बाहरी-भीतरी

चंदन को जब से यह बात पता चली है कि अर्जुन के घर के पास एक कुतिया ने छह पिल्लों को जन्म दिया है तब से वह इसी फिराक में है कि कब, कैसे उनमें से एक पिल्ला उसे मिल जाए। इसी वजह से इन दिनों चंदन अर्जुन के प्रति अतिरिक्त सम्मान और स्नेह प्रदर्शित कर रहा है। साथ ही, दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता। अनिल को तो उसने खास हिदायत दी कि आइंदा से अर्जुन को ‘जंगली’ या ‘होंडो’ भूले से भी मत कहना। दरअसल, उसके सहपाठी अर्जुन मुर्मू ने उसे बताया था कि उसके घर के पास एक कुतिया ने छह पिल्लों को जन्म दिया है। एक अदद पिल्ले के लिए उसकी इतनी खातिर-तवाज्जो हो रही थी।

चंदन को कुत्तों में अत्यंत दिलचस्पी थी। वह जहाँ-जहाँ अपने नन्हें पैरों के सहारे जा सकता था, उस बस्ती को, उस मोहल्ले को, वहाँ के बाशिंदों को वह वहाँ रहने वाले कुत्तों से पहचानता था। किस इलाके में कितने कुत्ते हैं, कौन-कौन-से कुत्ते हैं, कहाँ किस कुतिया ने बच्चे दिए हैं, इसकी जानकारी उसके पास रहती। अपने स्कूल और घर के बीच के सारे रास्तों के आस-पास रहने वाले लगभग सभी कुत्तों से वह पूर्णतः परिचित था। कुत्तों का छोटा-मोटा एक्सपर्ट ही था वह। दो बार कुत्ता पालने की नाकाम कोशिश वह कर चुका था। एक दफे अपनी माँ के विरोध के कारण तो दूसरी बार अपने विस्थापन के खिलाफ पिल्ले की भूख-हड़ताल कर देने की वजह से उसे अपनी कोशिश में कामयाबी नहीं मिली। इस चक्कर में कुत्तों ने उसे चहेटा तो कई बार, काटा बस एक बार ही था। हुआ दरअसल यह था कि चंदन कुमार और अनिल एक गली में नवजात पिल्लों का मौका मुआयना करने गए थे। उनकी माँ तभी कहीं से घूमते हुई आ गई। वह उन दोनों को अपने बच्चों को दुश्मन समझकर झपटी। यह देख अनिल सिर पर पाँव रखकर भागा। पर, चंदन पिल्लों को निहारने में इतना मग्न था कि वह वक्त पर भाग नहीं पाया। चार कुक्कुर-दंत उसकी कलाई में पैवस्त हो गए। उसे पाँच कुएँ झँकाए गए। एक कुम्हार के पास ले जाकर झड़वाया भी गया। गनीमत यह रही कि उसे 14 इंजेक्शन नहीं लेने पड़े, टेटनस की सुई लेकर ही जान बच गई। वक्त पर सचेत नहीं करने के लिए उसने कुछ दिनों तक अनिल से बातचीत बंद रखी। इस वाकए के बाद भी उसका कुत्ता प्रेम कम नहीं हुआ। अपने कुत्ता प्रेम से वह अपने दोस्तों को भी संक्रमित कर चुका था। उसका पड़ोसी सह सहपाठी अनिल इस मामले में उसका प्रमुख सहायक था। किसी घर में झबरीले या अच्छे कुत्ते को देखते तो दोनों उसे चुराने का प्लान बनाते, उसकी रेकी करते; मगर, चुराने का साहस कभी नहीं कर पाते।

अर्जुन से चंदन नित्यप्रति उन पिल्लों की ताजा स्थिति का हालचाल लेता। घुमा-फिराकर एक ही बात वे उसे समझाते कि एक पिल्ला उसे उनको दे देना चाहिए – यह दोस्ती और इनसानियत का तकाजा है। उनके छोटे होने का हवाला देकर अर्जुन अपनी जान छुड़ाता। जब उन्हें लग गया कि दोस्ती, इनसानियत जैसी अमूर्त चीजों से काम नहीं चलेगा तो उन्होंने मूर्त और ठोस चीजों का प्रलोभन अर्जुन को देना शुरू किया। कई दौरों की बातचीत के बाद डील एक गेंद पर आकर पक्की हुई। अर्जुन ने भी सोचा कि न पिल्ले मेरे, न उनकी माँ मेरी, फोकट में ये बेवकूफ मुझे बाल देने पर राजी हैं तो लेने में हर्ज क्या है? बस्ती में किसे फर्क पड़ेगा, यदि एक पिल्ला ये उठा ले जाएगा? मुझे तो खेलने के लिए एक बाल मिलेगा। अब सवाल उठा कि बाल कहाँ से आए? अनिल के पास एक पुराना टेनिस बाल था। उसे वह अर्जुन को देने को तैयार हो गया। चंदन ने पिल्ले के लिए चेन खरीदने की जिम्मेदारी ली। इसी बुनियाद पर चंदन-अनिल प्राइवेट लिमिटेड की बुनियाद पड़ी।

शनिवार को हाफ डे की छुट्टी के बाद तीनों गपियाते हुए निकले। बागबेड़ा और हरहरगुट्टू पारकर वे अर्जुन की बस्ती मतलाडीह पहुँचे। तभी रानीडीह की तरफ से एक हाफ डाला ट्रक और एक 407 आता हुआ दिखा। उन वाहनों में तीर-धनुष, टाँगी, गँड़ासा, दौली व अन्य हथियारों से लैस युवक, महिलाएँ और पुरुष सवार थे। वे नारेबाजी भी कर रहे थे।

अनिल पूछ बैठा,

‘कौन हैं ये लोग?’

अर्जुन ने जवाब दिया,

‘नेता हैं दिशोम दल के।’

वाहन उनके पास से गुजरा, नारे गूँज। ‘जय झारखंड… डोमिसाइल लागू करो!’

चंदन को याद आया उसके मोहल्ले में बड़े-बुजुर्ग आजकल ‘मुख्यमंत्री’ नामक किसी नेता को खूब गरिया रहे हैं कोई डोमिसाइल लगाने के लिए। उनका कहना था कि सरकार बिहारियों को झारखंड से खदेड़ना चाहती है। वाहन आगे बढ़ गए। इस पर वे ज्यादा चर्चा नहीं कर पाए। एक मोड़ के बाद वे अर्जुन के घर के पिछवाड़े स्थित बँसवारी में पहुँच गए। वहाँ उन्हें कुत्ते के बच्चे दिखे। अर्जुन को देख वे दुम हिलाने लगे। उसने एक को उठा लिया। दो अनजाने चेहरों को देख वे जरा सशंकित थे।

‘देखा… हैं न मस्त, क्या बोले थे…!’

अर्जुन ने गर्व से कहा। चंदन की पारखी आँखें एक-एक पिल्ले को तौल रही थीं। एक सबसे मोटे-ताजे पिल्ले पर उसकी निगाह ठहर गई। अनिल को एक दूसरा पिल्ला पसंद आ गया। अर्जुन ने भी अनिल की पसंद को बेहतर बताया। जिद पैदा हो गई। तभी मोटे पिल्ले की जाँचकर रहे चंदन के मुँह से निराशा में निकला, ‘अरीऽऽ… इऽऽस!’ वह पिल्ला की बजाए पिल्ली निकली। दूसरे को उलटकर देखा गया, वह नर निकला। लिंग भेद यहाँ भी हावी था। भला, कौन चाहेगा कि जिसे वह इतने प्यार से पाल-पोसकर बड़ा करे, कल को उसके पीछे कुत्तों का झुंड गलत नीयत से घूमे। हाँ, उसका कुत्ता ऐसे किसी झुंड में शामिल हो तो कोई हर्ज नहीं। मन मसोसकर उसे अनिल की पसंद के पिल्ले के लिए ही राजी होना पड़ा। गहरे भूरे रंग के पिल्ले पर सफेदी यत्र-तत्र कलात्मक ढंग से बिखरी हुई थी। सफेद थूथन, माथे पर लंबा सफेद टीका-सा, गले में माला-सी सफेद धारी, पल-पल लपलपाती सफेद दुम और निरीह आँखें उसके पिल्लोचित सौंदर्य में अभिवृद्धि कर रही थीं। हृष्ट-पुष्ट भी वह था। इसके बाद पिल्ले के नाखून गिने गए। शुक्र था, उसके चारों पैरों में सिर्फ अठारह अँगुलियाँ थीं। अगर बीस अँगुलियाँ होती तो वह विषहा होता। पता नहीं चंदन को यह सब कहाँ से सुन रखा था। शायद, ऐसी अनुश्रुति है या कहीं धर्म शास्त्रों में लिखा है कि बीस अँगुलियों वाले कुत्ते विषहा होते हैं – जिनके काटे का कोई उपचार नहीं है, उनके काटने से आदमी पागल हो जाता है, कुत्तों की तरह भोंकने लगता हैं; बगैरा-बगैरा। अंतिम परीक्षण के लिए बहुक्म चंदन पिल्ले का कान पकड़कर अनिल ने उठाया। वह चिकरने लगा, ‘काँयऽऽ… काँयऽऽ…’ तय हो गया वह चोर नहीं है। कुत्ता चुप रहता तो इसका मतलब होता कि वह चोर है। घर के सामान चुराकर खा लेगा। अब कुत्ता तो रखवाली के लिए रखा जाता है, वह खुद चोर निकल जाए, क्या यह उचित होगा? अर्जुन ने दुबारा तसल्ली कर लेनी चाही। चंदन ने उसे मना किया। चंदन पिल्लों पर इस किस्म की ज्यादती के खिलाफ है मगर किया भी क्या जा सकता था, सालों से चली आ रही परंपरा को तो निभाना ही पड़ता है। चंदन के विशद श्वान ज्ञान से अर्जुन मंत्र-मुग्ध था। टेनिस बॉल उसे देकर दोनों पिल्ले को लेकर निकले। खुशी के मारे वे जमीन से आधा फुट ऊपर चल रहे थे।

