रोटियाँ

यह तीसरा दिन था जब वह रोटियाँ वापस ले जा रही थी। रोटियाँ बैग में थीं… जिन्हें वह कभी अलमारी में रख चुकी थी तो कभी टेबल पर तो कभी हाथ में, लेकिन हर बार कोई आ जाता और वह पैकेट छुपा लेती। उसे अफसोस हो रहा था कि रोटियाँ सामने रखी हैं और वह रोटियों के लिए उसके आसपास मँडरा रहा है। यहाँ तक कि उसकी क्लास में आकर बार-बार झाँकता। कभी किसी की फटकार पड़ती और वह दुम दबाकर भाग जाता। उसका आना हवा की तरह होता बिना किसी आहट के… आवाज के। कई बार तो वह लहर की तरह दिखाई देता… उठी और छपाक से विलीन हो गई। उसका यूँ बार-बार आना सबको झुँझलाहट से भर रहा था… इतना गंदा… मरियल… बीमार, हड़ीला कुत्ता पढ़े-लिखे, साफ-सुथरे, सुंदर, सजे-धजे, खिलखिलाते, इठलाते अपने-अपने स्टेट्स में जीते प्रदर्शित करते, ज्योतिष के अनुसार प्रतिक्षण ‘कलर कांबीनेशन’ की वाहवाही लूटते अभिजात्य समाज के बीच क्या कर रहा है।

‘पता नहीं ये चपरासी क्या करते रहते हैं। इनसे कुत्ते भी नहीं भगाए जाते… बस अपना-अपना ग्रुप बनाकर गप्पें लगाते रहते हैं। कामचोर कहीं के। पूरा बरामदा पॉटी और पेशाब से भरा पड़ा है। एक बार तो वे सब स्टाफ रूप में बंद हो गए थे और इतनी गंदगी मचा दी थी कि घर से फिनायल और अगरबत्ती लानी पड़ी थी।’ नगमा ने गुस्से में होठ बिचकाते हुए कहा।

‘वो ऐसे ही थोड़ी न आता है।’ रंजना ने रहस्य खोलते हुए कहा।

‘तोऽऽ…।’

‘वो किसी से कुछ माँगने आता है।’

‘क्या? …क्या माँगने आता है।’

‘रोटियाँ।’

‘किससे… कौन ये पुण्य कमाने का नाटक दिखाता है यहाँ पर! मैं भी तो सुनूँ।’

‘मैडम वर्मा! मैडम वर्मा रोज उसके लिए रोटियाँ लाती हैं। अब उसको आदत जो पड़ गई है बैठे-बैठाए खाने की। कामचारे, अलाल कहीं का’

‘बैठे-बैठाए क्या केवल कुत्ता खा रहा है।’ मुझे लगता है।

‘यही तो मैं सोचूँ कि वह यहाँ क्यों मँडराता रहता है। हम लोग तो कभी घास डालते नहीं।’ मिसेज सक्सेना ने लिपस्टिक लगे होठों को मरोड़ते हुए कहा।

‘बेचारा भूखा रहता है। देखती नहीं उसकी हालत।’ मिसेज भंडारी ने चिच्च… चिच्च करते हुए सहानुभूति दिखाने का अवसर न जाने दिया।

‘हालत की बात तो ठीक है पर कालेज के भीतर यह सब… आप जानती हैं न कुत्तों की आदतें…।’ मिसेज वर्मा को आते देखकर नगमा ने कहा –

‘कुत्तों की आदतें या कुत्ता समाज की…’

‘रोटियाँ मैं अंदर थोड़ी न डालती हूँ। बाहर मैदान में जाकर देती हूँ।’ मिसेज वर्मा ने सफाई देते हुए कहा। बाद में उन्हें लगा कि वे सफाई क्यों दे रही हैं, यह समूची सृष्टि ही परस्परता के सिद्धांत पर चल रही है। जीव, जगत्, ब्रह्मांड, फिर इस छोटे-से प्राणी के पीछे सब लोग हाथ धोकर क्यों पड़े हैं। उन्हें आज इन सभी वाक् योद्धाओं ने आड़े हाथों ले लिया था।

