धियनिया | गोविंद उपाध्याय

धियनिया | गोविंद उपाध्याय – Dhiyaniya

धियनिया | गोविंद उपाध्याय

‘अरे इ त गजबे हो गया। हमार करेजा मर गईल… हमार बउकिया मर गईल…। अब इ गाँव की बेटी सुरक्षित नहीं है। अरे हम लोकइया से कहे थे – ए बाबू! …घर में लइकनी को कुँवारी रखना अच्छी बात नहीं है। पर उ मलेछवा तो दूसरे सुर में ही रहता है।’ बड़की काकी बाहरी बरामदे में बैठी आत्म-विलाप कर रही थी।

घर के अंदर से रोने की आवाज अब भी आ रही थी। लोकई मिसिर दाह-संस्कार में व्यस्त थे। बरसात की उमस अपने चरम पर थी। जबकि अभी थोड़ी देर पहले ही पानी बरसना बंद हुआ था। कई दिन से लगातार पानी बरस रहा था। चारों तरफ पानी ही पानी था। खेत-खलिहान सब पानी में डूबे हुए थे। लगभग बाढ़ जैसी स्थिति हो गई थी।

‘बड़े कुसमय मरी है बऊकी…।’ मिसिर जी के दरवाजे पर खड़ी भीड़ में से किसी ने आवाज दिया।

बऊकी पैदा भी कुसमय ही हुई थी। तीन बेटे और एक बेटी के बाद नैनावती पैदा हुई थी। चौंकिए नहीं नैनावती ही नाम था बऊकी का। जब पैदा हुई थी तब किसी ने थोड़े ही सोचा था कि आगे चलकर यह नाम केवल राशन कार्ड और वोटर लिस्ट में ही रह जाएगा और सारी उम्र उसे ‘बऊकी’ नाम ढोना पड़ेगा। क्या फर्क पड़ता था इससे कि उसको कोई ‘बऊकी’ बोले या नैनावती कह कर बुलाए। यह सब सोचने के लिए दिमाग चाहिए और वह उसी से वंचित थी।

बहुत बड़ा गाँव है – रनुआडीह। जहाँ मिली-जुली आबादी है। जाति के हिसाब से यहाँ चार टोला है। जिसमें सबसे बड़ा टोला ‘मियाँ टोला’ है। यह मुसलमानों की बस्ती है। सबसे संपन्न टोला भी यही है। यहाँ लगभग हर परिवार के एकाध सदस्य दुबई में नौकरी करते है। दूसरे नंबर पर मिसिर टोला आता है। यहाँ के भी कुछ लड़के मियाँ टोला के बच्चों के साथ दुबई चले गए हैं। मिसिरों के पास खेत खूब है। कुछ परिवार के लड़के तो शहर में ‘बड़का हाकिम’ तक बन गए हैं। मिसिर टोला को रईसों का टोला भी कहा जाता है। पुरानी पीढ़ी मान-मर्यादा का बहुत ख्याल रखती थी। परंतु नई पीढ़ी में ‘लफंगई’ वालों की तादाद ज्यादा है। सुबह ही मोटर साइकिल दबाएँगे और ‘चौराहा’ पहुँचेंगे। चौराहा यानि गाँव के बाहर की वह जगह, जहाँ कुर्मी और अहिर टोला के लोगों ने दुकानें खोल लिया है। वहीं चाय पीएँगे, शौच करेंगे फिर नाश्ता-पानी के बाद मुँह में गुटका दबा कर, दस बजे तक घर लौटेंगे। अहिर और कुर्मी टोले के पास जमीन भले न हो पर, उनके परिश्रम और लगन में कोई कमी नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने अपने घर पक्के बनवा लिए। दरवाजों पर भैस से लेकर ट्रैक्टर-ट्राली तक दिखाई देता है। उनके बिना मिसिर और मियाँ टोले का कोई काम संभव नहीं है।

लोकई अब पचपन पार कर चुके हैं। मिसर टोले के शुरुआत में ही गूलर के पेड़ के बगल वाला घर उनका है। पहले खपड़ैल का था। जबसे लड़के की दुकान चल निकली। धीरे-धीरे पाँच कमरे का पक्का मकान खड़ा हो गया। कमल नारायण मिश्रा बहुत होनहार निकले। पास के कस्बे में छोटी सी बिजली मरम्मत की दुकान खोली और देखते-देखते वह ‘मिश्रा इलेक्ट्रानिक’ में बदल गई। अब उनके यहाँ मिक्सर ग्राइंडर से लेकर टी.वी. फ्रिज सब बिकता है।

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लोकई मिसिर हर तरह से सुखी थे। सिर्फ एक ही फाँस था उनके पास और वह थी नैनावती…।

जब नैनावती पैदा हुई तो घर में न उसके पैदा होने की कोई खुशी थी ना ही कोई गम। जैसे चार जन…। वैसे पाँच जन…। हाँ बड़की काकी को जरूर दुख हुआ था – ‘एक लइकनी पहले से ही थी। इ दूसर कहाँ से आ गई…। बहुरिया को लरिका हो जाता तो ठीक रहता…।’

