मैकाले का जिन्न | दिनेश कर्नाटक

मैकाले का जिन्न | दिनेश कर्नाटक – Maikale Ka Jin

मैकाले का जिन्न | दिनेश कर्नाटक

वे एक-दो नहीं पूरे छह थे। अब्बास, विलाल, अमर, मोहन, नक्षे, पान सिंह! पढ़ार्इ-लिखार्इ को छोड़कर बाकी सब कामों में उस्ताद! कक्षा में भूले-भटके ही नजर आते थे। होशियार इतने कि लगातार दस दिन गोल होने से पहले कक्षा में नजर आ जाते थे ताकि नाम कटने से बच जाए। इसके बाद किसी दिन कक्षा में दर्शन दे दिए तो हाफ टाइम के बाद मौका लगते ही चंपत हो जाया करते थे। वे उनकी अनुपस्थिति और अनियमितता को दूर करने के लिए कर्इ तरह के प्रयास कर चुके थे, मगर उनका ढर्रा जस का तस बना हुआ था। समझाने तथा कहने का उन पर कोर्इ असर नहीं होता था। वजह साफ थी। उन्हें अपने घर वालों की सह थी। किसी दिन माँ-बाप को उनकी जरूरत होती तो अपने साथ ले लेते। बाकि दिन उनकी मर्जी चलती!

वे सब कक्षा में अलग-अलग लड़कों के साथ बैठते थे। कापी चेक कराने, पाठ पढ़ाने और पूछताछ के समय या तो गायब हो जाते या ऐसे भोले भंडारी बने रहते कि पकड़ में नहीं आ पाते थे। लेकिन कब तक बचते? पहली मासिक परीक्षा ने कक्षा की पूरी तस्वीर नरेंद्र सर के सामने स्पष्ट कर दी। कापियों में प्रश्नों के उत्तर लिखने के बाजए उन्होंने प्रश्नों को ही कीड़े-मकोड़ों की शक्ल में उतार दिया था। कक्षा छह में पहुँच जाने के बावजूद, उन्हें अभी तक लिखना नहीं आ पाया था। जब उनसे पढ़ने को कहा तो यह भी उनके लिए दुष्कर कार्य हो गया था।

ऐसा भी नहीं था कि कक्षा में सभी बच्चे उनके ही जैसे थे। तीस बच्चों की कक्षा में समीर, संतोष, रऊफ, हर्षित, महमूद जैसे लड़के भी थे जो उत्साह से दिया गया काम करते और जैसे ही किया हुआ काम दिखाने को कहा जाता तो उनमें होड़ सी लग जाती थी। उनके घरों के हालात भी उन लड़कों के घरों से बेहतर नहीं थे। ये बच्चे न तो आए दिन कक्षा में अनुपस्थिति रहते थे और न कभी स्कूल से भागते थे। इन बच्चों का पठन-पाठन के प्रति उत्साह देखकर नरेंद्र सर को भी पढ़ाने में आनंद आता था। इनके माँ-बाप अपनी तमाम मुसीबतों के बावजूद इनसे पढ़ार्इ के अलावा और कुछ नहीं चाहते थे।

कक्षा के तमाम बच्चों में सब से अलग था, पान सिंह! अपने उजाड़ चेहरे, बिखरे हुए बालों, कटे-फटे, मैले और बास मारते कपड़ों के कारण वह कक्षा में सब से अलग नजर आता था। वह आए दिन बड़े ही मार्मिक ढंग से रोते हुए किसी लड़के की शिकायत लेकर उनके सामने खड़ा हो जाता था। ऐसा लगता था, जैसे वह एक तरफ है और कक्षा के सारे लड़के दूसरी ओर! जिसे देखो वह उसी को परेशान करने में लगा है। उनकी समझ में नहीं आता था कि छोटी-छोटी बातों में होने वाले झगड़ों में उसकी आँखों में इतना पानी कहाँ से आ जाता है। वे उसे अपने पास बुलाते तो वह अपने दांये हाथ से गंगा-जमुना की तरह बह रहे आँसुओं को पोछता जाता और लंबी-लंबी साँसें भरते हुए लड़कों की करतूत भी बताता जाता। उसका रोना दूसरे बच्चों जैसा नहीं होता था। वह रोना ऐसा था, जैसा सब कुछ गँवा देने या सब कुछ खत्म होने के बाद पैदा होता है। हृदय को भेद देने वाला…! वे जानते थे, उसको रूलाने में बच्चों की शैतानियाँ ही नहीं उसका अपना जीवन भी सम्मिलित है।

शुरू-शुरू में तो वे उसका रूदन सुनकर घबरा जाते थे। बगैर देर किए उसके रोने को उसके पीड़ित होने का सबूत मान लेते थे और उसके द्वारा दोषी ठहराए गए बच्चे की सजा मुकर्रर कर दिया करते थे। पढ़ाने के बीच में भी वह कोर्इ समस्या लेकर आता तो उसको सुलझाने में लग जाते थे। पर जब उसकी समस्याएँ खत्म होने के बजाए तेजी से बढ़ने लगी तो उनका माथा ठनका।

‘जरा अपनी कापियाँ लाकर दिखा तो… देखते हैं… तू रोने और शिकायत करने के अलावा भी कुछ करता है कि नहीं!’ एक दिन उन्होंने उससे कहा।

कापी देखी तो उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया। अब तक कितना सारा काम करवा दिया गया था जबकि उसने शुरू के कुछ पेजों पर दो-तीन लाइनों में किसी अज्ञात लिपि में कुछ लिखने की कोशिश की थी… कुछ पेजों पर चित्र बनाने की कोशिश की थी… बाकी कापी को अपने हाल में छोड़ दिया था।

उन्हें अपने स्कूली दिनों की याद आई थी। कभी उन्होंने भी ऐसे ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ा था। तब स्थिति दूसरी थी। पढ़ार्इ के लिए ले-देकर सरकारी तथा सहायता प्राप्त स्कूल ही होते थे। मध्य तथा निम्न वर्ग के अधिकांश बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ते थे। पब्लिक स्कूल तब समाज के सर्वोच्च तबकों के लिए थे। बीच के पंद्रह-बीस वर्षों में अचानक पूरी तस्वीर बदल गई। अब हर आदमी की हैसियत का स्कूल मौजूद है। जैसे शिक्षा न होकर दुकानदारी हो गर्इ। हिंदी माध्यम के स्कूल पिछड़ेपन की निशानी बन गए। हर वह आदमी जो पैसा खर्च कर सकता है, अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में डाल देता है। और वह क्यों न ऐसा करे? शासक वर्ग भी तो अब तक यही करता आया है! आम आदमी इतना बेवकूफ थोड़ा है कि उसकी चालाकियों को न समझ सके।

‘यह भेड़ चाल हम सब को, कहाँ लेकर जाएगी, इसका किसी को अंदाज भी है? जो काम अँग्रेज नहीं कर पाए अब उसे खुद हम से करवाया जा रहा है।’ नरेंद्र सर प्रायः सोचते थे।

उन्हें इन हालातों से निराशा होती थी। वे सोचते थे, अगर समाज के सभी वर्गों के बच्चे एक साथ पढ़ते तो न सिर्फ उन्हें परस्पर सीखने-सिखाने की प्रेरणा मिलती, बल्कि समाज में सामाजिक सद्भाव, समरसता तथा संवेदनशीलता उत्पन्न होती। विद्यालय लोकतंत्र का निर्माण करने में सहायक होते। अगर ऐसी ही बंटी हुर्इ शिक्षा देनी थी, ऐसा ही भेदभाव से भरा समाज बनाना था तो आजादी और लोकतंत्र की क्या जरूरत थी?