‘लेकिन घूमता तो वह यहाँ है… सुबह से शाम तक यहीं पड़ा रहता है।’

‘यहाँ मत डाला करिए।’ मिसेज सक्सेना बोली – ‘गंदगी फैलाता है, वैसे ही तो हम लोग गंदगी से परेशान रहते हैं। कभी पानी नहीं तो कभी सफाई नहीं होती। ऊपर से इनका झमेला।’ उन सबकी बातें सुनकर मिसेज वर्मा की हिम्मत टूट गई। उनके सामने ही आने-जाने वालों ने उसे दुत्कार कर भगा दिया। वह दुम दबाए डरा-सहमा पीछे मुड़-मुड़कर देखता भागता जा रहा था! वे मन मसोसकर रह गईं। उसके पक्ष में एक शब्द न बोल सकीं। यही उनकी कमजोरी है कि वे कभी भी सत्य का पक्ष खुलकर नहीं ले पाती हैं, वरना कितने तर्क हैं उनके पास!

कुत्ता अपने समूह के साथ रहकर भी अलग-थलग रहता था। कुत्तों के समाज ने भी उसे दुत्कार दिया था। उसकी हैसियत सेवक से गई-गुजरी थी… अन्यथा मोटे-ताजे, तंदुरुस्त कुत्तों के बीच उसकी इतनी दयनीय हालत क्यों होती। वे सारे काले, गेहुँआ, भूरे रंग के देशी कुत्ते… धूप सेंकते सोए रहते या मस्ती करते आपस में अठखेलियाँ करते रहते। कभी वे एक-दूसरे का मुँह चाटते तो कभी पंजे उठा-उठाकर एक-दूसरे को छेड़ते, तो कभी खुलेआम प्रेम करते… तो कभी… लंबी दौड़ लगाकर मुड़कर देखते और फिर दौड़ लगा देते… सारी धरती उन्हें अपनी लगती और सारे लोग आत्मीय…। ऐसा नहीं था कि चपरासियों ने उन सबको डंडों से मारकर न भगाया हो पर… उनका आना सतत जारी रहता। कैंटीन से निकली जूठन और खाने वालों से छोड़ा गया अन्न उन्हें यहाँ खींच लाता था। बेशर्मों की तरह वे डाँट-दुत्कार खाकर यहीं जमे रहते, पर यह कुत्ता तो मात्र हड्डियों का ढाँचा था। उसकी पसलियाँ गिनी जा सकती थीं। उसका काला मुँह… सूखकर चपटा हो गया था। सींकिया पाँव और बाहर निकली आँखें देखकर लगता था कि वह मौत के मुँह से निकलकर आ रहा है और कभी भी मौत के मुँह में जा सकता है। ताकतवर कुत्तों का समूह उसे कभी भी कोई चीज खाने नहीं देता। अगरचे कभी-कभार उसके पास कोई चीज देखते तो छीन लेते या झपट्टा मारकर उसे घायल कर वहाँ से रुखसत कर देते। वह डरा सहमा अलग पड़ा रहता। इतनी बड़ी दुनिया में उसका अपना कोई नहीं था। उसकी हालत बहिष्कृत तिरष्कृत एकाकी प्राणी के समान थी, जो विपन्न अवस्था में अकेला छोड़ दिया जाता है।

