तितली

जितनी तेजी से दो पटरियों पर दौड़ती रेलगाड़ी भाग रही थी, उसमें बैठे लोग भी अपने पीछे कुछ छोड़ते हुए भागे जा रहे थे और उतनी ही तेजी से रेलगाड़ी की खिड़की से दिखता बाहर का संसार – घर, दुकान, पेड़, जानवर, खेत, ईंटों के भट्टे, दीवारें, उन पर लिखे विज्ञापन पीछे छूटे जा रहे थे। जितनी जल्दी लोगों को आगे पहुँचने की थी, उतनी ही उनके नीचे खिसकती जमीन को पीछे छूटने की, और हुआ भी ऐसा ही लोग पटरियों पर फिसलते आगे निकल गए और जमीन पीछे छूट गई।

ऐसे ही एक दिन अपनी जमीन से दूर निकल आए थे श्री नारायण सक्सेना, जो फिर कभी इतनी तेजी से वापस नहीं लौट सके, अपने गाँव, जो कानपुर देहात में था। उसके बाद श्री नारायण सक्सेना ने गाँव से दिल्ली का सफर, नींद में कुछ बड़बड़ाते हुए कई बार किया था और रेलगाड़ी की खिड़की से हाथ निकालकर एक मुट्ठी गाँव भर लेना चाहा था, लेकिन नींद टूटने पर मुट्ठी में सिर्फ पसीना ही होता था, जिसमें प्रेस के कागज और मशीनों की गंध आती थी। खैर उसके बाद उन्होंने दिल्ली में और दिल्ली से बाहर कई यात्राएँ कीं, लेकिन अपने जीते जी वह दिल्ली से कानपुर देहात में बसे अपने छोटे से गाँव, छिरोला तक का सफर तय नहीं कर सके, पर नींद में गाँव तक जाकर लौट आने से मिला संतोष का भाव उनके चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान खिला देता था और अब वही मुस्कान उनकी सुनहली फ्रेम में जड़ी एक तसवीर का हिस्सा थी। श्री नारायण सक्सेना की यह तसवीर दिल्ली के एक एम.आई.जी. फ्लैट के ड्राइंग-कम-डाइनिंग कहे जाने वाले कमरे में खाने की टेबल के ऊपर टँगी थी। आठ साल पहले स्वर्गीय हो चुके श्री नारायण सक्सेना का यह फ्लैट दिल्ली के द्वारका इलाके में था, जिसे उन्होंने तब खरीदा था, जब वहाँ मेट्रो सेवा नहीं थी और श्री नारायण सक्सेना को वहाँ से आई.टी.ओ. स्थित प्रेस, जिसमें वह प्रूफ-रीडर थे, तक पहुँचने के लिए तीन बसें बदलनी पड़ती थीं। तब वहाँ फ्लैट की कीमतें कम थीं, फिर भी श्री नारायण सक्सेना और उनकी पत्नी की आधी से ज्यादा तनख्वाह हाउसिंग लोन चुकाने में चली जाती थी। उनकी पत्नी द्वारका में ही एक प्राइवेट स्कूल में, पाँचवी तक के बच्चों को पढ़ाती थीं।

श्री नारायण सक्सेना का देहांत आठ वर्ष पूर्व दिल का दौरा पड़ने से हुआ था, जिसका कारण डॉक्टर ने ज्यादा धूम्रपान और शहर में बढ़ते प्रदूषण को बताया था। बाकी की वजहें डॉक्टर नहीं जान पाया था। उसके पास पीछे छूटते गाँव के सपने को देखने और उसके बाद जाग कर माथे के पसीने को पोंछने के बीच दिल पर पड़े प्रभाव को नापने का कोई यंत्र नहीं था। इस शहर में एक आम आदमी को दो बेटियों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाने और उन्हें सुरक्षित रखने के तनाव से दिल पर पड़ने वाले असर को भी वह भूल गया था। शायद इसी को हल्का करने के लिए श्री नारायण सक्सेना ब्लड-प्रेशर के मरीज होते हुए भी सिगरेट पी लिया करते थे।

अब श्री नारायण सक्सेना दिल्ली में और इस परिवार की कहानी में सुनहली फ्रेम वाली तसवीर में सिमट गए थे, जिसके नीचे पड़ी टेबल पर उनकी पत्नी, जिन्हें श्री नारायण ‘अंशु की माँ’ कहकर बुलाते थे, उनकी मृत्यु के आठ साल बाद भी, सुबह-शाम अगरबत्ती जलाती थीं। आज शाम भी वह अगरबत्ती जला कर श्री नारायण की तसवीर देख रही थीं।

तभी फोन की घंटी बजी। उन्होंने कुछ काँपते हाथों से फोन उठाया। उनकी बड़ी बेटी अंशु का फोन था। अंशु अपनी एडवरटाईजिंग की पढ़ाई खत्म कर एक ऐड एजेन्सी में ट्रेनिंग ले रही थी। ”आज वह देर से घर आ सकेगी” उसने अपनी माँ को फोन पर बताया था।

अंशु की माँ ने अंशु के पिता की ओर देखा। वह सुनहली फ्रेम वाली तसवीर में मुस्कुरा रहे थे। मानो कह रहे हों ”बच्चे हैं, अंशु की माँ” और फिर उन्होंने अंशु को इजाजत दे दी थी।