औरों से क्या कहें, सब कुछ जानते-समझते हुए खुद उनके बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे थे। जब समाज में दो तरह की शिक्षा है तो उन्हें अपनी हैसियत वाली शिक्षा की ओर जाना ही होगा। रोज दो घंटा उनकी श्रीमती बच्चों की पढ़ार्इ को देती हैं। हालत यह है कि स्कूल डायरी में लिखे एक-एक निर्देश का पालन होता है। उनका बड़ा बच्चा अभी पहली में पढ़ता है, लेकिन दोनों भाषाएँ लिखने और पढ़ने लगा है। हिंदी में लिखे को हल्का-फुल्का समझ जाया करता है, लेकिन अँग्रेजी का सारा काम वह रटकर चलाता था। उसे रटते हुए देखकर उन्हें भारी कष्ट होता था, मगर वे कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। इधर अपने विद्यालय की हालत यह थी कि कक्षा छह में आने वाले कर्इ बच्चों को वे उस एक में पढ़ने वाले बच्चे के बराबर लिखना-पढ़ना तक नहीं सीखा पा रहे थे।

‘शर्मा जी इस बार एक-दो नहीं पूरे छह बच्चे ऐसे हैं जिन्हें पढ़ना-लिखना तक नहीं आता!’ उन्होंने स्टाफ रूम में आकर अपनी समस्या साथी शिक्षक के सामने रखी।

‘क्या बताएँ… आपकी क्या सभी कक्षाओं में हैं ऐसे बच्चे… मूड खराब हो जाता है… दूसरे बच्चों को पढ़ाएँ कि इन्हें कखग सिखाएँ… अरे आप, इनके लिए कुछ करके देख लो… इनके दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं!’ वे जैसे फट पड़े।

‘अब मूड खराब करके तो होगा क्या… सवाल ये है… इन बच्चों को पढ़ाया कैसे जाए?’ उन्होंने प्रश्न किया।

‘ये तो साब, उन प्रायमरी वालों से पूछा जाना चाहिए, जिन्होंने पाँच साल तक इन बच्चों के साथ जाने क्या किया?’ उन्होंने पल्ला छाड़ने के अंदाज में कहा।

‘शर्मा जी, अगर हम अपना काम जिम्मेदारी से कर रहे हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उन लोगों ने अपना काम नहीं किया होगा? बच्चों की पढ़ार्इ के लिए विद्यालय तथा शिक्षक के अलावा उसके माँ-बाप और समाज की भी तो भूमिका होती है। अब पुराना समय तो है नहीं कि डंडे और भय के बल पर बच्चों को रटा दिया और हो गया आपका काम। रटाना ही होता तो यह काम वे भी करवा चुके होते… आए दिन ट्रेनिंग में सिखाया जा रहा है कि बच्चों को बोझ मुक्त, रटंत मुक्त और भय मुक्त माहौल में शिक्षित करना है।

‘इन लोगों ने नए-नए प्रयोग करके शिक्षा का भट्टा बैठा दिया है… बच्चों को पूरी छूट दे दी है… हमको-आपको अब वो क्या समझते हैं… कोर्इ भय, कोर्इ डर है उनके अंदर!’ वे आक्रोश में थे।

‘यही तो वास्तविक चुनौती है, अब शिक्षक को डराने-धमकाने के बाजए… अपने धैर्य, ज्ञान, कला और करूणा से विधार्थी को सीखने को प्रेरित करना है… इसमें गलत क्या है…?

‘तो तैयार हो जार्इए… फिर से आ गर्इ दस दिन की ट्रेनिंग… आप यहाँ सोच रहो हो बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ… उनका आदेश है पढ़ाना-लिखाना छोड़कर ट्रेनिंग करो!’ वे हँसते हुए बोले।

‘मगर ट्रेनिंग को तो गर्मिंयों की छुटटी में करवाने की बात हुर्इ थी… सत्र के बीच में करवाने से पढ़ार्इ का नुकसान होता है। बदले में उपार्जित अवकाश देने की बात तय हुर्इ थी।’ उन्होंने अधीरता से कहा था।

‘सरकार उपार्जित अवकाश नहीं देना चाहती। वह इस वित्तीय बोझ को झेलने को तैयार नहीं है।’

‘अफसोस तो ये ही है कि हमारी सरकारों को आम आदमी को शिक्षा देना बोझ लगता है। मगर हथियारों के लिए उसका खजाना खुला हुआ है!’ वे खिन्न हो गए थे।

एक ओर शिक्षा व्यवस्था के सवाल, दूसरी ओर वे छह बच्चे जिन्हें अभी तक पढ़ना-लिखना नहीं आ रहा था। वे हर वक्त उनके दिमाग में घूमते हुए, उन्हें परेशान कर रहे थे। वे दूसरे लोगों की तरह डाक्टर, इंजीनियर या पीसीएस न बन सकने के बाद मजबूरी में शिक्षक नहीं बने थे। उनका पहला और आखिरी सपना शिक्षक होना ही था। बच्चों के बीच होना और पढ़ाना, उनके लिए काम के बाजए जीवन जीने के जैसा था। वे उनसे बातें करते। उन्हें हँसाते। जब बच्चे लय में होते तो पढ़ार्इ की ओर लौट आते। बच्चे खुशी-खुशी पढ़ भी लेते और सब काम करके ले आते थे। पर कुछ चीजें मायूस किए रहती थी। वहाँ आने वाले बच्चों के साथ जुड़ने वाली आगे की दो कड़ियाँ गायब थी। बच्चे स्कूल से निकलकर गंदगी के ढेरों, गालियों वाली गलियों, शराब के चौराहों, लालच की दुकानों और झगड़े के खेतों के बीच से होते हुए घर पहुँचते तो कोर्इ उनसे पूछने वाला नहीं होता कि स्कूल में क्या पढ़ा? कल के लिए कौन सी किताब बस्ते में रखनी है? कौन सी कापी में काम कर के ले जाना है? उल्टे वही गंदगी, अभाव, झगड़े और गालियाँ, उनके पीछे-पीछे घर में भी पहुँच जाते। अगले दिन सुबह बाप ने काम में साथ चलने को कहा तो ठीक वरना बुझे-बुझे, बास मारते कपड़ों के साथ कक्षा में पहुँच जाते। रास्ते में ज्यों-ज्यों साथ के लड़के मिलते जाते… घर पीछे छूटता चला जाता… सब कुछ भूलकर… मस्त होते जाते। नरेंद्र सर बच्चों के साथ एक शानदार संवाद की उम्मीद के साथ कक्षा में आते मगर काफी समय उनका हाथ-मुँह धुलवाने, कपड़ों को ठीक करवाने, डेस्क के नीचे जमा गंदगी को साफ करने में बीत जाता। यह सब करके अभी पाठ को पढ़ने से पहले उसकी चर्चा कर रहे होते कि घंटी बज जाती।