पिल्ले को लेकर वे अपने मोहल्ले में पहुँचे। पिल्ले को देख उनके दोस्त भी जुट गए। उसे अपने दोस्तों की देखरेख में छोड़कर चंदन और अनिल अपने-अपने घर खाना और डाँट खाने गए। आए तो रोटी, भात और दूध पिल्ले के लिए लेते आए। उसे भोजन कराया गया। फिर उसके नाम पर चर्चा छिड़ गई। अनिल ने ‘शेरू’ नाम सुझाया। चंदन ने इसे खारिज कर दिया। इस मामले में वह कैसे समझौता कर सकता था। उसने बहुत पहले से सोच रखा था कि एक दिन वह एक कुत्ता पालेगा, जिसका नाम वह ‘टाइगर’ रखेगा। अनिल भी पीछे हटने को राजी नहीं था। आखिर, उसके बाल के एवज में ही तो वह पिल्ला मिला था। ठीक है, आयडिया चंदन का था। पर वह उसे अपने घर में टाइगर को रखने देने की रियायत तो दे रहा है। चंदन उसे कम से कम अपनी पसंद का नाम तो रखने दें। कुछ बच्चों ने टाइगर तो कुछ ने शेरू नाम का समर्थन किया। मामला फँस गया। रोहित ने रास्ता निकाला। ‘दोनों नाम रख देते हैं, क्या एक आदमी के दो नाम नहीं होते? …गोलू का ही स्कूल का नाम सत्यम है।’ दूसरे बच्चे भी दो नाम वालों की मिसालें देने लगे। बहस को विराम देते हुए उसे दो-दो नाम दे दिया गया। कल तक अनाम रहा पिल्ला दो-दो नाम पाकर भी बहुत खुश नहीं दिख रहा था। चंदन के पैसे से उसके लिए लिए एक चेन खरीदी गई। जिससे बाँधकर उसे टहलाया जाता रहा। जब धुँधलका गहराने लगा तो चंदन को चिंता सताने लगी कि रात को टाइगर को कहाँ रखा जाए? उसे डर था कि सनातनी विचारों वाली उसकी माँ कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणी को घर में प्रवेश कभी नहीं करने देगी। यह सोच-सोचकर वह कुढ़ भी रहा था। कॉलोनी के अपेक्षाकृत अमीर परिवारों ने कुत्ते पाल रखे थे। क्या हुआ, उनके कुत्ते विदेशी नस्ल के हैं तो? उसके घरवाले तो एक धेला खर्च करेंगे नहीं… एक पुराना बाल देकर तो यही मिलेगा, न? यही सब सोचता वह अपने दोस्तों के साथ पिल्ले को लेकर अपने घर आ धमका।

बच्चों के साथ कुत्ते के बच्चे को देखकर चंदन की माँ का पारा चढ़ गया।

‘यह क्या रोजगार ठान रखा है… भगाओ इसे… बिना हाथ-पैर धोए घर में घुसना नहीं।’

चंदन जानता था कि माँ जब गुस्से में हो तो टोकना नहीं चाहिए। जितना उसे बोलना है उतना बोल लेने दो, तब उत्तर दो। माँ रुकी तो उसने पलटवार किया,

‘क्या… बकबक करती रही हो… बड़ा होकर घर की रखवाली ही करेगा न…’

‘हुँह, रखवाली… कोई जरूरत नहीं, रखवाली की… जहाँ से लाए हो, वहीं छोड़ आओ…’

दिनभर आवारागर्दी करने, पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान न होने के अभियोग लगाते-लगाते वह पूछ बैठी,

‘कहाँ से पकड़कर लाए इसे?’

‘पता नहीं… कहाँ से घूमते हुए आ गया।’

अनिल कुछ बोलना चाहता था, उसके पहले ही चंदन बोल पड़ा।

‘छोड़ आओ… अपनी माँ के पास खुद चला जाएगा।’

‘बाहर बड़े कुत्ते इसे काटकर मार देंगे।’ अनिल ने जवाब दिया।

अनिल की चालाकी पर चंदन प्रसन्न हुआ। बात आगे बढ़ाते हुए वह बोला,

‘मर गया तो हमें ही पाप लगेगा।’

पाप-पुण्य का सवाल खड़ा हो जाने पर माँ थोड़ी ढीली पड़ी। कुछ सोचकर बोली,

‘अनिल, तुम इसे अपने घर ले जाओ।’

चंदन के होश उड़ गए। अनिल घबराहट में बोला,

‘मेरे घर में कहाँ जगह है?’ जगह से ज्यादा अनिल को अपनी माँ का डर था। यहाँ तो जनतांत्रिक तरीके से सिर्फ डाँट-डपट हो रही है। यदि वह अपने घर इसे लेकर गया होता तो मध्ययुगीन ढंग से पिल्ले के साथ उसकी भी कुटाई शुरू हो जाती। किसी किस्म के संवाद का सवाल ही नहीं उठता।

‘यहाँ भी कहाँ जगह है।’

चंदन बोल पड़ा, ‘बाउंड्री में…’

‘रात भर काँय… काँय… करता रहेगा।’

‘पेट भरा रहेगा तो चुप रहेगा।’

उकताहट में माँ को ही अंततः हथियार डालना पड़ा।

‘ठीक है… ठीक है, रात भर रखो, सुबह इसकी माँ को खोजकर उसके पास इसे छोड़ आना।’

इस फौरी राहत से सबके चेहरे खिल उठे। रात की भारी चिंता दूर हुई।

‘चलो तुम दोनों अपने घर जाओ, चंदन तुम भी हाथ-पैर धोकर पढ़ने बैठो।’

माँ चली गई। अपने क्वार्टर के आगे बनी बाउंड्री के अंदर टाइगर को लेकर चंदन पहुँचा। उसकी जंजीर को अमरूद के पेड़ की जड़ से बाँध दिया। अनिल धीरे से फुसफुसाया, ‘थोड़ी देर में आऊँगा।’

चंदन भी अच्छे बच्चे की तरह हाथ-पैर धोकर पढ़ने बैठ गया। ठीक खिड़की के पास, ताकि टाइगर पर नजर रख सकें।

शाम को ड्यूटी से पिता के लौटने के बाद माँ उन्हें चंदन का कारनामा सुनाती है,

‘टाइगर पकड़ लाए हैं लाड़ले!’

