एक खाली दिन | देवेंद्र – Ek Khali Din

एक खाली दिन | देवेंद्र

‘मरे हुए को किसी से क्या? अब वह इस संसार से जा चुका है। भाई बाप, माँ बहन कोई नहीं है इसका। सड़ रहे मांस, मवाद और बदबू से भरी यह देह! क्या आप लोगों को और कोई काम नहीं है? क्यों चिपके हो आप सब? यह लाश आपको पहचानती थोड़े है। आप अपना अपना काम करें। आपकी पर्ची पर नंबर लिख दिया गया है। यह जला दी जाएगी। अपने समय पर आकर राख ले जाइएगा। ओह, भीड़ के मारे तो यहाँ काम करना मुश्किल है।’ – डोम जोर जोर से चिल्ला रहा था।

मई की सुबह थी। सूरज अभी से बेतरह जलने लगा है। तेज गर्मी, राख, धुएँ और पसीने से सना वह अधेड़ डोम अपने काम में लगा भीड़ के मारे घबरा रहा था। वहाँ चारों ओर जल रही लाशों का धुआँ था। अगरबत्तियों की घिनावनी गंध थी, और लाशों के साथ चले आ रहे लोगों की भीड़। मुनीम किसको क्या समझाए? सबको बस अपनी अपनी जल्दी पड़ी है। ‘बहुत पहले कभी रात के सन्नाटे में यहीं एक औरत आई थी – अपने बेटे की लाश लेकर, सत्तो ने सोचा और मुनीम से पूछा – ‘मैं राख लेने के लिए कितने बजे आऊँ?’

मुनीम ने बिना उसकी ओर देखे लाश का नंबर पूछा और बताया – ‘रात को बारह बजे।’

‘भाई साहब, मैं अकेली हूँ, आप कुछ जल्दी नही कर देंगे?’

मुनीम झुँझला पड़ा – ‘यहाँ सबको तो जल्दी ही पड़ी है। लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता। अगर दिक्कत है तो आप कल आइएगा। मारकीन के कपड़े में बँधी आपको राख मिल जाएगी।’

– ‘नहीं, मैं आज ही आ जाऊँगी।’ – सत्तो चलने को हुई तो मुनीम ने टोका – ‘डेथ सर्टीफिकेट’ देकर ‘डिटेल’ लिखा दीजिए।’

– ‘आपका नाम?’

– ‘शताक्षी।’

– ‘उम्र?’

– ‘पैंतीस वर्ष।’

तब तक दो आदमी घबराए और दौड़ते हुए मुनीम के पास आकर उससे लड़ने लगे। जो राख कपड़े में बाँधकर उन्हें दी थी इकतीस नंबर वाली लाश की राख नहीं है। कोई दूसरा आदमी वह ले जा चुका है। ‘अब मैं क्या करूँ?’ मुनीम ने सफाई दी – ‘आपको कल रात आठ बजे आना था, और आ रहे हो आज।’

सत्तो बार बार मुनीम को अपनी ओर मुखातिब करने की कोशिश कर रही थी – ‘भाई साहब, मैं रात को ही आ जाऊँगी। बल्कि कुछ पहले ही। देखिए, कुछ गड़बड़ न होने पाए।’

वे दोनों जोर जोर से मुनीम को गालियाँ देने लगे। लेकिन वह फिर अपने रजिस्टर पर झुक आया – ‘मरने वाला आपका क्या लगता है?’ उसने सत्तो से पूछा।

– ‘पति।’

शहर और जिला। इस तरह पूरा पता लिखने के बाद मुनीम ने कागज के एक छोटे से टुकड़े पर कुछ लिख कर पास खड़े लड़के को लाश के कफन में टाँकने के लिए थमाया और सत्तो से जाने के लिए कह दिया।

एक लाश के साथ आए पाँच आदमी, वेशभूषा और बातचीत से गाँव के लग रहे थे। वे बहुत देर से एकटक सत्तो की ओर देख रहे थे। श्मशान और अकेली जवान सुंदर औरत। उनके मन में करुणा तो नहीं ही है। कुछ जिज्ञासा और कुछ दूसरी ही बातें होंगी। वे शायद उसी के बारे में बात कर रहे हैं – सत्तो ने सोचा और आगे बढ़ गई थी। वह सुबह ही अस्पताल से सीधे पति की लाश लेकर यहाँ आ गई थी। अब जाकर इतनी देर बाद भीड़भाड़ से निकलते हुए उसने एक लंबे तनाव से राहत महसूस की। आगे थोड़ी दूर पर इत्मीनान से बैठकर बीड़ी पी रहे ठेले वाले ने पूछा, ‘मैडम, काम निबट गया?’

