जींस वाली लड़की | ज़ेब अख्तर

जींस वाली लड़की | ज़ेब अख्तर – Jeans Vali Ladaki

जींस वाली लड़की | ज़ेब अख्तर

सामने से एक तेज बाइक गुजरी और सड़क पर के गड्ढे का ढेर सारा कचरा कल्लन खाला खाला को नहला गया। कल्लन खाला ने उठते हुए फुफकारा, नाश हो इन शैतानपीटो का… फटफटिया देखावत फिरे हैं… और चलावे नहीं आवत तो माँ-बाप खरीद के काहे दे दिहिन है इन बंदरवन के हाथ में… अब कहाँ से लावे फिर से नहाने का पानी… हरामी सब…

मोटरसाइकिल वालों को कोसते-कोसते कल्लन खाला हाँफने लगी तो दोबारा वहीं बैठ गई। वह अभी-अभी आकर सहन पर बैठी थी। सहन क्या था… दो कमरों के बाद बची हुई थोड़ी-सी जमीन। जो बमुश्किल दो-डेढ़ फिट चौड़ी होगी। लंबाई कमरों जैसी ही। उस पर किसी तरह दो बाँस खड़ा कर टीन की बाड़ डाल दी गई थी। ताकि बहू-बेटियों की लाज बची रहे। क्योंकि इसके बाद सड़क शुरू हो जाती थी। और सड़क से पहले मोटी-सी नाली। जिसे म्यूनिसपैलिटी वाले जितना साफ करते, वह उतनी ही तेजी से बदबू फैलाती।

बहरहाल, बिजली कटने पर यह सहन जन्नत की तरह महसूस होती थी। यहाँ से आसमान देखा जा सकता था। खुली हवा में साँस ली जा सकती थी। और मोहल्ले भर की आती-जाती औरतों से खैर-खबर पूछी जा सकती थी। जहाँ तक नजर जा सके, नजर रखी जा सकती थी।

लेकिन अब यह सहन भी बेपरदा हो गया था। कल रात की तेज बारिश इसकी बाड़ उड़ा ले गई थी। कल्लन खाला अपने-आप से बड़बड़ाई, आने दे इस बार सादिक को। पिछले साल से कह रही हूँ कि यहाँ दो ईटों की एक चहारदीवारी खड़ी कर दे। कैसी बेपरदगी होती है। घर में नई नवेली दुल्हन है। उसका फूल सा बेटा हामिद है। हालाँकि तसमीना को इस घर में ब्याह कर आए तीन साल हो चुके हैं। लेकिन कल्लन खाला के लिए अब तक वह नई ही है। वजह है सादिक उनका इकलौता बेटा है। सारा प्यार उमड़ता है, सादिक पर। उसके बेटे पर… और उसकी दुल्हन पर भी। बड़ी मुश्किल से मनाया था उसने सादिक को इस शादी के लिए। वरना सादिक तो डाल-डाल उड़ने वाला परिंदा था। उसका काम ही ऐसा था। ड्राइवरी की नौकरी थी। जंगल से लकड़ियाँ लाकर शहर के लकड़ी मिलों में देता था।

सादिक महीने-बीस दिन में सूरत दिखा जाया करता था। दो-एक दिन के लिए। कल्लन खाला घर में अकेली रहती थी। सादिक के अब्बा के बाद यह अकेलापन और बढ़ गया था। दुआ करती। मन्नतें माँगती कि किसी तरह सादिक के सर सेहरा बँधे। सूना घर फिर से आबाद हो। दूर की बहन कुलसुम तब आई थी, सादिक के लिए तसनीमा का रिश्ता लेकर। कल्लन खाला बाग-बाग हो गई थी। तसनीमा थी ही ऐसी। न सूरत में कोई कमी न सीरत में कोई खोट। ऊँचा कद। गोरा रंग। गुरबत के साए में पली। मगर बोली में नफासत। स्कूल का तो पता नहीं मगर शामपुरा के मदरसे में चार बार कलाम पाक खत्म कर चुकी थी। शगुन लेकर आए थे तसनीमा के अब्बा तो बड़े गर्व से कहा था, अपनी लंबी सफेद दाढिय़ों को उँगली से कंघी करते हुए, अठारह की हो गई है, तसनीमा, मगर क्या मजाल की आज तक कभी सिनेमा हाल का रस्ता तक देखा हो। कभी जरूरी काम से निकली भी तो बुरके के बिना नहीं। दीन की पाबंद इतनी कि खुद वो नहीं देख पाते तसनीमा का चेहरा हफ्तों।

