उमेश चौहान
उमेश चौहान

लगता है भारत में अब
लोकतंत्र की नई पौध
जमीन पकड़ने लगी है
चलो सींचे इसे जरूरत भर
डालते रहें इसमें खाद-पानी चुनाव-दर-चुनाव
ताकि लहलहा उठे यह फसल भरपूर
क्योंकि देश की जनता अब जागरूकता के साथ
अच्छी उपज वाली फसल की तलाश में है
भले ही वह अभी भी चुनती रहती है यहाँ-वहाँ
अपनी ही जाति-बिरादरी का नेता
और देती है बार-बार खंडित जनादेश भी।

लोकतंत्र की इस नई पौध के लिए
एक लंबा इंतजार किया है हमने
समय-समय पर अनेकों प्रयोग भी किए हैं
हम कभी नहीं भुला सकते
इस लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए किया गया
नेहरू, लोहिया, इंदिरा और जे.पी. का योगदान
कुछ बचकाने और मनमाने प्रयोग भी किए हैं हमने
जिनका जिक्र यहाँ किया जाना इसलिए जरूरी नहीं
ताकि न मिले फिर से उन अनचाही बातों को कोई तूल
जिनके लिए बहुचर्चित रहे हैं लोगों को बरगलाने वाले ऐसे प्रयोग।

See also  लोगों और चीजों में | अलेक्सांद्र कुश्नेर

किसी संकर किस्म की पौध नहीं है यह
जिसके लिए फसल-दर-फसल
खोजते फिरें हम महँगे बीज
या फिर करते फिरें उनका आयात
यह पौध तो खालिस अपने ही खेतों की मिट्टी में उपजाई है हमने
अपने ही अवशिष्टों की कंपोस्ट से पोषित किया है इसे हमने
ताकि बना रहे इस पर हमारा
बौद्धिक और धार्मिक अधिकार
और अक्षुण्ण बनी रहे हमारी
अपनी ही बोई फसल काटने की संप्रभुता
चाहे कैसे भी हों हमारे लिए
इन फसलों की उपज के परिणाम!

See also  जनहित का काम | केदारनाथ सिंह

मित्रो! चलो धन्यवाद दें!
चुनाव 2009 के समापन के इस अवसर पर
इस देश की मीडिया को
सामाजिक विचारकों को
चुनाव आयोग के वोटर-जागरण अभियान को
जिनकी मुहिम से ही आज
जमने लगी है यह पौध
और सबसे ज्यादा तो
देश के लाखों गाँवों में
दूर बैठी उस विशाल जनता को
जिसने हमेशा ही इन प्रयोगों में
चुपचाप अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है।

See also  अघोषित उलगुलान | अनुज लुगुन

चलो उनको भी दे दिया जाय
थोड़ा-सा धन्यवाद
जो बकौल दिनकर जी
अभी तक बैठे रहे हैं बेपरवाह
तटस्थता के अपराधी बने
किंतु अब वे भी तैयार हो रहे हैं
लोकतंत्र की इस नई खेती में
अपना पसीना बहाने के लिए!

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *