दस्तक दर दस्तक

उसकी पत्‍नी की छोटी बहन और उसका पति पिछली शाम उसके घर आ गये थे। वह लोग गर्मियों की लंबी छुट्टियों में देहरादून और मसूरी मे रहने का प्रोग्राम बनाकर आये थे। वह लोग यकायक अथवा संयोग से नहीं आ पहुंचे थे। उन्‍होंने अपने चलने से पहले तार और खत के द्वारा निश्चित तिथि की सूचना भेज दी थी। उसे अपने साढ़ू और साली के स्‍टेशन पर पहुंचने का समय और ट्रेन का भी पता था। इस संबंध में काफी पत्राचार हो चुका था और उसकी पत्‍नी ने उन लोगों को लिख भेजा थाः ‘मैं भी आप लोगों के साथ देहरादून चलना चाहती हूं। इनका जाना तो नहीं हो पाएगा। हां मैं बच्‍चों के संग पूरी तरह तैयार रहूंगी। एक दिन आप लोग यहां ठहरना, अगले रोज किसी गाड़ी से निकल चलेंगें।’

वह बाहर से लौटा तो जेठ की दोपहरी पूरी तरह तप रही थी। घर में एक अजब-सी चुप्‍पी पसरी पड़ी थी। लगता था उसकी साली और साढ़ू खाना खाकर दूसरे कमरे में आराम कर रहे थे। उसकी पत्‍नी कंघी चोटी से फारिग होकर स्‍टूल पर बैठी शायद उसी के लौटने की राह देख रही थी। पत्‍नी के माथे पर तेल की चिकनाहट फैली हुई थी और मुसी हुई धोती एकदम चीकट लग रही थी। हालांकि उसके हिसाब से पत्‍नी के पेट में बच्‍चा होने की संभावना नहीं थी लेकिन उसका पेट बेतरह आगे को निकला हुआ था। छोटे-छोटे दो बच्‍चे फर्श पर नंग-धड़ंग रेंग रहे थे। मैली-कुचैली पत्‍नी और फर्श पर औंधे पड़े बच्‍चों को देखकर उसे गहरी वितृष्‍णा का अहसास हुआ।

अपनी पत्‍नी और बच्‍चों को इस गलीज हालत में देखकर व‍ह चिढ़ गया। मेहमानों के साथ लगकर पत्‍नी का बाहर जाना उसे खामख्‍वाह लगने लगा। वह जानता था कि उसकी साली और साढ़ू इस घर से जितनी जल्‍दी हो सके निकल जाना चाहते थे। यह एकदम तय बात थी कि उन दोनों को यहां हर तरह की असुविधा महसूस हो रही थी। वे लोग एक बेहतर जिंदगी जीने के आदी थे। बच्‍चों-कच्‍चों का भी कोई झंझट उन लोगों के साथ नहीं था। उसका साढ़ू एक महाविद्यालय में प्रोफेसर था और तनख्‍वाह के अलावा परीक्षाओं की कापियां जांचने से भी अच्‍छा पैसा कमा लेता था।

उसकी सास कई बार उसे छेड़ चुकी थीं, ‘लाला। तुम इतने जादे पढ़ लिखके भी कोई ढंग की नौकरी क्‍यों नहीं करते? इस मरी मास्‍टरी की हजार-बारह सौ रुपल्ली में आजकल क्‍या होता है? बाल-बच्‍चे पैदा कर रहे हैं तो कुछ पैसा-रुपया कमाने की भी तो सोचो और कुछ नहीं तो दो-चार टूशन ही पकड़ लो।’

