जहाँपनाह जंगल

उजाला अब इतना था कि सबके चेहरे नजर आ रहे थे। मेरा भी। अलस्सुबह का झुटपुटा था या ऐसी मटमैली रोशनी, जब सूरज कहीं होता तो है लेकिन दिखाई नहीं देता और जब तक कि आप सोचें, वह अचानक चमकने लगता है – जंगल में धूप की तरह। उस नीमरोशनी में मैंने साफ-साफ देखा कि सबके चेहरों से वहशत टपक रही है। लोग अपनी-अपनी गुफाओं और ठीयों से बाहर निकल आए थे और स्क्वेर के बीचोंबीच वाले पार्क में घबराए-से जमा हो गए थे – एक-एक कर। फ्लैट नं. 32-बी के नेवला, 39-सी के भेड़िया, 44-ए के अजगर और 40-एफ के कबरबिज्जू… इन चरिंदों के अलावा कुछ परिंदे भी थे लेकिन जिनके मैंने नाम नहीं दिए थे – वे कुछ भी हो सकते थे – मोर, फाख्ते, कठफोड़वा, चील या गिद्ध…

बुड्ढी डाक्टर सेई अपनी छत पर खड़ी थी – कालोनी की और औरतों की तरह जो अपनी-अपनी बालकनियों या छतों या दरवाजों पर गिलहरी की तरह खड़ी देख रही थीं या इस फिराक में थीं कि क्या हुआ या होने जा रहा है। पार्क में कुछ नहीं था, सिवाय एक उस सुविधा के कि वहाँ से हादसे वाली जगह नजदीक पड़ती थी और ठीक-ठाक देखी जा सकती थी हालाँकि जिस फ्लैट में वो घटना हुई थी वहाँ अब देखने के लिए कुछ नहीं था। पुलिस के एक-दो सिपाही बाहर बैठे डंडे हिला रहे थे – ऐसे चरते हुए घोड़ों की तरह जो थोड़ी-थोड़ी देर में अपनी पूँछ हिला लेते हैं दाएँ-बाएँ, बाएँ-दाएँ।

‘भाई, हद हो गई।’ किसी ने कहा।

‘अंधेर है, अंधेर…’

‘मुल्क का तो सत्यानाश हो गया। रसातल को जा रहा है देश।’

‘लोगों का लहू सफेद हो गया है।’ कोई रिरियाया, ‘किसी के जान-माल को कोई पुरसानेहाल नहीं।’

‘अल्लाह, रहम कर।’ साँस भरकर मास्टर खरगोश बोले।

‘कितना माल-मत्ता गया?’ अचानक 39-सी के भेड़िये ने मुझसे धीरे से पूछा। मैं चौंका जरूर लेकिन मैंने जवाब नहीं दिया – जान-बूझकर। इस हरामजादे से मुझे इतनी नफरत है कि उसका चौखटा देखते ही मैं गुस्से से भर जाता हूँ लेकिन वह है कि मौका-बमौका मेरे ही आस-पास ठँस जाता है।

‘जब जान ही के लाले पड़ जाएँ तो माल-मत्ते का क्या है?’ मेरे पास खड़े अरना भैंसे ने जवाब दिया। उसने सुन लिया था। कालू भेड़िए ने बेशर्मी से गर्दन हिलाई यानी वो तो है। तभी एक जीप आकर उस फ्लैट के सामने रुकी और उसमें से एक वर्दीधारी इंस्पेक्टर उतरकर अंदर चला गया। वह लकड़बग्घे की तरह चलता था और अब वह आया तो पार्क के पीले पेड़ों के पीले पत्ते एकाएक झरने लगे। दस-बारह लोगों के छोटे-छोटे बतियाते ग्रुप यकबयक चुप हो गए। क्या हुआ? लगता है, जीप अस्पताल से लौटी है। औरत तो यहीं अधमरी हो चुकी थी शिकार में पिटी नीलगाय की तरह। लगता था, मृत्यु की औपचारिक घोषणा-भर के लिए अस्पताल ले जाई जा रही है लेकिन आदमी की हालत गनीमत थी, हालाँकि जब बह यहाँ से ले जाया जा रहा था, उसका सर भी फट चुका था और खून से लथपथ था। जानना मैं भी चाहता था लेकिन हिम्म्त की खिसके ने। वह ग्रुप से टूटकर सीधे उन सिपाहियों तक जा पहुँचा, छोड़ी देर चील की तरह आस-पास मँडराता रहा और खबर ले आया कि औरत बस अब-तब की मेहमान है यानी आदमी की हालत भी अच्छी नहीं ।

‘और बच्चा?’ किसी ने पूछा।

‘हाँ जी, बेचारे बच्चे का क्या हुआ?’

