दबे पाँव

कुछ समय हुआ एक दिन काशी से रायकृष्ण दास और चिरगाँव से मैथिलीशरण गुप्त साथ-साथ झाँसी आए। उनको देवगढ़ की मूर्ति कला देखनी थी – और मुझको दिखलानी थी। देवगढ़ पहुँचने के लिए झाँसी-बंबई लाइन पर जालौन स्टेशन मिलता है। वहाँ से देवगढ़ सात मील है। बैलगाड़ी से जाना पड़ता है, जंगली और पहाड़ी मार्ग है।

मैं इससे पहले दो बार देवगढ़ हो आया था। सरकार देवगढ़ को अपनी देखरेख में लेना चाहती थी। जैन संप्रदाय देना नहीं चाहता था, क्योंकि देवगढ़ के किले में प्राचीन जैन मंदिर थे, जिनके प्रबंध की ओर उपेक्षा अधिक थी और व्यवस्था कम। परंतु मैं जैन समिति का वकील था। मंदिर की अवस्था और व्यवस्था देखने के लिए जाना पड़ता था।

हम तीनों जाखलौन स्टेशन पर सवेरे पहुँच गए। मैंने आने की सूचना पहले ही भेज दी थी। स्टेशन पर उतरते ही कुछ हँसते-मुसकराते चेहरे नजर आए। एकाध चिंतित भी। चिंता का कारण मैंने मित्रों को सुनाया। पहली बार जब गया था, समिति के मुनीम ने मेरे भोजन की व्यवस्था के संबंध में पूछा।

मैंने कहा, ‘दूध पी लूँगा।’

मुनीमजी ने पूछा, ‘कितना ले आऊँ?’

मैंने उत्तर दिया, ‘जितना मिल जाय।’

‘सेर भर?’

‘खैर! ज्यादा न मिले तो सेर भर ही सही।’

‘दो सेर ले आऊँ?’

‘कहा न, जितना मिल जाय।’

‘यानी तीन-चार सेर?’

‘क्या कहूँ, पाँच-छह सेर भी मिल जाय, तो भी हर्ज नहीं।’

‘पाँच-छह सेर!’ मुनीम ने आश्र्चर्य प्रकट किया। सिर खुजलाया और मुसकुराकर व्यंग्य करते हुए बोला –

‘उसके साथ कुछ और भी?’

मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा, ‘यह तुम्हारी श्रद्धा के ऊपर निर्भर है।’

मुनीम सिर नीचा करके चला गया। थोड़ी देर में एक छोटे घड़े में पाँच सेर दूध और थोड़ी जलेबी लेकर लौट आया। उसके सामने ही मैंने सब समाप्त कर दिया। जब देवगढ़ वापस हुआ और झाँसी जाने को हुआ, मुनीम मेरे सामने सिकुड़ता-सकुचाता हुआ आया।

बोला, ‘वर्माजी, बुरा न मानें तो अर्ज करूँ – एक रसीद दे दीजिए।’

मैंने अपनी स्मृति को टटोला-किस बात की रसीद माँगता है, फीस तो मैंने अभी ली नहीं है।

मैंने पूछा, ‘किस बात की रसीद?’

मुनीम ने नीचा सिर किए हुए ही कहा, ‘पाँच सेर दूध और पाव भर जलेबी की रसीद। समितिवाले यकीन नहीं करेंगे की वकील साहब पक्का सवा पाँच सेर डाल गए। शक करेंगे कि मुनीम पचा गया।’

मुझे हँसी आई। मैंने रसीद दे दी।

उस स्टेशन वाले की चिंता का कारण सुनाते ही रायकृष्ण दास और मैथिलीशरण गुप्त कहकहे लगाने लगे। चिंतित चेहरे पर शरारत की भी हल्की-पतली लहर थी।

उस पर भी हँसी आ गई। मैंने कहा, ‘अब की बार वह सबकुछ नहीं है, मुनीमजी।’

हम लोग बैलगाड़ी से देवगढ़ पहुँचे। छकड़े के धक्कों और दचकों को हम लोगों ने अपनी बातों और हँसी में दबा लिया।

