तर्पण | चित्रा मुद्गल

तर्पण | चित्रा मुद्गल – Tarpan

तर्पण | चित्रा मुद्गल

“पापाजी, ये सुबह-सुबह उठते ही आप सहगल की सीडी क्यों लगा देते हैं?

कितना मनहूस गाना है।

जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे – ?

गाना क्या है, रोना है, रोना।

बंद कीजिए।

पचासों नई सीडी अमृता ने लाकर रखी हुई हैं घर में।

उन्हें सुनिए।”

“पापाजी, आपने तो हद कर दी। येऽऽ लैंडलाइन्स का बिल बारह सौ रुपये? इतना!

हम तो कहीं करते ही नहीं फोन।

घर में होते ही कब हैं?

दफ्तर से खटखटा रात सोने भर के लिए तो घर आते हैं। हमारे रहते किसी का फोन आ गया तो उठा भर लेते हैं।

जिन्हें करना होता है, उन्हें दफ्तर से कर लेते हैं। अपने-अपने मोबाइल हमारे पास हैं। आपको मोबाइल दिया नहीं क्योंकि आपको पेसमेकर लगा हआ है।”

अमृता बता रही थी, तुम फिजूल भुन्ना रहे हो। गनीमत समझो कि बिल कम आया है।

वरिष्ठ नागरिकों को सरकार ने हर जगह छूट दे रखी है।

”मुझे तो लगता है, एमटीएनएल वालों ने बूढ़ों के लिए फोन की दरें आधी कर रखी हैं।

वरना पापाजी का क्या है।

हर आधे घंटे में वे बीस-पच्चीस मिनट से कम नहीं बतियाते।

जाने इतनी बातें फोन पर क्यों करते हैं।

किससे करते हैं?

जिससे करते हैं, वह भी फुरसत वाला ही होगा।

उस हिसाब से तो बिल मामूली ही समझो।”

“लो, सुनो अपने बाप के कसीदे –

हमें तो पड़ोस की रमणिका ने चार्टेड बस में बताया।

कल दोपहर की ही तो बात है।

नुक्कड़ वाली धोबन को चार उल्टियाँ क्या हो गईं –

पापाजी उसे रिक्शे में बैठाकर अस्पताल ले दौड़े। पता चला वहाँ जाकर – रतनिया पेट से है।

हमें ही नहीं पता। प्रपंचों में हम पड़ते ही कहाँ हैं।

मोहल्ले में चार तरह के लोग चार तरह की बातें बना रहे हैं।

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ये खन्ना, क्यूँ इतना फिक्रमंद हो उठा रतनिया को लेकर?

अब मैं किस-किस को जाकर सफाई दूँ कि, पापाजी पचासी पार कर रहे हैं?”

“पापाजी!

यह क्या तमाशा है?

दफ्तर जाने की मारा-मारी के बावजूद सुबह मैं पानी की बोतलें भरकर लाइन से फ्रिज में लगाकर जाती हूँ।

साँझ को मर-खप घर लौटते हैं दोनों तो –

घूँट भर ठंडा पानी पीने को नसीब नहीं होता।

हमसे तो मोहल्ले के जमादार, पोस्टमैन, ठेले वाले किस्मत वाले ठहरे –

उन्हें जब भी प्यास लगती है,

आप बोतलें खाली कर देते हैं।

आप समझते क्यों नहीं पापाजी।

परोपकार के वो जमाने लद गए।

घर के सामने जब लोग पानी के मटके रखवा दिए करते थे, गरमियों में।

प्याऊ बनवा दिया करते थे रास्तों पर।”

“नमकीन पिछले हफ्ते ही तो घर में आई थी, पापाजी!

हमने तो टूँगा ही नहीं।

इतनी जल्दी खत्म भी हो गया?

थके-हारे घर लौटकर एक पैग लेने की सोचो तो नमक चट कर स्कॉच के घूँट भरो।

जानते नहीं यहाँ से बाजार कितनी दूर है?

वैसे तो आप कहते रहते हैं,

बीकानेरी भुजिया आपके दाँतों से चबती नहीं।

फिर किनकी खातिरदारी में नमकीन की भरनियाँ उलीचते रहते हैं आप!”

“अपने कमरे की बिजली दिनभर क्यों जला कर रखते हैं पापाजी आप?

पिछले साल ही तो मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है आपका।

आपने ही कहा था।

आपरेशन ठीक-ठाक हो गया, संतुष्ट हैं आप।

अब आपको आँखों से ठीक से दिखाई देता है बल्कि,

साधारण रोशनी में भी आराम से पढ़ लेते हैं आप।

कल शाम चार्टर्ड से उतरकर गेट से जैसे ही दाखिल हुए घर में,

बरामदे की बत्ती को जलते हुए पाया।

जाने कब से जली छोड़ रखी होगी आपने। क्यों आन की। दिन तो बड़े होते हैं आजकल?

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पापाजी,

इस महँगाई में –

बिजली की फिजूलखर्ची कैसे बरदाश्त करें। बताइए?”

“घर में साग-सब्जी ले आने भर से घर का खर्च नहीं चलता पापाजी।

सैकड़ों खर्चे हैं।

किस-किस को गिनाएँ?

