गरजत-बरसत अध्याय 3 | असग़र वजाहत

गरजत-बरसत अध्याय 3 | असग़र वजाहत – Garajat-Barasat-Part-iii

गरजत-बरसत अध्याय 3 | असग़र वजाहत

अब्बा और अम्मां नहीं रहे। पहले खाला गुजरी उसके एक साल बाद खालू ने भी जामे अजल पिया। मतलू मंज़िल में अब कोई नहीं रहता। खाना पकाने वाली बुआ का बड़ा लड़का बाहरी कमरे में रहता है। मल्लू मंजिल का टीन का फाटक बुरी तरह जंग खा गया है। ऊपर बेगुन बेलिया की जो लता लगी थी वह अब तक हरी है। मौसम में फूलती है। मैं हर साल मल्लू मंज़िल की देखरेख पर हज़ारों रुपया खर्च करता हूं। यही वजह है कि दादा अब्बा के ज़माने की इमारत अब कि टिकी हुई है। साल दो साल कभी तीन-चार साल बाद घर जाना हो जाता है। मल्लू मंज़िल आबाद होती है। ‘द नेशन` जैसे अखबार के ज्वाइंट एडीटर का उस छोटे से शहर में आना अपने आप ही खबर बन जाती है। स्थानीय अखबारों के सम्पादक, बड़े अखबारों के रिपोर्टर और कभी-कभी हमारे अखबार का लखनऊ संवाददाता आ जाते हैं। पत्रकारिता पर बेबाक बहसें होती हैं।

कोई सात-आठ साले आता था तो स्टेशन पर पत्रकार माथुर मिला करते थे। वे उस ज़माने में किस अखबार में काम करते थे, मुझे याद नहीं। हो सकता है या शायद ऐसा था कि किसी अखबार से उनका कोई संबंध न हो और पत्रकार हो गये हों। बहरहाल माथुर मुझे स्टेशन पर रिसीव करते थे। चाय पिलाते थे। उस दौरान आसपास से गुजरने वाले किसी सिपाही को बड़े अधिकार के साथ आवाज़ देकर बुलाते थे और कहते थे, सुनो जी दरोगा जी से कह देता दिल्ली ‘द नेशन` के ज्वाइंट एडीटर साहब आ गये हैं। इंतिज़ाम कर लें और सुनो सामने पान वाले की दुकान से दो पैकेट विल्स फिल्टर और चार जोड़े एक सौ बीस के बनवा लेना।

ज़ाहिर है सिपाही पान वाले को पैसे तो न देता होगा। वह दरोगा जी का नाम लेता होगा जैसे माथुर जी मेरा हवाला देते हैं। उन दिनों माथुर जी की ये सब चालाकियां मैं टाल दिया करता था यह सिर्फ अनुभव प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं कहता था। कुछ अंदाज़ा था कि मेरे एक बार आने से माथुर के दो चार महीने ठीक गुज़र जाते होंगे।

मुझसे मिलने शहर के अदीब-शायर आ जाते हैं कभी-कभी कुछ पुराने लोग और कभी अब्बा के जानने वाले भी आते हैं। मेरे ज़माने के पार्टी वाले लोगों में करीब-करीब सब हैं। मिश्रा जी काफी लटक गये हैं। मेरे ख्याल से सत्तर से ऊपर है पर अभी भी पार्टी के जिला सैक्रेट्ररी है। कामरेड बली सिंह पूरी तरह मछली के व्यापार में लग गये हैं।

पिछले सालों जब मैं गया तो मिलने वालों में युवा लड़कों का एक गुट जुड़ गया है जो शहर में शैक्षणिक गतिविधियां करते रहते हैं। कस्बों से शहर आये लोग भी बढ़ गये हैं और उनमें से कुछ आ जाते हैं। मल्लू मंज़िल कुछ दिन के लिए गुलज़ार हो जाती है।

शहर की हालत वही है। उतना ही गंदा, उतना ही उपेक्षित, उतना ही भ्रष्टाचार, उतना ही उत्पीड़न और वही अदालतें जहां मजिस्ट्रेट महीनों नहीं बैठते, अस्पताल जहां डॉक्टर नहीं बैठते, सरकारी दफ्तर जहां बाबू नहीं बैठते।

नूर और उसके अब्बा, अम्मां की यही राय थी कि बच्चा लंदन के हैवेट अस्पताल में पैदा होना चाहिए। मैं जानता था कि मामला दिल्ली के किसी अस्पताल में कुछ गड़बड़ हो गया तो बात मेरे ऊपर आ जायेगी। मैंने नूर को लंदन भेज दिया था। वहां उसने हीरा को जन्म दिया था। हीरा का नाम उसके दादा ने रखा था। जाहिर है हीरे जवाहेरात का व्यापारी और क्या नाम रख सकता था। नाम मुझे इसलिए पसंद आया कि हिंदू मुसलमान नामों के खाँचे से बाहर का नाम है। बहरहाल हीरा के पैदा होने के बाद कुछ महीने नूर वहीं रही। फिर दिल्ली आ गयी। उस जमाने में मल्लू मंजिल आबाद थी। मैं नूर और हीरा को लेकर घर गया था। अब्बा को हीरा का नाम कुछ पसंद नहीं आया था। उन्होंने कुरान से उसका नाम

सज्जाद निकाला था और अम्मां अब्बा जब तक जिंदा रहे हीरा को सज्जाद के नाम से पुकारते थे।

गर्मियां शुरू होने से पहले नूर हीरा को लेकर लंदन चली जाती थी। मिर्जा साहब ने अपने नवासे के लिए लंदन से बाहर एसेक्स काउण्टी के एक गांव में किसी लार्ड का महल खरीद लिया था। इस महल का नाम उन्होंने ‘हीरा पैलेस` रखा था। ये सब लोग गर्मियों में ‘हीरा पैलेस` चले जाते थे। मैं भी एक आद हफ्ते के लिए वहां जाया करता था। हीरा पैलेस बीस एकड़ के कम्पाउण्ड में एक दो सौ साल पुराना महल है जिसमें चार बड़े हॉल, एक बड़ा डाइनिंग हाल, बिलियर्ड रूम, स्मोकिंग रूम, काफी लाउंज, पिक्चर गैलरी और बीस बेडरूम हैं। मुझे यहां ठहरना अटपटा लगता था। क्योंकि हमेशा ये एहसास होता रहता था कि किसी म्यूजियम में रह रहे हैं। मिर्जा साहब को यह पैलेस इस शर्त पर बेचा गया था कि वहां रखी कोई चीज़ हटायेंगे नहीं और उसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं करा सकते। इसलिए वहां के बाथरूमों में रखे टोंटी वाले लोटों के अलावा कुछ ऐसा नहीं था जिसका मिर्जा साहब से कोई ताल्लुक हो।

पैलेस की ‘विजिटर्स बुक` भी उतनी ही पुरानी थी जितना पुराना पैलेस था। मोटे चमड़े की लाल जिल्द चढ़ी इस किताब में ब्रिटेन के तीन प्रधानमंत्रियों के अलावा बर्टेंड रसेल के भी हस्ताक्षर और रिमार्क्स लिखे थे। इस किताब में जब मुझसे कुछ लिखने और दस्तख़त करने को कहा गया तो मुझे बड़ा मज़ा आया। लगा कि मेरे हस्ताक्षर इस रजिस्टर का मज़ाक उड़ा देंगे।

बुढ़ापे में मिर्जा इस्माइल लार्ड का खिताब हासिल करना चाहते थे और उसके लिए ज़रूरी था कि वो प्रभावशाली अंग्रेजों को एक शानदार महल में बुलाकर इंटरटेन करें। ऐसा करने के लिए ही उन्होंने यह पैलेस खरीदा था। एसेक्स काउण्टी के शेरे गांव के बाहर एक पहाड़ चोटी पर बना यह महल काफी दूर से जंगल में खिले फूल-सा लगता था।

एक बार गर्मियों में नूर ने हीरा का नाम लंदन के किसी मशहूर किण्डरगार्डेन स्कूल में लिखा दिया। मैं समझ गया कि अब वे दोनों वापस नहीं आयेंगे। लेकिन इससे बड़ी चिंता यह थी कि मैं हीरा को कुछ

नहीं सिखा पाऊंगा। मैं यह चाहता था कि वह अवधी लोक गीतों पर सिर धुन सके जैसा मैं करता हूं। वह ‘मीर` और ‘गा़लिब` की शायरी से ज़िंदगी का मतलब समझे। लेकिन अब वह सब ख्व़ाब हो गया था। लेकिन मैं नूर के ख्वाब को चूर-चूर नहीं करना चाहता था। लेकिन पता नहीं कैसे नूर ये समझ गयी थी। वह हीरा को हिंदी पढ़ाती थी। पूरा घर उससे हिंदुस्तानी में बातचीत करता था। नूर और हीरा जाड़ों में पन्द्रह दिन के लिए दिल्ली आते थे और मैं उन दिनों छुट्टी ले लेता था। हम खूब घूमते थे और मैं हीरा के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुज़ारता था। स्कूल पूरा करने के बाद हीरा अब बी.ए. कर रहा है। उसे समाजशास्त्र में बेहद दिलचस्पी है और इस बारे में हमारी लंबी बातचीत होती रहती है।

नूर के लंदन चले जाने के बाद मैं सुप्रिया के नजदीक आता गया। बंगाली और उड़िया मां-बाप की बेटी सुप्रिया के चेहरे की सुंदरता में दुख की कितनी बड़ी भूमिका है यह किसी से छिपा नहीं रह सकता। उसकी बड़ी-बड़ी ठहरी हुई आंखों से अगर उदासी का भाव गायब हो जाये तो शायद उनकी सुंदरता आधी रह जायेगी। उसमें हाव-भाव में दुख की छाया में तपे हुए लगते हैं। सुप्रिया के दोनों भाई कभी नहीं मिले और यह मान लिया गया कि पुलिस ने जिस बर्बरता से नक्सलवादी आंदोलन को कुचला था, वे उसी में मारे गये हैं। उनका कहीं कोई रिकार्ड न था। कहीं किसी आसतीन पर खून का निशान न था लेकिन दो जवान और समझदार लड़के मारे जा चुके थे।

सुप्रिया की मां उसके साथ रहती है। पिताजी कलकत्ता में ही हैं। उसकी मां को शायद मेरे और सुप्रिया के संबंधों के बारे में पता है लेकिन वह कुछ नहीं बोलती। दरअसल पूरे जीवन का संघर्ष और दो बेटों के दु:ख ने उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं से सुख की अगर कोई परछाई भी आती हो तो उसे सहेज लो. . .पता नहीं कल क्या हो। सुप्रिया और मेरे संबंध गहरे होते चले गये। मैंने सोचा नूर को बता दूं. . .फिर सोचा नूर को पता होगा। वह जानती होगी मैं और नूर साल में दो बार मिलते हैं और उसके बाद साल के दस महीने हम अलग रहते हैं तो जाहिर है. . .

सुप्रिया का संबंध चूंकि राजनैतिक परिवार से है इसलिए उससे मैं कुछ ऐसी बातें भी कर सकता हूं जो नूर से नहीं हो सकती। ‘द नेशन` में जब मेरे ‘पर कतरे` जाते हैं तो सुप्रिया के संग ही शांति मिलती है। मेरे अंदर उठने वाले तूफ़ानों को दुख से भरा-पूरा उसका व्यक्तित्व शांत कर देता है।

मेरे दो बहुत प्राचीन मित्रों अहमद और शकील के मुकाबले के वे अच्छी तरह समझती है कि मेरे सपने किस तरह छोटे होते जा रहे हैं ओर सपनों का लगातार छोटे होता जाना कैसे मेरे अंदर विराट खालीपन पैदा कर रहा है जो ऊलजलूल हरकतें करने से भी नहीं मरता।

कभी-कभी अपने अर्थहीन होने का दौरा पड़ जाता है। लगता है मेरा होने या न होने का कोई मतलब नहीं है। मैं पूरी तरह ‘मीनिंगलेस` हूं। मेरे बस का कुछ नहीं है। मैं पचास साल का हो गया हूं लेकिन कुछ न कर सका और जब जिंदगी कितनी बची है। मेरा ‘बेस्ट` जा चुका है। कहां गया, क्या किया, इसका कोई हिसाब नहीं है।

मैं ऑफिस से चुपचाप निकला था। लिफ्ट न लेकर पीछे वाली सीढ़ियाँ ली थीं और इमारत के बाहर निकल आया था। ऐसे मौकों पर मैं सोचता हूं काश मेरा चेहरा बदल जाये और कोई मुझे पहचान सके कि मैं कौन हूं। मैं भी अपने को न पहचान सकूँ और एक ‘नॉन एनटिटी` की तरह अपने को आदमियों के समुद्र में डुबो दूं।

पीछे से घूमकर मुख्य सड़क पर आ गया और स्कूटर रिक्शा पकड़कर जामा मस्जिद के इलाके पहुंच गया। भीड़-भाड़, गंदगी, जहालत, गरीबी, अराजकता, अव्यवस्था की यहां कोई सीमा नहीं है। यहां अपने आपको खो देना जितना सहज है उतना शायद और कहीं नहीं हो सकता। पेड़ की छाया में रिक्शेवाले अपने रिक्शों की सीटों पर इस तरह आराम करते हैं जैसे आरामदेह बेडरूम में लेटे हों। आवाजें, शोर, गालियां, धक्का, मछली बाजार, मुर्गा बाजार, उर्दू बाजार, आदमी बाजार और हर गली का अपना नाम लेकिन कोई पहचान नहीं। मैं बेमकसद तंग गलियों में घूमता रहा। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा रहा। नीचे उतरकर ये जानते हुए सीख के कबाब खा लिए कि पेट खराब हो जायेगा

और सुप्रिया को अच्छा नहीं लगेगा। रिक्शा लिया और बल्ली मारान आ गया। गली कासिमजान से निकला तो हौजकाज़ी पहुंच गया बेमकसद।

रात ग्यारह बजे स्कूटर रिक्शा करके मैं ऑफिस के इमारत के सामने अपनी ऑफीशियल गाड़ी के सामने उतरा। मैं बीड़ी पी रहा था। मुझे यकीन था कि ऑफिस के ड्राइवर और मेरा ड्राइवर रतन मुझे देख लेंगे। पागल समझेंगे। ठीक है, मुझे पागल की समझना चाहिए।

रतन ने मुझे देखा। मैं बीड़ी पीता हुआ उसकी तरफ बढ़ा। “सर, आप चलेंगे”, उसने पूछा।

“हां चलो”, मैं गाड़ी में बैठ गया।

ये ऑफिस वाले मुझे अधपागल, सिड़ी सनकी, दीवाना, मजनूं समझते हैं। ये अच्छा है।

एक दिन एडीटर-इन-चीफ से किसी बात पर कहा-सुनी हो गयी। मुझे गुस्सा आ गया। मैं वापस आया और अपने चैम्बर के बाहर पड़े चपरासी के मोढ़े पर बैठ गया। सब जमा हो गये। कुछ मुस्कुरा रहे थे। कुछ मुझे अफसोस से देख रहे थे। चपरासी परेशान खड़ा था। जब काफी लोग आ गये तो मैंने कहा, “मैं यहां इसलिए बैठा हूं कि इस अख़बार में मेरी वही हैसियत है जो मुरारीलाल की है जो इस मोढ़े पर बैठता है।”

यार लोगों ने ये बात भी एडीटर साहब को नमक-मिर्च लगाकर बता दी।

गुस्से में आकर एडीटर-एन-चीफ ने मेरा ट्रांसफर मीडिया ट्रेनिंग सेण्टर में कर दिया था। ऑफिस आर्डर निकल आया था। मैंने ये आर्डर लेने से इंकार कर दिया था। मेरा कहना था कि मैं पत्रकार हूं और मुझसे पत्रकारिता पढ़ने या अखबार का ट्रेनिंग सेण्टर संचालित करने का काम नहीं लिया जा सकता। मैनेजमेंट कहता था, नहीं, ऐसा हो सकता है। मैंने तीन महीने की छुट्टी ले ली थी और सुप्रिया के साथ पश्चिम बंगाल घूमने चला गया था। हम दोनों ने बहुत विस्तार और शांति से बंगाल का एक-एक जिला देखा था। तस्वीरें खींची थी। मैं खुश था कि चलो इस बहाने कुछ तो हुआ।

शकील उन दिनों उपविदेश राज्यमंत्री था। मेरे मना करने के बावजूद वह ‘द नेशन` के मालिक सीताराम बड़जातिया से मिला था और मामले को रफ़ा-दफ़ा करा दिया था। मैंने तो ये सोच लिया था कि ‘द नेशन` को गुडबॉय कहा जा सकता है क्योंकि वैसे भी मैं वहां तकरीबन कुछ नहीं करता हूं। कभी साल छ: महीने में कुछ लिख कर देता हूं तो एडीटर छापता नहीं क्योंकि वह अखबार की पॉलिसी के खिलाफ होता है।


रात के दो बजे फोन की घण्टी घनघना उठी। पता नहीं क्या हो गया है। सुप्रिया भी जाग गयी। मैंने फोन उठा लिया, दूसरी तरफ चीफ रिपोर्टर खरे था, “सर! मंत्री पुत्रों द्वारा फुटपाथ पर सोये लोगों को कुचल दिए जाने की एक और न्यूज़ है। मैं दरियागंज थाने से बोल रहा हूं।”

किस मंत्री का लड़का है?”

“सर, शकील अहमद अंसारी के लड़के कमाल अहमद अंसारी।”

“ओहो. . .” मैं और कुछ न बोल सका।

“सर. . .ऑफिस में अमिताभ है. . .उससे कह दीजिए सर पेज वन पर दो कॉलम की खबर है. . .हमारे पास पूरी डिटेल्स. . .”

“हां मैं फोन करता हूं।” मैंने कहा।

इससे पहले के मैं ऑफिस फोन करके नाइट शिफ्ट में काम करने वाले अमिताभ को निर्देश देता, शकील का फोन आ गया।

“तुम्हें न्यूज़ मिल गयी।” वह बोला।

“हां, अभी-अभी पता चला. . .कमाल कैसा है?”

“वह तो ठीक है. . .हां उसके साथ जो लड़के थे उनमें से एक लड़के को लोगों ने काफी पीट दिया है. . .वह अस्पताल में है।”

किसका लड़का है।”

“बी.एस.एफ. के डायरेक्टर जनरल का बेटा है रवि।”

“दूसरे और कौन थे?”

“हरियाणा के सी.एम. का लड़का था. . .”

“और?” मैंने पूछा।

“ये सब छाप देना।” वह बोला।

“हमारा चीफ रिपोर्टर थाने में है. . .उससे अभी मेरी बात हुई . . .पहले पेज पर दो कालम में खबर जा रही है।”

“यार हम तीस साल से दोस्त है।” वह बोला।

“दोस्ती से कौन इंकार करता है।”

“साजिद ये लोकल खबर है. . .तीसरे पेज पर जहां दिल्ली की खबरें लगती हैं, वहां लगा दो।”

“देखो ये लोकल ही खबर होती. . .इसमें अगर यूनियन पावर एण्ड इनर्जी मिनिस्टर शकील अहमद अंसारी का लड़का न इनवाल्व होता।”

“साजिद ये तुम क्या कह रहे हो. . .यानी मुझे बदनाम. . .”

“प्लीज शकील. . .आई एम सॉरी।”

उसने फोन काट दिया। मैंने ड्यूटी पर बैठे अमिताभ को इंस्ट्रक्शन दिए। सुप्रिया ने चाय बना डाली थी। वह जानती थी कि अब चार बजे के बाद फिर सोना कुछ मुश्किल होगा।

“मैं कमाल को बचपन से जानता हूं. . .तुम्हें पता है मैं शकील और अहमद यूनीवर्सिटी के दिनों के दोस्त हैं. . .शायद मेरे ही कहने पर शकील ने कमाल का एडमीशन दिल्ली पब्लिक स्कूल में कराया था। लेकिन शकील के पास टाइम नहीं है. . .तुम्हें पता कमाल के लिए यू.एस. से एक स्पोर्ट मोटर साइकिल इम्पोर्ट करायी थी शकील ने?”