उसी तसनीमा का पैगाम आया था सादिक के लिए। दुल्हन बन कर जब आई तो देखनेवालों का ताँता दो-तीन दिनों तक जारी रहा। सभी ने कल्लन खाला को बधाई दी। कुछ ने इतनी नेक और खूबसूरत दुल्हन मिलने पर उसकी किस्मत पर रश्क भी किया। मोहल्ले की औरतें आती। घूँघट उठाकर चाँद से चेहरे का दीदार करती। नेग देती। और इधर कल्लन खाला का दिल धड़कता रहता। कोई कुछ जादू-टोटका न कर दे। बलइयाँ लेती। और दुआएँ खैर पढ़ती। आसमान की ओर देख कर कल्लन के खालू से कहती, देख लो वहीं से… लाखों में एक बहू लाई हूँ। दुआ दो कि घर की खुशियाँ सलामत रहे। मुझे बस एक पोता चाहिए… और मन न माने तो आ जाया करना तुम भी… लेकिन हाथ न लगाने दूँगी पोते को …दूर से चाहे जितना देख लो…

और देखते-देखते घर सचमुच खुशियों से भर गया। गाहे-ब-गाहे घर आकर दूसरे दिन ही भागने वाला सादिक अब आता तो हफ्तों रुकता। तसनीमा ने उसे मालामाल कर दिया था। सलीके से उठने बैठने लगा था सादिक। रोज नहाता। बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी की जगह अब पानों से भरे गाल चमकते रहते। जुम्मे के दिन घर में होता तो नमाज भी पढ़ने चला जाया करता। नहीं तो तसनीमा घर में घुसने ही न देती।

अब कभी कल्लन खाला आसमान की तरफ देखती तो आँखों में आँसू भर आते। मगर इन्हें रोकना खूब जानती थी कल्लन खाला। वो कहते हैं न कि मरने वाले के लिए आँसू न बहाओ। यह खुदा को नापसंद है। लिखा है कि एक-एक आँसू एक-एक दरिया बन जाता है। जिसे मरने वाले को पार करना पड़ता है। बहिश्त तक पहुँचने के लिए। ऊपर से आँसू आदमी को कमजोर बनाते हैं सो अलग। कल्लन के अब्बा के इंतकाल को सात-आठ साल से ज्यादा हो चुके थे। लेकिन आज तक किसी ने कल्लन खाला की आँखों को नम होते नहीं देखा था। उनकी हिम्मत और सब्र की मिसाल देते थे सभी।

तसनीमा की गोद भरी और कल्लन खाला की एक आखिरी मुराद भी पूरी हो गई। हामिद अब डेढ़ साल का होने चला था। माशाअल्ला सेहतमंद और गोलमटोल। गोद में एक बार ले लो तो उतारने को दिल न करे। लेकिन सादिक इधर अब फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने लगा था। घर आने के दिनों का अंतराल फिर से लंबा होने लगा था। हफ्ता, दिन और महीनों बाद सूरत दिखाई देने लगी उसकी। आता भी तो एक दो दिन के लिए। जेब में जो होता घर के खर्च के लिए देता और फिर गायब।

तसनीमा राह देखा करती। जब कोई ट्रक गुजरता दौड़ कर सहन तक आ जाती। फिर भारी कदमो से लौट पड़ती। हामिद बहुत सारा वक्त ले लेता। लेकिन जब रात होती तो बिस्तर सूना-सूना जान पड़ता। इस सूनेपन को न तो हामिद की किलकारियाँ भर पाती न कल्लन खाला की तेज बड़बड़ाने वाली आदत। नमाजें पढ़ती और मौलवी साहब से दुआ के लिए मिन्नत करती।

पिछले कुछ दिनों तसनीमा का मन किसी अनहोनी की आशंका में धड़कने लगा था। लगने लगा था कहीं कुछ अनहोनी जरूर हो रही है। कहीं किसी कोल्हीन के चक्कर में तो नहीं पड़ गए। काम भी तो ऐसा ही है। ट्रक लेकर जाता है सादिक बीच घने जंगलों में कहीं। वहाँ लकड़ी कटवाता है। और फिर ट्रक पर लोड होती है लकड़ियाँ। इस में कई-कई दिन लग जाते हैं। मनमाफिक लकड़ी की तलाश होती है। सागवान, महुआ, आम, शीशम, पलाश, सखुआ…

फिर उन्हें काटनेवालों को खोजना पड़ता है। बड़ी और मोटी-मोटी तनों को काटने के बाद उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में करना होता है। तब जाकर उसे लारी पर चढ़ाते हैं। इस दरम्यान वहीं किसी गाँव में ठिकाना होता था। जो मिल गया खा लिया। जहाँ जगह मिली सो लिया। सुनते हैं आदिवासियों के गाँव हैं उस इलाके में। और आदिवासी लड़कियाँ बड़ी आसानी से किसी की बातों में आ जाती है। थोड़ा सा स्नो पाउडर कर दो बस। सीधी होती हैं बेचारी। इसी का फायदा उठाते हैं गैरआदिवासी मरद।