दूर तक फैली सड़क के किनारे चमचमाती बत्तियाँ, रात में ऐसी लगती थीं, मानो सितारों को किसी ने एक कतार में रख दिया हो। दूधिया रोशनी में सड़क पर दौड़ती कारें, किसी काली नदी पर नावों-सी बहती थीं। उन्हीं में से एक पर सवार थी अंशु। हवा उसके बालों से लगातार खेल रही थी। दूसरी ओर से आती हुई गाड़ियों की रोशनी उसके चेहरे पर रह-रह कर पड़ती, जिसमें उसकी आँखों की चमक साफ दिखती। वह बहुत खुश थी। मगर उसकी खुशी में एक अजीब-सा कौतूहल था। आज वह सजल से पहली बार ऑफिस से बाहर मिलने जा रही थी। सजल का अंदाज सहज ही प्रभावित कर लेने वाला था। उसकी बातों में एक प्रवाह था। उसकी आँखें बहुत दूर कहीं देखती हुई लगती थी। सजल बैंगलोर में रहता था और अक्सर अपने काम के सिलसिले में दिल्ली आया करता था। अपने पिता के कई मित्रों के दिल्ली में होने के बावजूद भी वह दिल्ली में किसी होटल में ही कमरा लेकर रुका करता था। दिल्ली में उसकी कंपनी के विज्ञापन संबंधी काम वही एजेंसी देखती थी, जिसमें अंशु ट्रेनिंग ले रही थी। उसी ऐड एजेन्सी के ऑफिस में सजल और अंशु की मुलाकात हुई थी। अंशु दिल्ली में पली-बढ़ी थी, पर उसके नैन-नक्श और हाव-भाव में कहीं कानपुर देहात का अल्हड़पन और मासूमियत छुपी थी, जो उसके आधुनिक परिधानों, अँग्रेजी में बातचीत और दिल्ली के तौर-तरीके के बीच कहीं से छलक जाती थी। यही बात अंशु को दिल्ली की उन तमाम गोरी-चिट्टी और बहुत कम उम्र में ही दुनियादारी समझने वाली अन्य लड़कियों से अलग करती थी और शायद खूबसूरत अंशु की हल्की-सी झिझक लिए हुए बातचीत करने के ढंग से पैदा हुई कशिश ही सजल को किसी शक्तिशाली चुंबक की तरह उसकी ओर खींचती थी, पर सजल अपने-आपको संयत रखता था। सजल की आँखें और उनमें तैरता आत्मविश्वास अंशु को बहुत भाता था। इसी लिए मुलाकात के पहले दिन से ही वह सजल की किसी बात को न नहीं कह सकी थी। अब तक की मुलाकातें ऑफिस या ऑफिस के नीचे बने कैफे में ही हुई थीं। सजल बहुत बातें करता, अंशु उसे एकटक देखती रहती। जैसे उसकी बातों में बसे किसी संगीत को सुन रही हो। सजल की कहीं दूर देखती आँखें और मुस्कुराता हुआ चेहरा उसे बहुत भाते थे। सजल की मुस्कुराहट में उसे अपने पिता श्री नारायण सक्सेना की उसी मुस्कुराहट की झलक मिलती थी, जो उसके फ्लैट में टँगी सुनहली फ्रेम वाली तसवीर में से बिखर कर द्वारका स्थित फ्लैट को उसका घर बनाती थी। सजल के चेहरे की वह मुस्कुराहट उसे अपने भविष्य के किसी घर के सपने का आभास देती थी। हालाँकि अब तक वह दोनों सिर्फ अच्छे दोस्त ही थे।

अंशु तब चौदह वर्ष की थी और दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही थी, जब उसके पिता श्री नारायण सक्सेना का देहांत हो गया था। दिल्ली की चकाचौंध और युवा मन के सपनों के बीच अपनी छोटी बहन बिन्नी के साथ बड़ी होती अंशु पर पिताजी के जाने के बाद जो जिम्मेदारी आ गई थी, अंशु उसे समझती थी, पर कभी-कभी उसके मन में एक तितली अनजाने ही अपने पंखों के रंग बदलने लगती थी। उसे खुला नीला आसमान पुकारने लगता था, तभी पिताजी की तसवीर से देखती आँखें उस तितली के पंखों पर एक बोझ रख देती थी, जिससे वह उस नीले आसमान से मुँह फेर लेती थी। अंशु अपने पिताजी के बहुत करीब थी और आज भी उनकी तसवीर से अकेले में बातें किया करती थी। कल शाम जब वह ऑफिस से घर लौटी तो बहुत खुश थी। उसने बड़े ही संकोच के साथ सबकी नजर से बचकर पिताजी की तसवीर से कहा था ”आई रियली लाइक हिम”। अभी भी अंशु के मन में जो चीज धीरे-धीरे घुल रही थी, वह थी सजल की मुस्कुराहट। वह उसी के बारे में सोचती चली आ रही थी। तभी एक झटके के साथ गाड़ी रुकी।

ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाजा खोला। अंशु बाहर निकली तो उसके सामने एक आधुनिक ढंग से बनी कोठी थी। अंशु आगे बढ़ती, उससे पहले ही सजल अपने दोस्त अभि के साथ कोठी से बाहर निकला। अभि एक लंबे कद का लड़का था, जिसके बाल बढ़े हुए थे और उसके शरीर को देखने से उसके मॉडल होने का आभास होता था। उसका शरीर जिम में कई घंटों के वर्कआउट से तराशा गया लगता था। सजल ने अंशु का परिचय अभि से करवाया। अभि ने अंशु से हाथ मिलाते हुए अंशु का स्वागत किया था। यह अभि की ही कोठी थी। आज सजल ने अंशु को यहीं पार्टी के लिए आमंत्रित किया था। अंशु को ऑफिस से लाने के लिए अभि ने ही अपनी गाड़ी भेजी थी।

अभि, सजल और अंशु को लेकर कोठी के अंदर बने बड़े हॉल में आ गया। हॉल में सुनीत, अनिल और रिया, जो अभि और सजल के दोस्त थे, पहले से ही मौजूद थे। सुनीत और अनिल दोनों को ही मोटा कहा जा सकता था। दोनों की लो वेस्ट जीन्स, उनकी बाहर निकली तोंद के कारण कुछ ज्यादा ही नीचे खिसकी लग रही थीं। उन दोनों में अनिल कुछ ज्यादा ही मोटा था और उसने अपने बालों को जैल लगाकर खड़ा कर रखा था। रिया गोरे रंग की, गदराए शरीर वाली, फैशनेबल लड़की थी, जिसने टाईट स्कर्ट और स्लीवलेस टॉप पहन रखा था। हॉल में मद्धम रोशनी फैली थी और हल्का संगीत बज रहा था, जो कोई अँग्रेजी म्यूजिकल एलबम का उत्तेजनापूर्ण पर धीमी गति से आगे बढ़ता हुआ गीत था, जिसमें प्रेम-निमंत्रण करती गायिका की आवाज बड़े भारी और गहरे गले से अपने अंगों में भरे मांसल सौंदर्य का बखान कर रही थी। उसका आमंत्रण अपने प्रेमी या किसी अज्ञात नायक के लिए नहीं था, बल्कि हर उस दृष्टि से था, जो उसकी देह पर पड़ रही थी। उसके साथ बजती रिद्म वैसी ही थी, जैसी शकीरा या मैडोना के या अन्य किसी पाश्चात्य पॉप सिंगर के गीतों में बजती है और जिसकी परिणति एक ऐसे उन्मादपूर्ण वातावरण में होती है, जहाँ चेहरे, संस्कृति, भाषा, भाव सब गौण हो जाते हैं और देह की मांसलता, उसका आकार एवं अनुपात आँखों के कैमरे से जूम करके देखा जाता है।

अंशु के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। वह जब भी ऑफिस या कॉलेज के अलावा घर से बाहर जाती थी तो उसकी माँ या छोटी बहन उसके साथ होती थीं। आज अंशु अपने घर और ऑफिस से दूर थी। अकेली थी। और सामने था सजल। अंशु के युवा मन में बैठी तितली के पंखों का रंग धीरे-धीरे बदल रहा था। उन पर लाल, नीले, गुलाबी और कई रंगों के चमकीले धब्बे उभर रहे थे। उसके पंख फैलकर बड़े हो गए थे।