“ओ हो. . .”

“हां, मेरे ख्याल से पांच हज़ार डालर. . .के करीब. . .”

“माई गॉड।”

“कमाल ने आज जो एक्सीडेंट किया है वह पहला नहीं है. . इससे पहले अपने बाप के चुनाव क्षेत्र में यह सब कर चुका है।”

“एण्ड ही वाज़ नॉट कॉट?”

“वो हम सब जानते हैं।”

“कानून, न्याय, प्रशासन, अदालतें, गवाह, वकील सब पैसे के यार हैं . . .अगर देने के लिए करोड़ों हैं तो कोई कुछ भी कर सकता

है. . .हमने इसी तरह समाज बनाया है. . . हमारे सारे आदर्श इस सच्चाई में दब गये हैं।”

“लेकिन शकील कैन टेल. . .”

“शकील क्या कहेगा? तुम्हें पता है पच्चीस साल की उम्र में ही कमाल शकील की सबसे बड़ी पॉलिटिकल स्पोर्ट है. . .उसके चुनाव की बागडोर वही संभालता है और बड़ी खूबी से ‘आरगनाइज़` करता है क्योंकि यह सब बचपन से देख रहा है. . .अपने क्षेत्र से शकील ग़ाफ़िल रहकर दिल्ली की उठापठक में आराम से लगा रहता है और कमाल क्षेत्र संभाले रहता है. . .आजकल चुनाव क्षेत्र जागीरें हैं. . .बाप के बाद बेटे के हिस्से में आती है।”

“कमाल ने पढ़ाई कहां तक की है?”

“मेरे ख्याल से बी.ए. नहीं कर पाया है या ‘क्रासपाण्डेन्स` से कर डाला है। बहरहाल, पढ़ाई में वह कभी अच्छा नहीं रहा लेकिन व्यवहारिक बुद्धि ग़ज़ब की है, जन सम्पर्क बहुत अच्छे हैं. . .मतलब वह सब कुछ है जो एक राजनेता में होना चाहिए।”

“वैसे क्या करता है?”

“शकील की कंस्ट्रक्शन कंपनी और ‘रियल स्टेट डिवल्पमेंट कंपनी का काम देखता है. . .अभी इन लोगों ने वेस्टर्न यू.पी. के कुछ शहरों में कोई सौ करोड़ की ज़मीन खरीदी है. . दस कालोनियां डिवलप करने जा रहे हैं।”

“ओ माई गॉड इतना पैसा।”

“मैं उसका दोस्त हूं. . .मुझे पता है. . .दौ सौ करोड़ के उसके स्विस एकाउण्ट्स हैं।”

“हजार करोड़।”

“हां. . .”

छोटी उम्र में ही उसका कमाल का चेहरा पक्का हो गया है। उस का कद पांच दस होगा। काठी अच्छी है। कसरती बदन है। देखने से ही सख्त जान लगता है। हाथ मज़बूत और पंजा चौड़ा है। आधी बांह की कमीज़ पहनता है तो बांहों की मछलियाँ फड़कती दिखाई देती रहती है।

रंग गहरा सांवला है। आंखें छोटी हैं पर उनमें ग़जब की सफ़्फ़ाकी दिखाई देती है। लगता है वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। उसमें दया, सहानुभूति, हमदर्दी जैसा कुछ नहीं है। वह जब सीधा किसी की आंखों में देखता है तो लगता है आंखें भेदती चली जा रही हों। एक कठोर भाव है जो अनुशासन प्रियता से जाकर मिल जाता है लेकिन अपनी जैसी करने और अपनी बात मनवा लेने की साध भी आंखों में दिखाई पड़ती है। नाक खड़ी और होंठ पतले हैं। गाल के ऊपर उभरी हुई हडि्डयां हैं जो बताती हैं कि वह इरादे का पक्का और अटल है। जो तय कर लेता है वह किए बिना नहीं मानता।। कमाल की गर्दन मोटी और मजबूत है जो सिर और शरीर के बीच एक मजबूत पुल जैसी लगती है। उसके चेहरे पर धैर्य और सहनशीलता का भाव भी है। पतले और तीखे होंठ उसके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं की तरफ इशारा करते हैं। आंखें शराब पीने की वजह से थोड़ी फूल गयी हैं। लेकिन उनका बुनियादी भाव निर्ममता बना हुआ है। ‘द नेशन` के प्रादेशिक क्रासपाण्डेंट बताते रहते हैं कि कमाल का आतंक एक जिले तक सीमित नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आठ-दस जिले और यहां तक कि लखनऊ तक कमाल का नाम चलता है। वह इतना शातिर है कि अपनी अच्छी पब्लिक इमेज बनाये रखता है। कभी बाढ़ आ जाये, शीत लहर चल जाये, गरीब की लड़की की शादी हो, बेसहारा को सताया जा रहा हो, कमाल वहां मौजूद पाया जाता है।

“सुनो, क्या हमारे नेता ऐसे ही होते रहेंगे?” सुप्रिया ने पूछा।

“ये राष्ट्रीय नेताओं की तीसरी पीढ़ी है। पब्लिक स्कूलों में पढ़ी लिखी या अध पढ़ी, अंग्रेजी बोलने वाली और हिंदी में अंग्रेज़ी बोलने वाली इस पीढ़ी का सिद्धांत, विचार, मर्यादा, परम्परा से कोई लेना-देना नहीं है. . .ये सिर्फ सत्ता चाहते हैं. . .पावर चाहते हैं ताकि उसका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें. . .ये चतुर चालाक लोग जानते हैं कि उनके पूर्वजों ने यानी पिछली पीढ़ी के नेताओं ने जनता को जाहिल रखा है. . .जानबूझ कर जाहिल रखा है ताकि बिना समझे वोट देती रहे।

“जाहिल कैसे रखा है?”

“इस देश को जितने बड़े पैमाने पर शिक्षित किया जाना था वह नहीं किया गया। साहबों और चपरासियों के अलग-अलग स्कूल अब तक चले रहे हैं. . .अब ये सरकार देशवासियों को शिक्षित करना अपनी जिम्मेदारी भी नहीं मान रही है. . .थक गये यार. . .गुलशन से कहो ज़रा चाय और बनाए।”

सुप्रिया लौटकर आयी तो उसके हाथ में अखबारों का पूरा बण्डल था। मैंने सबसे पहले ‘द नेशन` खोला पहले पन्ने पर कमाल वाले ‘एक्सीडेंट की खबर नहीं थी। ऐसा लगा जैसे मुझे किसी ने ऊपर से लेकर नीचे तक जलाकर राख कर दिया हो। सुप्रिया ने मुझे देखा। अखबार देखा और समझ गयी कि बात क्या है।

इससे पहले कि मैं न्यूज़ एडीटर को फोन करता। शकील का फोन आ गया। वह बोला, ‘माफी मांगने के लिए फोन कर रहा हूं।`

किस बात के लिए माफी मांग रहे हो? मुझे ज़लील करके माफी चाहते हो।”

“नहीं. . .फिर तुम गलत समझे. . .”

“तो बताओ सही क्या है? क्या ये सच नहीं कि एक मंत्री होने के नाते तुमने मेरे अखबार पर दबाव डालकर वह खबर उस तरह नहीं छपने दी जैसे छपना चाहिए थी. . .और ऐसा करके तुमने ये साबित किया कि अखबार में मेरी कोई हैसियत नहीं है. . .मैं कुत्ते की तरह जो चाहे भौंकता. . .”

वह बात काटकर बोला, “तुम बहुत गुस्से में हो. . .मैं शाम को फोन करूंगा।”

“नहीं तुम शाम को भी फोन न करना।” मैंने गुस्से में कहा और फोन बंद कर दिया।

खबर न सिर्फ तीसरे पेज पर एक कॉलम में छपी थी बल्कि एक्सीडेंट की वजह टायर पंचर हो जाना बताया गया था। इस तरह कमाल को साफ बचा लिया गया था। यह भी लिखा था कि उस वक्त गाड़ी कमाल नहीं चला रहा था बल्कि ड्राइवर चला रहा था। ड्राइवर को पुलिस ने गिरफ्तार करके हवालात में डाल दिया था। उसकी जमानत करा लेना

शकील के लिए बायें हाथ का काम था।

“ऐसे समाज में इंसाफ हो ही नहीं सकता जहां एक तरफ बेहद पैसे वाले हों और दूसरी तरफ बेहद गरीब।” मैंने सुप्रिया से कहा। वह दूसरे अखबार देख रही थी। सभी अखबारों में खबर इस तरह छपी थी कि कमाल साफ बच गया था।

“अब देखे इस केस में क्या होगा? शकील मरने वालों के परिवार वालों को इतना पैसा दे देगा जितना उन्होंने कभी सोचा न होगा, गवाहों को इतना खिला दिया जायेगा कि उतनी सात पीढ़ियां तर जायेंगी . . .पुलिस को तुम जानती ही हो. . .न्यायालय मजबूर है. . .गवाह सबूत के बिना अपंग है. . .और अगर न भी होता तो शकील के पास महामहिमों का भी इलाज है. . .अब बताओ, किसका मज़ाक उड़ाया रहा है. . .मैं तो पूरे मामले में एक बहुत छोटी-सी कड़ी हूं।”

दफ्तर जाने का मूड नहीं था लेकिन सुप्रिया का जाना जरूरी था। उसकी वीकली मैगज़ीन का मैटर आज फाइनल होकर प्रेस में जाना था। उसके जाने के बाद मैं अखबार लेकर बैठा ही था कि गुलशन ने आकर बताया, मुख्तार आये हैं, मुख्तार का नाम सुनते ही सब कुछ एक सेकेण्ड में अंदर दिमाग में चमक गया।

खेती बाड़ी और राजनीति छोड़कर दिल्ली चले आने से एक-दो साल बाद एक दिन मुख्त़ार ऑफिस आ गया था। मुझे लगा था कि वह शायद पिए हुए था। मैं उसे लेकर कैंटीन आ गया था।

“आप चले आये तो हम भी चले आये।” वह बोला, मैं कुछ समझ नहीं पाया और उसकी तरफ देखने लगा।

“आपने वतन छोड़ दिया. . .दिल्ली आ गये. . .हम भी दिल्ली आ गये. . .”

“क्या कर रहे हो?”

“फतेहपुरी मस्जिद के पास एक सिलाई की दुकान में काम मिल गया है।”

“और वहां क्या हाल है?”

“ठीक ही है।” वह खामोश हो गया था।

“मिश्रा जी कैसे हैं?”

“उनसे मिलना नहीं होता. . .” मुझे आश्चर्य हुआ। वह बोला, “अब आपसे क्या छिपाना मिश्रा जी के साथ हम लोगों की निभी नहीं। आपके आने के बाद. . .उमाशंकर, हैदर हथियार, कलूट, शमीम सब अलग होते गये. . .रिक्शा यूनियन टूट गयी. . .सिलाई मज़दूर यूनियन भी खतम ही समझो. . .बीड़ी मज़दूर. . .” वह बोलता रहा और मैं अपराध भाव की गिरफ्त में आता चला गया था। मेरे दिल्ली आने के तीन साल के अंदर यूनियनें टूट गयीं, जिला पार्टी में झगड़े शुरू हो गये, जो लोग पार्टी के करीब आये थे, सब दूर चले गये। जिला पाटी सचिव मिश्रा जी का वही हाल हो गया जो पहले था। लाल चौक का नाम फिर बदल कर लाला बाज़ार हो गया. . .इतने लोगों, रिक्शे वालों, बीड़ी मज़दूरों, सिलाई करने वालों के दिल में एक आशा की किरन जगाकर उन्हें अधर में छोड़ देना विश्वासघात ही माना जायेगा। अपने कैरियर और पैसे के लिए मैं उन सबको उनके हाल पर छोड़ कर यहां आ गया. . .मिश्रा जी ने ठीक ही कहा था, “कामरेड हमें पता था, आप यहां रुकोगे नहीं।” इतना तय है कि मैं वहां रुकता तो यह न होता जो हो गया है और इसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आती है। मैं पता नहीं कैसे अपने आपको प्रतिबद्ध और ईमानदार मानता हूं। मैं तो दरअसल अवसरवादी हूं। अगर मेरे अंदर हिम्मत नहीं थी तो मुझे वह सब शुरू ही नहीं करना चाहिए था।

एक बार दिल्ली आने के बाद मुख्त़ार वापस नहीं गया। शायद वह इतना हयादार है कि अपना चेहरा उन लोगों को नहीं दिखाना चाहता जिनके साथ उसने मेरी वजह से विश्वासघात किया है। वह दिल्ली में ही रहने लगा। रोज़ जितना पैसा कमाता था उससे शाम को एक ‘अद्धा पाउच` खरीदता था। गटगट करके. . .पुराने स्टाइल में अद्धा पेट में उतारकर नमक चाटता था और थोड़ी गप्प-शप्प मारकर दुकान में ही सो जाता था। वह कभी-कभी साल छ: महीने में मुझसे मिलने चला आता था। मुझे यह एहसास हो रहा था कि वह ‘एल्कोहलिक` होता जा रहा है यानी रात-दिन नशे में डूबा नज़र आता था। मैं सोचता क्या उसकी बर्बादी का जिम्मेदार मैं ही हूं? पता नहीं यह कितना सच है लेकिन इतना तो

है कि अगर वह दिल्ली न आता। इस तरह न उखड़ता तो शायद बर्बाद न होता।

आज भी वह नशे में हैं। उसका दुबला-पतला जिस्म देशी ठर्रे की ताब नहीं ला पाया है और जर्जर हो चुका है। ओवर साइज़ कमीज में वह अजीब-सा लग रहा है। बाल तेज़ी से सफेद हो गये हैं और चेहरे पर लकीरें पड़ने लगी हैं।

“चाय पियोगे?” मैंने उससे पूछा।

“चाय?” वह बेशर्मी वाली हंसने लगा। लेकिन सिर नहीं उठाया।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“अब. . .आप जानते हो।”

“तो क्या पियोगे।”

“अरे बस. . .आपको थोड़ी तकलीफ देनी है. . .”

मैं समझ गया। उसका ये रटा हुआ जुमला मुझे याद हो चुका है। इससे पहले कि वह वाक्य पूरा करता मैंने जेब में हाथ डाला पर्स निकालना और दो सौ रुपये उसकी तरफ बढ़ा दिए।

उसने पैसे मुट्ठी में दबाये और तेज़ी से उठकर बाहर निकल गया। वह उसे जाते देखता रहा। फाटक पर उसने गुलशन से कोई बात की और बाहर निकल गया। मैं सोचता रहा कि देखें ये क्या हो गया। मुख्त़ार बहुत अच्छा संगठनकर्ता रहा है। वह वक्ता भी अच्छा था। अपने समाज के लोगों को ‘कन्विन्स` करने के लिए उसके पास मौलिक तर्क हुआ करते थे। अगर राजनीति में रहता. . .या ये कहें कि अगर मैं राजनीति में रहता . . .अपने जिले में. . .अपने घर में. . .अपने गांव में रहता तो वह भी . . .लेकिन कोई गारंटी तो नहीं है। गारंटी तो वैसे किसी चीज़ की भी नहीं है यही तो जिंद़गी की लीला है।


काफी हाउस क्यों उजड़ा? ये कुछ उस तरह की पहेली बन गयी है। जैसे ‘राजा क्यों न नहाया, धोबन क्यों पिटी?` पहेली का उत्तर है। धोती न थी। मतलब राजा इसलिए नहीं नहाया कि नहाने के बाद पहनने के लिए दूसरी धोती न थी और धोबन इसलिए पिटी कि धोती न थी, यानी कपड़े न धोती थी। तो ‘काफी हाउस क्यों उजड़ा?` पहेली का उत्तर हो सकता है। ‘स` न था। ‘स` से समय, ‘स` से समझदारी, ‘स` से सहयोग, ‘स` से सगे, ‘स` से सत्ता, ‘स` से सोना. . .साहित्य. . .

काफी हाउस उजड़ा इसलिए कि वहां बसने वाले परिन्दों ने नये घोंसले बना लिये। मेरी और यार दोस्तों की शादियां हो गयीं। बच्चे हो गये। सास-ससुर और साले सालियों की सेवा टहल और पत्नी की फरमाइशों के लिए वक्त कहां से निकलता? और फिर कनाट प्लेस और काफी हाउस के नज़दीक कोई कहां रह सकता है? इसलिए पटक दिए गये काफी हाउस से दस-दस बीस-बीस मील दूर इलाकों में, वहां से कौन रोज़ रोज़ आता?

कुछ लोग हम लोगों के बारे में कहते हैं जब तक ये लोग संघर्ष कर रहे थे काफी हाउस आते थे। अब स्थापित हो गये हैं। सोशल सर्किल बड़ा हो गया है। जोड़-तोड़, लेन-देन के रिश्ते बन गये हैं। जिनमें काफी हाउस के लिए कोई जगह नहीं है। पता नहीं ये कितना सच है लेकिन कुछ न कुछ सच में इसमें हो सकता है।

पिछले डेढ़ दशक में पन्द्रह बहारें आयीं हैं और पतझड़ गुज़रे हैं। जेल से निकलने के बाद सरयू डोभाल का कविता संग्रह ‘जेल की रोटी` छपा था और उसकी गिनती हिंदी के श्रेष्ठ कवियों में होने लगी थी।

उसके बाद ‘पहाड़ के पीछे` और ‘आवाज का बाना` उसके दो संग्रह आ चुके हैं। वह ‘दैनिक प्रभात` का साहित्य संपादक है और हिंदी ही नहीं भारत की अन्य भाषाओं के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में उसका अमल-दखल है। उसकी शादी इलाहाबाद में हुई है। पत्नी एन.डी.एम.सी. के किसी स्कूल में पढ़ाती है। एक लड़का है जो बी.ए. कर रहा है। इसमें शक नहीं कि अब सरयू के पास काफी हाउस में दो-दो तीन-तीन घण्टे गप्प मारने का वक्त नहीं है। उसे अपने दफ्तर में ही आठ-साढ़े आठ बजे जाते हैं। बाहर ड्राइवर खड़ा इंतिज़ार करता रहता है कि साहब को जल्दी से जल्दी घर छोड़कर मैं आजाद हो जाऊं। उसकी पत्नी शीला खाने पर इंतिज़ार करती है और बेटा अपनी सहज ज़रूरतों की सूची थामे उसका ‘वेट` करता रहता है। ऐसे में सरयू काफी हाउस तो नहीं जा सकता न? और फिर हफ्ते में तीन चार शामें ऑफीशियल किस्म के ‘डिनर` होते हैं जहां जाना नौकरी का हिस्सा है। कोई कुछ कहता नहीं लेकिन ऐसे ‘डिनरों` में ही नीतियां तय होती, फैसले लिए जाते हैं, लॉबींग की जाती है, समझौते होते हैं, रास्ते निकलते हैं। लखटकिया से लेकर दस हज़ारी इनामों तक की लॉबींग होती है। सरयू को साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका निकालनी है, साहित्यकारों के बीच रहना है, उनका समर्थन प्राप्त करना है, उनसे संबंध बनाना है इसलिए यह सब नौकरी का आवश्यक हिस्सा बन जाता है।

नवीन जोशी की शादी सुमित्रानंदन पंत के परिवार में हुई है। शादी के बाद नवीन ने दो-तीन नौकरियां बदलने के बाद एक बड़ी पब्लिक अंडरटेकिंग में पी.आर.ओ. के पद पर पांव जमा लिए हैं। शादी से पहले उसका एक कविता संग्रह ‘चुप का संगीत` छप चुका है। अब शादी, नौकरियों और बाल-बच्चों के झंझटों में इंज्वाय करना सीख गया है। वह दिल्ली के पहाड़ी ब्राह्मण समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य है। ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि उसके पिताजी अंग्रेजों के ज़माने के सेक्शन ऑफीसर थे, चाचा जी जज थे, छोटे चाचा इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। आज उसके परिवार में दो दर्जन आई.ए.एस. और प्रोफेसर हैं। अखबारों के सम्पादक हैं, टी.वी. चैनलों के एंकर हैं,