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अपने विचार मंथन से निकलकर उस दिन वे एक-दूसरे के साथ बातों में मशगूल बच्चों की ओर देखने लगे थे।

‘तुम में से कुछ बच्चों को अभी तक ठीक से लिखना तक नहीं आता, वह भी उस भाषा में जो तुम आराम से बोलते हो। इसी तरह बार-बार अभ्यास करवाने के बावजूद कुछ बच्चों को अभी तक अँग्रेजी में दिनों और महीनों के नाम तक लिखने नहीं आ पा रहे हैं! क्या प्राइमरी में तुम्हारी मैडम ने तुम लोगों को कुछ नहीं सिखाया?’ उन्होंने बच्चों से पूछा।

‘सिखाया सर, मैडम काफी मेहनत करती थी। ये लोग भाग जाया करते थे। मैडम का दिया काम कर के नहीं लाते थे।’ हमेशा की तरह समीर ने उन लड़कों की ओर इशारा करते हुए बताया।

मासिक परीक्षाओं से पहले वे उत्साह के साथ अपना कोर्स पढ़ाने में लगे हुए थे। अब यह सोचकर कि कक्षा के कुछ बच्चों के लिए इस पढ़ार्इ का कोर्इ मतलब नहीं है, उन्हें काफी अजीब लग रहा था। फिर उन्होंने तय किया कि इस विषय में ज्यादा सोच-विचार करने के बाजए कुछ करना आरंभ कर दिया जाना चाहिए। आगे का रास्ता खुद ही निकलता चला जाएगा। उन सब से एक अतिरिक्त कापी लाने को कहकर, उन्होंने अगले ही दिन से उन्हें अक्षर, शब्द तथा वर्तनी को सिखाने का काम शुरू कर दिया।

जब तक अलग से व्यवस्था नहीं होती वे बच्चों के लिए अलग-अलग पाठ-योजना बनाकर कक्षा में जाते। उन्होंने पान सिंह सहित पीछे की कतार के लड़कों को कक्षा के अपेक्षाकृत बेहतर बच्चों के साथ बैठा दिया था तथा उनकी सहायता और निगरानी का काम भी उन्हीं लड़कों को सौंप दिया था। वे लगातार उनकी कापियाँ पर नजर रख रहे थे। परिणामस्वरूप कुछ दिनों से स्कूल आ रहे पान सिंह ने स्कूल आना छोड़ दिया। लड़कों ने पूछने पर बताया, वह घर से स्कूल तो आता है, लेकिन बीच से गायब हो जाता है। बड़े लड़कों के साथ घूमता है, बीड़ी पीता है और ताश खेलता है। उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि गलती पान सिंह की नहीं, उनकी है। उन्हें उसे पाँच साल का छूटा हुआ कुछ ही दिनों में सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी।

उस दिन उन्होंने पूरी कक्षा के बच्चों की कापियों को साथ-साथ देखने और उनसे उनकी प्रगति पर बातचीत करने की योजना बनार्इ थी। लेकिन सुबह-सुबह प्रार्थना के समय ही मंडल स्तर के एक अधिकारी अपने लाव-लश्कर के साथ विद्यालय में आ गए और शिक्षकों की कतार में हाथ बाँधकर खड़े हो गए। एक-एक कर प्रार्थना, शपथ तथा राष्ट्रगान आदि सब निपट गया। प्रधानाचार्य उनके आगे नतमस्तक थे। मानो पूछ रहे हों, ‘सर आगे क्या आदेश है?’

अधिकारी महोदय ने न सिर्फ मंच सँभाल लिया, बलिक विद्यालय की कमान भी अपने हाथों में ले ली थी। बच्चों से बोले, ‘वे उनके सामने कुछ बातें रखना चाहते हैं, क्या वे उन्हें सुनना चाहेंगे? बच्चों ने जोर से ‘यस सर कहा। इससे खुश होकर उन्होंने बच्चों से पूछा कि वे कितनी देर तक उन्हें सुन सकते हैं, आधा घंटा या एक घंटा! बच्चों को उनकी यह बात कुछ समझ में नहीं आई। वे उजबक की तरह उनकी ओर देखते रह गए।

नरेंद्र सर को झुँझलाहट हो रही थी। उन्हें लग रहा था, अधिकारी महोदय को शिक्षकों से भी पूछना चाहिए था, कि क्या वे बच्चों को संबोधित कर सकते हैं, आज उनकी कोर्इ खास योजना तो नहीं है जो इससे प्रभावित हो सकती है! लेकिन जिस तरह से वे प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों को तवज्जो दिए बगैर अपना काम करते जा रहे थे, उससे लग रहा था, वे प्रधानाचार्य तथा शिक्षकों को इस लायक ही नहीं समझते कि उनसे कुछ पूछा जाए।

अधिकारी महोदय ने कुछ विदेशी तथा भारतीय राष्ट्रपतियों की जीवन गाथा बच्चों को सुनाई। उन्हें बताया कि कैसे अथक परिश्रम करने तथा मन में ठान लेने की वजह से गरीब घर में पैदा होते हुए भी एक दिन वे उस सर्वोच्च पद पर पहुँच गए। तरक्की करने तथा आगे बढ़ने में न तो गरीबी और न साधारण स्कूलों की पढ़ार्इ उनके मार्ग की बाधा बनी। आप सब भी एक दिन बड़े आदमी बन सकते हो, जरूरत है जुट जाने की। मेहनत करने की। भाषण के दौरान वे अपने हाव-भावों तथा मंच से ही मातहतों को अपने आदेशों के जरिए बच्चों को यह भी संकेत दे रहे थे कि वे जिन बड़े आदमियों का जिक्र कर रहे हैं, वे भी उन्हीं में से एक हैं।

अपना भाषण समाप्त कर वे प्रधानाचार्य से बोले, ‘देखिए, बोर्ड परीक्षाओं में अधिकांश बच्चे गणित, विज्ञान, अँग्रेजी जैसे विषयों में फेल हो जाते हैं… इस पर ध्यान दीजिए!’