पेंशन तो आपकी अपनी दवा-दारू में खर्च हो जाती है।

बाकी सारा खर्च तो हम पर पड़ता है।

चलो माना।

पेंशन कम है।

तनख्वाह जो कम थी।

मगर तब क्या हुआ आपको पापाजी।

सिक्स्थ पे कमीशन का बढ़ा हुआ हिसाब-किताब हाथ आते ही, फौरन लपक लिए आप पटियाला।

बेटी की मुट्ठी गरम करने?

समझी,

स्वाभाविक है।

पैरवी की फीस भरनी जरूरी जो ठहरी!”

“यह क्या किया आपने पापाजी?

बैठक में मम्मीजी की तसवीर टाँग दी?

मम्मीजी की तसवीर कोई सैयद हैदर रजा की पेंटिंग है क्या?

कितनी भद्दी लग रही है दीवार!

सोचा था,

साठ-सत्तर हजार जोड़ लूँगी तो रजा की एक पेंटिंग खरीद कर लाकर यहाँ टाँग दूँगी।

न होगा तो उनकी किसी पेंटिंग का पोस्टर ही खरीद कर मढ़वा लूँगी। लग जाएँगे चार-चाँद बैठक की कलात्मकता में।

ईर्ष्या करेंगे अड़ोसी-पड़ोसी।

उनके घर की दीवार पर रजा की पेंटिंग सजी हुई है।

सच तो यह है पापाजी!”

”जोड़-गाँठ कर बंगला बनवा लेने भर से कोई बंगले वाला नहीं हो जाता।

बंगले में रहने के लिए बंगलेवालों जैसी औकात भी होनी चाहिए।

औकात तो वही है।

जहाँ बैठ कर चाय पी, कुर्सी के नीचे कप-प्लेट सरका दीं।

मक्खियाँ भिनकती हैं तो भिनकती रहें।

क्या फर्क पड़ता है।

फिर, सुधरने में क्या सुख

जो पसरने में मिलता है!”

“माना, संपत्ति कर में वरिष्ठ नागरिकों को भारी छूट मिलती है। तर्क सही है आपका पापाजी! सही सोचते हैं आप!

पैसे हमारे बचते हैं और हमें बचाने ही चाहिए। इफरात में नहीं कमाते हम लेकिन जो काम करने के बाद होना है, वह अगर मरने से पहले हो जाए और शांति से हो जाए, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?

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इकलौता वारिस हूँ आपका।

दोनों कमाते हैं।

आराम से भर लेंगे बढ़ा हुआ संपत्ति कर।

जितना खर्च मेरे नाम घर कराने में अभी आएगा, आपके न रहने पर उसी काम का चार गुना अधिक भरना होगा। शायद उससे भी ज्यादा।

बोलिए पापाजी,

कागजात कब तैयार करवाऊँ?

वकील कह रहा था – रजिस्ट्री के समय आपके पापाजी को मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होना पड़ेगा। उनसे उनकी मर्जी पूछी जाएगी।

वैसे मजिस्ट्रेट रजिस्ट्री के लिए घर भी आ सकते हैं लेकिन उनके घर आने की फीस साठ-सत्तर हजार से कम न होगी, इधर आपके हाथों में कंपन शुरू हो गया है पापाजी। पेंशन कार्यालय में पेंशन क्लर्क शिकायत करने लगे हैं, खन्ना साहब के हस्ताक्षर बदलने लगे हैं।

बाकी तो,

आप सोच लीजिए पापाजी।”

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तर्पण – Tarpan

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चित्रा मुदगाली के बारे में जानें

चित्रा मुद्गल (फोटो- @sahityaakademi)
चित्रा मुद्गल (फोटो- @sahityaakademi)

चित्रा मुद्गल एक भारतीय लेखिका हैं और आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रमुख साहित्यिक हस्तियों में से एक हैं। वह अपने उपन्यास अवान के लिए प्रतिष्ठित व्यास सम्मान प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। 2019 में उन्हें उनके उपन्यास पोस्ट बॉक्स नंबर 203, नालासोपारा के लिए भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार, साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया।

पूरा नामचित्रा मुद्गल
जन्म10 सितम्बर, 1943
जन्म भूमिचेन्नई, तमिलनाडु
कर्म भूमिभारत
कर्म-क्षेत्रकथा साहित्य
शिक्षाहिंदी साहित्य में एमए
मुख्य रचनाएँ‘आवां’, ‘गिलिगडु’, ‘एक ज़मीन अपनी’, ‘जीवक’, ‘मणिमेख’, ‘दूर के ढोल’, ‘माधवी कन्नगी’ आदि।
भाषाहिन्दी
पुरस्कार-उपाधिसाहित्य अकादमी पुरस्कार
‘उदयराज सिंह स्मृति पुरस्कार’ (2010)
‘व्यास सम्मान’ (2003)
प्रसिद्धिलेखिका
नागरिकताभारतीय
अन्य जानकारीचित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘आवां’ आठ भाषाओं में अनुदित हो चुका है तथा यह देश के 6 प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत है।
अद्यतन‎12:31, 11 सितम्बर 2021 (IST)
इन्हें भी देखेंकवि सूची, साहित्यकार सूची
चित्रा मुद्गल

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