शुरू में पिता को इसमें कोई खास बुराई नजर नहीं आई। मगर माँ के ‘समझाने’ पर कि यह सुपुत्र के बिगड़ने का लक्षण है तो उन्होंने चंदन को डाँट लगाई। इस प्रसंग को वे ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते। वे दूसरी ही चिंता से घिरे रहते हैं। चाय सुड़कते हुए वे चंदन की माँ को बताते हैं कि किस तरह से आज शहर में बलवा होते-होते बचा। डोमिसाइल के समर्थन में निकाले गए आदिवासियों के जुलूस के विरोध में बिहारी भी सड़क पर उतर आए थे। बीच शहर में पारंपरिक हथियारों से लैस आदिवासी घिर गए। खूनखराबा की नौबत आ गई थी। रैफ के जवानों को दंगा रोकने के लिए उतारा गया। पुलिस अधिकारियों ने रैफ की सुरक्षा में आदिवासियों को शहर से धीरे-धीरे बाहर निकाला। पिता को चिंता थी कि डोमिसाइल की आग जमशेदपुर में भी पहुँच चुकी है। राँची की तरह यहाँ का भी माहौल विषाक्त हो सकता है। माँ को चिंता थी कि उनकी कॉलोनी भी तो बेढ़ाडीपा, मतलाडीह और रानीडीह सरीखे आदिवासी बस्तियों से ज्यादा दूर नहीं है।

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पुस्तक पर आँखें टिकाए और टाइगर में ध्यान लगाए चंदन भी यह वार्तालाप सुन रहा था। उसकी आँखों के सामने सुबह तीर-धनुष लेकर जाते आदिवासी उभर आए। इस विषय पर उसका बालमन ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया। माँ और पिता को व्यस्त देख, वह नजरें चुराकर टाइगर की खिदमत में हाजिर हो गया।

उसकी छोटी बहन ने अपने कबाड़रूपी खिलौनों के खजाने में से दो प्लास्टिक के डब्बे टाइगर के खाने-पीने के बर्तन बनाने के लिए दिए, जिनमें उसने अपने काल्पनिक किचन की खाद्य सामग्री के रूप में गेंदा फूल की सूखी पंखुड़ियाँ और ईंट का चूर्ण रखा हुआ था। थोड़ी देर में अनिल भी वादे के मुताबिक हाजिर हो गया। रात में टाइगर की सुरक्षा और सुविधा पर गहन मंथन के बाद एक गद्देदार बिस्तर भी उसके सोने के लिए पुआल के ऊपर फटा बोरा बिछाकर तैयार किया गया। हालाँकि, उन्हें टाइगर को यह समझाने में मुश्किल पेश आ रही थी कि यह इंतजाम उसके लिए बेहतर है। वह बिस्तर पर सोने से इनकार कर रहा था, इतने लाड़ की उसे आदत जो नहीं थी।

पौ फटते ही चंदन उठकर टाइगर को मलोत्सर्ग के लिए टहलाने निकला। वह टाइगर की सेवा में लगा रहा। धीरे-धीरे सूरज के साथ बच्चे भी निकल आए। रविवार होने की वजह से मोहल्ले के सभी बच्चे घर पर ही थे। टाइगर के नाश्ता-पानी का इंतजाम किया गया। माँ भुनभुना रही थी। इतवार होने की वजह से उसके पिता भी घर में ही थे। उन्हें चंदन ने समझाया कि – ‘टाइगर बड़ा होकर घर की रखवाली ही करेगा न!’

पिता ने भी माँ को समझाया कि कुत्ते के बहाने कम से कम घर में तो रहेगा। फिर, बचा-खुचा, जूठन जो बाहर फेंकना पड़ता है, उसे खाकर-पीकर पल जाएगा। माँ को झुकना पड़ा। फिर टाइगर को टहलाने निकाला गया। रात भर उसे हुई परेशानी पर भी बातचीत शुरू हुई। अनिल का विचार था कि खुले आकाश के नीचे उसे सुलाना ठीक नहीं, शीत लगने से उसकी तबीयत बिगड़ सकती है। चंदन ने सुझाव रखा,

‘क्यों न उसके लिए एक घर बनाया जाए?’

‘घर…!’

सभी चौंके।

‘हाँ… एक छोटा-सा दीपावली घर जैसा।’

विचार सबको भा गया। मोहल्ले में इधर-उधर पड़ी ईंटें, ईंट के टुकड़े लाए गए। घर बनाने के लिए तिवारी जी ने ईंटें गिराई थीं, वहाँ से भी कुछ ईंटें टपाई गईं। अनिल ने बैट बनाने के लिए पटरा रखा हुआ था। उसे वह ले आया छत बनाने के लिए। जोड़ाई के लिए बाल मंडली पीली मिट्टी खोद लाई। चंदन ने अपनी बड़ी बहन रेखा से मदद माँगी। शुरू में माँ के भय से अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल करने से वह झिझकी। फिर बच्चों का उत्साह देख वह भी उनका मार्गदर्शन करने लगी। उनको देख मोहल्ले की अन्य लड़कियाँ भी वहाँ जमा हो गई। दीपावली घर बनाने के उनके अनुभव का लाभ उठा बच्चे निर्माण कार्य में जुट गए। कड़ी मेहनत के बाद कुत्ता घर तैयार हुआ। टाइगर लामकान से बामकान हो गया।

स्कूल से चंदन आजकल जल्दी घर आ जाता। टिफीन के समय भी सीधे घर भागता। स्कूल जाता तो अपनी छोटी बहन को टाइगर की भली भाँति देखभाल करने की ताकीद कर के जाता। अपने खाने से ज्यादा उसे टाइगर के खाने-पीने की चिंता रहती। जब मोहल्ले के बच्चे खेलने में मगन रहते तो वह शान से उसे लिए तफरीह करता। इस दौरान टाइगर कभी ‘बाचेन’ तो कभी ‘बेचेन’ रहता। हालाँकि, नाम को लेकर संशय अभी भी बरकरार था। अनिल उसे शेरू नाम से ही पुकारता। चंदन जलभुनकर रह जाता। अनिल भी टाइगर की ताबेदारी में लगा रहता। कभी टहलाने तो कभी दिशा-फरागत कराने के लिए वह उसे लेकर घूमता। कभी-कभी दोनों दोस्त चापाकल पर ले जाकर साबुन से रगड़-रगड़ कर उसे नहलाते भी। बेचारे टाइगर को नहाना बिल्कुल पसंद नहीं था। चंदन की माँ-बहन ताना मारती कि खुद तो नहाने में नानी मरती है… टाइगर को नहलाने चले हैं। पिता उसकी माँ से चुहल करते, ‘इतनी फिक्र तो तुम्हें भी अपने बच्चों की नहीं है।’ चंदन की माँ को टाइगर के रूप में एक जंजीर मिल गई थी। जिसे खींचकर वह चंदन को काबू में करती। टाइगर को भगा देने, उसे खाना नहीं देने की धमकी देकर चंदन को पढ़ने, दूध पीने जैसे काम आसानी से वह करवा लेती। टाइगर के लिए चंदन को कई कुर्बानियाँ देनी पड़ रही थीं। उसका आबोदाना न बंद हो जाए इसलिए वह नाक बंदकर दूध पी लेता, हरि सब्जियाँ खाता।

अनिल के टूटे बेल्ट को मोची से कटवा और सिलवाकर टाइगर के लिए पट्टा तैयार किया गया। जो उसके गले की शोभा बन गया। चंदन बड़ा होकर पुलिस अफसर बनने का सपना देखता। अपने सपने में टाइगर को वह सी.आई.डी. कुत्ते के रूप में शामिल करता। फिर, दोनों मिलकर सपने में ही अपराधियों को पकड़ते। सी.आई.डी. कुत्ता बनाने के लिए बजाब्ता उसे ट्रेनिंग दी जाती। रूमाल सूँघाकर उसे छुपा देते; फिर उसे उसको ढूँढ़ने का हुक्म देते, जिसकी तामील टाइगर हरगिज-हरगिज नहीं करता।

चंदन कुत्ता-दोस्त था तो रोहित क्रिकेट के पीछे पागल। यूँ तो अनिल थोड़ा-थोड़ा दोनों था, पर टाइगर के आने के बाद वह क्रिकेट को भूल गया था। उसने अपना बाल कुत्ते के लिए दे दिया था, जिससे उनकी क्रिकेट टीम बिखर गई थी। रोहित इससे चिढ़ा बैठा था। अपनी चिढ़ वह कभी टाइगर का कान मरोड़ तो कभी उसकी टाँग खींचकर निकालते रहता। चंदन उसे ऐसा करने से बरजता। एक शाम अनिल टाइगर को लेकर घूम रहा था। रोहित टाइगर को छोटे-छोटे ढेलों से मारने लगा। कुछ देर तक तो बड़ी कुशलता से ढेलों से वह खुद को बचाते रहा। ‘इस बार बचकर दिखाओ’ की चुनौती देता हुआ, रोहित उस पर ढेले पर ढेले चला रहा था। इस दौरान ढेले का आकार भी बढ़ता जाता। अनिल भी हँसता हुआ, टाइगर का कूदना-फाँदना देख रहा था। बचते-बचते भी एक ढेला उसे लग गया। वह काँय-काँय करने लगा। उसकी आर्त पुकार सुनकर चंदन तत्काल वहाँ नमूदार हुआ। फिर तो, उसने रोहित को बेतरह फटकारना शुरू किया। अनिल को भी टाइगर की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के लिए लताड़ा। अनिल सफाई देने लगा कि रोहित ने मजाकवश ऐसा किया है, उसका इरादा टाइगर को चोट पहुँचाने का नहीं था। फिर भी वह दोनों को खरी-खोटी सुनाते रहा।