प्रधानाचार्य ने खिलौने की तरह हर बार हिलने वाले अपने सिर को फिर से हिला दिया।

बड़े साहब ऑफिस की ओर को चले गए।

नरेंद्र सर के भीतर कुछ कुलबुलाने लगा था। वे सोचने लगे, ‘आखिरकार शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को किस तरह का ‘बड़ा आदमी बनाना है? क्या आदमी बड़ा तभी होता है जब वह बड़े पद और हैसियत को प्राप्त कर लेता है? क्या बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए गणित, विज्ञान और अँग्रेजी पर ही जोर दिया जाना चाहिए? क्या शारीरिक शिक्षा, कला, संगीत तथा भाषा-साहित्य विद्यालयों के मूलभूत विषय नहीं हैं? जिन लोगों के ऊपर शिक्षा को सँवारने का दायित्व है, अगर उन्हीं की उस के बारे में भ्रांतिपूर्ण समझ होगी तो शिक्षा का क्या हश्र होगा? विद्यालय में शिक्षकों के पाँच पद वर्षों से रिक्त हैं। उनकी व्यवस्था कौन करवाएगा? ध्वस्त होने के कगार पर पहुँच चुके स्कूल भवन की सुध कौन लेगा? सर्व शिक्षा अभियान, माध्यमिक शिक्षा अभियान, एनएसएस, एनसीसी, चुनाव प्रक्रिया, पल्स पोलियो की रैलियों और राज्य तथा केंद्र सरकारों के आकस्मिक कार्यक्रमों के बीच शिक्षण का कार्य कब और कैसे होगा? विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की समस्याओं पर चर्चा कौन करेगा?

नरेंद्र सर ने तय किया कि बड़े साहब जब कक्षाओं की ओर को आएँगे तो उनसे जरूर पूछेंगे कि आजादी की लड़ार्इ में कर्इ अनाम लोगों ने देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया! कोर्इ उनका नाम तक नहीं जानता! कर्इ लोग बड़े कार्यों में संलग्न होते हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाते, ऐसे लोगों को वे क्या मानेंगे? कर्इ लोग आज भी विज्ञापन और प्रदर्शन के बगैर लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए कार्य कर रहे हैं। क्या उनका जीवन असफल माना जाएगा?

वे अभी बच्चों की उपस्थिति लेकर लौटे ही थे कि पता चला अधिकारी महोदय ऑफिस के सामने की कक्षाओं की ओर एक चक्कर लगाकर चलते बने। क्या उन्हें शिक्षकों से मिलना नहीं चाहिए था? मगर ये लोग अब असुविधाजनक स्थितियों में नहीं पड़ना चाहते। अगर वे शिक्षकों के बीच जाते तो वे तमाम समस्याओं को उनके सामने रखते… जिसका उनके पास कोर्इ जवाब नहीं होता। इससे अच्छा तो यही है कि निकल लो चुपचाप पतली गली से… हो गया निरीक्षण!

यह सब भूलाकर नरेंद्र सर ने अभी कक्षा में जाकर चार बच्चों की कापियाँ भी अच्छे से नहीं देखी थी कि पीरियड खत्म हो गया। उनका सिर चकरा गया। अभी तो घंटी बजी ही थी।

प्रधानाचार्य बोले ‘आज पढ़ार्इ ऐसे ही होगी… साहब पीरियड छोटे करने को कह गए हैं… साहब का कोर्इ भरोसा नहीं… कर्इ बार लौटकर देखने भी आ जाते हैं…!’

बच्चों की शैक्षिक प्रगति का मूल्यांकन करने के बाद नरेंद्र सर को उन छह के अलावा पाँच और ऐसे बच्चे मिल चुके थे, जिन पर अलग से ध्यान देने की जरूरत थी। उन्होंने सोचा हो सकता है, वरिष्ठ तथा अनुभवी होने के नाते प्रधानाचार्य के पास कोर्इ समाधान हो, कोर्इ सही राय दे दें! उन्होंने समस्या बताकर उनका निर्देशन चाहा।

‘देखिए नरेंद्र जी, सरकार ने अब कक्षा आठ तक किसी भी बच्चे को फेल न करने का आदेश दे दिया है। ऐसे में अच्छे बच्चों के साथ बहुत सा कूड़ा-करकट तो आएगा ही। हमारे जमाने में ऐसी समस्या नहीं थी। छंटार्इ नीचे से ही शुरू हो जाती थी। आगे की कक्षाओं में अच्छे बच्चे ही आ पाते थे।

‘ये काम तो प्राइवेट स्कूल वाले आज भी कर रहे हैं। प्रवेश परीक्षा और दूसरे तरीकों से समाज के क्रीम बच्चों को अपने वहाँ ले लेते हैं, फिर हमारे अधिकारी, सरकार और मीडिया उनके साथ हमारी तुलना करने लगता है।’ नरेंद्र सर ने कहा।

‘देखो भार्इ, कुछ समय और धैर्य बना लो! सुनने में आ रहा है, जल्दी ही हार्इस्कूल की बोर्ड परीक्षा भी समाप्त होने वाली है। कोशिश करते रहो! ध्यान रखना, ज्यादा बच्चे फेल नहीं होने चाहिए! वरना हम लोगों पर सवाल उठने लगेंगे?’

‘सर आप जानते हैं, कापी में कुछ न लिखने वाले बच्चे को आगे बढ़ाना मैं उसके साथ अन्याय समझता हूँ। पिछली बार पच्चीस प्रतिशत लड़के फेल हो गए थे। आपने कइयों को पास कर देने को कहा। इस बार जो हालत है उसमें तो तीस से चालीस फीसदी बच्चे यहीं रुक जाएँगे। इसके लिए क्यों न अभी से कुछ कर लिया जाए!’

‘मुझे बताइए क्या कर सकते हैं आप! अपना कोर्स पढ़ाएँगे… या उन्हें अ आ क ख सिखाएँगे! अभिभावकों से कहिए, वे अपने बच्चों की पढ़ार्इ-लिखार्इ में ध्यान दें। अपने साथियों से बात कीजिए, उनसे पूछिए वे क्या करते हैं? परेशान मत होइए। पढ़ार्इ से ज्यादा सरकार को उनके भोजन और वजीफे की चिंता है। आप के पास मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी है, इस बात का ध्यान रखिए कि बच्चों को खाना समय से मिल जाए।’

‘लेकिन सर मेरा पहला काम पढ़ाना है। रोज मेरे तीन-चार पीरियड सब्जी, दाल-मसाले की व्यवस्था देखने में लग जाते हैं। शिक्षकों को इस काम में नहीं उलझाया जाना चाहिए! मुझे भाषा जैसा बुनियादी विषय पढ़ाना होता है। अगर इतना समय बच जाए तो मैं इन बच्चों को और अधिक समय दे पाऊँगा!’