क्या होना था बच्चे का? अगर मैं इस कालोनी का न होता तो शायद इस हमदर्दी पर कुर्बान हुआ जा सकता था लेकिन मैं इसी कालोनी का था – कालोनी ही नहीं, इसी स्क्वेर का और सब-कुछ की बराबरी का हिस्सेदार। सारी आवाजें मैंने भी सुनी थीं – शुरू से आखीर तक, लेकिन अपने फ्लैट के अंदर दुबका हुआ मैं भी अनजान बना हुआ था दरार में छिपे गोह की तरह, कैप्टन जेबरा की तरह, 41-एफ के सियार की तरह, सामने वाले अरना भैंसे की तरह या अपने पड़ोसी कबरबिज्जू की तरह…

यह संयोग नहीं था कि मैं उस वक्त जागा हुआ था। रात मैं देर से लौटा था एक पार्टी से। पार्टी क्या, अपनी ही चंडाल चौकड़ी से। मेरे तीन-चार दोस्तों का यह गिरोह जब भी इकट्ठा हो जाता है, शाम को शगल में तब्दील कर लेता है। कोई भी हलाल हो सकता है या हम बारी-बारी से एक-दूसरे को हलाल करते रहते हैं – गरज शाम काटने से या उससे बचने से है। बहरहाल, रात को बारह बजे के आस-पास जब मैं लोटा तो मेरे पेट में शराब के तीन-चार पैग पड़े हुए थे और मैं मस्त था। ऐसे में नींद तो फौरन आ जाती है लेकिन जाने क्या होता है कि दो-तीन घंटे बाद अचानक आँख खुल जाती है और मैं करवटों बदलता हुआ अपनी ही जिंदगी का तखमीना तैयार करने लगता हूँ – क्या खोया? ये-ये-ये। क्या पाया? खाक-धूल! कहाँ पहुँचे? दादरी से दिल्ली। दिल्ली पहुँचकर कौन-सा तीर मार लिया? क्यों, दिल्ली में रहना ही क्या तीर मारना नहीं है? …कल क्या करोगे? वही जो गुजरे हुए कल में किया था या उसके पहले वाले कल में किया था या उसके भी पहले वाले कल में किया था…

कोई साढ़े तीन या चार का वक्त होगा। सीटी बजाकर चोरों को सावधान करने वाला नेपाली चौकीदार जाने कब का गायब हो चुका था। एकाएक कोई गाड़ी आकर रुकी – पार्क के इस या उस कोने पर। तब मैंने ध्यान नहीं दिया था। जब वह दुबारा भागने के लिए चली तब याद आया कि हाँ आई थी। पहले गोली चलने की आवाज हुई थी, फिर किसी महिला की चीख। चीख नहीं, अँधेरी खामोशी को चीरता हुआ आर्तनाद। फिर यकबयक चुप्पी। फिर कुछ खटर-पटर के साथ आदमी का चिल्लाना जो एकदम रोक दिया गया। फिर कोई धप्प-धप्प की आवाज के साथ भागा था – बचाओ-बचाओ, चिल्लाता हुआ। यह कोई बच्चा था जो पार्क में आ गया था और हैबतनाक आवाज में जोर-जोर से चिल्ला रहा था – बचाओ-बचाओ, …पहले मैं उठकर बैठा। फिर पत्नी। बत्ती जलाई थी लेकिन पत्नी ने डाँटकर बुझा दी। खिड़की के बाहर अँधेरे पार्क में देखने की कोशिश की थी जहाँ से बच्चे की चीख सुनाई दे रही थी। दो-चार और फ्लैट्स में बत्तियाँ जली थीं, एकाध में बत्ती जलकर बुझ भी गई, मेरी तरह। लेकिन कोई बाहर नहीं निकला था। चंद चीखों के बाद बच्चा भी जाने कहाँ गुम हो गया था। वह तो बाद में किसी फ्लैट के अँधेरे जीने में बिलखता हुआ मिला – तब जब लुटेरे गाड़ी में बैठकर निकल भागे थे और स्क्वेर के मुझ जैसे शेर धीरे-धीरे बाहर निकलकर पार्क में आए थे यह कहकर ताज्जुब करते हुए कि भई, क्या हो गया…?