वक्तन-फवक्तन अनिल टाइगर को अपने साथ ले जाता था। ढेला कांड के बाद चंदन टाइगर की सुरक्षा का सवाल उठा उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करता। चंदन की भाव-भंगिमा ऐसा होती जा रही थी मानो टाइगर पर उसका ही एकाधिकार हों। इशारों में इस बात को वह अनिल को समझाने की कोशिश भी करता। लेकिन, अनिल भी इशारे जैसी बारीकियों पर ध्यान देने वाला प्राणी नहीं था। वैसे वह ध्यान देता भी क्यों? आखिर, बाल जो उसने दिया था। वह कैसे भूल जाता कि टाइगर उर्फ शेरू उनका संयुक्त उपक्रम है। वह अपने मन की करता।

एक शाम बेचेन टाइगर मोहल्ले में घूम रहा था। चंदन और अनिल थोड़ी दूरी बनाकर उसके पीछे-पीछे था। कुत्तोचित जिज्ञासा से टाइगर हर चीज को सूँघता हुआ बड़गाछ के पास पहुँच गया। वे दोनों भी उस पर नजर रखने के लिए बड़गाछ के नीचे आ गए, जहाँ मोहल्ले के युवाओं की महफिल जमी हुई थी। वे डोमिसाइल पर बहसरत थे। ‘अरे… कुछ नहीं होगा… ट्रेन जब खुलने वाली होती है न तो जनरल बोगी में… जगह को लेकर खूब चिल्लपों होती। वही हाल झारखंड का है। नया… नया राज्य बना है, अपनी-अपनी जगह पक्की करने के लिए सब हंगामा मचाए हुए हैं। अब देखो… एक साल पहले आदिवासी और सदान आमने-सामने थे – पेसा को लेकर। पेसा के तहत पंचायत चुनाव होते तो सभी प्रमुख पद आदिवासियों के लिए आरक्षित हो जाते। तो कुड़मी और दूसरे सदान आदिवासियों के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। उस समय सदान और बिहारी एक पाले में थे। अब डोमिसाइल को लेकर आदिवासी और सदान एक खेमे में और बिहारी और…’ ये सतेंद्र भैया थे – अखबारों को घोंट डालने के लिए कुख्यात। वैसे, उनके सियासी ज्ञान के सभी कायल थे।

‘उन्हें बिहारियों से ही जलन हैं… मारवाड़ियों… गुजरातियों की समृद्धि उन्हें नहीं दिखती? जिनके पास फैक्टरियाँ हैं, बिजनेस, जो पॉश इलाकों में रहते हैं।’ कब से चुप बैठे श्याम भैया का गुस्सा छलक पड़ा।

सतेंद्र भैया के होंठ टेढ़े हो गए, ‘यही तो बात है… जनरल बोगी में बैठे आदिवासी पहले स्लीपर बोगी में काबिज बिहारियों से होड़ करेंगे कि सीधे ए.सी. बोगी पर धावा बोलेंगे?’

सुधीर भैया ने कहा, ‘लेकिन, हम चुप रहे तो बेटिकट यात्रियों जैसी हमारी हालत हो जाएगी… हमें रामानंद जी और सतीश शर्मा का साथ देना चाहिए।’

तभी संतोष भैया ने सभी को चिढ़ाने के इरादे से तीर छोड़ा,

‘यहाँ भी नौकरी चाहिए… और बिहार में भी… वहाँ बहाली होगी तो वहाँ भी दौड़ लगा दोगे… हम तो बिहारी है… बिहारी…’ सभी युवक उन्हें गरियाने लगे। चंदन ने महसूस किया था कि संतोष भैया को हर बहस में प्रतिपक्ष में रहने की अजीब कुटेव है। भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच हो तो वे पाकिस्तान की जीत के दावे करते। अभी फिर शरारतपूर्ण ढंग से वे आदिवासियों के पक्ष में खड़े हो गए।

‘वहाँ के खतियान में सात पुश्तों के नाम दिखाने लगोगे… दोहरी स्थानीयता नहीं चलेगी!’

संतोष भैया यह कहकर प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में मुस्कुराने लगे।

‘जा… तोहरा के आदिवासी बना लिहन सऽऽ… ठप्पा लगवा आवऽऽ रानीडीह जाके…।’ श्याम भैया चिढ़कर भोजपुरी में उतर आए। खीझ व्यक्त करने के लिए उन्हें भोजपुरी ज्यादा मुफीद लगती है। हँसी-मजाक शुरू हो गया।

टाइगर टहलते हुए बरगद के पास आ गया था। बहस को बेपटरी होता देख मनोज भैया जाने के लिए मुड़े, उनकी नजर टाइगर पर पड़ गई। उन्होंने चंदन से पूछा – ‘किसका कुत्ता है?’

‘मेरा!’ चंदन बोल पड़ा। अनिल को यह उसका यह दावा अच्छा नहीं लगा। वह चाहता था कि ‘मेरा कुत्ता’ की जगह चंदन ‘हमारा कुत्ता’ कहा करें।

‘बुला तो।’

चंदन मालिकाना हक से चिल्लाया,

‘टाइगर… आऽऽ… आऽऽ… टाइगर…’

किसी चीज के मुआयना में व्यस्त टाइगर ने उसे अनसुना कर दिया। अनिल ने हाँक लगाई,

‘शेरू… आऽऽ… आऽऽ…’

और कमाल हो गया। अनिल की पुकार सुनकर शेरू उर्फ टाइगर पलटा; दूसरी आवाज पर उसकी ओर दौड़ पड़ा। सुनील भैया ने व्यंग्य कर दिया।

‘तेरा कुत्ता है… तेरे बुलाने पर नहीं आया, इसके बुलाने पर आ गया!’

चंदन के तन-मन में आग लग गई। वह गुस्से में फूट पड़ा।

‘तुम शेरू… शेरू कहकर उसका दिमाग खराब कर देते हो… उसका नाम टाइगर है… टाइगर…!’

दाँत पीसते हुए उसने अनिल को धक्का दे दिया। अनिल गिर गया। एक भैया ने उसे उठाया। उठते हुए उसने पलटवार किया।

‘सिर्फ तुम्हार नहीं है शेरू… टाइगर… मैंने अपना बाल दिया था उसके लिए…’

वह ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ में अपने योगदान को गिनाते हुए चंदन पर झपटा।

‘कौन बोला था तुमसे… बाल देने के लिए?’ भैया लोगों ने बीच-बचाव किया। दोनों झगड़ने लगे। बेचारा टाइगर चुपचुप उन्हें झगड़ते देखता रहा। वह चंदन को बताना चाहता था कि उसने उसकी आवाज सुनी थी, पर, जमीन में गड़े एक प्लास्टिक को जाँचने-परखने में इतना मग्न था कि उसने तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी। जब अनिल ने हाँक लगाई तब तक उसकी दिलचस्पी उस प्लास्टिक में जाती रही थी। इस विलंब को बेकार ही चंदन अपनी अवहेलना समझ बैठा है। मगर, उसके पास ऐसी जुबान नहीं थी, जिससे चंदन को अपनी बात समझा पाता। दोनों लड़ते रहे। अनिल अपना बाल, पटरा और पट्टा लौटाने की माँग करने लगा। चंदन ने कहा वह लौटा देगा और टाइगर को उठाकर चलते बना।

जब सगे भाइयों के बीच निबाह मुश्किल होता है, वे दोनों तो मात्र दोस्त थे। दोनों के बीच खी-मी होते ही रहती थी। यह कोई नई बात नहीं थी। लेकिन चंदन ने उसका पटरा और पट्टा लौटाकर दुश्मनी को और पक्का कर दिया। बाल भी खरीदकर देने को वह तैयार था। राज्य में डोमिसाइल को लेकर गृहयुद्ध से हालात थे तो अनिल और चंदन के बीच शीतयुद्ध छिड़ गया। पटरे के स्थानापन्न के तौर पर गते से चंदन ने टाइगर के घर का छप्पर बनाया। अपनी छोटी बहन के फ्राक का बेल्ट काटकर रंगीन और ज्यादा आकर्षक पट्टा तैयार किया। ‘जिसे पहनकर टाइगर टाइगरनी लगने लगा है’ यह कहना था अनिल का। दोनों एक-दूसरे की जमकर चुगली करते। चूँकि टाइगर चंदन के पास था तो इस लड़ाई में वही विजेता था। यह बात अनिल को खलती। अपने शेरू से अलग कर दिए जाने से वह आहत था। उसके लिए उसने भी परेशानियाँ झेली थीं… अपनी गेंद दी थी, डाँट खाई थी… मेहनत की थी। ‘जिसका बैट, वही कैप्टन’ की तर्ज पर जिसका बॉल, वह कम-से-कम वाइस कैप्टन तो होना ही चाहिए। उसकी इस दलील से सभी सहमत थे। इससे अनिल को कुछ ‘करने’ का हौसला मिल रहा था। चंदन से चिढ़ा बैठा रोहित अनिल को अपना बाल वापस माँगने के लिए उकसा रहा था। उसकी सलाह पर अनिल ने नई चाल चलते हुए गोलू से संदेश भिजवाया कि, ‘मुझे मेरी वही वाली गेंद चाहिए।’