उसे देर हो रही थी। हिसाब चुकता करने के बाद वह मुख्य सड़क के दाईं ओर बने पी.सी.ओ. में घुस गई। वहाँ एक सत्रह अट्ठारह साल का लड़का बैठा था। सत्तो को पचास की नोट लौटाते हुए उसने बताया – ‘आपके भाई और बहनों को मैंने सूचना दे दी है। माँ का फोन या तो ‘डेड’ है या वे घर पर नहीं हैं। भाई ने शाम तक पहुँचने के लिए कहा है। उन्होंने पूछा है कि इस समय आप कहाँ ठहरी हैं?’

सत्तो ने कुछ जवाब नहीं दिया और बोली – ‘पचास रुपए अपने पास ही रखे रहो और माँ के लिए फोन ‘ट्राई’ करते रहना। और सुनो, माँ को यह बता देना कि मैं यहीं रात को बारह बजे मिल जाऊँगी।’

सत्तो जिस समय होटल पहुँची उस समय दिन के दस बज रहे थे। अस्पताल, श्मशान और पी.सी.ओ. तक लगातार लोगों की प्रश्नसूचक नजरों से भिंदती हुई उसे होटल में आकर इस बात से तसल्ली हुई कि यहाँ किसी को उसके पति की मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वह भी आम ग्राहक की तरह यहीं चैन से रहकर आराम कर सकती है। कमरा खोलते हुए नौकर ने पूछा – ‘मैडम, आप नाश्ता लेंगी?’

‘नहीं। सिर्फ एक कॉफी।’ उसके चले जाने के बाद वह बाथरूम में जाकर हाथ मुँह धोने लगी। अस्पताल, दवाइयाँ और फिनायल के साथ ही श्मशान के आसपास फैली गंध जैसे पोर पोर में भर गई है। कई कई बार साबुन से हाथ मुँह धोने के बाद वह बालकनी में आकर खड़ी हो गई। रात तक सारे रिश्तेदार, माँ और भाई आ जाएँगे – उसने सोचा।

नीचे दुकानों के सामने पूरी सड़क पर भीड़ पसर रही थी। आती जाती, दौड़ती भागती भीड़ में आदमी असंख्य हैं लेकिन कोई चेहरा नहीं। शोर है पर शब्द नहीं। जैसे कोई जंगल हॉय हॉय करता चीख रहा हो। उसका पति इस समय इस तेज धूप में श्मशान पर अकेले लाश बन कर पड़ा है। अभी कल तक वह उसका जीता जागता वजूद था। एक अविछिन्न रिश्ता माँ से, घर से, भाई से, बहनों से और सबको तोड़ता अंत में पति सिर्फ पति से। पति के बाद कोई रिश्ता नहीं। आस्था की आखिरी मंजिल। लेकिन जिंदगी हर रिश्ते से बड़ी होती है और अपनी जरूरतों के लिए निर्मम।

भाई बहनों में वह सबसे छोटी थी। जाड़े की गुनगुनी धूप थी। बड़े वाले जीजा आए हुए थे। वह उनके लिए चाय लेकर गई तो उन्होंने पूछा – ‘सत्तो तुम्हें नाचना आता है?’

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– ‘नहीं मैं तो नचाऊँगी।’ वह सबकी मुँहलगी थी। माँ की लाड़ली और मुहल्ले की सबसे शोख चंचल लड़की। घर के पिछवाड़े अहाते में कहीं से लाकर उसने छुईमुई के पौधे रोप दिए थे। और घंटों अकेले वहीं बैठकर उसकी पत्तियों से छेड़छाड़ करा करती। उल्लास और उच्छलता के वे दिन अब कभी नहीं आएँगे। ‘लड़कियों का इतना ‘विटी’ होना अच्छा नहीं। बाद में तकलीफ होती है।’ किसी ने माँ को सावधान किया।