नौशाद भाभी कहती थी, मरद जात का कोई भरोसा नहीं। जहाँ बोटी दिखी नहीं कि लगा लार टपकने। और खूबसूरत औरत मिल जाए तो कुत्तों जैसी हो जाती है इनकी हालत… लात जितनी मारो… सह लेंगे… कि शायद गोश्त नहीं तो हड्डी का ही एक टुकड़ा ही मिल जाए… चूसने के लिए… तू सावधान रहा कर …इतने इतने दिन घर से गायब रहना कोई अच्छी अलामत नहीं तेरे मरद की …झाड़ जंगल में क्या हो रहा है …किसी को क्या पता… रख लेगा किसी कोल्हिन को …और तुझे खबर तक नहीं लगेगी। खबर तब लगेगी जब उसके बाल बच्चे आ जाएँगे… बाप के जायदाद में हिस्सा माँगने… किरिस्तान बना लेती हैं मरदों को फँसा कर…

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नौशाद भाभी बेवा थी। कोई ज्यादा उमर नहीं। कोई बाल बच्चा नहीं। शौहर के इंतकाल के बाद बच्चों को संदल कुरान और अमपारा पढ़ाकर गुजारा कर रह थीं। दो कमरों का मकान शौहर छोड़कर गए थे। एक कमरा किराए पर लगा दिया था। सो जिंदगी गाड़ी मजे से चल रही थी – यह कहा जा सकता था। जहाँ जाती चाँदी के ढक्कन वाला पनबट्टा साथ दबाए चलती। आँखों पर सुनहले फ्रेम वाला चश्मा।

अल्लाह… ऐसा मत कहो… भाभी… तसनीमा ने सर पर से सरकते दो पट्टे को सँभालने का जतन करते हुए कहा था। उसे याद आ गई सादिक की बात। खुद सादिक ने उसे बताया था। उस दिन उसने कुछ ज्यादा ही शरारत की थी। फिर भी उसका मन भरा नहीं था। तसनीमा थक कर हाथ जोड़ने लगी थी। पूरे बदन मे दर्द ऐसा होने लगा था कि साँस लेना भी भारी …तकिये पर औंधे मुँह लेटी उखड़ी-उखड़ी साँसों को जोड़ने के संयत कर रही थी…

तब सादिक ने गुस्सा होकर कहा था… तुम से अच्छी तो वो होती हैं… थकने का नाम नहीं लेती… बल्कि थका देती हैं… यहाँ…तो …जैसे बदन नहीं झीना कागज है… जरा सा पानी पड़ा नहीं लगा भरभराने… रिरयाने… हुंह… फुलकुमारी

वह अपना मोबाइल उठाकर बिस्तर पर से उठ गया था। कैसी-कैसी फिल्में थीं सादिक के मोबाईल में। तसनीमा ने एक ही देखा था। लजाते-शरमाते। सादिक के बहुत इसरार करने पर। सादिक ने बताया था सब पैसे देने पर मिल जाती हैं। जितना चाहे मस्ती करो।

लेकिन वह अभी गुस्से से काँप रहा था। सिगरेट न मिला तो बीड़ी निकाल कर सुलगाने लगा था। बिस्तर पर ही अपने छोर में सिमट में सिमट गई थी तसनीम। नहीं दुबक गई थी। सहम गई थी उस रात। पराई औरत का जिक्र और सादिक वह रूप डरा गया था उसे। मगर सादिक बीड़ी सुलगाते हुए चौक पर चला गया था। जहाँ यारों का अड्डा जमा रहता था रात भर।

नौशाद भाभी की बातें सुनकर सोच में पड़ गई थी तसनीमा।

वो तसनीमा को और भी बहुत कुछ बताती रहती थी। गोया, किसके यहाँ क्या चल रहा है सब पता रहता था उसे। किसकी बेटी कहाँ पढ़ रही है। किस के बेटे का चक्कर किस से चल रहा है। कौन किस डॉक्टर से किस चीज का ईलाज करवा रहा है… यह भी पता रहता था उसे। अपनी जानकारी पर इतराते हुए एक दिन नौशाद भाभी ने कहा था, मेरी नजर कुछ छिप न सके है… तसनीमा… कोई कितना भी जतन कर ले…

तसनीमा ने उसे छेड़ते हुए पूछा था, सड़क की तरफ इशारा करते हुए… अच्छा बताइए… इस औरत ने किस रंग का सूट पहन रखा है…

कुछ दूरी पर काले बुरके में एक काया चली आ रही थी। सर से पाँव ढकी काया। कुछ नजदीक आने पर नौशाद भाभी ने बताया था… बड़े ही शांत लहजे में, यह जरीन है जानेमन… जींस और टी शर्ट पहन रखा है इसने बुरके के नीचे… मेन मारकेट जाएगी और बुरका उतार कर मजे से घूमेगी… पूरा मारकेट…

चौक पड़ी थी तसमीमा। भाभी की जानकारी पर नहीं… इस नायाब तर्जुबे पर। हैरत से उसकी आँखें फैल गई थी… बुरके के नीचे जींस…

