गुहार | जयनंदन

गुहार | जयनंदन – Guhar

गुहार | जयनंदन

लाश सड़ चुकी थी। उसके अंग-प्रत्यंग विकृत हो उठे थे। कोई सप्ताह भर पहले इससे जान निचोड़ी गई होगी। खबर मुझे काफी देर से मिली। पता नहीं मेरे हितचिंतकों एवं हितैषियों के एक बड़े हुजूम को भी, जिसे मैंने अपने ऊपर आसमान के सारे बादलों की टकराहट से उपजी सारी बिजली टूटने के बाद सहानुभूतिवश तैयार होते देखा था, इस लाश के होने का पता इतनी देर से कैसे चला। इसके पहले तो वे बीस-पच्चीस कोस की दूरी पर भी पड़ी हुई लावारिस ताजी लाश की सूचना तुरंत दे डालते थे।

बहरहाल, भीषण दुर्गति प्राप्त उस लाश को पहचानना बहुत मुश्किल था। लेकिन मेरे जेहन में उनकी देह के कुछ ऐसे निशान दर्ज थे जिसके आधार पर मैं दावा कर सकती थी कि यह लाश शर्तिया मेरे पति की है। रात की पाली में ड्यूटी जाते हुए घर से कारखाने के बीच चार मील की पसरी निर्जनता और सन्नाटे में उनके गुम होने के बाद छह महीने के दरमियान यह बारहवीं लाश थी। इसके पहले सूचित ग्यारह लाशें मैं देख चुकी थी और सबों पर मैंने अपने पति होने का पुख्ता दावा पेश किया था। चूँकि सभी में एक आश्चर्यजनक समानता थी कि उनमें से किसी का भी चेहरा साबुत नहीं था।

मुझे उनमें से कोई भी लाश सुपुर्द नहीं की गई, हालाँकि आज भी मुझे अपने उन दावों के प्रति तिल भर संशय नहीं है। लोग समझते हैं कि मैं अपना दिमागी संतुलन खो चुकी हूँ… पति की गुमशुदगी का सदमा मुझे अर्द्धविक्षिप्त बना गया है। उनकी धारणा को और भी बल मिल जाता है, जब वे एक आदमी की इतनी लाशें होने की मेरी जिद से परिचित होते हैं और बावजूद इसके वे मुझे सिंदूर, चूड़ी, मंगलसूत्र और रंगीन साड़ी में एक सुहागन जैसी असुविधाजनक स्थिति में पाते हैं। उन्हें समझा पाना मेरे लिए मुश्किल है कि लाश दर लाश मेरा सुहाग और भी पुष्ट होता जा रहा है। बारहवीं लाश जब मैं देखने गई तो मेरे सारे शुभेच्छु पहले ही अनुमान लगा चुके थे कि इस बार भी मैं अपने पति होने की पुष्टि करूँगी… और सचमुच मैंने ऐसा ही किया।

मैंने उचित किया या अनुचित, इसका निष्पक्ष फैसला हो, यही गुहार ले कर यहाँ मैं आपके सामने हूँ।

पहली लाश यहाँ से दो-तीन मील के फासले पर सुवर्णरेखा नदी के किनारे एक बोरे में बंद मिली। इसे मैं देखते ही चीत्कार कर उठी। चाकुओं और छुरों से लाश बुरी तरह क्षत-विक्षत थी। अपनी आँखों से ऐसी बर्बर निष्ठुरता मैं पहली बार देख रही थी। मैंने देखा कि लाश के दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बँधी हुई हैं। मेरे पति भी अक्सर अपनी मुट्ठियाँ बाँध कर रखा करते थे। शव का रंग साँवला था और मेरे पति गौरवर्णी थे। लेकिन यह सिर्फ मैं जानती थी कि जब वे कारखाने में दमन भटि्ठयों में काम कर रहे होते थे या करने जा रहे होते थे तो उनका रंग बिल्कुल विवर्ण हो जाता था। उनके सीने में घने बालों के बीच घाव का एक निशान था, जो लाश में भी मौजूद था। इन एकरूपताओं के आधार पर मेरा कहना सर्वथा उचित था कि यह लाश मेरे पति की है।

