वे आती थीं
वे आती थीं

बेटियों की कठिनाई कुछ यों भी थी
कि वे देख नहीं सकती थीं
बूढ़ी अकेली माँ के पास
सौदे सुलफे का न होना
बिजली का बिल चुक न पाना
कपड़ों का फटते जाना

वे आती थीं चाहे जैसे
कभी कभार छुप छुपा के
कभी दो चार दिन में
कभी छटे छमाहे

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वे बनवा देतीं माँ के
टूटे दाँत
कभी-कभी त्योहारों से पहले
झड़वा देतीं घर के जाले

समझाती माँ को
कि वह दुख न करे
यह तो होता है हर घर में

बेटियाँ आँसू पोंछ लेती थीं अपने
चुपके से लौटते समय
कहती थीं मन-ही-मन
‘माँरी, तू मर क्यों नहीं जाती
काहे को बैठी है –
क्या पाना बाकी तुझे
सिवा अपमान के…’

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ऊपर से कहतीं वे हँस के,
‘दवा ले लेना समय पे
आऊँगी जल्दी ही मैं
कॉलेज की छुट्टियाँ होते…’

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