हाँ… नीचे और भी बहुत कुछ है जानेमन…

क्यों करती है यह भला ऐसा…

मरदों को लुभाने के लिए…

मरदों को लुभाने के लिए… तसनीमा की समझ में कुछ न आया था।

तू बड़ी भोली है… मासूम है… तसनीम …खुदा तेरी इस मासू्मियत को बचाए रखे…

तब नौशाद भाभी ने आगे कहा था… पता है ये लड़की कहाँ जाती है…

कहाँ…

अजीब-अजीब जगहों का नाम लिया था भाभी ने। तसनीमा उन जगहों के बारे में कुछ खास नहीं जानती थी। यही समझती थी कि इन जगहों पर बड़ी-बड़ी दुकानें हैं। महँगी चीजों के। आज एक दूसरी दुनिया की परतें खुल रही थी उसके आगे जैसे… जहाँ सब कुछ नया-नया और चौंकाने वाला था। फिर नौशाद भाभी ने आगे कहा था, घर में कोई मरद कमाने वाला नहीं हो तो …रोकटोक करने वाला नहीं तो मन उड़ेगा ही… किसे नहीं चाहिए बढ़िया और कीमती मोबाईल… महँगे कपड़े और लजीज खाना…

संकोच के मारे उसने आगे कुछ नहीं पूछा था। लेकिन वह और भी बहुत कुछ जानना चाहती थी उस बुरके वाली के बारे में। दो-चार दिनों में वह एक बार जरूर दिखाई दे जाती थी। इतना तो अंदाजा लगाती थी कि वो घनी और बहुत बड़ी आबादी वाले मोहल्ले के दूसरे छोर पर रहती थी। क्योंकि तसनीमा के घर तक यानी सड़क तक पहुँचते-पहुचते उसकी चाल धीमी पड़ जाती थी। कभी-कभी वो रिक्शे पर होती। तसनीमा ने बहुत बार देखना चाहा था उसका चेहरा, मगर नहीं देख सकी थी। बुरके में सिर्फ उसका चप्पल ही दिखाई पड़ता था। और उसके ऊपर थोड़ा सा जींस का हिस्सा। मुश्किल से दो या तीन उँगली भर। जिसका रंग बदलता रहता था। मोहरी की साइज बदलती रहती। उनके कंपन का अंदाज बदलता रहता। कभी वो चुस्त होती तो कभी बड़े घेरेवाली। कभी उनमें जरी का काम होता तो कभी पायल जैसा कुछ उसके साथ टँका होता।

तसनीमा ने कभी जींस नहीं पहना था। बस देखा था। मायके यानी उसके कस्बे में भी लड़कियाँ जींस पहनती थी। लेकिन उसके लिए तो इसकी कल्पना भी गुनाह थी। हालाँकि सादिक कई बार बता चुका था कि वह तसनीमा को जींस में देखना चाहता था। मगर सुबह-सुबह होते कई बातों के साथ जींस वाली बात वह भूल जाता। तसनीमा को पता था उसकी इस आदत के बारे में। सो उसे बहुत मलाल भी नहीं होता था। तीन ईद कर चुकी थी वह ससुराल में। बड़ी मुश्किल से ईद में एक सूट खरीद पाती थी। राशन के पैसे से कुछ बच-बचाकर। कल्लन खाला के लिए साड़ी सादिक ले आता था। अब तो साज-सिंगार भी भूलती जा रही थी। एक नाइसिल का पाउडर और नारियल का तेल ही होता था उसके कमरे में श्रंगार के लिए। पाउडर हामिद के लिए आया था। और तेल कल्लन खाला भी लगा लेती थीं। मगर इससे क्या होता है। नौशाद भाभी कहती हैं – सादगी में भी कयामत की अदा होती है। आईना देखने लगी थी वह। सचमुच, वह अभी तक कयामत थी। बिना किसी बाहरी दिखावे के। ऊपर से नीचे तक उसकी बनावट में कोई फर्क, कोई ढीलापन नहीं आया था। फिर भी वह नकाब में छिपी उस लड़की या औरत को, जो भी थी, उसे देखना चाहती थी।

एक दिन न जाने क्यों जींस के वे घेरे उसके सहन के पास आ कर रुक गए थे। बुरके के अंदर से दो आँखों ने तसनीमा को भरपूर नजरों से देखा था। जैसे कुछ कहना चाहती हो। तसनीमा को हैरत हुई थी। घबरा गई थी वह। कुछ ही मिनटों में उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदें चमकने लगी थी। वह हामिद को उठाकर, जल्दी से अपने कमरे में चली गई थी।

कुछ और बातें सुनी थी उसने उसके बारे में। यह कि बडे-बड़े रसूखदारों तक पहुँच है इस लड़की की। शायद इसीलिए अड़ोस-पड़ोस के लोग इससे कुछ कहने से परहेज करते थे। दामन बचा कर निकल जाने में ही अपनी खैर सझते थे। इसी तरह की कितनी बातें।