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संवाददाता हैं, कुमाऊंनी पंडितों की प्रतिष्ठा और प्रभाव से नवीन गदगद रहता है। वह अपने पिछले राजनैतिक विचारों पर शर्मिन्दा तो नहीं लेकिन उसका उल्लेख करने पर असुविधाजनक स्थिति में आ जाता।

‘पब्लिक अण्डरटेकिंग` किस तरह अपने कर्मचारियों और वह भी ऊंचे कर्मचारियों के नाज़ नखरे उठाती हैं इसका सउदाहरण बयान करना नवीन को बहुत पसंद है। वह कंपनी की उन तमाम योजनाओं के बारे में जानता है जिनसे लाभ उठाया जा सकता है। जैसे बच्चे के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा तक कंपनी कितनी छुट्टी मां को और कितनी छुट्टी बाप को देती है। बच्चे के पैदा होने पर कितना एलाउंस मिलता है। स्कूल योग्य हो जाने पर यह एलाउंस कितना बढ़ जाता है। अगर कार खरीद ली जाये तो कितना पैसा कार ‘मेनटेनेंस एलाउंस` का मिलता है। ड्राइवर की तनख्वाह मिलती है। ऑफिस अगर तेरह किलोमीटर से दूर है तो पांच रुपये पचास पैसे प्रति किलोमीटर और ज्यादा एलाउंस मिलता है। साल में तीस हज़ार पेट्रोल के लिए बीस हजार इंजन बदलवाने आदि आदि ये सब उसे जबानी याद है और वह धड़ाके से बताना शुरू कर देता है। तीन साल बाद नयी कार खरीदने का इंटरेस्ट फ्री लोन मिल जाता है। पुश्तैनी मकान ठीक कराने और बच्चों की शादी करने के लिए भी दस लाख तक का ‘इंटरेस्ट फ्री` लोन मिलता है।

नवीन परिवार के पुराने किस्सों का भी ख़ज़ाना है। अंग्रेजों के ज़माने में राजधानी शिमला चली जाती थी। एक ट्रेन में पूरी भारत सरकारी दिल्ली से शिमला कैसे जाती थी। उसके पिताजी को दो घर एलाट थे। एक दिल्ली में एक शिमला में। सारा काम बहुत व्यवस्थित और योजनाबद्ध हुआ करता था। इन किस्सों के साथ-साथ उसके पास अपने परिवार के बुजुर्गों की ईमानदारी, मेहनत और लगन को दर्शाने वाले अनगिनत किस्से थे। बडे चाचा सन् बीस में जज थे। आठ सौ रुपये महीने तन्खा मिलती थी। वे हर महीने दो सौ रुपये के दस-पन्द्रह मनीआर्डर अल्मोड़ा करते थे। किसी गरीब रिश्तेदार को पांच रुपये, किसी को दस, जैसी जिसकी जरूरत होती थी। पचास रुपये महीने का गुप्तदान करते थे। सौ रुपये महीने हेड़ाखान बाबा के मठ में जाता था।

इसके अलावा परिवार का जो भी लड़का हाईस्कूल कर लेता था उसे इलाहाबाद बुलाकर अपनी कोठी में रख लेते थे और आगे की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाते थे।

नवीन के एक चचा जी पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के क्लासफेलो थे। इन दोनों के बड़े रोचक किस्से उसे याद हैं जिनमें पंडित पंत को शिकस्त हुआ करती थी और पंडित भुवन जोशी विजेता और आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित होते थे। एक रिश्तेदार शूगरकेन इंस्पेक्टर थे और तरक्की करते करते शूगरकेन कमिश्नर हो गये थे। वे कभी किसी से बहस में हारते नहीं थे। नवीन के अनुसार कहते थे, भाई मैं तो बातचीत को खींचकर गन्ने पर ले आता हूं और वहां अपनी मास्टरी है. . .बड़े से बड़े को वहीं चित कर देता हूं।

हम लोगों ने ये सब किस्से काफी हाउस के जमाने में सुने थे। इनमें अल्मोड़ा के लोगों, वहां आपसे एक नवाब साहब, एक आवारा और न जाने किन-किन लोगों के किस्से नवीन अब भी जब मौका मिल जाता है सुना देता है। उसका मनपसंद काम चाय की प्याली और गपशप्प का आदान-प्रदान है। वह यह काम घण्टों कर सकता है।

कविता का पहला संग्रह छपने के बाद नवीन अपनी पब्लिक सेक्टर नौकरी में आ गया था। पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, नातेदार सब समय की मांग करते थे। इसलिए उसका काफी हाउस आना बंद हो गया था और फिर अकेला क्या आता? न तो सरयू जाता था। न मैं जाता था, न रावत ही जाता था। वह अकेला वहां क्या करता? मेरा कभी-कभी मूड बन जाता था और कोई काम नहीं होता था। तो मैं उसके आफिस का कभी-कभार एक आद चक्कर लगा लेता था। मैं जानता था उसे आमतौर पर कोई काम नहीं होता है। वह आफिस के दो-चार दूसरे अधिकारियों से गप्प-शप्प करता रहता है। चाय पीता है। ए.सी. की बेहिसाब हवा खाता है। गप्प करने को जब कोई नहीं मिलता तो चपरासियों से खैनी लेकर खाता है और गप्पबाज़ी करता है। यह उसका बड़प्पन है कि वह पद को महत्व नहीं देता जिसकी वजह से कभी-कभी ऑफिस में उसकी आलोचना भी हो जाती है।

अच्छी खासी नौकरी में होते हुए भी नवीन को हम सब की तरह यह कामना तो थी कि यार पैसा बनाया जाये। हम में से किसी को पैसा मिल जाता तो शायद वह सब न करते जो दूसरे पैसे वाले करते हैं। हम फिल्म बनाते, यात्राएं करते, किताबें खरीदते वग़ैरा, वग़ैरा. . .नवीन अक्सर काफी हाउस में भी मोटा पैसा बनाने की योजनाएं बताया करता था और रावत उसका मज़ाक उड़ाया करता था। पैसा कमाने की मोटी योजनाएं अब भी उसके पास आती रहती हैं। एक दिन मैं उसके आफिस गया तो बोला कि यार किसी का फोन आया था, सोवियत यूनियन से एक आर्डर है। पांच करोड़ की प्याज़ भेजना है।?

“क्या?” मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं आया।

“हां यार पांच करोड़ की प्याज़ भेजने का आर्डर है।”

“तुम्हारे पास है?”

“हां हां . . .और क्या . . .पांच परसेंट कमीशन।” वह बहुत गंभीर लग रहा था।

“मज़ाक तो नहीं कर रहे हो।”

“नहीं यार. . .” वह नाराज़ होकर बोला।

इसी तरह पुरानी बात है, एक दिन उसका फोन आया कि अमेरिका से पानी का एक जहाज ‘डनहिल` सिगरेट लेकर ईरान जा रहा था कि ईरान में क्रांति हो गयी है। अब यह जहाज खुले समुद्र में रुका खड़ा है और विश्व में अपने माल के ग्राहक तलाश कर रहे हैं। नवीन ने बताया कि ‘डनहिल` का ग्राहक खोजने की कोशिश कर रहा है।

इस तरह के कोई काम उससे नहीं हो सके। बस टेलीफोन ऑफिस का, क्लर्क और चपरासी, काग़़ज स्टेशनरी. . .अपने शौक मुफ्त में पूरे कर लेता था और थोड़ी देर के लिए एक सपना देख लेता था। यार इसमें बुराई क्या है?

“यार ये निगम को साले को हो क्या गया है?” रावत गुस्से में बोला।

“अच्छा खासा पैसा है साले के पास।” नवीन ने कहा।

“भई देखो चाहे जो करे. . .हमें क्यों पार्टी बनाता है. . .” सरयू ने अपनी बात रखी।

“ये बताओ उसने तुमसे कहा क्या था?” सरयू ने मुझसे पूछा।

“यार यही कहा था कि आज रात तुम चारों हमारे साथ डिनर करो. . .और कुछ नहीं बताया था।” मैंने कहा।

“यही चालाकी है उसकी . . .वहां जाकर पता चला कि क्या किस्सा है।”

“देखो मैं तो बहुत पहले से निगम के बारे में ‘क्लियर` हूं। मुझे पता है उसका मुख्य धंधा दलाली है . . . वह पैसा कमाने के लिए कोई भी रास्ता अपना सकता है।” रावत ने कहा।

“चलो अब आगे से देखा जायेगा।”

“यार किस बेशर्मी से मंत्री से कह रहा था, सर एक ड्रिंक तो और लीजिए. . .देखिए सर. . .साकी कौन है।” सरयू ने कहा।

“मतलब अपनी पत्नी को साकी बना दिया. . .।”

“यार मंत्री को तो वही सर्व कर रही थी न?” नवीन ने कहा

“मंत्री के बराबर बैठी थी।”

“देखो राजाराम चौधरी पर्यटन मंत्री हैं. . .और निगम की एडवरटाइजिंग. . .”

“वो सब ठीक है. . .पर हद होती है।”

हम चारों में मेरी निगम से ज्यादा पटती है। वह यह जानता है और इन तीनों को ‘इनवाइट` करने के लिए भी उसने मेरा ही सहारा लिया था। हम जब उसके घर पहुंचे तब ही पता चला था कि वह अपनी पत्नी का जन्मदिन मना रहा है और उसमें चीफगेस्ट के रूप में राजाराम चौधरी को बुलाया है। वैसे एक-आद बार यह बात काफी हाउस में उड़ती उड़ती सुनी थी कि निगम अपनी पत्नी के माध्यम से बहुत से काम साधता है। उसकी पत्नी सुंदर है। बच्चा कोई नहीं है। आज तो निगम का चेहरा अजीब लग रहा था। उसने उतनी शराब पी नहीं थी जितनी दिखा रहा था। वह नशे में है इसका फ़ायदा उठा रहा था। यह सब समझ रहे थे।

निगम मुझसे बता चुका था कि पार्टी में राजाराम चौधरी होंगे और

उसने यह भी कहा था कि यह बात मैं सरयू और रावत वगै़रा को न बताऊं। उसे शक था क तब शायद ये लोग न आते।

“लेकिन वो हम लोगों को क्यों बुलाता है।”

“सीधी बात है यार. . .मंत्री को यह बताना चाहता है कि उसके मित्र पत्रकार भी हैं।”

“हां यार मुझे तो उसके दो बार मिला दिया मंत्री से. . .और दोनों बार खूब जोर देकर कहा कि ये ‘दैनिक प्रभात` में साहित्य सम्पादक हैं।”

“तो ये बात है।” रावत आंखें तरेरता हुआ बोला।

कुछ महीनों बाद सुनने में आया कि निगम को पर्यटन मंत्रालय से बहुत काम मिल गया है। यह भी सुना गया कि निगम ने दो कोठियां खरीद ली हैं। यह भी पता चला कि गाड़ी बदल ली है। उसने फोन करके खुद बताया कि नैनीताल में एक काटेज खरीद लिया है। जब कभी मिल जाता है तो बड़े जोश में दिखाई देता है। नया ऑफिस खोल लिया है जहां बीस पच्चीस का स्टाफ काम करता है।

मैंने शकील के पास संबंध खत्म कर लिये थे लेकिन उसका फोन अक्सर आता रहता था। वह कहता था कि मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा। . . . इस उम्मीद पर के एक दिन हम फिर उसी तरह मिलेंगे जैसे हम पहले मिला करते थे। मैंने भी सोच लिया था कि बस पुरानी दोस्ती जितनी निभ सकी है मैंने निभायी है और अब जिन्दगी के इस मोड़ पर मेरे और शकील के बीच कुछ ‘कामन` नहीं है। हमारे रास्ते अलग है।

एक साल तक हमारी मुलाकात नहीं हुई। अहमद टोक्यो से लौट कर आया तो उसने अपना ‘ऐजेण्डा` घोषित कर दिया कि वह मेरी और शकील की दोस्ती करवाना चाहता है। मुझे उसकी इस बात पर हँसी आई और उसे समझाया कि यार कि अब हम लोग हॉस्टल के लौण्डे नहीं है हम पचास के आसपास पहुँचे लोग हैं। न तो अब शकील को मेरी ज़रूरत है और मुझे उसकी। हमारी जिन्दगी अलग है, सोचने का तरीका अलग है।

– अरे साले तो मेरा और तुम्हारे सोचने का तरीका कौन सा एक है?“

– कभी एक नहीं रहा“ मैनें कहा।

– यही तो बात है . . . तुम उस साले को इतना ‘सीरियसली` क्यों लेते हो“।

मुझे हँसी आ गयी आज भी अहमद उसी तरह के बेतुके तर्क देता है जैसे तीस साल पहले दिया करता था।

अहमद पीछे पड़ गया आखिरकार मैं शकील से एक साल बाद मिला और हैरत ये हुई कि वह मुझसे लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा पहले तो मैं समझा साला ‘एक्टिंग` कर रहा है नेता साले एक्टिंग का कोर्स किए बिना ‘टॉप` के एक्टर बन जाते है। लेकिन बाद में पता चला कि वह एक्टिंग नहीं कर रहा था।


मोहसिन टेढ़े धड़ाधड़ अपनी जायदाद बेचकर पैसा खड़ा कर रहा है। अभी आम का बाग और वह हवेली नहीं बेची है जहां उसकी मां रहती है। मां से वह काफी परेशान है। कहता है अम्मां दिल्ली आना नहीं चाहती। मोहसिन टेढ़ा किसी भी तरह अब तक इसमें कामयाब नहीं हो सका कि अम्मां को दिल्ली ले आये। हां, उसके बहनोई दिलावर हुसैन एडवोकेट ने कहला दिया है कि पुश्तैनी जायदाद में उनका मतलब उनकी बीवी का भी हिस्सा है। मोहसिन टेढ़े किसी भी तरह जायदाद का एक तिनका अपनी बहन और बहनोई को नहीं देना चाहता।

सौ बीघा कलमी आम का बाग मोहसिन टेढ़े के दादा ने लगवाया था और यह ज़िले के ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े बागों में गिना जाता है। बाग में चार कुएं हैं, पक्की नालियां हैं, और हर तरह से कलमी आम के पेड़ हैं। मोहसिन टेढ़े ने जब इस बाग का ग्राहक तय किया तो उसके बहनोई दिलावर हुसैन एडवोकेट ने उसे धमका दिया और वह बयाना देने भी नहीं आया। मोहसिन ने एक और खरीदार को पटाया और उससे बयाना ले लिया। यह बात दिलावर हुसैन को पता लग गयी। उन्होंने मोहसिन को चैलेंज किया कि वे तहसील में बाग की लिखा-पढ़ी न करा सकेंगे। उनका मतलब यह था कि गुण्डे मोहसिन टेढ़े को तहसील न पहुंचने देंगे। ऐसे मौके पर मोहसिन टेढ़े के काम कौन आता सिवाय शकील अहमद अंसारी के। शकील ने यह छोटा-सा काम करने की जिम्मेदारी अपने सुपुत्र कमाल को सौंप दी।

कमाल ने मोहसिन को यकीन दिलाया कि बैनामा हो जायेगा। दिलावर हुसैन एडवोकेट कुछ नहीं कर सकेंगे। मोहसिन को यह बड़ा

अच्छा लगा। कमाल उन्हें बताता रहता था कि उसने अपने इलाके के इतने लोग बुला लिए हैं, जिले के अफसरों को साउण्ड कर दिया है कि यह मंत्री जी का काम है। सब मदद करने के लिए तैयार हैं। बैनामा अगले दिन होना था।

रात शकील के घर पर खाना-वाना खाने के बाद कमाल ने मोहसिन टेढ़े से पूछा, “अंकिल ये बताइये. . .अगर अपनी सिस्टर को उनका शेयर आपको देना ही पड़ जाता तो वह कितना होता?”

इस सवाल पर मोहसिन टेढ़े के हवास गुम हो गये। वह उड़ती चिड़िया के पर गिन गया।

“क्यों?” उसने पूछा।

“मतलब अंकिल आप जानते हैं. . .हमने पचास लोग बुलाये हैं जो हर तरह से लैस होंगे. . .अधिकारियों को उनका हिस्सा पहुंचा दिया गया है। पुलिस को भी दिया गया है क्योंकि पुलिस किसी के रिश्तेदार नहीं होती. . .”

मोहसिन टेढ़े की अकल के सभी दरवाजे खुल गये। उसने सोचा, कल बैनामा होना है, अगर आज कमाल कह दे कि उसके आदमी वहां नहीं पहुंच पायेंगे, वह नहीं जा सकता तो क्या होगा।

कितना खऱ्चा लग जायेगा।” मोहसिन टेढ़े मरी हुई आवाज़ में बोला।

पांच लाख।” कमाल ने कहा और मोहसिन टेढ़ा कुर्सी से उछल पड़ा, पांच लाख।”

“हां अंकिल पांच लाख. . .ये कुछ नहीं है. . .आप अस्सी लाख का बाग बेच रहे हैं।”

“ठीक है।”

मोहसिन टेढ़ा यह समझ रहा था कि कमाल शायद किसी काग़ज पर दस्तखत करायेगा। पर ऐसा नहीं हुआ।

अगले दिन जब बैनामा हो रहा था तो मोहसिन टेढ़े को कमाल के पचास आदमी कहीं नहीं दिखाई दिए। पुलिस भी नहीं थी। सब कुछ सामान्य था। मोहसिन टेढ़े ने कमाल से पूछा, तुम्हारे आदमी कहां हैं?”

“अंकिल आप अपना काम कीजिए।” वह सख्ती से बोला था। काम हो गया था। जितना पैसा कैश मिलना था वह सब कमाल ने गिनकर अपने पास रख लिया था। दिल्ली आकर उसमें से पांच लाख बड़ी ईमानदारी से गिनकर बाकी मोहसिन को लौटाते हुए कहा था, पापा को ये सब न बताइयेगा. . .”

मोहसिन ने सिर हिला दिया।

सुप्रिया को यह पसंद नहीं कि उसके रहते मेरे टेरिस पर महफिलें जमें और यार लोग शराब कबाब करें। अगर कभी ऐसा होने वाला होता है तो वह अपनी बरसाती में चली जाती है। लेकिन आजकल वह कलकत्ता गयी है इसलिए मेरी टेरिस आबाद हो गयी है।

मसला जेरेबहस यह है कि बलीसिंह रावत ने लोक सेवा आयोग द्वारा विज्ञापित डायरेक्टर मीडिया की पोस्ट पर अप्लाई कर दिया है। यह एस.टी. के लिए रिजर्व पोस्ट है और रावत के पास एस.टी. का प्रमाण-पत्र है। आज वह जिस वेतनमान पर काम कर रहा है उससे दुगना वेतनमान इस पोस्ट का है।

सरयू, नवीन का कहना है कि यह ‘गोल्डन अपारच्युनिटी` है रावत के लिए। मैं इससे सहमत हूं। डायरेक्टर मीडिया की पोस्ट सीधे मंत्रालय में है। क्या कहने?

रावत अपनी जानकारियों, समझदारी, फिल्म और साहित्य की सूक्ष्म दृष्टि के बावजूद सीधा है। उसमें मध्यवर्गीय छल कपट है। हम लोग ये जानते हैं रावत को ‘खींचने` का काई मौका नहीं छोड़ते।

पता नहीं कैसे धीरे-धीरे हम लोगों ने रावत को ‘कन्विंस` कर लिया कि नौकरी के लिए उसका जो इंटरव्यू लिया जायेगा उसका पूर्वाभ्यास करके देखना चाहिए।

कुछ ही देर में ‘मॉक इंटरव्यू` शुरू हो गया। कहावत है कि दाई से पेट नहीं छिपाना चाहिए। हम सब दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह साल पुराने दोस्त, एक दूसरे के बारे में सच जानते हैं। पूरे विश्वास से ऐसे सवाल पूछने लगे जिनका जवाब रावत नहीं दे सकता। चार पांच सवालों का

उत्तर रावत नहीं सके क्योंकि वे वैसे ही सवाल थे जिनके उत्तर की उपेक्षा उनके नहीं हो सकती।

कुछ देर में रावत चिढ़ गया और शायद समझ भी गया कि उनके साथ खेल हो रहा है। वह बोला, “अरे मादरचोदो, सत्यजीत रे पर सवाल पूछो, चार्ली चैपलिन पर पूछो, अम्बादास की पेंटिंग पर पूछो, रवीन्द्र संगीत पर पूछो. . .फिलिस्तीनी प्रतिरोध कविता पर पूछो. . .”

