एक नया सवेरा | अशोक मिश्र – Ek Naya Savera

एक नया सवेरा | अशोक मिश्र

रेनू को आज स्‍कूल से निकलने में देर हो गई, जिसका कारण था प्रधानाचार्य द्वारा ली गई शिक्षिकाओं की बैठक, जिसमें पठन-पाठन की समस्‍याओं के साथ अन्‍य समस्‍याओं पर चर्चा की गई। क्‍या करे वह, आज बैठक छोड़ जा भी तो नहीं सकती थी, क्‍लास टीचर होने के नाते उसका दायित्‍व कुछ अधिक था। घर पहुँचते-पहुँचते उसे शाम के छह बज गए।

वह घर में जैसे ही घुसी तो देखा कि वहाँ सास और ननदों की पंचायत चालू है। मन ही मन उसने सोचा कि करने-कराने के लिए इनके पास कोई काम तो है नहीं, बस दूसरों के घर के चर्चे करना उसमें आनंद उठाना ही इनकी दिनचर्या रह गई है। काम करने और कमाने के लिए मुफ्त की नौकरानी मैं हूँ ही फिर चिंता किसलिए?

उसने कमरे में जाकर कपड़े बदले और फिर बाहर आकर वाश बेसिन में मुँह धोया और तौलिए से पोछने के बाद किचन में जाकर गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया, घड़ी देखी तो शाम के सात बज चुके थे। उसने सोचा कि मुकेश अब आते ही होंगे और चाय के साथ थोड़ा चिप्‍स तलने में लग गई।

रेनू कमाते-खाते मध्‍यवर्गीय परिवार की बहू है, परिवार के मुखिया का कुछ दिन पहले एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो चुका था। उसकी शादी परिवार के एकमात्र लड़के मुकेश के साथ हुई थी जो सबसे बड़े हैं। बाकी दो ननदों की शादी हो चुकी है और एक अविवाहित है। फिर भी घूम-फिरकर उसकी कोई न कोई ननद मायके में ही डेरा जमाए रहती है और इन ननदों और उसकी सास ने मिलकर उसका जीना हराम कर रखा था। कामकाज से इन माँ-बेटियों को कोई मतलब न था। सारा दिन बैठकर टीवी सीरियल देखना और इधर-उधर की चर्चाएँ करना और उसके खिलाफ सास के कान भरना यही काम था। एकाएक उसके सोचने का क्रम टूटा, देखा तो चाय का पानी उबाल खाकर गिरने लगा था उसे विचारों के क्रम में ध्‍यान ही न रहा। उसने चाय की पत्‍ती डालकर दो-तीन उबाल खौलाकर चाय उतार ली और केतली में चाय और ट्रे में कप लेकर खाने की मेज पर पहुँच गई। वह चाय उडेलकर कपों में डाल ही रही थी कि मुकेश आ गए। इतने में उसकी सबसे छोटी ननद चापलूसी के अंदाज में बोली, ‘भय्या देखिए, मैंने आपके लिए चिप्‍स तले हैं।’ रेनू मन ही मन कुढ़कर रह गई कारण था कि उसकी सास सामने ही बैठकर उसे तीखी नजरों से घूर रही थी। अपनी बहन की बात सुनकर मुकेश रेनू की ओर देखकर हँसते हुए बोले, ‘देखो, मेरी बहनें मेरे खाने-पीने और रुचि का कितना ध्‍यान रखती है।’ यह सुनकर रेनू के तन-बदन में आग लग गई, किंतु वह एक समझदार युवती थी इसीलिए वह घर का माहौल नहीं बिगाड़ना चाहती थी। मुकेश अपनी माँ और बहनों को काफी चाहते थे। यद्यपि रेनू के प्रति उनका बरताव बुरा न था, फिर भी वह माँ और बहन के खिलाफ एक भी शब्‍द सुनना पसंद ही न करते थे। इसका कारण कुछ भी हो, मगर रेनू को मुकेश की यही एक कमजोरी सबसे खराब लगती थी।

‘भैय्या, शाम को खाने में क्‍या बना लूँ?’ छोटी ननद बोली। ‘ऐसा करो कि आलू के पराँठे और मटर पनीर की सब्‍जी बना लो।’ मुकेश ने उत्‍तर दिया।