यह भी अजब संयोग था। ठीक उसी दिन मसजिद में खास दुआ रखी गई थी। ऊँची मीनार तसनीमा के घर से ही दिखाई पड़ती थी। सूरज जब अलगनी पर टँगा होता तो इस मीनार की छाया घर पर पड़ती थी। उसी की माइक से आवाज आ रही थी मौलवी अतीक की। दुआ के दरम्यान उनकी रोती हुई आवाज खुद सुनी थी उसने… ऐ अल्लाह हमें माफ करना… हम अपनी औरतों को परदे में नहीं रख सके… बेलगाम, बेपरदा और बेहया हुई जाती हैं हमारी माँ-बहनें… हमें इनको काबू में रखने की तौफीक और ताकत अता फरमा दे खुदा…

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तसनीमा ने उँगलियों पर गिना था। वह दूसरे महीने की पचीस तारीख थी, जब सादिक नहीं आया था। कैसा-कैसा तो मन होने लगा था तसनीमा का।

लेकिन सादिक आया था। बदला-बदला-सा। लहजा, चेहरा, आवाज… सबकुछ…

कुछ कहना चाहता था। मगर कह नहीं पा रहा था। दूध पीते बच्चे को एक बार भी नहीं प्यार नहीं किया था उसने।

खुद कल्लन खाला भी अंदेशे में थी। बहुत पूछने पर भी सादिक ने उसे कुछ नहीं बताया।

सादिक की हालत देख कर कुछ पूछने की हिम्मत न कल्लन खाला कर पा रही थी न तसनीमा। बस दोनों चुपचाप इंतजार करने लगी थीं। सादिक के चेहरे को पढ़ने की नाकाम कोशिश के बाद। अब यही रास्ता बचा था।

और जब सादिक ने बोला तो तसनीमा की चीख निकल गई। कल्लन खाला सकते में पड़ गई। और नौशाद भाभी ने उचककर नाली में थूक दिया।

फिर सादिक ने ही कहा था… वो यहीं रहेगी… भाभी… नहीं तो मैं मर जाऊँगा… तसनीमा भी रहेगी… इसमें बहुत ज्यादा शोरगुल करने की जरूरत क्या है

सब देखने लगे थे उसकी तरफ। कहाँ से आई थी उसमें इतनी ताकत, इतनी हिम्मत?

यह कोई पहली बार तो नहीं है… मोहल्ले में कितने लोग हैं जिन्होंने दो शादियाँ की हैं… शरीयत में है…

हिचकते-हिचकते सादिक ने कह ही दिया था।

शरीयत अब जैसे इसी लिए है… हवस पूरी करने का लाइसेंस… नौशाद भाभी ने कहा था। फिर वो तसनीमा की ओर मुड़ी थी, तू क्या कहती है… बोल…

मैं यह हरगिज नहीं बर्दाश्त करूँगी… पंचायत बैठाऊँगी…

उससे क्या होगा…

पहले क्या लोग नहीं गए हैं पंचायत में…

फिर सादिक सख्त हो गया था, मोहल्ले में तमाशा कराना है तो कराओ इज्जत तेरी माँ की… कल्लन खाला और नौशाद भाभी के लिहाज में शायद उसकी जुबान बंद हो गई थी लेकिन फिर दूसरे ही पल उसने नरम होने की कोशिश करते हुए कहा था, वैसे खर्चे पानी में कोई कमी नहीं होगी…

मौलवी अतीक आए थे। सफेद टोपी और सफेद कुरता पायजामा और मुँह में ढेर सारा पान भरा हुआ। मोटे होंठ और लंबी दाढ़ी। अजीब सी नजरों से उन्होंने देखा था तसनीमा को। साथ में हाजी हलीम और सदर महमूद मियाँ। सभी को बुलाया था सादिक ने। पाँच सौ रुपये की पंचायती फीस चुका कर।

सब सुनने के बाद मौलवी अतीक ने पान के साथ ढेर सारी सफेदी उँगलियों से चाटते हुए कहा, लड़की अगर इस्लाम कबूल कर लेती है तो शरीयतन इस शादी में कोई उज्र नहीं है।

सुन कर फुफकार पड़ी थी तसमीना, मुझे यह मंजूर नहीं है… लगा था उसकी आँखें बाहर निकल आएँगी, घर में मैं रहती हूँ क्या पकता है… कैसे घर चलता है… अपने बच्चे के लिए दूध तक के पैसे नहीं दे सकता यह… ऊपर से रात दिन इसकी माँ के ताने कि मैं ही सादिक को घर में टिकने नहीं देती… मैं ही इसे सँभाल नहीं पाई… क्या-क्या सँभालती फिरूँ… मैं ही जानती हूँ… कैसे गुजारा हो रहा है… ऊपर से एक सौत… मैं जान दे दूँगी मगर यह नहीं होने दूँगी…

