मायकल लोबो | गोविंद मिश्र

मायकल लोबो | गोविंद मिश्र – Michael Lobo

मायकल लोबो | गोविंद मिश्र

मायकल लोबो तो वही था-टुटरूँ टूँ, गोवा कि पैंट-कमीज-कोट में कोई बाँस का एक पतला टुकड़ा गलती से डाल गया और डालकर भूल गया। रंग धुर काला, सिगरेट पी-पीकर और भी काला। काले के ऊपर पीलेपन की गोट। दाँत … ऍंधेरे में चमकती कोई सफेद लहर नहीं, बल्कि ढहती हुई इमारत की जहाँ-तहाँ से उखड़ती ईटें। हाथ-पैर लुंजपुंज। दाहिने हाथ की दो उँगलियाँ सिगरेट को बराबर थामें, हल्के काँपती हुई।

लेकिन क्या चुस्ती और आकर्षण था लोबो में। उन दिनों वह अपने को हर क्षण हरकत में पाता था … जबरदस्त हरकत में। समयकैसे भागाजा रहा है, और कहाँ-यह सोचने की कभी जरूरत ही नहीं हुई, क्योंकि वह खुद दुगनी रफ्तार से भागता होता। दिन में बारह बजे तक कचहरी में वकालत, उसके बाद या तो शराब की जुगाड़ में दौड़ते-फिरते रहे हैं या फिर शराब की महफिलें गरम हो रही हैं। घर में बीवी-बच्चे अपनी जानें। लोबो का काम है सिर्फ उनके लिए रुपए मुहैया कर देना। बरखुरदार शहर के पहुँचे हुए वकील के बेटे थे, खुद वकीलबने तो मौक्किल-मुकदमे पहले से ही मौजूद। कुछ दिनों में सरकारी वकील हो गए तो और भी घर-खर्च लायक आमदनी पक्की हो गई। दूसरे मुकदमों से जो पीट-पाट लिया वह शराब के लिए था।

दोपहर से ही अव्बाजी चालू हो जाती और चलती रहती बरसात की झिरी की तरह। अंतराल सिर्फ इस महफिल से उठकर दूसरी तक जाने का, उसे जमाने का। भीतर-बाहर खलल-बलल करती होती शराब। शाम तक पेट में बुदुर-बुदुर होने लगता, जैसे चूल्हे पर अदहन चढ़ा हो। कभी-कभी तो पेट की बाकायदे धज्जियाँ उड़ी हुई होतीं। ऐसा लगता जैसे भीतर लत्ताों के हजारों टुकड़े उड़ रहे हैं, उड़े जा रहे हैं … लेकिन जाम सामने बराबर हाजिर … जब तक कि पलक के ऊपर पहाड़ न आकर बैठ जाए। आधी रात तक घर पहुँच गए तो पहुाँच गए, वरना जहाँ तक पहुँचे, पहुँचे। कभी किसी की कार में ही लुढ़क गए और रातकार के साथ गैराज में कट गई। कभी सुबह-सुबह ढूँढ़ मची, दोस्तों से पूछा-पाछी हुई तो कोई दोस्त ही ताज्जुब करने लगा-‘एँ, घर नहीं पहुँचा, कहकर तो गया था कि घर ही जाता हूँ। अच्छा ठहरिए, बरामदे में कोई पड़ा है, शायद वही हो।’ और बाहर बरामदे या सीढ़ियों पर सोती हुई शख्सियत हजरत मायकल लोबो की ही निकलती। बाद में कितने दिनों तक ऐसी कोई बात महफिलों में मजाक बन नाचती। वैसे ज्यादातर लोबो घर पहुँच ही जाते, क्योंकि वह जिम्मेदारी उनकी नहीं, किसी और की होती थी। किसी-न-किसी की नजर पड़ ही जाती थी और छोटा कस्बा होने की वजह से सभी मायकल लोबो को पहचानते थे।