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उन दोनों को उम्मीद थी कि शायद अर्जुन से वह गेंद फट गई हों या कहीं खो गई हो; वह गेंद न लौटा पाए। ऐसी स्थिति में वे चंदन को दबाव में ले लेंगे। पर, ऐसी कोई बात नहीं हुई। उसी गेंद के लिए चंदन ने दूसरे दिन अर्जुन से बात की। नई गेंद खरीदकर देने का वादा किया। अर्जुन को भला क्या आपत्ति हो सकती थी नई गेंद लेने में। उसने कहा कि, ‘तुम मुझे जिस दिन नया बाल ला दोगे या नए बाल का पैसा दे दोगे मैं अनिल का बाल वापस कर दूँगा।’ चंदन पैसे जमा करने में जुट गया। लेकिन, अनिल रगड़ा करने पर उतारू था। उसने तीन दिन का अल्टीमेटम रोहित के जरिए चंदन को दिया। रोहित ने एक में चार जोड़कर उसके संदेश को धमकी बना डाला। संदेश उर्फ धमकी सुनकर चंदन भड़क गया, उसने जवाब दिया कि, ‘एक हफ्ते में लौटाऊँगा, बोल देना अनिल को जो करना है हो कर लो।’

रविवार की सुबह चंदन अपनी देखरेख में टाइगर को टहला रहा था, टाइगर ‘बेचेन’ था। अनिल भी बेचैन था – ‘जो करना है कर लो की चुनौती’ का जवाब देने के लिए। उसकी दी मियाद पूरी हो चुकी थी। अनिल और रोहित ने तुरंत योजना तैयार की। तदनुसार रोहित ने पीछे से आकर चंदन को टोका। चंदन पीछे मुड़कर उससे बातें करने लगा। रोहित उससे क्रिकेट खेलने चलने की जिद करने लगा। चंदन को उसने बातों में उलझा दिया। उधर एक गली से छुपकर अनिल ने टाइगर को बिस्कुट दिखलाया। वह दौड़ता हुआ अनिल के पास चला गया। अनिल ने उसे उठाया और सरपट भागा। टाइगर को कुछ समझ में नहीं आया। चंदन जब तक मुड़ा तब तक तो टाइगर अंतर्धान हो चुका था। रोहित बोला, ‘टाइगर तो उस ओर गया।’ उसने चंदन को गलत दिशा बता दी। चंदन उसी ओर बढा।

टाइगर को न पाकर चंदन का माथा ठनका। बदहवासी में वह इधर-उधर टाइगर को ढूँढ़ने लगा। गली में, घूरे पर, बरगद के नीचे-चंदन ने पूरा मोहल्ला छान मारा – पर कहीं टाइगर नहीं मिला। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि पलक झपकते ही टाइगर कहाँ गायब हो गया। उसे आसमान निगल गया या जमीन खा गई। किसी बच्चे ने तो नहीं चुरा लिया। सभी संभव-असंभव कारणों पर वह सिर खपाता रहा। अनिल और रोहित पर भी उसे शक था, पर उन दोनों का कहीं पता न था। बेचैनी में वह टाइगर को पूरी काँलोनी में ढूँढ़ने लगा।

पहले से तय योजनानुसार अनिल और रोहित टाइगर को लेकर अर्जुन के घर पहुँचे। अनिल ने अर्जुन के हवाले टाइगर को किया और उससे अपना बाल माँगा। अर्जुन सौदा रद्द होने से नाखुश था। पर किया जा सकता था। दोनों पार्टनरों के झगड़े में नुकसान उसका हो रहा था। उनके लिए भले ही वह टाइगर, शेरू या बब्बर शेर था, उसके लिए तो महज एक सामान्य पिल्ला था। उसके जैसे पाँच और पिल्ले उसके घर के पिछवाड़े में घूम रहे थे। उसने खुद को यह समझाकर तसल्ली दी कि शायद चंदन नई गेंद या पैसा देकर टाइगर को ले जाए। उसने अनिल की गेंद लौटा दी।

इसी बीच बागबेड़ा के एक छोर पर रानीडीह के दो आदिवासियों को बागबेड़ा के कुछ बिगड़ैल लड़के खुद को सूरमा साबित करने के लिए पीट रहे थे। एक दिन पहले डोमिसाइल के समर्थन में राँची बंद कराया गया था। इस दौरान बिहारियों के घर में कथित तौर पर तोड़फोड़ भी हुई थी। इसके विरोध में जमशेदपुर में अगले दिन बंद बुलाया गया। टेंपों में माइक लगाकर बागबेड़ावासियों से कल के बंद को समर्थन देने की अपील की जा रही थी। अनाउंस कर रहे लड़के लोगों को उत्तेजित करते-करते स्वयं इतने उत्तेजित हो गए कि उन्होंने साइकिल से जाते दो आदिवासियों को अपने टेंपों से ठोंक दिया। विरोध जताने पर उलटे उन्हें पीटने भी लगे। पिटने के बाद दोनों आदिवासी तत्काल वापस लौट गए। बिहारियों को गाली देते, लौटकर सबक सिखाने की धमकी देते। समझने वाले समझ गए, आसार अच्छे नहीं।

वापस आकर अनिल और रोहित घर के पास वाले मैदान में उसी गेंद से जीत का जश्न मनाने के लिए क्रिकेट खेलने लगे।

गोलू के पूछने पर कि बाल कहाँ से लाए। उन्होंने पूरी कहानी बेहिचक बता दी। इस धमाकेदार सूचना को पचाना गोलू के लिए मुश्किल हो गया। वह जल्द से जल्द चंदन को यह बताने के लिए अकुलाने लगा। टाइगर को खोजते चंदन को वह बेताबी से खोजने लगा। हैरान-परेशान चंदन उसे मिला तो उसने उसे सारा किस्सा एक साँस में ही सुना दिया। चंदन आग बबूला हो गया। वह गाली देता हुआ दौड़ा। गोलू भी उसके पीछे तमाशा देखने के लिए भागा।

बॉलिंग कर रहे अनिल पर चंदन गाली देते हुए टूट पड़ा।

अनिल ने भी जवाबी हमला बोला। दोनों में घूँसे चलने लगे।

‘तेरी… तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई टाइगर को ले जाने की?’

‘मुझे मेरा बाल वापस चाहिए था।’

‘मैं बोला था न, एक हफ्ते में वापस कर दूँगा।’

‘ऐसा नहीं होता है… तुम टाइगर के साथ खेलते रहते और मैं मुँह देखता रहता, क्या?’