मगर मौलवी अतीक उतने ही शांत थे। तजुर्बे, उम्र और शरीयत की जानकारी के बोझ से लदे। खुद तीन बीवियों के मालिक थे वे। एक गाँव में दो यहाँ। 24-25 साल की उम्र में जब इस मोहल्ले में आए थे तो साइकिल का पंक्चर बनाने का काम करते थे। मसजिद से लगे मुसाफिर खाने में रहते थे। पाँचों वक्त नमाज पढ़ते थे। मुसाफिर खाने में रहने की एक शर्त यह भी थी। धीरे-धीरे दीन की तरफ ध्यान लगने लगा। फिर एक दिन इल्हाम हुआ कि ये दुनिया तो फानी है। गैर सबाती है। खत्म हो जाने वाही चीज है। कहाँ फँसा तू। इससे निकल और दीन की खिदमत में लग जा।

और फिर अतीक लग गए दीन के काम में। पंक्चर टायरों को गंदे पानी में डालकर उनके छेद ढूँढ़ने और पंप से उनमें हवा भरने रहने से निजात तो मिली ही, मोहल्ले में रुतबा भी बढ़ने लगा। हालाँकि अभी मसजिद में सिर्फ अजान देने का काम मिला था। इमामत का जिम्मा यूपी, सहारनपुर के मौलवी असद पर था। वे 70 पार कर रहे थे। दीन के साथ उनकी खिदमत में भी लग गए अतीक मियाँ। वे यूपी लौटने लगे तो मोहल्ले वालों को इस बात पर राजी कर गए कि उनके बाद अतीक ही इमामत की जिम्मेदारी भी सँभालेंगे। फिर देखते-देखते सब हुआ। चार कमरों का खुला मकान, फ्रिज, कपड़ा धोने की मशीन, दो रंगीन टीवी, तीन बीवियाँ और पाँच बच्चों का सुख।

तो एक तब के दिन थे। एक आज का दिन। तो मौलवी अतीक इस वक्त बेहद शांत और संजीदा थे। जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।

वे हैरत से देखने लगे थे, तसमीमा और उसकी ऊँची आवाज को।

फिर कल्लन खाला की तरफ देखते हुए कहा था, ‘लगता है बहू-बेटियों को तमीज नहीं सिखाया तुमने… बड़ों के साथ पेश आने का।’

कल्लन खाला ने तसनीमा को इशारा किया था। तसमीना ने सर पर से दोपट्टा चेहरे तक गिरा लिया। मगर उसकी ऊँची आवाज बंद नहीं हुई थी,

मेरे साथ नाइंसाफी हो रही है। खुदा का कहर टूटेगा सब पर। यह एकतरफा फैसला मुझे मंजूर नहीं है… तसनीमा अब लगभग चीखने लगी थी। नौशाद भाभी और कल्लन खाला उसे जबरने उठाकर अंदर के कमरे की तरफ ले गई थीं। तसमीना छटपटाती रह गई थी। जैसे जबह होने से पहले बकरा तडफ़ड़ाता है।

बहुत देर की जोर-बहस के बाद सभी चले गए थे। फैसला वही हुआ था जो होना था।

सादिक पंचों को छोड़ने गया हुआ था। सफेद एंबेस्डर कार की पिछली सीट पर बैठते हुए हाजी हलीम ने कहा था, तौफीक साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि तसनीमा के मन में कुछ और चल रहा है…

मतलब…

आपने देखा नहीं उसका गुस्सा… फिर उसकी खामोशी…

आगे की सीट पर बैठे सादिक ने पीछे मुड़कर कहा था, ज्यादा से ज्यादा तलाक माँग सकती है और क्या… मैं इसके लिए भी तैयार हूँ… क्यों अतीक साहब…

नउजबिल्लाह… ऐसी मनहूस बातें नहीं करते बेटे… जानते हो खुदा ने इसे जायज जरूर करार दिया है मगर जायज होते हो हुए भी खुदा की नजर में यह इनसान का सबसे गिरा हुआ अमल है…सबसे ज्यादा नापसंद चीजों में से एक है तलाक…

लेकिन अगर तसनीमा नहीं मानी तो…

आपने करार निकाह के बारे में सुना है…? सदर महमूद साहब जो टाउन हाई स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते थे, ने विषय बदलते हुए तब पूछा था।

नहीं तो…? यह क्या है… मौलवी अतीक को अपनी नाइल्मी पर हैरत हुई।

बाहर से हिंदुस्तान आने वाले गैरमुल्की रईस मुसलमान आज कल यही कर रहे हैं… यहाँ शादियाँ करते हैं और निकाह के वक्त ही लड़कियों से तलाकनामे पर साइन करवा लेते हैं ताकि जब जी चाहे इस निकाह से छुटकारा पा जाए…

और लड़की वाले मान भी जाते हैं…

कुछ पैसे-वैसे का मामला होता है… फिर सब मान जाते हैं… लड़की के घरवालों से लेकर काजी तक…