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मिसेज वर्मा को लगता कि शायद कुत्तों में भी सवर्ण और दलित होते होंगे। इनमें भी ताकत और कमजोर का भेदभाव चलता होगा, वरना एक छोटा-सा मासूम कुत्ता बेवक्त बीमार और उपेक्षित क्यों हो गया। उस दिन मिसेज वर्मा बाहर धूप में बैठी थी कि वह… सामने आकर पूँछ हिलाने लगा…। उसकी पूँछ पर नाममात्र को बाल थे, घिसी छिली त्वचा दिखाई दे रही थी। उसकी हालत देखकर उनका मन भर आया। घर में पला विदेशी कुत्ता सोफे पर सोता है। पलंग पर आकर जब चाहे सो पसर जाता है। सुबह-शाम दूध, अंडे और पेडीग्री खाकर डकार भरता है। पपीता, प्याज, मटर और बाकी चीजें खाने के बाद वह रोटियों को ऐसी हेय दृष्टि से देखता था, गोया वह उसके लिए घास-फूस हों। बासी बची हुई रोटियाँ घर में इकट्ठी होती जातीं। गाय, भैंस और बकरियाँ कालोनी में दिखाई नहीं देती थीं। देशी कुत्तों का प्रवेश निषिद्ध था – रोटियों के उस भूरे पहाड़ को कम करने के लिए। कॉलोनी में सिर्फ भद्र किस्म के चेहरे पर चेहरा ओढ़े इनसान दिखाई देते, जो बड़ी गाड़ियों में निकलते या सुबह सैर करने के लि उनके नौकरों के हाथों में उनके विदेशी नस्ल के कुत्तों की रस्सी होती। वे पुलिया पर बैठे बातें करते होते और कुत्ते आने-जाने वालों को देखते रहते।

कभी-कभार मिसेज वर्मा रोटियाँ दूधवाले को दे देती पर उसे भी रोटियाँ ले जाने में परेशानी होती थी। एक-एक रोटी मिसेज वर्मा को न जाने कितनी स्मृतियों और चेहरों की याद दिला देती… चटनी-रोटी खाकर उन्होंने बचपन के कितने सुंदर दिन बिताए थे… ऐसी रोटियाँ खेत-खलिहानों में अचार के साथ अमृत के समान लगती थीं… रोटी का एक-एक टुकड़ा अमूल्य होता था। उनसे बचता तो गाय-भैंसों को दिया जाता, गाय-भैंसों से बचता तो कुत्ते-बिल्लियों का उस पर अधिकार होता, कुत्ते-बिल्लियों से बचता तो… गुड़-शक्कर मिलाकर चींटियों के काम आता, उनसे भी बचता तो दिनभर कलरव करते परिंदों के काम आता… पर यहाँ… यहाँ तो इन रोटियों की कोई कद्र ही न थी… गोल-गोल… सफेद सुंदर इन रोटियों की।

मिसेज वर्मा को आश्चर्य होता कि जिन रोटियों ने क्रांतियाँ करवाईं, जिन रोटियों ने युद्ध करवाया, जिन रोटियों के लिए इनसान रात-दिन मरता-खपता है, जिन रोटियों के लिए चोरी होती है, मालिक गिनकर रोटियाँ देता है… उन रोटियों को लोग यूँ फेंक देते हैं… तब मिसेज वर्मा को लगा… जिसको सबसे ज्यादा जरूरत है, उसको क्यों न खिलाई जाएँ। उस बीमार, भूखे, मरगुल्ले कुत्ते के लिए ये रोटियाँ प्राणदायक सिद्ध होगीं। वे अपने टिफिन के साथ चार रोटियाँ रख लेती। एक दिन उन्होंने सबके सामने रोटियाँ डाल दीं। देखती क्या है… मरियल कुत्ता डरता, सहमता, आसपास देखता, सूँघता उन रोटियों की तरफ बढ़ा चला आ रहा है। वह यूँ चल रहा था गोया युद्ध के मैदान में सिपाही दुश्मनों का पीछा करते हुए बढ़ता है। साथी दबंग कुत्तों का डर तो था ही उसे… लोगों का भी डर था… जो बार-बार पत्थर मारकर उसे भगा देते थे। उसके मैले-कुचैले बीमार शरीर को देखकर घिन करते थे, थूकते थे।