रेनू मन ही मन भन्‍ना गई कि पूछ तो ऐसे रही है मानो अभी दस मिनट में सारा काम निपटा देंगी ये माँ बेटी। हकीकत यह है कि इन सबको करना-कराना कुछ भी नहीं है, बस भैय्या की चापलूसी को कह दें या भाभी की चुगली से माँ को कान भरती रहेंगी ये बहनें। मुकेश अपनी माँ की ओर इतना ध्‍यान देते हैं कि उनकी कहीं कुछ भी बुराई उन सबके व्‍यवहार में नजर नहीं आती। सच यह था रेनू को इन सबके बीच में गेहूँ के बीच घुन की तरह पिसना पड़ रहा था। क्‍या करें रेनू घर में रोज महाभारत नहीं करना चाहती, इसीलिए चुप लगा जाती है और फिर उसे घर से बाहर तक खटना पड़ता है। अपने भविष्‍य और बाल-बच्‍चों के भविष्‍य के लिए उसे नौकरी भी करनी ही पड़ती है, सिर्फ मुकेश की कमाई से मुश्किल से घर का खर्च चल सकता है। सुरसा जैसी इस महँगाई में कितनी भी कमाई हो पूरी नहीं पड़ती। उसकी कमाई की वजह से ही सही, घर का स्‍तर थोड़ा ठीक-ठाक दिखता है। वह तो कहो कैसे भी ससुर जी अपनी जिंदगी में मकान बना गए। मगर उसका भी तो मौका पड़ने पर उसकी सास ताना मार देती हैं। अगर वह इन सबकी बातों पर जाए तो इस घर में एक दिन भी रहना असंभव हो जाए।

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चाय पीकर रेनू ने कप, प्‍लेट, ट्रे आदि समेटकर उठा लिया और चौके में आकर उसे धोकर साफ करने लगी। मगर उसकी दोनों ननदों में से किसी से भी यह न हुआ कि आखिर भाभी थकी-हरी ऑफिस से आती है उसका थोड़ा-सा हाथ बँटा दें। ऊपर से हर काम को लेकर छींटाकशी और ताने मारना तो इनकी आदत में शामिल है। उसकी दोनों विवाहित ननदों में कोई न कोई किसी न किसी बहाने डेरा जमाए ही रहती है और माँ का तो अपनी बेटियों से इतना लगाव है कि बस चले तो दोनों दामादों को घरजमाई बना लें। ऊपर से इन सबकी विदाई पर आने वाला खर्च कुछ कम न था। पिछली बार रेनू ने थोड़ा-सा प्रतिवाद किया था कि माँजी को दीदी लोगों को जल्‍दी-जल्‍दी बुलाने की क्‍या जरूरत है। बस इसी बात पर कोहराम मच गया। माँ जी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया, ‘मैं कौन-सा तुम्‍हारी कमाई पर डाका डाल रही हूँ, क्‍या मेरा अपने बेटे की कमाई पर इतना भी अधिकार नहीं है। तुम कौन होती हो मुझे रोकने-टोकने वाली।’ फिर तो घर का माहौल तीन दिन तक बेहद तनावपूर्ण रहा। ऐसे मौके पर मुकेश का एकदम कायरों की भाँति चुप्‍पी साध लेना रेनू को काफी नागवार गुजरता। मुकेश माँ के आज्ञाकारी पुत्र बने रहते और वह उनकी कमाई को आराम से लुटाती रहती। आखिर कब तक चलेगा यह सब जबकि अभी छोटी ननद के हाथ भी पीले करने हैं।

रेनू के मन में एक विचार आ रहा था तो एक जा रहा था। उसने चौके में आकर प्रेशर कुकर में पराँठे बनाने के लिए आलू चढ़ा दिए और खाना बनाने की तैयारी में लग गई। इतने में छोटी ननद पास आकर बोली, ‘मैं तो भाभी चित्रहार देखने जा रही हूँ बाकी काम आप निपटा लेना।’ रेनू सोचने लगी कि किस घर में होगा इस लड़की का गुजारा, ससुराल वाले लाकर वापस मायके भेज जाएँगे। लड़की होकर भी घर के कामकाज से ऐसे भागती है जैसे किसी राजा के घर ब्‍याह होने वाला है, जहाँ दर्जनों नौकर होंगे।

खैर यह सब कोई एक दिन की समस्‍या नहीं है बल्कि आए दिन की बात है, यह सोचकर उसने अपने मन-मस्तिष्‍क में चल रही विचारों की श्रृंखला से बाहर आकर एक चूल्‍हे पर सब्‍जी चढ़ाकर पराँठे सेंकने में लग गई। इधर उसने खाना मेज पर लगाया कि उधर सब खाने बैठ गए, सबको परोसने-खिलाने के बाद जो कुछ बचा उसे खाकर वह उठ गई। रात में चौका-बर्तन कर सारा काम निपटाकर जब वह अपने बेडरूम में पहुँची तो रात के दस बज चुके थे। मुकेश जग रहे थे और उनके हाथ में कोई पत्रिका थी जिसे वह पढ़ रहे थे, उसे देखकर बोले, ‘आज तो तुमने काफी देर लगा दी।’

‘जल्‍दी आ जाती तो घर का सारा काम कौन करता।’ रेनू ने उत्‍तर दिया।

‘क्‍या घर में माँ और छोटकी हाथ नहीं बँटाती। कामकाज में तुम्‍हारा?’