इस समय श्मशान पर पड़ी लावारिश लाश से गुजरती हुई वह अपने विवाह के बारे में सोचने लगी। वहाँ आग की लपटों और मंत्रोच्चार के बीच उसकी स्मृतियों और सपनों को जलाया जा रहा था। मुड़ी तुड़ी उदास सत्तो उस समय शांतनु को सोच रही थी। और आज, बालकनी के नीचे फैला गलियों और गुंबदों का यह शहर, जीता जागता, चिढ़ाता हँसा सा शहर अचानक निर्जीव और खौफनाक प्रेत की तरह उसके मन के एकांत कोने में उभर कर तरह तरह की आशंकाओं में लपेटने लगता। यह शांतनु का शहर है।

‘तुम यहीं प्रतीक्षा करना – उसने शांतनु से कहा था – हफ्ते भर में लौट आऊँगी।’ उसे आपरेशन के नाम पर दूसरे शहर ले जाया गया था। सुहाग सेज पर बैठा दी गई सत्तो तरह तरह की आशंकाओं से भरी हुई थी। ओह! इस नई और अपरिचित जिंदगी की इमारत आज रात के झूठ पर ही खड़ी हो रही है। हे भगवान, मुझे क्षमा करना। सोचा था मैंने एक सीधा सरल जीवन लेकिन… इतना बड़ा पाप! मैं पूरी तरह निर्दोष और अकेली हूँ। बोझ की तरह फेंक दी गई इस निर्जन सन्नाटे में।

विवाह की पहली रात थी। वह अपने पूरे शरीर को योनि में बदलते हुए महसूस करती रही, जहाँ ताजे ‘एवार्सन’ के घाव थे। यह आदमी कहाँ दोषी है? सत्तो ने अपने पति के लिए करुणा से भरकर सोचा और फिर निढाल पड़कर सो गई।

अपने घर की छोटी खिड़की से / देखता हूँ शहर के सबसे ऊँचे गुंबद को / जहाँ खड़े होकर / देखा था सारे शहर को तुम्हारे साथ / और हम नहीं देख सके थे / इस छोटे से घर को।

महज दो मील की दूरी पर शांतनु का घर है। जिस शहर के नाम तक को उसने भुला दिया था आज वह उसी के बीचोंबीच खड़ी है। नीचे सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही है। डोम ने उसे रात को बारह बजे बुलाया है, अभी तो पूरा दिन खाली है, वह बाथरूम में नहाने चली गई।

महीनों लगातार अस्पताल में रहते हुए, स्पेशल वार्ड के उस निहायत स्वच्छ बाथरूम में भी जैसे एक बीमार की गंध फैली रहती। वार्ड ब्वाय को उसने घरेलू नौकर की तरह इस्तेमाल किया। मौसम्मी का रस, सेब या अनार के दाने वह बाजार से कुछ भी लाकर उसे दे जाता। लेकिन सबमें एक बेजान स्वाद और दवाइयों की तीखी गंध हर समय महसूस होती रहती। आज जैसे उन सारी चीजों से निजात मिल गई हो। वह घंटों नल के नीचे ठंडे पानी से नहाती रही। यह उसके वैधव्य का प्रथम दिन है। पति की घिनौनी बदबूदार बीमारी, ठहरी हुई बेस्वाद जिंदगी और अस्पताल के लंबे तनाव से राहत देता, उसके वैधव्य का प्रथम दिन।

सत्तो अब इस जीवन का क्या करेगी? आइने के सामने बैगनी रंग की साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई उसने एक क्षण के लिए सोचा। उसके अनुभवों का निचोड़ यही था कि सोचने से कुछ नहीं होता। घटनाएँ ही जिंदगी का दिशा निर्देश करती रहतीं। और हम कभी भी तयशुदा रास्ते से नहीं चल पाते। उसने तो पहले हमेशा शांतनु के बारे में सोचा था, लेकिन अब वह पढ़ी गई कहानियों की तरह कभी अकेले में उभरकर मिट जाया करता।

नहा चुकने के बाद उसे याद आया कि कल दोपहर के बाद से उसने कुछ नहीं खाया है। उसे भूख लग रही थी। एक बार उसने सोचा कि होटल के इसी कमरे में अपने लिए खाना मँगा ले। लेकिन दूसरे पल ही उसने यह विचार बदल दिया। कमरा बंद करके वह सीधे सड़क पर निकल आई। बावजूद इसके कि तेज धूप में आग के बगूले उठ रहे थे और सड़क जलने लगी थी, उसे आज का मौसम खुला साफ और सुंदर लग रहा था। अगले चौराहे पर रेस्टोरेंट है। जब वह शांतनु के साथ पहली बार उसके इस शहर में आई थी तो अक्सर हर शाम वहीं इडली डोसा खाने आया करती। अगर वहाँ शांतनु मिल जाता। इस समय तो दोपहर है। ऐसी धूप में कौन यहाँ बैठने आएगा।