हम सब हंसने लगे।

हम लोगों ने पूरे प्रसंग को चाहे जितना ‘नॉन सीरियसली` लिया हो लेकिन बलीसिंह रावत की निदेशक मीडिया के पद पर नियुक्ति हो गयी। हमने जश्न मनाया। रावत पर सब अपने-अपने दावे पेश करने लगे। नवीन ने कहा यार मैंने तो तुझे सूट का कपड़ा खरीदवाया और सूट सिलवाया था। मैंने कहा, मैंने तुम्हें टाई बांधना सिखाई थी। बहरहाल रावत बहुत खुश था।

संबंध ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं। नूर अब पूरे साल लंदन में रहती हैं। पहले जाड़ों में हीरो के साथ एक दो हफ्त़े के लिए आ जाती थी और हीरा का कॉलिज खुलने से पहले लौट जाती थी। धीरे-धीरे साल में एक चक्कर लगना भी बंद हो गया और दो-तीन साल में एक बार आने लगी। मैं भी लंदन जाते-जाते थक गया था। अब वहां सब कुछ नीरस था। मैं गर्मियों में श्रीनगर चला जाता था।

धीरे-धीरे सुप्रिया ने नूर की जगह ले ली थी लेकिन सुप्रिया के साथ भी संबंधों में कोई पक्कापन न था। हमेशा लगता था जब पत्नी ही अपनी न हुई तो प्रेमिका क्या होगी। लेकिन सुप्रिया ने हमेशा विश्वास बनाये रखा। कभी जब नूर को आना होता था तो बिना मुझे बताये अपने कपड़े वग़ैरा लेकर अपनी बरसाती में चली जाती थी और कभी नहीं कहती थी कि ये संबंध कैसे हैं? वह मेरी कौन है? नूर कौन है? मैं ये क्यों कर रहा हूं। लगता है कि सुप्रिया को अपार दुख ने सतह से उखाड़ दिया है वह अब जहां है वहां कोई सवाल जवाब नहीं होते।

लंदन और नूर से दूर होने के साथ-साथ मैं हीरा से भी दूर हो गया

हूं। मैंने उसे लेकर जो ख्वाब पाले थे वे छितरा गये हैं। लेकिन हीरा से मेरी बातचीत होती रहती है। हो सकता है नूर से किसी महीने बात न हो लेकिन हीरा से होती ही है। वह चाहे जहां हो, मैं उसे फोन करता हूं। हॉस्टल में था तो वहां ‘काल` करता था। मेरे और उसके बीच सबसे बड़ा विषय तीसरी दुनिया के संघर्ष हैं। उसे राजनीति और अर्थशास्त्र में दिलचस्पी है और मैं पत्रकार होने के नाते इन दोनों विषयों से बच नहीं सकता। ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स` के रेडीकल टीचर्स उसके ‘आइडियल` हैं। वह बराबर उनकी किताबें और लेख मुझे भेजता रहता है। वह जानता है कि मैं कभी वामपंथी राजनीति में था और भी उससे सहानुभूति रखता हूं। वह बताता रहता है नवपूंजीवाद किस तरह संसार के गरीब देशों पर कब्ज़ा जमाना चाहता है। हीरा अपनी शिक्षा, परिवार के उदार मानवीय विचारों, बॉब से दोस्ती और रेडिकल टीचर्स की संगति में काफी इन्किलाबी बन गया है। वह क्यूबा और चीन की यात्रा कर चुका है। मिर्जा साहब, उसके नाना लेबरपार्टी से अपने पुराने और गहरे रिश्ते की वजह से ‘गुलाबी` विचारों को पसंद करते हैं और उन्हें लगता है कि हीरा जवानी के जोश में ‘अतिलाल` है जो समय के साथ-साथ ‘गुलाबी` हो जायेगा।

सुप्रिया के साथ रहते हुए कभी-कभी यह ख्य़ाल आता है कि मुझे यहां सुप्रिया का सहारा मिल गया है। नूर लंदन में क्या करती होगी? पता नहीं मुझे लगता है लेकिन हो सकता है मैं गल़त हूं कि नूर और बॉब की दोस्ती सिर्फ दोस्ती की हद तक कायम नहीं है। दोनों स्कूल में साथ पढ़ते थे फिर कॉलिज में साथ आये। यूनीवर्सिटी साथ-साथ गये। अंग्रेज़ संस्थानों का माहौल ‘वीकली पिकनिक`, ‘नाइट आउट`, ‘पार्टियां डांस`, ‘ड्रिंक्स डिनर` ऐसा कौन है जो इस माहौल में एक बहुत अच्छे आदमी और दोस्त के साथ गहरे और बहुत गहरे संबंध बनाने में हिचकिचायेगा? लंबे जाड़ों और बरफीले तूफान के बाद जब प्रकृति जागती है तो ऐसा लगता है जैसे वीनस की मूर्ति चादर ओढ़े सो रही थी और अचानक उसने चादर फेंककर एक अंगड़ाई ली है। ऐसे मौसम में युवक पागल हो जाते हैं और रंगों के तूफान में अपने को रंग लेते हैं। जाड़ा बीत जाने

के बाद सूखी-सी लगती टहनियों के ऊपर हरे रंग की कोपल जैसी पत्तियां निकलती जिनके रंग हरे होने से पहले कई चोले बदलते हैं और पत्तियाँ हर चोले में मारक नज़र आती है। सड़कें किनारे खड़ी बेतरतीब झाड़ियां इस तरह फूल उठती है कि उन पर से निगाह हटाना मुश्किल होता है। लगता है यह पृथ्वी, पेड़, फूल, रंग, नीला पानी, नीला आसमान सब आज ही बना है। दूर तक फैली हरी पहाड़ियों की गोद में बसे गांवों में बसंत उत्सव मनाये जाते हैं। सेब के बागों में आर्केस्ट्रा बजता है, नृत्य होता है, बियर बहती है, ‘बारबीक्यु` होता है और पूरा माहौल नयी जिंदगी का प्रतीक बन जाता है। पता नहीं इस तरह के कितने वसंत उत्सवों में नूर और बॉब गये होंगे। पता कितनी बार हरे पहाड़ों के जंगली फूलों के बीच ट्रैकिंग की होगी। पता नहीं टेम्स के किनारे कितनी दूर तक टहले होंगे।

नूर और बॉब के रिश्ते या उनके बीच शारीरिक संबंधों की बात जब मैं सोचता हूं तो मुझे गुस्सा नहीं आता। मैं मानता हूं अगर ऐसे संबंध होंगे तो नूर की इच्छा बिना न होंगे। और दूसरी बात यह कि बॉब इतना अच्छा आदमी है कि उसे साधारण की परिभाषा में नहीं बाध जा सकता। अगर यह संबंध है तो विशेष संबंध होगा. . .क्या यह मैं किसी और से भी कह सकता हूं।

बाग बेचने के बाद मोहसिन टेढ़े ने शादी कर डाली। चूंकि मोहसिन टेढ़े नौकरी वगै़रा तो करता न था सिर्फ ज़मीन जायदाद का खेल था। वह भी तेजी से बेच रहा था इसलिए मोहसिन टेढ़े के लिए लड़की मिलना मुश्किल था। ये बात जरूर है कि इलाके वालों, रिश्ते-नातेदारों में अच्छी साख थी। लोग जानते और मानते थे लेकिन अच्छे घरों से इंकार ही हो रहा था। आखिरकार एक मीर साहब जो मेरठ कचहरी में पेशकार थे, की चौथी लड़की के साथ मोहसिन टेढ़े का रिश्ता तय हुआ।

मोहसिन की शादी सीधी-साधी थी। दोनों पक्षों को अच्छी तरह मालूम था कि ‘एडजस्टमेंट` क्यों किया जा रहा है। दहेज वाजिब वाजिब मिला था। रिसेप्शन वाजिब वाजिब था। लड़की इंटर तक पढ़ी थी। घरदारी से अच्छी वाक़िफ़ थी। देखने सुनने में वाजिब वाजिब थी। मोहसिन टेढ़े जानता है कि इससे ज्यादा इन हालात में कुछ नहीं हो सकता। शादी के बाद वह बीवी को लेकर सीधे दिल्ली आ गया। उसने कहा था, यार क्या फायदा पहले घर ले जाऊं? घर में है कौन अम्मां हैं, वो यहीं शादी में आ गयी। बाकी बहनोई साहब ने तो मुकदमा दायर कर दिया है। दूसरे रिश्तेदारों से मेरा मतलब ही नहीं है।

दिल्ली में उसने गुड़गांव के पास किसी सेक्टर में मकान खरीद लिया था। मैंने बहुत समझाया था कि यार इतनी दूर क्यों जा रहे हो। पर वह नहीं माना था। उसका कहना था, “यार मैं रिश्तेदारों से दूर रहना चाहता हूं. . .ये सब मुझे लूटना खाना चाहते हैं। मैं गुड़गांव सेक्टर तेरह में रहूंगा वहां कोई साला क्या पहुंचेगा. . .और फिर वहां सस्ता है और फिर यार कौन-सा मुझे नौकरी करनी है। हफ्ते में एक आद बार दिल्ली चला आया करूंगा और वही सुकून से रहूंगा. . .तुम कभी वहां आकर देखो. . .बड़ी पुरफ़िज़ा जगह है।”


“देखो आदमी सच बोलने के लिए तरसता है। उसकी ये समझ में नहीं आता कि कहां सच बोला जाये? मेरी तो समझ में आ गया कि सच कहां बोलना चाहिए. . .यहीं बोलना चाहिए, यहीं बोलना चाहिए और यहीं बोलना चाहिए. . .” अहमद हंसने लगा।

टेरिस पर चांदनी फैली है नीचे से चमेली की फूलों की तेज़ महक आ रही है। मलगिजी चांदनी में जामो-सुबू का इंतिज़ाम है। तीन पुराने दोस्त ज़िंदगी की दोपहर गुज़ारकर आमने सामने हैं।

“क्या कमजोरी है तुम्हारी।” शकील ने पूछा।

“यार तुम लोग पूछ रहे थे न कि पहले मैंने इंदरानी को छोड़ा था, फिर राजी रतना को छोड़ा। उसके बाद एक रूसी लड़की के साथ रहने लगा. . .मास्को से टोक्यो आ गया तो एक अमरीकी टकरा गयी . . . मैं यार. . .” उसे कुछ नशा आ गया था और जबान लड़खड़ा रही थी।

“तुम्हें नशा ज्यादा हो रहा है।” मैंने कहा।

वह हंसने लगा हां, मैं जानता हूं और ये भी जानता हूं कि कहां नशा होना चाहिए और कहां नहीं. . .डिप्लोमैटिक पार्टियों में नशा होना जुर्म है. . .वहां हम वी.वी.आई.पी को नशे में लाते हैं, उसे खुश करते हैं. . .उसके चले जाने के बाद अपने हाई कमिश्नर साहब को नशे में लाते हैं। ये भी हमारी ड्यूटी होती है. . .जानते हो. . .एक बार मैक्सिको में हमारे एम्बैस्डर एक स्पेशल कोटे वाले आदमी थे और लगता था उन्हें उनके पूरे कैरियर दूसरे तरह के लोगों ने परेशान किया था। अब ‘टॉप बॉस` हो जाने के बाद उनके अंदर बदला लेने की ख्वाहिश बहुत मज़बूत

हो गयी थी. . .तो जब उन्हें चढ़ जाती थी तो ‘उन लोगों` में से किसी को बुलाकर दिल की भड़ास निकाला करता था. . .गाली गलौज करता था और जवाब में हम सब यस सर, यस सर कहते रहते थे। सब जानते थे दस-पन्द्रह मिनट में थककर चला जायेगा या. . .”

“जो बात शुरू की थी वो तो रह ही गयी।”

“हां सच ये है कि औरतें मेरी कमज़ोरी है. . .और ये भी मेरी कमज़ोरी है कि मैं एक औरत के साथ लंबे अरसे नहीं रह सकता. . .और . . .”

“इतनी बड़ी और भयानक बातें इतनी जल्दी एक साथ न बोलो।” मैंने उससे कहा। शकील हंसने लगा।

“ये बताओ कि तुम राजदूत बन रहे हो न?” शकील ने पूछा।

“टेढ़ा सवाल है. . .देखो हमारी मिनिस्ट्री में जो सबसे पावरफुल लॉबी है वह चाहती है कि अब मुझे दिल्ली में सड़ा दिया जाये क्योंकि मेरी जगह उनका एक आदमी राजदूत बन जायेगा। हमारे सेक्रेटरी उन लोगों के दबाव में हैं. . .अब अगर पी.एम.ओ. और कैबनेट सेक्रेटरी दखल दें तो बात बन सकती है. . .मैंने शूज़ा चौहान से बात की है।”

“वाह क्या तगड़ा सोर्स लगाया है. . .वह तो आजकल कैबनेट सेक्रेटरी की गर्ल फ्रेण्ड है।”

“हां यही सोचकर उससे कहा है।”

“फिर?”

“वह तो एम.ई.ए. में भी बात कर सकती है।”

“नहीं उससे काम नहीं चलेगा. . .तुम लोग या और दूसरे लोग एम.ई.ए. के बारे में नहीं जानते. . .वहां अजीब तरह से काम होता है . . .क्योंकि पब्लिक डीलिंग नहीं है. . .प्रेस तक खबरें कम ही पहुंचती हैं इसलिए अजीब माहौल है. . .”

“कुछ बताओ न?” मैंने कहा।

“नहीं यार तुम प्रेस वाले हो।”

“तो तुम ये समझते हो कि मैं चाहूंगा तो स्टोरी छप जायेगी? ऐसी बात नहीं है मेरी जान. . .सरकार के खिलाफ हमारे यहां कुछ नहीं

या कम ही या नपा तुला छपता है।”

फ्तब तो बता सकता हूं।” वह हंसकर बोला, “तुमने जर्मनीदास की किताब महाराजा पढ़ी है?”

“हां।”

“बस उसे भूल जाओगे।”

“नहीं यार।”

“छोड़ो यार छोड़ो. . .ये तुम लोग कहां से लेकर बैठ गये। दिनभर यही सब सुनते-सुने कान पक गये हैं” शकील ने उकता कर कहा।

“तो तुम्हारे मंत्रालय में भी. . .”

“मेरे भाई कहां नहीं हैं. . .अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान. . .कहां ‘करप्शन` नहीं है।

“तो उसके बारे में बात न की जाये?” मैंने कहा।

“जरूर करो. . .मैं चलता हूं. . .यार यहां मैं इसलिए नहीं आया हूं।” शकील बोला, “अहमद ने मुझे आंख मारी।”

“कबाब ठण्डे हो गये हैं।” अहमद ने कहा।

मैंने हांक लगाई “गुलशन. . .”

“तो राजी रतना को तुमने छोड़ दिया?” शकील ने अहमद से पूछा।

“नहीं उसने मुझे छोड़ दिया।”

“कैसे?”

“जब हम मास्को में थे तो एक बड़ी ‘डील` जो मेरी वजह से ही मिली थी, राजी ने मुझे बाहर कर दिया था। पूरे पचास लाख का चूना लगाया था।” अहमद ने कहा।

मेरे अंदर ये सब सुनकर ‘वहश्त` बढ़ने लगी। यार मैं इस दुनिया में इसलिए हूं कि शकील और अहमद जैसे लोगों की बकवास सुनता रहूं? मैंने अपने ऊपर कितनी ज्यादती की है। दसियों साल से मैं इनकी बकवास सुनता आया हूं। खामोश रहा हूं। पर और कर भी क्या सकता हूं? लेकिन कम से कम से मैं मजबूर तो नहीं हूं उनकी बकवास सुनने

के लिए? सुप्रिया अक्सर कहती है कि तुम इन दोनों को ‘टालरेट` कैसे कर लेते हो? मैं पुरानी दोस्ती का हवाला देकर उसे चुप करा देता हूं लेकिन जानता हूं कि यह सही नहीं है। पता नहीं, मेरी क्या कमजोरी है जो मैं इन लोगों से अब तक जुड़ा हुआ हूं। अहमद तो फिर भी ब्यूरोक्रैट है लेकिन शकील अहमद अंसारी ये तो सत्ता का एक पहिया है जो करोड़ों इंसानों को कुचलती आगे बढ़ती चली जा रही है।

“क्या सोच रहे हो उस्ताद?” अहमद ने पूछा।

मैं चौंक गया। सोचा जो सोच रहा हूं सब कह दूं और ये खेल यहीं खत्म हो जाये। लेकिन नहीं। मैंने कहा, “कुछ नहीं यार. . .हीरा की याद आ गयी थी।”

“क्या कर रहा है हीरा?” शकील ने पूछा।

“एशिया पर कुछ रिसर्च का प्रोजेक्ट है।”

“बहुत अच्छा. . .तुम खुशनसीब हो यार. . .हीरा बहुत कामयाब होगा।” शकील ने कहा।

“कमाल का क्या हाल है?” अहमद ने पूछा।

“यार मेरे नक्शे कदम पर चल रहा है। जिला परिषद का चेयरमैन है, जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष है।”

रात घिर आई थी। चांदनी महक गयी थी। मैंने तय किया धीरे-धीरे इन दोनों से पीछा छुटाना है। क्या मैं इनसे अलग हूं? मैंने ऐसा क्या किया है?

“यार ये क्या है प्यारे? इतनी भी कंजूसी ठीक नहीं. . .तुमने खिड़कियों पर पर्दे अब नहीं लगाये हैं?”

मोहसिन टेढ़े हंसने लगा “नहीं यार कंजूसी नहीं. . .कसम खुदा की पर्दे तो रखे हैं. . .लेकिन बस. . .”

चाय लेकर मोहसिन टेढ़े की बीवी आ गयी। हम चाय पीने लगे।

“अच्छा गाड़ी का क्या हुआ? खरीद ली तुमने?”

मोहसिन टेढ़े फिर शर्मिन्दगी वाली हंसी हंसने लगा। उसकी बीवी के चेहरे पर पीड़ा के भाव आ गये।

मोहसिन टेढ़े की शादी को दस साल हो गये हैं। इस बीच उसकी अम्मां गुजर गयी हैं। खानदानी हवेली भी वह बेच चुका है और एक अंदाज़ के तहत उसके पास सत्तर अस्सी लाख रुपये हैं जिनका ब्याज आता है। गुड़गांव में एक और फ्लैट है जो किराये पर उठा दिया है।

शादी के बाद जब मैं एक बार उसके घर आया था तब भी घर में पर्दे नहीं थे। उसने कहा था यार देखो दिन में तो बाहर से कुछ नज़र नहीं आता। रात की बात है। तो रात मैं पहले बत्ती बंद कर देता हूं उसके बाद अपन लेटते हैं, मतलब यार छोटी-सी एहतियात से काम चल जाता है। वैसे पर्दे पांच हजार के लग रहे हैं। अब देखो यार लगवाते हैं,”

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धीरे-धीरे उसकी बीवी मुझसे खुलने लगी थी और जब भी जाता था कोई न कोई मसला सामने आ जाता था। शादी के बाद बीवी को मायके भेजने में भी मोहसिन बड़ी कंजूसी करता था। बीवी जब तक दो-तीन दिन खाना नहीं छोड़ती थी। रो-रोकर अपना बुरा हाल नहीं कर लेती थी तब तक उसे लेकर उसके घर न जाता था।

“भाई साहब देखिये किचन का बल्ब पिछले दो महीने से फ्यूज है। अंधेरे में रोटी डालती हूं। हाथ जल जाता है।” उसने एक बार शिकायत की थी।

“यार मोहसिन तुम पैसा किसके लिए बचा रहे हो? तुम्हारे कोई औलाद है नहीं। ले देके एक बहन है जिनसे तुम्हारा मुकदमा चल रहा है. . .तुम्हारी सारी जायदाद उन्हीं को. . .”