‘मैं पैसे जुगाड़ कर रहा था।’

‘ठीक है, जब पैसे होंगे तुम्हारे पास, तुम अर्जुन को देकर शेरू को ले आना।’

गोलू और रोहित उन्हें छुड़ाने में लगे हुए थे। पर उनसे वे काबू में नहीं आ रहे थे। चंदन रोहित को भी गाली देने लगा। कुछ लोगों ने उन्हें पटका-पटकी करते देखा तो दौड़ पड़े। उन्हें एक-दूसरे से अलग किया।

इधर, पिटकर आए आदिवासियों ने सारी दास्तान अपनी बस्ती में सुनाईं। उनका आक्रोश महामारी की तरह रानीडीह में फैला। इसे संपूर्ण भूमिपुत्रों पर दीकुओं का हमला माना गया। दिशोम दल और मुक्ति पार्टी के नेता नेतृत्व सँभालने आ गए। प्रत्याक्रमण की तैयारी शुरू हुई। हरकारे आस-पास के आदिवासी इलाकों में भेजे गए।

राज्य में डोमिसाइल का झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था। डोमिसाइल लागू करने की माँग पर आदिवासी और सदान उग्र थे – उनकी माँग थी कि सन 1932 के खतियान को आधार बनाकर स्थानीयता तय हों। वहीं बिहार, यूपी… मूलवाले इसे वापस लेने की माँग पर आसमान सिर पर उठाए हुए थे। अपने-अपने पक्ष में बहुसंख्यक होने के कारण सामान्यीकृत कर इसे आदिवासी बनाम बिहारी टकराव का नाम दे दिया गया था। राज्य के कई शहरों में बाहरी-भीतरी के नाम पर झड़पें हो रही थीं। जमशेदपुर में भी दो-तीन बार भिड़ंत हो चुकी थीं। रानीडीह डोमिसाइल समर्थकों का तो बागबेड़ा डोमिसाइल विरोधियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना हुआ था। रानीडीह में दिशोम दल के नेता सक्रिय थे। वे मुक्ति पार्टी के आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए इस मुद्दे को इतनी हवा दे चुके थे कि रानीडीह और आस-पास के इलाके में एक तूफान पैदा हो गया था। दबाव में मुक्ति पार्टी को भी मैदान में उतरना पड़ा। बागबेड़ा में एक पुरानी खानदानी पार्टी के नेता रामानंद झा और भगवा पार्टी से जुड़े सतीश शर्मा डोमिसाइल के सहारे अपनी सियासी जमीन पुख्ता करने में जुटे थे। धरना-प्रदर्शन के साथ-साथ आदिवासियों के हमले की सूरत में उन्हें मुँहतोड़ जवाब देने के लिए उनकी देखरेख में बम-पिस्तौल, हॉकी, स्टिक, तलवार, भाला और तीर-धनुष भी जुटाए जा रहे थे। रामनवमी अखाड़ा कमेटियों के हथियारों से भी गर्द झाड़ा-पोछा जा रहा था।

टाइगर के बिना चंदन के लिए एक पल भी काटना मुश्किल साबित हो रहा था। जब तक टाइगर उसके पास था, उसे अनिल की परवाह नहीं थी। पर टाइगर को लौटाकर अनिल ने उसे पटखनी दे दी थी। ‘विरह की अग्नि’ में सुलग रहे चंदन ने अपूर्व कदम उठा लिया। अपने पिता के पर्स से उसने बीस रुपये चुराए। उसने पहले से अपनी और टाइगर की जीभ काट-काटकर, घर के कबाड़ बेचकर और छोटे-मोटे सौदे-सुलफ लाने के दौरान तीन-पाँच करके गेंद के लिए बीसेक रुपये जुटाए थे। उसके पास लगभग चालीस रुपये हो गए। वह टाइगर को वापस लाने के लिए निकला।

रानीडीह के बाद ग्रामीण इलाका शुरू होता है। वहाँ से भी काफी तादाद में आदिवासी और सदान रानीडीह में इकट्ठा हो गए। एक फेरी वाले के जरिए बागबेड़ा में इसकी खबर पहुँच गई। आदिवासियों की तैयारी की खबर सुनकर रामानंद झा और सतीश शर्मा भी सक्रिय हो गए। वहाँ भी बिगुल फूँका गया। शहर के कई इलाकों के बिहारी वीर सामुदायिक सेवा के लिए वहाँ पहुँचने लगे। दोनों ओर के मोबाइल घनघनाने लगे… हवा में जहर घुलने लगा।

इन सब से बेखबर चंदन जब मतलाडीह पहुँचा तो वहाँ तीर-धनुष, हॉकी स्टिक, पिस्तौल से लैस आदिवासियों का हुजूम रानीडीह की तरफ से आता दिखा। वे नारा लगा रहे थे। चंदन डर के एक घर के पीछे छुप गया। रानीडीह के आदिवासी बागबेड़ा पर हमले कर सकते हैं – यह आशंका कई लोगों को जताते उसने सुन रखी थी। उसे लगने लगा कि यहाँ आकर वह फँस गया है।

‘बिहारी गंगा पार जाओ!’
‘दीकू झारखंड नहीं चलेगा…!’

‘जय झारखंड’ के नारे लगाता जनसैलाब आगे बढ़ गया। चंदन बुरी तरह से डर गया। वह लौटने की सोचने लगा। पर, उसे ख्याल आया कि लौटा तो भीड़ उसे रास्ते में मिल जाएगी। भीड़ के आगे बढ़ जाने तक यहीं रुकना उसे ठीक जान पड़ा। अपनी मंजिल के इतने करीब आकर लौटना भी उसे अनुचित लग रहा था। टाइगर और उसके बीच फकत चंद फर्लांग का फासला था। आगे बढ़े या लौटे के सवाल पर कुछ पल वह अस्ति-नास्ति में पड़ा रहा। फिर उसके कदम खुद-ब-खुद बँसवारी की ओर बढ़ गया। उसे खुद पर गुस्सा भी आ रहा था और अपने दुस्साहस पर हैरानी भी हो रही थी। भय के बावजूद वह रुका नहीं। मानो, उसके अंदर एक किस्म की चाबी भर दी गई हों, जो उसे ठेलते हुए बलात लिए जा रही थी।

मतलाडीह से सटे मिश्रित आबादी वाले हरहरगुट्टू में चूँकि दोनों समुदाय साथ-साथ रहते आए थे, इसलिए यहाँ उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ उठ खड़े होने में संकोच-सा था। यहाँ दोनों समुदाय टकराव से बच रहे थे। आदिवासी सेना को भी यहाँ हमला करना ठीक न लगा। फिर, उन्हें ललकारा भी तो बागबेड़ा वालों ने था। सेना आगे बढ़ गई।

चंदन पसीने से तर-बतर था। टाइगर को लेकर मन में चल रही उधेड़बुन की वजह से शारीरिक कष्ट की ओर उसका ध्यान नहीं था। उसने अपनी चाल तेज कर दी। बस्ती में केवल महिलाएँ और बच्चे थे। एक-दो जगहों पर महिलाएँ खड़ी होकर बातें कर रही थीं। वह उनकी नजरों में आने से बचता हुआ आगे बढ़ा। कुछ महिलाओं ने उसे देखा भी पर उसका संज्ञान नहीं लिया। वे चिंतित थीं अचानक बिगड़े माहौल से। चंदन की धुकधुकी बढ़ती जा रही थी। बँसवारी के पास पहुँचने पर वहाँ उसे टाइगर अपने भाई-बहनों के साथ घूमते दिखा। चंदन ने धीरे से टाइगर को पुकारा। टाइगर दुम हिलाते उसके पास दौड़ा आया। वापस आने पर टाइगर के साथ उसके भाई-बहनों ने रूखा व्यवहार किया था, यहाँ आकर वह अनेर हो गया था। चंदन की स्नेहिल उपस्थिति से उसकी खुशी का पारावार न रहा। उसकी लपलपाती दुम उसकी खुशी को बयाँ कर रही थी। उसके भाई-बहन भी उसके पीछे हो लिए। चंदन ने एक पल के लिए सोचा कि अर्जुन को घर से बुलाकर पैसे दे दूँ। पर, जो हालात थे उसे देखते हुए इसमें खतरा भी था कि बदले हालात में बिहारी समझ कर पता नहीं अर्जुन का बर्ताव उसके साथ कैसा हो? फिर यहाँ ज्यादा देर रुकना भी खतरे से खाली न था। वह वापस जाने के लिए मुड़ा। थोड़ी दूर चलकर ही टाइगर के भाई-बहन रुक गए, उन्हें अपने सीमा से बाहर जाना ठीक नहीं लगा। टाइगर अभी भी उसके पीछे था। थोड़ी दूर इसी तरह दोनों चलते रहे। फिर इधर-उधर देख चंदन ने टाइगर को उठा लिया और तेजी से चल पड़ा।

बागबेड़ा और हरहरगुट्टू के बीच मौजूद नाले पर बनी पुलिया पर आदिवासियों के पहुँचने पर उन्हें देशी बमों से सलामी दी गई। इधर से तीरों की बौछार हुई। उधर से दुनालियाँ तड़तड़ाईं। बम-बंदूक के धमाके, तीरों की सरसराहट, भगदड़, गाली-गलौज, नारेबाजी के शोर के बीच सायरन की आवाज हवा को चीरती हुई उठी… और निकट से निकटतर आने लगी।