लोबो से भी ज्यादा तेज भागती थी उनकी जुबान, कतन्नी की तरह कच्च-कच्च करती चली जाती। वह कहता भी था- लो … बो, बो … लो एक ही बात है, हर्फ ही तो इधर से उधर हो गया और साथ मिलाकर पढ़िए तो भी वही है-लोबो बोलो, अल्लाताला का हुक्म है कि बोलो। अरे वो दारासिंह है तो यहाँ भी दारूसिंह हैं। जामलकर …? वह यहाँ कहाँ होगा भाई, जामबूलकर है तो जाम को ही ढूँढ़ रहा होगा। वह होगा देवदास … हम तो भाई सेवादास हैं … लेव जाम, चढ़ाओ जाम। लोबो की हाजिरजवाबी और मजाक के अंदाज ऐसे थे कि महफिलों में सब उनके मोहताज होते। हर महफिल का केन्द्रबिंदु वही था-वह बोलता और सब सुनते। शराब और उसकी बातें एक सिक्के के दो पहलू थे … उन्हीं से महफिलें गरम होती थीं। एक-से-एक चटक और शानदार मजाक लोबो के दिमाग में दौड़े चले आते। एक चौराहे पर शहर की एक मशहूर हस्ती की प्रतिमा खड़ी थी। वे जब जीवित थे तो समाज-सेवी होने के अलावा उनका एक व्यक्तिगत किस्सा भी शहर में खासा मशहूर था। उनकी एक रखैल थी जो उन्हें भी छोड़ किसी औरके साथ भाग गई थी। एक रात शराब के बाद लोबो एंड कंपनी भटकती हुई इस चौराहे पर आ निकली। मूर्ति के पास ही ट्रेफिक का एक बोर्ड था-कीप लैफ्ट। लोबो अपने साथियों को बुला-बुलाकर उसे पढ़वा रहे थे और भुनभुनाते जाते-‘पब्लिसिटी की हद है।’ दोस्त लोग उस पर भी न समझे तो उन्होंने तफसील दी-‘यानि कि मूर्ति के साथ-साथ यह भी मशहूर कर रहे हैं कि उनकी जो ‘कीप’ थी वह भाग गई … यानि कि हद है।’

कभी-कभी मजाक पैदा करने की लत लोबो से क्या का क्या उगलवा जाती। उस शाम वह अपने पिता को दफनाकर सीधा महफिल में पहुँचा था। पिता के ही एक बुजुर्गवार साथी ने देखा तो औपचारिकतावश दूर से ही पूछा-‘मायकल, तुम्हारी माँ कैसी है।’ ‘आलराइट सर! स्टिल ऐ विडो सर!’ कहकर लोबो अपने पैने अंदाज में खुश-खुश आगे बढ़ गया, लेकिन जब सभी दोस्त एकाएक चुप … तो उसे भी कुछ कोंचा। जो वह कह गया, उससे यह ध्वनि निकल गई थी कि माँ आप जैसे विधुर लोगों के लिए उपलब्ध है। लोबो को हल्की ग्लानि हुई कि अभी-अभी पिता को कब्र में उतारकर आया और फौरन शराब, साथही माँ के साथ ऐसा क्रूर मजाक। लेकिन यही तो था मायकल लोबो।

शराब के बिना एक दिन भी रहना मुश्किल और शराब और जुबान तो फिर साथ थिरकती थीं। कोई लगाम नहीं। हमदर्द उसे अक्सर समझाते। कुछ दोस्तों ने उसे टालना भी शुरू किया। कुछ ने शराब देना बंद कर दिया।गिरजे के पादरी लोग कहते-‘मायकल, अब भी समय है, आ जाओ, हम शराब छुड़वाने में तुम्हारी मदद करेंगे।’ लेकिन लोबो तो सोते हुए भी जैसे घोड़े पर सवार रहता था, कहता-‘किनारे बैठ तमाशा देखने वाले क्या जानें दरिया में बहना क्या है, क्याहोताहै लहरों के थपेड़ों में डूबना-उतराना। अरे, एक बार लगाम छोड़कर तो देखो हुजूर। पर लग जाएँगे। उड़ने का लुत्फ तुम क्याजानो, हर वक्त अपनी सेहत की हिफाजत करते बैठे रहते हो और यह शरीर भी आखिर दगा दे ही जाता है।’ लोबो को थोड़ा-बहुत गड़ती थीं तो बीवी की वे झुकी हुई निगाहें जिनके बोझ को उठाए वहहर उस व्यक्ति को धन्यवाद देती जो कहीं भी पड़े उसके पतिको देर रात उठाकर घर लाया होता। लोबो ने कभी उन निगाहों को देखा नहीं, इस हालत में ही नहीं होता था … फिरभी वे उसे बराबर घूरती होतीं, उसकी पीठ में छेद करती होतीं। लोबो तेज बोल-बोलकर बीवी की उन नजरों को परे कर देता। धीरे-धीरे उसके लिए वह एक खेल हो गया था-थोड़ी देर को शीशे में कुछ उतराएगा, लोबो एक हाथ मारकर उसे पोंछ डालेगा।

