उपेक्षा
उपेक्षा

इस तरह उपेक्षा मेरी, 
क्यों करते हो मतवाले! 
आशा के कितने अंकुर, 
मैंने हैं उर में पाले।।

विश्वास-वारि से उनको, 
मैंने है सींच बढ़ाए। 
निर्मल निकुंज में मन के, 
रहती हूँ सदा छिपाए।।

मेरी साँसों की लू से 
कुछ आँच न उनमें आए। 
मेरे अंतर की ज्वाला 
उनको न कभी झुलसाए।।

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कितने प्रयत्न से उनको, 
मैं हृदय-नीड़ में अपने 
बढ़ते लख खुश होती थी, 
देखा करती थी सपने।।

इस भाँति उपेक्षा मेरी 
करके मेरी अवहेला 
तुमने आशा की कलियाँ 
मसलीं खिलने की बेला।।

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