‘देखो तो कितना दुबला है… बेचारे को कोई खाने को नहीं देता, जो मिलता है सो दूसरे कुत्ते छीन लेते हैं।’

‘कमजोर और गरीब तो हर जगह मारे जाते हैं। चाहे इनसान हों या जानवर।’ मिसेज बक्षी ने अफसोस जताते हुए कहा।

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कुत्ते ने चुपके से आकर पहले एक रोटी उठाई और इतनी तेजी के साथ भागा… मानो किसी ने उसके सामने बंदूक की नाल तान दी हो। पर क्षणों बाद ही वह लौट आया। इस बार उसने दूसरी रोटी उठाई और झाड़ियों में जाकर छुपा दी। …तीसरी रोटी भी वह बरामदे में कहीं छुपाकर आया था। यानी वह अपने लिए दिनभर की व्यवस्था कर रहा था। …चौथी रोटी उसने वहीं मैदान में बैठ कर मजे से खाई। वह रोटी खाता जाता था और आसपास सतर्क निगाहों से देखता जाता था। रोटी खाते समय उसके चेहरे पर, उसकी आँखों में असुरक्षा का भाव अलबत्ता साफ नजर आ रहा था। पर थोड़ी देर बाद ही वह पूँछ हिलाता हुआ मिसेज वर्मा के सामने आ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में कृतज्ञता का भाव था। …भूख शांत होने के बाद की तृप्ति…। उसने अँगड़ाई ली और धूप में पाँव पसारकर लोट लगाने लगा – गोया कह रहा हो अब मैं भी ताकतवर बनूँगा, मेरा भी कोई अपना है। यह क्रम चल निकला था।

मिसेज वर्मा दो-चार रोटियाँ ले आती। कुत्ता उसी तरह से रोटियाँ यहाँ-वहाँ ले जाकर छुपा देता। उसका स्नेह और कृतज्ञता का भाव मिसेज वर्मा के प्रति बढ़ता जा रहा था। वह उनके आने की प्रतीक्षा करता… उनके आने पर पीछे-पीछे चलकर अपनी प्रसन्नता जताता, पर दूसरी तरफ एक अलग ही चर्चा चल निकली थी…। सीढ़ियों पर… बरामदे में… क्लास रूम में या… कहीं भी गंदगी देखकर हर कोई उसी मरगुल्ले कुत्ते को दोषी ठहराता। उसे कोसता। गालियाँ देता। घिन करता।

‘आपको बताऊँ’ सुखदा ने बाहर देखते हुए कहा – ‘असल में मिसेज वर्मा ने इसको लपका लिया है। वो रोटियाँ लेकर आती हैं। दया दिखाती हैं, इसलिए ये उनके पीछे पड़ा रहता है। …यह कोई दया दिखाने की जगह है। दया दिखानी है तो ले जाओ अपने घर। वहीं रखो। करो सेवा! मारे दुर्गंध के बैठा भी नहीं जाता।’

‘पर सुखदा यही एक कुत्ता तो नहीं है – सात-आठ कुत्तों का ग्रुप है।’

‘पर अंदर तो वही आता है, देखा कितना चालाक है… रोटियाँ छुपाकर रखता है।’

‘इसे चालाकी नहीं कहते, मजबूरी कहते हैं सुखदा! छीना-झपटी में उसे कुछ नहीं मिलता। हर प्राणी अपने को जिंदा रखने के लिए हाथ-पाँव मारता है पर… स्टॉफ-रूम में या क्लास-रूम में कुत्तों का आना… छिः-छिः…।’ मिसेज भंडारी ने मुँह बनाते हुए कहा।

‘मैडम को बताना चाहिए।’

‘इतनी सी बात…।’

‘इतनी सी बात नहीं है यह।’