सास हमेशा इसी बिन्‍दु से शुरू करती थीं क्‍योंकि वह अपनी पत्‍नी और बच्‍चों को गर्मियों की छुट्टियों में हमेशा सास के पास छोड़ आता था। बेचारी विधवा सास के पास भी कोई खजाना नहीं गड़ा था। एक तिहाई मकान अपने लिए रखकर उसने बाकी किराये पर उठा रखा था और दो कमरों में वह अपनी तीन बिन ब्‍याही बेटियों और एक फालिजग्रस्‍त बेटे के साथ वक्‍त काट रही थी। उसके बच्‍चे अभागी औरत पर अनचाहा बोझ हो उठते थे। दूध बूंद और दीगर खर्चों के लिए भी वह इस दौरान कुछ नहीं दे पाता था।

वह अपनी प्रतिभा से इतना अभिभूत था कि उसे बेहतर नौकरी की सलाह देने वाला आदमी अपना दुश्‍मन नजर आता था। ज्‍यादा रुपया पैसा कमा सकने वाले लोग उसे निहायत टुच्‍चे और दिमागी स्‍तर पर दिवालिये दिखाई पड़ते थे। उसकी यह ठोस धारणा बन गई थी कि प्रतिभाशाली आदमी परेशान और हमेशा तंग हाल रहने के लिए नियतिबद्ध है। वह मानता था कि उसकी आर्थिक तंगी बौद्धिकता का अपरिहार्य लक्षण है। सास की खरी बातों से वह मन-ही-मन क्रुद्ध होकर कटु आलोचना करने लगता था लेकिन अपनी पत्‍नी और बच्‍चों को लंबी छुट्टियों में सास के पास ही छोड़ आने को विवश हो उठता था।

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उसकी औरत उसे उकसाती थी कि अपनी सास की कोई भी भेंट वह स्‍वीकार न करे लेकिन अपने घर में जरूरत की चीजों की बेहद तंगी देखकर सास द्वारा दी गई मालूमी सौगात को चुपचाप स्‍वीकार कर लेता था। मसलन उसके घर में प्रेशर कुकर नहीं था। उसकी सास ने अपनी बेटी को एक छोटा सा प्रेशर कुकर लाकर दिया तो वह प्रेशर कुकर की सुविधाओं के बारे में दूर तक सोचता चला गया। अंत में स्‍वयं से यह कहकर उसने सास का अहसान उतार फेंका कि मुझे प्रेशर कुकर के होने न होने से क्‍या फर्क पड़ता है – वह दे भी रही है तो अपनी बेटी की सुविधा के खयाल से दे रही है।

उसकी पत्‍नी, अपनी बहन-बहनोई को दो-चार रोज रोककर उनकी खातिर करने को उत्‍कंठित थी क्‍योंकि वह उसके तथा बच्‍चों के लिए बहुत सी चीजें लेकर आये थे और अपने सहज घरेलूपन में वह उसके अपने सगे थे। उन्‍हें लेकर वह अकुंठित थी। जब भी वह उनके घर जाती थी वह लोग उसकी तथा बच्‍चों की जी-जान से खातिर करते थे। उसे उसकी विपन्‍नता का अहसास कभी नहीं होने देते थे। इसके अलावा वह महज उसकी तथा बच्‍चों की वज‍ह से देहरादून को जाने वाली सीधी ट्रेन को छोड़कर उसके घर आये थे। ऐसी स्थिति में उसकी पत्‍नी को मेहमानों को आग्रहपूर्वक रोकना जरूरी लग रहा था।

लेकिन घर की स्थिति इतनी विद्रूपमयी थी कि उसकी पत्‍नी का आस्‍फालन भीतर ही भीतर ज्‍वालामुखी के लावे जैसा उबल रहा था। वह मेहमानों को पिछले दिन न किसी रेस्‍त्रां में ले जा सकी थी न रात को फिल्‍म दिखा सकी थी। उसकी बहन ने कहा था ‘सुना है यहां हैंडलूम की बहुत अच्‍छी साड़ियाँ मिलती हैं।’ उसने अपनी बहन से हुलसकर कहा था ‘कल तो मंगलवार था पर आज बाजार खुला है – सांझ को तुझे साथ लेकर चलूंगी – देख लेना और अच्‍छी लगे तो ले लेना।’

