श्रांत मन का एक कोना | मानोशी चटर्जी

श्रांत मन का एक कोना | मानोशी चटर्जी

श्रांत मन का एक कोना | मानोशी चटर्जी श्रांत मन का एक कोना | मानोशी चटर्जी श्रांत मन का एक कोनाशांत मधुवन-छाँव माँगे। सरल मन की देहरी परहुए पाहुन सजल सपने,प्रीति सुंदर रूप धरती,दोस्त-दुश्मन सभी अपने,भ्रमित है मन, झूठ-जग मेंसहज पथ के गाँव माँगे। कई मौसम, रंग देखेघटा, सावन, धूप, छाया,कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें,दुख-घनेरे, भोग, माया।क्लांत … Read more

तुम नहीं होते अगर | मानोशी चटर्जी

तुम नहीं होते अगर | मानोशी चटर्जी

तुम नहीं होते अगर | मानोशी चटर्जी तुम नहीं होते अगर | मानोशी चटर्जी तुम नहीं होते अगरजीवन विजन-सा द्वीप होता। मैं किरण भटकी हुई-सी थी तिमिर में,काँपती-सी एक पत्ती ज्यों शिशिर में,भोर का सूरज बने तुम, पथ दिखाया,ऊष्मा से भर नया जीवन सिखाया,तुम बिना जीवन निठुरमोती रहित इक सीप होता। चंद्रिका जैसे बनी है … Read more

क्या खोया क्या पाया… | मानोशी चटर्जी

क्या खोया क्या पाया... | मानोशी चटर्जी

क्या खोया क्या पाया… | मानोशी चटर्जी क्या खोया क्या पाया… | मानोशी चटर्जी अनगिन तारों मेंइक तारा ढूँढ़ रहा है,क्या खोया क्या पायाबैठा सोच रहा मन। छोटा-सा सुख मुट्ठी से गिरफिसल गया,खुशियों का दलहाथ हिलाता निकल गयाभागे गिरते-पड़ते पीछे,मगर हाथ में,आया जो सपना वो फिर सेबदल गया,सबसे अच्छा चुनने मेंउलझा ये जीवन।क्या खोया क्या … Read more

कुछ मिले काँटे | मानोशी चटर्जी

कुछ मिले काँटे | मानोशी चटर्जी

कुछ मिले काँटे | मानोशी चटर्जी कुछ मिले काँटे | मानोशी चटर्जी कुछ मिले काँटेमगर उपवन मिला,क्या यही कम हैकि यह जीवन मिला। घोर रातें अश्रु बनकर बह गईं,स्वप्न की अट्टालिकाएँ ढह गईं,खोजता बुनता बिखरते तंतु पर,प्राप्त निधियाँ अनदिखी ही रह गईं,भूल जाता मन कदाचित सत्य यह,आग से तप कर निखर कंचन मिला। यदि न … Read more

पतझड़ की पगलाई धूप | मानोशी चटर्जी

पतझड़ की पगलाई धूप | मानोशी चटर्जी

पतझड़ की पगलाई धूप | मानोशी चटर्जी पतझड़ की पगलाई धूप | मानोशी चटर्जी पतझड़ की पगलाई धूप। भोर भई जो आँखें मींचे,तकिए को सिरहाने खींचे,लोट गई इक बार पीठ परले लंबी जम्हाई धूपअनमन सी अलसाई धूप। पोंछ रात का बिखरा काजल,सूरज नीचे दबता आँचल,खींच अलग हो दबे पैर सेदेह-चुनर सरकाई धूप,यौवन ज्यों सुलगाई धूप। … Read more