‘कभी हाथ बँटाया है कि आज बँटाती।’ रेनू ने उत्‍तर दिया।

‘तुम क्‍या झूठ बात करती हो, मेरे सामने तो सब तुम्‍हारी खूब मदद करती हैं।’

‘बस उतनी ही देर जितनी देर आप घर में रहते हैं।’

‘मुझे तो ऐसा नहीं लगता।’ मुकेश ने उत्‍तर दिया। रेनू इस पर चुप लगा गई कि बात आगे न बढ़ने पाए। यह कोई एक दिन की बात न थी बल्कि रोज-रोज की चख-चख और खिच-खिच थी। फिर रेनू और मुकेश बातें करते हुए थककर कब सो गए किसी को पता ही नहीं चला।

रेनू जब सुबह सोकर उठी तो देखा कि भोर की किरण खिड़की के रास्‍ते घर में प्रवेश कर रही है। वह जल्‍दी से उठकर बाथरूम की ओर चल दी, क्‍योंकि उसे पता था कि सास और ननद में से कोई भी सुबह जल्‍दी सोकर उठने वाली नहीं थी, जबकि उसे चाय, नाश्‍ता, सब कुछ तैयार कर स्‍कूल भी जाना था। इतना काम करने और घर-भर की गुलामी करने के बावजूद सास और ननदें उससे मुँह फुलाए रहती हैं। इन सबकी यही इच्‍छा रहती है कि वह अपना पूरा वेतन इन्‍हीं सबको समर्पित कर दे तब ये माँ-बेटियाँ खुश रहें। सुबह का खाना बनाकर मुकेश को दफ्तर भेजने के बाद रेनू भी स्‍कूल के लिए चल दी।

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शाम को स्‍कूल से लौटने के बाद घर की छत पर सूखने के लिए डाले गए कपड़ों को उठाकर वह लौट ही रही थी कि एकाएक न जाने कैसे उसका पैर सीढ़ियों से फिसला और वह सात-आठ सीढ़ियाँ लुढ़ककर धड़ाम से नीचे आ गिरी।

रेनू की ननद और सास वहीं बरामदे में बैठकर बात कर रही थी कि छोटी ननद जोर से चिल्‍लाई, ‘अरे अम्माँ, जल्‍दी आओ, दौड़ो, किसी डॉक्‍टर को बुलाओ भाभी छत से गिर गई हैं, उनका सिर भी फट गया है, जल्‍दी करो, वर्ना हम भैय्या को मुँह दिखाने के काबिल भी न रहेंगे।’ पूरे घर और पड़ोस में कोहराम मच गया, जिसने भी सुना, सबसे पहले दौड़कर आया और एंबुलेंस बुलाकर रेनू को लादकर तुरंत अस्‍पताल पहुँचाया गया। मोहल्‍ले के किसी व्‍यक्ति ने मुकेश को दफ्तर फोन करके जानकारी दी, वह भी घबराए हुए अस्‍पताल पहुँचे। डॉक्‍टर ने तुरंत रेनू को आपातकालीन वार्ड में भिजवाया और उसका इलाज शुरू हो गया, सिर में अधिक चोटें आने से चार-पाँच टाँके भी लगाने पड़े। कुछ देर बाद डॉक्‍टर ने मुकेश को बताया कि दाहिना पैर भी उखड़ गया है और उस पर प्‍लास्‍टर चढ़ाना होगा। देर रात तक रेनू को उपचार चलता रहा।

रात गए पाँच-छह घंटे बीतने के बाद रेनू को होश आया। डॉक्‍टर ने तुरंत रेनू के परिवार वालों को इत्‍तला दी कि मरीज को होश आ गया है अब आप मिल सकते हैं।

रेनू ने कराहते हुए पूछा, ‘मैं कहाँ हूँ, मुझे क्‍या हुआ है?’ ‘तुम्‍हें कुछ नहीं हुआ है।’ उसके माथे पर हाथ फेरते हुए मुकेश ने जवाब दिया।

