धूप : एक गौरइया
धूप : एक गौरइया

मैंने कहा धूप से – 
धूप! जरा ठहरो, 
मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी, 
यहाँ यह ठिठुरन,यह अंधियारा 
मुझे तनिक नहीं भाता है। 
लेकिन धूप,धूप थी, 
भला क्यों रुकती ! 
मुझे मटमैली साँझ दे चली गई। 
मैंने देखा : मेरे ऊपर से 
पंख फड़फड़ा गौरइया एक क्षितिज की ओर उड़ी 
जाने कहाँ खो गई।

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