उमेश चौहान
उमेश चौहान

मित्रो!
अफसरानो!
पुलिस कप्तानो!
कलक्टर साहबानो!
देश के आला हुक्मरानो!
जनता के नुमाइंदो!
न्याय के रखवालो!
चौथे स्तंभ वालो!
खोलो अब अपनी सोच के बंद किवाड़!
जरूरी हो गया है आज कि मिटाकर प्रबल तंद्रा को
किया जाय अब अपनी चेतना का विस्तार!

जिंदगी से हैरान-परेशान चूहों की सभा में
भले ही यह फैसला न हो पाया हो अभी कि
कौन बाँधेगा बिल्ली के गले में घंटी
लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि
खतरे की घंटी तो बज ही चुकी है
खास तौर पर यह खबर पढ़कर कि
एक एम.बी.ए. पास ने
दो साधारण फौजी जवानों के साथ मिलकर
क्रांति का आगाज करने के इरादे से
भगत सिंह के महत्कर्म को मिसाल बनाकर
नोयडा में लूट ली स्टेट बैंक की एक शाखा

See also  दृष्टि

भले ही बचकाना हो उनकी हरकत
जघन्य अपराध हो उनका ऐसा करना
सजा भी मिले शायद उनको इसकी
और कोई भी
एक बूँद आँसू तक न बहाए उनकी बदहाली पर
लेकिन, मित्रो!
खतरे की घंटी तो बज ही चुकी है न!
भले इकट्ठे होकर
चूहे न ले पाए हों कोई फैसला अभी तक!

See also  नवीन कल्पना करो | गोपाल सिंह नेपाली

बेहतर होगा मित्रो!
अब तुम अपने आप ही
बजाना शुरू कर दो खतरे की घंटियाँ
ऊपरी तौर पर तो
व्यवस्था भी स्वागत कर ही रही है
सीटी बजाने वालों का!

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *