड़के लड़कियों से बात नहीं करेंगे। बुजुर्ग बात करें। कायदा भी यही है।

जंगल में उन लोगों को कितने कितने तो साल बीत गये हैं। दशकों। अब वे चाहते हैं, कि बिना किसी खून खराबे के लोग मान जायें। उन्हें मानना ही होगा आखिरकार वे उनके ही लोग हैं। संसार के सारे मजदूर, किसान और आदिवासी किसी और के नहीं हो सकते।

बुजुर्ग डर गया। पहले उसने अकेले समझाया। लड़के लड़कियों को पहले से कुछ-कुछ भान था। एक लड़के ने एक दिन बुजुर्ग को कहा था, कि अबकी बार उनको यहाँ आने नहीं देंगे। ज्यादा हुआ तो मार डालेंगे। बुजुर्ग ने उसे वह किस्सा बताया कि किस तरह वह जंगली आदमी, उनकी बिरादरी का आदमी मारा गया था और कौन जाने वह बाहरी आदमी ठीक ही कह रहा हो, कि वह अकेला नहीं है। जंगल में बहुत से लोग हैं, बुजुर्ग को ही क्या उसे भी सबका खयाल रखना होगा। यह खतरा नहीं लिया जा सकता है। बुजुर्ग अकेला समझाता रहा पर लड़के लड़कियाँ मानने को तैयार नहीं थे। फिर उन सातों के साथ मिलकर समझाया गया। सब बुजुर्ग और बंदूक थामे उन सातों को घूरते रहे।

…सबसे पहले घोटुल के एकमात्र प्रवेश रास्ते पर लकड़ी के लट्ठे खड़े किये गये। वह बंद हो गया। उसकी छानी हटाने में दो दिन लगे। बुजुर्ग कहता था, कि यह सब करने की जरूरत नहीं लोग खुद ही मान जायेंगे। पर वे सातों कहते थे, कि यह काम लड़के लड़कियाँ खुद करें। ऐसा करने पर वे शायद उस बात को समझ पायें जो दशकों से वे उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

बुजुर्ग ने वादा किया कि आग अब कभी नहीं जलेगी। रात को घोटुल के सामने अँधेरे, वीराने और सन्नाटे की जिम्मेदारी उसे लेनी पड़ी।

…फिर भी घोटुल एकदम से वीरान नहीं हो पाया था। वे लोग रात को वहाँ आ जाते। आग नहीं जलती थी। शराब के मिट्टी के पात्र तोड़ डाले गये थे। वाद्य यंत्र जला दिये गये थे। कुछ लोग बायसन के हार्न और कौड़ियाँ बचा लाये थे। उन्हें उन्होंने उन आदिम झोंपड़ियों में छुपा लिया था, जिसे बरसों पहले उन्होंने छोड़ा था। घोटुल के बाद उन्हें वापस इन्हीं झोंपड़ियों में जाना था, जो बचपन के बाद उनके लिए निषिद्ध रह आई थीं।

…वे सोचते कि वे तो सिर्फ नाचना और गाना चाहते थे। वे कहना चाहते थे, कि जो रोज गाता हो, रोज पीता हो, रोज नाचता हो, …वह एकदम से नहीं छोड़ सकता। नाचना रोज। गाना रोज। हजारों हजार साल का रोज। वे नग्न थे, बेघर और कई कई बार भूखे भी… पर वे नाचते थे, गाते थे। भला वह चीज कैसे छूट जाये जो नग्नता और भूख से भी ज्यादा अहम हो। वे बस इतना ही कहना चाहते थे, कि उन्हें नहीं चाहिए तुम्हारा भरपेट खाना और कपड़े, या यही कि जिसे तुम घर कहते या मानते हो… वे बस रात को मदमस्त नाचना चाहते हैं। पर वे सातों उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। उनके अनुसार उनकी इस बात में एैब है। संसार की सबसे बड़ी आयरनी।

कहते हैं, बस्तर के कुछ युवा आज भी जाने किस उम्मीद में रात के जंगल में किसी रिक्त स्थान पर इकट्ठा होना चाहते हैं? जाने क्यों चाँद आज भी मुँह फेरने से पहले उस अँधेरी जगह को ताकता है? जाने क्यों तो…?

घोटुल की जगह अब बंदूक थी। उन्माद और प्यार की जगह गुस्सा था। जंगल ने कभी किसी लड़की को रात को उस अँधेरी खाली जगह पर सिसकते सुना था। धड़कनों की जगह अब एक शुष्क-सी आग थी। वे कई दिनों तक जलते रहे। फिर एक दिन। सबसे पहले एक युवा सामने आया। उसने बंदूक अपने हाथ में उठा ली और उस बाहरी आदमी से कहा – बताओ किसको मारना है?

पता नहीं किसे तो मारना था उसे?

उन्हें तय करना था कि दुनिया में किसे वे अपना दुश्मन घोषित करें। किसे जानी दुश्मन। किसकी खोपड़ी उड़ानी होगी और किसके सिर्फ हाथ और पैर काटने से ही काम चल जायेगा। उन सातों ने उन्हें बताया कि किसे दुश्मन मानना है और किसे दोस्त। सातों खुश थे, कि अंततः वे उनकी बात समझ गये।

दिल्ली विश्वविद्यालय का वह लड़का बस्तर का सबसे बडा अधिकारी हो गया। उसके पास घोटुल बंद होने की खबर पूरे दो साल बाद अंततः पहुँच ही गई। विश्वविद्यालय के पाठ की रील उसके मस्तिष्क में रिवाइंड हुई। उसने अपने मातहतों और पुलिस के बड़े अधिकारियों को बुलाया।

‘…घोटुल आदिवासी समाज की राजनीति और अर्थतंत्र की धुरी है। अगर यह बंद हो जाये तो जंगल में भुखमरी फैल सकती है, उनका सिस्टम कोलैप्स हो सकता है।’

उसके मातहतों ने उसे कुछ सलाहें दीं। वह उत्तेजित हो गया।

‘…ये क्या समझते हैं, जंगल में इनकी ही चलेगी। मैंने एक प्लान तैयार किया है। हम सरकारी घोटुल बनायेंगे। हम घोटुल को इस तरह नष्ट होता नहीं देख सकते। सरकारी घोटुल में लोगों को लाने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की होगी उन्हें आदेश दिये जा चुके हैं।’

उसने पुलिस के अधिकारी से कहा।

‘…आपका सहयोग चाहिए। कितनी फोर्स है? कितने हथियार?’

वह अधिकारी बहुत पहले से षड्यंत्रों का शिकार रहा। एक ताकतवर दगाबाजी जब उसने देश के नामचीन विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी प्रभाग में दाखिला लिया। एक बडे सलीके से कहा गया धोखा, कि अगर मानव को जानना है, तो मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) पढ़ो। एक जाल जो उसे एक परीक्षा में फाँसकर अजीब से तंत्र में सुशोभित करता है। एक जालसाज समाज। एक फरेबी समय। एक छल, हर कदम। एक फंदा जो जंगल में बिछ रहा है और सब आश्वस्त हैं, कि वह उसमें फँसेगा ही। वह इस षड्यंत्र को समझना ही नहीं चाहता।

…जंगल में घात लग चुकी है। जंगल की घात संसार की एकमात्र घात है, जो टूटती नहीं, जो बडे इत्मिनान से बीत जाने देती है शताब्दियाँ।

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