रोटी-पानी | प्रेमशंकर शुक्ला | हिंदी कविता
रोटी-पानी | प्रेमशंकर शुक्ला | हिंदी कविता

रोटी-पानी की मुश्किलें
चाट गई हैं
जिनके चेहरे का नमक

जिनकी आँखों का गड्ढा
और गहरा हुआ है
और किनारा और स्याह

जिनका न बचपने की तरह
बचपना आया
न हुए वे युवा की तरह युवा

उनसे कैसे कहूँ
कि यह अपने गणतंत्र का
स्वर्ण जयंती वर्ष है?

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