समरसता की विक्ट्री

विजय के नगाड़े ‘सिरमिया देवी’ को बेसुध किए जा रहे थे, ये उन्हीं की जीत के तो नगाड़े थे। चुनाव आयोग की वेबसाईट के अनुसार वे अपने निकटतम प्रतिद्वंदी से रिकॉर्ड मतों से आगे चल रही थीं, कुछ दौर बचे थे, और किसी भी फेरबदल की उम्मीद नहीं थी। रजिया चुनावी कार्यालय में बैठकर इस नगाड़े की अगुआई कर रही थी।

सिरमिया देवी का जी आज की विजय से रो रहा था। उन्होंने कभी इस तरह जीत नहीं चाही थी, हमेशा ही पार्टी के अंदर रहकर पार्टी के टिकट पर जीत उनका सपना रहा था। जिस पार्टी को उन्होंने ब्लॉक लेवल से उठाकर जिला और फिर प्रदेश में अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी के उम्मीदवार को और वह भी उनकी पार्टी के सर्वेसर्वा की बहू को हराकर, वे जीत रही थीं। उनकी आँखों में आँसू थे, ये आँसू किसके थे? खुशी के? दुख के? विजय के?

अभी छह महीने पहले तक तो सब कुछ ठीक ही था।

पूरे बीस साल तक, युवावस्था से अधेड़ावस्था आते तक वे केवल पार्टी के लिए ही समर्पित थीं। मंडल और कमंडल की राजनीति के समय में सामाजिक न्याय को लेकर बनी इस पार्टी में पहले जाति और धर्म के आधार पर कुछ नहीं था। सिरमिया देवी का मन अपने समाज के लिए, अपने समाज की औरतों के लिए बहुत कुछ करने का मन था। ऐसे में युवा सिरमिया देवी ने सामाजिक समरसता का नारा बुलंद करने वाली इस पार्टी का दामन थाम लिया था।

पैंतालीस बरस की सिरमिया देवी इस पार्टी के महिला मंडल की जिला प्रमुख थीं। सीधे पल्ले की साड़ी पहने, ठेठ देसी अंदाज में जिंदा रहने वाली सिरमिया देवी का अपने जिले में बोलबाला था। राशन न मिलने से लेकर पति के साथ मारपीट की बात भी औरतें सिरमिया देवी से करने आ जाती थीं। वे महिलाओं की बहुत सगी थीं। हर गली में और हर ब्लॉक में उनकी अपनी महिला टीम थी।

“सिरमिया देबी जिंदाबाद, जिंदाबाद।”

नारे उनके कानों में पड़ने लगे थे।

और उन्होंने अपने कान बंद कर लिए।

उनके सामने वह पच्चीस बरस की सिरमिया खड़ी हो गई, नेता साहब ने जिसे पार्टी में जगह दी थी।

“अब तो मजा आ रहा होगा? अब तो हरा दिया न उसी झंडे को जिसके नीचे उसने राजनीति सीखी, जिसने उसे पहचान दी!, वाह सिरमिया!”

“मैंने क्या गलत किया है? मैं तो उसूलों की ही खातिर आई थी इस पार्टी में, मैं तो नहीं गई थी न छोड़ के? आप ही लोगों ने भगा दिया था?”

सिरमिया देवी अपने नेता साहब की फोटो से बात कर रही थीं।

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“आप ही लोग आए थे, परिवार के खिलाफ! कि जनता का राज होगा, अब लोकतंत्र आएगा और लोकतंत्र कहते-कहते, कब आपकी पार्टी एक ही परिवार की पार्टी बन गई आप खुद ही नहीं पहचान पाए।”

सिरमिया हाँफ रही थी और हाँफते-हाँफते वह छह महीने पहले पार्टी कार्यालय पहुँच गई। इस बार उसके सभी परिचितों का मानना था कि उसे चुनाव लड़ना चाहिए, क्योंकि वह उस क्षेत्र विशेष की समस्या से वाकिफ है। उसे ये भी पता है कि कौन सी सड़क कब बनी है और राशन की कालाबाजारी कौन करता है। बीस साल से समस्याओं से लड़ते-लड़ते ये सब कैसे उनके दैनिक रूटीन का हिस्सा बन गई थीं, उसे नहीं पता चला था। पर टिकट लेना क्या इतना आसान था?