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‘नरेंद्र जी भाषा…? आप भी…! प्रधानाचार्य हँसने लगे। ‘भाषा से क्या फर्क पड़ता है? धीरे-धीरे सब सीख जाते हैं। हाँ, अँग्रेजी में कोर्इ कसर मत छोड़िए! ज्यादातर बच्चे उसी में फेल होते हैं। आप चिंता मत किया करिए। अपने साथियों से बात कर… उनके अनुभव का लाभ उठाइए!’ उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा।

‘अरे हाँ सुनिए… बीएलओ और जनगणना की डयूटी के लिए तहसीलदार साहब ने कुछ मेहनती और कर्मठ शिक्षकों के नाम माँगे थे। मैंने आपका नाम भेज दिया है।’ उन्होंने उन्हें सूचना दी।

‘मगर मेरे पास तो पहले से ही कर्इ काम हैं! फिर पढ़ार्इ का क्या होगा… बच्चों की विशेष कक्षाओं का क्या होगा?’ नरेंद्र सर ने परेशान मुद्रा में कहा।

‘अरे कौन सा कल से शुरू हो रहा है… जब होगा देखा जाएगा… सरकारी राज काज है… आपको ड्यूटी करनी है… चाहे यहाँ करो या कहीं और… आपका मीटर तो घूम ही रहा है!’ प्रधानाचार्य हँसते हुए बोले।

‘लेकिन… हमारा काम तो विद्यालय में है… केंदीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों को तो इन कार्यों में नहीं लगाया जाता… आखिरकार हमारे विद्यालयों के बारे में सरकार का नजरिया क्या है… क्या ये विधालय शिक्षा का दिखावा करने को खोले गए हैं… क्या शिक्षा पूर्ण कालिक कार्य नहीं है… क्या सरकारी स्कूलों का शिक्षक बहुउद्देशीय कर्मचारी है?’ वे तिलमिला उठे थे।

नरेंद्र सर और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे। लेकिन वे जानते थे, प्रधानाचार्य के लिए उनकी बातों का कोर्इ अर्थ नहीं है। गए तो थे, विद्यार्थियों की समस्या का जिक्र करने बदले में उन्होंने उनके सिर पर और भी नई जिम्मेदारियाँ डाल दी।

साथ के अध्यापकों से इस समस्या पर चर्चा की। उपाध्याय जी कहने लगे ‘ये समस्या सभी के सामने आती है। लोग अपनी तरह से कोशिश भी करते हैं। लेकिन जब उस कोशिश का बच्चों की ओर से… उनके माँ-बाप की ओर से जवाब नहीं आता है तो निराश हो जाते हैं। इस कोशिश में कर्इ बार झुँझलाहट में उनका हाथ उठ जाता है… बच्चे को गंभीर चोट लगने पर लेने के देने पड़ जाते हैं। आप ने देखा होगा ऐसे मामले अखबारों में किस तरह से आते हैं!’

‘कोर्इ इस पर विचार नहीं करता कि शिक्षक अपना आपा क्यों खो बैठता है? वह ऐसा करने को क्यों मजबूर हो जाता है? उल्टे उसे खलनायक और अपराधी बनाकर जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। विश्लेषण करने वाले भी, संकट के मूल स्रोत को चिह्नित नहीं कर पाते!’ नरेंद्र सर ने गंभीरता से कहा।

‘इसलिए अब लोग सिरदर्द मोल लेने के बाजए चुपचाप अपना कोर्स पूरा करने में लगे रहते हैं.’

‘लेकिन ऐसा कोर्स पूरा करने का क्या फायदा जहाँ बच्चों को पढ़ना-लिखना ही नहीं आता!’ लंबा निःश्वास छोड़ते हुए नरेंद्र सर ने कहा।

‘बताइए और क्या किया जा सकता है?’ उपाध्याय जी ने उत्सुकता से उनकी ओर देखते हुए कहा।

‘ऐसे बच्चों के लिए सरकार को अलग से पाठ्यक्रम बनाना चाहिए। नवोदय जैसे स्कूल हमारे वहाँ से होशियार बच्चों को चुनकर ले जाने के बाजए इन विशिष्ट बच्चों को पढ़ाने के लिए होने चाहिए। वो तो कब होगा पता नहीं, लेकिन मैं सोच रहा हूँ… इन बच्चों को अलग से पढ़ाऊँ… स्कूल के बाद!’

‘आप सोच तो ठीक रहे हो… ये बच्चे अतिरिक्त ध्यान देने की माँग करते हैं… लेकिन क्या वे पढ़ने आएँगे… क्या उनके माँ-बाप उन्हें पढ़ने भेजेंगे… सबसे बड़ी बात आपकी इस भलमनसाहत को कहीं गलत तो नहीं समझा जाएगा?’

‘गलत मतलब!’

‘ट्यूशन!’

‘जिसे जो समझना है समझे… मुझे जो ठीक लग रहा है… मैं तो वही करूँगा!’

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए बनाई गई अपनी योजना को लेकर वे प्रधानाचार्य जी के पास पहुँचे।

‘सर, मुझे शाम के समय छह से सात बजे तक के लिए एक कक्षा कक्ष चाहिए, वहाँ मैं अपनी कक्षा के कमजोर बच्चों को पढ़ाना चाहता हूँ।’ उन्होंने बगैर कोर्इ भूमिका बनाए प्रधानाचार्य से कहा।

प्रधानाचार्य ने गौर से उनकी ओर देखा, फिर बोले – ‘आप बच्चों से बात करिए… उनके अभिभावकों से उनको भेजने को तैयार करिए… हम बड़े बाबू से पूछते हैं कि आप को कमरा दिया जा सकता है कि नहीं!’

