सपनों की बाइबिल

रोजाना सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक मैं अपनी सीट पर बैठी दूसरों के ख्‍वाब टाइप करती रहती रही हूँ। मुझे इसीलिए मुलाजिम रखा गया है। मेरे अफसरों का हुक्‍म है कि मैं तमाम चीजें टाइप करूँ। ख्‍वाब, शिकायतें, माँ से मतभेद, बोतल और बिस्‍तर की समस्‍याएँ, बाप से झगड़ा, सरदर्द जो इतना तेज हो जाता है कि दुनिया की तमाम लज्‍जतें मंद पड़ जाती हैं, हमारे दफ्तर में सिर्फ वही लोग आते हैं जिनके घरों में अजाब भर चुके होते हैं।

मुमकिन है कि चूहा अपने जिस्‍मानी एतबार से बहुत समझ जाता हो कि दूर से आते दिखाई देनेवाले दो बड़े पाँव कायनात का निजाम किस तरह चलाते हैं, लेकिन जहाँ से दुनिया को देखती हूँ वहाँ से यही मालूम होता है कि दुनिया के निगहबान का नाम ‘परेशान’ है।

परेशानी की भी शक्‍ल हो सकती है। कुत्‍ता, तवायफ, चुड़ैल, शैतान… सो जाए या जागता रहे, वो परेशान ही रहता है।

जब लोग सवाल करते हैं कि मैं कहाँ काम करती हूँ, तो मैं उन्‍हें बताती हूँ कि मेरा काम शहर के अस्‍पताल के एक शोबे का रिकार्ड दुरुस्त रखना है। आमतौर पर ये जवाब काफी साबित होता है। इसके बाद कोई इस तरह की बात नहीं पूछता जिसके जवाब में मुझे बताना पड़े कि मैं पहले से मौजूद रिकार्ड की निगहदाश्‍त के अवाला नया रिकार्ड भी टाइप करती हूँ। दरअसल नया रिकार्ड टाइप करना ही मेरा पेशा है और मैं अपने पेशे से सच्‍चे दिल से जुड़ी हूँ। इसलिए कि मेरी तहवील में ख्‍वाबों के ढेर हैं और मैं किसी को ये नहीं बता सकती। नहीं बता सकती कि मैं अपने घर के कमरे में अस्‍पताल के कानूनों की पाबंद नहीं हूँ। यहाँ मैं फकत ‘परेशान’ के हुक्‍म पर अमल करती हूँ जो ख्‍वाब जमा करने की हिदायत करता है।

ख्‍वाब-दर-ख्‍वाब मैं बालिग हो रही हूँ और इसी रफ्तार से ख्‍वाबों से मेरी पहचान में इजाफा हो रहा है। ये सिलसिला जारी रहा तो एक दिन मैं दुनिया की सबसे बड़ी ख्‍वाब जाननेवाली बन जाऊँगी। लेकिन ख्‍वाब जानने की इंतिहा पर पहुँच कर भी मैं लोगों के ख्‍वाब रोकने की कोशिश नहीं करूँगी। ख्‍वाबों का नाजायज इस्‍तेमाल नहीं करूँगी। यहाँ तक कि मैं ख्‍वाबों का नतीजा बताने का भी कोई इरादा नहीं रखती। मैं तो सिर्फ ख्‍वाब जमा करना चाहती हूँ। उन्‍हें पहचानना चाहती हूँ। उनसे मुहब्‍बत करना चाहती हूँ। मैं ‘परेशान’ की कारकुन हूँ और ख्‍वाब जमा करना मेरे फर्ज में शामिल है। यही वजह है कि मैं अपने टाइपशुदा ख्‍वाब इतनी बार पढ़ती हूँ कि वो मुझे जबानी याद हो जाते हैं। फिर मैं घर जा कर उन्‍हें ‘परेशान’ की पवित्र किताब में दर्ज करती हूँ।

कभी-कभी मैं रात के वक्‍त अपने घर की छत पर चली जाती हूँ। वहाँ से नींद भरे शहर को देखना मुझे अच्‍छा लगता है। छत पर टहलते हुए वायलिन के तार की तरह हर वक्‍त लरजने के लिए तैयार रहती हूँ। सुबह के आसार नमूदार होने पर थकन से चूर अपने बिस्‍तर पर आती हूँ और किसी बुखारजदा शख्‍स की तरह हो जाती हूँ। शहर में मौजूद इंसानी सरों का शुमार और फिर उन सरों में आनेवाले नकली ख्‍वाबों का हिसाब मुझे बेइंतिहा थका देता है।