“नहीं यार क़सम खुदा की मैं कंजूसी नहीं करता। यार बस बाज़ार जाना नहीं हो पाता।” वह बोला।

मैंने अपने ड्राइवर को भेजकर दो बल्ब मंगवाये और मोहसिन की पत्नी को दे दिए।

कभी वह शिकायत करती थी कि भाई साहब देखिए राशन पूरा नहीं पड़ता“ मोहसिन का ये कहना था कि यार सलमा बर्बादी बहुत करती है, रोटियाँ बच जाती है, दाल दो- दो दिन फ्रिज में पड़ी रहती है, फेंकी जाती है, और इफ़रात में आ जायेगा तो और बर्बादी होगी।

जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था मोहसिन टेढ़े के पैरों की तकलीफ बढ़ रही थी, वह अस्पताल के चक्कर लगाया करता था, कभी-कभी मुझसे भी सरकारी अस्पतालों में फोन कराता था। बीमारी के साथ- साथ उसकी कंजूसी भी बढ़ रही थी।

एक दिन उसने मुझसे कहा, “यार देखो, तुम्हें तो हर महीने तनख्वाह मिलती है न?”

“हां”

“मुझे नहीं मिलती।”

“अरे यार फ्लैट का किराया आता है. . .ब्याज आता है. . .ये क्या है?”

“साजिद. . .यार मुझे डर लगता रहता है कि मेरा पैसा यार ख़त्म हो जायेगा. . .यार फिर मैं क्या करूंगा।”

“तुम पागल हो।” मैंने कहा।

“सच बताओ यार।”

“तुमने पैसा ‘इनवेस्ट` किया हुआ है. . .वहां से आमदनी होती है. . .अपने ऊपर भी खर्च न करोगे तो पैसे का फायदा?”

“हां यार बिल्कुल ठीक कहते हो।”

मोहसिन टेढ़े यह वाक्य कई सौ बार बोल चुका है लेकिन करता वही है जो उसका जी चाहता है।

रावत कुछ खुलकर तो नहीं बता रहा है लेकिन इतना अंदाज़ा लग गया है कि हालत गंभीर है।

“यार पहले तो मैं समझा कि ठीक है. . .मुझे नौकरशाही की कोई ट्रेनिंग नहीं है। मैं तो पत्रकार रहा हूं. . .इसलिए गल़तियां होती हैं . . . और फिर अंग्रेज़ी भी उतनी अच्छी नहीं है। फ़ाइल वर्क सारा अंग्रेजी में होता है. . .फिर सालों ने मुझे डरा भी दिया था। रावत साहब सरकारी काम है. . .ज़रा सा भी इधर से उधर हो जाता है तो जेल चला जाता है. . .नौकरी तो जाती ही है।”

“तुम्हारी उम्र दूसरे बराबर के अधिकारियों से कम है। तुम एस.टी. कोटे में हो, तरक्की भी जल्दी ही होगी। बहुत जल्दी वह अपने साथ के दूसरे अफसरों से बहुत आगे निकल जाओगे। असली खेल ये लगता है।” मैंने कहा।

“नहीं यार, ऐसा क्यों होगा?” नवीन बोला।

“है क्यों नहीं, कुलीन इस बात को पसंद क्यों करेंगे कि सत्ता उनके हाथ से निकलकर किसी ‘ट्राइबल` के हाथ में जाये।”

“तुम भी तो कुलीन मुसलमान हो।” नवीन हंसकर बोला।

“हां ठीक कहते हो।” मैंने कहा।

“ये बातचीत कुछ ज्यादा ही निजी स्तर पर आ गयी।” सरयू बोला।

“चलो यार रावत को बताने दो।” मैंने कहा।

“देखो भाई हमारे तो ऐसे संस्कार हैं नहीं. . .तुम मेरे दोस्त हो . . .मैं कभी सोचता भी नहीं कि मुसलमान हो. . .जोशी ब्राह्मण है, ये कभी मेरे मन में आया ही नहीं. . .तो मैं ये सब नहीं सोचता लेकिन यहां मतलब मंत्रालय में. . . र वह रूक गया।

“कहो, कहो, इसमें छिपाने की क्या बात है।” सरयू बोला।

“देखो मेरे बॉस ने पहले मुझसे कहा कि आपको फाइल वर्क नहीं आता. . .आप सीख लें. . .मैंने सीख लिया. . .उसके बाद बोले, देखिए इंग्लिश में ही सब कुछ होता है. . .आपकी लैंग्वेज हिंदी रही है. . .खैर मैंने इंग्लिश नोटिंग सीखी. . .अब रोज कोई न कोई गल़ती निकाल देता है. . मैं फाइलों को विस्तार से पढ़ता हूं तो ये ‘कमेण्ट` आ जाता है कि ‘अनावश्यक देरी हो गयी` अगर ठीक से नहीं पढ़ता तो ये लिख देते हैं कि फाइल पढ़ी नहीं गयी। एक ही अफसर नहीं. . .मुझे तो लगता है सब के सब. . .” वह खामोश हो गया। पिछली नौकरी उसने छोड़ दी है। अब कोई और नौकरी मिलेगी नहीं। डायरेक्टर के पद पर वेतन अच्छा मिलता है। सरकारी मकान मिला हुआ है। लेकिन . . .

“देख यार मैं. . .जंगली हूं. . .मेरा पिता भेड़ियों से लड़ते हुए मर गया था. . .मैं साला आदमियों से लड़ते हुए नहीं मर सकता।” रावत गिलास खाली कर गया।

“यही प्राब्लम है. . .मध्यवर्गीय संस्कार नहीं है।” नवीन बड़बड़ाया जो रावत नहीं सुन सका।

पता नहीं ये मध्यवर्गीय संस्कार क्या होते हैं? क्या वही तो नहीं होते जो निगम साहब के हैं। उनके बारे में उड़ती-उड़ती खबरें आती हैं। अब तो लोग कहने लगे हैं कि निगम ने अपने पत्नी को राजाराम चौधरी की रखैल बना दिया है और दोनों हाथों से पैसा बटोर रहा है। शिमला मेंं फ्लैट खरीद रहा है। रामनगर में बड़ा-सा फार्म लिया है। अय्याशी में खूब पैसा उड़ा रहा है। हर शाम एक नयी लड़की के साथ गुजरती है। इस तरह शायद वह राजाराम चौधरी से बदला ले रहा है। दिखाना चाहता है कि वह घाटे में नहीं है। अगर उसकी पत्नी किसी की रखैल है तो वह हर रात एक नयी लड़की के साथ सोता है।

निगम कभी छटे-छमाहे मुझे फोन भी कर देता है और बड़े ‘ऑफर` देता है। जैसे चलो यार जिम कार्बेट पार्क चलते हैं। ‘लैण्ड क्रूसर` ले ली है मैंने, ड्राइवर है। मिनी बार साथ ले लेंगे। नमकीन वग़ैरा साथ होगा। पीते-पिलाते चलेंगे. . .रामनगर में बढ़िया खाना खायेंगे . . .अब इन साले एम.पी., एम.एल.ओ. ने वहां होटल डाल दिए हैं। सब फारेस्ट की लैण्ड पर बनाये हैं। कोई साला कहने सुनने वाला नहीं है। जंगल में घूमेंगे. . .सुबह-सुबह तुम्हें चीता दिखायेंगे. . .उसके इस तरह के आफरों को मैं टाल देता हूं।


जगमग जगमग किसी चीज़ पर आंख ही नहीं टिकती। मौर्या शेरेटन के मुग़ल हाल में सब कुछ चमचमा और जगमगा रहा है। झाड़-फानूस इतने रौशन है कि उससे ज्यादा रौशनी की कल्पना नहीं की जा सकती। चार सौ लोगों को समेटे लेकिन मुगलहाल फिर भी छोटा नहीं लग रहा है। नीचे ईरानी कालीन है जिसमें पैर धंसे जा रहे हैं। दीवारों पर ब्रिटिश पीरियड की बड़ी-बड़ी ओरिजनल पेन्टिंग है। चारों कोने में बार है और सफेद ड्रेस पहने वेटर इधर से उधर डोल रहे हैं। हाल में बीचों-बीच शकील खड़ा है. . .बल्कि मुहम्मद शकील अंसारी, यूनियन कैबनेट मिनिस्टर, सिविल एवीएशन. . .उसने बंद गले का सफेद सूट पहन रखा है जो तेज़ रोशनी में नुमायां लग रहा है। सफेद फ्रेंच कट दाढ़ी, आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा और होंठों पर विजय के गौरव में डूबी मुस्कुराहट. . .

“आज साला रगड़ रगड़ कर नहाया होगा. . .फेशल करायी होगी।” अहमद ने मेरे कान में कहा।

“वैसे जमता है साला।”

“नेता ऐसे ही होते हैं।”

“यहां तो पूरी भारत सरकार मौजूद है।”

शकील को उसके मंत्रालय के ऊंचे अफसर घेरे खड़े हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि मंत्री महोदय किस आदमी से कैसे मिलते हैं। मिनिस्ट्री का सेक्रेटरी टेढ़ी-टेढ़ी आंखों से हर उस आदमी को देखता है जो शकील को बधाई देने जाता है। एक अलग कोने में एम.ई.ए. के सेक्रेटरी और दो ज्वाइंट सेक्रेटरी खड़े हैं उनके साथ कैबनेट सेक्रेटरी और शूजा दीवान खड़ी हैं। होम मनिस्टरी के भी लोग मौजूद हैं. . .कारपोरेशन्स के चेयरमैन, सुप्रीम कोर्ट के जज, जाने-माने एडवोकेट, यूनीवर्सिटियों के वायस चांसलर, बड़े उद्योगपति, कला, संस्कृति, फिल्म और एन.जी.ओ. क्षेत्र के नामी गिरामी लोग, सब देखे जा सकते हैं।

शकील के कान में किसी ने कुछ कहा और वह तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

“लगता है पी.एम. आ रहे हैं”, अहमद बोला।

“पी.एम. का आना तो बड़ी बात है। आमतौर पर यह प्रोटोकाल के खिलाफ भी है।”

‘प्रोटोकाल` धरा रह जाता है जब पावर ही पावर नज़र आती है।

“वो बायीं तरफ देख रहे हैं सोफे पर बैठे दाढ़ी वाले।”

“हां यार।”

“शकील ने पूरे मुल्क के प्रभावशाली मौलवियों को बुला रखा है। इनके हाथ में है मुस्लिम वोट. . .यही वजह है जो प्रधानमंत्री आ रहे हैं।

कुछ देर बाद सिक्युरिटी के घेरे में पी.एम. के साथ-साथ शकील अंदर आया। दो भूतपूर्व प्रधानमंत्री पी.एम. की तरफ बढ़े, दो चार पुराने समाजसेवी भी आगे बढ़ने लगे। कैमरा मैन धड़ाधड़ फ्लैश चमकाने लगे। वेटर ट्रे लेकर पी.एम के पास गया पर उन्होंने हाथ उठाकर इंकार कर दिया। भरतनाट्यम नर्तकी प्रधानमंत्री के पास पहुंच गयी और उनसे गले मिल ही ली। प्रधानमंत्री के बूढ़े और जर्जर चेहरे पर संतोष और खुशी की छाया तेज़ी से आई और चली गयी। चार-पांच मिनट के बाद प्रधानमंत्री चले गये।

“चलो अब साले के पास चलते हैं।”

“क्या करोगे यार. . .दूसरों को मौका दो. . .हम तो मिलते ही रहते हैं”, मैंने कहा।

“हाय अहमद. . .” मैंने देखा कि शूजा दीवान ने अहमद की गर्दन झुकाकर उसके गाल पर प्यार जड़ दिया। अहमद ने भी शिष्टतावश उसका गाल चूम लिया।

मैंने अहमद की तरह देखा। पचपन साल की उम्र में भी वह उतना ही बड़ा ‘किलर` लगता है जितना पच्चीस साल की उम्र में लगता था। उसके घुँघराले बाल, चेहरे पर झलकता गुलाबी रंग, क्लीन शेव, बहुत कायदे से पहने गये शानदार विदेशी कपड़े और जानलेवा मुस्कुराहट कम से कम चालीस पार कर चुकी शूजा दीवान को दीवाना बना देने के लिए काफी है।

मैं धीरे से खिसक गया। लगता था शूजा उसके साथ कुछ बात करना चाहती है। मैंने देखा अहमद ने शूजा की कमर के गिर्द हाथ डाल दिया है और वह बहुत प्रसन्न है। दोनों पता नहीं किससे मिलने जा रहे हैं। मैं अखबार वालों की टोली में आ गया। अचानक सरयू दिखाई दिया।

“ओहो. . .चलो तुमसे मुलाकात तो हुई।”

“यार. . .क्या बताऊं. . .” वह शर्मिन्दा सा होकर बोला “हमारे सम्पादक महोदय की “लाइट लेट हो गयी है. . .उन्होंने मुंबई से फोन करके कहा कि तुम वहां चले जाओ और अखबार की तरफ से ‘बुके` दे दो. . .ये भी कहा कि यह बहुत ज़रूरी है।”

“ज़रूरी तो है ही है यार. . .जहां पी.एम. आये हों. . .वह जगह।”

वह मेरी बात काटकर बोला “साजिद मुझे इस सबसे घृणा है”, मैंने देखा उसे कुछ चढ़ चुकी थी।

“छोड़ो यार इन सबको यहां बैठो” मैं उसे कोने में सोफे पर घसीट लाया।

“बहुत दिनों के बाद मिले हो. . .क्या ज़माना था यार काफी हाउस वाला. . .रोज़ शाम हम लोग मिला करते थे।”

“हां. . .वो हमारी ज़िंदगी का सबसे शानदार दौर था। हालांकि पैसे नहीं होते थे। पेट खाली रहता था, महीने में एक चप्पल घिस जाती थी लेकिन फिर भी. . .”

“और आजकल क्या हो रहा है? कोई कह रहा था तुम्हारा पांचवां संग्रह आ रहा है?”

“हां. . .लेकिन तीन-चार महीने लग जायेंगे।”

“नाम क्या रखा है।”

“कुछ बताओ यार. . .अभी तक फाइनल नहीं किया है।”

“इन्हीं दिनों कविता छपी है ‘चुप की आवाज़` यही रख दो संग्रह का नाम।”

नीले सूट में एक अधिकारी आया बोला, “सर आपको साहब के साथ ही जाना है।” उसने कहा और तेज़ी से चला गया। मेरे जवाब का इंतिज़ार भी नहीं किया।

“अब देखो. . . ये बदतमीजी है या नहीं?” सरयू बोला।

“छोड़ो यार. . .ये लोग हमें हमारी जिंदगी जीने ही नहीं देते। टालो. . .कविता संग्रह के नाम की बात हो रही थी।”

“हां, ‘चुप की आवाज` पर सोच भी रहा हूं. . .अच्छा यार बढ़िया खबर यह है कि मेरी कविताओं का फ्रेंच अनुवाद पेरिस से छप गया है।” सरयू ने बताया।

“अरे वाह. . .अनुवाद किसने किया है?”

“लातरे वाज़ीना. . .वहां हिंदी पढ़ाती है।”

पार्टी अपने ज़ोर पर आ गयी थी लेकिन शकील को छोड़कर सभी महत्वपूर्ण लोग जा चुके थे। शकील अपने मंत्रालय के अधिकारियों के सुरक्षा घेरे में अब भी लोगों से मिल रहा था।

“रावत का क्या है?”

“यार उसका मामला बड़ा अजीब हो गया है?”

“कौन? उसके बॉस?”

“हां यही समझ लो. . .चार पांच बड़े खूसट, चंट और चालाक . . .बल्कि जातिवादी किस्म के ब्राह्मणों ने उसे घेर रखा है. . .मैं भी यार ब्राह्मण हूं. . .लेकिन उस तरह के ब्राह्मणों से भगवान बचाये।”

“क्या हुआ?”

“यार सब मिलकर उसके साथ खतरनाक किस्म का खेल खेल रहे हैं . . .उस पर इतना काम लाद दिया है जिसे चार आदमी भी नहीं कर सकते हैं. . .जब काम पूरा नहीं हो पाता तो उस पर लिखित आरोप

लगाते हैं कि आप ‘अयोग्य` हैं. . .जबकि वह नौ नौ बजे रात तक दफ्तर में बैठा रहता है. . ..जल्दी में वह कोई काम कर देता है तो उसकी गल़ती पकड़ते हैं और उसके लिए दफ़्तरी डांट-फटकार वगै़रा होने लगती है. . .

“यार रावत को चाहिए था कि इन सालों को पटा लेता।”

“उसे तुम जानते हो. . .वह दो ही शब्द जानता है अच्छा और बुरा. . .उसकी नज़र में जो बुरा है उसके साथ वह प्यार, मुहब्बत, सम्मान का ढोंग नहीं रचा सकता. . .।”

“नवीन का क्या हाल है?”

“सरकारी नौकरी में रावत जितना ‘अनफिट` है, नवीन उतना ही ‘फिट` है।” सरयू हंसकर बोला।

“तुमसे मुलाकात होती है?”

“हां कभी-कभी आफिस चला आता है. . .घण्टों बैठा गप्प मारता रहता है।”

“कुछ लिख रहा है।”

“पन्द्रह साल से उसने कुछ नहीं लिखा. . .अब तो सिर्फ जीभ के बल पर दनदनाता है। कितनी बार कहा, यार नवीन कुछ लिखो। तुम इतनी अच्छी फिल्म समीक्षाएँ करते थे, कविताएं लिखो. . .बस हां-हां करके टाल देता है. . .ऑफिस के कायदे कानून का जानकार बन गया है, कहां से कितना पैसा मिल सकता है, यह उसकी उंगलियों पर रहता है।”

किसी दिन आ जाओ तुम लोग तो टेरिस पार्टी रहे।”

“तुम बताओ. . .तुम्हारा क्या हाल है?”

“अखबार का तुम जानते ही हो. . .यहां मेरा होना न होना बराबर है. . .न तो वे लोग मुझसे काम लेते हैं न मैं करता हूं. . .बस यही सोचता रहता हूं कि काम क्या किया, जीवन क्या जिया. . .बर्बाद किया. . .”

“नहीं यार तुम. . .” वह रुक गया। अहमद हमारी तरफ आ रहा है।

“यार अब तो यहां से खिसकना चाहिए।”

“शकील के साथ चलना है। कह रहा था तुम दोनों धोखे से भी यहां खाना न खाना। मैंने लखनऊ से काकोरी कबाबची बुलवाया है।”

“वाह साले की ठसकों में तरक्की हो रही हैं”, अहमद बोला।

“अब तो दुनिया के किसी भी कोने से सीधे माल मसाला आया करेगा. . .एयर इंडिया अपने मिनिस्टर्स की अच्छी देखभाल करता है। योरोप से चेरी आयेंगी. . .पेरिस से ‘चीज़` आयेगी. . .मास्को से बोद्का. . .