यह तो तलाक की आड़ में लड़कियों की खरोद-बिक्री है एक तरह से…

हाँ गरीबी जो न करा दे… मौलवी अतीक ने ही कहा था। फिर उन्होंने ही आसमान की तरफ देखते हुए कहा था, या मौला… किस तरफ जा रहा है दीन…

महमूद साहब ने आगे कहा था, दरअसल इस तरह के निकाह का तरीका अरब से आया है…

अरब से… मैं कुछ समझा नहीं… यह हाजी हलीम थे।

सऊदी अरब में इन दिनों मिस्यार का चलन है। इसके तहत औरत और मर्द बिना निकाह किए साथ रह सकते हैं और जिस्मानी संबंध भी बना सकते हैं…

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अच्छा… हैरत से खुली रह गई थी सबकी आँखें। सदर साहब ने आगे कहा था, मर्द चाहे तो अपनी मिस्यार बीवी को कुछ खर्च दे सकता है या नहीं भी दे सकता है… साथ रह सकता है या नहीं भी रह सकता है… सब उसकी मर्जी पर है। यही नहीं एक मर्द एक साथ चार मिस्यार बीवियों के साथ संबंध रख सकता है। और बदलते जमाने में ऐसी औरतों की कमी नहीं जो मिस्यार को तरजीह दे रही हैं… वजह जो भी हो

सुनकर अवाक रह गए थे सभी। सादिक ध्यान से यह सब सुन रहा था। उसका आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था। कुछ लफ्ज उसके गले में अटक रहे थे। मगर बड़े लोगों के बीच बोलना हिमाकत है, जानता था वो। कहीं बनता मामला बगड़ न जाए। महमूद साहब जारी थे, असल में कुछ साल पहले जब दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में थी, तब इसका असर अरब पर भी पड़ा। ऐसे में निकाह का खर्च मरदों पर भारी पड़ने लगा। तब इस खर्च से बचने के लिए उलेमा ने यह रास्ता निकाला…

फिर भी क्या ये जायज है… शरीयतन?

…अरब के उलेमाओं ने इसे जायज करार दिया है। कहते है जब शुरुआती दिनों में मुसलमान जिहाद पर जाते थे, तब अपनी जरूरतें मिटाने के लिए मिस्यार का सहारा लेते थे। बाद में यह रिवाज खत्म कर दिया गया। लेकिन हुकूमत ने चार-पाँच सालों से इसे फिर से मंजूरी दे दी।

इसके बाद खामोश पड़ गए थे सभी। लगा था सदी का सबसे बड़ा मगर सबसे घिनौना सच उनके सामने खोल कर रख दिया गया हो। उबकाई आने लगी थी हाजी हलीम को। कैसा-कैसा तो मन हो आया था। उल्टी जैसा। तभी, कार एक झटके से रुक गई थी। हाजी साहब का घर आ गया था। वो सब को छोड़ कर घर की जानिब चल दिए थे।

दूसरे दिन चला गया था सादिक।

जाते हुए उसने कल्लन खाला से कहा था, तसनीमा को सुनाते हुए, अगली बार आएगा तो अकेला नहीं होगा।

कल्लन खाला ने हमेशा की तरह सर पीट लिया था। तसनीमा अपने कमरे में हामिद को सुलाने की कोशिश कर रही हामिद जाग कर चिल्लाने लगा था। तसमीना ने दूघ का बोटल उसके मुँह से लगा दिया था। जिसे छिटक वह फिर रोने लगा था। वह खाली बोटल से ही उसे बहलाने की कोशिश कर रही थी। जिसे अब शायद वह समझ चुका था। तसमीना ने परदा सरका कर अपनी छातियों को टटोलने लगी थी। शायद वहाँ ही दूध हो। तीन दिन से लगातार भूखे रहने से छातियाँ भी सूखने लगी थीं। हामिद ने वहाँ से भी मुँह झटक लिया था। रोते हामिद को उसने पीटना शुरू कर दिया था। कल्लन खाला ने हामिद को उससे छीनते हुए कहा था, पागल हुई जा रही हो… गुस्से पर काबू रखना सीखो… खुदा के लिए …यह मरदों की दुनिया है। इनसे पार पाना मुश्किल है। …शौहर तो हाथ से गया अब बच्चे की भी जान ले लोगी क्या… बड़बड़ाते हुए वो हामिद को लेकर अपने कमरे में चली गई थी।

तसनीमा लेटी की लेटी रही। मगरिब की नमाज का संक्षिप्त वक्त निकलता रहा। आज नमाज के लिए उठने का जी नही हुआ। लेटे-लेटे उसकी नजर बहिश्त जेवर पर पड़ी। विदाई के वक्त माँ ने दिया था। कहा था खास इहतेमाम करने को। यह भी कहा था मन कभी मचले तो इसे पढ़ना। एक मुसलमान बीवी की सारी मुश्किलों का हल है इसमें। सभी सवालों के जवाब। यह किताब नहीं जेवर है लड़कियों के लिए। घर की जीनत है। लेटे-लेटे वह उसी के पन्ने के पलटने लगी। इन शब्दों पर उसकी नजर अटक गई, बीवी की जायज ख्वाहिशों का एहतेराम शौहर के लिए जरूरी है, मगर उससे भी ज्यादा जरूरी है एक बीवी को शौहर की जरूरत को पूरी करना। शौहर तुम्हारे लिए मिजाजी खुदा है।

सोचने लगी थी तसनीमा तो क्या ऐसे ही होते हैं खुदा?