“तो क्या सोचा है आपने?” प्रदेश प्रमुख ने पूछा था।

“हमने?”

“जी, टिकट तो देखिए आपको मिलेगा नहीं! हाँ जो पद अभी आपके पास है, महिला मंडल का प्रांत प्रमुख, वह अपग्रेड कर दिया जाएगा!”

“देखिए सर” रजिया ने कहा

“रजिया जी, आप चुप रहें, ये हमारे और सिरमिया देबी के बीच की बात है, काहे को टाँग अड़ा रही हैं! टिकट तो आपको मिलेगा नहीं, तो आप देख लीजिए!”

“भाई साहब आप जानते ही हैं कि मैंने कितनी मेहनत की इस पार्टी को इस शहर का हिस्सा बनाया हैं?” ये सिरमिया देवी बोली।

“देखो, सिरमिया समझो, हमें पार्टी के नियम पर ही चलना है।” वे उसे समझाने की आखिरी कोशिश कर रहे थे।

“और पार्टी के क्या नियम हैं? कि आम कार्यकर्ता काम करे डंडा खाए और जब ब्लॉक, शहर और महानगर स्तर पर पार्टी की साख बन जाए तो एसी में बैठे लोग बाहर आएँ और अपने परिवारों में टिकट बाँट दें? आखिर मेहनत करने वाला कार्यकर्ता कहाँ जाएगा?”

“देखो, सिरमिया देबी, हम सब जानते हैं कि आपने कितनी मेहनत की है और आपने कितना काम किया है। और हमारे लिए बहुत अनमोल भी हैं! तभी तो आपको महिला मंडल का प्रांत अध्यक्ष बना रहे हैं। काम करिए, पद तो दे रहे हैं।” कुटिलता अपने चरम पर थी।

“वाहे भाई साहब! पद भी महिला मंडल में ही, मुझे महिला मंडल से हटाकर जिला अध्यक्ष क्यों नहीं बनाते?” सिमरिया देवी ने सवाल किया

“अरे, जिला अध्यक्ष पे एक औरत! पूरा संगठन तबाह हो जाएगा, जिला अध्यक्ष पद पर एक औरत को बिठाने का मतलब जानती हो? राजनीति में आई हो, तुम्हारे लिए महिला मंडल है राजनीति करो न!” एक कमीनी हँसी हर तरफ तैरने लगी।

उस हँसी के कमीनेपन को अनदेखा कर वे बोलीं – “हाँ, और चुनाव लड़ता कौन हैं? चाँदी का चम्मच लिए जो पैदा होते हैं, नेता के घर या जो अमीर घरों की महारानियाँ ब्याह कर आती हैं, वही न?”

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“जाओ, तुम कर भी क्या लोगी! ज्यादा से ज्यादा अपने कुछ ब्लॉक के वोट काट पाओगी? नेताजी के पास तंत्र है, पैसा है पावर है! राजनीति में बीस बरस गुजारने के बाद तो तुम्हें पता ही होगा कि बड़ा नेता अपने विरोधियों को कैसे मारता है! नेता जी का काटा तो पानी भी नहीं माँगता!” ये प्रांत प्रमुख के कोई साथी बोले – “ओह तो यही सब कहने के लिए आपने बुलाया था! ब्लॉक लेबल पर हमारी टीम में कितने लोग हैं जो आपकी बहूरानी को जानते हैं? हम दीदी को इस बार विधानसभा में अपने प्रतिनिधि के रूप में देखना चाहते हैं। हम अपने बीच से लोग चाहते हैं। किसी राजघराने का नहीं।” रजिया ने दोनों के बीच आकर जैसे एक फैसला सा किया

“चुप करें रजिया मेम साहब! आप तो कुछ बोलें ही नहीं! आप को आता ही क्या है, सिरमिया देवी, आप इसकी बात में ना आना, पार्टी की तरफ से तो टिकट बहू जी को ही मिलेगा! राजघराने की हैं, उनमें कुलीनता कूट-कूट कर बसी है, और सुंदर हैं, सब कुछ तो है!”

“और नहीं है तो बस यहाँ की समस्याओं की समझ!”