“यही नहीं . . .ये तो सब हाथी के दांत हैं. . .तुम तो जानते ही होंगे. . .नये एयर क्राफ्ट खरीदे जाने हैं।”

बेडरूम में अखबारों का ढ़ेर पलटने लगा। मंत्री मण्डल की हेडलाइन है, दूसरी सेकेण्ड लीड क्रिकेट मैच में हमारी जीत की है, उसके बाद योरोपियन यूनियन ने सौ मिलियन यूरो पावर जनरेशन के लिए आफर किया है. . .सब अच्छी खबरें हैं। आजकल हम लोगों को मैनेजमेण्ट की हिदायत है कि कम से कम पहले पेज पर अच्छी खबरें छापें। एडीटर और न्यूज़ एडीटर इसका पूरा ध्यान रखते हैं। कहीं धोखे से यह न छान देना कि सात प्रांतों में अकाल की स्थिति है। कहीं भ्रष्टाचार की खबरें न छप जायें पहले पृष्ठ पर. . .हां तीसरे पेज पर अपराध की बहार है. . .लौट फेर का सब अख़बार यही कर रहे हैं . . .ये क्यों निकल रहे हैं? इसका उद्देश्य क्या है? ये अपने को नेशनल डेली कहते हैं। ‘नेशन` इन खबरों में कहां है? अख़बार के दफ्तर में मैं ऐसी बहसें बहुत कर चुका हूं पर कोई नतीजा नहीं निकला। अगर ज्यादा कुछ करूं तो नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। यही अच्छा है कि उस ज़माने की नौकरी है जब परमानेंट नौकरी दी जाती थी। आजकल की तरह ‘काण्ट्रेक्ट` वाली नौकरी होती तो कब का निकाल बाहर किया जाता। मैनेजमेण्ट जानता है कि कुछ साल की बात है। साला रिटायर होकर घर बैठ जायेगा। इससे पंगा क्यों किया जाये। तीस साल की नौकरी में इसके भी सम्पर्क बन गये हैं। मंत्रियों के फोन आयेंगे। पचड़ा होगा।

इससे अच्छा है पड़ा रहने दो। सनकी है। सनक में निकल जाता है ऐसे इलाकों में जहां साधारण रिपोर्टर तक जाना न पसंद करेगा। ठीक है थोड़ा खिसका हुआ है। पर कभी-कभी ऐसे लोगों की भी ज़रूरत पड़ जाती है।

सुप्रिया की याद आ गयी। उस प्रसंग को निपटे भी कम से कम पांच साल हो गये हैं। लगता है संबंधों के बनने के पीछे न कोई कारण होता है। और न बिगड़ने की कोई वजह होती है। सुप्रिया से मेरे संबंध बिगड़े भी तो नहीं। बस ठण्डे पड़ते गये। हो सकता है उसका दुख भारी हो गया हो। हो सकता है मुझे ऊब गयी हो, हो सकता है इसकी निरर्थकता का एहसास हो गया हो या हो सकता है सेक्स की ख्वाहिश ही कम होती चली गयी हो. . .लेकिन अब भी मैं उसे फोन कर लेता हूं। वह भी कभी काल करती है। बहुत सालों से हम मिले नहीं हैं लेकिन अगर मिलेंगे तो हो सकता है हमारी बीच शारीरिक संबंध भी बन जाये। मेरे ख्याल से सुप्रिया अब पैंतालीस की होगी और मैं पचास पार कर गया। पहले जैसा जोश और वलवला तो नहीं है लेकिन फिर भी मैं सुप्रिया की प्रतीक्षा करता हूं. . .सोचता हूं जब तक कर सकूँ अच्छा ही है।

सुबोध कुमार चट्टोपाध्याय यानी अपने पिता के स्वर्गवास के बाद सुप्रिया की मां अकेली हो गयी थीं और किसी भी कीमत पर अलीमउद्दीन स्ट्रीट वाले फ्लैट न छोड़ना चाहती थी। इसलिए सुप्रिया को कलकत्ता जाना पड़ा था। वहां उसे एक वीकली में नौकरी मिल गयी थी।

आज इस वक्त उसकी याद आई तो आती चली गयी। दस-बारह साल बहुत होते हैं। एक बज चुका है। सुप्रिया को कलकत्ता फोन नहीं किया जा सकता वह आफिस में होगी लेकिन हीरा को लंदन फोन किया जा सकता है। अभी लंदन में सुबह होगी।


इतने सालों में मेरा शहर बहुत नहीं बदला है। हां, पुरानी मण्डली बिखर गयी है। कलूट नहीं रहे। मुख्त़ार ‘एलकोहलिक` हो गया। सुबह डेढ़ पाव दारु पीकर चचा के होटल आ जाता है और दोपहर तक अखबार पढ़ा करता है, दोपहर को खाना खाकर सो जाता है। शाम फिर शराब शुरु हो जाती है। अब उसका पार्टी से कोई ताल्लुक नहीं है। यूनियनें सब ठप्प हो गयी हैं। अतहर की लखनऊ में नौकरी लग गयी है। वह यहां कम भी आता है। उमाशंकर ने आटा चक्की खोल ली है। पार्टी में अब भी हैं और जितना हो सकता है सक्रिय रहते हैं। कामरेड आर.के. मिश्रा अब भी पार्टी सेक्रेटरी हैं। बूढ़े हो गये हैं। दांतों में बड़ी तकलीफ रहती है। पंडित दीनानाथ गांव जाकर रहने लगे हैं। शहर बहुत कम आते हैं। सूरज चौहान ने पार्टी छोड़ दी थी। कामरेड बली सिंह का स्वास्थ्य बहुत गिर गया है। दिल के दो आपरेशन हो चुके हैं। ‘आबरु` बरेलवी केवल प्रैक्टिस करते हैं। साम्प्रदायिक पार्टी ने हिन्दू के नाम पर जातिवादी दलों ने जातियों के नाम पर अपने वोट बैंक बना लिए हैं।

मैं मकान की मरम्मत, देखभाल, टैक्स के नाम पर इतना पैसा भेज देता हूँ। घर में खाना पकाने वाला बुआ का लड़का भी मल्लू मंजिल में आ गया था। मजीद अपनी पत्नी अमीना और आधा दर्जन बच्चों के साथ रहता है।

केसरियापुर वाले चौरे में रहमत का छोटा बेटा अशरफ रहता है। रहमत को गुजरे एक ज़माना हुआ। वहां खेती बटाई पर ही होती है। पहले सारा अनाज घर आ जाया करता था और खाला वगै़रा के काम आता था। अब बेच दिया जाता है और अशरफ उसे पैसे से मल्लू मंजिल की

मरम्मत वगै़रा करा देता है। गुलशन अक्सर बड़बड़ाता रहता ‘अरे एक बोरा लाही तो आ ही सकती है. . . दो मन अरहर आ जाये तो यहां साल भर चले।` मैं उसे कभी-कभी उसे केसरियापुर भेज भी देता हूं और वह अपने हिसाब से ग़ल्ला ले आता है।

ऐसा नहीं है कि अपने वतन में अब मैं बिल्कुल अजनबी हो गया हूं। जब जाता हूं पुराने परिचित और नये लड़के मिलने आ जाते हैं। मैं भी कलक्ट्रेट का एक चक्कर मार लेता हूं। पुराने लोग मिल जाते हैं। ताज़ा हालात की जानकारी हो जाती है। चूंकि शहर में सभी जानते हैं कि मैं ‘द नेशन` में हूं इसलिए कभी-कभी छोटे-मोटे काम भी बता देते हैं जिन्हें मैं कर देता हूं।

अगर मैं चाहूं तो वहां बराबर जा सकता हूं लेकिन हर बार वहां जाकर तकलीफ होती है। गुस्सा आता है। दुख होता है। निराशा होती है। ऐसा नहीं है कि इस तरह के छोटे शहर या कस्बे मैंने देखे नहीं हैं। उम्र ही गुज़री रुरल रिर्पोटिंग करते करते। देश का शायद ही कोई ऐसा ग्रामीण क्षेत्र हो जो न देखा हो। लेकिन इस शहर में आकर दुख इसलिए होता है कि मैंने चालीस साल पहले एक छोटा, गरीब पर साफ-सुथरा शहर देखा है जहां सिविल सोसाइटी अपनी पूरी भूमिका निभाया करती थी। आज यह एक गंदा, ऊबड़ खाबड़, सड़कों पर कूड़े के ढ़ेर और गड्ढ़ों वाला एक ऐसा शहर बन गया है जहां सिर्फ पस्ती दिखाई देती है। जो नयी इमारतें बनी हैं वे भी दस-पन्द्रह साल में बूढ़ी और बेढंगी लगने लगी हैं। क्योंकि ठेकेदारों और सरकारी कर्मचारियों ने इतना पैसा खाया है कि जिसकी कोई मिसाल नहीं दी जा सकती। नगरपालिका की खूबसूरत इमारत के अहाते में सड़क की तरफ दुकानें बना दी गयी हैं जिसके कारण सौ साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत छिप गयी है। इस इमारत की भी हालत खराब है। कहा जा रहा है इसे गिराने की बात चल रही है। जिला अस्पताल साफ-सुथरा हुआ करता था अब वह गंदगी का अड्डा है और मरीज़ों की भीड़ लगातार डाक्टरों की प्रतीक्षा करती रहती है जो प्राइवेट क्लीनिकों के काम करते हैं। सरकार स्कूलों की अंग्रेज़ों के ज़माने में बनी इमारतों का हाल बेहद खराब है। रख रखाव की बात छोड़

दें, फुलवारी और लान को जाने भी दें तो इमारत का प्लास्टर गिर रहा है। दसियों साल से पुताई नहीं हुई है। यह देखकर विश्वास नहीं होता कि चालीस साल पहले यह एक ‘वेलमेनटेण्ड` और खूबसूरत स्कूल हुआ करता था। सड़कों पर कूड़े के बड़े-बड़े ढेऱ लगे रहते हैं और नालियां नाले कीचड़, गंदगी, मच्छरों से बजबजाते रहते हैं। कहते हैं नगरपालिका में जब भी ‘ड्रेनेज सिस्टम` बनाने की बात होती है दो गुटों में लड़ाई हो जाती है और उसे मंज़ूरी नहीं मिल पाती।

आबादी बेहिसाब बढ़ी है। गांवों में अपराध और जतीय तनाव इतना ज्यादा हो गया है कि बड़ी संख्या में लोग शहर आ गये हैं। इसके साथ रिक्शों की संख्या बढ़ती चली गयी है। शहर के किनारों पर जो नयी बस्तियाँ बनी हैं उनमें कलेक्ट्रेट के पास बनी धनवान वकीलों और व्यापारियों की कोठियों के अलावा दसियों ‘सल्म एरिया` बन गये हैं। बच्चे-पक्के मकान, अधूरे मकान, गड्डमड्ड मकान, पतली-पतली गलियां, नालियां, कूड़े के ढेऱ और गलियों में बेहिसाब गऱीब बच्चे नज़र आते हैं। मोहल्ले की गलियां कुछ पक्की हो गयी हैं जिन्हें विधायकों ने अपनी निधि से इन्हें पक्का कराया है। पता नहीं विधायकों और सांसदों की निधि सड़कों पर क्यों नहीं लग सकती?

पुराने प्राइवेट कालिजों की मैनेजिंग कमेटियों पर उन लोगों ने कब्ज़ा जमा लिया है जिन्होंने अपराध के माध्यम से व्यापार में मुनाफा कमाया था और अब अपनी सामाजिक हैसियत बना रहे हैं। ग्राम पंचायतों और जिला पंचायत पर दंबगों का कब्ज़ा है। राजनीति अपराधियों के हाथ में खिलौना बन गयी है। हर जाति के अपने-अपने गुण्डे, अपराधी और बदमाश हैं जिनका जाति विशेष में बड़ा सम्मान होता है। जिसने जितनी हत्याएं की हैं उसका पद उतना ऊंचा समझा जाता है। ‘आबरु` बरेली ने एक बार बताया कि उनके पास कत्ल का एक केस आया। कातिल पुराना हत्यारा और अपराधी था। उससे वकील साहब ने पूछा ‘तुमने क्यों गोली चलाकर किसी अजनबी को मार डाला`। उसने जवाब दिया वकील साब देखना चाहता था कि दोनाली चलती भी है या नहीं।` मतलब यह कि अपराध करना अपराध नहीं है। हर चीज़ का पैसा तय

है। एफ.आई.आर. बदलना है, गवाह तोड़ने हैं, फाइल में कागज़ लगवाना है, तारीख बढ़वानी है, सम्मन तामील कराना है या नहीं कराना, बड़े साहब को पैसा पहुंचाना है। बताया गया कि कुछ बड़े साहब तो दोनों पार्टियों को बुला लेते हैं और दो टूक कहते हैं ये फैसला लिखवाना हो तो इतना, यह लिखवाना हो तो इतना। अब यहां पैसे का खेल शुरु हो जाता है। जो धनवान है वह जीत जाता है। यही वजह है कि अगर किसी चीज़ की ‘वैल्यू` बढ़ी है तो वह पैसे की। कैसे आता है? किसी तरह आता है? ये सवाल ही नहीं बचे। सवाल यह है कि जल्दी से जल्दी कितना आता है।

रात के अंधेरे में बिस्तर पर लेटकर कभी-कभी ख्य़ाल आ जाता है कि इतना जीवन गुज़ारा क्या किया? मतलब क्या करना चाहता था और क्या किया? लेखक बनना चाहता था। अगर लेखक ही बन गया होता तो कुछ लिख-लिखाकर संतोष हो जाता। वह भी नहीं हो पाया। पत्रकार बन गया, लेकिन किया क्या? ग्रामीण क्षेत्रों के रिपोर्टें छपवाई, पर उनसे क्या हुआ? एक ज़माना था जब सोचता था कि पूरा संसार बदल जायेगा। अच्छा हो जायेगा। अब लगता है पूरा संसार और ज्यादा बिगड़ गया है। पहले सोचता था पूंजी का दबाव कम होगा. . .आदमी राहत की सांस ले पायेगा. . .पर हुआ इसका उलटा. . .सोचता था एशिया के देश खुशहाल होंगे. . .साम्राज्यवाद की गिरफ्त से छूटे देश आगे बढ़ेंगे। लेकिन ऐसा भी नहीं दिखाई पड़ता। देश में क्या है आज? तरक्की और प्रगति के आंकड़े किसकी सम्पन्नता दर्शाते हैं क्योंकि बहुसंख्यक जनता तो उसी तरह चक्की के पाटों के बीच है जैसे पहले थी और सोने पर सुहागा यह कि धर्मान्धता और जातीयता ने मुद्दों को ढांक लिया है। अब सब कुछ साम्प्रदायिकता, जातीयता, प्रांतीयता के आधार पर नापा जाता है। यही वजह है कि मुख्य मुद्दों पर कोई बात नहीं करता। लोकतंत्र का विकास इस तरह हुआ कि आम आदमी की आवाज़ ज्यादा कमज़ोर पड़ी है। आज चुनावी लेख पैसा, सम्प्रदाय, जाति का खेल बन गया है। ऐसे हालात में क्या किया जा सकता है? मैं क्या करूं? कुछ न करने से यह अच्छा है कि कुछ किया जाये, चाहे उसमें कमियां हों, चाहे गल़तियां हों,

चाहे ‘लूपहोल` हों, लेकिन कुछ किया जाना चाहिए। क्या? क्या कोई बना बनाया रास्ता है? कोई राजनैतिक दल, कोई विचारधारा?

“यार ये खेल तो तुम खतरनाक खेल रहे हो”, मैंने अहमद से कहा।

“खतरा तो कुछ नहीं. . .बस थोड़ी दिक्व़फ़त होती है”, वह बोला और शकील हंसने लगा।

“इससे संभल नहीं रही है”, शकील ने आंख मारी।

“बात सीरियस है यार. . .अबे तुझे मालूम है वह कैबनेट सेक्रेटरी की गर्लफ्रेण्ड है”, मैंने कहा।

“ये कौन नहीं, पूरी सरकार जानती है”, अहमद ने कहा।

“उसे पता चल गया तो तुम्हारा क्या होगा ?”

“क्या वो उसे सती-सावित्री मानता है?”

“फिर वही बेतुकी ‘लाजिक`. . .अरे यार ‘इगो` भी तो होता है

“देखो, मेरे सामने और कोई रास्ता है नहीं. . .मैं ये मानता हूं कि मेरी ज़िंदगी में हमेशा औरतें काम आयी हैं. . .और ये भी मानता हूं कि अब मतलब पचपन साल का हो जाने के बाद. . .या समझो. . . चार पांच साल बाद मेरी यू.एस.पी. खत्म हो जायेगी. . .समझे।”

हम तीनों हंसने लगे।

“शकील से कहो”, ये कुछ करेगा।“

“यार मेरी मिनिस्ट्री की बात होती तो जो कहते कर देता. . .पर मामला एम.ई.ए. का है”, वह बोला।

“कहीं से दबाव डालो।”

“मिनिस्टर तो उल्लू का पट्ठा है. . .सेक्रेटरी के आगे उसके एक नहीं चलती. . . वह क्या करेगा?”

“देखो. . .बात साफ है. . .शूज़ा दीवान मेरे बारे में कैबनेट सेक्रेटरी से बात करेगी. . .उनकी बात मेरा सेक्रेटरी टाल नहीं सकता. .यार मैं ‘एम्बेस्डर` हो जाऊंगा तो तुम लोगों को भी ऐश करा दूंगा. . .

वैसे इस सरकार का कोई भरोसा नहीं है. . .जल्दी करना चाहिए।”

“सरकार की तुम फिक्र न करो. . .चलेगी. . .”, शकील बुरा मान कर बोला।

“ठीक है भई. . .

तो अब पोज़ीशन क्या है?”

“मैं शूज़ा से मिलता हूं. . .अभी तो मैंने कुछ कहा नहीं है।”

“कैसी है?”

“अरे यार खूब खेली खाई है. . .अब तुम समझ लो. . .करोड़ों की प्रापर्टी बनाई है इसने. . .और बस वैसे ही. . .इधर का माल उधर करने में।”

“तो आगे क्या करोगे?” मैंने पूछा।

“यार ये इस काम में माहिर हैं. . .अपने आप सेट कर लेगा। ये चाहे तो कोई भी औरत इसके लिए ख़ुदकुशी कर सकती है”, शकील ने कहा।

“ये न कहो यार. . .औरतों ने ही इसे चूना लगाया है. . .”

“इसने भी तो चूना लगाया है. . .बल्कि इसने इम्पोरटेड चूना लगाया है”, वह हंसने लगा।

“तीन साल का टिन्योर ‘पोस्टिंग` होती है न एम्बेस्डर की?”

“हां. . .तीन साल. . .”

“तुम लोग भी जिस तरह ‘टैक्स पेयर` का पैसा बरबाद करते हो वह ‘क्रिम्नल` है”, मैंने अहमद से कहा।

“अब तुम कहते रहो. . .उससे क्या होता है. . .ये तो साले तुम अपने अखबार में भी नहीं लिख सकते” अहमद ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया।

“हां जानता हूं. . .ये सब अखबार में नहीं लिख सकता. . .अखबार में ये भी नहीं लिख सकता कि राष्ट्रपति तीन सौ कमरे के पैलेस में क्यों रहता है? हज़ारों एकड़ उपजाऊ जमीन पर बड़े-बड़े लॉन और मुगल़ गार्डेन बनाने की क्या ज़रूरत है. . .करोड़ों लोग लगातार अकाल, बाढ़ और सूखे से मरते रहते हैं और राजधानी में बारह महीने शहनाई बजती रहती है”, मैंने कहा।

“ये रूरल रिपोर्टिंग से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. . .जो तुम चाहते हो वो तो समाजवादी देशों में भी होता है. . .देखो यह तो देश के गौरव का सवाल है, प्रतिष्ठा का सवाल है, सम्मान की बात है. .हमें इस संसार में रहना है तो यहां. . .”

मैं शकील की बात काटकर बोला “ये बताओ ये देश किसका है?”