जब वह पहुँची तो रेस्टोरेंट करीब करीब खाली था। कोने में सिर्फ एक लड़का लड़की के साथ बैठा था। दुकानदार काउंटर पर बैठा चुपचाप सड़क की ओर देख रहा था। शायद उसे भी इस समय खास ग्राहकों की आदत नहीं है। वह भीतर जाकर चुपचाप एक तरफ बैठ गई। न चाहते हुए भी उसकी नजर कोने में बैठे लड़के पर चली गई। वे दोनों सत्तो से बेपरवाह आपस में धीरे धीरे बातें कर रहे थे। वे निश्चित ही किसी अनदेखे भविष्य की योजना बना रहे हैं – सत्तो ने सोचा और उसे लड़के पर थोड़ी सी दया आई।

बेयरे ने पानी का गिलास रखकर पंखा ‘आन’ किया और खड़ा हो गया। ‘दो रोटियाँ, सादा चावल, दाल फ्राई, आलू परवल की भुजिया, सलाद और सुनो – सत्तो ने पर्स से पैसा निकालकर थमाते हुए उससे कहा – बाहर से दो आम खरीद लेना और काट कर थोड़ी देर फ्रिज में रख दो।’ गिलास का एक घूँट पानी पीकर वह चुपचाप सड़क की ओर देखने लगी।

चलो यह अच्छा ही है कि यहाँ किसी को मेरे बारे में नहीं मालूम, यही कि अभी भी मेरे पति की लाश जलाए जाने की उम्मीद में लावारिश श्मशान पर सूख रही है। श्मशान की बात सोचते ही उसे उबकाई आने लगी, अब वह कैसे खाना खा सकेगी। वह दूसरी बातें सोचने का उपक्रम करने लगी। माँ को अब तक जरूर ही खबर लग गई होगी। पता नहीं वे भैया के साथ आएँगी या पड़ोस से किसी को लेकर। यह भी हो सकता है कि भैया ने स्वयं फोन करके माँ को रोक दिया हो। अब चाहे जो भी हो। शांतनु के प्रेम ने घर के भीतर उसके संबंधों का सारा समीकरण ही चौपट कर दिया। वैसे भी शादी के बाद लड़कियाँ जब पहली बार मायके जाती हैं तो उन्हें अपने सोने के लिए स्थान तलाशना पड़ता है। वह तन्मयतापूर्वक अपने बीमार पति की सेवा में लगी रही। पति ने पिछले पाँच सालों में उसे बेहद प्यार किया था। जब कभी वह सामान्य होता तो सत्तो को करुण निगाहों से देखा करता। सत्तो और डाक्टरों के अलावा उसे भी शायद अपनी निश्चित मृत्यु का अंदाजा हो गया था। कल पूरे दिन मृत्यु के तेज हमलों से वह चीखता और छटपटाता रहा। दर्द की किसी दवा का कोई असर नहीं हो रहा था। आसपास के वार्डों से गुजरते डाक्टर लापरवाह नजरों से उसे देखते और आगे बढ़ जाते।

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‘आप अपने घर से किसी और को बुलवा लीजिए।’ डाक्टर ने सत्तो से कहा। अब वह किसी से क्या क्या बताए। इतना असहाय और अकेलापन। उसे अपने ही ऊपर दया आ रही थी। रात नौ बजे जब पति की मृत्यु हुई तो सत्तो को राहत मिली।

शायद बारह से तीन का ‘शो’ छूट गया है। अलग अलग समूहों में चलते हुए ढेर सारे लोग रेस्टोरेंट में आने लगे थे। भीड़ देखकर कोने में बैठी लड़की असहज महसूस करने लगी। लड़के ने बेयरे को बुलाकर बिल चुकता किया और दोनों बाहर निकल गए।

सत्तो भोजन कर चुकी थी और थोड़ी देर अभी बैठना चाहती थी। लेकिन आने जाने वाले वृद्ध, अधेड़ और जवान सब उसे एक नजर जरूर घूरते। लड़कियाँ बचपन से ही ऐसी ‘खाऊ’ नजरों की अभ्यस्त हो चुकी होती हैं। क्या अब भी मेरे भीतर कुछ घूरने के लिए है। यह सोचकर ही उसे हँसी आ गई। थोड़ी देर बाद ही वह बाहर सड़क पर निकल आई।