और यह बात उसकी पत्‍नी ने उसे बतलाकर रुपयों का इंतजाम करने के लिए कह दिया था। वह उसे अलग ले जाकर समझाते हुए फुसफसाहट भरे स्‍वर में बोली थी, ‘रज्‍जो कब-कब हमारे घर आती है। इसके पास रुपयों की कमी नहीं है पर हमें इसके रुपये खर्च नहीं कराने चाहिए। एक-दो साड़ी इसे खरीदवा दूंगी – खुश हो जाएगी। जरा-सा मान रह जाएगा बिचारी का। नहीं तो न जाने क्‍या सोचेगी!’

वह अपना गला भींचकर बमका, ‘सोचेगी ऐसी की तैसी। हुंह। साले रईसजादे चले आते हैं अपनी शान दिखाने।’ नफरत का गुस्‍सा उसकी नस-नस में फैल गया। वह फिर बिफर उठा, ‘अब करते फिरो नौली (रुपयों) का अलग से इंतजाम इन साहबजादी की साड़ियों के लिए। क्‍या यहीं अनोखी साड़ियाँ मिलती हैं? इस जमाने में साली हैंडलूम की साड़ियाँ देहातों तक में बिखरी फिरती हैं। पर वह अपने शहर से क्‍यों खरीदे जब उसको तुम्‍हारी जैसी बेवकूफ, फूहड़ औरत अपनी टेंट से खरीदकर देने के लिए पागल घूम रही हो।’

पत्‍नी ने उसका गर्मी से काला पड़ गया गुस्‍सैल चेहरा देखा और स्‍टूल छोड़कर उठ खड़ी हुई। पति के आक्रोश पर उसने कोई तात्‍कालिक प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त नहीं की और पानी का गिलास लाकर उसके हाथ में दे दिया।

पानी का एक घूंट पीकर उसने गिलास झुककर फर्श पर टिका दिया और आत्‍म-रुदन की शैली में प्रलाप करने लगा, ‘बोलो कहां-कहां मारा फिरूं रुपयों के लिए? तुम्‍हारें जाने का इंतजाम करूं या रज्‍जो की साड़ी के लिए रुपयों की भीख मांगू। कहीं रुपयों की टकसाल नहीं लगी है कि ढालूं और तुम्‍हारी झोली में लाकर डाल दूं।’

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अपनी मजबूरियों का रोना रोते-रोते वह यकायक चुप हो गया। उसे लगा कि वह इसी तरह हाय-हाय करता रहा तो उसकी पत्‍नी बच्‍चों को लेकर फिर कहीं नहीं जाएगी और गर्मियों की पूरी छुट्टियों भर वह उनको इसी घर की भट्टी में लेकर सड़ता रहेगा।

वह उल्‍टे पांव लौटते हुए पत्‍नी से बोला, ‘अच्‍छा तुम लोग जाने की तैयारी करो। मैं एक बार फिर से कोशिश करता हूं। अभी तो गाड़ी जाने में कई घंटे बाकी पड़े हैं। गाड़ी तो रात को ही जाएगी। अभी ऐसी कोई जल्दी भी नहीं है।’

वह यह जाने बिना कि रुपयों की व्‍यवस्‍था कहां से करेगा फिर घर से बाहर निकल गया। उसकी जान पहचान का एक भी व्‍यक्ति ऐसा नहीं था जिससे उसने दस-बीस-पचास रुपये उधार न ले रखे हों। अब वह बार-बार दोहराए गए उन बहानों से भी घृणा करने लगा था जिनके आधार पर उसे टरकाने वाले भी थोड़ा बहुत कुछ-न-कुछ दे ही देते थे।