बड़की काकी की बात भी रह गई। नैनावती के बाद लोकई एक बेटे के बाप भी बन गए।

लोकई ठहरे किसान आदमी। दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करते…। खेत में पसीना बहाते। उन्हें सिर्फ वर्तमान की चिंता सताती थी। नैनावती के बाद दो बच्चे हुए थे। पर दूसरा पैदा होते ही मर गया था। नैनावती की बहन दो साल बड़ी और भाई सिर्फ डेढ़ साल छोटा था। उन दोनों के बीच उपेक्षित सी पड़ी नैनावती पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। जब छोटा भाई भी दौड़ने और टनाटन बोलने लगा तब लोगों का ध्यान उस पर गया। दुबली-पतली नैनावती का मुँह हमेशा खुला रहता। उससे टपकते लार से सीने के पास का कपड़ा भींग जाता। मक्खियों के झुंड के बीच बैठी नैना कूड़े के ढेर जैसी दिखती। वह बोलती तो मुँह से सिर्फ ‘गो… गो…’ निकलता और चलती तो कुछ कदम के बाद ही धप्प से गिर जाती। हाँ! नैनावती इन सब के बावजूद रोती नहीं थी। बस टुकुर-टुकुर सबको देखती रहती।

माँ ने दबी जुबान से इसकी चर्चा भी की, ‘ ए जी… कुछ गड़बड़ है। नैनवा को कहीं दिखा देते। कौवनो डाकदर से।’

लोकई पत्नी को घूर कर देखते रहे – ‘तुमहू बीच-बीच में बउरा जाती हो का। इ पेट झर्री अउर बोखार थोड़े है कि गोली खा कर ठीक हो जाएगा…। हमहू समझ रहे हैं। नैनवा बऊकाह है। थोड़ा बड़ी होने दो…। धीरे-धीरे सब समझने लगी। फिर जवन जेकरे भाग में लिखा होगा…। उहे न होगा।’

पाँच-छह वर्ष का होते-हवाते यह साफ हो गया कि नैनावती सामान्य बच्चा नहीं है। उसके दिमाग में कुछ कमी है। पहली बार लोकई मिसिर को उसके लिए चिंता हुई। पर वह कर भी क्या सकते थे – ‘जब भगवान पैदा किए हैं तो उहे सँभालेंगे भी। सब अपना-अपना भाग लेकर इस धरती पर आए हैं।’

नैना ‘बऊकी’ हो गई। नैना उपेक्षित हो गई… अब नैना का होना न होना उस घर में कोई मायने नहीं रखता था। ऐसा मान लिया गया कि उसके पास बुद्धि नहीं है। इसलिए उसकी कोई निजी आवश्यकता भी नहीं है।

लेकिन ऐसा नहीं था। नैनावती बहुत संवेदनशील थी। उसके अंदर भी सपने उगते थे। वह भी अपने भाई-बहन के साथ स्कूल जाना चाहती थी। वह भी बच्चों के साथ खेलना चाहती थी। पर यह सब वो कह नहीं पाती थी और न यह सब करने की उसके पास क्षमता थी। बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें निहारती।

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गोरी-चिट्टी नैना देखने में सुंदर थी। उम्र के अठारहवें साल में वह पाँच फुट की दुबली-पतली… सामान्य युवती सी दिखती। लेकिन जल्द ही लोगों को पता चल जाता कि कहीं कुछ गड़बड़ है। वह बोलती तो शब्द एक-दूसरे में इतना गुँथ जाते कि कुछ भी समझ नहीं आता। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह हाथ का इशारा भी करती। जब वह चलती तो एक अजीब सा धब्ब-धब्ब का स्वर उत्पन्न होता। घर में उसे सिर्फ बर्तन धोने और झाड़ू पोंछा जैसा काम ही दिया जाता। उसमें भी बहुत ज्यादा कुशलता उसके पास नहीं थी।

उसके लिए नए कपड़े शायद ही कभी सिलवाए जाते हों। हमेशा बड़ी बहन की उतरन ही उसे मिलती। उन कपड़ों का रंग धूमिल हो चुका होता। बड़ी बहन उससे लंबी और ज्यादा स्वस्थ थी। इस लिए उसके कपड़े नैनावती के शरीर में आ कर ढीले और लंबे हो जाते। जब वह थोड़ा बड़ी हुई तो उसने विरोध भी जताया। पैर पटका – ‘हाम… ना… हाम… बी… नजा… नजा…।’

तब माँ ने पुचकार से उसे शांत कर दिया, ‘मोर बच्चा… तोहरे लिए भी नया-नया आएगा।’

पर नैनावती के लिए उस घर में कुछ भी नया कभी नहीं आया।

नैनावती की यह घोर उपेक्षा उसे और दयनीय बना देती। बच्चे जवान हो चले थे। बड़ी बेटी के विवाह के लिए लोकई मिसिर चिंतित थे। कई जगह विवाह की बात चलती और फिर बात बनते-बनते रुक जाती। जब कभी नैना के बारे में सोचते तो उनकी चिंताएँ और गहरी हो जाती – ‘जब सुघड़ और सुंदर लड़कियों की शादी होने में आदमी के जूते की एड़ियाँ घिस जाती है… तो इस बऊकी से भला कौन बियाह करेगा। और बिना विवाह के लड़की को घर में रखना तो महा पाप है…।’