मतलाडीह को जल्दी-जल्दी पारकर चंदन टाइगर को गोद में लिए हरहरगुट्टू पहुँच गया। यहाँ का माहौल भी तेजी से बदल चुका था – सड़कों पर सन्नाटा था। पुलिया की तरफ बढ़ते उसके तेज कदम यकायक बम के धमाकों तथा उन्मादपूर्ण नारों का शोर सुनकर रुक गए। दूर से ही पुलिया के करीब उसे जमा भीड़ दिखी। उसे हैरत हुई। वह समझे बैठा था कि जुलूस आगे जाएगा, मगर यहाँ तो पुलिया पर ही मोर्चा खुला हुआ था। उसने फैसला लिया-नाले से होकर जाने का। बस्ती के बीच से होते हुए एक कच्चे सँकरे रास्ते से होकर नाला किनारे चंदन पहुँचा। किनारे-किनारे वह आगे बढ़ने लगा। इस रास्ते से उस पर किसी की नजर नहीं पड़ सकती थी। नाले के दोनों छोर पर दूर तक खेत फैले हुए थे। छिछले नाले में कुछेक जगहों को छोड़कर कहीं भी घुटने से ऊपर पानी नहीं था।

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पुलिया पर पुलिस के आने से बम-गोली-तीर चलना बंद हो गए। लाइसेंसी, गैर-लाइसेंसी हथियार छुपाए जाने लगे। लड़ाई बंद हो गई… नेतागिरी चालू हो गई। पुलिया के हरहरगुट्टू के छोर पर आदिवासी तथा बागबेड़ा के छोर पर बिहारी योद्धा मोर्चा सँभाले हुए थे। पुलिया और उसके पास की सड़क नो मेंस लैंड में तब्दील कर दी गई। जहाँ पुलिस और रैफ के हथियारबंद जवान तैनात कर दिए गए।

नाले के दोनों छोरों पर खेतों के बाड़े संग उग आए नीम, अमड़ा, पीपल, जंगल जलेबी के पेड़ों और बाँसों का घना झुरमुट धूप का रास्ता रोके खड़ा था। मद्धिम रोशनी सुरक्षा का आभास दे रही थी। चंदन टाइगर को लिए आगे बढ़ रहा था। खेतों के अंतिम छोर से होते हुए वह अपनी कॉलोनी में पहुँच जाता। तभी, आगे बढ़ते हुए उसके पाँव सहसा ठिठक गए। सामने के खेत के बाड़े से छह-सात युवकों का झुंड निकला। उनके हाथों में तीर-धनुष, हॉकी स्टिक के साथ मूली, टमाटर और गोभी थे। काले-साँवले चेहरे उनके आदिवासी होने के प्रमाण थे। चंदन की छाती में एक शून्य-सा पैदा हो गया। जैसे छाती के अंदर से कोई अंग अचानक से पिघलकर गायब हो गया। वह मूर्तिवत खड़ा रह गया। युवकों की भी नजर उस पर पड़ी। उसका गंदुमी रंग उसे बाहरी यानि दुश्मन साबित कर रहा था। चंदन भयवश पीछे हटा। उनमें से एक युवक को पता नहीं क्या सूझा, वह चिल्लाया,

‘रुकऽऽ…’

इतना सुनते ही चंदन जान हथेली पर रखकर पीछे की ओर भागा। बदहवासी में काई जमे एक पत्थर पर उसका पैर पड़ा, वह फिसला… और छपाक… औंधे मुँह नाले में जा गिरा। टाइगर भी उसके हाथ से छिटककर पानी में जा गिरा। पानी के छींटे दूर तक उड़े। टाइगर काँय-काँय करने लगा। चिल्लाने वाले युवक ने दौड़कर चंदन को पकड़ लिया। चंदन को काटो तो खून नहीं। बाकी युवक क्षण भर के लिए स्तब्ध खड़े रहे। फिर उनमें से एक आगे बढ़ा। उसने चंदन को पकड़े युवक को डपटा, ‘क्या कर रहा है? छोड़ उसको।’

चंदन को पकड़े युवक ने कहा, ‘बेहारी बच्चा है…’

‘तो क्या हुआ… छोड़!’

उसने चंदन को उसके कब्जे से छुड़ा लिया। चंदन का दायाँ घुटना और कोहनी छील गई थी, माथे पर गूमड़ निकल आया था। चंदन ने टाइगर को नाले के किनारे दूसरी और भागते देखा तो इस विपत्तिजनक स्थिति में भी स्वभावतः उसे पकड़ने के लिए बढ़ा। यह देख उनमें से एक युवक ने भागकर टाइगर को उठा लिया। दूसरे युवक भी तब तक उनके पास आ गए। उनमें जिरह होने लगी। भीड़ की आड़ में कायर कुछ ज्यादा ही बहादुर बन जाते हैं। उन्हीं में से एक था वह। जो बड़ा जानवर न मिलने पर छोटे जानवर का ही सेंदरा (शिकार) करना चाहता था। मगर दूसरे युवक जानवर और एक बच्चे के फर्क को समझ रहे थे और बच्चे को पीट देने की खोखली बहादुरी को भी। इससे माहौल बिगड़ने का भी खतरा था। चंदन की स्थिति दूसरे मोहल्ले में घुस आए कुत्ते की तरह हो गई थी, जिसे उस मोहल्ले के कुत्तों ने घेर लिया हों। वे संताली में बहस कर रहे थे। उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उनके तीर उसे अपने सीने में चुभते हुए से लग रहे थे। चंदन को देख टाइगर कुनमुनाया। चंदन ने अपने हाथ बढ़ा दिए। उसे थामे युवक ने टाइगर को चंदन को सौंप दिया। कम ऊँचाई से गिरने के कारण टाइगर को ज्यादा चोट नहीं आई थी। लेकिन, पानी में भीगने की वजह से वह भीगी बिल्ली जैसा दयनीय लग रहा था, उसे देख चंदन को अपनी दुर्दशा का भान हुआ। उसकी रुलाई फूट पड़ी; दर्द और दहशत के बावजूद अब तक अकबकाहट में वह रो नहीं पाया था। ‘चुप… चुप… बाबू।’ एक युवक उसे चुप कराने लगा।

उन युवकों को नाले पर नजर रखने के लिए तैनात किया गया था कि कहीं इस छोर से दुश्मन हमला न कर दें। मगर यहाँ उन्हें अपनी ऊर्जा जाया होती दिखी तो वे गाजर-मूली उखाड़ने लगे। अब एक बिहारी बच्चा उनके हाथ आ गया था। बिहारियों से उन्हें इतनी नफरत तो थी कि उनके खेतों में लगे मूली-गोभी को उखाड़ डाले; क्योंकि उन्होंने जगह-जगह जमीन का अतिक्रमण कर रखा है। बाहर से आकर सारी अच्छी नौकरियों, अच्छे इलाकों पर कब्जा जमा लिया था। उन्हें रेजा-कुली समझते हैं… जंगली और होंडो कहते हैं। लेकिन, यह नफरत इस हद तक भी नहीं थी कि एक निरपराध बच्चे को मारे या पीटे। भले ही वह बिहारी क्यों न हों। चंदन के आँसुओं और टुकुर-टुकुर ताकती टाइगर की कातर आँखों ने भी असर किया। अधिकतर युवक चंदन को छोड़ देने के पक्ष में खड़े हो गए। वे चंदन को पकड़ने वाले युवक को ही गरियाने लगे। बहुमत उसके विरुद्ध हो गया। खुद को सबकी नजरों में वीर साबित करने की अपनी कोशिश का उलटा नतीजा देख वह भी ठंडा पड़ गया। चंदन को उठाने वाले युवक ने चंदन के बदन पर लगी धूल को झाड़ते हुए हम दर्दाना ढंग से पूछा, ‘कहाँ रहते हो बाबू… बागबेड़ा में? …तुम्हारा कुत्ता है?’ चंदन ने बड़ी मुश्किल से सिर हिलाया। उसकी आँखों में अब भी पानी भरा था। ‘ठीक से चले जाओ।’ एक युवक ने चंदन को टाइगर समेत नाला पार करवा दिया।

एस.डी.ओ. बारी-बारी से दोनों पक्षों के नेताओं से बात करते। उनसे जमघट हटाने की मिन्नत करते। बातों-बातों में नेताओं को केस-मुकदमों में उलझाने का भी भय दिखाते। उन पर नामजद मुकदमे दर्ज करने की धमकी देते। उनके साथ डी.एस.पी. और तीन थानाप्रभारी भी थे। आदिवासी नेता बागबेड़ा के उन युवकों की गिरफ्तारी की माँग कर रहे थे, जिन्होंने आदिवासियों को पीटा था। बिहारी नेता यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि बिहारी युवक ऐसी उदंडता भी कर सकते हैं।