“सबका है।”

“उसका भी है जो अकाल में मर रहा है. . .उसका भी जो बाढ़ में बह गया. . .उसका भी जो. . . अगर यह देश उनका भी है तो उन्हें क्या मिल रहा है जिनका देश है. . .बहुसंख्यक जनता।”

“इन सब बहसों से कुछ नहीं होगा। अहमद बोला “चलो . . .खाना लगवाओ।”

शिप्रा को मेरे सख्त़ निर्देश हैं कि जब भी कोई मुझसे मिलने आये, उसे आने दिया जाये। लोग जानकारियों का ख़ज़ाना हैं और पता नहीं किसके पास क्या मिल जाये। मैंने यह भी कह रखा है कि ये सवाल भी न किए जायें कि क्या काम है? और कहां से आये हैं? मेरे ख्याल से ये सवाल मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हैं। आदमी होना अपने आप में बहुत से सवालों का जवाब है।

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आफिस में मैं जब तक रहता हूं मिलने वाले लगातार आते रहते हैं। दूरदराज इलाकों से आये लोग वहां के हालचाल बताते हैं मैं जानता हूं कि जिस तरह मैं अखबार में सब कुछ नहीं लिख सकता उसी तरह दूसरे अखबार भी बहुत कुछ नहीं छाप सकते। इसलिए आज भी जानकारी विश्वस्त जानकारी का सूत्र मनुष्य ही है। संचार क्रांति के इस युग में आदमी से आदमी का मिलना उतना ही ज़रूरी है जितना हज़ारों साल पहले था।

दूरदराज़ इलाकों से लोग, छात्र, स्वतंत्र लेखन करने वाले पत्रकार, एन.जी.ओ., राजनैतिक कार्यकर्ता, संगठनों और यूनियनों के लोगों से मिलता रहता हूँ। अखबार के दूसरे वरिष्ठ लोग यह देखकर मुंह बनाते हैं और ऐसी अटकलें लगाते हैं कि मेरा बड़ा मनोरंजन होता है। कहते हैं अली साब चुनाव लड़ना चाहते हैं या कोई कहता है अपनी पार्टी बनाना चाहते हैं। एक अफवाह यह भी उड़ाई थी कि सरकार में कोई बड़ा पद प्राप्त करना चाहते हैं। बहरहाल मैंने इनमें से किसी बात का खण्डन नहीं किया।

जहां तक अखबार की राजनीति मतलब अन्दरुनी उठा-पटक वाली राजनीति का सवाल है उससे मैं बहुत दूर हूं। पक्की नौकरी है कोई निकाल सकता नहीं। तरक्की मुझे चाहिए नहीं क्योंकि वह मेरे ख्याल से अर्थहीन है। मैं अगर एसोसिएट सम्पादक के रूप में रिटायर होता हूं या चीफ एडीटर के रूप में तो उससे क्या फ़र्क पड़ता है? मानता हूं कि अपना संतोष और अपने हिसाब से अपनी प्रसांगिकता से बड़ी कोई चीज़ नहीं है।

“आपको कल प्रधानमंत्री के साथ श्रीनगर जाना है”, शिप्रा ने ऑफिस में घुसते ही मुझे बिग-बॉस का आदेश सुना दिया।

“क्यों क्या और कोई नहीं है।”

“बड़े बॉस मिनिस्टर फॉर एक्सट्रनल अफेयर्स के साथ चीन गये हैं, त्रिवेदी जी छुट्टी पर हैं।”

“हां तो अब मैं ही बचता हूं. . .ठीक है पी.एम. ऑफिस फोन करके प्रोग्राम पूछ लो। घर फोन करके गुलशन से कहो सामान पैक कर दे और ड्राइवर से कह दो कि “लाइट टाइम पर घर जा जाये।”

“मैंने यह सब काम कर दिए हैं मिस्टर अली. . .ये देखिए प्रोग्राम. . .”, वह बोली।

“ओ गॉड शिप्रा. . .इतनी स्मार्ट नेस. . .तुम्हें मेरे जैसे आदमी की सेक्रेटरी नहीं किसी मल्टीनेशनल कारपोरेशन के सी.ई.ओ. की सेक्रेटरी होना चाहिए”, मैंने कहा और वह हंसने लगी। उसके सफेद दांत

गुलाबी होंठ। फिर मैंने सोचा कि वह बहुत सुंदर है. . .ताज़ा है. . .ताज़गी उसके व्यक्तित्व से पानी की गरम फुहार की तरह बरसती रहती है. . .वाह इस उम्र में खूबसूरती को ‘एप्रीशिएट` करने का ये जज्ब़ा. . .सच पूछा जाये तो पचास साल का हो जाने के बाद ही यह पता चलता है कि औरतें कितनी सुंदर होती हैं उससे पहले तो आदमी जल्दी से होता है। सुंदरता को देखते और सराहने के लिए वक्त चाहिए, धैर्य चाहिए, अनुभव चाहिए, परिपक्वता चाहिए. . .कहीं ये न हो कि तुम बुढ़ापे में शायरी शुरू कर दो. . .।

प्रधानमंत्री के साथ श्रीनगर गया ऊब और निरर्थकता का भाव लेकर लौट आया। सोचा कि क्या दूसरे पत्रकारों को भी यही लगा होगा? हो सकता है लगा हो लेकिन जिस तरह मैं यह सब लिख नहीं सकता, कह नहीं सकता उसी तरह वे भी मजबूर होंगे। यह भी हो सकता है कि अपना महत्व बनाये रखना जरूरी होता है।


मेरी टेरिस पार्टी में एक मेम्बर नहीं है। उसका फोन आया है कि वह बस आ ही रहा है। शकील के इसरार पर हम शुरू कर चुके हैं। गुलशन कबाब ले आया है।

“यार ये अहमद कह रहा था कि उसे दिल्ली पेरिस-दिल्ली दो कम्पलिमेण्ट्री टिकट दिला दूं।”

“क्यों?”

“शूजा के साथ एक हफ्ते को पेरिस जाना चाहता है।”

“लगता है अभी पूरी तरह काबू में नहीं आई है।”

“वो तो जो है जो है. . .मैं परेशानी में पड़ गया हूं।”

“क्या परेशानी?”

“यार टिकट तो मिल जायेंगे. . .लेकिन अगर कैबनेट सेक्रेटरी को यह पता चल गया तो पता नहीं उसका क्या ‘रिएक्शन` हो?”

“क्या होगा?”

“कुछ भी हो सकता है।”

“फिर भी तुम क्या सोचते हो?”

“बहुत बुरा मानेगा. . .रिपोर्ट ये हैं कि दोनों में बहुत निकटता हो गयी है। अलवर के किसी ‘रिज़ाट` में जाते हैं. . .”

“हां ये तो हो सकता है. . .”

अहमद आ गया और बातचीत में शामिल हो गया।

“देखो वैसा कुछ नहीं होगा. . .एक हफ्ते की बात है. . .शूजा ने उन्हें बता दिया है वह अपनी बहन से मिलने इंग्लैण्ड जा रही है… वहां से कुछ दिन के लिए पेरिस जायेगी. . .यार तुम्हें पेरिस में ठहरने का भी इंतिजाम करना होगा”, उसने शकील से कहा।

“लो सोने पर सुहागा. . .बहुत गड़बड़ हो जायेगी।”

“अमां तुम बेकार में डर रहे हो”, वह बोला।

“तुम तो जानते ही हो कि बड़े लोगों की बेटियों से ‘स्प्रिचुअल` इश्क करने वालों का भी क्या हाल होता है. .. और यहां तुम्हारा मामला तो सौ फीसदी ‘फिज़िकल` है।”

“देखा इसका एक सीधा रास्ता हो सकता है”, मैंने कहा।

“क्या?”

“तुम सीधे इस झंझट में पड़ते ही क्यों हो।”

“मतलब?”

“यार पैलेस इंटर कांटिनेण्टल वालों को इशारा करो. . .वे अपने आप सब इंतिज़ाम करा देंगे. . .तुम्हारी एयर लाइंस में ‘केटरिंग` करते हैं. . .इतनी मदद भी न करेंगे।”

“हां ये तो हो सकता है।”

“यार साजिद के दिमाग में आइडिये खूब आते हैं. . .लेकिन खुद साला तरसता रहता है”, अहमद ने कहा।

“अपनी अपनी किस्मत है”, अहमद बोला।

“नहीं ये साला सोचता बहुत है. . .सोचने वाले ‘इम्पोटेण्ट` हो जाते हैं।”

“वाह. . .ये कहां से खोज लाये?”

“देखो बेटा. . .आदमी की औरत के साथ और औरत की आदमी के साथ रहने की ख्वाहिश ‘नेचुरल` है। अगर ये नहीं होता तो आदमी. . .”

“‘अननेचुरल` हो जाता है?”

“नहीं नहीं ये बात नहीं है. . .लेकिन आदमी. . .तुम्हारे जैसा हो जाता है”, वह हंसकर बोला।

अहमद ने मज़ाक में ही सही पर सही बात कही है। सात साल हुए सुप्रिया को गये और उसके बाद से मैं अकेला हूं। साल में एक-दो बार या उससे ज्यादा वक्फ़े के बाद लंदन जाता हूं तो मुझे तन्नो अजनबी लगती है। उसे मैं भी शायद अजनबी लगता हूंगा। हद ये है कि हम एक दूसरे के सामने कपड़े नहीं बदलते। वैसे सब कुछ ठीक है। हम एक दूसरे को पसंद करते हैं। चाहते हैं, पर बस. . .हो सकता है उम्र की वजह से हो. . .हो सकता है कुछ और हो. . .

“क्या सोचने लगे”, अहमद ने बोला।

“तुम ठीक कहते हो यार।”

“तो अपनी सेक्रेटरी पर दांव लगाओ।”

“अरे यही यार. . .”, मैं घबरा गया।

“देख साले को।”

“इसका इलाज कराओ”, शकील ने कहा।

“देखो इसकी प्राब्लम यह है कि इसने अपने बारे में बहुत कम सोचा है।”

“बिल्कुल ठीक कहा तुमने।”

“इसकी जगह कोई ओर होता तो आज पता नहीं क्या हो गया होता।”

“वह बात अलग है. . .बात तो ये हो रही थी कि मैं ‘अकेला` हूं।”

“यार तुम अपनी वजह से. . .अपनी ‘चोवइस` से अकेले हो।”

“अब तुम भी कुछ बोल दो. . .खामोश क्यों बैठते हो”, शकील ने मुझसे कहा।

“अब मैं क्या बताऊं. . .सुप्रिया के बाद. . .”

“अरे छोड़ो सुप्रिया को. . .इतने साल हो गये. . .पता नहीं कहां होगी।”

“तुम लंदन क्यों नहीं चले जाते।”

अब मैं उन लोगों को क्या बताता कि पति और पत्नी होने के बावजूद समय ने हम दोनों के साथ क्या अन्याय किया है।

“नहीं यार. . .वहां मैं क्या करूंगा।”

“करने की ज़रूरत क्या है. . .ससुर साहब खरबों छोड़ गये हैं”, अहमद ने कहा।

“यार तुम पागल हो गये हो. . . मतलब मैं पड़ा पड़ा खाता रहूं।”

“तुम दरअसल ‘रियल्टी` को ‘फेस` नहीं करना चाहते”, अहमद बोला।

“देखो तुम और हम लोग सभी पचास से ऊपर हैं. . .अब इस उम्र में कोई ‘ठिया` न हुआ तो मुश्किल हो जायेगी।”

“अहमद का क्या ‘ठिया` है?”

“यार मैं बस साल दो साल में ही किसी अच्छी औरत से. . .”

“अरे छोड़ो. . .ये तुमने जिंद़गीभर नहीं किया।”

अभी तो रात के तीन बजे हैं। पता नहीं क्यों डियरपार्क से किसी मोर के बोलने की आवाज़ लगी। मैं उठकर खिड़की तक आया। अंधेरा है। रौशनी का इंतिज़ार बेकार है क्योंकि अभी उसमें समय है। एक बजे जब वे दोनों चले गये तो मैं स्टडी में आ गया था। जब कभी उकताहट बढ़ती है और ‘डिप्रेशन` सा होने लगता है तो अपनी किताबें देख लेता हूं. . .चार किताबें. . .देश के नामी पब्लिशर्स ने छापी है। चारों ग्रामीण और आदिवासी भारत की विभिन्न समस्याओं पर आधारित है। इन किताबों पर सात ‘एवार्ड` मिले हैं जो स्टडी में सजे हुए हैं। तस्वीरें हैं. . . .तो क्या जिंदगी के एक-एक पहल का हिसाब देना पड़ता है? कौन मांगता है यह हिसाब? शायद हम अपने आपसे ही मांगते हैं। अपने को संतुष्ट करना बहुत मुश्किल काम है। मैं तो काम बिल्कुल नहीं कर पाता। मैं सोचता हूं छोटा होते-होते, होते-होते अब ये ‘सपना` क्या रह गया? मर तो नहीं गया? मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि ‘सपने` के बिना भी मैं ज़िंदा हूं तो अब वह सपना क्या है? मैं दसियों साल देश के गांवों में घूमता रहा, लिखता रहा। ‘सपने` की तलाश करता रहा। कभी बड़ी हास्यास्पद लेकिन आंखें खोल देने वाली परिस्थितियों से दो चार भी हुआ। एक बार बैतूल के एक आदिवासी गांव में मुझे और मेरे साथ एक दो और जो लोग थे उन्हें देखकर गांव में भगदड़ मच गयी थी। आदमी

अपना काम छोड़कर भागने लगे थे। औरतें बच्चों को बगल़ में दबाये भागने लगीं थीं। मैं हैरान था कि यह क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है? ये लोग हमें क्या समझ रहे हैं। तब साथ वाले एक स्थानीय कार्यकर्ता ने बताया था कि ये लोग हमें बैंक वाले समझ कर भाग रहे हैं। मेरी समझ में फिर भी बात नहीं आई थी। पहले तो कार्यकर्ता ने आवाज़ देकर इन लोगों को रोका था और उनकी भाषा में ही कहा था कि हम बैंक वाले नहीं हैं। ये सुनकर कुछ लोग पास आये थे।

पता चला कि कर्ज लेना भी विकास की एक पहचान माना जाता है। इसके अंतर्गत एक बैंक ने आदिवासियों को कर्ज देने के लिए एक राशि निश्चित की थी। आदिवासियों को कर्ज की कोई ज़रूरत न थी ओर न वे बैंक से कर्ज लेना जानते थे और न इसके अभ्यस्त थे। इस कारण बैंक का ब्रांच मैनेजर परेशान हो गया कि ‘टारगेट` पूरा नहीं हो सकेगा तो उसकी तरक्की में अड़चन आयेगी। किसी ने सुझाया कि गांव ही जाकर कर्ज दे दो। वहीं कागज़ी कार्यवाही कर लो। वह दो तीन बिचौलियों के साथ आया और गांव के सबको पैसा दे दिया। उनसे अंगूठा निशान लगवा लिए। इन लोगों को कुछ पता नहीं था कि यह कैसा पैसा है? इसका क्या करना है? यह किस तरह लौटाया जायेगा? लौटाया भी जायेगा या नहीं। बैंक मैनेजर कर्ज देकर चला गया। इन लोगों ने पैसे की शराब पी डाली। अनाप-शनाप ख़र्च कर दिया। साल भर बाद दूसरा बैंक मैनेजर कर्ज की किश्त वसूल करने आया। कर्ज की किश्त वसूल हो जाना भी विकास की पहचान और बैंक मैनेजर के ‘प्रोमोशन` के लिए आवश्यक माना जाता है। इस बैंक मैनेजर ने जब देखा कि आदिवासियों के पास किश्त देने के पैसे नहीं हैं तो इससे उन्हें और कर्ज दे दिया और उसमें से किश्त के पैसे काट लिए। फिर तो यह रास्ता ही निकल आया। कई साल तक यही होता रहा। हर बैंक मैनेजर अपना ‘कैरियर` बनाता रहा है और आदिवासी भयानक कर्ज में डूबने लगे। होते-होते स्थिति थोड़ी स्पष्ट होने लगी। किसी ने इन्हें बताया कि तुम लोगों के तो जानवर, खेत, घर बिक सकते हैं। ये समझ में आते ही ये डर गये और अब बैंक वालों को आता देखकर जंगल में भाग जाते हैं।

विकास के लिए प्रेरणा देने वाले अटपटे किस्म के बोर्ड अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई पड़ते हैं। मैं सोचता हूं आदिवासी या पिछड़े वर्गों में गांव वालों को चाहिए कि एक बोर्ड लगवायें जिस पर लिखा हो “कृपया हमारा विकास न कीजिए. . .हमें जीवित रहने दीजिए।” त्रासदी यह है कि चालीस साल तक विकास का विनाश चलता रहा और आज भी जारी है।

मैं सोचता हूं कि लिखने से क्या होगा? इतना लिखा क्या हुआ? मेरा नाम हुआ। मेरा सम्मान किया गया। मुझे ‘एवार्ड` मिले। मुझे पैसा मिला। लेकिन उनका क्या हुआ जिनके बारे में मैंने लिखा था। फिर क्या करूं? सागर साहब की तरह उनके बीच रहकर काम करूं? अब सुना है सागर साहब ने नौकरी छोड़ दी है और अपनी पत्नी के साथ गलहौटी गांव में ही बस गये हैं। उनका काम गलहौटी के आसपास के गांवों में भी फैल गया है। इसके साथ यह भी हुआ है स्थानीय माफिया उनसे बहुत नाराज़ हैं। उन्हें कई बार मार डालने की धमकियां दी जा चुकी हैं। क्या सागर साहब जैसा साहस मुझमें है?. . .वाह ये तो अजीब बात है, साहस है नहीं और इच्छाएं इतनी हैं? दोनों का कोई मेल भी है?


अहमद ने मोर्चा मार लिया। शूजा के साथ पेरिस में एक सप्ताह रहा। लौटकर आया तो शूजा ने कैबनेट सेक्रेटरी पर ज़ोर डाला कि उसकी सिफारिश करें और अनंत: वह राजदूत हो गया। कहता है यार बड़ी ‘मेहनत` करनी पड़ती है ‘एम्बैस्डर` बनने के लिए।

यह भी मसला था कि किन-किन देशों में वह भेजा जा सकता है और उसमें से कौन-से देश ऐसे हैं जहां वह जाना चाहेगा या जहां जाने से फ़ायदा होगा। मैं और शकील ये समझ रहे थे कि वह योरोप के किसी सुंदर देश को पसंद करेगा लेकिन उसने कहा तुम लोग जानते नहीं योरोप में कहां वे मज़े हैं जो ‘मिडिल ईस्ट` में हैं. . .मतलब यार तीन साल मरेंगे तो कुछ कमा लें। जहां सोना होगा- काला सोना वहां जाना चाहिए. . .योरोप के छोटे मोटे देशों में क्या है, कुछ नहीं, उसने बताया था कि एक ‘आर्डर` को वह इधर से उधर खिसका देगा तो करोड़ों बन जायेगा। उसने भ्रष्ट राजदूतों के बड़े-बड़े किस्से सुनाये। एक राजदूत की पत्नी तो सुबह नाश्ते के लिए दूध, अण्डे और ब्रेड तक पर अपना पैसा नहीं खर्च करती थी। उसने ड्राइवर को आदेश दे रखा था कि वह नाश्ते का सामान लाया करे और बदले में उसका ‘ओवर टाइम` मंजूर कर लिया जायेगा। ड्राइवर भी खुश रहता था क्योंकि इसमें उसे अच्छा खासा बच जाता था।

हमने अहमद से कहा कि यार ये काम राजदूतों की पत्नियां कर सकती हैं। अफसोस तुम कुंवारे हो. . .कैसे करोगे. ..उसने कहा था, यार इस तरह के टुच्चे काम तो मैं करूंगा भी नहीं। मैं तो बड़ा खेल खेलना चाहता हूं. . .ऊंचा दांव लगाऊंगा।“

“आमतौर पर ‘एम्बैसडर` पत्नी या बच्चों के नाम पर धंध कर लेते हैं। तुम्हारे साले जोरू न जाता, दूसरी औरतों से नाता. . .क्या करोगे?”

“देखो रास्ता एक नहीं होता. . .”

“क्या मतलब हुआ इसका?”

“तुम दोनों को मज़ा आयेगा एक किस्सा सुनो. . .या बेचारे से हमदर्दी करोगे।”

किससे? तुमसे?”

“नहीं किसी और से. . .”

किससे यार?”

“सुन तो लो।”

“सुनाओ।”

“शूजा कह रही थी कि अपने सी.एस. के साथ उसके बड़े दिलचस्प संबंध हैं। वे शूजा को अपनी प्रेमिका मानते हैं और उसी तरह मिन्नतें करते हैं, ध्यान रखते हं नाज़ उठाते हैं, जैसे महबूबा के उठाये जाते हैं। शूजा भी उन्हें प्रेमी मानकर पूरा अधिकार जताती है, आदेश देती है, ज़िद करती है, रूठती, मनती है वगैऱा वगै़रा. . .लेकिन दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ता नहीं बन पाता. . . र

“क्यों?”

