एक प्रेमकविता...
एक प्रेमकविता...

आज दोपहर
मेरे जीवन के भीतर एक औरत चली जा रही थी
गुस्से में
अपने चार साल के बच्चे के साथ

बच्चे के कंधे पर बस्ता था
बस्ता चार किलो से ज़्यादा था
किताबें भारी थीं
भारी था उत्तरआधुनिक ज्ञान
औरत का मन भी हल्का नहीं था
किताबों में औरत के मन का ब्यौरा नहीं था

तब भी बच्चे ने कहा –
मम्मा अब मैं अच्छा बच्चा बनूँगा

औरत अब सुबक पड़ी थी
और बच्चे से बस्ता माँग रही थी
बच्चा फिर कह रहा था अब मैं अच्छा बच्चा बनूँगा
औरत फिर सुबक रही थी
आँसू दिखाई देने लगे थे
वह उन्हें पोंछ रही थी

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घर थोड़ा आगे था
घर के रास्ते में सीढ़ियाँ थी बहुत सारी
बच्चा हाँफते हुए उन्हें गिन रहा था
औरत हालाँकि बस्ता नहीं उठा रही थी
फिर भी थकी हुई थी
पसीने से भीगी

मेरे जीवन के भीतर वह औरत थी
अपने बच्चे के साथ
घर के भीतर जाती हुई वह मानो जीवन से
बाहर जाती थी

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जहाँ वह बच्चा था कहता हुआ अब मैं
अच्छा बच्चा बनूँगा
जहाँ वह औरत थी आँसू पोंछती बच्चे से
बस्ता माँगती

ग़लत थी या सही
बढ़िया थी या घटिया
उसे होना चाहिए था या नहीं
पर ठीक वहीं

मेरी कविता थी
बगटुट भागती
रास्ते पर उसे कुछ कुत्ते खदेड़ते थे
जिन्हें मैं पुचकारता
अचानक ही ख़ुद को कवि मान बैठा था !

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