सजल ने अंशु का सभी से परिचय करवाया। अनिल, जो अपेक्षाकृत मोटा था और जिसने बालों को जैल लगा कर खड़ा कर रखा था ने आगे बढ़ कर, हॉल के एक कोने में रखी वाईन की बॉटल उठा कर उसे लंबे गिलासों में पलटना शुरू कर दिया, और ”लेट्स बिगिन” के घोष के साथ पार्टी का आगाज किया।

सुनीत, जिसकी आँखें किसी शरारती बच्चे जैसी थी, ने म्युजिक की सी.डी. में सांग नंबर बदल कर वॉल्युम बढ़ा दिया। अब गीत तेजी से आगे बढ़ता हुआ सामूहिक उन्माद को, पूरी उत्तेजना से शरीर के अंग-अंग में उतार लेने का आह्वान कर रहा था। सुनीत ने अंशु को हॉल के बीच में डांस करने के लिए कहा। अंशु कुछ झिझकती हुई सजल और दोस्तों द्वारा बनाए गए घेरे के बीच थिरकने लगी।

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अनिल ने सभी के हाथों में वाईन के गिलास थमा दिए और एक गिलास अंशु की ओर बढ़ाते हुए कहा ”इट्स योर ड्रिंक”, अंशु ने बहुत संक्षिप्त उत्तर दिया ”नो थैंक्स” अनिल ने अपने जैल लगे बालों में उँगलियाँ फिराते हुए कहा ”कम ऑन, इट्स कूल …यू विल बी कंफर्टेबल”। अंशु ने गिलास थाम लिया। अब गीत की गति मंथर थी और उसमें कोई धीरे-धीरे फुसफुसा रहा था, साथ में गिटार बज रहा था और गायक नदी, पहाड़, पेड़, समंदर सभी से अपनी जगह छोड़ कर, अपना रूप बदल कर आसमान में उड़ने के लिए कह रहा था।

अंशु और सजल एक साथ डांस कर रहे थे। सजल की आँखें जो बहुत दूर देखती हुई लगती थीं, इस समय अंशु को देख रही थी और शायद उसको देखते हुए उसके पार निकल गई थीं। उसके मन में बैठी तितली के पंखों के रंग अब तेजी से बदल रहे थे, वे अब पहले से ज्यादा चटक थे। गीत की गति धीमी और आवाज किसी गहरी सुरंग से आती हुई लग रही थी।

तभी अभि ने अंशु से साथ डांस करने का आग्रह किया था। अब अंशु, अभि के साथ डांस कर रही थी पर उसकी नजरें सजल पर ही जमीं थीं, जो अब रिया के साथ धीरे-धीरे थिरक रहा था। अंशु के लिए जैसे यह सब कुछ एक स्वप्न जैसा था, जो अभी घड़ी के अलार्म या माँ की आवाज से टूट जाने वाला था। वह रह-रह कर उसमें डूबना चाहती थी। तभी अभि ने उसकी गहरे नीले रंग की लो वेस्ट जीन्स और गुलाबी स्लीवलेस टॉप के बीच से झाँकती कमर पर हाथ रखते हुए पूछा था ”आर यू कंफर्टेबल”? अंशु के शरीर में एक अनचाही झुरझुरी फिर गई थी। उसने सिर्फ हाँ में सिर हिलाया था। तभी अनिल ने म्यूजिक ऑफ करते हुए कहा था ”आई एम हंग्री यार”, उसी क्षण अंशु की नजर घड़ी पर पड़ी ”ओह, इट्स इलेवन थर्टी”। सजल ने अंशु की ओर बढ़ते हुए कहा ”डोंट वरी, मेक ए कॉल टू योर मॉम”, अंशु ने अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर देखा था ”ओह, इट्स डिस्चार्ज्ड” सजल ने अपना फोन अंशु की ओर बढ़ा दिया।

अंशु की माँ की नजर फोन और घड़ी के बीच घूम रही थी। अंशु की माँ ने अपने पति के देहांत के बाद हरेक दिन दो-दो जवान होती बेटियों के साथ डर-डर कर काटा था। वह किसी अनिष्ट की आशंका से हमेशा सहमी रहती थीं। यह वही समय था जब दिल्ली में महिलाओं को रोज किसी नए तरीके से हवस का शिकार बनाया जा रहा था। आँकड़े दिल्ली को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित महानगर घोषित कर रहे थे। इन अपराधों में शामिल लोगों का पहले कोई पुलिस रिकॉर्ड नहीं था। घर, सड़क, पार्क या कोई भी सार्वजनिक स्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं बचा था। कभी अजनबी तो, कभी रिश्तेदार, तो कभी पति और पिता तक महिलाओं के साथ कुकृत्यों में शामिल हो रहे थे। अंशु की माँ ने अपने मन का डर निकालने के लिए, अपने पति की तसवीर की ओर देखा। उन्हें लगा मानो कह रहे हों ”आती ही होगी” तभी फोन की घंटी बजी।

घंटी बजते ही, उन्होंने फोन उठा लिया, ”कहाँ हो तुम, कितनी देर लगेगी घर आने में? …देख अकेली मत आना, इतनी रात में। तुम्हारे दोस्तों में से ही कोई तुम्हें घर छोड़ देगा। ठीक है, देख बेटा, अपना ध्यान रखना।” …और फोन कट गया।

अभि ने सबको डिनर के लिए डाइनिंग टेबल पर बुला लिया था। खाना खाते हुए, अभि ने अंशु की ओर देखते हुए कहा था ”सजल यू आर लकी यार टू हैव ए ब्यूटिफुल फ्रेंड लाइक अंशु”। अंशु कुछ झेंप गई थी। अभि ने आगे कहा ”रियली, अंशु मेड दिस ईवनिंग ब्यूटिफुल”। रिया ने वाईन का गिलास खाली करते हुए अंशु की ओर देखा। अंशु हँस दी ”आई एन्ज्वाइड ए लॉट। थैंक्स फॉर द लवली पार्टी”। अनिल जिसका पूरा ध्यान खाने पर था, बीच में ही बोल पड़ा ”या गुड फूड”। सभी उसकी ओर देख कर हँस पड़े। अभि ने अंशु की ओर देखते हुए पूछा ”आर यू ओ.के. नाउ?” अंशु ने झिझकते हुए कहा ”या, आई एम फाईन, …बस …मैंने पहले कभी ड्रिंक्स नहीं ली, …अगर माँ को पता चला तो!”

