पिता का नाच | आशुतोष
पिता का नाच | आशुतोष

पिता का नाच | आशुतोष – Pita Ka Naach

पिता का नाच | आशुतोष

यूँ तो वह समय सुबह का था पर नंदू को उनके बड़े बेटे जग्गी और छोटे सत्तू ने इतने सख्त लहजे में धमकाया कि झोपड़े के आसपास का समय गर्म दोपहरी में बदल गया था। नंदू हतप्रभ थे। दोनों बेटे नंदू की ऐसी तैसी कर नंदू की ही कमाई से खरीदी गई स्कार्पियो में बैठकर धड़धड़ाते हुए निकल गए।

नंदू के नाचने-गाने को लेकर उनके बेटों का यह रवैया आम बात है, पर आज जिस तरह से वे उनके साथ पेश आए इतने की उम्मीद नंदू को नहीं थी। पर नंदू तो नंदू हैं। उन्हें कुछ नहीं चाहिए। चाहे दुख पड़े या सुख वे सिर्फ गाएँगे और नाचेंगे। तुरंत ही सब कुछ भुला कर नंदू ने खँजड़ी उठाया और एक चइता शुरू किया। ‘सोवत पिया को जगावे हो रामा… कोयल बड़ी पापी…’।

नंदू गरीब माँ-बाप के इकलौते बेटे थे। बचपन से ही उनको गाने का शौक था। भैंस की पीठ पर बैठ कर जब नंदू मुक्त कंठ से अलाप लेते तब ऐसा लगता कि वह भैंस की पीठ नहीं बादशाह का दरबार हो और वे खुद नंदू नही तानसेन हों। गाने के इसी जुनून के चलते नंदू घर से भागकर एक नाच पार्टी में शामिल हो गए। कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद नाच के पक्के नचनिया बन गए।

बेतिया के रामउजागिर बाबू की बेटी की बारात में नंदू पहली बार पूरे मेकअप के साथ स्टेज पर उतरे। खिलता हुआ नाक नक्श, होठों में फँसी हुई आधी हँसी ने घराती-बाराती सभी के ऊपर कहर ढा दिया। नगाड़े और हारमोनियम की जुगलबंदी की लहर में नंदू ने सतगजी आजमगढ़िया लहँगा और गोरखपुरी टिकुली के साथ स्टेज पर जब पहला फेरा लिया तो नाच देखने वालों के दिल शामियानें के चारों ओर बँधे कनात से टकराने लगे।

नंदू ने अपने जीवन के उस पहले बेमिसाल परफारमेंस के आखिर में जब ‘इन्हीं लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा’ गाया तो स्वयं रामउजागिर बाबू स्टेज पर आ गए। उन्होंने अपनी गोपालगंज वाली पाही नंदू के नाम करने की घोषणा की साथ ही नंदू का नाम मीनाकुमारी रख दिया। लोग जान गए थे, कि रामउजागिर बाबू आज होश में नहीं हैं।

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नंदू के नाम के साथ ही उस नाच पार्टी का नाम ”मीना कुमारी नाच पार्टी” हो गया। लोग अपने घर के शादी-ब्याह में मीना कुमारी का नाच कराने में अपना शान मानने लगे थे। उन दिनों न जाने कितनों ने अपनी मुराद पूरी होने पर काली माई, हनुमान जी के सामने मीनाकुमारी का नाच कराने की मनौती मानी थी।

समय के साथ नंदू की शोहरत और समृद्धि बढ़ती गई। कई पीढ़ियों की दरिद्रता दूर हो रही थी। नाच के डेढ़दार की बेटी से नंदू की शादी हुई। अपनी ही शादी में नंदू पहले जी भर कर नाचे तब जाकर कहीं फेरे लिए। समय के साथ नंदू का घर दो बेटों और एक बेटी से भर गया। नंदू के मीना कुमारी नाच पार्टी का रुतबा बढ़ता ही जा रहा था। लोग बताते हैं कि एक बार रामउजागिर बाबू ने एक नेता को प्रसन्न करने के लिए पटना हवाई अड्डे पर नंदू का नाच कराया था। जिसके एवज में रामउजागिर बाबू को एम.एल.ए. का टिकट मिला था।

अब नंदू बहुत व्यस्त रहने लगे थे। नाच ही उनके लिए सब कुछ था। बच्चे बड़े हुए। दोनों बेटों की शादी हुई। नंदू इनमें मेहमान के ही तौर पर शामिल हुए। वैसे यदि नंदू याद करें तो उन्हें मुश्किल से याद आएगी कि जब उनके बाबूजी गुजरे तो वे बलरामपुर में नाच रहे थे। माई की मृत्यु के समय सुल्तानपुर के बड़ा गाँव के दिग्गज वकील वीरेंद्र बहादुर सिंह के घर सोहर गा रहे थे। और जब उनकी पत्नी उनके जीवन से जा रही थीं तब वे बगहा में सांसद जी की बहू के स्वागत में बधाई गा रहे थे।

नंदू का बड़ा बेटा जग्गी नंदू के ही रुपये को पानी की तरह बहा कर जिला पंचायत सदस्य और छोटा बेटा सत्तू सरपंच बन गया था। बेटों की सामाजिक हैसियत बदल गई। अब उन्हें नंदू का नाचना-गाना अच्छा नहीं लगता था। वे नचनिया का बेटा कहा जाना पसंद नहीं करते। इसके लिए वे कई बार नंदू को समझा चुके थे। बेटों की गाली-गलौज चुपचाप सुनते और नाचते रहते। परेशान होकर बेटों ने उन्हें उनकी ही बनाई हवेली से बाहर निकाल दिया। बिना किसी शिकवा-शिकायत के नंदू गाँव के बाहर बगीचे में बने झोपड़े में रहने लगे। वहीं से नाच का शौक पूरा करते थे। नाच की ही कमाई से तीन गाँवों में पाही बनाई, हवेली बनाया और सब कुछ छोड़ दिया जैसे कुछ था ही नहीं। अब वस एक साध रह गई थी कि बिटिया का ब्याह हो जाए तो फिर आखिरी दम तक नाचते गाते रहें।