दूसरे दिन मुझे वही ख्‍वाब टाइप करने होते हैं जिन्‍हें मैं रात अपनी छत से महसूस कर चुकी हूँ। यकीनन शहर भर के ख्‍वाब असीम हैं और मैं शाम तक फकत उनका एक मामूली हिस्‍सा टाइप कर सकती हूँ, लेकिन इसके बावजूद मेरे दफ्तर में फाइलों का अंबार बढ़ता जा रहा है और बहुत जल्‍द वो दिन आने वाला है जब दफ्तर में सिवाय ख्‍वाबों की फाइलों के कोई दूसरी चीज रखने की जगह नहीं बचेगी।

यूँ भी होता है कि मैं लोगों को उनके ख्‍वाबों के हवाले से पहचानने लगती हूँ। बहुत-से मरीज ऐसे होते हैं कि मैं उनके नाम भूल जाती हूँ, लेकिन उनके ख्‍वाब याद रहते हैं। मसलन ये आदमी जो एक फैक्‍ट्री में काम करता है, ख्‍वाब में खुद को किसी मशीन के घूमते पहियों में फँसा हुआ महसूस करता है। ये ख्‍वाब में इतना खौफजदा हो जाता है कि आँख खुलने के बाद भी कुछ देर तक चीखता रहता है। इस तरह के लोग और भी हैं जो ख्‍वाब में देखते हैं कि वो किसी मशीन तले रौंदे जा रहे हैं या कोई ईजाद उन्‍हें निगल रही है। कभी-कभी ख्‍याल आता है कि जब मशीनें नहीं थीं उस वक्‍त लोग किस तरह के ख्‍वाबों से डरते होंगे?

मेरा अपना भी एक ख्‍वाब है। इस ख्‍वाब में एक बहुत बड़ी झील नजर आती हैं। इतनी बड़ी कि इसके किनारे हेलीकॉप्‍टर की शीशेवाली सीट से भी नजर नहीं आते जहाँ से मैं उसकी तह में झाँकती हूँ। झील का पानी खौफनाक बलाओं से भरा हुआ है। ऐसी बलाएँ जो पुराने जमाने में जमीन की सतह पर घूमती थीं। वो जमाना जब इंसान गुफाओं में रहता था। अभी उसने आग नहीं जलाई थी, फसल नहीं उगाई थी।

इस ख्‍वाब में सूरज चाँद सितारे और जमीन-आसमान के दरमियान पाई जानेवाली दूसरी तमाम चीजों की शक्‍लें और खासियत बदली हुई दिखाई देती हैं। अचानक झील की सतह बर्फ से ढक जाती है और मेरे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगते हैं, यहाँ तक कि मैं जाग जाती हूँ। इस ख्‍वाब से निकलने के बाद कुछ देर तक किसी भी ख्‍वाब में अर्थ तलाश करना बेकार लगता है।

यही वो झील है जहाँ रात के वक्‍त शहर भर के ख्‍वाब बहते हुए आते हैं, यहाँ पहुँच कर तमाम दिमागों का गर्द व गुबार बैठ जाता है। जाहिर है कि ये झील शहर के आसपास पाए जानेवाले पीने के शफ्फाक पानी के उन जखीरों जैसी नहीं हो सकती जिनकी दिन-रात यूँ हिफाजत की जाती है जैसे वो काँटेदार जाली में रखे अनमोल हीरे हों, ये एक मुख्‍तलिफ झील है। सदियों के जमाशुदा गलते-सड़ते ख्‍वाबों से इस झील का पानी मटमैला और बदबूदार हो गया है और इसकी सतह से हर वक्‍त धुआँ उठता रहता है।

एक सर में रात भर में कितने ख्‍वाब आते हैं? और शहरी सरों की कुल तादाद क्‍या है? और दुनिया में इस तरह के कितने शहर पाए जाते हैं? और जमीन पर कितनी रातें गुजर चुकी हैं? मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो गणित में तेज होते हैं और बड़ी-बड़ी संख्‍याओं का पल भर में हिसाब लगा लेते हैं। मैं तो सिर्फ इस एक शहर में रात भर देखे जानेवाले ख्‍वाबों का शुमार करती हूँ, तो मेरा सर चकरा जाता है।