उसकी अक्ल ने मानने से इनकार कर दिया। कहा तो गया है खुदा सत्तर माँओं से ज्यादा प्यार करने वाला है। तो फिर उसी के साथ ऐसा क्यों हो रहा है। बहुत कुछ उसके अंदर घुमड़ने, बनने-बिगड़ने लगा था। जैसे एक शीशी से सभी रंगों को मिला कर मिक्स कर दिया गया हो। फिर उससे एक रंग निकालने को कहा जाए। तसनीमा का सर दुखने लगा था। इसी कैफियत में पता नहीं कब नींद आ गई। आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी। नौशाद भाभी हामिद को गोद में ले कर उसे झिंझोड़ रही थी। वो खाने के लिए बड़े का गोश्त और चावल और कुछ चपातियाँ लेकर आई थी।

सादिक को पंद्रह दिन हो गए थे, उस साँवली सी लड़की को लेकर आए। तसनीमा को अपना कमरा छोड़ना पड़ा था। वो कल्लन खाला के कमरे में सोने लगी तिपाई बिछा कर। नौशाद भाभी के गले से लिपट कर सिसकने लगी थी। कल्लन खाला पानी लाने के लिए गई म्यूनिसपैलिटी के नल पर गई हुई थी।

नौशाद भाभी ने बड़े प्यार से उसकी पीठ सहलाती रही थी। देर तक। पीठ के सहारे बहुत सारा दर्द रिसता रहा था। किसी को पता नहीं था, मगर सादिक ने उसे कल रात फिर पीटा था।

मुझे यहाँ से ले चलो… अब मैं इस घर में नहीं रहना चाहती…

इतनी कमजोर हो तुम… इतनी जल्दी हिम्मत हार गई… चल मार्केट हो कर आते हैं… मन बहल जाएगा…

अनमनी-सी तसनीमा तैयार हो गई थी। वह शहर का सबसे शादनार मार्केट था। जहाँ ईट की जगह रंगबिरंगे काँच झिलमिला रहे थे। फर्श की जगह दूध सी चिकनी और चमकदार टाइल्स लगे थे। नौशाद भाभी शायद यहाँ पहले भी आ चुकी थी। इसलिए कांप्लेक्स की परादर्शी सीढ़ियाँ वह बिना किसी कौतुहल के, लापरवाही के साथ चढ़ रही थी। चार मंजिला इस कांप्लेक्स की हर मंजिल पर धीमे बजते संगीत ने अलग समा बांध रखा था। फिर हवा में तैरती गुलाब-की सी खुशबू। एक गारमेंट शॉप के सामने आकर रुकी थी वह। शोकेस में सजे कपड़े किसी को भी बेचैन और गरीब बना सकते थे। देर तक देखती रही थी तसनीमा यह सब। नौशाद भाभी के साथ घिसटती हुई सी वह भी शाप के अंदर दाखिल हो गई थी।

यहा क्यो लाई हो भाभी… मेरे पास तो पैसे भी नहीं हैं कुछ लेने के लिए –

जो लेना हो ले लो… बाद में मन होगा तो लौटा देना नहीं तो कोई बात नहीं…

तसनीमा की नजर वहाँ सजे एक जींस पर टिक गई। पीली जरी का काम किया हुआ जींस। नौशाद भाभी ने तभी उसे भरपूर और नशे भरी नजरों से देखा।

ऐसे क्या देख रही हैं आप… लजा गई थी तसनीमा।

तुम्हारी साइज… फिर फुसफुसाते हुए कहा, ‘कोई कह नहीं सकता तुम एक बच्चे की माँ हो, बहुत ताकतवर हो तुम… तुम्हें एक ट्रक ड्राइवर से पिटने की जरूरत नहीं… देख तो जरा इसे पहन कर कैसी लगती है मेरी जान…’

हैंगर से जींस निकालकर उसने तसनीमा को धकियाते हुए ट्रायल रूम के अंदर बंद कर दिया था। आदमकद शीशे के सामने।

बाहर, एक कोने में वही बुरके वाली लड़की खड़ी थी। बिना बुरके के। नौशाद भाभी पास के फरवाले दुधिया सोफे में धँसकर पान बनाने लगी थी। एक नहीं तीन।

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जींस वाली लड़की – Jeans Vali Ladaki

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