देवगढ़ के किले के नीचे गुप्तकालीन विष्णन मंदिर है। उस समय पुरातत्व विभाग ने उनको अपने अधिकार में नहीं लिया था। मंदिर खंडहर के रूप में था। पत्थरों में रामचरित के दृश्य उभरे पड़े थे। एक विशाल खंड पर, जो मंदिर की एक बगल में सटा हुआ था, शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए विष्णु, लक्ष्मी और कुछ देवताओं का उभार था। उसको देखकर हम लोग विस्मय और श्रद्धा में एक साथ डूब गए। देखते-देखते आँखे थकी जा रही थीं; परंतु मन नहीं भरता था – मूर्तियों के उस खंडहर के चारों ओर जंगल और सूनसान। कुछ दूरी पर जंगली जानवरों की पुकारें और जंगल में काम करनेवाले थोड़े से मनुष्यों के कभी-कभी सुनाई पड़ जानेवाले शब्द। पवन की सनसनाहट में बरगद और पीपल के पत्तों की खरभरी। इन सबके ऊपर विष्णु की मूर्ति की बारीक मुसकान थी। एक ओर ऊँची पहाड़ी पर हरे-हरे पेड़ों में उलझा हुआ किला और उसके भीतर निस्तब्ध मंदिर और शांतिनाथ की मूर्तियाँ और दूसरी ओर विष्णु की वह अभय देनेवाली मधुर वरद मुसकराहट प्रकृति को गुदगुदी दे रही थी, वातावरण को विशालता, इतिहास को महानता और भविष्य को शाक्ति। हम लोगों को उसने जो कुछ दिया, उसके लिए हृदय बहुत छोटी जगह है।

पुकारें और जंगल में काम करनेवाले थोड़े से मनुष्यों के कभी-कभी सुनाई पड़ जाने वाले शब्द। पवन की सनसनाहट में बरगद और पीपल के पत्तों की खरभरी। इन सबके ऊपर विष्णु की मूर्ति की बारीक मुसकान थी। एक ओर ऊँची पहाड़ों पर हरे-हरे पेड़ों में उलझा हुआ किला और उसके भीतर निस्तब्ध मंदिर और शांतिनाथ की मूर्तियाँ और दूसरी ओर विष्णु की वह अभय देनेवाली मधुर वरद मुसकराहट प्रकृति को गुदगुदी दे रही थी, वातावरण को विशालता, इतिहास को महानता और भविष्य को शक्ति। हम लोगों को उसने जो कुछ दिया, उसके लिए ह्दय बहुत छोटी जगह है।

विष्णु की नाक के बिलकुल अग्र भाग को किसी मूर्ति भंजक ने टाँकी से छीला था। शायद वह उस समग्र मूर्ति के खंड करना चाहता था; परंतु – जान पड़ता है – उसके हाथ, हथौड़ी और टाँकी – सब कुंठित हो गए। क्रूरता और बर्बरता के ऊपर उस स्मित ने कोई मोहिनी डाल दी। अब उसका वशीकरण पुरातत्व विभाग के ऊपर है। मूर्तियाँ यथावत रख दी गई हैं। अहाता बना दिया गया है और चौकीदार रहता है।

हम लोग किले के मंदिरों में देखते फिरे। मूर्तियों की मुद्रा एकांत शांति की थी। उन सबका एकत्र प्रभाव मन में सुनसान पैदा करता था। परंतु उस सुनसान में होकर जब मन विष्णु के अर्धस्मित की ओर झाँकता था तब उस स्मित की झाँकी में जीवन दिखलाई पड़ जाता था।

घूमते-घूमते हम लोग किले के छोर पर पहुँचे। उस स्थान का नाम ‘नाहर घाटी’ है। वहाँ खड़े होकर बेतवा नदी का ऊबड़-खाबड़ प्रवाह देखा। किले की पहाड़ी से सटकर बहती है। नदी तल में टोरें, पत्थर, जल-राशियाँ और वृक्ष समूह हैं। नाहर घाटी के नीचे गहरा नीला जल और ऊपर, पहाड़ी पर से, बहता हुआ धूमरा-काला शिताजित्।

नदी तल में, एक टापू पर, कतारबंद वृक्ष समूह के देखकर मेरे मित्रों को आश्चर्य हुआ। एक ही कद के, एक-से डौल के, कतारों में खड़े पैड़ों को देखकर मनुष्य के बनाए उद्यान का भ्रम हुआ। परंतु उस वृक्ष समूह में प्रकृति और केवल प्रकृति की कला के सिवाय और किसी का हाथ था ही नहीं, इसलिए भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं मिली।

