मुहर | चंदन पांडेय
मुहर | चंदन पांडेय

मुहर | चंदन पांडेय – Muhar

मुहर | चंदन पांडेय

रोली के जिद्दी और अकड़ू होने की खबर आजकल जैसे सबको हो गई है। अभी अभी पारिजात सर ने भी जिद्दीपने के खातिर उसे डाँट लगाई है।

रोली की नौकरी छूटे तीन महीने हो रहे हैं। नौकरी की तलाश में मित्रों की मदद उसे ‘अच्छी’ नहीं लगती। यह भी सच है कि सीधे रास्ते सारे बंद हैं। उसके मित्र समझदार हैं। किसी जगह उसके रोजगार की बात चलाने से पूर्व रोली की सहमति लेने का काम सलीके से करते हैं। इस तरह कि कहीं रोली को ‘फील’ ना हो जाए।

भोपाल के इस दफ्तर में रोली के लिए नौकरी की बात पारिजात सर ने चला रखी है। इस दफ्तर में उनका मित्र मुकुंद पांडेय बड़ी पदवी पर है और सक्षम है। मुकुंद पांडेय, पारिजात का सहपाठी रहा है और दो वर्षों के पाठ्यक्रम के दौरान पारिजात ने मुकुंद से कभी जो बातचीत की हो। पर समय समय की बात। तुक्के और अपनी बीवी की मदद से मुकुंद ने दफ्तर की दुनिया में अच्छा स्थान बना लिया है। वैसे, इस दफ्तर में रोली की नौकरी की बात चलाने से पहले पारिजात ने दो बार सोचा था। या शायद तीन बार।

नौकरी पारिजात की भी नहीं है पर उन्होने छोड़ रखी है। यह उनका तरीका है। छ: महीने की नौकरी करते हैं, धुआँधार काम करते हैं इतना शानदार कि चाहकर भी बॉस डाँट नहीं पाता… फिर नौकरी छोड़ देते हैं। थोड़ा दुनिया घूमा, कुछ किताबें पढ़ी, कुछ लेख लिखे और फिर छ: महीने के लिए नौकरी कर लेते हैं। इस अखबार की छवि उनके मन में अच्छी है इसलिए चाहते हैं कि रोली यहीं काम करे।

भोपाल तक का रेल टिकट लेने के लिए रोली कतार में थी और मुंबई के अपने मित्र से बात कर रही थी। आकाश था। यहाँ टिकट कतार से कम ही मिल रहे थे। ऐसे में बुकिंग क्लर्क पर उपजी झल्लाहट रोली ने आकाश पर उतार दी। थोड़ी बेरुखी से कहा : अभी फोन रखो, बाद में बात होती है। इसी बात पर उस मित्र ने कहा था : रोली, तुम ‘एरोगेंट’ हो गई हो।

उसी शाम की बात है, पारिजात सर का फोन था। रोली उन्हें अपने भोपाल के टिकट हो जाने की बात बता रही थी। सर ने पूछा : टिकट कन्फर्म तो नहीं होगा? उनके सवाल में तंज था। रोली ने कहा : बिल्कुल सही, कन्फर्म नहीं है। सर डाँटने लगे। उनका कहना वाजिब था। जाना, जब दो दिन पहले ही तय हो चुका था तो टिकट भी पहले ले लेना था। आलसी नंबर एक से नंबर दस तक, सारा यही जो ठहरीं। और तो और, रोली मैडम, सर की डाँट का बुरा भी मान गईं। कह दिया : अब मैं भोपाल नहीं आ रही हूँ। सर ने दुनिया की सारी उपेक्षा बटोर कर कहा : महारानी, ऐसी अकड़ नहीं चलेगी। समझी।

जब वो अपने लिए चाय बना रही थी तो पाया कि चीनी नहीं है और साथ ही उसे सुबह का वह समय याद आया जब आकाश ने उसे एरोगेंट कहा था। रोली को यह छोटे मोटे आविष्कार की तरह लगा। शाम को पारिजात सर ने भी उसे अकड़ू कहा था। शाम की यह याद आते ही वो चाय लेकर हॉस्टल की छत पर चली आई।

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उसे हँसी और एक पुरानी याद साथ साथ आई। पत्रकारिता की पढ़ाई के आखिरी साल की बात है, जब एक दिन उसने ‘एवरीथिंग इज एल्यूमिनेटेड’ के बारे में सुना। अंकित था या कोई और जो इस फिल्म की तारीफ में कई सारे पुल बाँधे जा रहा था। बाइत्तिफाकन रोली ने अगले ही दिन किसी पत्रिका में इस फिल्म का जिक्र देखा। उसे यह संयोग अच्छा लगा। दोनों घटनाएँ अगर दिनों के अंतराल पर घटती तब वो शायद इस फिल्म का ध्यान नहीं धर पाती। पर अनोखी बात तो इसके भी बाद घटी.