नरेंद्र सर की समझ में नहीं आया कि प्रधानाचार्य उनके ऊपर व्यंग्य कर रहे हैं या उनका हौंसला बढ़ा रहे हैं। कमरे के लिए बड़े बाबू से पूछने की बात उनकी समझ में नहीं आई।

‘नरेंद्र जी इतनी मेहनत आपने अपने लिए की होती तो आज आप कहीं पर डी.एम. या एस.डी.एम. होते!’ उन्हें सोच में पड़ा हुआ देखकर प्रधानाचार्य ने कहा।

‘सर, मैं इस तरह से नहीं सोचता। मैं मानता हूँ जो काम आदमी खुशी से अपना समझकर करता है, उसके लिए वही बड़ा काम है। मैं तो शिक्षक होने को ही अपने लिए उपलब्धि समझता रहा हूँ। बच्चों से भी यही कहता हूँ कि जो काम उन्हें सब से अच्छा लगता है, वही काम सब से महान और बड़ा है!’ उन्होंने विनम्रता से कहा।

‘आपकी उमर में हम भी बच्चों को पढ़ाने और सिखाने के लिए काफी चिंतित रहते थे। एक उम्र होती है, जब बहुत कुछ करने का मन करता है। आप जैसे उत्साही लोगों को देखकर अच्छा लगता है!’ प्रधानाचार्य ने कहा।

उनके बार-बार बुलाने पर भी अधिकांश बच्चों के माता-पिता स्कूल में नहीं आए। कारण वे जानते थे। वे सब दिहाड़ी में काम करने वाले मिस्त्री, कारपेंटर, मजदूर, ठेला लगाने वाले दुकानदार या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले लोग थे। उनके लिए अपना काम छोड़कर स्कूल आने का मतलब था, एक दिन की दिहाड़ी से हाथ धोना। जो आए थे, उनमें से एक को छोड़कर बाकि ने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने से मना कर दिया था, उनका कहना था उस समय वे बच्चों को अपने साथ काम पर लगाते हैं।

अब नरेंद्र सर बाकी बचे बच्चों के घर वालों से मिलने जा रहे थे। साथ के लिए उन्होंने कक्षा के दो लड़कों को बुला लिया था। दोनों लड़के उन्हें कस्बे के अंत में बस्ती और गाँव को जाती सड़क के पास मिल गए थे। उन लोगों को देखते ही कुछ आवारा कुत्ते और कुछ नंग-धड़ंग बच्चे तेजी से उनकी ओर लपके। कुत्तों ने उन लोगों को सूँघना शुरू कर दिया, जबकि बच्चे उनके बारे में अनुमान लगाने लगे। बस्ती के अंदर कच्ची सड़क के दोनों ओर घरों के इर्द-गिर्द गंदगी बिखरी पड़ी थी। लोगों ने दरवाजे पर आकर उनकी ओर देखना शुरू कर दिया था।

‘हम क्या कर सके हैं, साहब! जे तो सरकार ने स्कूल खोल दिया है इसलिए पढ़ने भेज देवे हैं… वरना हमें तो दो समय की रोटी कमाणें के लिए औलाद चाहिए… अभी से काम नहीं सीखेगा तो आगे जाकर क्या करेगा?’

‘करना आप ने नहीं है… मैं करूँगा… शाम को चार से छह बजे तक इसको पढ़ाऊँगा… आप ने इसको भिजवा भर देना है!’

‘पढ़ने-लिखने से कुछ न होवे है। आदमी निकम्मा हो जावे है। काम से जी चुरावे लगे है। नौकरी का इंतजार करे है। किसी काम का न रह जावै है।’ उसने मुँह बिचकाते हुए कहा।

‘आप ठीक कह रहे हो। बच्चे थोड़ा बहुत पढ़-लिखने के बाद काम करने में शर्म महसूस करने लगते हैं। ये हमारी शिक्षा की कमी है। काम करना शर्म का नहीं गर्व का विषय है। शर्म तो चोरी करने में आनी चाहिए फिर पढ़ना नौकरी के लिए ही नहीं होता है। यह ज्ञान का युग है। मामूली से मामूली काम के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी हो गया है। जो पढ़ा-लिखा होगा वो अच्छे से अपना काम कर सकेगा!’

वह अविश्वास से उनकी ओर देखता रह गया।

‘पण मास्टर साहब, अब तो तुम लोग भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में न पराण लाग रयो हो… फेर हमारे बच्चों की एतनी चिंता काहे कर रहे हो?’

‘हम भी पढ़ाते… मंत्री, संसद, डीएम, सबके बच्चे एक साथ पढ़ते… आजाद देश में होना तो यही चाहिए था… मगर ऐसा है नहीं… फिलहाल तो जो है, उसी से काम चला लिया जाए!’

‘समझ गया मास्टर साहब, पण मैं आपको पढ़ाने की फीस नी दे पाऊँगा!’ उसने विचित्र नजरों से उनकी ओर देखते हुए कहा।

‘आप को कभी भी… न तो इस बारे में सोचना है और न ही कुछ देना है… सरकार हमें इसी काम के लिए तो तनखा देती है!’

आखिरकार उन्हें सात बच्चे पढ़ाने को मिले। प्रधानाचार्य जी ने कमरे के बारे में कोर्इ जवाब नहीं दिया था। वैसे भी अब बड़े कमरे की जरूरत नहीं थी। उन्होंने तय किया कि इन बच्चों को वे अपने घर में ही पढ़ा लेंगे।

विचार से पत्नी को अवगत कराया तो वह नाराज हो गई। ‘अपने बच्चों पर ध्यान देने के बाजए आप ये क्या आफत मोल ले रहे हो… स्कूल में पढ़ाते तो हो… इतना समय अपने बच्चों को पढ़ा देते तो वे क्लास में और अच्छी पोजीशन में आ जाते!’

‘हमारे बच्चे पढ़ार्इ में ठीक हैं… इन बच्चों को बुनियादी बातें भी नहीं आती। उन बच्चों की जिम्मेदारी भी हमारी ही है… उनके घरों में हमारी-तुम्हारी तरह कोर्इ पढ़ा-लिखा नहीं है जो उन्हें पढ़ा सके।’

‘आपके अलावा और कौन-कौन है जो बच्चों को पढ़ा रहा है!’ पत्नी ने फिर से प्रश्न किया।

‘मुझे समझ में आ रहा है। मैं पढ़ा रहा हूँ। औरों से क्या मतलब है?’

‘आजकल सब अपने फायदे की जुगत में लगे रहते हैं। आपके पास ऐसे कामों के लिए ही समय है? मैं किसी काम के लिए कहूँगी, तुरंत मना कर दोगे!’

‘तुम जो समझो!’ कहकर नरेंद्र सर घूमने निकल गए। कहाँ तो उन्होंने सोचा था, यह काम करते हुए उन्हें अपने पेशे के प्रति सार्थकता का एहसास होगा। लोग सराहना करेंगे, पर यहाँ तो जिसे देखो वो टाँग खिंचार्इ में लगा था।

उस रात उन्होंने एक अजीब सपना देखा। एक गोरे जिन्न ने पूरे देश को अपने कब्जे में लिया हुआ था। वह अपनी उँगलियों से पूरे देश को नचा रहा था। नरेंद्र सर के शरीर पर भी जगह-जगह डोर बंधी थी, जिसका नियंत्रण उस जिन्न के हाथ पर था। नरेंद्र सर उस डोर से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वह उन्हें देखकर हँस रहा था। नरेंद्र सर ने उससे सवाल किया, ‘तुम कौन हो और इस तरह हमारे देश को अपनी उँगलियों पर क्यों नचा रहे हो?’