पहाड़ों, जंगलों और नदी की करामातों के भिन्न-भिन्न दृश्यों को देखते-देखते मन थकता ही न था। यहाँ तक कि गाँठ का सब खाना निबटा लेने के बाद भी काली अँधेरी रात और विकट बीहड़ मार्ग की चिंता न थी। गई रात जाखलौन पहुँचकर क्या खाएँगे, इसकी कोई फिक्र नहीं। जब रात हो गई तब हम लोग वहाँ से टले।

बैलगाड़ी धीरे-धीरे टक-टक जा रही थी कि यकायक बैल रुक गए और बँगलें झाँकने लगे। तेंदुओं ने रास्ता रोक रखा था।

हम लोगों के हाथ में केवल बाबुआनी छड़ियाँ थीं तेंदुओं के मुकाबले के लिए। तोप-तमंचों के मुकाबले के लिए अकबर इलाहाबादी ने अखबार निकालने की सलाह दी; परंतु तेंदुओं का मुकाबला बाबुआनी छड़ियों से किस तरह किया जाए, इसकी सलाह हम लोग किससे लेते। अंत में हल्ला-गुल्ला करते हुए – और गाड़ीवान की बुद्धि का सहारा-लेकर किसी तरह जाखलौन लौटे। उस समय मेरे मन में एक भाव जागा था। यदि बंदूक हाथ में होती तो कितना हौसला न बढ़ता।

मेरे पिता परम वैष्णव थे। वर्तमान वैष्णव धर्म की परंपराओं में पले, हथियार निषेध कानून के वातावरण में घुले बीसवीं सदी के प्रारंभिक कालवाले के लिए बंदूक एक गैर जरूरी और दूर की समस्या थी। इसलिए वह भाव मन के एक कोने में समा गया।

कुछ दिनों बाद एक घटना फिर घटी।

मुझको कभी-कभी वकालत के संबंध में बाहर जाना पड़ता था। एक बार बरसात में मैं बैलगाड़ी से लौट रहा था। मार्ग में ही साँझ हो गई। पानी तो नहीं बरस रहा था, परंतु आकाश बादलों से घिरा हुआ था। रात होते ही अँधेरा बहुत सघन हो गया। बैल चलते-चलते एकदम ठिठक गए। बिजली चमकी और तेंदुआ बीच सड़क पर दिखलाई पड़ा। देवगढ़ की याद आ गई। परंतु उस समय साथ में हल्ला-गुल्ला करनेवाले लोग बहुत थे; यहाँ मैं, गाड़ीवान और मेरा मुंशी बस। एक उपाय सूझा। मैंने रूमाल फाड़कर छड़ी के सिरे पर लपेटा। दियासलाई से आग लगाई और तेंदुए को हल्ला करके डराया। वह चला गया, परंतु एक निश्चय मन में छोड़ गया – जंगली जानवर को भयभीत करने के लिए और अधिक रूमाल न फाड़कर आगे कारतूस फोड़ूँगा। बंदूक का लाइसेंस लिया। एक .310 बोर की राइफल सुलभ थी। ले ली। परंतु उससे संतोष नहीं हुआ। तब .12 बोर की दुनाली और 275 बोर पँचफैरा माउचर लिया।