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ये अजीब झील हैं। इसमें प्‍यार करनेवालों के चेहरे और फूली हुई लाशें और यादें और धुंध और धुआँ पुर्जे और साइंसी ईजादें और नफा-नुकसान एक-दूसरे से लिपटे तैरते रहते हैं और कभी-कभी मुझे इसमें मुर्दा पैदा होनेवाले बच्‍चे भी नजर आते हैं। मुर्दा पैदा होनेवाले बच्‍चे देख कर ऐसा लगता है जैसे वो झील की दूसरी तरफ बैठे महान रचनाकार के नामुकम्‍मल संदेश हों।

इस झील को कोई भी नाम दे लो। दुनिया के सारे लोग एक बिरादरी की सूरत में सिर्फ यहाँ नजर आते हैं। एक समूह, एक ढेर, एक समझ में न आनेवाला अंबार जो सोते में बिल्‍कुल एक चीज का बना लगता है, लेकिन ज्‍यों ही जागता है जुदा-जुदा हो जाता है। झील की इकाई में सब पाक हो जाते हैं, मगर जागते में उनको दोबारा अपनी-अपनी शख्सियत का लबादा ओढ़ना पड़ता है।

झील का ख्‍वाब मेरा जाती ख्‍वाब है। इसे मैं किसी रिकार्ड में दर्ज नहीं करूँगी। किसी फाइल में दफ्न नहीं होने दूँगी।

अहम बात ये है कि अस्‍पताल के जिस शोबे में मुझे नौकरी मिली है वो दूसरे शोबे में मुझे नौकरी मिली है वो दूसरे शोबों से बहुत मुख्‍तलिफ है। हमारे शोबे में दवाएँ नहीं दी जातीं, मरीज से सिर्फ मुफ्तगू की जाती है, उसकी सुनी जाती है, उसे महसूस किया जाता है। मुझे अपने शोबे का तरीका पसंद है। ये उन जिस्‍मानी बीमारियोंवाले शोबों के तरीके से बेहतर है जहाँ रंगीन घोल और पाउडर के ढेर लगे होते हैं। हमारे अस्‍पताल की इमारत नीम अँधेरी और तंग है जिसके कारण कभी-कभी दूसरे शोबों के मरीज और डॉक्‍टर भी हमारे कमरों में अस्‍थाई तौर पर आ जाते हैं। ऐसे दिनों में हमारे शोबे की अहमियत बढ़ जाती है।

मंगल और बुध के रोज जगह की कमी के सबब ऑपरेशनवाले मरीजों के पलंग हमारे शोबे के हॉल में खड़े कर दिए जाते हैं। टाइपिंग के दौरान मेरी नजर बार-बार उनकी तरफ उठ जाती है। जिस जगह मैं बैठती हूँ वहाँ से मरीजों के पाँव नजर आते हैं। सुर्ख कंबलों और सफेद चादरों से निकले साफ-सुथरे पीले पैरों की लंबी कतार।

किसी-किसी दिन स्‍नायु रोगियों के शोबेवाले भी हमारा कोई कमरा इस्‍तेमाल करते हैं। ये मरीज अजीबोगरीब बोलियाँ बोलते हैं। लैटिन और चीनी जबानों के गाने गाते हैं और सारा वक्‍त शोर मचाते रहते हैं। अगर ऐसे मरीजों की जिस्‍मानी हालत दुरुस्त साबित हो जाए तो स्‍नायु रोगियों के माहिर उन्‍हें हमारे शोबे में भेज देते हैं।

इन दुश्‍वारियों के बावजूद मैं अपने काम से गाफिल नहीं होती। सर झुकाए लगातार दूसरों के ख्‍वाब टाइप करती चली जाती हूँ। अब तो मेरे पास मरीजों के ख्‍वाबों के अलावा अपने भी एक से ज्‍यादा ख्‍वाब जमा हो चुके हैं। ये ख्‍वाब मैंने खुद रचे हैं। लेकिन मैं इन ख्‍वाबों को खुद से भी नहीं दोहराऊँगी। कुछ अर्से तक इन्‍हें उस बुत की तरह वक्‍त गुजारना होगा जो अपनी नकाब की रस्‍म से एक लम्‍हा पहले तक मखमल के सुर्ख कपड़े में सर से पाँव तक ढका रहता है।

