रात्रि
रात्रि


मैं मींच कर आँखें
कि जैसे क्षितिज
      तुमको खोजता हूँ।
 


ओ हमारे साँस के सूर्य!
साँस की गंगा
      अनवरत बह रही है।
      तुम कहाँ डूबे हुए हो?
 

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