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‘यू ब्लडी इंडियन… यू डोंट नो एबाउट मी? मयने ही तो तुम लोगों को अपना एंपायर का गुलाम बनवाया था। मयने थ्योरी दिया था… फिलट्रेशन थ्योरी… जिसे 24 नवंबर 1839 को गवर्नर-जनरल आकलैंड ने सरकारी पालिसी बना दिया था। तुमको पटा है, तब मैंने क्या कहा था। मयने कहा था, ‘सरकार का कोशिश, समाज के अपर क्लास में शिक्षा को फैलाने तक सीमिट रहना चाहिए, अपर क्लास के पास पड़ने के लिए टाइम है और उसका कल्चर छन-छनकर नीचे के आदमी तक पहुँचता है। तुमको मालूम है… आज भी तुमारा देश हमारी थ्योरी पर चल रहा है। नब्बे साल बाद जब हमरा कुछ ऑफिसर लोग टुम पर दया करके तुमको पडाने की कोशिश में लगा था तो मयने 1929 में हर्टांग कमीशन के जरिए कहा था, ‘सरकार को गवर्नमेंट स्कूल को खोलने की स्पीड को धीरे-धीरे कम करके, इन स्कूलों के रिसपांसबिलीटी से अलग हो जाना चाहिए। तुम जानता है, सिर्फ डेढ़ सौ साल में मयने तुम्हारे वहाँ का ब्रेन को अपने कब्जे में ले लिया था। तुमसे तुम्हारी जबान छीन ली। तुमसे तुम्हारा भरोसा छीन लिया। तुमको नकलची बना दिया। अब तुम चाहकर भी हमारी कैद से आजाड नहीं हो सकता। तुम तड़पता रहेगा। अस्सी साल बाद 2009 में हमने तुम्हारे वहाँ राइट टू एजुकेशन दिया। तुमको मालूम नहीं है… वो शिक्षा देने का नहीं छीनने का राइट है… डेखना अब सरकारी स्कूल तेजी से बंद होता जाएगा… हमने पब्लिक स्कूलों में गरीबों के लिए 25 परशेंट रिजरवेशन करके फिर से तुम्हारे लोगों के बीच में फूट डाल दिया है। तुम अपनी जबान में बोलकर हमको हराना चाहता है। हम बहुत जल्दी तुमहारे देश के अंदर तुमारे हाथों से तुमहारी भाषाओं का गला घुंटवा देगा… समझा तुम!’

‘तू कभी ऐसा नहीं कर पाएगा… तेरे मंसूबे हम पूरे नहीं होने देंगे!’ नरेंद्र सर ने अपने को आजाद करने की कोशिश करते हुए कहा।

‘यू ब्लडी अकेला आदमी… तुम पैले अपने को आजाद करके डिखाओ?’ उसने हँसते हुए कहा।

‘हमने तुमको पैंसठ साल पहले अपने देश से भगा दिया था!’ नरेंद्र सर ने आत्मविश्वास से कहा।

‘टुम बहुट भोला आडमी है। गांडी की टरह जिसने आजादी के समय अपने आजाद होने की घोषणा करते हुए हमारे रेडियो वाले से कहा था, ‘दुनिया से कह दो गांडी को अँग्रेजी नहीं आता! हमने उसको तुम्हारे लोगों से मरवा दिया। तुम अपनी भाषाओं में बोलकर आजाद होना चाहता है… हम टुमको भी नहीं छोड़ेगा?’

नरेंद्र सर ने देखा, कर्इ लोग हाथों में लाठी-डंडे लिए हुए उनकी ओर लपक रहे थे। एक पत्थर उनके सिर पर आकर लगा और उनकी नींद खुल गई। उन्होंने सिर पर हाथ लगाया, वहाँ से खून रिस रहा था। पत्थर से बचने की कोशिश में उनका सिर चारपार्इ के कोने से टकरा गया था।

उन्होंने सपने के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। पान सिंह को स्कूल नहीं आते हुए एक महीना बीत चुका था। उन्होंने उसके घर कर्इ जवाब भिजवाए, पर कोर्इ नहीं आया। आखिरकार उन्हें मजबूर होकर उसका नाम काटना पड़ा। नाम कटने के एक हफ्ते बाद उसकी माँ उस को अपने साथ लेकर आर्इ।

‘इतने जवाब भिजवाने के बाद अब आने से क्या फायदा… अब तो इसका नाम कट चुका है!’ उन्होंने नाराजगी से कहा।

‘क्या बताऊँ मास्साब, ये बहुत बिगड़ चुका है। अपने से बड़े लड़कों से दोस्ती कर ली है। उनके साथ आवारा घूमता रहता है। कितना मार दिया, उल्टा तक लटका दिया, पर इस पर कोर्इ असर नहीं पड़ता है!’ उसने कहा।

‘मारने से कुछ नहीं होता… उससे तो ये और भी बिगड़ जाएगा! इसके पिताजी कहाँ हैं?’ उन्होंने पूछा।

‘दो साल पहले घर से चले गए थे तब से उनका कुछ पता नहीं है!’ उसकी आँखों में आँसू भर आए थे।

‘मैं समझ गया!’

‘मास्साब, मुझे भी रोज काम नहीं मिल पाता। मेरी इच्छा तो थी ये भी कहीं काम में लग जाता तो… आसरा हो जाता… आपकी कहीं जान-पहचान हो तो देखिएगा?’

पान सिंह की माँ की बात सुनकर चौंक गए थे नरेंद्र सर!

इतनी उम्र में ये कहाँ काम करेगा… इसी वजह से तो सरकार वजीफा देती है…!’

‘सात-आठ सौ में क्या होता है मास्साब?’

‘सरकार उसका खर्च उठा रही है… पूरे घर का नहीं! दिन का खाना… किताबें… ताकि वह आगे जाकर अपने लिए और घर के लिए अच्छा कर सके! अभी क्या होगा… कहीं बर्तन माँजने में लग जाएगा… जिंदगी गर्क हो जाएगी! ऐसा मत सोचो… इसे स्कूल भेजो… इसका जो भी खर्च होगा मैं देख लूँगा!’

‘ठीक है, मास्साब!’ आश्वस्त सी होते हुए उसकी माँ ने कहा था।

फिर वे पान सिंह की ओर मुखातिब हुए थे। ‘कल से स्कूल आ जाना… अब तुझ से कापी दिखाने के लिए नहीं कहूँगा… सवाल भी नहीं पूछूँगा… तेरा मन हो तो खुद ही कापी दिखा देना… खुद ही सवालों के उत्तर बता देना… कोर्इ तुझ को परेशान करेगा तो मुझे बताना! तेरी मम्मी भी अब तुझे नहीं मारेगी… ठीक है… अब आएगा ना स्कूल!’