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कौन नहीं जानता था कि क्या हो गया। जब लोग अपने-अपने फ्लैट्स के अंदर थे तभी जान गए थे कि एक फ्लैट में लुटेरे घुस आए हैं, माल-असबाब तो जा ही रहा है, वहाँ जान के लाले पड़े हुए हैं। कुछ जानकारी बाहर आने पर मिली थी यह कि किस तरह लुटेरे कालोनी में आए – जंगल में अंधड़ की तरह और सीधे उस फ्लैट में दाखिल हुए, किसने हील-हुज्जत की, कौन लोहे के सरियों में बिछा दिया गया, कौन लहूलुहान गिर पड़ा और कैसे बच्चा निकल भागा – मुहल्ले वालों को गुहार लगाता हुआ…

धूप अभी भी निकली नहीं थी। शायद बदली थी। पास के मंदिर में घंटा बजने लगा था और गुरुद्वारे की नगर-कीर्तन करने वाली टोली झाँझ-मंजीरे के साथ वापस लौट रही थी। इसी समय हादसे वाले फ्लैट के सामने खड़ी जीप स्टार्ट हुई और वर्दीधारी इंस्पेक्टर को लेकर चली गई। सिपाही अब इत्मिनान से डंडे हिलाने लगे।

नल के आने का वक्त हो चुका था, लोग अब खिसकने लगे। पहले अरना भैंसा गया, फिर जेबरा और उनकी देखादेखी दो-चार और। जो चले गए, बचे हुए उनकी बखिया उधेड़ने लगे।

‘बड़ा तुर्रमखाँ बनता था।’ एक ने लौटते हुए जेबरे को देखते हुए कहा, ‘एक मासूम बच्चा इसी के फ्लैट के सामने गुहार लगाते-लगाते ढेर हो गया, लेकिन पट्ठा बाहर नहीं आया। अरे हमारे पास होती ट्वेल्व बोर गन… बताते।’

‘रिवाल्वर तो यार तेरे पास भी है।’ किसी ने जड़ दिया ‘तू क्यों नहीं निकला?’

‘तुम चुप रहो जी,’ उसने भड़क कर जवाब दिया, ‘तुम ही निकल आते डंडा लेकर। मुकाबले के लिए हथियार नहीं हिम्मत की जरूरत होती है…।’

तभी पड़ोस में, 35-बी की गूँगू और पगली लड़की जोर-जोर से चीखने और चिल्लाने लगी यहाँ से वहाँ तक टहलती हुई। वह उसका रोज का काम था।

जिस किसी ने कालोनी का नाम रखा था, था वह दिलचस्प। दिलशादनगर का नाम सुनते हा मेरी तबियत हरी हो गई थी। कुछ तो नाम का आकर्षण था, फिर नई दिल्ली और वह भी साउथ में रहने की जिद, मैं खिंचा चला आया था और उसमें मैंने हजार खूबियाँ ढूँढ़ निकाली थी। माना कि जरा दूर है मगर उससे क्या हुआ? दिल्ली में दूरियों का भला कोई मतलब होता है। अगर बसें ठीक-ठाक हों तो जैसे सात किलोमीटर वैसे सत्रह। फिर मैं कई धक्के खा चुका था। पहले जंगपुरा एक्सटेंशन, फिर तालकटोरा गार्डन, फिर न्यू राजेंद्रनगर फिर वापस जंगपुरा एक्सटेंशन। मैं टांड-टबीला उठाए यहाँ, वहाँ तंग आ चुका था और कुछ बरस एक जगह सुकून से रहना चाहता था।