अभी रात बारह बजने में बहुत देर है। सामने सिनेमा हाल में कोई अंग्रेजी फिल्म लगी है। ढाई तीन घंटा समय तो आसानी से कट सकता है। लेकिन अचानक ही उसे लगा कि अकेले अंग्रेजी फिल्म देखते हुए कोई उसे सस्ती और बाजारू औरत समझकर छेड़छाड़ न करने लगे। वह वापस होटल जाने के लिए मुड़ गई। लेकिन फिर उसने श्मशान के लिए रिक्शा पकड़ लिया।

श्मशान पर भीड़ और बढ़ गई थी। वह एक तरफ थोड़ी दूरी पर खड़ी होकर पति की लाश को देख रही थी। ओह, कितना अकेला है यह। मुझे इस तरह इसे छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। अब यह लाश कुछ सोच नहीं सकती। लेकिन दूसरे लोग तो उसके पक्ष में सोच सकते हैं। तभी तो सारे रिश्ते नातों को भ्रम बताया गया है। यह संसार एक स्वप्न है। किसी एक रात में देखे गए स्वप्न जितना ही ठोस और प्रामाणिक। उसी का विस्तार। पचास साठ या सौ सालों तक चलते फिरते शरीर और खुली आँखों का स्वप्न। पाँच साल पहले मैंने इसी आदमी के साथ भाँवरें ली थीं। अस्पताल आने के कुछ दिन पहले ही इसने मेरे साथ संभोग किया था। वह एकटक उस लाश को देख रही थी। दुख और अभाव में गुजरी मेरी जिंदगी को इसी आदमी ने बदल दिया था। वह रोना चाह रही थी लेकिन सोचने का क्रम उससे भी तेज झटके दे रहा था।

एक औरत को इस तरह वहाँ अकेले देखकर कुछ लोग फिर उसे ही देखने लगे। ‘यह सुबह अपने पति की लाश लेकर आई थी, मैंने देखा था।’ पीछे से किसी की आवाज सुनाई दी।

– ‘लेकिन इसने रंगीन साड़ी पहन रखी है।’ दूसरे ने उत्सुकता प्रकट की।

– ‘शायद अकेले है।’ किसी ने वाजिब चिंता जताई।

लोग उसे लेकर ही बातें कर रहे हैं, सत्तो ने सोचा। यहाँ तो खड़ा रहना भी दूभर है। श्मशान पर काम करने वाले तीन चार मजदूर एक साथ आए और किनारे रखी लाशों को क्रम से उठाकर ले जाने लगे।

– ‘मैडम, आप क्या किसी लाश के साथ आई हैं?’ एक लहीम शहीम आदमी ने पास आकर उससे सवाल पूछा।

– ‘हरामी कहीं का।’ सत्तो ने मन में सोचा – एक पल भी ये लोग चैन नहीं लेने देते। और बिना उसकी ओर देखे सड़क की ओर लौट गई।

पाँच बज रहे हैं- उसने घड़ी में देखा। वह पैदल ही कुछ देर सड़क पर यूँ ही टहलती रही। साँझ होने वाली है। शांतनु कहीं दिख जाता। कई बार ऐसा हुआ है कि बहुत ही एकांत में, जहाँ अपनी ही साँसों की आहट न सुनाई दे, जाकर सत्तो ने बहुत डरते हुए सोचा था कि किसी तरह एक बार वह शांतनु को देख लेती। शादी के तत्काल बाद तो जब भी वह कहीं यात्रा पर जाती उसे ऐसा अंदेशा लगा रहता कि शायद वह कहीं किसी प्लेटफॉर्म पर दिख जाय। ओस की बूँद जितना औरत का जीवन। सपनों की भी कोई निरापद नींद नहीं होती। और उसने ऐसा कभी प्रयास नहीं किया।

एक बार शकीला ने उसे कुरेदना चाहा – ‘क्या तुम शांतनु से मिलना चाहोगी?’

सत्तो काँप गई। एक निर्दोष अपराधिनी की तरह और बोल पड़ी – ‘अब मुझे उससे क्या?’