मैं जो भी ख्‍वाब हासिल करती हूँ, जिस तरह भी हासिल करती हूँ – उस पर ‘परेशान’ के दस्‍तखत जरूर होते हैं। ‘परेशान’ को ड्रामाई अंदाज में जाहिर होना पसंद है। हरचंद कि वो जाहिर होने के लिए मुख्‍तलिफ जगहों और वक्‍तों का चुनाव करता है। मगर कोई जगह कोई वक्‍त हो, वो हमेशा ड्रामाई अंदाज में सामने आता है।

ख्‍वाबों का कारोबार बहुत खतरनाक होता है। अगर ‘परेशान’ अपनी तरफ से उसमें शायरी शामिल न कर दे तो ये कारोबार नाकाबिले-बरदाश्‍त हो जाए। ख्‍वाबों के कारोबार में शायरी शामिल करने पर मैं ‘परेशान’ की शुक्रगुजार हूँ।

चमड़े की जैकेट में उस नौजवान ने बताया था कि उसके ख्‍वाब… लेकिन मैं ये कैसे कह सकती हूँ कि ये उस नौजवान का ख्‍वाब है जो उस रोज स्‍याह जैकेट पहने हमारे क्लिनिक में दाखिल हुआ था? मुझे यकीन है कि ये उसका जाती ख्‍वाब है।

दिल में यकीन का जज्‍बा हो तो ताकत और इल्तिजाओं और आँसुओं से ख्‍वाब तहरीर किए जा सकते हैं। दूसरों के ख्‍वाब टाइप करना आसान काम है लेकिन जाती ख्‍वाब लिखने में बहुत ऊर्जा लगती है।

अस्‍पताल के सेंटर में एक और शोबा है जो हमारे शोबे से भी ज्‍यादा अहमियत रखता है, जिसके ख्‍वाब हमारे बस में न आ सकें उसे हम इमारत के सेंटर में भेज देते हैं। मैंने अस्‍पताल का वो शोबा आज तक नहीं देखा। हरचंद कि उसकी सेक्रेटरी मेरी पहचान की है (हम दोनों एक ही हॉल में दोपहर का खाना खाते हैं)। मगर उसका हुलिया और उठने-बैठने का अंदाज मुझे उससे दूर रखता है। उसका नाम भी अजीब-सा है। मैं अक्‍सर उसका नाम भूल जाती हूँ। कुछ इस तरह का नाम जैसे : मिलरवेज या मिलरोज। इस तरह के नाम टेलीफोन डायरेक्‍टरी में नजर नहीं आते।

मैंने एक बार टेलीफोन डायरेक्‍टरी के पन्‍ने पलटे थे और ये देख कर खुश हुई थी कि शहर में बहुत-से लोग ऐसे भी हैं जिनका नाम स्मिथ नहीं है।

बहरहाल ये मिलरवेज या मिलरोज नाम की औरत बड़ी सेहतमंद और ऊँची-लंबी है। इसका लिबास आम लिबास के बजाय किसी संस्‍था की वर्दी मालूम होता है (जरूरी नहीं कि ये संस्‍था कोई कानून लागू करती हो)। मिलरोज के संगीन चेहरे पर चंद गैरमामूली तिल भी हैं। ये तिल देख कर ख्‍याल आता है कि शायद मिलरोज का चेहरा सूरज की रोशनी में बहुत कम रहा है। धूप की तपिश हासिल न हो तो जिल्‍द पर तरह-तरह के दाग पड़ जाते हैं। मुमकिन है मिलरोज ने नकली रोशनियों तले परवरिश पाई हो। अगर इसके चेहरे से इसकी आँखें नोचने की कोशिश की जाए तो महसूस होगा जैसे कोई पत्‍थर खुरच रहा हैं।

मेरे वार्ड की हैड सेक्रेटरी का नाम मिस टेलर है। मिस टेलर पहले दिन से हमारे वार्ड से जुड़ी है। अजब इत्तिफाक है कि जिस दिन मैं पैदा हुई थी उसी रोज वार्ड का उदघाटन हुआ था। मिस टेलर अस्‍पताल के बारे में हर चीज जानती है। वो इसके तमाम डॉक्‍टरों, मरीजों, शोबों और मन्‍सूबों से वाकिफ है। अपने पेशे में इतनी लगन मैंने किसी और में नहीं देखी। वो अस्‍पताल में मौजूद हर जानदार और बेजान शै का हिसाब रखती है। उसे तमाम वक्‍त गणना में घिरा देख कर मुझे हैरत होती है।