तीन साल पहले कालोनी नई-नई बसी थी। मस्जिद-मोठ और तुगलकाबाद के बीच एक जंगल था। था क्या, है – जहाँपनाह जंगल। उसके सामने कभी शायद दिलशाद सराय नाम का गाँव था – उजड़ा हुआ। उसे पूरी तरह उजाड़कर दिल्ली विकास प्रधिकरण ने यह कालोनी बसाई थी।

जहाँपनाह जंगल के सामने एक पीला बोर्ड पहले ही लगा हुआ था :

देहली डेव्हलपमेंट अथॉरिटी
             जहाँपनाह
           सिटी फॉरेस्ट

देखते ही देखते उसी के सामने दिलशादनगर का एक और पीला बोर्ड लग गया और वहाँ बसें रुकने लगीं।

जो लोग दूरदर्शी थे और जिन्होंने समय पर रजिस्ट्रेशन करवा लिया था, देखते-देखते उनके नाम फ्लैट निकल आए थे। कुछ खुद आ बसे थे लेकिन अधिकांश ने अपने फ्लैट किराए पर उठा दिए थे। पहले-पहले लोग यहाँ आते झिझकते थे लेकिन मकान की तंगी और आसमान छूते किराए ने अच्छे-अच्छों को यहाँ धकेल दिया था और अब यह आलम था कि साइकिल वाले से लेकर टोयोटा वाले तक एक साथ रहने लगे थे। बस्ती पचरंगी हो गई थी – अजब घाल-मेल वाली। नौकरीपेशा लोगों में छोटे, मँझोले और बड़े तीनों थे और तिजारत करने वालों में सब्जीफरोश से ट्रांसपोर्ट एक साथ डटे हुए थे। कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके धंधे का पता नहीं लगता था लेकिन खुदा का दिया हुआ सब-कुछ था उनके पास – वीडियो तक। सोलह सौ चौंसठ फ्लैटों वाली इस कालोनी की इमारतें शीशम के पेड़ जितनी ऊँची थीं, पके पत्ते जैसे रंग की पुती हुई। तिमंजिला थीं और प्रत्येक स्क्वेर में चौसठ फ्लैट थे। हर स्क्वेर के बीचोंबीच एक पार्क बना हुआ था – यह अलग बात है कि हर पार्क बच्चों के लिए खेल के मैदान में बदल चुका था – एक गंजे सिर की तरह जो बीच में तो चमकता है लेकिन जिसके किनारे-किनारे झालरें उड़ती रहती हैं।

मैं अपने स्क्वेर को सबसे अच्छा समझता था – अकारण। हालाँकि कारण ढूँढ़ने लगूँ तो पसंदगी से ज्यादा नापसंदगी के निकल आएँगे। मेरे एन सामने एक कबरबिज्जू रहता था जिससे मुझे सख्त नफरत थी। नफरत इसलिए कि वह मेरे मरने का इंतजार कर रहा था। यहाँ एक कैप्टन था जो आदमी से ज्यादा जेबरा लगता था, एक बैंक वाला था जिसकी शक्ल नेवले से मिलती-जुलती थी और एक एक्सपोर्टर था जिसे देखकर भेड़िए की याद आती थी। हमारे बगल वाले फ्लैट में एक ऐसा परिवार रहता था जिसकी जवान लड़की पागल थी और गूँगी भी। उसे वक्तन-फवक्तन पागलपन के दौरे पड़ते थे और वह चीखने लगती थी। वह कुछ कहती थी लेकिन क्या – यह किसी की समझ में नहीं आता था। अक्सर रातों को हम उसकी चीख से घबराकर उठ बैठते थे क्योंकि अँधेरे में वह आवाज बहुत हैबतनाक लगती थी – जंगल में बनबिलाव की तरह।