”डोंट वरी, टेक दिस”, अभि ने छोटी-सी सफेद टेबलेट अंशु की ओर बढ़ा दी और कहा ”इट विल रीफ्रैश योर ब्रेथ”। अंशु ने टेबलेट मुँह में डाल ली, और सजल की ओर देखते हुए बोली ”अब मुझे चलना चाहिए” अंशु और सजल दोस्तों से विदा लेकर बाहर निकल आए, अभि भी गाड़ी की चाबी लेकर बाहर आ गया और बोला ”ड्राइवर तो जा चुका है, मैं तुम लोगों को ड्रॉप कर देता हूँ”। अनिल ने बाहर निकल कर चिल्लाते हुए कहा ”वी विल कॉन्टिन्यू द पार्टी”।

अभि ड्राईविंग सीट पर था, सजल उसके साथ वाली सीट पर और अंशु पीछे की सीट पर बैठी थी। काली-लंबी, विदेशी कार रात के सन्नाटे में तेजी से दौड़ रही थी। कार में ए.सी. की ठंडक और हल्का संगीत, जिसमें गिटार पर कोई पश्चिमी धुन बज रही थी, अंशु की पलकों को और भी बोझिल कर रही थी। अभि ने कार सजल के होटल के सामने रोक दी। सजल ने उतरते हुए अंशु को ”बाय” कहा, पर अंशु ने आँखें मूँदी हुई थी। शायद वह नींद में थी या शायद नशे में, सजल अभि को गुड-नाइट कहकर होटल की सीढ़ियाँ चढ़ गया था।

सजल को छोड़ने के बाद काली, लंबी, विदेशी कार जिसके शीशे भी काले थे खाली सड़कों पर कुछ देर दौड़ने के बाद एक सुनसान सड़क के किनारे आकर ठहर गई थी। कुछ देर बाद कार फिर चल पड़ी थी। अब अभि ने अपनी ओर का शीशा नीचे कर रखा था और सिगरेट सुलगा ली थी।

…और कार शहर में मकड़ी के जालों की तरह फैली सड़कों और चौराहों से गुजरती हुई अँधेरे-उजालों में तैरने लगी थी। …और कुछ देर बाद अंशु की सोसाइटी के सामने जाकर रुकी थी।

अभि ने अंशु को आवाज दी, पर अंशु गहरी नींद में थी। अभि ने उतर कर पीछे का दरवाजा खोल कर, उसके गाल को थपथपाते हुए कहा ”अंशु घर आ गया”। अंशु आँखें नहीं खोल पा रही थी। तभी अभि ने कंधों को पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा ”कम ऑन अंशु, घर आ गया”। इस बार उसने आँखें खोलीं तो सामने अपनी सोसायटी देखकर, एक झटके से कार से बाहर आ गई। उसका सिर भारी था। उसने आँखें फैला कर घड़ी देखी थी, जो रात के दो बजा रही थी। सजल वहाँ नहीं था। अंशु ने अपनी बाँह छुड़ाते हुए कहा था ”इट्स ओ.के. …गुड नाइट” और वह अपने आप को सँभालती, अपनी घबराहट दबाती हुई, सोसायटी के गेट के अंदर चली गई थी।

फ्लैट की घंटी बजने से पहले ही माँ ने दरवाजा खोल दिया। अंशु सीधी अपने कमरे में चली गई। माँ ने उससे कुछ नहीं कहा। वह गुस्से में बात नहीं करती थीं। वह बत्ती बुझाकर अपने कमरे में सोने चली गई थीं। जहाँ बिन्नी, उनकी छोटी बेटी उनके साथ ही सोती थी।

अंशु ने अपने कमरे में पहुँच कर, कपड़े बदलने के लिए अपना नाइट गाउन उठा लिया। अपना टॉप उतारने से पहले ही उसे अचानक एहसास हुआ, उसकी ब्रा का हुक खुला हुआ था। उसके माथे पर सलवटें पड़ गईं। उसने तेजी से बढ़ कर अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और एक झटके से टॉप उतार कर बेड पर फेंक दिया।

अब वह शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आपको ऐसे देख रही थी मानो अपनी छाती पर किसी घटना के सबूत ढूँढ़ रही हो। उसने कंधों पर झूलती ब्रा को भी उतार फेंका, पर कहीं कोई निशान न पा सकी। उसके मन की तितली के पंखों पर बने चटक रंगों के धब्बे हल्के होकर फैल गए थे। सारी रात वह उस तितली के पंखों पर किसी की उँगलियों के निशान ढूँढ़ती रही थी।

पार्टी में सजल की नजदीकी, ड्रिंक्स, दोस्त, डांस सब कुछ उसे अच्छा लगा था। यह सब कुछ उसके लिए बिल्कुल नया था, पर अभि की उसे घूरती आँखें, उसे अब भी चुभ रही थीं। उसके भीतर जवान होती औरत, जो कल रात सजल की बाँहों में पिघल कर बह जाना चाहती थी, जिसके भीतर पूरी शाम एक सिहरन समाई रही थी, जानना चाहती थी कि कल नींद में या नशे में उसके साथ क्या हुआ, आखिर किसने उसके मन में मचलती तितली को नीले आसमान में पंख फैला कर उड़ने से पहले, उसके पंखों को छू कर धुँधला करने की कोशिश की थी।

पर्दे से छन-छन कर धूप कमरे में आ रही थी। सजल ने आँखें खोलीं, तो सामने दीवार पर टँगी घड़ी में दस बज रहे थे। उसने फोन उठा कर रूम-सर्विस को चाय का ऑर्डर दिया, बेड से उठ कर खिड़की की ओर बढ़ते हुए, सिगरेट सुलगा ली और खिड़की पर पड़े पर्दे को एक ओर सरका दिया। बाहर आसमान साफ था और धूप तेज थी। होटल की खिड़की से बाहर, एक सड़क इंडिया गेट की ओर जाती दिख रही थी, जिस पर अनगिनत वाहन धीरे-धीरे रेंग रहे थे। सजल की आँखें दूर जाती सड़क को देख रहीं थी, उसे इसी दिल्ली में एक दिन अपना कारोबार बड़े स्तर पर फैलाना था, जिसकी शुरुआत वह पिछले वर्ष कर चुका था। दूर जाती सड़क को देखते हुए जैसे उसे कुछ याद आ गया। कल रात इसी लंबी सड़क पर अभि की काली, लंबी, विदेशी कार दौड़ती चली गई थी, जिसमें अंशु भी थी। उसने अपना मोबाइल उठाकर अंशु का नंबर डायल कर दिया। उसे दूसरी ओर से आती हुई अंशु की आवाज बहुत भारी सी लगी।

सजल ने उसके मूड का जायजा लेते हुए पूछा, ”हाउ इज द मॉर्निंग?”

अंशु ने छोटा सा जवाब दिया ”ठीक है”।

सजल ने फोन के दूसरी ओर से उठती भाप की गर्माहट महसूस की और अगला प्रश्न पूछा, ”क्या बात है, मूड ठीक नहीं लगता… हूँ?”

अंशु– ”हाँ… माँ बहुत नाराज हैं, अब मैं इस तरह लेट नाइट बाहर नहीं जाऊँगी”।

सजल– ”तो आपके लिए मैं पार्टी दिन में रख लूँगा।”

अंशु– ”आई एम नॉट जोकिंग …अब मैं किसी पार्टी में नहीं आने वाली।”

सजल– ”इज रियली समथिंग सीरियस?”