“सुनो दिलचस्प है. . .शूजा के मुताबिक सी.एस. को यह यक़ीन है कि शूजा किसी ‘क्लासिकल` प्रेमिका की तरह अब तक उन्हें जिस्मानी रिश्ता नहीं बनाने दे रही। लेकिन शूजा को पक्का यक़ीन है कि सी.एस. जिस्मानी रिश्ता बना ही नहीं सकते, लेकिन इसका इल्ज़ाम भी अपने सिर नहीं लेना चाहते। वे दिल से चाहते हैं कि शूजा उन्हें जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए टालती रहे तो अच्छा है लेकिन ज़ाहिर ये करते हैं वे जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए बेचैन हैं. . .और नहीं बन पाता। तो इसके ज़िम्मेदार ‘वो` नहीं शूजा है।”

मैं चपरासी की कुर्सी पर बैठा अखबार पढ़ रहा था कि किसी की आवाज़ सुनी- “हम अली साहब से मिलना चाहते है।”

सिर उठाकर सामने देखा तो कांप गया। सामने सल्लो खड़ी थी। बिल्कुल सल्लो, सौ फीसदी सल्लो, वही रंग, वही नक्श, वैसे ही बाल और उसी तरह की ढीली ढाली सलवार कुर्ता और मोटा दुपट्टा. . .बिल्कुल सल्लो. . .मैं हैरान होकर उसे देखने लगा. . .ये कैसे हो सकता है. . .चालीस साल बाद सल्लो फिर आ गयी?

“हम अली साहब से मिलना चाहते हैं”, उसने कोई जवाब न पाकर मुझे फिर पूछा।

“आइये”, मैं उठा और ऑफिस के अंदर आ गया और अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

“बैठिये. . .”, वह बैठ गयी।

“आपका नाम क्या है?”

“हमारा नाम अनुराध है. . .सब अनु कहते हैं।”

“हां तो बताइये अनु जी मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं।”

“एक गिलास यानी मिल जायेगा?” वह संकोच करते हुए बोली।

“हां. . .हां क्यों नहीं”, मैं उठा जग में पानी उंडेलने लगा तो वह आ गयी और बोली “हम ही ले लेंगे।”

“नहीं, आप बैठिये. . .हमारे कल्चर में मेहमान के सामने पानी पेश किया जाता है. . .अमरीकी कल्चर में कहा जाता है, वो उधर पानी रखा है या चाय रखी है जाकर ले लो. . .लेकिन मैं तो अमरीकन नहीं हूं और न आप हैं।”

“शुक्रिया” वह पानी का गिलास लेकर हँसते हुए बोली।

उसके चेहरे पर पसीने की बूंदों और कपड़ों के इधर-उधर से कुछ गीले होने की वजह से मैं समझ गया था कि वह बस से आई हैं और इससे यह पता चल गया था कि वह किस वर्ग से संबंध रखती है लेकिन इतना काफी नहीं है। हम लोगों की अजीब आदत है कि नये आदमी के बारे में सब कुछ जानना चाहते हैं। गांव गिराव में तो साफ-साफ पूछ लेते हैं किस जाति के हो? या कौन लोग हो? लेकिन अखबार के दफ्त़र में तो यह सवाल नहीं किया जा सकता। इसलिए जाति जानने के लिए दसियों सवाल करने पड़ते हैं। जाति का पता लगते ही बहुत सी बातें साफ हो जाती हैं। लड़की ने अपना नाम अनुराध बताया है, फैमली नाम भी नहीं बताया। अनुराध वर्मा या शर्मा, यादव, पंत, जोशी. . .क्या?

“जी बताइये?”, जब उसने पानी पी लिया तो मैंने सवाल किया।

“पिछले सण्डे हमने आपका ‘आरटिकल` पढ़ा था।”

“ब्राइड बर्निंग वाला. . .”

“जी हां।”

ओहो, ‘जी हां` कह रही है। ‘हां जी` नहीं कर रही है इसका मतलब पंजाब या हरियाणा की नहीं हैं।

“अच्छा तो फिर. . .”

“हम आपसे कहना चाहते हैं. . .”

हम, हमने, हमारा. . .इसका मतलब है उत्तर प्रदेश या बिहार की लगती है।

“जी आप क्या कहना चाहती हैं।”

“हमें आपका लेख पसंद आया. . .बहुत अच्छा लगा।”

“शुक्रिया।”

“हमने आपका लेख दो-तीन बार पढ़ा।”

लगभग पौने पांच फुट लंबी और चालीस किलो वज़न वाली यह लड़की जब हम, हमारी, हमें कहती है तो कितना अजीब लगता है। इसकी उम्र पच्चीस छब्बीस साल से ज्यादा क्या होगी।

“मुझे बहुत खुशी है. . .”, मैंने ऐसी नज़रों से देखा जैसा कह रहा हूं भई आगे बढ़ो. . .भूमिका काफी लंबी हो गयी है। लेकिन मैं उसे देखे जा रहा हूं उसमें सल्लो नज़र आ रही है। उसी तरह का जिस्म. . .वही सांवला रंग. . .उसी तरह के नाज़ुक हाथ. . .और चेहरा भी. . .

बस आंखें अलग हैं। सल्लो की आंखों में किसी हिरनी का भाव हुआ करता था। इसकी आंखों में गहरी उदासी ओर आत्मविश्वास की छींटे आपस में घुल मिल गये हैं।

“जला देना तो एक बात है. . .लेकिन रोज़ का जो जीवन है . . . उस पर कोई नहीं लिखता. . .आप. . .क्यों नहीं लिखते?”

“देखिए. . .यह सच्चाई है कि महिलाओं के दैनिक जीवन के दु:ख कितने बड़े और कैसे हैं. . .मैं नहीं जानता. . .अगर आप बतायें तो. . .”

“हां हम आपको बता सकते हैं”, वह उत्साह से बोली।

मैंने सोचा, वाह इससे बढ़िया क्या हो सकता है। पत्रकारिता में फलसफ़ा और सिद्धांत बघारने से कहीं अच्छा होता है मानवीय अनुभवों को सामने रखना इसी में पाठकों को मज़ा आता है. . .

“मैं आपका बड़ा आभारी हूंगा. . . अब बताइये. . .यह होगा कैसे?”

“हम आपके ऑफिस में . . यार

“ठीक है. . .तो क्यों न आज से ही शुरु कर दें।”

“जैसा आप कहें।”

“पहले चाय मंगाते हैं”, मैंने इंटरकाम पर शिप्रा को बुला लिया।

शिप्रा आई। “आधुनिक योरोपीय कपड़ों में सजी एक तेज़ तर्रार गोरी, लंबी, आत्मविश्वास में शराबोर लड़की. . .और अनुराध दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और दोनों ने एक दूसरे का नापसंद किया।

“देखो . . .करीब एक घण्टे मेरे पास किसी ‘विज़ीटर` को न आने दो. . .और दो चाय. . .भिजवा दो।”

वह चली गयी।

अनु बताने लगी हमारी एक सहेली है। स्कूल में टीचर है। मैरीड है। उसके ससुराल वाले कहते हैं जो कुछ कमाती तो वह परिवार की ‘इन्कम` है। उसका पति उससे एक-एक पेसा ले लेता है। फिर बस का पास बनवा कर दे देता है। लंच अपने साथ ले जाती है। वह स्कूल में चाय तक नहीं पी सकती। उससे कहा जाता है ज्यादा चाय पीना बुरी बात

है। सेहत खराब हो जाती है. ..कभी-कभी हमारी दोस्त को कापियां जांचने या इम्तिहान में ड्यूटी करने के कुछ पैसे मिल जाते हैं तो उन्हें छिपा लेती है। पति को नहीं बताती। उन्हीं पैसों से अपने लिए कुछ खरीदती है. . .पर डरती है कि पति ने देख लिया और पूछा कि कहां से आया? तो क्या जवाब देगी। अगर नहीं बता पायेगी तो सीधे चरित्र पर हमला करेगा. . .बता देगी तो पैसे देने पड़ेंगे. . .डांट-डपट अलग पिलायेंगे. . .एक दिन उसने हमें स्कूल से फोन किया और बोली “देख मैंने सैण्डिल ली है।” उसने बड़ी खूबसूरत सैण्डिल दिखाई। बोली “तू इसे ले जा. . .पहन ले. . .जब थोड़ी पुरानी पड़ जायेंगी तो मैं ले लूंगी. . .नयी सैण्डिल लेकर घर जाऊंगी तो सबकी निगाह पड़ेगी. . .पूछेंगे तो क्या बताऊंगी. . .कुछ दिन पहनी हुई कोई देखेगा नहीं. . .अगर पूछा भी तो कह दूंगी कि अनु की हैं. . .एक दिन के लिए बदल ली है।”

वह बताती रही और हैरत से उसे देखता रहा. . .ये कैसे संभव है? ये है क्या. . .अपनी मेहनत. . .अपना पैसा. . .लेकिन. . .

उसी दिन में एडीटर-इन-चीफ से मिला और ‘वीकली कालम` शुरु कर दिया। मैं यह समझ रहा था कि अनु के अनुभव कहीं जल्दी ही चुक गये तो क्या होगा. . .लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कालम के बारे में ‘वीमेन ग्रुप` उत्साहित हो गये। वहां से स्टोरीज़ आने लगीं।

अनु अक्सर बिना बताये, बिना फोन किये ऑफिस आ जाती थी और मैं घण्टों उससे बातचीत करता था। यह तय है कि यह एक नयी दुनिया थी जो मेरे ऊपर खुल रही थी। मेरे अपने कोई अनुभव न थे। हां इधर-उधर कभी कुछ कान में पड़ जाता था। वैसे अखबार दहेज के चक्कर में जला दी गयी लड़कियों से भरे रहते हैं लेकिन इससे यह पता न चलता था कि उनकी दुनिया कैसी है? या पैदा होते ही. . .होश संभालते ही उन्हें क्या झेलना पड़ता है, किस तरह के व्यवहार को सहने की आदतें डाली जाती हैं ताकि शादी के बाद सब कुछ सहन कर लें। हद ये है कि जलकर मर जाये और कुछ न बोले।

“अनुराध. . .तुमने अब तक अपना पूरा नाम नहीं बताया है।”

वह बच्चों की तरह खुश हो गयी और बोली “अरे ये कैसे हो गया. . . हमारा पूरा नाम अनुराध सिंह है।”

“तुम रहती कहां हो।”

“हम आर.के.पुरम में रहते हैं। पिताजी कृषि मंत्रालय में सेक्शन आफीसर हैं।”

“तुम लोग रहने वाले कहां के हो?”

“हम लोग इलाहाबाद के हैं. . .”

मैं चुप हो गया।

“और कुछ पूछिये?”, वह शरारत से बोली।

“तुम करती क्या हो?”

“मैं गणित के ट्यूशन करती हूं।”

किस क्लास के बच्चों को पढ़ाती हो?”

किसी भी क्लास के बच्चों को मैथ्स पढ़ा देती हूं।”

“क्या मतलब?”

“मतलब हम कक्षा एक से लेकर एम.एस.सी. को मैथ्स पढ़ा सकते हैं?”

ये कैसे? तुमने मैथ्स कहाँ तक पढ़ी है?“

“हमने इंटर तक पढ़ी है मैथ्स. . .हमें अच्छी लगती है. . .मैथ्स में हमने जितने भी इम्तिहान दिए हैं, हमारे सौ में सौ नंबर आये हैं।”

“लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि तुम एम.एस.सी. को मैथ्स पढ़ा सको।”

“पढ़ाते हैं. .. हम बता रहे हैं न।”

मैंने सोचा ये हो कैसे सकता है। झूठ बोल रही है। लेकिन इसको मालूम नहीं कि पत्रकार से झूठ बोलने का क्या नतीजा होता है क्योंकि पत्रकार बेशर्म होता है।

मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में अपने दोस्त मैथ्स के प्रोफेसर लाल को फोन मिलाया और कहा कि ज़रा इस लड़की से फोन पर बात करके बताओ कि वह एम.एस.सी. को मैथ्स पढ़ा सकती है या नहीं।

मेरे इस फोन पर वह हंस रही थी। बुरा नहीं मान रही थी कि मैं उसकी परीक्षा लेना चाहता हूं।

“लो बात करो. . .”

“जी मेरा नाम अनुराध सिंह है. . .हम इंटर तक पढ़े है. . . .जी. . .”

मैं सिर्फ वह सुन रहा था जो अनुराध कर रही थी।

“जी रियल एनालिसिस और काम्पलेक्स एनालिसिस में मेरी रूचि है. . .जी? . . .जी.एच. हार्डी की किताब है न. ..’प्योर मैथमेटिक्स` वह पढ़ी है मैंने. . .किताब मेरे पास है. . .जी अपने आप . . .जी हां. . .कॉपसन की ‘फन्कन्शस् ऑफ काम्पलेक्स वैरियेबुल्स`. . जी ट्यूशन करती हूं. . .और और कुछ तो मैं कर नहीं सकती. . .डिग्री नहीं है मेरे पास. .. ये लीजिए आपसे बात करेंगे”, उसने फोन मेरी तरफ बढ़ा दिया. ..

“हां बताओ।”

“लड़की सच बोल रही है. . .”

“क्या?”

“हां।”

“यार ये कैसे. ..”

“सब कुछ हो सकता है. . .तुम्हारे बड़े-बड़े पत्रकार हाई स्कूल फेल नहीं थे?”

“लेकिन. . .”

“इसको शौक है. ..ये ‘जीनियस` है. . .और क्या कह सकता हूं।”

मैंने फोन रख दिया वह हंसने लगी।

“देखिए हम झूठ नहीं बोलते”, वह आत्मविश्वास के साथ बोली। मैं सिर्फ उसकी तरफ देखने लगा। कायदे से मुझे अपने व्यवहार पर शर्म आनी चाहिए थी। मान लीजिए प्रोफेसर लाल कह देते कि लड़की ‘फेक` है तब क्या होता?

“देखो मुझे अफसोस है. . . पर हमें इतना निमर्म होने की आदत पड़ जाती है।”

“हमने बुरा तो नहीं माना. . .आप की जगह हम होते तो यही करते”, वह बोली।

“चलो आज से मान लिया कि तुम झूठ नहीं बोलती हो. . .ये भी बताओ कि क्या तुमसे जो पूछा जाये सच-सच बताती भी हो।”

“हां क्यों नहीं. . .”, वह बोली।

मैंने घड़ी देखी शाम के सात बज गये हैं। गर्मी के दिनों में इस समय का अपना विशेष महत्व है। बाहर हवा ठंडी चल रही होगी। टेरिस पर गुलशन ने छिड़काव कर दिया होगा। पंखे लगा दिए होंगे. . .केन का सोफा बाहर निकाल दिया होगा। क्या मैं इस लड़की से घर चलने के लिए कहूं? नहीं पता नहीं क्या समझे. . .और फिर मेरे घर क्यों जायेगी? कोई बात नहीं टटोल कर तो देखा जा सकता है।

“ये बताओ तुम घर कितने बजे तक लौटती हो।”

“कोई तय नहीं है. ..कभी रात वाले ट्यूशन में देर हो जाती है तो दस साढ़े दस भी बज जाते हैं।”

“तुम्हारे पापा. . .”

“नहीं पापा मम्मी कुछ नहीं कहते वे जानते हैं।”

“तुम आर.के.पुरम में रहती हो न?”

“हां।”

“मैं सफदरजंग एन्क्लेव में रहता हूं. . .जानती हो अफ्रीका ऐवेन्यू से जो सड़क डियर पार्क की तरफ जाती है. . .उसी सड़क पर।”

“अरे तो सड़क के दूसरी तरफ वाले ब्लाक में तो हमारा घर है।”

“तो देखो. . .अगर तुम चाहो तो. . .मेरे साथ चलो. . .थोड़ी देर मेरे यहां बैठो. . .चाय पियो. . .फिर मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगा।”

“अरे वहां से तो मैं पैदल चली जाऊंगी”, वह बोली।

मकान उसे पसंद आया। वह बच्चों की तरह ‘रिएक्ट` करती है। उसका इसका डर नहीं रहता कि उसे लोग क्या समझेंगे। ‘माइक्रोवेव` ओवन देखकर बोली “अरे ये तो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।”

खरगोश पसंद आये। गुलशन के तोते को हरी मिर्च खिला दी।

हम टेरिस पर आकर बैठे। गुलशन मेरे लिए ड्रिंक्स की ट्राली ले अनु के लिए ट्रे में चाय लाया। वह दूर तक फैली हरियाली को देखने लगी।

“हरियाली नीचे से देखने और ऊपर से देखने में बड़ा फ़र्क़ होता है”, वह हसंकर बोली।

“हां. .. सिर्फ हरियाली ही नहीं बल्कि सब कुछ।”

“जहाज़ में बैठकर कैसा लगता होगा”, वह इतने उत्साह से बोली कि मैं समझ नहीं पाया।

“तुम कभी नहीं बैठी?”

“हम बैठना चाहते हैं।“

गुलशन पकौड़े ले आया। हमने पकौड़े लिए। अनु ने गुलशन से कहा फ् गुलशन भाई. . .फूल गोभी को छौंक कर पकौड़े बनाओ. . . बहुत अच्छे बनते हैं।”

“कैसे हमें नहीं आता।”

“चलो बताती हूं”, वह उठकर गुलशन के साथ चली गयी और मैं हैरत में उसे जाता देखता रहा।

यार ये लड़की बन रही है। इतनी सहजता दिखा रही है। इतनी ‘रिलैक्स` लग रही है। ऐसा हो नहीं सकता। फिर ये इतनी खुश कैसे रहती है? मैं ये सब सोच ही रहा था कि अनु पकौड़े लेकर आ गयी। खाया मज़ा बहुत अच्छा था।

“मैंने गुलशन भइया को सीखा दिए हैं”, वह हंसकर बोली।

गुलशन आ गया और कहने लगा “अमीना को भी अच्छा लगा। अब इसी तरह बनाया करेंगे।”

“अनु दीदी हमें कटहल पकाना सिखा दो. . .कहते हैं हिन्दू कटहल बड़ा अच्छा बनाते हैं”, गुलशन ने कहा। मैंने हिंदू पर विशेष ध्यान दिया लेकिन अनु के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वह सहज ढंग से बोली “ठीक है. . .किसी दिन सिखा दूंगी. . .आजकल तो मिलता

नहीं कटहल।”

कुछ देर बाद अहमद आ गया। मैंने अनु से मिलवाया और अनु को बताया “ये राजदूत हैं. . .जानती हो. . .भारत को विदेशों में ‘रिप्रीजेंण्ट` करते हैं।”

उसने अपनी आंखें फाड़ते हुए कहा “अरे. . .राजदूत. . .हम ने तो आजतक कोई राजदूत नहीं देखा थार, वह आश्चर्य से बोली।

मैंने हंसकर कहा “हां देख लो. . .ऐसे होते हैं राजदूत।”

अहमद ने कुछ बुरा माना। वह अनु की तरफ भी नहीं देख रहा था। लगता था उसे अनु का वहां होना अच्छा नहीं लगा। अनु भी शायद समझ गयी और बोली हम अब जायेंगे।”

“तुम्हें गुलशन छोड़ देगा।”

वह तैयार हो गयी।

“यार तुम ‘भी कहां-कहां से न जाने क्या क्या जमा कर लेते हो”, अहमद बुरा मानता हुआ बोला।

“अबे वो ‘जीनियस` है।”

“होगी यार. . .हमसे क्या।”

“साले जिससे तुम्हारा मतलब न सधे. . .वो सब बेकार है।”

“पकौड़े अच्छे हैं”, वह पकौड़ा खोते हुए बोला।

“उसी ने बनाये हैं।”

किसने? उसी ‘जीनियस` ने?”

“हां”, मैंने कहा और वह हंसने लगा।

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गरजत-बरसत अध्याय 3 – Garajat-Barasat-Part-iii

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Further Reading:

  1. गरजत-बरसत अध्याय 1
  2. गरजत-बरसत अध्याय 2
  3. गरजत-बरसत अध्याय 3
  4. गरजत-बरसत अध्याय 4
  5. गरजत-बरसत अध्याय 5

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