इधर कुत्ते की सेहत में सुधार आता जा रहा था। उसके पाँवों और शरीर पर माँस की परत दीखने लगी थी। चेहरा भी भरने लगा था। यानी सूखी-बासी रोटियाँ उसके शरीर को लग गई थीं।

‘मैडम, आपको प्रिंसिपल मैडम ने बुलाया है।’ दूसरे दिन चपरासी ने आकर कहा।

‘आती हूँ।’

जब वह प्राचार्य कक्ष में पहुँची तो मैडम फाइलों पर साइन कर रही थी। मैडम के चेहरे पर गुस्से के भाव थे। हालाँकि उनकी बातों में कहीं कोई ऐसी बात न होती थी जो आहत या अपमानित करती हो, पर आज उनके तेवर बदले हुए थे।

‘मैडम, आपने बुलाया?’

‘बैठो।’

‘जी…’

‘आपके खिलाफ शिकायतें आई हैं।’

‘क्या… शिकायतें… कैसी शिकायतें?’ मिसेज वर्मा स्तब्ध रह गईं, क्योंकि वे कालेज के सभी काम समय पर और समझदारी के साथ करती थीं। सभी गतिविधियों में भाग लेती थीं। उनकी क्लास में हमेशा छात्राएँ रहती थीं। वे भी छात्राओं के साथ पूरी मेहनत करती थीं। तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के साथ भी उनके संबंध अच्छे थे। फिर आज ऐसी क्या बात हो गई कि उनकी शिकायतें की गईं।

‘कैसी शिकायतें मैडम… किसकी तरफ से?’ मिसेज वर्मा से रहा नहीं गया तो पूछ बैठी।

‘टीचर्स और स्टूडेंट्स की तरफ से।’

‘किस बात को लेकर?’

‘आप कालेज के माहौल को अनहाइजिनिक कर रही हैं। आपके कारण ही कालेज के अंदर गंदगी होती है।’

‘कैसे…?’

‘सुना है आपने किसी कुत्ते को लपका लिया है। उसको रोटियाँ डालती हैं, जिससे वह क्लास रूम और स्टॉफ रूम में आता जाता रहता है।’

‘मैडम बाकी कुत्ते भी तो हैं। मैं तो जब से इस कालेज में आई हूँ कई कुत्तों को देखती आ रही हूँ… जरूरी तो नहीं कि यही कुत्ता गंदगी फैलाता हो… आपने देखा है उसे… बेचारा भूखा रहता था… इसीलिए मैं घर से रोटियाँ लाकर दे देती हूँ वो भी पीछे के मैदान में।’

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‘आपको यह सब कालेज के बाहर करना चाहिए।’

‘मैडम।’

‘मुझे भी जानवरों से प्रेम है पर…’

मिसेज वर्मा ने एक शब्द नहीं कहा। उनकी देह गुस्से के कारण काँप रही थी, आँखों में आँसू उमड़ आए थे। यह किस किताब में लिखा है कि किस स्थान पर कुत्ते को रोटियाँ देनी चाहिए किस पर नहीं।

‘आगे से ध्यान रखिए कि कुत्ता अंदर न आए।’ मैडम ने निर्णय देते हुए सख्त आदेशात्मक लहजे में कहा।

‘जीऽऽई’ भर्रायी आवाज में उन्होंने थैला उठाया और स्टाफ रूम की तरफ चल दीं। थैले में रखी रोटियाँ अलमारी में रख दीं। बगीचे में बैठा कुत्ता उन्हें देखकर दौड़ा-दौड़ा आया।

‘देखिए, वो आ गया आपका सेवक। इसको तो नगर निगम वालों से कहकर पकड़वा देना चाहिए।’ सुखदा ने हँसकर दंभ के साथ कहा।