अंशु की आवाज भर्रा गई, ”नो… नथिंग।”

सजल ”यू आर साउंडिग अप-सेट।”

दूसरी ओर से एक पल को कोई आवाज नहीं आई।

सजल- ”मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।”

…तभी फोन कट गया।

रविवार का दिन था। दोपहर के बारह बजे थे। द्वारका स्थित अंशु के फ्लैट की कॉलबेल बजी, उसकी आवाज ऐसी थी जैसे किसी आहट से ढेरों पंछी चीं-चीं करते हवा में उड़ जाते हैं।

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बिन्नी ने दरवाजा खोला, सामने सजल खड़ा हुआ था। उसने मुस्कुराते हुए कहा था ”मैं सजल… वो अंशु से मिलना था।” बिन्नी ने मुस्कुराते हुए कहा था ”मैं जानती हूँ… प्लीज कम इन” उसके चेहरे पर जिज्ञासा थी। वह घर में अनायास सजल की उपस्थिति से उत्साहित थी। बिन्नी ने जोर से अंशु को आवाज दी थी – ”अंशु दीदी!”

उससे पहले ही अंशु ड्राइंग रूम में आ गई थी। वह सजल को घर में देख मुस्कुराना चाहती थी, पर उसके चेहरे पर मुस्कान आ नहीं पाई थी। वह सजल को बहुत कुछ एक साथ कह देना चाहती थी और इसी कोशिश में जैसे उसके भीतर सब कुछ आपस में उलझ गया था। सजल सोफे पर बैठ गया। उसकी आँखें अंशु पर जमी थीं और अंशु दीवार पर टँगी अपने पिता श्रीनारायण सक्सेना की तसवीर देख रही थी। भीतर ही भीतर सजल की उपस्थिति उसे गुदगुदा रही थी, पर उसके साथ ही उसे कुछ रोक भी रहा था। सजल ने अंशु की कशमकश को पढ़ते हुए उसके पास आकर पूछा था- ”व्हॉट्स रॉन्ग?”

अंशु ने उलझन भरे स्वर में इतना ही कहा था – ”अभि!”

”क्या किया अभि ने?” सजल ने आश्चर्य जताते हुए पूछा।

अंशु ने कोई जवाब नहीं दिया। तब सजल ने जोर देते हुए कहा – ”आई एम सॉरी, मुझे तुम्हारे साथ आना चाहिए था।” …पर फिर थोड़ा रुकते हुए आगे बोला – ”पर अंशु, अभि इज वेरी कूल गॉइ” …ही लव्स फ्रैंड्स, …एनी वे फॉरगेट इट …तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है, हम शाम को मिलते हैं।”

अंशु – ”नो, आई कांट मीट यू इन यॉर हॉटेल।”

सजल- ”आई नो दैट …नो पार्टी, नो हॉटेल, नो फ़्रैंड्स, बस मैं और तुम… मुझे ढेर सारी बातें करनी हैं।” उसने अंशु का हाथ थामते हुए कहा ”माई डियर, डियर, डियर अंशु! ”प्लीज, आज शाम हम कहीं बाहर चलेंगे, ऐसी जगह जहाँ सिर्फ मैं और तुम होंगे।” उसके बाद सजल की गहरी और दूर देखती हुई आँखें सिमट कर छोटी हो गईं और अंशु के चेहरे पर जम गईं। वह मुस्कुरा रहा था। अंशु की नाराजगी धुल गई थी, उसके भीतर की कशमकश और सजल की मुस्कुराहट में सजल की मुस्कुराहट जीत गई थी और अंशु भी मुस्कुरा दी थी। सजल की लगातार उसे देखती आँखों से उसकी मुस्कुराहट चेहरे पर खुल कर फैल गई थी।

सजल ने दरवाजे की ओर बढ़ते हुए कहा था ”देन सी यू इन द ईवनिंग” …बी रेडी बाई सेवेन… मैं तुम्हें पिक कर लूँगा।”

धूप फ्लैट की खिड़की से आगे खिसक गई थी। अंशु की माँ श्रीनारायण सक्सेना की तसवीर के नीचे अगरबत्ती जला रही थीं। सुनहली फ्रेम और काँच से मढ़ी तसवीर में श्री नारायण सक्सेना के साथ अंशु की माँ के चेहरे का प्रतिबिंब बन रहा था। जिस पर कल रात का गुस्सा कुछ हल्का होता लग रहा था। बिन्नी ने उन्हें सजल के बारे में कुछ बताया था। तबसे वह अंशु की शादी के बारे में सोचने लगीं थीं और फिर आज कुछ जल्दी ही श्री नारायण सक्सेना की तसवीर के आगे अगरबत्ती जलाने लगीं थीं।

तभी उन्होंने अंशु को अपने कमरे में तैयार होते देखा तो उनसे बिना बोले रहा नहीं गया।

उन्होंने पूछा, ”आज भी तुम कहीं जा रही हो?”

अंशु ने हाँ में सिर हिला दिया।

माँ ने आगे कहा ”पर सुबह तो तुम कह रही थीं, तबियत ठीक नहीं।”

अंशु – ”अब ठीक है।”

माँ – ”ठीक है …पर जल्दी आना, मैंने खाना बना लिया है।”

अंशु ने स्वयं को शीशे में देखते हुए जवाब दिया ”मैं खाना बाहर ही खाऊँगी”। माँ कुछ गुस्से से बोली – ”तो पहले बताना था ना …मैं तो कुछ कहती ही नहीं, जो जी में आए करो।” अंशु की माँ ने इससे ज्यादा सख्ती अपने बच्चों से कभी नहीं दिखाई थी। बिना बाप के लड़कियों को पालते हुए उन्होंने डाँटना-मारना तो दूर, उन्हें कभी तू भी नहीं कहा था। वह अपनी बेटियों से तुम कह कर बात करती थीं।

अंशु बिना कुछ कहे बाहर निकल गई। माँ ने पीछे से कहा, ”ज्यादा देर मत करना।”

सफेद रंग की लंबी कार सड़क पर दौड़ रही थी। सजल ड्राइव कर रहा था और उसकी बगल में बैठी अंशु, जिसने गहरे बादामी रंग की जीन्स और काले रंग का स्लीवलेस टॉप पहना था। सजल ने आसमानी रंग की टी-शर्ट और नीले रंग की जीन्स पहनी थी। उसकी कलाई पर बड़े डायल की घड़ी चमक रही थी, जो देखने वाले को उसके धनाढ्य होने का एहसास बिना कुछ कहे ही करा देती थी। दोनों के जिस्मों से उठती परफ्यूम की खुशबू मिल कर कार में फैल रही थी। धीमी आवाज में किसी इंडियन बैंड के एलबम का कोई गाना बज रहा था, जिसमें गायक लोकधुन को पॉप में लपेटकर कुछ अमेरिकन एक्सेंट में गा रहा था। जिसे युवा पीढ़ी फ्यूजन कहती है। दरअसल यह ऐसी मिली-जुली संस्कृति का ऐसा गड्ड-मड्ड संगीत था, जिसमें गीत और गायक दोनों के मूल को पकड़ पाना संभव नहीं था, पर इससे सजल की पसंद का अंदाजा होता था, जो देशी पकवान, विदेशी अंदाज में परोसे जाने का कायल था।