दफ्तर में मेरी दिलचस्‍पी सिर्फ ख्‍वाब जमा करने की हद तक है। मुझे यकीन है अगर अस्‍पताल में आग लग जाए तो मिस टेलर खुद को बचाने से पहले आँकड़ों की फाइलें बचाने की कोशिश करेगी। मेरे और मिस टेलर के मशगले मुख्‍तलिफ होने के बावजूद हमारे आपस के तल्‍लुकात खुशगवार हैं। बस, मैं ये नहीं चाहती कि वो मुझे दफ्तर की फाइलों में पुराने ख्‍वाब पढ़ते देख ले। आम तौर पर शोबा बेपनाह मसरूफ रहता है, लेकिन फिर भी मुझे कभी-कभी ख्‍वाबों के पुराने रिकार्डो में झाँकने का मौका मिल ही जाता है। मगर इतनी उतावली में अनोखे और अछूते ख्‍वाबों का चनाव एक मुश्किल काम है। मेरे आर्ट का तकाजा है कि मैं फुर्सत से बैठूँ, ख्‍वाबों की गहराई में उतरूँ, उनके सारे पहलुओं को जाँचूँ, उन्‍हे हर कोण से परखूँ और फिर जिन ख्‍वाबों को हर तरह से मुकम्‍मल पाऊँ, उन्‍हें घर ले जा कर ख्‍वाबों की पवित्र किताब में दर्ज कर दूँ। अगर शराब का स्‍तर बतानेवाले जानकार पहली बूँद चखने से पहले एक घंटे तक शराब की खुशबू सूँघ सकते हैं तो मैं ख्‍वाबों के सिलसिले में इस फुरर्सत और सहूलत से क्‍यों महरूम हूँ?

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कभी-कभी मेरा जी चाहता है की मैं एक बड़ा ट्रंक लाऊँ और ख्‍वाबों की सारी फाइलें उसमें भर कर ले जाऊँ। अस्‍पताल के गेट पर गैरमामूली किस्‍म की पोटलियों ओर बंडलों को खुलवा कर देखा जाता है और स्‍टाफ के चंद दूसरे लोग भी सरकारी सामान की निगरानी पर लगे हैं। मगर मैं टाइपराइटर या कोई कीमती दवा वगैरह चुराने का मन्‍सूबा नहीं बना रही। मैं तो बस पुराने ख्‍वाबों की फाइलें एक रात के लिए घर ले जाउँगी और दूसरी सुबह उन्‍हें उसी तरतीब से दोबरा अलमारी में सजा दूँगी। इसमें किसी का क्‍या नुकसान हैं? यूँ तो मैं ख्‍वाबों में फकत झाँकने से भी बहुत कुछ मालूम कर सकती हूँ, लेकिन मिस टेलर के आने-जाने का कोई वक्‍त मुकर्रर नहीं है, जिसके सबब मैं हर आहट और सरगोशी पर चौंक जाती हूँ और इस तरह मैं चंद लम्‍हों के लिए भी अपना शौक पूरी तवज्‍जो से पूरा नहीं कर पाती।

उदास दिनों में जब मेरे पास इतना वक्‍त भी नहीं होता कि पुरानी फाइलों से किसी ख्‍वाब की एक झलक ही देख लूँ, परेशान मेरी तरफ पीठ करके पहाड़ों जितना बुलंद हो जाता है और मुझ पर इतना खौफ तारी होता है कि मैं अपने होश गुम कर बैठती हूँ।

ऐसे मौके पर मेरी हालत उन भेड़ों की-सी होती है जो आँखों के सामने उगी घास चरने में इस कदर मशगूल हो जाती हैं कि चरागाह के आखिरी सिरे पर कुर्बानी के चबूतरे की मौजूदगी के आखिरी लम्‍हे तक बेखबर रहती हैं।

इससे ज्‍यादा खतरनाक बात ये है कि डॉक्‍टर हर रोज परेशान के आदमियों को उनकी पनाहगाहों से बाहर निकाल रहे हैं। डॉक्‍टरों के लिए परेशान के दरबार तक पहुँच रखनेवालों की भी कोई हैसियत नहीं है। हरचंद कि उसके गिरोह में फकत वही नुमायाँ ओहदे पर तैनात होता है जो ख्‍वाबों को याद रखे और ख्‍वाब देखनेवालों को भूल जाए। यूँ भी ख्‍वाबों के मुकाबले में ख्‍वाब देखनेवालों की क्‍या वकत है? मगर डॉक्‍टर ये नहीं मानते। उनके लिए तो परेशान मरीज के बदन में दाखिल होनेवाला काँच का टुकड़ा है जिसे वो रूहानी तरीकों से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।

