Tushar Dhawal
Tushar Dhawal

लौटता हूँ उसी ताले की तरफ 
जिसके पीछे 
एक मद्धिम अँधेरा 
मेरे उदास इंतजार में बैठा है

परकटी रोशनी के पिंजरे में 
जहाँ फड़फड़ाहट 
एक संभावना है अभी

चीज-भरी इस जगह से 
लौटता हूँ 
उसके खालीपन में 
एक वयस्क स्थिरता 
थकी हुई जहाँ 
अस्थिर होना चाहती है

मकसद नहीं है कुछ भी 
बस लौटना है सो लौटता हूँ 
चिंतन के काठ हिस्से में

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पक्ष एक और भी है जहाँ 
सुने जाने की आस में 
लौटता हूँ 
लौटने में 
इस खाली घर में

उतारकर सब कुछ अपना 
यहीं रख-छोड़ कर 
लौटता हूँ अपने बीज में 
उगने के अनुभव को ‘होता हुआ’ 
देखने

लौटता हूँ 
इस हुए काल के भविष्य में

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