सुखदा की व्यंग्य और दंभ भरी हँसी उनके कलेजे को चीर गई।

आज उनसे टिफिन नहीं निकाला गया… कुत्ता बार-बार क्लास रूम के चक्कर लगा रहा था… कभी बरामदे में जाकर दुबक जाता तो कभी भागकर दरवाजे के पीछे छुप जाता।

तेज सर्दी पड़ रही थी। आसपास के खेतों में जमकर ओस गिरी थी। पाले से तमाम पेड़-पौधे और फसलें नष्ट हो गई थीं। कालेज के परिसर में लोग गरम कपड़ों से लदे, सिर पर टोपी लगाए, कान बाँधे, गले में स्कार्फ डाले, दस्ताने पहने धूप सेंक रहे थे या चाय पी रहे थे या गप्पें लगा रहे थे। उन सबके बीच मिसेज वर्मा को यह दुबला-पतला कुत्ता दिखाई नहीं दिया…। मिसेज वर्मा ने चारों तरफ निगाहें दौड़ायीं…। वे पीछे वाले भवन में गईं, फिर लाइब्रेरी में, उसके ऊपर वाले कमरों में। पूरे भवन की सीढ़ियों के नीचे… कमरों के भीतर, दरवाज़ो के पीछे, झाड़ियों के बीच, कचरे के कंटेनर में, यहाँ तक कि कालेज के बाहर तक वे उसे खोज आईं, पर सेवक नहीं दिखा…। कहाँ चला गया… क्यों नहीं आया… क्या नगर निगम वाले पकड़कर ले गए… या मेरे डाँटने पर कहीं चला गया? बुरा मान गया होगा… मान भी सकता है… घर का डॉगी कितने जल्दी नाराज हो जाता है, मुँह लटकाकर आँखों में आँसू भर कर पसर जाता है। जब तक दस बार बुलाओ नहीं, पुचकारो नहीं, सिर न थपथपाओ, तब तक खाने की तरफ देखता तक नहीं। अपने सजातीय कुत्तों से कैसी-कैसी बातें करता है। उसकी भाषा समझने का प्रयास हर बार निष्फल ही रहता। तभी उन्हें चपरासी आता दिखा।

‘शाहिद…!’

‘जी मैडम।’

‘वह कुत्ता दिखा?’

‘कौन-सा? वह सूखा-साका? नहीं मैडम दो दिन से दिखाई नहीं दिया… बीच में तो थोड़ा ठीक हो गया था।’ शाहिद ने लापरवाही से कहा।

‘जरा ढूँढ़ो तो।…’ उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

‘देखता हूँ मैडम।’

पंद्रह बीस मिनट बाद मिसेज वर्मा देखतीं क्या हैं कि शाहिद सेवक को एक बोरे पर रखकर घसीटता हुआ चला आ रहा है।

‘क्या हुआ?’

‘मर गया।’

‘मर गया… कैसे…?’

‘भूख के कारण। देख नहीं रहीं उसकी अंतड़ियाँ तक निकल आईं।’

उन्होंने पास में जाकर देखा… कुत्ते की देह अकड़ गई थी। उसकी पसलियाँ पहले की तरह गिनी जा सकती थीं…। उसकी खुली आँखें पथरा गई थीं। जबड़ा ऐंठ गया था। पेट पिचक गया था।

‘बेचारे को किसी ने कुछ खाने को नहीं दिया होगा। जानवर तो इनसानों की जूठन पर ही पल जाते हैं… पर’ कहता हुआ शाहिद घसीटता हुआ उसे बाहर ले जा रहा था और वे थैले में रखी रोटियों को मसोसते हुए वहीं खड़ी रह गईं… निस्पंद… निस्तब्ध सी…। उन्हें सुखदा सहित स्टाफ रूम में बैठी कई महिलाओं की सामूहिक हँसी सुनाई दी जो कह रही थी – ‘चलो झुटकारा मिला… उसको देखकर घिन लगती थी। पर अब मिसेज वर्मा के कुत्ता प्रेम का क्या होगा…?’

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