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बीवी भी आखिर तंग आ गई। कहाँ तक आधी रात को रोज किसी-न-किसी का सामना करती। उसने मायकल को उठाकर लाने वाले को दबी जुबान से फटकारना शुरू कर दिया-”भाई साहब! इन्हें क्यों उठा लाए आप, इनकी जगह वहीं है जहाँ वे पड़े थे।” फिर यह हुआ कि कोई खटखटाता रहता, यह दरवाजा ही न खोलती। लाने वाला मायकल को सीढ़ियों पर सुलाकर चला जाता। इस बीच बेटी रूथ जाग गई तो वह पापा को भीतर करती, वरना सीढ़ियों पर ही सुबह। ऐसे ही चल रहा था … बीच-बीच में लोबो को सुधरने की कोशिशें भी, बीबी को दिए वायदे कि बस आज से बंद … लेकिन शामको फिर उसी हालत में घर पहुँचना। सब कुछ इतनी बार हो चुका था कि किसी भी घटना में कुछ नया नहीं रहा था। सबने, मायकल लोबो ने खुद भी सुधरने की आशा छोड़ दी थी। ऐसे ही जीना था, जब तक जीना था … और जीना भी एक-एक दिन नहीं, एक दिन में एक-एक महीना घट रहा था … कि एक रोज वैसे ही घर की सीढ़ियों पर लुढ़के हुए पता नहीं क्या हुआ कि लोबो में तमाम धुंध के बीच अपने इर्द-गिर्द की थोड़ी पहचान जगी। दिमाग सोया था-यह एकदम नहीं मालूम कि कौन यहाँ लाया, कैसे लाया, वह रात कहाँ था, शाम कहाँ से शुरू हुई … लेकिन उसने देखाकि रूथ उसे सीढ़ियों पर से उठा रही थी …

”पापा, मैं कब तक आपको इस तरह उठाती रहूँगी?”

ये शब्द … स्वर में कैसी वेदना … जहाँ तकलीफ का बाँध चटकने को आ जाता है। रूथ बोल चुकी पर वे शब्द फिर भी बोलते रहे। उनके पीछे बड़ी ही रहस्यमय गूँज थी … जैसे दूर किसी गिरजे के घंटों की आवाज संगीत में छनती हुई चली आ रही हो। अनूगूँज सिर्फ आवाज की ही नहीं, अर्थ की भी … अर्थ जो रोशनी बन आसपास फैल रहा था, फैलकर बज रहा था। आवाज, अर्थ और रोशन के फर्क खत्म हो गए थे। घर, सीढ़ियाँ, बरामदा, छप्पर, बेटी और वह … इनकी अलग-अलग पहचानें नदारद थीं। सिर्फ रोशनी थी-रोशनी में उतराते गूँज के टुकड़े, वहीं कहीं पर कहीं नहीं ….

