साध्वी
साध्वी

हल्के रंग के परिधान में
अपने कई हमसफरों के साथ
सूखी रोटी-सी मरियल
पुस्तक मेले के एक साफ-सुथरे छोटे स्टाल पर
वह खड़ी है
शताब्दियों से

उसके चेहरे पर है
न कोई कामना
न कौतूहल
न कोई रोमांच
जैसे सूख गया हो कोई कुआँ
और छा गई हो उसके मुहाने पर
उदासी की घास

सब कहते हैं
उसे साध्वी

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कहती हैं उसकी आँखें
चीख-चीखकर
साध्वी नहीं, मैं एक स्त्री हूँ

मेरे भी उन्नत वक्षों में होती है सुरसुराहट
रजस्वला होती हूँ हर माह
मेरे भी गर्भ में
मचा सकते हैं ऊधम
नन्हें-नन्हें दो पाँव
कोई नहीं सुनता
उनकी चीख
दुनिया इन तमाम चीखों से भरी पड़ी है
बेहिसाब ऐसी गलतियों से भरी
करता नहीं जिसे कोई ठीक

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पिता, भाई, चाचा, दोस्त
खो गए हैं उसके भीतर
वह लड़का भी
शाम के झुटपुटे में
जिसने चूमा था
गर्दन के पीछे
उसके खुले हिस्से को

लेकिन वह
भूले से भी नहीं खोजती उन्हें
न जाने कब
कोई पुकार ले उसे
पुराने नाम से

पुराना नाम सुनकर वह हौले से दबाती है
अपनी नई देह की सिहरन

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धर्मग्रंथ बेचते हुए
जब कोई पुरुष भंगिमा करती है उसे बेचैन
क्रोध से काँपने लगता है
उसके गले से लटका धर्मचिह्न
और वह छटपटाने लगती है
दो पल्लों बीच फँसी तितली की तरह

वह साध्वी नहीं
है चलती-फिरती एक देह
खोजती हुई अपनी आत्मा
इस मायावी दुनिया में

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