‘हैरी के साथ क्‍या हुआ था?’ एतराज करनेवालों को डॉक्‍टर याद दिलाते हैं, ‘जब हैरी हमारे शोबे में दाखिल हुआ था तो परेशान उसके कंधे पर हाथ रख चुका था। इसीलिए तो उसे पूरी दुनिया गंदगी का ढेर नजर आने लगी थी। उसने काम पर जाना छोड़ दिया था कि रास्‍ते में इंसानों के थूक और जानवरों की गंदगी पड़ी होती है। पहले ये गंदगी ज्‍यों की त्‍यों लगती है। वो कहता था कि जब घर आकर जूते उतारो तो हाथ नापाक हो जाते हैं। उसके बाद मुँह तक पहुँचने में उसे देर ही कितनी लगती है?

‘हैरी को शारीरिक लाचार भी बुरे लगते थे। लाचारों के नाखून और कानों का पिछला हिस्‍सा मैल से अँटा होता है। वो अक्‍सर बातचीत की शुरूआत ही इस जुमले से करता था। लेकिन हमारे मशविरों और हिदायतों पर अमल करने से वो बिल्‍कुल नॉर्मल हो गया था। याद है? इलाज के आखिरी दिन उसने हम सब के साथ कैसी खुशादिली से हाथ मिलाया था और हमारा शुक्रिया अदा करके रुखसत हुआ था।’

मुझे याद है आखिरी दिन उसकी आँखों के शोले बुझे हुए थे और वो अहमकों की तरह मुस्‍कुराता हुआ हमारे क्लिनिक से रवाना हुआ था। अगर सूरतेहाल यही रही तो कितने हैरी आएँगे, स्‍वस्‍थ हो कर चले जाएँगे और मैं अपने ख्‍वाबों के जखीरे में कोई इजाफा नहीं सकूँगी। मुझे बहरहाल अपनी रफ्तार बढ़ानी है और मिस टेलर की मौजूदगी में ये नामुमकिन है।

इस मस्‍अले का सिर्फ यही हल है कि किसी दिन दफ्तर ही में रात गुजारूँ और सुबह तक तमाम फाइलों से अपने मतलब के ख्‍वाब डायरी में तहरीर कर लूँ।

दफ्तर में रात गुजारने का ख्‍याल कई दिनों से (कंबलों से निकले मरीजों के पीले पैरों की कतार की तरह) बार-बार मेरे सामने आ रहा है। एक दिन पाँच बजे शाम मैं खुद को दफ्तर के वाशरूम में छिपते देखती हूँ। गहरे होते अँधेरे के साथ दफ्तर से घर जानेवालों के कदमों की चाप आहिस्‍ता-आहिस्‍ता खो जाती है। मैं वाशरूम से बाहर निकलती हूँ तो दिन भर मसरूफ रहनेवाले अस्‍पताल की इमारत सोमवार के चर्च की तरह खाली और उदास महसूस होती है। मैं फौरन अपने कमरे में दाखिल होती हूँ। टाइपराइर्ट्स अपने खानों में बंद किए जा चुके हैं। टेलीफोनों में ताले पड़े हैं। दुनिया अपनी जगह मौजूद है।

मैं छत पर लगा हल्‍की ताकत का बल्‍ब रोशन करके रिकार्ड में मौजूद ख्‍वाबों की सबसे पुरानी फाइल का पहला पेज खोलती हूँ। फाइल का रंग शुरू में नीला रहा होगा मगर अब उसकी जिल्‍द जर्द हो गई है। मेरी पैदाइश के दिन ये फाइल बिल्‍कुल नई रही होगी। मैं सुबह तक इस फाइल को देखती हूँ। आधी रात के करीब मैं इस फाइल में दर्ज ख्‍वाब पढ़ती हूँ। मई की उन्‍नीस तारीख को एक नर्स अपने मरीज की अलमारी खोल कर लांड्री के थैले से पाँच कटे हुए सिर निकालती है। उनमें से एक सिर नर्स की माँ का है।