मेरी इस निशानदेही के तुरंत बाद एक वृद्ध दंपति वहाँ आ गया था जो लाश की उँगलियों और चेहरे पर बची हुई एकमात्र साबुत नाक को देख कर तुरंत कह उठा था कि यह उनके बेटे की लाश है। सचमुच नाक और हाथ-पैर की उँगलियाँ उस वृद्ध की बिल्कुल कार्बन कॉपी थी। उनकी इस स्थापना पर मेरा कोई एतराज लाजिमी नहीं था। लाश उन्हें न मिलती तो वे बुरी तरह ढह जाते। मुझे एक और जानकारी मिली कि उनका लड़का शिक्षित बेरोजगार संघर्ष समिति का सचिव था। मेरे पति कारखाने में प्रतिपक्ष यूनियन की आतंक निवारण संघर्ष समिति के सचिव थे।

अब आप ही बताइए, क्या वह मेरे पति का शव नहीं था?

दूसरी लाश आठ मील दूर एक कस्बे के बाहर स्थित वाटर टावर के पीछे पड़ी हुई मिली। इसका सीना दर्जनों गोलियों से छलनी था। मैं वहाँ पहुँची तो एक दूसरा आदमी लाश ले जाने का उपक्रम कर रहा था। मृतक को वह अपना भाई बता रहा था। मैंने लाश में अनचाहे अपना कोई साम्य ढूँढ़ना चाहा तो अचंभित रह गई। उसके जबड़े भिंचे हुए से थे। मेरे पति का भी जबड़ा अक्सर अन्याय के समक्ष कस जाता था। मृतक का कद नाटा था और मेरे पति को जाननेवाले जानते होंगे कि वे ऊँचे कद के व्यक्ति थे। लेकिन वे मुझे बताया करते थे कि जब वे अन्याय से हार जाते हैं तो उनका कद स्वतः बौना हो जाता है। उनमें और इस मृतक में एक और अद्भुत साम्य था – दोनों की बाईं जाँघ में एक बड़ा तिल था। अब यह मानना कतई बेजा नहीं था कि यह मेरे पति का ही शव है।

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परंतु इसका भाई बतानेवाला एक आदमी दो बहुत ही ठोस सबूत दे कर अपना भाई साबित कर चुका था। उसके अनुसार सभी भाइयों की नाभि उभरी हुई थी और हाथ की कलाई कद के अनुपात में बहुत छोटी थी। अब मुझे भला क्या कहना था। कौतूहलवश मैंने मृतक के जीवन-वृत्त के बारे में संक्षिप्त पूछताछ की तो एक बार फिर चकरा गई। वह आदमी अक्सर झूठे और फरेबी किस्म के आदमियों से उलझ पड़ता था और बराबर किसी न किसी से उसकी ठन जाती थी। मेरे वे भी तो ऐसे ही थे।

अब आप ही बताइए, क्या उसे मेरा पति का शव मानना गलत था?

तीसरी सूचित लाश का ठिकाना दस मील की दूरी पर जिले की सरहद से कुछ अंदर ही स्थित था। इसके नाक-मुँह इस तरह थुरे हुए थे कि पहचानना मुश्किल था, लेकिन बड़ी-बड़ी आँखें बिल्कुल घूरती हुईं साबुत थीं, ठीक मेरे पति की तरह। वे कभी भी किसी से आँखें चुरा कर या झुका कर बातें नहीं करते थे। कोई भी उन्हें डराने की कोशिश करता तो उनकी आँखें आग बरसाने लग जातीं। लाश की काया इकहरी थी, जबकि मेरे पति के जानकार उन्हें दोहरी कायावाले व्यक्ति के रूप में याद करते होंगे। लेकिन इस बात की सिर्फ मैं राजदार थी कि अपनी मजबूरीवाली ड्यूटी के लिए जाते समय उनका खून सूखने लग जाता था और काया सिकुड़ने लग जाती थी। एक समानता और भी परिलक्षित थी कि उनकी हथेलियों की तरह इस शव की भी हथेलियाँ घट्ठे के निशान से भरी हुईं सख्त और खुरदरी थीं। स्पष्ट था कि मैं इसे अपने पति का शव घोषित कर सकती थी। मगर हर बार की तरह इस बार भी दूसरा दावेदार आ खड़ा हुआ। साथ में उसके कई और कुटंब-परिजन थे और सबके चेहरे पर उसे एकमुश्त पहचान लेने का आत्मविश्वास था।

मेरे लिए इतने लोगों को एक साथ गलत ठहराना कठिन था। मृतक की खूबियों को याद करते हुए कुछ लोग कहते पाए जा रहे थे कि वह दया, प्रेम और करुणा की प्रतिमूर्ति था। किसी भी आदमी को दुख में देख कर मदद के लिए आगे बढ़ आना उसकी फितरत थी। मैं सन्न थी कि ये लोग अपने रिश्तेदार का चरित्र-चित्रण कर रहे हैं या मेरे पति का?