घर से निकलने के बाद वह देर तक सड़कों पर घूमता रहा। जब चक्‍कर काटते-काटते थक गया तो एक के बाद एक कई दोस्‍तों के घर गया मगर उसने रुपये-पैसे के बारे में कोई चर्चा नहीं छेड़ी। हालांकि भीतर-ही-भीतर फैलता एक डर उसे बार-बार उकसा रहा था, अगर वह रुपये लेकर घर नहीं पहुंचा तो भारी दुर्गति हो जाएगी। उसकी पत्‍नी अपनी छोटी बहन को साड़ियाँ नहीं दिलवा पाई तो वह अपमान से तिलमिला उठेगी। ऐसी स्थिति में पत्‍नी और बच्‍चों का बाहर जाना तो एकदम असंभव ही समझो।

वह दोपहर तक घूमते-घूमते पूरी तरह ध्‍वस्‍त हो गया लेकिन हठपूर्वक इस फैसले पर डटा रहा कि वह किसी से उधार नहीं मांगेगा। अंततः वह फिर घर लौट आया।

पत्‍नी ने दरवाजा खोलते ही पूछा, ‘ले आये रुपये? कितने लाये हो?’

उसने पत्‍नी को मैली धोती में लिपटे देख तो उसका पारा एकदम ऊपर चढ़ गया और वह चीख पड़ा, ‘और चिथड़े नहीं रहे घर में लपेटने के लिए?’

थुलथुल मांस के लोथड़ों जैसी औरत से उसे वितृष्‍णा हो रही थी। बच्‍चों की गलाजत से भी उसके भीतर आक्रोश भर उठा। सब उसे अनाथालय के जीव जैसे लगे। उसने मन-ही-मन कहा : यह औरत पत्‍नी के नाम पर माफीनामा है। मुझे हैरत है कि ऐसी सड़ियल और फूहड़ औरत के साथ मैं अपनी जिंदगी झोंक रहा हूं।

‘हुंह’ करके उसने फर्श पर रखे गिलास को ठोकर मार कर दीवार की ओर उछाल दिया। वह यह त्रासद तथ्‍य पूरी तरह भुला बैठा कि इस समय मुख्‍य समस्‍या सड़ी हुई पत्‍नी के साथ रहने या न रहने की नहीं है बल्कि उन रुपयों की जुगाड़ करने की है जिसके सहारे वह अपनी पत्‍नी और मेहमानों को घर से बाहर ठेल सकता है।

पत्‍नी ने उसके आक्रोश को सिरे से दरगुजर करके मतलब की बात पूछी, ‘मैं पूछती हूं कितने रुपयों का इंतजाम करके लाये हो?’

पत्‍नी ने जिस विश्‍वसनीयता के लहजे में यह बात पूछी थी उससे यह लगता था जैसे वह यह बात मानकर चलती है कि उसके पति को हर मांग की व्‍यवस्‍था कर ही देनी चाहिए। गोया उसमें कोई झंझट की बात ही नहीं है। वह बौखला कर किटकिटाया, ‘कानी कौड़ी भी नहीं दी किसी साले ने।’

पत्‍नी ने हैरत से उसका चेहरा देखा और चिंतातुर स्‍वर में बोली, ‘दो-ढाई सौ रुपयों के बिना मेरा घर से निकलना मुश्किल है।’

वह तमतमा कर बोला, ‘तुम इस घर से निकलो या यहीं सड़ती रहो। मैं तुम लोगों के लिए अब और भीख नहीं मांग सकता। तुम लोग उतने में ही गुजारा क्‍यों नहीं करते जितना कि मैं कमा कर लाता हूं।’

पत्‍नी शायद बहस की व्‍यर्थता समझती थी – वह कद्रे-सख्‍त लहजे में बोली, ‘मैं कुछ नहीं जानती। मुझे कम-से-कम दो सौ रुपये लाकर दो।’

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उसकी नजर में पत्‍नी का यह रुख सरासर तानाशाही जैसा था। वह बेकाबू होकर चीखा, ‘रईसजादी। दो-सौ रुपये छोड़, दो पैसे भी कहीं से मिलने वाले नहीं हैं। अब तुम्‍हारे जो जी में आये करो?’