स्क्वेर अगर मुहल्ला कहा जा सकता था तो मुहल्ले में किसी से किसी की राह-रस्म नहीं थी। कैप्टन जेबरा और कबरबिज्जू-जैसे दो-एक फालतू लोगों को छोड़कर किसी के पास न तो वक्त था और न इच्छा। स्वयं हमें रहते तीन-चार बरस हो गए थे लेकिन एकाध को छोड़कर हम किसी का नाम तक नहीं जानते थे। पहले हम लोग फ्लैट के नंबरों से काम चलाया करते थे, फिर पत्नी और मैंने मिलकर एक रास्ता निकाल लिया। उस रास्ते में तफरीह भी थी और सुविधा थी। जानवरों की मुनासिबत हर एक को एक-एक नाम दे दो और छुट्टी। खुद मुझे पीठ पीछे शायद गोह कहा जाता था। इसमें गलती मेरी ही थी। एक बार विनोदप्रियता के जोम में आकर मैंने यह कह दिया था – यह भी कोई फ्लैट हुआ। मुझे तो यह एक ऐसी दरार की तरह लगता है, जिसमें मैं एक गोह की तरह रह रहा हूँ…

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हाँ, इसी मानी में एक आदमी खुशनसीब था – फ्लैट नं. 38-बी का खिसके। खिसके उसका नाम नहीं था, हम लोगों ने दे रखा था खिसके। इसलिए वह अपनी जगह से थोड़ा खिसका हुआ था, यानी थोड़ा सा पागल।

थोड़ा सा इसलिए कि वह बेजरर था। बेजरर इसलिए कि न तो वह किसी को तंग करता था और न वह चीखता-चिल्लाता था। सच तो यह है कि वह किसी से ज्यादा बोलता चालता भी नहीं था वह कुछ कतरा नहीं था लेकिन सारा दिन व्यस्त दिखाई देता था – गलत को सही करता हुआ। वह काम कालोनी के खोए हुए बच्चों को उनके घर पहुँचाने से लेकर लुढ़के हुए डस्टबिनों को सही करने से लेकर कुछ भी हो सकता था – बहुत पहले वह पुलिस में था – कोई छोटा-मोटा सा अफसर – लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि वह घर बिठा दिया गया, वक्त से बहुत पहले। अब उसका घर-बार था, बीवी-बच्चे थे, वह उनके साथ रहता भी था लेकिन एक बेकार फर्नीचर की तरह। पत्नी किसी कंपनी में काम करती थी सो घर चल रहा था।

उसके चाल-ढाल में ही कुछ ऐसी बात थी कि वो एकाएक किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेता था, हालाँकि वह कमीज के साथ पाजामा पहनता था और दाहिने पायँचे को जाँघ के पास से पकड़ते हुए चुटकियों में पकड़ते हुए नेफे तक तेज-तेज चलता था – चीते की तरह। वह अक्सर अपने गेट पर खड़े रहता था, अंदर जाने के लिए। फिर अंदर जाता था बाहर आने के लिए और एकाएक बहुत तेजी से निकल पड़ता था, चौराहे से वापस लौटने के लिए। अक्सर वह किसी भी राहगीर को एकाएक पकड़ लेता था। उसे रोककर कहता – सुनिए, आप पोस्ट आफिस तो नहीं जा रहे हैं? न भी जा रहे हों तो मेरा एक काम कर दीजिए, प्लीज। यह चिट्ठी डाल दीजिए। बहुत जरूरी है।

जरूरी नहीं कि वह हाँ या ना के जवाब के लिए रुके। उसका काम था रोकना, रोक लिया, चिट्ठी थमानी थी, थमाई और उल्टे पाँव तेजी से वापस। दरअसल वह एक पुरजा होता था किसी अनाम को संबोधित और शिकायतों से भरा हुआ। शिकायतें कुछ इस तरह की होती थीं कि मेरी बीवी हर्राफा है और वह मुझे मार डालना चाहती है। उसने मेरे बच्चों को सिखा रखा है कि वह मुझे तंग करें। ये लोग मुझे खाना नहीं देते और मेरे मरने का इंतजार कर रहे हैं। मेरे पड़ोस में रहने वाला बुड्ढा कालू लैंपपोस्ट के बल्ब तुड़वाता है ताकि वह अँधेरे में बैठकर शराब पी सके और मुहल्ले की बहू-बेटियों की ताक-झाँक कर सके। वह बहुत हरामी है या अमुक प्लैट में अमुक कबूतरी की जगह वह नहीं है, उसकी सही जगह है फ्लैट नं. …। मैं पुलिस में कहकर एक-एक को सही करा दूँगा।