कैसा अद्भुत था वह प्रकाश … एक छोटी-सी जागना में ही। जागना जहाँ बड़ी होती होगी, वहाँ? ज्यों-ज्यों वह रोशनी उसकी पहुच से बाहर होती गई, लोबो का मन ग्लानि से भरता गया। हीनताबोध जीवन में पहली बार उभरा और वह भी इतना कि लोबो उसके बोझ से दबा जा रहा था। रूथ ने अंदर ले जाकर लिटा दिया पर लोबो को अब नींद कहाँ। कोई खामोश कराह उस पर गहरी खरोंच खींचती इधर से उधर चली जाती … एक के बाद दूसरी, हर जगह। गिरे हुए बाप को देखकर कैसी तकलीफ उपजती होगी बेटी में। शर्म का कितना बोझ ढोती होगी रूथ की नन्ही-सी जान! अपने परिचितों और सहेलियों के बीच उसका सिर झुका ही रहता होगा… उस चीज को लेकर जिसके लिए वह दूर-दूर तक जिम्मेदार नहीं थी …

मुश्किल-मुश्किल से पौ फटी उस रोज। लोबो सीधा पादरी के पास गया और बोला-”फादर, मैं आज इसी वक्त से शराब छोड़ता हूँ।” न धीरे-धीरे छोड़ने की बात, न किसी दवा, ड्रग या व्यक्ति का सहारा ही चाहिए। लोबो को, पता नहीं, कैसे बहुत भरोसा थाइस बार। एक हफ्ता बुरा बीता। लगता जैसे जिस्म का एक-एक हिस्सा अलग होकर हवा में गिरता जा रहा है और लोबो देख रहा है-यह कान गया, वह दाहिने हाथ की उँगली गई। कभी पूरे शरीर में खून की जगह हवा ही हवा महसूस होती। कभी जाने कहाँ से चीटियों का कोई बड़ा काफिला उठ खड़ा होता, सारे शरीर में एक-साथ रेंगने लगता। लोबो एक खौलती चिनचिनाहट में आ गिरता। कभी शराब के एक घूँट के लिए वह तलब उठती जैसे पानी के अंदर एक अदद साँस के लिए उठती है … बस एक घूँट! ऐसे में लोबो अपना हाथ कसकर दबाता, उस रोशनी को याद करने लग जाता जो उस रात सीढ़ियों पर उतरी थी, लोबो के लिए, उसे उठाने।

छह महीने हुए, लोबो ने शराब को हाथ नहीं लगाया। परिवार के लिए राहत हुई कि किसी को अब लोबो के लिए आधी रात उठना नहीं पड़ता … बाकी पहले जैसा ही है। लोबो ने सोचा था कि शराब छोड़ते ही वह पिता जैसा प्रतिष्ठित व्यक्ति हो जाएगा … लेकिन कुछ नहीं हुआ। बड़े आदमियों के लिए वहअब भी शराबी-कबाबी है। जो साथी थे, उनसे शराब हीजोड़ती थी। शराब गई तो वे भी गए। निम्न वर्ग के लिए लोबो कौतूहल की चीज है-‘अरे! वही है? छोड़ दी? गप्प मारता है।’ वे लोग लोबो से सटने की कोशिश करते हैं। कभी शराबी खुद आता है, कभी उसकी माँ, कभी बीवी-कैसे छूटी भैया, क्या हमारा रमन्ना नहीं छोड़ सकता? लोबो इन लोगों को झिड़ककर भगा देता है, उन्हें कभी मुँह नहीं लगाया … जब पीता था तब भी नहीं। गंदे लोग हैं, मुँह खुला नहीं कि ऐसा भभका छूटता है जैसे पेट में ही भट्टी लगी हो। एक वक्त था जब वह जलसों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन का काम बखूबी करता था, अपने खास मजाकिया अंदाज में उन्हें जानदार बना देता। दो-तीन पैग चढ़ाए और मंच पर कूद गया … बला का आत्मविश्वास। शाराब छोड़ने के बाद एक कार्यक्रम हाथ में लिया तो मंच परआते ही हाथ-पैर काँपने लगे, गला खुश्क … लगा जैसे सामने बैठा जन-समुदाय पहले से ही खी-खी कर रहा है-वही है जो सड़क पर कहीं भी लुढ़का दिखता था, सींकिया! लोबो की घिग्घी बँध गई, एक बोल मुँह से न निकला। उसे हटाकर किसी और को खड़ा करना पड़ा था।

