कहाँ जाऊँ
कहाँ जाऊँ

कहाँ जाऊँ किस जमीन पर
जहाँ बची रहे मेरी कविता में थोड़ी सी हरियाली
जहाँ बैठ कर लिखूँ
लिख सकूँ कि हम सुरक्षित हैं

कहाँ जाऊँ किस दरख्त पर
जहाँ मिल सके एक खुशहाल फरगुद्दी
चुलबुलाते चुज्जे
और मैं कहूँ कि पृथ्वी पर पर्याप्त अन्न है
कि चिन्ता की कोई बात नहीं

किस बाग में बैठूँ किस बरगद के नीचे
जहाँ बूढ़े सो रहे हों सकून की नींद
बच्चे खेल रहे हों गुल्ली डंडा
और मेरे रोम-रोम से निकले स्फोट –
धन्यवाद… धन्यवाद

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किस गली से गुजरूँ किस मुहल्ले से
जहाँ ढील हेरती औरतें
गा रही हों झूमर अपनी पूरी मग्नता में
लड़कियाँ बेपरवाह झूल रही हों रस्सियों पर झूले
मचल रहे हों जनमतुआ बच्चे अघाए हुए

किस गाड़ी पर चढ़ूँ किस एक्सप्रेस में
जो सरकती हो हरनाथपुर के उस चौपाल तक
जहाँ मंगल मियाँ के ढोलक की थाप पर
होती है होरी
कान पर हाथ रखे करीमन यादव गाते हैं विरहा
और सजती है निठाली हरिजन की सिनरैनी

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कैसी कविता लिखूँ कैसे छन्द
कि समय का पपड़ाया चेहरा हो उठे गुलाब
झरने लगे लगहरों के थनों से झर-झर दूध
हवा में तैरने लगे अन्न की सोंधी भाप

किसकी गोद में सो जाऊँ किस आँचल की ओट में
कि लगे
कि बस मर जाऊँ
और क्षितिज तक गूँज उठे निनाद
धन्य हे पृथ्वी… धन्यवाद… धन्यवाद

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