उसी दोपहर कैसेट्स की किसी अचर्चित दुकान में टहलते हुए रोली को इस फिल्म की सी.डी. मिल गई। उसे खूब आश्चर्य हुआ। उसे लगा हो ना हो सारे समीकरण ऐसे बन रहे हैं जिससे रोली को यह फिल्म दिखाई जा सके। उसने वो फिल्म खरीद ली वरना वो सी.डी. खरीदकर सिनेमा देखने वालों में से नहीं है।

रोली ने उस फिल्म को याद किया और उस घटना की इस बेअंदाज पुनरावृत्ति को भी। उसके चेहरे पर इस ख्याल की कसैली मुस्कराहट फैल गई कि आज कहीं कोई तीसरा ना मिल जाए जो उसके जिद्दी और अकड़ू होने की बात बताने लगे।

जिस दिन वो भोपाल पहुँची उससे पाँच दिन पूर्व से ही पारिजात सर अपना डेरा डंडा भोपाल में जमाए हुए थे। सर रोली से दो साल सीनियर हैं पर उनका ज्ञान तगड़ा है, जिसे वो गाहे ब-गाहे बघारते भी खूब रहते हैं। रोली को बहुत मानते हैं। चाहते हैं दुनिया की सारी समझ, सारा ज्ञान, सारा कुछ रोली के पास रहे। रोली, भले ही, ऐसा नहीं चाहती हो। दोनों के झगड़े मशहूर हैं।

कल साक्षात्कार है।

जब से वो आई है, पारिजात सर उसे कुछ ना कुछ समझाए जा रहे हैं। पहला घंटा शेयर बाजार के बारे में धाराप्रवाह बताते हुए बिताया। अभी अर्थशास्त्रीय सूत्र समझा रहे हैं। पर रोली यह सब सुनना नहीं चाहती है। उसे बार बार समझाए जाने की कोशिश भली नहीं लग रही है। जैसे वो बहुत बड़ी हो गई है या जैसे कोई उसे याद दिला रहा है कि वो बेरोजगार है। समझाइशों के बीच एक बार वो टोकती भी है : इससे पहले मुझे नौकरी नहीं मिली है क्या? साक्षात्कार के लिए जाते हुए उसने पीपल के गिरे हुए पत्तों के रंग का सूट पहन रखा था। रास्ते भर, जैसा कि आप सब अवगत हो चुके होंगे, सर रोली को समझाते रहे। दफ्तर के बाहर ही मुकुंद से मिलना तय हुआ था। वो मिले और मिलते ही पारिजात सर से शेयर बाजार के उतार चढ़ाव की बात शुरु कर दी। पारिजात बात जरूर कर रहे थे पर साथ के साथ यह भी सोच रहे थे कि कहीं रोली के साक्षात्कार में विलंब ना हो जाए। उनका यह सोचना साफ दीख रहा था जिसे देख रोली मन ही मन हँस रही थी।

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साक्षात्कार के वक्त एच.आर. (मानव संसाधन) की टीम के साथ मुकुंद पांडेय भी बैठे रहे। औपचारिक सवाल पूछे जा रहे थे जिनके औपचारिक ही जबाव रोली दे रही थी। एच.आर. के बंदे सवाल पूछकर एक बार सुनील की तरफ देख लेते थे; कहीं सवाल वजनी तो नहीं हो गया? बीच बीच में सुनील अपने संघर्षों की कहानी, अपनी ही जबानी शुरू कर दे रहे थे। वो सीनियर थे इस नाते सब उन्हें सुन भी रहे थे – कि कैसे बचपन में पचास मीटर पैदल चल कर विद्यालय जाया करते थे, कि बचपन में उन्हें विद्यालय की फीस जमा करने में उन्हे कितनी मुश्किल आती थी; इसलिए नहीं कि उनके पास पैसे नहीं होते थे बल्कि इसलिए कि उन्हें फीस जमा करने के लिए लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता था।

वो सीनियर थे इसलिए आते आते प्रवचन पर उतर आए। यह सब बताने लगे कि दुनिया माया है, सब मिथ्या है… और कहते कहते तैश खा गए। कहना शुरु किया : लोगों को अहंकार नहीं पालना चाहिए। जब मैं कॉलेज में था तब कुछ लोग मुझसे बात करना भी गवारा नहीं करते थे। वो मुझे देख कर रास्ता बदल लेते थे। उन्हे लगता था कि कॉलेज से निकलते ही किसी अखबार के संपादक की कुर्सी पर जा बैठेंगे… और इतना सब कह कर मुकुंद ने रोली की तरफ देखा। रोली ने बड़े गौर से देखा, मुकुंद उसकी तरफ देख रहे हैं। एच.आर. के सद्स्यों ने देखा : मुकुंद अभ्यर्थी की ओर देख रहे हैं और यह जो अभ्यर्थी है वह भी कम नहीं है जो मुकुंद की तरफ देखे जा रही है।