सर्द हवा का एक हल्‍का झोंका मेरी गर्दन को छूता गुजर जाता है। मैं ख्‍वाबों की फाइलों के सामने फर्श पर बैठी हूँ और अब टाँगों पर फाइल का बोझ महसूस कर रही हूँ। अचानक मेरी नजर सामनेवाले दरवाजे पर पड़ती है। दरवाजे के किवाड़ फर्श से उठे हुए हैं। दरवाजे की दूसरी तरफ दो मर्दाना जूते नजर आ रहे हैं। जूतों की नोकें मेरी तरफ हैं। भूरे चमड़े के बने हुए ऊँची एड़ियोंवाले ये जूते विदेशी ढंग के हैं। जूते स्थिर हैं, उनके ऊपर काले रंग की वो रेशमी जुराबें भी हैं जिनसे किसी की टाँगों की जर्द रंगत झलक रही है मगर जूते हिल नहीं रहे।

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‘बेचारी!’ कोई बड़ी प्‍यार भरी आवाज में कहता है, ‘बेचारी फर्श पर कैसे बैठी है। अब तक तो इसकी टाँगें अकड़ गई होंगी। इसकी मदद करो। सूरज निकलनेवाला है।’

दो हाथ मेरे बाजुओं तले से निकल कर मुझे खींच कर खड़ा कर देते हैं। मेरी टाँगे वाकई सुन्‍न हो चुकी हैं। मैं लड़खड़ाती हूँ। ख्‍वाबों की फाइल फर्श पर जा पड़ती है।

‘कुछ देर तक यूँ ही खड़ी रहो। खून की गर्दिश दुरुस्त हो जाएगी।’ अस्‍पताल के मालिक की सरगोशी मेरे कान में गूँजती है। मैं अपनी डायरी सीने से लगा लेती हूँ। ये मेरी आखिरी उम्‍मीद है।

‘इसे कुछ नहीं मालूम है।’

‘इसे कुछ नहीं मालूम।’

‘इसे सब कुछ मालूम है!!’

चमकदार जूते की नोक ख्‍वाबों की फाइल को ठोकर मारती है। मेरी पैदाइश की पहली चीख के वक्‍त शहर में देखे जानेवाले तमाम ख्‍वाबों का रिकार्ड अलमारी की तह के अँधेरे में चला जाता है। वो मुझे इमारत के सेंटर की तरफ ले जा रहा है। मैं अपनी रफ्तार तेज कर देती हूँ ताकि कोई ये न समझे कि मुझे घसीटा जा रहा है।

‘इससे पहले कि तुम मुझे निकालो,’ मैं मजबूत लहजे में कहती हूँ, ‘मैं खुद नौकरी छोड़ दूँगी।’

‘तुम हमारे काम आती हो,’ इस बार मालिक कहीं दूर से बोलता है, ‘हमें तुम्‍हारी जरूरत है।’

मैं और मालिक चलते रहते हैं। यहाँ तक कि पेच-दर-पेच राहदारियों में दाखिल हो जाते हैं। उसके बाद सुरंगें आती हैं। आखिरी सुरंग के खात्‍मे पर लोहे का फाटक खुल जाता है। हमारे गुजरने के बाद ही पीठ पीछे फाटक यूँ बंद होता है जैसे मवेशियों को बूचड़खाने ले जानेवाली गाड़ी का दरवाजा बंद होता है।

हम एक अनजाने कमरे में दाखिल हो चुके हैं। कम से कम मेरे लिए ये कमरा बिल्‍कुल अजनबी है। मैं दूसरों के इलाके में आ गई हूँ और मेरा सामान पीछे रह गया है। हैंगर पर लटका कोट… और मेरे डेस्‍क की दराज में मेरा बटुआ पड़ा है। सिर्फ मेरी डायरी मेरे साथ है और परेशान है जिसकी तपिश मुझे बर्फबारी में जमने से बचा रही है। मैं तेज रोशनियों के नीचे खड़ी कर दी गई हूँ – आ गई हूँ।

‘चुड़ैल!’ मिस मिलरोज फौलादी डेस्‍क के पीछे खड़ी मुझे घूर रही है। कमरे की बनावट ऐसी है जैसे किसी समुद्री जहाज का निचला हिस्‍सा हो। किसी भी दीवार पर कोई खिड़की या रोशनदान नहीं है। सामने से परेशान के नायब नमूदार होते हैं। उनकी आँखें दहकते हुए कोयलों से ज्‍यादा सुर्ख और रोशन हैं। वो मुझे अजीब आवाजों में खुश आमदीद कहते हैं। उन्‍हें मालूम हो चुका है कि मैं परेशान की सफों में शामिल हूँ और वो जानना चाहते हैं कि दुनिया में परेशान के कारकुन किस हाल में हैं?