अब जो कुछ गुजर चुका है उसे सोचने से क्या फायदा? भूल जाओ! और भूलते ही चले जाओ शायद कहीं कोई सुख का एक टुकड़ा मिल जाय। जिंदगी के अलग अलग संदर्भ और प्रसंग हैं। कौन, कब और कैसे आता है और गुजर जाता है। हँसाती रुलाती जिंदगी ऐसे ही अनंत काल से चल रही है। अनंत काल तक चलती चली जाएगी। जो आज चरम सत्य है वही कल हँसी का विषय बन जाता है। किसी दूसरे की सुविधाओं और मानदंडों पर हम क्यों जीते रहें। कभी वह शांतनु के बगैर जिंदगी की कल्पना भी नहीं करती थी। लेकिन जब भाई का करारा चाँटा पड़ा तो अचानक ही उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। ‘माँ, मुझे बचा लो’ – वह जोर से भागी। बड़ी बहन वहीं थी। उससे सत्तो की दशा नहीं देखी गई, बोली – ‘पिछला सोचने से क्या फायदा?’

उसने तीन दिन अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। भाई उसे दूसरे शहर लेकर चला गया, जहाँ उसकी शादी होनी थी। मेरी शादी हो गई। और मैंने शादी कर ली। यह बात शांतनु के लिए एक सूचना भर थी। लेकिन यातना के उस लंबे अँधेरे के बाद मैं साँस भर हवा और आँख भर आकाश के लिए तरस गई थी। मेहमान गाजा बाजा और उत्सव। जिंदगी कितनी देर तक सिर्फ अपनी शर्तों पर जी जा सकती है। लड़कियाँ शादी के बाद सब कुछ भूल जाती हैं। स्मृतिहीन होना किसी का शौक नहीं। भाई सोचता है कि वह प्रेमी को भूल जाए और यह कभी न भूले कि मैं ही उसका बाप भी हूँ। पति सोचता है कि मैं उसकी दुनिया हूँ। एक तुक का बोध नहीं और क्षेपक रचकर जीवन का मूलपाठ ही इन लोगों ने बदल दिया। अब मैं ही क्यों याद रक्खूँ कि आज मेरे पति की मृत्यु हुई है, कि मुझे सिनेमा नहीं देखना चाहिए कि मुझे सफेद साड़ी पहननी चाहिए। अपने तय किए नियमों की तार्किक परिणतियाँ लोग भी भोंगे।

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उसके भीतर जैसे कोई चीत्कार कर रहा हो। उसकी साँस तेज चल रही थी और दिल जोर जोर से धड़क रहा था। क्या ही अच्छा हो वह खुद ही चलकर थोड़ी देर के लिए शांतनु से मिल ले। बस इसलिए नहीं कि अब वह बहुत अकेली हो गई है या आज उसे शांतनु की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा वह मुझे अपमानित ही तो करेगा। इस समय वह एक अनियंत्रित और विचित्र आवेग के वशीभूत हो गई थी। उसी समय एक खाली रिक्शा बगल से जा रहा था। उसने उसे रोका। शांतनु के घर का रास्ता उसे मालूम था।

रात के बारह बजने वाले हैं। दिन भर की बेहद गर्मी के बाद अचानक रात का मौसम बदल गया। आकाश में बादल भर गए थे और ठंडी हवा चल रही थी। शांतनु दूसरे कमरे में शायद सो चुका है। सत्तो जगी हुई सोच रही थी। बाहर हल्की बूँदाबाँदी हो रही है। वह धीरे से उठी और बरामदे में आकर चुपचाप सड़क की ओर देखने लगी। चारों ओर एक डरावना सन्नाटा था। उसने सोचा कि शांतनु को जगाना ठीक रहेगा या नहीं? कहीं वह अटपटा न महसूस करे। इतनी रात को अकेले सड़क पर डर भी लग रहा था। चोर, उचक्के और रात का सन्नाटा इसके अलावा उसे भूतों प्रेतों से भी बहुत डर है। श्मशान तक जाना है। वह बहुत देर तक सोचती रही कि शांतनु को जगाना ठीक रहेगा या नहीं? पहले वह शांतनु पर कितना अधिकार समझती थी। कुहासे और ठंड से काँपती ठिठुरती जाड़े की रात, वह भोर में चार बजे ही उससे मिलने चला आता। तब सत्तो की उल्टी सीधी इच्छाएँ भी शांतनु की मंजिल होती थीं। प्यार और समर्पण का वह युग बीत चुका है। आज उसने कैसे आश्चर्य से मुझे देखा था।