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पहले लोबो किसी की परवाह नहीं करता था, अब किसी की छोटी-से-छोटी बात भी गड़ जाती है। पहले हमेशा उसके चारों तरफ भीड़-ही-भीड़ थी, अब लोबो अकेला हो गया है।

मायकल! पूरे सात साल तुम सोये रहे। तुम्हें पता ही न चला कि इसबीच कैसे पिता की जीम-जमाई वकालत टुकड़ा-टुकड़ा ढलती चली जा रही है। ईश्वर ने तुम्हें सब कुछ दिया था-तंदुरुस्ती, अकल, शिक्षा, बोलने की कला और पिता की उम्दा विरासत, लेकिन तुम सो गए, सात साल सोते रहे। तुममें अब कोई वजन नहीं रहा। बाँस में लिपटे फटे कपड़े की तरह तुम अब सिर्फ हवा में फटर-फटर होते रहोगे। लोबो तो गुजर चुका, अब तो उसका खोल बचा है जो इधर से उधर होता रहेगा …

लोबो के दफ्तरमें मौक्किलों वाली बेंच पर वह बैठी हुई थी। मैले-कुचले कपड़ों में लिपटी एक दुबली-पतली काया। चेहरा-मोहरा साधारण। कुल मिलाकर इतनी मामूली कि नजर कहीं नहीं ठहरती थी। देखने के फौरनबाद ही भूल जाने वाली चीज।

दफ्तर में और कोई नहीं था। लोबो की नजर किताब से उठी कि वह दिखाई दी। कब आई, कैसे कि आवाज ही न हुई, कितनी देर से यों चुपचाप बैठी हुई है, क्या कोई मुकदमा लाई है?

लोबो के मुखातिब होते ही औरत ने मुँह सड़क की तरफ कर लिया, पीठ लोबो की ओर। फिर दोनों हाथों से कपड़े ऊपर खींच अपनी पीठ खोल दी। पीठ पर घाव ही घाव छिटके हुए थे, नए-पुराने, पके-सड़े, पुरे-अधपुरे … सभी तरह के घाव। पुराने घावों पर जहाँ-तहाँ नई ठाकरें … जिससे सूखने की बजाय वे और भिनककर रह गए थे। पूरी पीठ दागों से ऐसे पटी पड़ी थी जैसे किसी भटकी हुई चिट्ठी पर एक ही जगह के आसपास दस तरह की मोहरें मारी गई हों। लोबो कुछ पूछता उसके पहले ही उधर से उसने बताना शुरू कर दिया-

”मरद रोज शराब पीकर घर पहुँचता है, मुहल्ले में घुसते ही झगड़ा-फसाद करता है, वह बीच-बचाव कर किसी तरह घर लाती है तो फिर घर में उसे मारता है या बच्चों को। कभी-कभी तो एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में सभी मारे जाते हैं। मारते समय मरद को ठौर-कुठौर का भी ध्यान नहीं रहता। बगैर गालियाँ वह बात ही नहीं करता। रोज का यही हाल है, एक दिन का भी नागा नहीं …”

लोबो ने बीच में टोकने की कोशिश की, कल के मुकदमे की तैयारी में व्यस्त होने की बात उठाई लेकिन औरत वैसे ही पीठ इस तरह किए हुए अपना दु:ख गाती चली गई। अब वह छोटे-छोटे किस्सों पर आ गई थी-उस रोज यह हुआ, अगले रोज यह … छोटे-छोटे फिजूल के ब्योरों के साथ बीच-बीच में सिसकती भी थी … पर वहस्वर भी करीब-करीब बोलने जैसा हो। सिसकने में आवाज ऊपर-नीचे कतई नहीं होती थी। एक-सी चलती उस आवाजमें अजीब ठंडापन था … जैसे सहते-सहते वह उस बिंदु पर आ पहुँची हो जहाँ उतार-चढ़ाव के अहसास ही खत्म हो गए हों, दु:ख एक-पर-एक जमकर रह गए हों।

