पिता की चिता जलाते हुए | दिनेश कुशवाह

पिता की चिता जलाते हुए | दिनेश कुशवाह

कुछ बातें अक्सर कहते थे पिता…

भादों की किसी विकट काली रात में 
जब छप्पन कोटि बरसते हों देव 
अपने निकट बहने वाली नदी को 
उसकी समग्र भयावहता में देखो 
और कल्पना करो कि 
यमुना को कैसे पार किया होगा वसुदेव ने 
एक नवजात बच्चे के साथ ! 
तुम्हें लेकर जीवन की वैतरणी को 
कुछ इसी तरह पार किया है मैंने

अघाए हुए और रिरिआते आदमी की 
हँसी में फर्क करना सीखो 
अभागा आदमी का बच्चा 
जन्मते ही रोना शुरू करता है 
जिंदगानी की कहानी उसी समय शुरू हो जाती है 
फटी धोती, टूटी झोपड़ी, डँसी देह और कुचली आत्मा ने 
गरीब को एक अदद अधम शरीर बना दिया 
पंचतत्व तो आज भी अमीरों की चाकरी में लगे हैं।

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इसलिए जनता को शास्त्र नहीं / कविता से शिक्षित करो 
साधुता को श्रम से जोड़ो / भिक्षा से मुक्त करो 
साधुता वहाँ बसती है / जहाँ जूता गाँठते हैं रैदास 
चादर बुनते हैं कबीर।

बतरस के तो रसिया थे पिता 
कोई नहीं मिलता तो / बैलों से ही बोलते-बतियाते 
इधर कुछ दिनों से उसी पिता को 
देख कर आश्चर्य होता था मुझे 
कि दुनिया में आदमी / कैसे रहता है इतना चुपचाप !

विश्वास नहीं होता कि बप्पा सपना हो गए

उन्हें देख कर लगता था कभी 
कि गाँव-जवार, खेत-खलिहान 
इसलिए जवान हैं कि पिता जवान हैं 
कुएँ का पानी सूख जाएगा 
पर पिता की जवानी नहीं खत्म होगी 
लेकिन औचक्क चले गए पिता…

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पिता के पास एक पुश्तैनी कोट था 
जब जंगल और मैदान जाड़े से काँपने लगते 
पिता उसे पहन कर आगी तापते थे 
गाँव से सटकर बहती सरयू के किनारे 
कभी आग के फूल की तरह खिले थे पिता 
और आज वहीं आग की नदी में नहा रहे थे।

सबसे पहले पिता के दोनों पाँव 
जलते हुए झूल गए / जैसे उतान लेटे हुए पिता ने 
टाँगें बटोर ली हों और कह रहे हों 
अब नहीं चल पाऊँगा तुम्हारे साथ।

लपटों के बीच लाल अंगार पिता 
और अस्त होते सूर्य का रंग / एक जैसा दिख रहा था 
बस नहीं दिख रहीं थीं तो उनकी आँखें 
जिनके तनिक लाल होते ही 
हम भाई-बहनों की कँपकँपी छूट जाती थी

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पचास पार करते ही पिता की वही आँखें 
हर भावुक प्रसंग पर डबडबा जाती थीं,

चिरायंध गंध में सना / चिट-चिट का चरचराता शोर 
मन में मचे कोहराम में डूब गया था।

पिता ने जीवन भर चलाया था मन भर का हथौड़ा 
लोहे को देते रहे तरह-तरह की शक्ल 
पर अब बीड़ी के जले ठूँठ ही उनकी याद दिलाएँगे 
कि धौंकनी-सी थी उनकी छाती / थाली में रखा चुटकी भर नमक 
और एक हरी मिर्च थी उनकी आँखें।

भुलाए नहीं भूलेंगे उनके जीवन के दुख 
जलते रहेंगे मेरे भीतर दीए की टेम की तरह 
भर-भर आएगा मेरा मन जैसे 
नाभि में अनायास भरती है कपास 
जब भी सूखेंगे मेरे होंठ 
पिता के पपड़ाए खेत याद आएँगे।