तीन दिन पश्‍चात डॉक्‍टर ने रेनू को अस्‍पताल से रिलीव कर दिया और मुकेश के साथ खड़ी माँ को सख्‍त हिदायत दी, अब बहू को कम से कम 3 माह पूरा बेडरेस्‍ट करना होगा और मरीज को प्रतिदिन दूध-फल-जूस आदि भी दिया जाए।

मुकेश ने फिर टैक्‍सी बुलाकर किसी तरह लादकर रेनू को घर पहुँचाया और उसे अपने बेडरूम में सुलाया और छोटी बहन को आवाज देकर रेनू का बिस्‍तर खिड़की के किनारे लगा दिया जिससे हवा और प्रकाश भी कमरे में आता रहे और रेनू जब चाहे बाहर के दृश्‍य भी देख सके।

इधर रेनू के तीन माह तक लगातार बेडरेस्‍ट करने की बात सुनकर उसकी सास छोटी बेटी से बोली, ‘बेटी, अब क्‍या और कैसे होगा, मैं कुछ करना भी चाहती थी तो तू मुझे मना कर देती थी अब तो सारी आफत सिर पर आ ही गई ना।’

दूसरे दिन सुबह मुकेश को दफ्तर जाना था। माँ ने दाल-चावल बनाकर रख दिए थे। मुकेश को यह सब पसंद न था। उसका मन सब्‍जी-रोटी के बिना भरता ही न था। खैर मुकेश ने थोड़ा-सा खाना खाकर दफ्तर का रास्‍ता लिया।

पिछले पंद्रह दिनों से मुकेश देख रहा था कि घर की सारी व्‍यवस्‍था पूरी तरह से चरमरा गई है। कोई भी काम अपने समय से पूरा नहीं होता, न ढंग का नाश्‍ता, न ढंग का खाना बनता, पूरे घर में गंदे बर्तन और कपड़े इधर-उधर पड़े रहते थे। घर में कई जगह धूल जम गई थी और तो और ऐसा लगता था कि पूरा घर जैसे एक कूड़े के ढेर में बदल गया हो। जबकि यही सब और सारे काम रेनू बिजली की फुर्ती के साथ कर दिया करती थी।

आखिर एक दिन मुकेश ने भन्‍नाकर माँ से कह ही दिया, छोटी बहन भी वहीं खड़ी थी, ‘माँ, इन दिनों आखिर इस घर को क्‍या हो गया है, कोई भी काम समय पर नहीं होता। आखिर पहले कौन करता था सारा काम? कैसे समय पर नाश्‍ता, खाना, कपड़े-लत्ते धुलना, सफाई पोछा और घर का हर सामान अपनी जगह पर तरीके से सजा हुआ मिलता था, जबकि आज देखो तो पूरा घर अस्त-व्यस्त दिखता है। न कहीं झाड़ू न कहीं पोंछा, हर सामान अपनी जगह से गायब, इधर-उधर धूल की पर्तें, गंदे कपड़े और गंदे बर्तनों में भिनभिनाती मक्खियाँ, आखिर ये घर है या बूचड़खाना। भैय्या, आखिर हम लोग कोशिश तो पूरी करते हैं, फिर भी थोड़ी कमी तो रह ही जाती है ना छोटी बहन ने उत्‍तर दिया।

अब माँ और बेटी मुकेश से कैसे कहतीं कि अभी तक तो वे बहू की छाती पर मूँग दल रही थीं और हरामखोरी करती थीं। आखिर तो मुकेश के सामने पोल-पट्टी खुलनी ही थी, मुकेश को अब सब समझ में आ गया कि रेनू हमेशा सही कहती थी।

एक दिन रेनू की सास चौके में खाना बना रही थीं, जबकि उस दिन उनकी तबीयत ठीक न थी, फिर भी छोटी बिटिया से यह न हुआ कि वह माँ की मदद करे। उन्‍होंने जब उसे थोड़ी मदद के लिए बुलाया तो बिटिया रानी टी.वी. पर आ रही ‘लव स्‍टोरी’ पिक्‍चर का आनंद ले रही थी। उसने वहीं से जवाब दिया, ‘क्‍या अम्माँ! जरा से काम के लिए तुमने आसमान सिर पर उठा रखा है अभी मैं पिक्‍चर छोड़कर नहीं आ सकती। काम के लिए अपना पिक्‍चर का मजा बेकार नहीं कर सकती। जरा-सा काम क्‍या करना पड़ा कि मेरी नाक में दम करके रख दिया है अम्‍माँ ने।’ बुदबुदाते हुए छोटी बेटी ने कहा।

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अपनी ही जायी संतान का टके-सा उत्‍तर सुनकर माँ का चेहरा उतर गया। उन्‍हें हल्‍की सी रुलाई आ गई। ‘जरा से काम के लिए अपनी ही बेटी ने जवाब दे दिया आखिर क्‍या फायदा इन औलादों से।’ वह बुदबुदाई।