वह एकरस ठंडी आवाज लोबो को मूर्छा में लिए जा रही थी। पता नहींकिस किस्से के बीच यह एकाएक फूट पड़ा-

”ठीक है … ठीक है … तो मैं क्या करूँ? मुझे इस सबसे क्या मतलब? आप तो इस तफसील से सुनाए जा रही हैं जैसे गुनहगार मैं होऊँ, जैसे मैं ही आपको पीटता होऊँ, जैसे आपका पति अगर पीटता है तो इसका जिम्मेदार मैं हूँ। जाइए, अपने मुखिया से कहिए, मुझसे क्या मतलब? आपका आदमी जब इतना खराब है तो उसे छोड़ क्यों नहीं देतीं? दायर करिए मुकदमा, मैं लड़ता हूँ। मैं जानता हूँ-वह आप न करेंगी। हिंन्दुस्तानी औरत रोयेगी-गायेगी खूब, मगर अलग होने की बात न करेगी …”

औरत पलटी, एक नजर लोबो पर डाली-वैसी ही ठंडी नजर, जैसी आवाज। फिर पीठ ढकी, आँखों के हिल्गे आँसू पोंछे और बगैर कुछ कहे बाहर निकल गई।

औरत तो चली गई पर उसकी पीठ पर उछले दाग पीछे छूट गए। लोबो की बीवी की व ेनिगाहें,जब वह देर रात लोबो को लाने वालों को धन्यवाद देती होतीं-‘भाईसाहब …’ वे नजरें जिन्हें लोबो ने सीधे कभी नहीं देखा था, पर जो उसकी पीठ में बराबर छेद करती होतीं… वे जैसे फिर लौट आई थीं, उस औरत की पीठ पर उछले घावों में दुगनी-चौगनी होकर फैली हुई थीं।

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लोबो उलझकर रह गया। वह नंगी पीठऔर वे उछले घाव सामने बने ही रहते। जितना वह परे करता, उतना ही ये और सामने झूलते। सवाल-पर-सवाल चले आते-वह औरत कौन थी, कुछ माँगा तो नहीं पर क्या आस लेकर आई थी? उसे इस तरह दुतकारकर नहीं भगाना था। अपना दु:ख क्या इतना बड़ा होता है कि किसी और के दु:ख दिखाई ही न दें? क्या इस औरत को ढूँढ़ा जा सकता है? वह कहीं दिखाई दे जाए तो पहचाना भी तो नहीं जा सकता। पीठ खुली हो तो वह एकदम पहचान लेगा। लोबो के सामने अब भी एक-एक घाव था-कौन, कैसा, पीठ पर किस जगह। अक्सर उन घावों सेबहुत ही महीन धागे उठकर लोबो की आँखों तक तन आते। लोबो पर एक रहस्यमयी तंद्रा मँडराने लगती … बैठते-उठते, चलते-फिरते, काम करते हुए भी। एक धुंध-सी चारों ओर घिर आती जिसमें वेघाव अस्फुट स्वरों में कुछ बोलते हुए तैरते होते। आसपास कुछ वैसी आवाज घूमती होती जो रूथ की उस दिन थी-‘पापा! मैं कब तक इस तरह आपको उठाती रहूँगी-कब तक …।’ एक दिन तो सोने-जागने के बीच लोबो को ऐसा लगा जैसे घावों के वे कटे-छटे स्वर अलग-थलग पड़े अक्षर हो गए। फिर सहसा एक इबारत में सज गए जो उस पीठ पर साफ-साफ लिखी हुई थी-‘और ईश्वर ने कहा कि तू अब इधर आ जो यह कहता है कि तेरी जिंदगी गई। उधर देख कि दूसरों की अब भी बच सकती है। मायकल! तेरा नुकसान इसी तरह भर सकता है कि उसे तू दूसरे की जिंदगी में होने दे। जिनसे तू भागता है, उन्हीं के बीच जा …

”डिं्क एंड शिंक-पियो और सिकुड़ते जाओ। डिं्रक और थिंक-या पी लो या फिर सोच ही लो …”