फिलहाल तो वह बड़ी बेटी के विवाह के लिए ही चिंतित थे। लेकिन इस चिंता से उन्हें जल्द ही निजात मिल गई। पास के ही गाँव में उनके इच्छा के अनुरूप लड़का मिला गया था।

लोकई तो यह सोचे थे – बऊकी का भी उसी लड़के से सिंदुर छुआ देंगे और वह भी सुहागिन मान ली जाएगी। पर लड़के के घर वालों ने साफ मना कर दिया, ‘भाई इ सब टिटिम्मा करना है तो हम इस रिस्ता को यहीं रोक देते हैं। आप उसके योग कोई लरिका खोज कर बियह दें। हमें इसमें न सानें।’

बात वहीं खतम हो गई। लेकिन लोकई का सर दर्द और बढ़ गया। बड़की काकी विवाह के समय ही हल्ला करने लगी – ‘लोकई इ तुम ठीक नहीं कर रहे। सेनुर छुअवा दो दूल्हा से बऊकी को। काहे उसे धियनिया बनाने पर तुले हो…?’

लोकई बड़की काकी का हाथ जोड़कर शांत करते रहे – ‘चुपा जो काकी हम जोगाड़ कर रहे हैं बउकियों का कहीं बियाह कर देंगे।’

बड़की काकी बहुत मुश्किल से शांत हुई। दरअसल बड़की काकी की कोई संतान नहीं थी। उनका खेत-बगीचा भी लोकई मिसिर के पास ही था। बड़की काकी उनके पिता के बड़े भाई की पत्नी थी। पचहत्तर पार कर चुकी थी। कमर झुक गई थी। शरीर की उर्जा चुक गई थी… पर जुबान उनकी अभी भी बहुत तेज थी।

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बड़की काकी आज भी अपने समय में जी रही थी। तभी तो वह चाहती थी कि बऊकी का विवाह भी हो जाए। काकी जब-तब इसके लिए लोकई को कोंचती रहती – ‘ये लोकई कवनो लरिका बउकिया के लिए भी खोजो। नहीं तो कुँवारी मर गई तो इस गाँव के लिए काल हो जाएगी। धियनिया बन जाएगी तो कवनो लड़की को सोहागिन नहीं होने देगी। सेनुर लगने के पहिले ही सब लइकनी खून बोकर मर जाएँगी। गाँव को कलंक लग जाएगा। हमरे मइके के पास निकरुआ गाँव है… उहाँ के लोग बहुत भोगे है धियनिया का गुस्सा… दस साल तक उस गाँव की किसी लइकनी को सोहाग नसीब नहीं हुआ…। हमारी दादी बताती थी – बनारस के पंडित जी आ कर धियनिया का गुस्सा शांति किए थे। तीन हफ्ता तक पूजा-पाठ अउर हवन होता रहा था…।’

बऊकी, बड़की काकी से खूब हिली-मिली थी। बड़ी बहन का विवाह हो गया। उससे छोटे भाई का विवाह हो गया। तब बऊकी बड़की काकी के पास खड़ी हो कर अपने माँग में सिंदूर डालने का इशारा करते हुए कहती – ‘डा… हमार… बि… कब…?’

फिर तो बड़की काकी लोकई को कोसना शुरू कर देती और नैनावती अपने होठों पर अँगुली रख कर चुप रहने का इशारा करते-करते सहम जाती।

लोकई लाख प्रयास के बावजूद नैनावती के विवाह में सफल नहीं हो पाए। अचानक एक दिन नैनावती को बुखार हुआ। बरसात का मौसम था। इस मौसम में सर्द-गर्म रहता ही है। ऐसे में बुखार कोई बहुत बड़ी समस्या तो थी नहीं। फिर बऊकी तो वैसे भी उपेक्षित थी।

‘मामूली बुखार है… एकाध दिन में ठीक हो जाएगा। तुलसी का काढ़ा और बुखार के लिए पैरासीटामाल दे दो। खाँसी भी ठीक और बुखार भी ठीक…।’

हमेशा कि तरह इस बार की लापरवाही ने नैना की हालत बिगाड़ दी। जब तक लोग नर्सिंग होम में भर्ती कराते, हालत काफी गंभीर हो गई। डाक्टरों ने डेंगू बताया… और तीन दिन के इलाज के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।

नैनावती के मरने का किसी को दुख नहीं था। दुख था तो सिर्फ बड़की काकी को…। उन्हें लगता – नैना धियनिया बनकर अब गाँव की सभी जवान लड़कियों को सताएगी।

जब लोकई मिसिर नैनावती के अंतिम संस्कार कर रहे थे तो उनके चेहरे पर एक लंबे समय बाद सुकून झलक रहा था। वह अब काफी राहत महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था जिस पहाड़ को वह वर्षों से ढो रहे थे। वह उनके सिर से हट गया है।

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