एक स्‍वर | प्रेमशंकर मिश्र

एक स्‍वर | प्रेमशंकर मिश्र

उस दिन
अलविदा का गगनभेदी अजानों से लेकर
शिवाले के हर हर महादेव तक
कुछ एक ऐसा समवेत स्‍वर उभरा
जिसकी
उफनती हुई लचीली लहरों ने
एक साथ मिलकर
क्रुद्ध कंपित हिमालय के
डगमगाते चरण थाम लिए
जैसे कुछ
अनहोनी होते होते बच गई।
फिर वह एक स्‍वर उठते उठते ऐसा उठा
कि‍ कंगूरों से उलझे काले बादल
पीले पड़े फट गए,
और उस पार वाली
काली कुहूकाल वाली
मौत की वह जहरीली वादियाँ

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साफ साफ दिखने लगीं
जिनमें
”बुद्धं शरणं गच्‍छामि” वाले
हँसों के परकटे वंशज
न मरते हैं न जीते हैं
सिर्फ
इसी स्‍वर के लिए युग-युग से
घुट-घुट के
सिर धुन-धुन रोते हैं
वन्‍य पशुओं के लिए
मोतियाँ पिरोते हैं।

उसी रात
घर घर की रोजाअफ्तारी में
निर्जल व्रतधारी में
मुल्‍ला और पुजारी में
दीन धर्म मजहब की
हर विभिन्‍न क्‍यारियों में
एक नया स्‍वप्‍न
नया होश बन के बिखर गया
वही एक तारस्‍वर
अन्‍य छहों स्‍वर से हट
एक नया घोष
नया जोश बन के निखर गया।

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उसी समय
दुनिया की
हर उभरती पलकों ने
साफ बहुत साफ साफ
एक चित्र देखा है
बरबला के कामरूप तक की
एक रेखा है
अब न कहीं भेदभाव
अब न कही धोखा है
यह बसंत का स्‍वर है
ईद की बहार है
जोकि प्राण-प्राण में समा गई
मिट गए उलूक अब अमाँ गई
आज से लगा उजेला पाख है
ले नई उड़ान भेदते क्षितिज नए कपोत
बात अब ‘चुसूल’ से
उसूल में समा गई।

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