चंदन अपने मोहल्ले में पहुँचा तो अनिल, रोहित, गोलू इत्यादि एक साथ खड़े होकर पुलिया पर चल रहे हंगामे पर ही गुप्तगू कर रहे थे। उसने अनिल और रोहित को दिखाते हुए टाइगर को किसी ट्रॉफी की तरह हिलाया। जवाब में अनिल ने अपने हाथ में थामी गेंद लहराई। चंदन को उससे उलझने की फुर्सत नहीं थी। वह तेजी से अपने घर में घुस गया। उसकी माँ और बड़ी बहन भी मोहल्ले की अन्य औरतों के साथ एक कोने में खड़ी होकर दास्ताने-पुलिया में चर्चालीन थीं। उसके पिता तमाशागाह बनी पुलिया पर हँगामा देखने गए हुए थे। उस वक्त किसी को चंदन पर ध्यान देने की फुर्सत नहीं थी। दुनिया-जहान से बेखबर सिर्फ उसकी छोटी बहन घर में खेल रही थी। सबसे पहले उसने चुराए हुए बीस रुपये का नोट अपने पिता के पर्स में रखा। भीगकर गंदे हो गए अपने कपड़े बदले और अपने जख्मों पर अपनी छोटी बहन से नेलपालिस लगवाया, ताकि वे पके नहीं। उसके पूछने पर उसने बहाना बना दिया कि ठोकर खाकर वह गिर गया था। तब तक गोलू भेद लेने आया। सारे बच्चे यह जानने के लिए कुलबुला रहे थे कि टाइगर को वह ऐसे माहौल के बीच कैसे ले आया? चंदन ने झूठ बोल दिया कि अर्जुन उसे टाइगर को देने आया था।

अब तक उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक भी पुलिया पर पहुँच चुके थे। रैफ की एक और टुकड़ी बुला ली गई। कर्फ्यू की घोषणा हुई। भीड़ छँटने लगी। प्रशासन को खबर लग चुकी थी कि दोनों पक्षों ने हथियारों का जखीरा जमा कर रखा है। पुलिस के मुखबिरों की सटीक जानकारी के आधार पर बागबेड़ा और रानीडीह के संदिग्ध व्यक्तियों के घर की तलाशी शुरू हुई। कई घरों से बम-तमंचे बरामद हुए। पुलिस ने दोनों पक्षों के कुछ लोगों को गिरफ्तार किया। कुछ व्यक्तियों पर बलवा फैलाने, हथियार जमा करने का केस भी दर्ज किया गया।

पुलिया के पास रैफ की एक टुकड़ी तैनात थी। फिर भी तनाव और तल्खी कायम रही। प्रशासन की सख्ती ने ऊपरी तौर पर माहौल को शांत कर दिया। पर, भय, आशंका और अविश्वास का कोई इलाज प्रशासन के पास नहीं था। आमने-सामने के टकराव के बाद दोनों पक्ष अति सतर्क हो गए थे। दोनों तरफ बैठक पर बैठक होने लगीं। युवकों की टोलियाँ बारी-बारी से रात में पहरा देतीं। जब-तब हमले की अफवाह उड़ती… उड़ाई जाती। कुछ ज्यादा ही सावधान लोग तो अपने परिवार को सुरक्षित ठिकानों पर छोड़ आए थे। दूसरे पक्ष की भारी तैयारी की बातें फैलाकर नेतागण अपना उल्लू सीधा करने में लगे थे। फिर से गुपचुप हथियार जुटाए जा रहे थे। गिरफ्तार और फरार रणबाँकुरों के मुकदमे लड़ने के लिए चंदा-चिट्ठा हो रहा था। आम लोग परेशान और खौफजदा थे। हक की लड़ाई में कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। बिहारी इलाकों से होकर आदिवासी भयवश काम पर नहीं जा रहे थे। बिहारी भी आदिवासी इलाकों में जाने से बचते।

अर्जुन को देने के लिए चंदन बाकी रुपये जमा करने में जुटा था। प्रशासन ने एहतियातन स्कूल बंद करवा दिया था। चंदन ने सोच रखा था कि स्कूल खुलते ही अर्जुन को बाल खरीदने के पैसे दे देगा। उसे डर था कि अनिल को यह बात पता चली कि बिना पैसे दिए ही वह टाइगर को उठा लाया है तो वह अर्जुन को भड़काने लगेगा, अपना पिल्ला वापस माँगने के लिए। इसलिए बेहतर है कि पैसे देकर हमेशा के लिए टाइगर का स्वामित्व प्राप्त कर लिया जाए।

मौके एवं माहौल को देखते हुए बाल-मंडली प्रशासन द्वारा जब्त हथियारों की क्षतिपूर्ति के लिए पत्थरों का जखीरा जमा करने की योजना बनाती है, ताकि आदिवासी हमला करे तो छतों से उन पर आदिम हथियारों से जवाबी हमला किया जा सकें। इसके लिए मोहल्ले के सभी बालवीर जुटे। उन्होंने चंदन को भी पत्थर जमा करने चलने के लिए बुलाया। चंदन टाइगर को बाचेन लेते हुए आया। आदिवासियों को अपना दुश्मन मानना चंदन के लिए जरा मुश्किल था। उसने टाइगर को झाड़ा फिराने का बहाना बना अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया। अनिल को मौका मिल गया। उसने ताना मारा, ‘यह थोड़े ही जाएगा, आदिवासी अर्जुन ने इसे कुत्ता जो दिया है।’ चंदन बोला, ‘तुम भी तो इसे लाने गए थे।’ ‘उस समय की बात दूसरी थी… अब मुझे पता चल गया है कि आदिवासी हमारे दुश्मन हैं।’ रोहित बोला, ‘चंदन गद्दार है।’ ‘हाँ… ठीक है, मैं गद्दार हूँ!’ उसकी हिमाकत बाकी लड़कों को भी अच्छी नहीं लगी। वे भी चंदन को कोसने लगे। अनिल के पैर सूँघ रहे टाइगर की चेन चंदन ने खीची। अनिल जल गया।

उसने बाल-संसद में प्रस्ताव पेश किया, ‘चंदन यदि आदिवासी का कुत्ता अपने पास रखेगा तो कोई लड़का उससे बात नहीं करेगा, न उसके साथ खेलेगा।’ चंदन को अपना हुक्का-पानी बंद होने की परवाह नहीं थी; पर टाइगर को आदिवासी अर्थात बाहरी सिद्ध कर दिए जाने में सन्निहित खतरे से वह चौकन्ना हो गया। एक बार बाहरी सिद्ध कर देने के बाद उसे नुकसान पहुँचाना आसान हो जाता। भावावेग में उसने टाइगर को गोद में उठाते हुए कहा, ‘देखो!’ अपने घुटने और कोहनी के जख्म दिखाते हुए वह लगभग चिल्लाया, ‘यह चोट मुझे कैसे लगी… पता है?’ उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर वह नाले में अपने साथ घटी घटना बताने लगा। उसके दोस्त आवाक होकर सुनते रहे। अनिल ने सवाल उठाया, ‘लेकिन, तुमने गोलू को उस दिन कुछ और बताया था?’ रोहित ने भी उसके सुर में सुर मिलाया, ‘या तो तुमने गोलू से झूठ बोला था या आज झूठ बोल रहे हो?’ ‘हाँ… मैंने उस दिन झूठ बोला था, इस डर से कि मेरी माँ को पता चला तो वह चिल्लाएगी, टाइगर को भगा देंगी।’ बाकी लड़कों की नजर में शक-शुबहा की कोई गुंजाइश नहीं थी। चंदन के पास सबूत के तौर पर जख्म और टाइगर था। टाइगर अपना बदन ऐंठने लगा, मानो गवाही देना चाह रहा हों। उसे गोद से उतारते हुए चंदन बोला, ‘सब आदिवासी बदमाश नहीं हैं। अगर होते तो मुझे नाले में मारकर फेंक देते और किसी को पता भी नहीं चलता।’ उसकी दलील में दम था। बच्चों की तनी हुई मुट्ठियाँ ढीली पड़ गईं। उन अनजाने अदिवासी युवकों की सहृदयता ने उन्हें प्रभावित किया। पत्थर जमा करने की योजना रद्द कर दी गई।

राजनैतिक नुकसान होता देख सत्ताधारी पार्टी का हाईकमान मुख्यमंत्री को बदलने का निर्णय लेता है। सत्ता सँभालते ही नए मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक सख्ती बरती। राजनीतिक संकट को कोर्ट में ले जाकर न्यायिक मसला बनाने की चतुराई दिखाई। मामला कोर्ट में जाकर लटक गया। धीरे-धीरे सबकुछ ठंडे बस्ते में जाने लगा। राज्य की स्थिति में निरंतर सुधार होने लगा। चंदन चालीस रुपये जमा कर चुका था, उसे बस स्कूल खुलने का इंतजार था।

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