अब आप ही बताइए, मैं कैसे न कहती कि यह मेरे पति का ही पार्थिव शरीर है?

नदी में बहती हुई एक लाश के यहाँ से आठ मील दूर दक्षिण के एक गाँव में किनारे लगने की खबर मुझे दी गई। यह उनके गुम हो जाने के बाद चौथी लाश थी। उसका सिर और चेहरा पूरी तरह कुचल कर चिपटा बना दिया गया था। बस उसकी तनी हुई लंबी गर्दन और पानी से फूले हुए जिस्म में उभरी हुई छाती महफूज थी, जिनका सूक्ष्म अवलोकन मुझे यह कहने के लिए इंगित कर रहा था कि यह बेशक मेरे पति का ही शव है। मगर मेरे साथ के लोग सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि मेरे पति की गर्दन छोटी और मोटी थी। मैं उन्हें क्या बताती कि जब भी उन्हें आसमान में झाँकना होता था या दूर निशाना लगाना होता था उनकी गर्दन लंबी हो कर तन जाती थी।

इसके पहले कि इस लाश पर मैं अपना विशेष हक जता पाती, मुझे अप्रकट रूप से एक प्रतीक्षा थी उस दूसरे आदमी की जो उस पर अपना रिश्तेदार का हक आरोपित कर देता। ठीक ऐसा ही हुआ। एक धड़धड़ाती हुई पुलिस वैन आ कर रुकी और उससे उतरे पुलिसवालों ने लाश की शिनाख्त शुरू कर दी। नतीजा यह निकला कि वह लाश कल रात में अपहृत हुए एक प्रदेश मंत्री की बता दी गई। उस मंत्री के बारे में सबकी राय थी कि वह ईमानदार और कर्मठ था तथा भ्रष्ट एवं बेईमानों को बर्दाश्त नहीं कर पाता था। विधानसभा के अगले सत्र में वह किसी बाहुबली मंत्री के कारनामों का भंडाफोड़ करनेवाला था, जिसके लिए उसे कई दिनों से धमकियाँ मिल रहीं थीं।

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हद हो गई, यह तो मेरे पति की कहानी बताई जा रही थी। कारखाने के प्रबंधन, यूनियन और नामी-गिरामी ठेकेदारों की धाँधलियों से वे क्षुब्ध थे और मजदूरों की एक आमसभा करके सबका सरेआम पर्दाफाशकरने का उन्होंने ऐलान कर रखा था। उन्हें रोज-रोज धमकियाँ और चेतावनी दी जाने लगी थीं।

अब आप ही बताइए कैसे मैं इसे अपने पति का शव न मानूँ?

घर से बारह मील दूर पाँचवाँ शव गर्दनविहीन था। उसके कुछ हिस्से मांसभक्षी पशुओं एवं पक्षियों के आहार बन गए थे। फिर भी दो जिस्म एक जान वाली अंतरंगता के कारण अपने पतिवाले अधिकांश चिह्न मैं आसानी से टटोल सकने में सक्षम थी। वे अपने हाथ की उँगलियों के नाखून कभी काटा नहीं करते थे। उन्हें वे एक हथियार की तरह सहेज कर रखते थे। उनके तलवे एवं एड़ियाँ बिवाइयों एवं कट-छँट के निशानों से गुँधे हुए थे। चूँकि ड्यूटी के बाद नंगे पैर चलने की उन्होंने आदत बना ली थी। कहीं बाहर भी जाना होता तो वे इसी तरह चले जाते। वे कहा करते थे कि कंकड़, पत्थर और काँटे हमें संघर्ष के लिए अभ्यस्त बनानेवाले औजार हैं। उनका यह भी मानना था कि सीधे धरती से जुड़े पैर मिट्टी की सहनशीलता और उसमें समाई उर्वरा शक्ति को महसूस करते चलते हैं। अब भला अपने पति के रूप में पहचान करने से मैं कैसे इनकार कर देती। इसके पहले कि मेरे परिजन मेरी घोषणा की ताईद करते, एक हताश खोजी दल वहाँ फिर आ पहुँचा। दल के सदस्यों ने गहनता से देखा-परखा और मेरे दावे को खारिज करते हुए अपना फैसला आरोपित कर दिया। उन्होंने बताया कि यह शव उनके गाँव के एक यतीम युवक का है जो व्यवस्था-विरोध का एक निर्भीक और असुविधाजनक शख्सियत बन गया था। वह शोषितों, दलितों, पीड़ितों और गरीबों की चीखों, कराहों और टीसों को बगावत में ढालने का एक जनप्रिय जादूगर में परिवर्तित हो गया था। उसे अपनी तिल भर भी परवाह नहीं थी और दूसरों के लिए जीने में उसे मजा आने लगा था।