‘जी आऊँगा!’ उसने कहा।

तब से पान सिंह रोज स्कूल आता है। अब वह उनके पास कोर्इ शिकायत लेकर भी नहीं आता है। वह डेस्क में कापी-किताब रखकर उनके ऊपर झुका रहता है। अपने वादे के अनुसार उन्होंने कभी उस से न कुछ दिखाने को कहा और न कुछ पूछा। ‘स्कूल आता रहेगा तो लड़कों की संगत में कुछ न कुछ सीखता रहेगा।’ वे सोच रहे थे।

मगर यह बहुत दिनों तक नहीं चल सका।

पान सिंह ने फिर से स्कूल में आना बंद कर दिया। रोज सुबह नरेंद्र सर जब बयालीस रोल नंबर पर पहुँचते तो उन्हें लगता अभी पान सिंह ‘यस सर!’ कहकर अपनी सीट से उठता हुआ दिखाई देगा। लेकिन दिन बीतते चले गए और ऐसा पल कभी नहीं आया।

हर समय पान सिंह का जिक्र करने के कारण अब स्टाफ के कर्इ लोग इस नाम से परिचित हो चुके थे।

साथी शिक्षक कर्इ बार उनसे पूछ लेते थे – ‘और आपके पान सिंह की पढ़ार्इ कैसी चल रही है?’

यह उन्हें उनका मजाक नहीं… संवेदनशीलता लगती थी।

लेकिन शिक्षक ही नहीं अब तो कक्षा के बच्चे भी उन्हें पान सिंह की खबरें देने लगे थे।

‘सर, पान सिंह गुप्ता समोसे वाले के वहाँ काम करने लगा है! कह रहा था… अब स्कूल नहीं पढ़ेगा!’

‘देखो नरेंद्र सर, ये हालत है, इन बच्चों की… आपने कितना ध्यान रखा था उसका… शायद फीस भी जमा की थी… मगर उसे तो नोट कमाने का चस्का लगा हुआ है… पढ़ेगा कहाँ से!’

न जाने कितने लोगों ने कितनी बार उन्हें पान सिंह के गुप्ता समोसे वाले के वहाँ काम करने की बात बता दी थी। मगर वे प्रतिक्रिया में कुछ नहीं कहते थे।

दो महीनों तक उन्होंने उपस्थिति रजिस्टर में पान सिंह की जगह को बनाए रखा। अर्द्धवार्षिक परीक्षा के बाद उस जगह को बाद वाले रोल नंबर से भर दिया। अब पान सिंह ‘ड्राप आउट’ हो चुका था।

नरेंद्र सर अब पहले से काफी बदल गए थे। वे खिन्न से रहने लगे थे। किसी भी बात पर एकदम नाराज हो जाते थे और तपाक से उत्तर दे देते थे। यह सोचे बगैर कि इसका सामने वाले पर क्या असर पड़ेगा! ऐसा नहीं है कि अपनी यह बेचैनी और खिन्नता खुद उन्हें नजर नहीं आ रही थी। मगर वे विवश थे।

उस दिन सुकून से बैठे प्रधानाचार्य जी ने उन्हें अपने पास बुलवाया।

‘आइए भार्इ, नरेंद्र जी कैसे हैं? क्या चल रहा है इन दिनों!’ उन्होंने मुस्कराते हुए उनकी ओर देखकर पूछा था।

नरेंद्र सर को उनकी मुस्कान खुद को चिढ़ाती प्रतीत हुर्इ थी।

‘जी, ठीक हूँ!’

‘आपके पान सिंह का क्या हाल है? सुना उसके लिए आप काफी चिंतित रहते हैं!’

‘सर, मेरी चिंता से न तो उसके घर के हालात बदल सकते हैं और न उसकी पढ़ार्इ चल सकती है!’

‘सुना, इन दिनों गुप्ता समोसे वाले के वहाँ काम कर रहा है!’

‘जी, आपने ठीक सुना है!’

‘सरकार कुछ कर ले इन्होंने पढ़ना-लिखना थोड़ा है… अच्छा, आप कुछ बच्चों को पढ़ाने की बात कर रहे थे! क्या हुआ… बच्चों के माँ-बाप से बात हुर्इ?’

‘बात हो गर्इ है सर! पढ़ाना भी शुरू कर दिया है!’

‘आप तो क्लास के लिए कह रहे थे?’

‘आपने कहा बड़े बाबू से पूछना पड़ेगा तो मैंने सोचा जब बच्चों को पढ़ाने के लिए बड़े बाबू से पूछना पड़ रहा है तो आपको कष्ट देने के बाजए कोर्इ और व्यवस्था क्यों न कर ली जाए!’ उन्होंने अपनी कड़ुवाहट को उगल दिया था।

‘नरेंद्र जी, आप नाराज हो गए!’

‘सर, मैं नाराज क्यों होने लगा?’

कितने बच्चे आने को तैयार हुए?’

‘सात!’

‘सिर्फ सात… आप तो कह रहे थे… दस-बारह बच्चे हैं!’

‘जी हाँ… बच्चे तो इतने ही थे… लेकिन सर, विडंबना यह है कि बच्चों के हालात उन्हें पढ़ने नहीं देते… हमारे योजनाकार… उनको हर हाल में पढ़ाना चाहते हैं। मगर उनके घरों के हालात नहीं बदलना चाहते। हम सब उनके लिए बनी हुर्इ योजनाओं को लागू करने में लगे रहते हैं… मुझे ऐसा लगने लगा है सर कि हम सब लोग शिक्षा के इस नाटक में अभिनय कर रहे हैं!’ नरेंद्र सर ने कर्इ दिनों से परेशान कर रही बातों को कह दिया था।

‘नरेंद्र जी, अब आप सच्चार्इ को समझे… हमेशा से ऐसा ही होता रहा है… आगे भी ऐसे ही होता रहेगा…!’ प्रधानाचार्य जी दिव्य ज्ञान देने के अंदाज में बोले।

‘नहीं सर, आगे भी ऐसा ही नहीं होता रहना चाहिए!’ कहकर वे खड़े हो गए।

‘अरे बैठो भर्इ, कहाँ की जल्दी में हो… सब हो जाएगा!’ प्रधानाचार्य ने कहा।

‘सर, मध्याह्न भोजन का समय हो रहा है। जरा नजर मार आऊँ!’ कहकर नरेंद्र सर उठ गए और प्रधानाचार्य जी मुस्कराते हुए उन्हें जाते हुए देखते रहे।

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मैकाले का जिन्न – Maikale Ka Jin

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