‘शांति, मैं तुम्‍हारे लिए अमन व सलामती का पैगाम ले कर आई हूँ,’ मैं अपना डायरीवाला हाथ बुलंद करके उन्‍हें मुखातिब करती हूँ।

‘ये पुराना राग है बीबी।’ मिलरोज हाथी की तरह झूम उठी है, ‘अब हम ऐसी बातों से प्रभावित नहीं होंगे।’

मिस मिलरोज मुझ पर झटपती है। मैं बचने की कोशिश करती हूँ। मगर वो बहुत तेजरफ्तार और ताकतवर है। पहली बार उसका वार खाली जाता है मगर दूसरी बार वो मुझे दबोच लेती है।

‘पुराना राग मत अलापो, ये डायरी हमारे हवाले कर दो।’

मिस मिलरोज की साँसों में पागल कर देनेवाली बू है। मैं उसकी गिरफ्त से निकलने की कोशिश में उसकी मर्दों जैसी मजबूत और बेरस छाती को अपने वजूद की पूरी कुव्‍वत से परे धकेलती हूँ। लेकिन मैं उसके मुकाबले में बहुत कमजोर हूँ। उसकी उँगलियाँ दरिंदे के पंजों की तरह मेरे बदन में घुस जाती हैं।

‘मेरी बच्‍ची… मेरी बच्‍ची मेरे पास लौट आई है।’ मेरे कानों में फुँफकारती है।

‘ये लड़की…’ अस्‍पताल के मालिक की आवाज से कमरा गूँजता है, ‘परेशान के साथ वक्‍त गुजारती रही है।’

‘बुरी बात…बुरी बात…’

सफेद लकड़ी का एक तख्‍त ऐन मेरे सामने बिछा दिया गया है। मिलरोज मेरी कलाई से घड़ी उतारती है। उँगलियों से अँगूठी निकालती है। बालों से पिन अलग करती है। फिर वो मेरा लिबास उतार कर मुझे मौसम की पहली बर्फ जैसी बेदाग और सफेद चादरों में लपेट देती है। अचानक कमरे के चारों कोनों से पथराई आँखोंवाले चार वजूद निकल कर मुझे सफेद तख्‍त पर ले जाते हैं। उन्‍होंने ऑपरेशन थिएटरवाले चार कपड़े और नकाब पहन रखे हैं। उनका मकसद परेशान की बादशाहत खत्‍म करना है। वो एक-एक करके मेरी दोनों टाँगों और बाजू को काबू में कर लेते हैं। दरवाजे से आनेवाला मेरे सर के पीछे खड़ा हो जाता है। मैं उसे नहीं देख सकती, मगर उसके हाथों में मौजूद तेज धारवाले औजार की खड़खड़ाहट सुन सकती हूँ।

परेशान के नुमाइंदे मेरी बेबसी पर प्रतिरोध करते हैं, वो गुनगुनाते हैं :

फकत खौफ से मुहब्‍बत की जा सकती है / खौफ से मुहब्‍बत चेतनशील होने की निशानी है / फकत खौफ, हर तरफ मुहब्‍बत खौफ का राज हो / फकत खौफ से मुहब्‍बत की जा सकती है। मिलरोज और अस्‍पताल का मालिक परेशान के नुमाइंदों को खामोश करने में नाकाम रहते हैं।

मेरे सर के पीछे खड़े शख्‍स को इशारा किया जाता है। अचानक मशीन और तेजधार पुर्जों के चलने की आवाज बाकी तमाम आवाजों पर हावी हो जाती है। ज्‍यों ही मैं खुद को ओझल होते महसूस करती हूँ छत पर लगी रोशनियों से परेशान का चेहरा झाँकता है। उसकी आँखों में बिजलियाँ कौंध रही हैं। आवाज की कड़क से कायनात पर साये पड़ रहे हैं।

मैं उम्र भर परेशान से जुड़ी रही हूँ और मुझे पहले दिन ही मालूम हो गया था कि ये जुड़ाव बीसवीं मंजिल से छलाँग है, गले में पड़ी रस्‍सी है, दिल पर रखे खंजर की नोक है।

  • हसन जमाल ‘शेष’ पत्रिका के संपादक हैं।

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