शुरू-शुरू में जब लोग जानते थे तो एकाध बार बावेला मचा था लेकिन जब लोग समझ गए तो उन्होंने ध्यान देना बंद कर दिया। खिसके ने भी थोड़ी ज्यादती कर दी थी। उसने पड़ोस की एक बहुत सुंदर महिला को उसके घर जाकर ऐसी ही कोई चिट्ठी दे दी थी और वह हर रोज यही करना चाहता था…

‘आप क्या कर रहे हैं?’ पार्क से बाहर जाते हुए खिसके ने मुझसे पूछा। वह पता नहीं कब मेरे हमराह हो गया था और साथ-साथ चलने लगा था।

‘कहाँ क्या कर रहे हैं?’

‘यहीं और कहाँ?’

‘वही कर रहा हूँ जो आप।’ मैंने कहा, ‘रह रहा हूँ।’

‘रह तो आप नहीं रहे हैं,’ उसने तल्खी से कहा – हाँ घुसे हुए जरूर हैं। दिलशादनगर में सिर्फ मैं रह रहा हूँ बाकी सब घुसे हुए हैं। अँधेरी दरार में घुसे हुए गोह की तरह…’

मुझे लगा वह मुझ पर व्यंग्य कर रहा है। खासकर गोह सुनकर और भी। इस कंबख्त को भी पता है कि मुझे गोह कहा जाता है।

‘बताइए, आप कौन-सा तीर मार रहे हैं?’ मैंने गुस्से में कहा। ‘मारा तो नहीं है, हाँ, अब जरूर मारूँगा। आप देखते ही रह जाएँगे। मैं पुलिस से कहकर एक-एक को सही कर दूँगा।’

‘वह तो आप करा ही रहे हैं।’ मैंने हादसे वाले फ्लैट की तरफ इशारा करके कहा। वहाँ अब भी पुलिस वाले डंडे हिला रहे थे। मैं हँसने लगा।

वह मुझे कई क्षण तक घूरकर देखता रहा। फिर पाजामे के पायँचे को नेफे तक उठाए तेजी से चला गया। घर नहीं, आगे चौराहे की ओर।

उस दिन दफ्तर को जाने वाली अपनी चार्टर्ड बस में भी सिर्फ उसी की गूँज थी। लोग गुस्से में थे लेकिन सहमे और डरे हुए। अपनी ही कालोनी में इतनी बड़ी घटना हो गई थी – भला कौन अछूता और बचा हुआ रह सकता था। यों इस तरह की घटना दिल्ली में नई बात नही रह गई थी। आए दिन ऐसी खबरें मिलती ही रहती थीं – हर घटना कमोवेश एक-जैसी ही होती थी, सिर्फ क्षेत्र बदल जाता था – कभी करोलबाग तो कबी ईस्ट पटेलनगर, आज राजौरी गार्डन तो कल जमनापार का आदर्श विहार…

अजीब बात है कि जब तक ऐसी घटना कहीं और होती है, हम उसे खबर की तरह लेते हैं लेकिन जिस दिन हमारे आस-पास होती हैं, हम यकबयक डर जाते हैं और हमें गुस्सा आता है – खासकर सरकार पर…