2

हिंदी में कुछ-न-कुछ लिखने की लत पुरानी है। सन् 1909 में छपा हुआ मेरा एक नाटक सरकार को नापसंद आया। जब्त हो गया और मैं पुलिस के रगड़े में आया। परंतु रंगमंच पर अभिनय करने पर अभिनय करने का शौक था और नाटक लिखने का भी; उपन्यास तो मेरे पथ में बहुत देर में आए। चार-पाँच नाटक 1908 में लिखे थे। कई वर्षों के बाद उनको दुबारा पढ़ा। मैंने अपने से पूछा, ‘ये किसके लिखे?’ बड़ी ग्लानी हुई। मैंने उन सबको फाड़कर पानी में फेंक दिया। बंदूक सँभालने पर पुरानी कामनाएँ फिर जाग्रत हुईं। जंगल और पहाड़ों के भ्रमण ने विवश किया। अनेक प्रकार के स्त्री-पुरुष वकालती पेशे में मेरे अनुभव में आते रहे। उनकी ढाल-पुरुष वकालती पेशे में मेरे अनुभव में आते रहे। उनकी चाल-ढाल एक बँधे हुए ढाँचे की थी। कुछ थोड़े ही ऐसे मिले जिनको झूठ और छल-कपट से घिन हो। परंतु जंगलों, पहाड़ों और देहातों में जो नमूने मिले, वे बिलकुल दूसरे और एक-दूसरे से भिन्न। सच्चाई स्पष्ट और उनका झूठ भी उतना ही साफ। यह बात नहीं कि गूढ़ और रहस्यमय लोग न मिले हों – काफी संख्या में मिले और नगरवालों से कहीं अधिक गहरे। उनकी तह तक पहुँचने में आश्चर्य होता – अन्वेषण, विश्लेषण और संश्लेषण के विद्यार्थी को परम संतोष। मुझको यह सब बंदूक की ओट में मिला। शायद वैसे भी मिलता, और लोगों को यों ही प्राप्त हो जाता है; परंतु मुझको शायद इसी तरीके से लिखा बदा है।

मैं काम करते-करते प्रत्येक शनिवार की संध्या की बाट जोहा करता था। जो कुछ भी सवारी मिली, अपने मित्र श्री अयोध्याप्रसाद शर्मा को लेकर शनिवार की शाम को चल दिया; रविवार जंगल में बिताया और सोमवार को सवेरे काम पर वापस।

इस क्रम में सबसे पहले मुझको कई प्रकार के हिरन मिले।

झाँसी से चौबीस-पच्चीस मील दूर एक मित्र की बारात में शामिल होना था। जिस दिन टीका था उसी दिन झाँसी की कचहरी में अनिवार्य काम था। दूसरे दिन छुट्टी थी। काम चार बजे खत्म हुआ। और कोई सवारी न थी, एक ताँगा किराए पर किया। थोड़े से कपड़े लिये, गरमी की ऋतु थी-वैसे भी मैं साथ में बहुत कम कपड़े लेकर बाहर जाता हूँ – .12 बोर की दुनाली बंदूक ली पचास कारतूस। तेजी से भी जाते-जाते लगभग नौ बजे रात को गाँव जब करीब एक मील रह गया, पहुँचा। इस जगह पहूज नदी का रपटा मिला। रपटे के एक किनारे खुसफुस करते हुए बहुत से आदमी दिखलाई पड़े। उनको गिन नहीं सका; परंतु बीस से ऊपर लगे। ताँगेवाला डरा। मैंने उसको उत्साहित किया और तुरंत दुनाली में दो कारतूस डालकर तैयार हो गया।

उन लोगों ने कोई रोक-टोक नहीं की। ताँगा निकल गया। मैं जब बारात में पहुँचा, बड़ी धूमधाम देखी। इतनी रोशनी कि आँखें चौंधियाने लगीं। दूल्हा जेवरों से लदा हुआ था और अनेक बाराती सोने और मोतियों से अपने कंठ सजाए हुए थे। बारात में कम-से-कम पचास बंदूकें थीं और पुलिस की एक पूरी गारद। रक्षा के पूरे उपकरण थे। मैंने सोचा, ‘यदि मैं डाकू होता तो केवल दो संगियों को लेकर सारी बारात लूट लेता। इस मरकरी रोशनी में बारातवाले बंदूकचियों की चकाचौंध खाई हुई आँखें कुछ भी न कर पातीं। मैं अंधेरे में ओट लेकर, चार-पाँच कारतूस दागकर सारी बारात को भगा देता।’

जैसे ही यह कल्पना मन में आई, मुझे पहूज नदी के रपटे पर मिले हुए उन बंदूकवालों का स्मरण हो आया।

बारात के नायक मेरे मित्र हिंदी स्कूल के मेरे छूटपन के सहपाठी थे। मैं उनको अलग ले गया। आपस में काफी बेतकल्लुफी थी।

मैंने पूछा, ‘इतनी बंदूकों और पुलिस गारद की जरूरत क्यों पडी?’

