शाहजादे की अग्निपरीक्षा

दिल्ली का बादशाह जहाँगीर सन 1605 में राजसिंहासन पर बैठा था। उसे दस-बारह साल राज करते-करते हो गए थे। जहाँगीर सूझ-बूझवाला व्यक्ति था; परंतु कभी-कभी दुष्टता का भी बरताव कर डालता था। उसमें सनक भी थी।

जहाँगीर ने बड़े-बड़े कठघरों में कुछ शेर पाल रखे थे। कभी-कभी वह अपने सिपाहियों-सरदारों की कुश्ती इन शेरों से करवाता था। शेर पालतू थे, पर थे तो शेर और बड़े-बड़े। एक बार उसने अपने घुड़सवार पहरेदारों में से कुछ को शेरों से कुश्ती लड़ने का आदेश दिया। उन बेचारों को लड़ना पड़ा। वे बहुत सँभल-सँभलकर, बड़े साहस के साथ लड़े। फिर भी उनमें से तीन को शेरों ने मार डाला। बाकी घायल हो गए। जहाँगीर के ऊपर कोई अंकुश नहीं था, जो उसे मनमानी करने से रोकता। वह युग ही इस तरह का था।

एक दिन जहाँगीर अपने एक भतीजे और अपने सबसे छोटे शाहजादे को साथ लिए घूमते-घूमते शेरों के कठघरों के पास जा पहुँचा। जंगली जानवरों को देखने से मन प्रसन्न होता ही है, वे दोनों बालक हर्षमग्न हो गए।

भतीजे के मुँह से निकला – ‘कैसे रग-पट्ठेवाले शेर हैं ये! आँखों से जैसे लौ फूट रही हो।’

शाहजादे ने कहा, ‘इनके सिर बहुत बड़े-बड़े हैं। छाती चौड़ी और मजबूत हैं!’

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भतीजे ने कहा, ‘लंबे-लंबे नुकीले नाखून पंजे के भीतर होंगे!’

शाहजादा बोला, ‘और लंबे-लंबे नुकीले दाँत उन चौड़े-चकले होंठों के भीतर।’

भतीजे ने कहा, ‘पर कान इनके छोटे-छोटे हैं, इतने छोटे कि हमारी उँगलियों की पकड़ में मुश्किल से सकेंगे।’

शाहजादा बोला, ‘पकड़ लोगे?’

भतीजा बोला, ‘क्यों, क्या हुआ? शेर को साथ ही एकाध थप्पड़ भी मारी जा सकती है।’

वह हँस पड़ा। शाहजादे के होंठों पर रीनी-झीनी सी ही मुसकराहट आई। बोला, ‘आप उसका पंजा पकड़ लेंगे?’

भतीजे ने मस्ती और बेपहवाही के साथ उत्तर दिया, ‘जिसका कान पकड़ सकते हैं, उसका पंजा पकड़ना मुश्किल ही क्या!’

जहाँगीर उन दोनों बालकों की बातें सुन रहा था। सनक गया। बालक उस क्षण उससे कुछ दूरी पर और कठघरे के निकट थे। जहाँगीर ने उनकी ओर कदम बढ़ाए।

भतीजे के कंधे पर हाथ रखकर जहाँगीर ने पूछा, ‘शेर का कान पकड़ लोगे और उसका पंजा भी?’

भतीजा पहले तो सकपकाया, फिर परंपरा की सुनी बातें उसके मन में उभर आईं। हिम्मत बँधी।

भतीजे ने उत्तर दिया, ‘जी हाँ, सरकार, शाही खून तो मेरी नसों में भी है।’

‘अच्छा!’ कहकर बादशाह ने दाँत भींचे। उसे क्रोध जल्दी आ ही जाता था। उन दिनों उसकी अपने लड़के शाहजादा खुर्रम से अनबन थी – खुर्रम, जो बाद में ‘शाहजहाँ’ के नाम से विख्यात हुआ। जहाँगीर के पिता अकबर के अंतिम दिनों में ही जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र खुसरू उसके विरुद्ध हो गया था। वह सब यकायक उसे स्मरण हो आया।

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‘अच्छा, बढ़ाओ अपना हाथ कठघरे के भीतर और रखो शेर के सिर पर – इस शेर के सिर पर, जो कठघरे के पास खड़ा है। फिर उसका कान पकड़ना!’ जहाँगीर ने अपने घमंडी भतीजे को आज्ञा दी। स्वर उसका कड़ा था।

भतीजे का गर्व जल गया। उसके रोम खड़े हो गए और शरीर काँपने लगा। वह एक अंगुल भी आगे न बढ़ सका।

‘डालता है हाथ कठघरे में या नहीं? जहाँगीर कड़का। भतीजे की घिग्घी बँध गई। वह हाथ जोड़कर क्षमा माँगने लगा। जहाँगीर ने क्षमा नहीं किया। उसे कैदखाने में डाल देने का हुक्म अपने पहरेदारों को दिया। पहरेदार पकड़कर ले जाने लगे।’

अब जहाँगीर ने अपने पुत्र – शाहजादे से कहा, ‘तुममें है हिम्मत? रख सकते हो शेर के सिर पर अपना हाथ?’

चचेरे भाई के साथ जहाँगीर का वह बरताव देखकर शाहजादा सहम गया था; परंतु पिता की उस ललकार पर उसके भीतर का तेज जाग पड़ा। उसने घमंड की कोई बात नहीं की थी। उसने अपनी दृढ़ता को सँभाला-बटोरा, ‘जो हुक्म, कोशिश करता हूँ।’

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उसके चचेरे भाई को पहरेदार कैदखाने में बंद करने के लिए पकड़े लिए जा रहे थे; परंतु वह विचलित नहीं हुआ। सधे पैरों से वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। साँस साधी। उसने सेर के सिर पर हाथ रख दिया और रखे रहा। शेर ने अपनी जलती हुई आँखें ऊपर घुमाईं; परंतु वह बालक नहीं घबराया।

जहाँगीर ने कहा, ‘हाथ खींच लो।’

शाहजादे ने हाथ खींच लिया। वह प्रसन्न था और थोड़ा सा काँप रहा था। सिर नीचा किए रहा।

जहाँगीर ने बड़े अभिमान के साथ उसके पुरुषार्थ की सराहना की। सिर पर हाथ फेरा और गले से लगा लिया।

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