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लड़कों का ब्याह तो नंदू के धन-दौलत के बल पर हो गया पर लड़की के ब्याह में नंदू का नचनिया होना बाधा बन गया। यही वह बात थी जिसने जग्गी, सत्तू की नजरों में नंदू को साँप बना दिया। नंदू को अपने सम्मान पर कलंक मानते हुए दोनों बेटे उन पर अक्सर अपना गुस्सा उतारने लगे थे। नंदू भी समझ नहीं पा रहे थे कि न जाने कितने लोगों की बेटियों के ब्याह में वे नाचते रहे हैं। पर उनकी ही बेटी के ब्याह में उनका नचनिया होना बाधा कैसे बन गया। जग्गी तो अब गुस्से में नंदू पर हाथ भी उठाने लगा था। नंदू चुपचाप मार खाते और अकेले पड़ने पर रोते।

अब नंदू स्टेज पर अपनी बेटी के ब्याह के लिए तपस्या करते तो लोगों को लगता कि नंदू नाच रहे हैं, बेटी के सुख के लिए दुआ करते तो लोगों को लगता कि नंदू पाठ खेल रहे हैं, अपनी बेटी के दुख में रोते तो लोगों को लगता कि नंदू गा रहे हैं।

बेटी के ब्याह की बात कहीं बन नहीं पा रही थी। नंदू के बेटों ने उनसे अपने सारे संबंध तोड़ लिए। अब नंदू बहुत अकेले पड़ गए थे। किसी तरह जग्गी ने पड़ोस के जिले में अपनी बहन की शादी की बात चलाई। उसने लड़के वालों से बताया कि लड़की के माँ-बाप दोनों मर चुके हैं। लड़के वाले कुछ बिना माँ-बाप की लड़की पर दया करके और कुछ रुपये की माया से तैयार हो गए।

शादी की बात कर लड़के सीधे नंदू के झोपड़े पर आए। जग्गी ने सख्त लहजे में समझाया कि तुम्हें इस शादी से कोई मतलब नहीं रखना है। लड़के वालों से बता दिया गया है कि लड़की के माँ-बाप दोनों मर चुके हैं। नंदू चकरा गए। वे सिर्फ इतना बोल पाए कि ‘लेकिन हम तो जिंदा हैं’, बस सत्तू ने लपक कर उनका गर्दन पकड़ लिया ‘तुम मरोगे लेकिन हम सबको मार कर…। नंदू के गले से गों-गों की आवाज आ रही थी। सत्तू गुस्से में था। ‘चाहते क्या हो तुम? लड़की सारी उमर कुँवारी बैठी रहे, नचनिया का बेटा बनकर तो हम जी रहे हैं पर नचनिया की बेटी से कोई ब्याह नहीं करना चाहता।’ यह कहते हुए सत्तू ने जोर से नंदू के पेट में लात मारी। नंदू दर्द से कराहते हुए वहीं दुहरे हो गए। आज बहुत दिन बाद नंदू को अपने माई और बाबूजी की बहुत याद आ रही थी।

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जग्गी ने नंदू को घसीटते हुए झोपड़े से बाहर कर दिया। फिर एक-एक कर नाच का सारा समान झोपड़े के बीचों-बीच में इकट्ठा करने लगा। नाल, नगाड़ा, हारमोनियम, नाच के पर्दे, कपड़े सब कुछ। अंत में सत्तू ने नंदू का मेकअप बॉक्स उठाया, जिसके जादू से नंदू मीनाकुमारी में बदल जाते थे। नंदू ने अपनी आँखें बंद कर ली। जग्गी ने झोपड़े में आग लगा दिया। अंत में गुस्से में आकर सत्तू ने वह बक्सा भी आग में फेंक दिया। नंदू चेतनाशून्य हो गए थे। वे अपनी जिंदगी की एक-एक आस को राख में बदलते देख रहे थे।

उसके बाद किसी ने नंदू को नाचते-गाते तो क्या बोलते भी नहीं देखा। लोगों के जेहन में अब मीनाकुमारी नाच पार्टी की सिर्फ बातें बची थीं।

लड़के वालों के घर बरिच्छा की शानदार तैयारी की गई थी। जलपान के बाद बरिच्छा का कार्यक्रम शुरू हुआ। मंत्रोचार के बीच जैसे ही जग्गी लड़के को तिलक लगाने के लिए उठा वैसे ही लड़के के दादा ने उसे टोका, ‘अभी रुकिए, पहले आपको मेरी एक शर्त पूरी करनी होगी।’

जग्गी घबरा गया, ‘लेन-देन की सारी बात हो चुकी है अब कैसी शर्त?’

दादा ने कहा, ‘मेरा यह इकलौता पोता है, इसके जन्म पर इसकी दादी ने एक मन्नत माँगी थी, पहले उसे आप पूरा करने का वचन दीजिए तभी यह शादी हो पाएगी।”

जग्गी अपने रुतबे और पैसे के गुरूर में बोला, ‘दादा! आप शर्त बताइए।’

दादा ने पूरे अभिमान के साथ कहा, ‘शर्त यह है कि मेरे पोते की शादी में मीनाकुमारी का ही नाच होना चाहिए।’

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