इस तरह जेहाद और बगावत उसके चरित्र का हिस्सा बन गई। वह जब भी मुड़ कर देखता तो चीख, कराह और टीस मिश्रित आर्तनाद करती एक भीड़ अपने पीछे पाता। बेजमीन के पैरों और बेआसमान के सिरोंवाले लोग उस पर अपनी रहनुमाई के लिए लगातार निर्भर होते चले गए। उसने अपना कंधा हर पीड़ित आदमी के लिए सुलभ बना दिया, फिर तो उसे पता भी नहीं चला कि कब उसे अपनी रोटी दूसरों को खिलाने में ज्यादा आनंद मिलने लगा। खुली प्राकृतिक आँधी, पानी, धूप और दुनियावी निष्ठुरताओं के घूरे से कुकुरमुत्ते की तरह गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध वह अपना सिर उठाता जा रहा था तभी व्यवस्था पोषक शक्तियों ने उसका पुर्जा-पुर्जा छिन्न-भिन्न कर दिया।

आप चाहे विश्वास न करें – मेरे पति की निर्मिति भी ठीक इन्हीं धातुओं से हुई थी और ऐसी ही आग उनमें सुलगती रहती थी। वे अपनी पगार पर न जाने किस-किसकी जरूरतों की मुहर लगा दिया करते थे। कल क्या होगा, इस पर जरा भी विचार करना उन्हें गवारा नहीं था। वे कहते थे कि उनका कल उन लाखों लोगों के कल से अलग क्यों होना चाहिए जो हर पल अनिश्चितता के भँवर में नाक तक धँसे रहने को विवश हैं। आप मेरे जीर्ण-शीर्ण कपड़े देख लीजिए, मेरे घर की हालत देख लीजिए… समझ जाइएगा। अब आप ही बताइए कि इस शव पर अधिकार पाने के और कौन से प्रमाण मुझे देने चाहिए?

मैं अपने बयान को और ज्यादा लंबा नहीं बनाऊँगी। आगे जो छह और लाशों के साथ मुझे गुजरना पड़ा उनके साथ भी मेरे अनुभव इसी तरह के रहे। सारी लाशें बर्बरता और वहशीपन की परकाष्ठा के एक मौन बयान थीं। जिंदगी की ऐसी लाचारी मेरे रोम-रोम को जैसे काँटे में तब्दील कर डालती थी। मुझे यों महसूस होता जैसे मेरे जिस्म के सारे रक्त, अस्थियाँ और मांस आँसुओं में ढल गए हैं। कोई भी देख कर मुझे कह देता है कि मैं बस आँसू की एक लकीर भर हो कर रह गई हूँ।

अब मैं अत्याचार की नाव पर सवार दुखों के समुद्र में भँवरों के बीच फँसी हूँ। बस नाव डूबने के पहले शायद यह मेरा अंतिम आर्तनाद है। बारहवीं लाश देखने की यातना बिछ गई है मेरे सामने। यह लाश संपूर्ण सड़ कर मानो दुर्गंध का एक गुब्बारा बन गई थी। गाँववालों ने उसे ताड़ के पत्तों से ढँक दिया था, ताकि वह गिद्ध-कौओं और स्यार-कुत्तों के आक्रमण की जद में न आ सके। जीवित शरीर के प्रति कोई कितना भी खूँखार बर्ताव कर ले, लाश के साथ उसका मन द्रवित हो ही जाता है। शायद जीवन की निस्सारता और परलोक आदि का खयाल कहीं उसके अवचेतन में उभर आते होंगे।