‘तुम्हें मालूम नहीं? मजबूतसिंह डाकू चालीस-पचास आदमियों का गिरोह लिये यहीं कहीं आसपास है। रखवाली के लिए ये सब बंदूकवाले और पुलिस के सिपाही आए हैं।’ उन्होंने उत्तर दिया।

‘जी हाँ, खूब रखवाली होगी! मजबूत सिंह थोड़ी सी आड़ लेकर इस प्रचंड रोशनी में इकट्ठे समूह पर जब गोली चलावेगा तब दस-बीस आदमी कुछ देर में ढेर हो जाएँगे और बाकी भगदड़ में शामिल होकर हवा हो जाएँगे। पुलिस कुछ नहीं कर सकेगी।’

‘क्या किया जाय?’

‘दूल्हा का सब गहना उतारकर एक बक्स में रक्खो, और इन पुरुष गुंडों ने जो सजावट की है उसको भी हटाकर बक्स में रखवा दो। इस काम को सावधानी के साथ चुपचाप करो। मैं डाकुओं को देख आया हूँ। अभी लगभग एक मील की दूरी पर हैं। थोड़ी देर में पास की पहाड़ी में आ छिपेंगे और मौका पाकर छापा मारेंगे।’

‘गहने वाले बक्स का क्या होगा?’

‘बारात का डेरा इस पहाड़ी के नीचेवाले पेड़ों की छाया में है। यहीं पर बक्स रख दो। डाकू धोखे में आएँगे। मैं एक आदमी को साथ लेकर यहीं रह जाऊँगा, तिलक-टीके में नहीं जाऊँगा। तुम बंदूकवालों के कई दस्ते बनाओ। कुछ को बारात से अलग अँधेरे-अँधेरे में आगे चलने दो, कुछ को बारात के अगल-बगल और कुछ को बिलकुल पीछे।’

मेरे मित्र मान गए। उन्होंने मेरे कहने के अनुसार काम किया। बारात टीके के लिए चल दी।

मैंने डेरे में बक्स रखा। मेरा साथी चिरगाँव का करामात था। वह मेरा शिकारी साथी था। उसके पास .12 बोर की इकनाली बंदूक थी। हमलोगों के साथ और कोई न था।

डेरा क्या, छाया के लिए एक पाल था। उसके अगल-बगल कनात या आड़-ओट कुछ न थी। बड़े-बड़े पेड़ अवश्य थे। पास ही पहाड़ी थी। हम लोगों के पास रोशनीवाला हंडा था। मैंने करामत से उस हड़े को हटवाकर पहाड़ी की तली में रखवा दिया। पाल के नीचे अँधेरा हो गया और पहाड़ी पर उजेला।

मैं और करामत फर्श पर औंधे लेट गए। बंदूकें भरकर छतिया लीं। मेरा रुख पहाड़ी की

इस लेटाई-लाइंगलोड-को लिये हुए बहुत विलंब न हुआ होगा कि पहाड़ी में लोगों के इकट्ठे होने की आहट मिली। मैंने करामत को संकेत किया और चुप पड़े रहने के लिए धीरे से कहा।

पहाड़ी में वे लोग जल्दी जमा हो गए। आश्चर्य करते होंगे कि किस बेढंगे ने पहाड़ी के पड़ोस में रोशनी का हंडा रख दिया।

डेरे में सुनसान प्रतीत करके उन्होंने एक मूर्खता की। आग जलाकर तंबाकू पीने लगे। हंडे की रोशनी और तंबाकू के लिए की हुई आग के प्रकाश में वे मेरी पहचान में आ गए। मैंने उनसे कहीं बढ़कर ज्यादा मूर्खता की।

मैं चिल्लाया, ‘यहाँ है सब गहना! है तुममें से किसी की छाती में बाल, जो आकर इसको उठाए? उठाओ सिर और किया मैंने गोली से चकनाचूर।’

करामत ने धीरे से मेरी प्रताड़ना की। बोला, ‘बड़े भैया, ऐसी चुनौती नहीं दी जाती।’

मैं अपने घमंड और बड़े बोल पर मन में सहमा; परंतु बात मुँह से निकल चुकी थी। अब तो उसका निभाना ही बाकी रह गया था। उसी समय करामत की ओर से एक बिच्छू मेरी तरफ आया। करामत ने धीरे से मुझको सावधान किया।