– ‘क्या तुम्हें मेरा आना अच्छा नहीं लगा।’ चाय पीते हुए सत्तो ने शांतनु से पूछा था।

– ‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ शांतनु ने कहा, लेकिन मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है।

थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर – ‘अगर तुम मुझे बताकर शादी करने गई होती तो मेरे लिए ज्यादा सहज होता।’ वह दूसरी ओर देख रहा था।

ऐसी भयानक और अलंघ्य तटस्थता। मेरी सफाई का एक शब्द भी इसके लिए बेमानी है। सत्तो ने सोचा।

सीटी की आवाज के साथ ही लाठी की ठक ठक करता शायद कॉलोनी का चौकीदार इधर ही आ रहा है। अँधेरे का हिस्सा बन कर खड़ी सत्तो ने सोचा – अगर मैं इसी समय और बगैर शांतनु को बताए चुपचाप चली जाऊँ तो शायद यह कल सुबह स्वप्न मानकर भूल जाय। कभी कभी स्वप्न हमारे जीवन में भौतिक स्थितियों से भी ठोस और मूर्तमान होकर आते रहते हैं।

शांतनु से मिलने के थोड़ी देर बाद ही वह बोर होने लगी थी। इतने सालों तक भूलने की लगातार कोशिश में भी वह चाहती थी कि शांतनु से उसकी एक निरापद और सुरक्षित मुलाकात हो पाती। लेकिन आज जब वह मिली तो थोड़ी देर बाद ही वहाँ के समूचे माहौल में अपनी गैरजरूरी उपस्थिति महसूस करने लगी। कुछ कुछ अपमानित भी। उसे आज के अपने इस निर्णय पर पश्चाताप हो रहा था।

‘और तुम्हारे हाल चाल कैसे हैं?’ बहुत देर बाद शांतनु ने पूछा – ‘सुना था बहुत बड़े घर में तुम्हारी शादी हुई है। तुम ठीक हो न?’

फिर वही सन्नाटा छाया रहा। शांतनु क्या पूछे? सत्तो के पास बताने के लिए भी कुछ न था। थोड़ी देर बाद फिर – ‘आज तुम यहाँ, इस तरह आई कैसे?’

अगर इसे मेरे पति की बात मालूम हो जाय तो यही सोचेगा कि मैं अपने मतलब से आई हूँ।

सत्तो शांत थी। और दीवाल पर टँगी उस पुरानी पेंटिंग की ओर देख रही थी जिसे उसने शांतनु के ‘बर्थ डे’ पर दिया था। कुछ तसल्ली हुई तो उसने धीरे से पूछा – ‘तुम्हारे पास मेरे पुराने फोटोग्राफ्स होंगे?’

शांतनु के चेहरे पर एक निर्मम हँसी कौंध गई – ‘अब इतने सालों बाद! तुम्हें कोई डर है क्या? ओह, सत्तो ने लंबी साँस ली और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोली – ‘देखना चाहती हूँ तब मैं कैसी थी।’

‘तुम्हें कब तक रुकना है?’ शांतनु ने पूछा

– ‘एक दूर के रिश्तेदार यहाँ अस्पताल में भर्ती हैं। देखने आई थी। कल सुबह जाना है।’ सत्तो ने उसे बता दिया।

लेकिन कल सुबह क्यों? अचानक उसके भीतर फिर वही विचित्र आवेग फैलने लगा। शांतनु को किस तर्क से जगाए। शायद यह उसे अच्छा न लगे। अगर इसे मेरी इस असहाय दशा का पता चलेगा तो भले ही करुणा दिखाए लेकिन मन ही मन संतुष्ट होगा। आकाश में बादल जोर जोर से गरजने लगे थे। उसने आहिस्ते से दरवाजा उढ़काया और बिना किसी आहट के चुपचाप सड़क पर चल पड़ी। शायद अगले चौराहे से कोई रिक्शा मिल जाए। थोड़ी देर बाद उसे अपने पीछे किसी के चलने की आहट सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा तो एक काला कुत्ता चला आ रहा था। वह डर गई। कहीं यह उसके पति की आत्मा न हो? उसने बचपन से ही भूतों और प्रेतात्माओं की तरह तरह की कहानियाँ सुन रखी थीं।

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