यही गुस्सा बस के लगभग सभी यात्रियों के चेहरे पर था। सभी को अचानक समाज और देश की याद आ गई थी और कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर गुर्राया जा रहा था, हालाँकि यह सभी जानते थे कि वह गुर्राना किसके लिए था। और तो और मैं भी शर्मिंदा नहीं था कि मेरे ही स्क्वेर की घटना की तफ्सील मुझे बस में मिल रही थी और वह भी दूसरों से। मालूम हुआ कि जिसके फ्लैट में यह घटना हुई उसके मालिक का नाम रामेश्वर वर्मा था। पैंतालीस-पचास के आसपास का वह आदमी एक मँझोले दर्जे का व्यापारी था और पत्नी और बच्चे के अलावा परिवार में और कोई नहीं था। बहन मेरठ में थी और बड़ा भाई बंबई में। चाहे उसकी जवान पत्नी के बदन पर दमकते जेवरों का आकर्षण हो या पैसों का, रिवाल्वर और लोहे के सरियों से लैस तीन लुटेरे एक कार में अंधड़ की तरह आए थे और थोड़ी ही देर में सबका वारा-न्यारा कर आगे बढ़ गए थे -अगली कालोनी में लूट के लिए। उस दिन आसपास तीन डकैतियाँ हुई थीं और सात लोग अस्पताल पहुँचाए गए थे।

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‘उस बच्चे का क्या हुआ?’ मैंने एकाएक बात काटते हुए पूछा। प्रश्न मैंने जिससे किया था वह पूरा जानकार था। पता नहीं क्यों, उसका सारा बदन चितकबरा था और वह चीतल की तरह लगता था लेकिन उसने सुनकर भी मेरी बात का जवाब नहीं दिया।

मेरे पड़ोस में बैठे रोज के सहयात्री और इंडियन एयरलाइंस के सुकुमार बनर्जी ने एक बार मेरी तरफ देखा फिर आसपास से निर्लिप्त खिड़की से बाहर देकने लगे – सामने फैली हरियाली को, पेड़ों को, बिना बादलों वाले आकाश को और उस हवा को जिसमें सोने जैसी धूप घुली हुई थी। दिल्ली में ये सितंबर के अंतिम दिन थे जब धूप बहुत नर्म होती है, हवा बहुत तोज और पेड़ों के पत्ते निखर कर बहुत हरे हो जाते हैं – पीले पत्तों को गिराते हुए।

बस इंडिया गेट के पास से गुजर रही थी।

‘क्या आपने कभी इस जहाँपनाह जंगल को देखा है?’

अभी कुछ दिन पहले ही बनर्जी ने मुझसे एकाएक पूछा था। हम दोनों बस का रास्ता देख रहे थे। जहाँपनाह जंगल के सामने।

‘मैं अक्सर सोचता हूँ कि किसी दिन इस जहाँपनाह जंगल को अंदर से देखा जाए। ये सारे पेड़ शीशम के हैं और अंदर शायद बहुत से अनार लगे हुए हैं। अक्सर सुबह जब बहुत से मोरों की गुहारती हुई आवाज यहाँ से आती है तो मुझे बेचैनी सी होती है और लगता है कि अभी चलो। लगता है, देखना चाहिए कि आखिर लोग इससे डरते क्यों हैं। क्यों इतनी सारी कहानियाँ इसके बारे में कही-सुनी जाती हैं। क्यों आए दिन किसी-न-किसी जवान आदमी की कटी पिटी लाश यहाँ मिलती है। लेकिन फिर सोचता हूँ…’

कहते-कहते बनर्जी रुके थे, और मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि वह फाख्ता की तरह लग रहे हैं। उन्होंने एक बार मेरी ओर अपनी गोल-गोल और गुलाबी आँखों से देखा था और भावुक स्वर में कहा था – ‘पता नहीं, क्या सोचता हूँ। आप बताइए।


दिल्ली में चार्टर्ड बसें जिन्नात की तरह होती हैं। वे रोज सुबह हमें एक खास वक्त पर घरों से निकालती हैं और अपने-अपने दफ्तरों में जमा कर देती हैं। रोज शाम को वे कुछ खास-खास जगहों से उठाती हैं और ठीक वक्त पर हमें वापस अपने घरों में फेंक जाती हैं। हम जिन्नात से बचना चाहते हैं लेकिन हर बार अपने-आपको इनके हवाले कर देते हैं – यह जानते हुए कि ये हमें वहाँ ले जाते हैं जहाँ हम जाना नहीं चाहते।