सजल ने बात शुरू करते हुए कहा – ”क्या हुआ, अभी तक परेशान हो?” बिना अंशु के जवाब का इंतजार किए उसने बोलना जारी रखा ”यू नो अंशु, हमारी प्रॉब्लम क्या है …हम लोग सोचते बहुत हैं, …बट आई बिलीव, इनसान को अपनी जिंदगी खुलकर, बिंदास जीनी चाहिए …कोई भी जब ज्यादा सोचने लगता है, तो जिंदगी उसे बाँधने लगती है।”

अंशु – ”हाँ, पर सबका अपना तरीका है… रफ्तार सब चाहते हैं …शायद मैं भी पर…” सजल बीच में ही बोला – ”पर तुम्हारी सोच स्पीड-ब्रेकर का काम करती है।”

तभी सजल ने जोर से ब्रेक लगाया। दोनों को एक झटका लगा।

अंशु ने पूछा, ”क्या हुआ?”

सजल – ”स्पीड-ब्रेकर।” और दोनों एक साथ हँस दिए।

”थैंक गॉड, तुम हँसी तो।” सजल ने मुस्कुराते हुए कहा।

सजल की नजदीकी, उसकी मुस्कान और उसकी बातों का प्रवाह अंशु के मन में एक सुखद लहर पैदा कर रहे थे। धीरे-धीरे उसके मन की तितली के कोमल पंखों पर बने रंगीन धब्बे चटक होकर फैलने-सिकुड़ने लगे थे। एक बार फिर वह आसमान में उड़ने के सपने देख रही थी। तभी उसे लगा था कि तितली अपने पंख पसार कर उसके भीतर तेजी से गोल-गोल घूमने लगी है। शायद उस तितली के पंखों पर फैलते-सिकुड़ते रंगों की चमक को सजल ने अंशु की आँखों में तैर आई नमी में देख लिया था। कोई ऐसी भाषा जिसमें शब्द नहीं थे, जो मौन होकर भी मुखर थी। उसमें दोनों के मन बातें करने लगे थे। कार में बजते गीत के शब्द रंगीन पानी के बुलबुलों की तरह दोनों के बीच तैर रहे थे, पर उसकी आवाज दोनों के कानों तक नहीं पहुँच रही थी। इन गहरे मौन के क्षणों में सजल ने अंशु के भीतर से निकलने के लिए उड़ती, पंख फड़फड़ाती तितली के पंखों की आवाज को सुन लिया था और एक अद्भुत भारहीनता के क्षण में उसने अंशु के हाथ को छुआ था। इस छुअन को अंशु ने बहुत भीतर तक अनुभव किया था। उस बिना शब्दों के संवाद में अंशु का रोम-रोम हिस्सा ले रहा था और उसने सजल का हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी गोद में रख लिया था। सजल ने अंशु की आँखों में देखते हुए पूछा था – ”क्या देख रही हो?”

अंशु ने गहरी साँस लेते हुए कहा था – ”तुम्हारे लिए सब कुछ कितना आसान है।”

सजल – ”क्योंकि मैं इतना सोचता नहीं… अब अगर तुम मुझे पसंद हो, तो हो, …आई लाइक यू डियर, आई लव यू।”

अंशु के बदन में करंट-सा दौड़ गया। सजल ने जो कुछ इतनी आसानी से कह डाला था, अंशु कब से यही सजल से कहना भी चाहती थी और सुनना भी, पर उसके भीतर कौन था, जो उसे ये तीन शब्द कहने से रोक लेता था। क्या सजल के लिए भी इन तीन शब्दों के वही मायने थे, जो अंशु के लिए थे। सजल के मुँह से निकले इन तीन शब्दों ने, जो सैंकड़ों भाषाओं में अनगिनत लोगों ने, अनगिनत लोगों से कहे थे, एक पल में अंशु को सजल का कर दिया था।

सजल ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा – ”डोंट यू लव मी?” यह कहते हुए उसने अंशु के हाथ को दबाया, और अंशु की आँखों में देखा फिर अंशु के जवाब का इंतजार करते हुए दूर जाती सड़क पर देखने लगा। अंशु ने सजल के हाथ को पकड़ कर अपने काँपते होठों से चूम लिया और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया, जहाँ कहीं आस-पास ही उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। शायद वहीं उसके मन की तितली भी पंख फैलाए बैठी थी और उसके दिल की धड़कनों को सुन रही थी। वह पंख फैलाए किसी भी पल नीले आसमान में उड़ जाने को तैयार थी। उधर सजल के चेहरे पर आत्मविश्वास और किसी को जीत लेने की खुशी थी।

गाड़ी एक लंबी सड़क पर दौड़ती हुई, फ्लाई-ओवर पर चढ़ती चली गई थी। कुछ देर की ड्राइव के बाद गाड़ी साउथ दिल्ली के एक बंग्लो के सामने रुकी थी। गाड़ी से उतरते हुए अंशु ने सजल से पूछा ”ये हम हैं कहाँ”। सजल ने जेब से चाबी निकालते हुए कहा ”यही है वो जगह, जहाँ होंगे सिर्फ मैं और तुम, हम यहाँ रुक कर चाहे जितनी बातें कर सकते हैं।”

अब दोनों बंग्लो के ग्राउंड फ्लोर पर उसके हॉल में आ गए थे, जिसकी सजावट अंग्रेजों के समय की थी, जो दीवार पर टँगी एक विदेशी महिला के चित्र, एक कोने में स्टूल पर सजी बन्दूक और शो-केस में सजे सोने और चाँदी के मोमेन्टोस से पता चलता था। कमरे के बीचों-बीच छत पर एक बहुत सुंदर फानूस लटक रहा था। सजल के बटन दबाते ही फानूस से कई रंगों का प्रकाश निकल कर कमरे में बिखर गया था। यह प्रकाश दीवारों पर अजीब-सी एक-दूसरे में उलझी हुई आकृतियाँ बना रहा था।

अंशु ने सवाल किया, ”यहाँ कौन रहता है?”