मायकल लोबो की जुबान थिरक रही है, उसी अंदाज में जैसे कभी शराब की महफिलों में थिरकती थी। यह चर्च का एक हिस्सा है … पर मुख्य इमारत से दूर, एक किनारे पर, एक उपेक्षित पड़ा कमरा जो लोबो को हफ्ते में एक दिन एक घंटे के लिए इस्तेमाल को मिल जाता है। न यहाँ प्रार्थना-घर जैसे सजावट है और न ही वहाँ जैसी गौरवमयी औपचारिकताएँ। उल्टे बेतकल्लुफी … यहाँ तक कि फूहड़पन है। हर शुक्रवार को यहाँ कोई भी आ सकता है और अपने बारे में कुछ भी कह सकता है। लोग शराब की अपनी कमजोरी से बात शुरू करते हैं-छोड़ने की कोशिशें, कोशिशों की असफलताएँ, पीने की विवशताएँ … और सरकते-सरकते अपनी दीगर कमजोरियों पर भी आ जाते हैं। शुरुआत लोबो ने खुद से की थी। अपनी कमजोरियाँ सबके सामने खोलकर रख दो तो वे ही तुम्हारी शक्ति बन जाती है, दो कमजोर लोग इस तरह आपस में एक-दूसरे की शक्ति बन सकते हैं। सबकेबोलने के बाद लोबो सभी बातों को समेटकर सारांश प्रस्तुत करता है। बीस-पच्चीस आदमी-औरतें आते हैं, ज्यादातर मजदूर भाई और उनके परिवार के लोग। लोबो एक-एक के घर के बारे में, उनकी समस्याओं के बारे में जानता है, वक्त जरूरत उनमें से किसी के भी घर पहुँच जाता है। वकालत खर्च कमाने-भरके लिए, बाकी लोबो पूरी तरह से इन्हीं लोगों में डूबा हुआ है …

”मैं पूरे सात साल सोया रहा। जागा तो बाहर जिंदगी कहाँ की कहाँ पहुँच चुकी थी। मैं उन सात सालों को फिर वापस नहीं ला सकता। क्यातुम भी मेरी तरह सोते रहना चाहोगे ….?”

लोबो की नजरें पुराने-नए चेहरों की भीड़ में किसी को खोजा करती है … वह जिसे लोबो खुद नहीं जानता, पहचान भी नहीं पाएगा। वह जो आई थी और झिड़की खाकर चुपचाप लौट गई। लोबो को चलते रहना है … जब तक उस पीठ पर उछले घाव पुर नहीं जाते …

तुममें से कोई मेरे बराबर क्या बरबाद होगा। यह मेरे बस का कभी नहीं था कि मैं शराब छोड़ सकता। यह तुम्हारे हाथ में भी नहीं है। इसलिए ओ मेरे भाइयो, मैं तुमसे कहता हूँ कि शराब छोड़ने की चिंता छोड़ दो। चिंता यह करो कि ईश्वर से दूर क्यों हो। वह एक बार तुम्हें पास बुला ले …”

एक-से-एक बातें, रस से सराबोर … पता नहीं भीतर कहाँ उगती हैं और कैसे बाहर झर-झर करती निकलती चली आती है, जैसे हवा के हल्के झोक से ही हरसिंगार के फूल बरसते चले आ रहे हों। सब सुन रहे हैं पर तुम कहाँ हो … वह जो मेरी नादानी से लौट गए, हर बार जब आदमी को मारता है तो तुम इस तरह झेलते हो प्रभु? क्या इसीलिए तुम वहाँ हो जहाँ दु:ख है, दर्द है, कष्ट है …?

लोबो के मुँह से डेविड की प्रार्थना के बोल जलती मोमबत्ताी से मोम बूँदों की तरह गिर रहे हैं … टप … टप …

”प्रभु! अपने तरीके मुझे जनाओ।

अपने रास्ते मुझे दिखाओ

अपने सत्य में मुझे ले चलो, मुझे सिखाओ

क्योंकि तुम मेरी मुक्ति के देवता हो

सारे दिन मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहता हूँ …।”

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मायकल लोबो – Michael Lobo

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