मैंने कहा, ‘होगा! इतनी बेवकूफी के बाद अब मैं बिच्छू से बचने के लिए बैठ नहीं सकता।’ बिच्छू मेरे कंधे के पास से आगे बढ़ा। मैं चुपचाप पड़ा था। वह धीरे-धीरे मेरी कुहनी के पास आ गया। शायद न काटता; परंतु यदि डंक मार देता तो एक हाथ बेकार हो जाता और यदि डाकू मेरे शेखी का जवाब देते तो मैं अपने घमंड के समर्थन में एक हाथ भी न उठा पाता। मैंने एक हाथ में बंदूक सँभाली और दूसरे हाथ में मुट्ठी से बिच्छू को खत्म कर दिया।

अब डाकुओं से भिड़ जाने के लिए पूरी साँस मिल गई। परंतु चोरों, बटमारों और लुटेरों में इतना साहस कहाँ होता है, जो इस प्रकार की चुनौती को स्वीकार करते।

वे धीरे-धीरे खिसक गए

पौ फटने के समय बारात लौटी। तब तक हम दोनों उसी लेटाई में अपनी पसलियों का भुरकस करते रहे।

बारात में मेरे कई शिकारी मित्र भी थे। एक लँगड़ा दढ़ियल शिकार का लती भी। उसके पास बंदूक न थी; परंतु खाने को हिरन चाहता था। साथ हो लिया।

चलते ही, थोड़ी देर बाद, हिरनों के झुंड-के-झुंड मिले। हिरन सब मिलाकर सौ के ऊपर होंगे। बड़े-बड़े सींगवाले कर छाल सब झुंडों में दस-बारह से कम न थे। उदय होते हुए सूर्य की कोमल किरणें उनकी चिकनी-चमकती हुई देहों पर रिपट रही थीं। आँखें बड़ी-बड़ी। इन्हीं की उपमा तो कवियों ने अपनी कामिनियों को दी हैं। गोली न चलाने का मोह उत्पन्न हुआ। परंतु किसानों की खेती का भरपूर नुकसान भी तो ये ही करते हैं। मोह को छोड़ दिया। अब केवल चुनाव का सवाल सामने था-इनमें से किसको निशाना बनाऊँ?

एक बहुत पुराना, बड़े सींगवाला एक झुंड का नायक था। उसको एक ही गोली से समाप्त कर दिया। बाकी भाग गए।

परंतु यह निशाने पर बहुत देर में था।

हिरन का शिकार काफी श्रम और सावधानी चाहता है। कभी निहुरकर चलना पड़ता है, कभी दर्जनों गज पेट के बल, कभी घुटने के बल और कभी-कभी गोद में बंदूक रखकर पीठ के बल घिसटना भी पड़ता है।

उस हिरन को लेकर करामत इत्यादि पहूज नदी के किनारे पहुँचे। एक भरके में की छाया के नीचे जा बैठे। नदी के उस पार से यह स्थान दिखलाई पड़ता था। नदी में धार पतली थी। पाट भी चौड़ा न था।

हम लोग रात भर के जागे थे। मैं एक पत्थर के सहारे टिक गया। बाकी लोग रूमाल या साफे से मुँह ढककर सो गए। इनमें लँगड़ा दढ़ियल भी था। करामत बैठा-बैठा बीड़ी पीने लगा।

इतने में उस पार एक देहाती दिखलाई पड़ा। उसने वहीं से पुकार लगाई, ‘आग है, आग? तंबाखू पीना है।’

करामत ने शरारत की। व्यंग्य के स्वर में उत्तर दिया, ‘हओ, है आग हमाए पास। आओ इतै, हम देवें आग।’

देहाती ने समझा, डाकुओं का गिरोह है; वह उलटे पाँव भागा।

परंतु उसके भागने का सही कारण उस समय मेरी समझ में नहीं आया था। थोड़ी ही देर में एक और आदमी नदी के उसी किनारे पर आया। वह कुछ क्षण खड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे हम लोगों के पास आया। आकर बैठ गया। उसमें और करामत में बातचीत होने लगी।

आगंतुक ने कहा, ‘हिरन तो बढ़िया मारा।’

करामत ने शेखी बघारी, ‘हम लोगों का निशाना चूकता थोड़े ही है!’

‘आप कहाँ से आ रहे हैं?’

‘जहाँ से मन चाहा।’

‘कहाँ जाएँगे?’

‘जहाँ सींग समावें।’

‘और लोग भी साथ हैं?’

‘और लोग भी साथ हैं?’