सजल ”है मेरा एक दोस्त, कुछ दिनों के लिए बाहर गया है। मैं कब से तुम्हें अकेले में मिलना चाहता था।” कहते हुए सजल की आँखें कुछ छोटी होकर अंशु को देखने लगी थीं। अंशु ने सजल की आँखों में देखा तो जैसे उसे अपनी ही परछाई दिखाई दी। अंशु ने कभी नहीं सोचा था कि वह सजल का प्यार पा सकेगी और सजल इतनी सरलता से यह सब कह देगा, जिसे कितनी बार उसने मन ही मन बोलने की कोशिश की थी। कई बार उसके मन में बैठी तितली ने उड़ने के लिए अपने पंखों को तोला था, पर उन पंखों पर उसने हमेशा एक बोझ महसूस किया था, जो आज सजल के उन तीन शब्दों को अनायास ही कह देने से गायब-सा हो गया था। वह जैसे सब कुछ भूल गई थी। इस बीच उसके भीतर कुछ बदल गया था। उसका चेहरा खिल उठा था और आँखों में एक अद्भुत-सी चमक थी, जो सजल की आँखों से मिलते ही और बढ़ गई थी।

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सजल ने उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे अपने पास खींच लिया था। उसके शरीर के भीतर एक सिहरन दौड़ रही थी, जो तेज होती धड़कनों के साथ एक तूफान पैदा कर रही थी, जो उसकी तेज और गर्म साँसों से बाहर निकल रहा था। सजल की पकड़ कस गई थी, जिससे उसकी तनी छातियाँ सजल के सीने को छूकर दब गईं थीं और उसके होंठ खुल गए थे, जिन्हें सजल बड़ी बेसब्री से चूम रहा था। अंशु के कुँआरे मन में बैठी तितली, जिसके पंखों पर कई रंगों के धब्बे थे, अंशु के शरीर में उठे इस तूफान के साथ उड़ कर, आज बाहर आ गई थी। वह कहाँ से, कैसे निकली थी, अंशु नहीं जान पाई थी, उसे इतना ही होश था कि जब वह शरीर से निकल कर उस के ऊपर मंडरा रही थी, तब उसके अधखुले होंठों को सजल ने पी लिया था। उसका शरीर हवा में तैरते पत्तों की तरह हल्का हो गया था। उसके पैर जमीन पर नहीं थे। वह सजल के गले से झूल गई थी और सजल के होंठ और हाथ मिल कर अंशु के पूरे शरीर को एक बैगपाईपर की तरह बजा रहे थे, जिसका संगीत सजल और अंशु के कानों में गूँज रहा था। इस संगीत में डूबे दोनों कब हॉल से बेडरूम में आ गए थे, पता ही नहीं चला। अब बेडरूम के दरवाजे पर लटका विंडचाईम बाहर से आती हवा से हिल कर निरंतर बज रहा था और अंशु के शरीर से उठते संगीत में मिल रहा था, जिसे सजल अपनी बेसब्र होती साँसों से बजा रहा था। हवा से हिलते फानूस के प्रकाश से दीवार पर बनती आकृतियाँ, आपस में उलझी जा रहीं थीं।

तभी किसी धातु की बनी वस्तु के जमीन पर गिरने की आवाज हुई।

अंशु ने पलट कर उस दरवाजे की ओर देखा, जो हॉल की ओर जाता था। उसने जो देखा, उसे देख कर वह सजल की बाँहों से छिटक कर दूर हो गई। तभी उसे होश आया कि वह कमर से ऊपर नग्न थी और उसकी जीन्स की जिप भी आधी खुली थी।

दरवाजे पर अभि की आँखें उसके नग्न स्तनों को घूर रहीं थी।

उसने एक झटके से झुकते हुए जमीन पर पड़ा टॉप उठाया और अपने खुद को ढँकते हुए बिखरी हुई आवाज को समेट कर चीखी ”व्हॉट द हेल इज दिस?” दरवाजे पर खड़ा अभि कमरे में आ गया। उसके साथ अनिल भी था।

पल भर में अंशु के कानों में बजता संगीत आपातकाल में बजते सायरन-सा तेज और भयावह हो गया। उसके शरीर में दौड़ती सिहरन, कँपकँपी में बदल गई, उसके शरीर की नर्म खुशबूदार त्वचा जो सजल के होंठों से नम हो गई थी, उसकी वह नमी अनायास ही भाप बन गई थी। उसके मुँह में घुलता तरल सूख गया था। उसने सजल की ओर देखा, पर सजल की आँखों में आश्चर्य, पश्चाताप, क्रोध, घृणा, प्रेम कुछ भी नहीं था। वे स्थिर थीं। उसने अंशु के कंधों पर हाथ रखा, पर इस बार उसके हाथ का स्पर्श अंशु को किसी गरम लोहे की सलाख के छू जाने जैसा लगा। अंशु ने उसके हाथ को जोर के झटक दिया।

सजल – ”डोंट वरी, …इट्स ओ.के, दे विल नॉट हार्म यू।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अंशु दरवाजे की ओर बढ़ी। अभि ने उसके शरीर को घूरते हुए, अपने मजबूत हाथों से उसके कंधों को पकड़ा और उसे बेड पर बिठा दिया। अभि उसके बराबर में बड़ी बेतकल्लुफी से बैठते हुए बोला ”रिलैक्स बेबी …इट्स पार्टी टाइम, यू विल एन्जॉय इट।”

अंशु का गुस्सा डर में बदल गया। उसके सामने तीन दोस्त नहीं, तीन जंगली जानवर खड़े थे, जिन्होंने एक योजना बना कर उसे फाँस लिया था। …और अब तीनों मिल कर उसका शिकार करने वाले थे।

सजल खुराना, अभि नंदा और अनिल मोतवानी। शहरी जंगल के ऐसे जानवर जिन्हें किसी का भय नहीं था। ये अक्सर ऐसे शिकार करते थे। ज्यादातर लड़कियाँ तो इनके पैसे, ऐशो-आराम, फैशन, लंबी गाड़ियों और इनकी पार्टियों की चकाचौंध देखकर खुद अपना सब कुछ लुटाने इनके पास चली आतीं और इस चकाचौंध में, हिंदी फिल्मों में पाया जाने वाला एक पागल प्रेमी ढूँढ़तीं, मध्यमवर्गीय लड़कियाँ जो काम की तलाश में घरों से निकलती, उनके लिए ये शहरी जंगल के हिंसक जानवर कुछ देर के लिए हिरण, मोर और मासूम खरगोश का भेष बना लेते। अब उन तीनों के मुखौटे उतर चुके थे। अंशु अपनी बची ताकत समेट कर चीख पाती तभी अभि ने अपना मोबाइल, जिसमें कम रोशनी में दूर से भी किसी का विडियो बनाया जा सकता था, उसे ऑन कर, एक विडियो क्लिप प्ले कर दिया था, जिसमें सजल अंशु को गोद में उठा कर उसके स्तनों को बेसब्री से चूम रहा था।