शायद इसलिए जाते या आते हुए हम अक्सर चुर रहते हैं।

लेकिन उस शाम को वापस घर लौटते हुए मैं चुप ही नहीं था, एक धड़का भी लगा हुआ था। जैसे मैं जानता था कि घर के आस-पास कुछ डरावना सा मेरी राह देख रहा है – अँधेरे खंडहर में लटके हुए चमगादड़ की तरह। पत्नी गेट पर ही मिली, राह देखती हुई नहीं, सहमी हुई बिल्ली की तरह एक ओर देखती हुई। रामेश्वर वर्मा के फ्लैट के सामने जो दो-चार लोग मुँह लटकाए खड़े थे उनमें से एक खिसके भी था। ‘क्या हुआ?’ मैंने घबराकर पूछा तो पत्नी ने उस फ्लैट की तरफ इशारा कर दिया।

मालूम हुआ कि रामेश्वर वर्मा बच नहीं पाए और उनकी पत्नी अब भी अस्पताल में बेहोश पड़ी है। बच्चा न तो घर पर था और न अस्पताल में। पता नहीं कहाँ था।

मालूम हुआ कि रामेश्वर वर्मा की छोटी बहन खबर सुनते ही मेरठ से आ गई है। आई थी वह भाई-भावज को देखने लेकिन घर पर स्वागत किया एकाध पड़ोसी और पुलिस के उस सिपाही ने जो रामेश्वर वर्मा की लाश लेकर उसी वक्त अस्पताल से आया था।

मैंने देखा स्क्वेर में कहीं कोई हलचल नहीं थी। और तो और उस फ्लैट में भी रोने की आवाज नहीं आ रही थी।

हाँ पड़ोसी की गूँगी और पगली लड़की ही सरेआम चीखने लगी थी। आज उसका स्वर कहीं गुना हिंसक और आक्रामक हो गया था।

दिलशादनगर में शाम रोज की तरह हुई। रात उसी तरह। कालोनी की सड़कें उसी तरह गुलजार थीं – खोमचेवालों, फेरीवालों और आइसक्रीम के ठेलों से। बच्चों की उँगली पकड़े सुंदर स्त्रियाँ थीं, मस्ती करते हुए नौजवानों के गोल थे और जीन्स में ठिलठिलाती हुई लड़कियाँ… स्वयं अपने स्क्वेर को देखकर यह विश्वास करना कठिन था कि वहाँ के एक सूने फ्लैट में एक मैयत पड़ी है और बहन अपने बंबई वाले भाई का इंतजार कर रही है। पता नहीं, कब से कर रही है।

रात के समय कोई ग्यारह बजे थे। मैं कालोनी की खास सड़क पर आदतन टहल रहा था, या सच कहूँ तो लेंडू कुत्ते की तरह शिकार की टोह में था, रोज की तरह। सड़क के एक सिरे पर रोशनी थी और दूसरे में अँधेरा। मैं लोमड़ी जैसी चालाकी के साथ चहलकदमी कर रहा था कि एक बार किसी ने मुझे एकाएक पकड़ लिया। कंधे से। चौंककर देखा तो खिसके था, अँधेरे में प्रेत की तरह मुझे घूरता हुआ। उसकी आँखें अँधेरी झाड़ी में छिपे हुए चीते की तरह जल रही थीं।

‘क्या है?’ मैंने अपने डर को छिपाते हुए झल्लाकर पूछा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। कई पल वह मुझे ऐसे घूरता रहा जैसे खा जाएगा। फिर उसने मुझे एक चिट्ठी पकड़ा दी। वह उन लोगों में से था जो सरेशाम सो जाया करते हैं। ताज्जुब हुआ कि आज वह इतनी रात गए अँधेरे में कैसे भटक रहा है।

कहा, ‘जरूरी है, बहुत जरूरी।’

और तेजी से चला गया।

मैंने वह चिट्ठी बेध्यानी से रख ली थी – दिल के पास वाली ऊपरी जेब में – ऐसे जैसे मैंने उसे सही जगह पहुँचा दिया हो। उसकी इबारत क्या होगी, शायद यह मैं जानता था। लेकिन यह नहीं जानता था कि वह पत्र पहली बार जिस किसी के नाम भेजा जा रहा है उसका नाम होगा :

देहली डेव्हलपमेंट अथॉरिटी
           जहाँपनाह
         सिटी फॉरेस्ट

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