‘ज्यादा सवाल करने से गड़बड़ हो जाएगी।’

अब मुझको संदेह हुआ, करामत कोई अभिनय कर रहा है।

आगंतुक जाने को हुआ। उसी समय लँगड़े दढ़ियल ने अपने मुँह पर से साफे के छोर को हटाया। आगंतुक के अचरज का ठिकाना न रहा।

यकायक उसके मुँह से निकला, ‘ओफ! आप लोग बहुत बच गए। थोड़ी ही देर में न जाने क्या से क्या हो जाता!’

लँगड़े दढ़ियल ने आगंतुक का अभिवादन किया, ‘मामा, राम-राम!’

लँगड़ा आगंतुक का भानजा था।

करामत हँसकर बोला, ‘क्यों, क्या हो गया?’

आगंतुक ने उत्तर दिया, ‘हो तो कुछ नहीं गया, पर हो जाता। मैं पुलिसमैन हूँ। यहाँ आस-पास हथियारबंद पुलिस लगी हुई है। मजबूत सिंह डाकू के गिरोह की खबर लगी थी कि यहीं कहीं है। आप लोगों पर उसी गिरोह के होने का संदेह था। आप अपने जवाब से खुद डाकू बन बैठे। यदि मेरा भानजा साथ में न होता तो मैं अपने अफसर से जाकर कहता कि डाकुओं के गिरोह का एक खंड इसी भरके में है। गोली चलती।’

मैं पत्थर का सहारा छोड़कर बैठ गया।

मैंने कहा, ‘और हम लोग समझते की हमको डाकुओं ने घर लिया। दुतरफा गोली चलती और मौतें होती।’

आगंतुक ने करामत को फटकार लगाई, ‘आप लोग बारात में आए हैं, आपको साफ कहना चाहिए था। आपकी इस भद्दी गलती के कारण न जाने कितनी जानें जातीं।’

मैंने भी करामत को एक नरम-गरम व्याख्यान दिया।

बुंदेलखंड में डाकू जंगलों, पहाड़ों और भरकों का ही सहारा पकड़ते हैं और वहीं शिकारियों का भी भ्रमण होता है। ऐसी दशा में बिना पहचान वाले लोग किसी भ्रम को मन में बसा लेवें तो कोई अचरज नहीं।

और फिर रातवाली शेखी की तौल में यह शेखी तो बिलकुल ही पोच थी। निरुद्देश्य और बेकार।

उस लँगड़े दढ़ियल की उपस्थिति ने वरदान का काम किया, नहीं तो मैं, करामत मियाँ और शायद मेरे अन्य साथी भी उस दिन ढेर हो जाते।


3

चिंकारे का शिकार करछाल के शिकार से भी अधिक कष्टसाध्य है। चिंकारा बहुत ही सावधान जानवर होता है। उसे संकट का संदेह हुआ कि फुसकारी मारी और छलाँग मारकर गया। हिरन संकट से छुटकारा पाने के लिए दूर भागकर दम लेता है। चिंकारा थोड़ी दूर ठहरता है। चिंकारा झोरों और भरकों में अधिक रहता है। तिल और गेहूँ के उगते हुए पौधों को खोंट-खोंटकर नुकसान पहुँचाता है; परंतु हिरन की अपेक्षा कम। हिरन से छोटा है। सींग भँजे हुए और सीधे खड़े होते हैं। मादा के भी सींग होते हैं, परंतु छोटे-छोटे। मादा हिरन के सींग नहीं होते हैं। और बातों में दोनों मिलते जुलते हैं। ये दोनों दिन में दो-तीन बार पानी पीते हैं। रात भर कुछ-न-कुछ खाते ही हैं। दिन में काफी चरते हैं; परंतु सोने को भी कई घंटे देते हैं। सोते समय इनके झुंड के दो-एक होकर चौकसी करते हैं। खतरे का शक हुआ कि पहरेवालों ने चौकड़ी ली और बाकी भी तुरंत सचेत होकर भाग निकले।

दोनों वर्गों का जनन समय वसंत ऋतु है। जब पलाश के पत्ते झड़ जाते हैं और उसमें बड़े-बड़े लाल फूलों के गुच्छे लगते हैं, तब इनके छौने कूदने-फाँदने लायक हो जाते हैं।