इसके बाद चौके में ही खड़ी-खड़ी माँ सोचने लगी कि बहू ने आज तक किसी काम के लिए मना नहीं किया, हरदम माँजी, माँजी कहते उसकी जुबान घिसती है। इन्‍हीं बेटियों के बहकावे में मैंने कभी भी उसके साथ अच्‍छा व्‍यवहार नहीं किया। मदद तो दूर मैं उस पर छींटाकशी करने से भी नहीं चूकती। अब तो वह बेचारी बिस्‍तर पर पड़ी है उसके साथ ज्‍यादती करना भी बहुत बड़ा गुनाह होगा। माँ के सोचने का क्रम चलता रहा कि आखिर बहू भी तो किसी की बेटी है, फिर उसने इस घर को सजाने-सँवारने के लिए क्‍या नहीं किया। मुकेश के साथ कंधे मिलाकर इस घर की बेहतरी के लिए कमाकर भी लाती है और एक यह छोटकी है जो न पढ़ती है न लिखती है, सारा दिन टीवी पर अंट-शंट पिक्‍चरें देखती है। ऊपर से बहू के प्रति मेरे कान भी भरती रहती है। कल को जहाँ छोटकी की शादी हुई नहीं कि वह फुर्र से चिड़िया की तरह उड़कर ससुराल चल देगी। फिर कौन करेगा मेरी देखभाल! भगवान न करे कि कहीं मेरे साथ कोई हादसा हो जाए तो सिवा बहू के कोई नहीं साथ देने वाला। बेटियाँ तो दो-चार दिन के लिए आकर खिसक लेंगी, काम तो आएगी बहू ही, फिर तो असली बेटी बहू ही हुई। मगर इस छोटकी को तो दूसरे के घर जाना है कुछ तो गुण-ढंग सीखना चाहिए। अब मुझे ही कुछ करना होगा। माँ खुद से वार्तालाप करते हुए कामकाज निपटाती जा रही थी।

अब माँ ने रेनू की देखभाल कायदे से शुरू कर दी, समय पर दवा, चाय, फल जूस आदि और पास में बैठकर बातचीत करना।

तीसरा महीना खत्‍म होते-होते रेनू के पैर का प्‍लास्‍टर कट गया और स्‍वास्‍थ्‍य भी सुधर गया था, फिर भी अभी डॉक्‍टरों ने घर का कामकाज करने से मनाकर रखा था।

रेनू दूसरे दिन सुबह उठकर चाय बनाने को चली तो माँ ने उसका हाथ पकड़कर बैठा दिया और छोटकी को आदेश देते हुए बोली, ‘आज से घर का सारा काम तू सँभालेगी और खाना-पीना, चाय-नाश्‍ता भी।’ छोटकी बोली, ‘पर अम्माँ, मुझे तो कुछ आता ही नहीं। कैसे करूँगी मैं ये सारा काम।’ तुझे सब कुछ सीखना होगा चार दिन बाद तुझे पराए घर जाना है।’ माँ आदेश देते हुए बोली।

छोटकी परेशान थी कि आखिर माँ को क्‍या हो गया है, क्‍यों वह एकाएक भाभी की तरफदारी करने लगी है। आज तक तो कभी भी मुझसे कुछ नहीं कहा।

अगले दिन घर में शाम को खाने की मेज पर बड़ा खुशनुमा माहौल था – मुकेश, रेनू, माँजी बैठे हुए थे और छोटकी सबको खाना परोसकर खिला रही थी। इतने में मुकेश ने अम्माँ से पूछा, ‘अम्माँ, आज तो छोटकी काफी मेहनत कर रही हैं?

माँ ने उत्‍तर दिया, ‘मेहनत कर रही है तो कौन-सा हम पर अहसान कर रही है। आखिर तो इसे पराए घर जाना ही है। फिर रेनू की टाँग तो इसी के काम न करने से टूटी थी।’

माँ का उत्‍तर सुनकर मुकेश और रेनू एक-दूसरे की ओर देखकर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्‍कुराए। फिर भी रेनू की समझ में न आ रहा था कि आखिर माँजी की सोच और छोटकी में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया। उधर, माँ को रेनू की दुर्बलता से एक नसीहत मिल गई थी। रेनू जहाँ परिवार में परिवर्तन देखकर ‘एक नया सवेरा’ का अहसास कर रही थी वहीं मुकेश भी हौले-हौले मुस्‍कुरा रहे थे।

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एक नया सवेरा – Ek Naya Savera

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