यह महाभारत और आगे नहीं बढ़ गया क्‍योंकि इसी समय उसकी साली और साढ़ू कमरे का दरवाजा ठेलकर अंदर आ गये। शायद वह स्थिति उनके लिए अकल्‍पनीय थी।

उसकी साली अपनी बड़ी बहन को पकड़कर दूसरे कमरे में ले गई। उसके साढ़ू ने उसके नजदीक आकर कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘अरे नरेश जी। आखिर बात क्‍या है? आप तो कभी अपसेट नहीं होते…’

उसके साढ़ू ने अपनी मुद्रा से यह आभास नहीं होने दिया कि वह अपने साढ़ू की आर्थिक विपन्‍नता से परिचित है। उसने पति-पत्‍नी के मनमुटाव को एक साधारण घरेलू स्थिति स्‍वीकार करने की मुद्रा बनाए रखी। वह मुलायम लहजे में बोला, ‘नरेश जी! अब आप नहा-धोकर खाना खाइए और थोड़ी देर सुस्‍ता लीजिए। बाहर से इतनी धूप में आए हैं कहीं तबियत न बिगड़ जाये।’

साढ़ू ने रात की गाड़ी से देहरादून जाने का कोई जिक्र तक नहीं किया – वह कई क्षण तक उसके कंधे पर अपनी हथेली टिकाए रहा।

उसे अपने मेहमानों से इतनी भावुकता भरी बातों की उम्‍मीद नहीं थी – वह उन्‍हें पूरी तरह से अपना शोषक मानकर चल रहा था। वह एकाएक पस्‍त पड़ गया। उसे कहीं यह लग रहा था कि जब वह अपनी पत्‍नी से झगड़ पड़ेगा तो वह लोग उसकी पत्‍नी का पक्ष लेकर उसको निखट्टू सिद्ध करेंगे। ले‍किन उन दोनों की प्रशांत मुद्राओं ने उसे अपनी ही दृष्टि में बहुत हीन बना दिया।

इस स्थिति में उसके लिए घर में एक क्षण भी ठहरना कठिन पड़ गया। नासमझ बच्‍चे तक उसे सहमे-सहमे, कनखियों से देख रहे थे। उसकी पत्‍नी तुर्की-ब-तुर्की उससे उलझ पड़ती तो वह उसे लानत भेजकर शांत हो जाता मगर अब वह अपना दांव पूरी तरह हार चुका था। उससे तो यह गुंजाइश भी बाकी नहीं बचती थी कि वह बेचारी उससे कोई सहज संवाद चला सके। फिर उसमें इतना नैतिक साहस भी कहां बचा था कि वह जिन लोगों के बाहर जाने के किराये तक की व्‍यवस्‍था नहीं कर सका था उनसे निर्भीक होकर आंखें मिला सके?

उसने पांवों के तलुवों से खिसकती चप्‍पलों में अंगूठे फंसाए और तीसरे पहर की झुलसा देने वाली धूप में सहन पार करके जीने में पहुंच गया। उसका गला प्‍यास की वजह से बुरी तरह सूख रहा था और होंठ खुश्‍की के मारे तड़कने लगे थे, पर वह उधर से बेखबर होकर उन बहानों की तलाश कर रहा था जिनके चलते वह लोगों को दो-ढाई सौ रुपये देने के लिए राजी कर सके।

उसके दिमाग में इस समय सिर्फ यही खयाल था कि रात को वह घर बिल्‍कुल खाली हो जाएगा जो इस समय ठंडे युद्ध का मैदान बना हुआ है। अगर एक मकान सहज स्थितियों में रीता नहीं होता तो वह अपने खालीपन में न जाने कितने अभिशप्‍त संवाद दोहराने लगता है।

सहसा उसने अपने मन में संकट की एक तर्कपूर्ण-भूमिका तैयार की और एक परिचित के द्वार पर दस्‍तक देने लगा।

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