जनशताब्दी एक्सप्रेस
जनशताब्दी एक्सप्रेस

उन्होंने उससे पूछा :

”कौन है तुम्हारे साथ ?”
डिब्बे में बहुत लोग थे
शाम का अखबार पढ़ती सजग बनी ठनी स्त्रियाँ
तापमान पर बहस करते बुजुर्ग
कानों में संगीत खोंसे युवा बाल उड़े अधेड़
निस्पृह बाहर ताकती लड़कियाँ,
पता नहीं कौन था उसके साथ बोलता तक नहीं

आखिर कौन है उसके साथ ?

जो भी है उसके साथ, इसी डिब्बे में है
इस यकीन के साथ वह अपनी जगह से उठी
नींद सी में एक एक कदम उठाती
बारी बारी से चेहरों को ताकती
चश्मा सँभालती माथे पर पल्लू खिसकाती,
चमक रहा था उसका मस्टर्ड देहातीपना
नाक की फुल्ली, हड़ियल उँगली में अष्टधातु का छल्ला

उसकी शक्ल कुछ कुछ पहचानी सी, डर लगा
कहीं हमारी तरफ न इशारा कर दे कह दे,
हम हैं उसके साथ,
बचपन वाला नाम लेकर बुलाने लगे
तब कहाँ से लाएँगे उसका टिकट, उसका जुर्माना भरेंगे ?

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या कह देंगे, हम नहीं हैं उसके साथ

इस डिब्बे में उसकी वैधता की पड़ताल करने वाले
उसके साथ क्या बर्ताव करेंगे ? टिकट नहीं है
बटुआ भी नहीं हुआ उसके पास तो क्या कहेगी ?
उन्होंने उसे छोड़ भी दिया तो भीड़ में किससे कहेगी,
उसे कहाँ जाना था ?
सब तो अपने जैसे दिखते हैं उसे किसके साथ जाना था ?

गाड़ी अपनी रफ्तार से भागी जा रही है
वे जोर देकर उससे पूछ रहे हैं,
कौन है उसके साथ ?
कैसी तो हो गई है हमारी याददाश्त !

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