रोली को देखने के बाद भी मुकुंद ने अपनी बात जारी रखा। कहते रहे : ये जो महान पढ़ाकू लोग थे और जो हमें किसी लायक नहीं समझते थे आज खुद सड़क पर हैं। इनका सारा ज्ञान जाने कहाँ खो गया कि आजकल बेकार बेरोजगार घूम रहे हैं।

रोली ने दूर की सोची और पाया कि वो जब तक यहाँ रहेगी यह पाजी पंडित ऐसी ही बातें करता रहेगा। रोली समझ रही थी कि मुकुंद यह सब किसके बारे में कह रहे हैं। यह सारी गलतियाँ पारिजात सर में है। वो अपने कॉलेज में शायद ही किसी से मेलजोल रखते हों। खुद उससे भी वे केवल पत्रकारिता संबंधित बातें ही करते हैं। दरअसल पारिजात सर अपने आप में इतना गुम रहते हैं कि उन्हें पत्रकारिता के अलावा किसी भी दुनियादारी से कोई मतलब नहीं रहता है। अपने बैच में सबसे पहली नौकरी उन्होंने ही पाई थी। सर्वाधिक इंक्रीमेंट्स भी उन्हीं के लगे। ये जरूर है कि आज उनके पास नौकरी नहीं है पर उन्होने नौकरी छोड़ रखी है, उन्हें निकाला नहीं गया है।

इतना लंबा सोचते ना सोचते रोली की साँस फूल गई। पारिजात सर के बारे में आज तक उसने इतनी अच्छी बातें एक साथ कभी नहीं सोची होगी। इसी खातिर उसने मुकुंद पांडेय से कहा : पारिजात सर जब चाहें उन्हें नौकरी मिल जाए। कितने अखबार वाले जो उनके काम को जानते हैं, उन्हें बुला रहे हैं।

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मुकुंद पांडेय झटका खा गए। किसी से कुछ भी सुनने की उनकी आदत छूट गई। फिर भी खीसे या दाँत जैसा कुछ निपोरते हुए कहा : मैं पारिजात जी की बात नहीं कर रहा हूँ। यह तो एक आम चलन होता जा रहा है। एच.आर. के सदस्यों की समझ में ज्यादातर बातें नहीं आ रही थीं कि यहाँ क्या चल रहा है और यह भी कि यह, पारिजात, आखिर है कौन? कुछ देर ठहर कर रोली को सुनाते हुए मुकुंद ने एच.आर. हेड से पूछा : अब? एच.आर. हेड ने कहा : जरूरी कागजात इन्हें मेल द्वारा भेज दिया जाएगा। उसने मुस्कराते हुए रोली को बधाई दी और यह इस अखबार को नियमित तौर पर देखने की सलाह भी दी ताकि जब काम पर रोली आने लगे तो इस अखबार की नीतियों को समझने पर ज्यादा समय ना खर्च हो। ठीक इसी बिंदु पर मुकुंद ने रोली का ध्यान अपनी तरफ खींचा, कहा : पारिजात जी से कहिएगा, शाम को मिल लें।

अखबार के दफ्तर से निकलते ही रोली ने पारिजात सर को फोन कर दिया।

रोली उस पूरे दिन भोपाल घूमती रही। एक छोटे से दिन में जहाँ जा सकती थी, गई। जहाँ नहीं जा सकती थी, जैसे भीमबैठका, वहाँ मन ही मन गई। भीमबैठका पर जो कछुए के आकार वाला पत्थर था, उस पर मन ही मन बैठी रही। भोपाल ने उसकी स्मृतियों का अच्छा खासा हिस्सा छेंक रखा है।

शाम को पारिजात सर मिले। मिलते ही डाँटना शुरु कर दिया। कहने लगे, ‘मुकुंद कह रहा था कि मंदी के कारण नई नियुक्तियाँ पाँच छ: महीने के लिए टाल दी गई हैं। वो झूठ बोल रहा था। पर हँसते हुए ही उसने एक बात कही कि रोली थोड़ी ‘एरोगेंट’ है। …बताओ, मुकुंद की हरेक बात का जबाव देना जरूरी था?’ पारिजात रोली को पिछले कुछ दिनों की हर वो घटना याद दिलाते रहे जिससे साबित होता था कि रोली जिद्दी और अकड़ू है।

इधर रोली को पहले तो बेहद तकलीफ हुई पर अपनी तकलीफ को उसने गुस्से में बदलने में दिया, सोचती रही – दो दिन पहले भी तो यही मंदी रही होगी जब उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। एक बार को ही, पर रोली को यह ख्याल आया कि पारिजात सर को बता दे, मुकुंद की कौन सी बात पर उसने ‘जबाव’ दिया था। पर नहीं बताया क्योंकि उसी वक्त हबीबगंज स्टेशन से एक रेल खुली थी। रोली उसके डब्बे गिनने लगी थी। उसने गौर किया तो पाया कि इधर कुछ रेलगाड़ियों के डब्बे हरे रंग के भी होने लगे हैं।

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