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पीछे जिन शारीरिक और चारित्रिक स्थितियों का जिक्र मैं कर चुकी हूँ, सूक्ष्मता से पड़ताल करने पर उन्हीं में से कुछ इसमें भी देखी जा सकती थी। एक नया प्रमाण लाश के मुँह का खुला होना था। मेरे पति भी चुप रहने में विश्वास नहीं करते थे और किसी भी नाइंसाफी का खुल कर प्रतिकार कर उठते थे। अतः उनकी पहचान के प्रति मेरे मन में कोई संशय नहीं था। इस बार किसी अन्य आसामी के बीच में टपक पड़ने की आशा नहीं रह गई थी। चूँकि एक सप्ताह से यह शव लावारिसहाल पड़ा था।

शुभचिंतक के आवरण में मजा लेनेवाले मेरे परिचितों ने लाश ले जाने की व्यवस्था कर दी। पोस्टमार्टम आदि की वैधानिक प्रक्रिया से गुजरने के लिए पहले हमें पुलिस स्टेशन जाना पड़ा।

पुलिसवालों ने लाश देखी और देखते-देखते उनके माथे पर गहरे बल पड़ गए। उनके दृश्य-पटल पर अनेक थानों के रिकार्ड में ब्लैकलिस्टेड एक कुख्यात डाकू उद्धार सिंह की तस्वीर चलचित्र की तरह घूमने लगी। उद्धार सिंह की जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी पर एक लाख का इनाम था। पुलिसकर्मियों ने अपने फाइल से उसके अनेक फोटो निकाल कर शव के चेहरे से मिलान किया और निष्कर्ष दिया कि यह डाकू उद्धार सिंह ही है।

डाकू उद्धार सिंह के बारे में सबको पता था कि वह अमीरों को लूट कर गरीबों की मदद करता है। वह गलत और आपराधिक दुनिया में दाखिल हो कर भी दलितों, पीड़ितों और शापितों के मसीहा के रूप में ढल गया था। उसे लोग राजनेताओं और नौकरशाहों की लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के खूँखार दुश्मन के तौर पर देखते थे। वह राजपाट चलाने वालों के नाम पोस्टर चिपका कर सरेआम चुनौती देता रहता था कि सुधर जाओ, नहीं तो सब पर शामत बरसा दूँगा।

शायद यह दोहराने की जरूरत नहीं कि मेरे पति भी अपने कारखाने की दलाल यूनियन और क्रूर प्रबंधन के नाम इसी तरह अवरोधक की तरह चुनौतियाँ बिछा दिया करते थे। उन्हें लापता करनेवालों को इनाम में इसी तरह एक बड़ी राशि भेंट में दी गई होगी।

अब आप ही बताइए, इस लाश को अपने पति के तौर पर मेरी शिनाख्त क्या गलत थी?

इस प्रकार छह महीने में बारह जघन्य हत्याओं के दृश्य। मुझे हासिल कुछ नहीं। हर बार दुखों की बाढ़ उफनती हुई तीव्र से तीव्रतर। मैं विधवा और सधवा की संधि रेखा पर स्थित। जानती हूँ कि मेरे पति अब जीवित नहीं हैं, साथ ही यह भी जानती हूँ कि उन्होंने अपनी जो पदचापें और सुगंध छोड़ी हैं, वे मर नहीं सकतीं, चाहे उनके बारह की जगह लाख शव सामने आ जाएँ!

बहनो और भाइयो, आप अगर ऐसे पक्ष में खड़े हैं जो न्याय और संघर्ष का पक्ष है तो आपसे मेरा नम्र निवेदन है कि आपके आसपास कोई ऐसा लावारिस शव पड़ा मिले जो वर्ण, आकार, कद में कैसा भी हो, मगर उसके जिस्म से नेकनीयती, खुद्दारी और सच्चाई की गंध निकल रही हो, और उसका कोई वारिस सामने न आए, तो समझिए, जरूर वह मेरे पति का शव है। बिना देर किए आप मुझे उसकी सूचना दे पाएँ तो मुझ अभागिन पर आपका बड़ा उपकार होगा।

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