अंशु की चीख गले में घुट गई।

अंशु के मन में जहाँ कहीं एक तितली रहा करती थी। जिसके पंखों पर रंगीन धब्बे थे, वहाँ गहरा सन्नाटा था और एक बहुत गहरा अँधेरा कुआँ था, जिस में अंशु अपनी माँ और बिन्नी को बारी-बारी गिरते देख रही थी, फिर उसी कुएँ में किसी ने उसके पिता श्री नारायण सक्सेना की वह सुनहली फ्रेम वाली तसवीर भी फेंक दी थी, जिससे वह बातें किया करती थी। उसके साथ ही उसके बचपन से अब तक की सारी तसवीरें उस कुएँ में गिर कर गायब हो रहीं थी। उसके दाँत भिंचे हुए थे। वह रो रही थी पर आवाज गले से बाहर नहीं आ रही थी।

बेड पर पड़ा अंशु का मोबाइल लगातार बज रहा था। शायद माँ ने घर से फोन किया था। अभि ने आगे बढ़ कर फोन बंद कर दिया।

…अब अंशु के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था। उसके आँसू उसके स्तनों और जंघाओं को गीला कर रहे थे, जिन्हें वहाँ किसी ने नहीं देखा। इसके बाद इस कहानी में श्रीनारायण सक्सेना की बेटी अंशु के मन में जो एक तितली रहा करती थी, जिसके पंखों पर कई रंगों के धब्बे थे, जो अक्सर खुले आसमान में उड़ने के सपने देखा करती थी, वह अब उसके मन में या उसके आस-पास, दूर-दूर तक कहीं नहीं थी।

उस समय सुबह के चार बजे थे, जब अंशु अपने घर पहुँची थी।

सुबह के ग्यारह बज चुके थे पर द्वारका स्थित उस फ्लैट में, जिसमें कभी श्री नारायण सक्सेना रहा करते थे, कुछ भी पहले जैसा नहीं था। अंशु की माँ ने सुबह झाड़ू-पोंछा करने आई काम वाली को लौटा दिया था। बिन्नी अपनी क्लास के लिए नहीं गई थी। किचन से नाश्ते की खुशबू नहीं आ रही थी। यहाँ तक की माँ ने नहा-धोकर पिताजी की तसवीर के सामने अगरबत्ती भी नहीं लगाई थी। बालकनी में खुलने वाला दरवाजा बंद था, इसलिए आज कमरे में धूप का वह चौखाना भी नहीं बन पाया था, जिसकी रोशनी में अंशु की माँ बिना चश्मा लगाए चावलों से कंकड़ बीन लिया करती थीं।

माँ, अंशु और बिन्नी एक ही कमरे में इतनी देर तक, एक साथ, इस तरह चुप पहले कभी नहीं बैठे थे। वे तीनों कमरे की अलग-अलग दीवारों को ध्यान से देख रहे थे, पर तीनों दीवारों में कोई खिड़की नहीं थी, जो किसी किरण के लिए कोई रास्ता बना पाती। तीनों एक-दूसरे की नजर बचा कर डाइनिंग टेबल के ऊपर टँगी श्रीनारायण सक्सेना की तसवीर को बीच-बीच में देख लेते थे और फिर उनकी आँखें दीवार पर स्थिर हो जाती थीं।

श्री नारायण सक्सेना की तसवीर पर कोई रोशनी नहीं पड़ रही थी, इससे उनके चेहरे की चिर स्थायी मुस्कान कुछ फीकी लग रही थी।

अंशु की माँ अपने भीतर बहुत सारी हवा खींच कर कुछ कहना चाहती थीं, पर हवा उनके मुँह और नथुनों से बिना कोई शब्द लिए बाहर निकल आती और कमरे में तैरने लगती। रह-रह कर आठ साल पहले हुई अपने पति की मृत्यु के बाद का वह दृश्य उनकी आँखों के आगे आ जाता, जिसमें यही कमरा था और बर्फ की सिल्ली पर श्री नारायण सक्सेना के मृत शरीर को रखा गया था। उनके सिरहाने धूप-बत्ती जल रही थी। सारी रात अंशु की माँ, अंशु और बिन्नी को सीने से लगाए बर्फ की सिल्ली को पिघलते हुए देखती रहीं थीं। सुबह गाँव से श्रीनारायण सक्सेना के छोटे भाई और चाचा के आ जाने पर ही अंतिम संस्कार किया गया था। संस्कार दिल्ली में ही हुआ था और श्रीनारायण सक्सेना कानपुर देहात में बसे अपने गाँव लौटने के सपने के साथ अपनी पत्नी और दो बेटियों को पीछे छोड़ कर धू-धू कर जल गए थे।

कमरे में रखी बर्फ की सिल्ली सुबह तक पिघल कर दो टुकड़ों में बँट गई थी। पूरे कमरे में और बाहर फ्लैट की सीढ़ियों पर पानी बह रहा था, पर अंशु की माँ की छाती पर उस रात का और उस आदम कद बर्फ की सिल्ली का बोझ आज तक पूरे भार के साथ उपस्थित था। आज का दृश्य उस रात से भिन्न था।

आज बर्फ की सिल्ली और मृत देह अलग-अलग नहीं थे, बल्कि एक जीवित देह ही बर्फ हो गई थी, जिसे उसकी माँ और पिता ने बहुत प्यार से पाला था।

ट्रेन दिल्ली से कानपुर की ओर दौड़ी जा रही थी।

दिल्ली की चकाचौंध बहुत पीछे छूट गई थी। वहीं रह गए थे अंशु के सपने, उसकी आँखों की चमक और उसके मन में रहने वाली तितली। उसकी आँखें खिड़की से बाहर आसमान में कहीं उसे ही ढूँढ़ रही थीं। उसके साथ बैठी थी, अंशु की माँ, जो पिछले तीन दिनों के घटनाक्रम से थकी, भयभीत और निराश थीं। सजल और अभि से मिली धमकियों को सोच कर वह बैठे-बैठ काँप जाती थीं। ऊपर की बर्थ पर एक अखबार में लिपटी हुई रखी थी, श्रीनारायण सक्सेना की सुनहली फ्रेम में जड़ी तसवीर, जो अपने गाँव छिरौला वापस जा रही थी। उनके साथ थे उनके छोटे भाई जय नारायण सक्सेना, जो आठ साल पहले इसी ट्रेन में अपने भाई की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने इसी तरह उनके परिवार के के साथ कानपुर तक आए थे और उसके बाद वह गाँव लौट गए थे और श्रीनारायण का परिवार दिल्ली, पर इस बार वह उनके परिवार को गाँव ले जा रहे थे, कुछ दिनों के लिए या हमेशा के लिए, यह वह स्वयं भी नहीं जानते थे।

अंशु के सामने वाली सीट पर बिन्नी बैठी थी, श्री नारायण सक्सेना की छोटी बेटी, जो यह सब कुछ होता देख रही थी। तभी खिड़की से आकर एक तितली उसकी कलाई पर बैठ गई थी। उसके पंखों पर कई रंगों के धब्बे थे। सबकी नजर बचा कर बिन्नी ने, उस तितली को अपने मन में छुपा लिया था।

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