और उस दिन की भारी बहस के बाद, अनुशासनहीनता के आरोप लगने के कारण अपने खून पसीने से सींची गई पार्टी को भरे मन से छोड़ दिया था। या यूँ कहें कि उन्हें निकाल दिया गया था।

मगर सिरमिया देवी की मंजिल तो कुछ और ही थी। बीस बरसों में इस तरह उनकी टीम थी कि जिले के हर एनजीओ, हर महिला विद्यालय और हर महिला उद्यमी के साथ उनकी पकड़ थी। और उनकी पार्टी का ही एक धड़ा इस बार उन्हें टिकट दिए जाने के पक्ष में था। सरकार के खिलाफ किसी भी धरने प्रदर्शन में वे और उनकी महिलाएँ हमेशा सबसे आगे रहती थीं। न जाने कितनी बार वे लाठियाँ खा चुकी थीं, हालाँकि उन्हें टिकट नहीं चाहिए था, पर अपने क्षेत्र की हर समस्या से परिचित होने के कारण वे विधानसभा में उनका हल चाहती थीं। बिजली विभाग से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सबमें क्या समस्या है, कहाँ उनका हल है, उन्हें अधिकतर पता था। मगर चुनाव में खड़े होने के लिए उनकी हिम्मत एक बार जबाव दे गई थी। कहाँ वो और कहाँ नेता साहब?

मगर अब वो कदम बढ़ा कर पीछे नहीं खींच सकती थी, अब जीत हो या हार, उन्हें आगे कदम बढ़ाना ही था। तो सोशल मीडिया एक्सपर्ट रजिया की मदद से उन्होंने निर्दलीय पर्चा भरा। हालाँकि सफर आसान नहीं था, पर सिरमिया देवी और रजिया के साथ-साथ उन महिला एनजीओ में काम करने वाली महिलाओं ने भी चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया जिनके लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी थी। ऐसी कई महिलाएँ थीं, जिनके पतियों को उन्होंने जबरन नशा मुक्ति केंद्र ले जाकर इलाज करवाया था। ऐसी कई कालोनियाँ थीं जहाँ पर जाकर उन्होंने महिलाओं को सरकारी योजनाओं के माध्यम से कभी सरकारी मशीन, तो कभी ब्यूटी पार्लर का काम शुरू करवाया था।

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रजिया ने अपना बनाम बाहरी मुद्दा बनाया, जिला की दीदी, विधान सभा इस बार जरूर जाएगी, का नारा दिलवाकर रजिया ने काफी कुछ बाजी को अपनी तरफ किया था। पर वह तो केवल कंप्यूटर था जिस पर बैठकर वे केवल नारे गढ़ सकती थीं, चुनाव तो नहीं जीत सकती थीं! चुनाव जीतने के लिए सच्ची मदद मिली उसी भीड़ से जिसके बीच उन्होंने अपने पंद्रह बीस बरस बिताए थे। कभी किसी की झोपड़ी टूटी तो सिरमिया हाजिर, कभी किसी की दुकान पर कोई अवैध वसूली तो सिरमिया हाजिर! और उसकी इसी हाजिरी ने उसे जनता की नजर में एक महान आत्मा बना दिया था, जिसके पास न तो कोई परिवार था और न ही कोई आगे पीछे। एक माँ थी जो अपने बेटे के साथ थी। उन पर जो पुलिस केस थे, वे उनके लिए नगीने थे क्योंकि वे उनके जन संघर्ष की कहानी कह रहे थे। उन्होंने अपने शरीर पर पुलिसिया लाठियों के निशानों को अपना हथियार बनाया।

उन्होंने अपना सब कुछ इस पार्टी और अपने शहर के लिए समर्पित कर दिया था। हवाई चप्पल पहने, सीधे पल्ले की आसमानी साड़ी में सिरमिया देवी आज फूल मालाओं से लदी हुई सोच रही थीं।

“ये जीत किसकी है और हार किसकी है? मैंने नेता साहब की बहू को हरा दिया! जीता कौन”

“दीदी, देखो न ये सामने जो भीड़ है, आपके अपने लोगों का प्यार है! दीदी, कोई नहीं हारा, लोकतंत्र जीता है।”

और वह अवाक कभी रजिया को, कभी अपने लोगों को तो कभी नेता साहब की फोटो को देख रही थीं।

नेता साहब मुस्करा रहे थे।

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