दोनों जानवर काफी मजबूत होते हैं। पेट की गोली खाकर बहुत दूर निकल जाते हैं। मर तो जाते हैं, परंतु उनको पीड़ा होती है। सिर से लेकर जोड़ तक का निशाना ही शिकारी को अपयश ने देगा।

किसान और बहेलिए रस्सियों का जाल बनाकर इन जानवरों को पकड़ते हैं और लाठियों से मार डालते हैं, परंतु यह शिकार शिकार नहीं है।

हिरन और चिंकारे सूर्यास्त के पहले ही खेती चरने के लिए जंगल से निकल पड़ते हैं और सूर्योदय के उपरांत खेतों को छोड़ते हैं। बहुत से तो खेतों में या उनके बिलकुल करीब के झाड़-झंखाड़ में गुप्त हो जाते हैं और अवसर मिलते ही खेतों में घुस पड़ते हैं। जब गेहूँ और चने के पौधे बड़े हो जाते हैं तब इनको छिपने का काफी सुभीता मिल जाता है। ज्वार और बाजरा के पेड़ों में तो अनेक झुंड बसेरा ही डाल लेते हैं। ऐसी हालत में बिना हाँके के इनका शिकार दुःसाध्य है।

इनके हाँके का शिकार बहुत संकटमय है। खड़ी खेती के दो-तीन ओर से हँकाई होती है। एक कोने पर बंदूकवाला खड़ा हो जाता है। ये जानवर झुंड बाँधकर खेतों में से नहीं निकलते। कोई इधर होकर भागता है और कोई उधर होकर। शिकारी अनुभवहीन हुआ तो वह भी मोहवश अपना ठौर-ठिकाना छोड़ देता है और धाँय-धाँय कर उठता है। कभी-कभी इसका फल भयंकर होता है। गोली या छर्रा बंदूक को छोड़ते ही फिर शिकारी के बस का नहीं रहता, और वह किसी भी हँकाईवाले के शरीर में जाकर धँस सकता है।

ये जानवर घरने जंगल या पहाड़ों में नहीं रहते। बिखरी-सँकरी झाड़ी और भरके ही इनके घर हैं। इन्हीं स्थानों में गाँववाले और जंगलवासी घास व लड़की के लिए घूमते-फिरते रहते हैं। इसलिए शिकारियों के बहुत सावधानी के साथ इन स्थानों में बंदूक चलानी चाहिए। मैं यह बात उपदेश के तौर पर लिख रहा हूँ। आप बीती घटनाओं के अनुभव की बात कह रहा हूँ।

एक बार हिरन में से छर्रे का एक दाना निकलकर एक गाँववाले के पैर में धँस गया था। कुछ कठिनाई के साथ निकलवा पाया था। हड्डी बच गई, नहीं तो उसकी एक टाँग बेकार हो जाती।

एक दुर्घटना मेरी बंदूक से नहीं ही थी; परंतु हुई थी मेरे निकट।

एक बार एक मित्र की गोली से मेरी खोपड़ी भी बाल-बाल बची। मेरे वे मित्र कान से कम सुनते थे। निशाना भी बहुत सुहावना नहीं लगाते थे। परंतु मेरे साथ मटरगश्त करने की कामना उनके मन में बहुत दिन से थी। कई बार मैंने उनकी इच्छा को टाला। परंतु एक बात तो वे बिलकुल ही सिर हो गए। साथ गए। जंगल में छोटे-छोटे नाले थे। उन नालों की तली में हाँकवाले और नालों के किनारों पर हम लोग एक-दूसरे के कंधों के सामने थे। फासला काफी था। हँकाई के पहले तय हो गया था कि मुँह के सामने की तरफ बंदूक चलाई जावेगी, न तो अगल-बगल और न पीछे।

हँकाई में जानवर निकले। वे नाले की तली की सीध में भागे; परंतु तितर-बितर होकर। मेरे मित्र पहले तय की हुई सब बातों को भूल गए। नाले में उतर पड़े और मेरी ओर बंदूक दाग दी। उनकी बंदूक का निशाना जानवर पर तो नहीं पड़ा। एक समूचा टीला उनकी अनी पर चढ़ा और गोली फिसलकर भनभनाती हुई मेरे सिर पर से निकल गई।

मैंने उनको चिल्लाकर बुलाया। जब पास आए, मैंने उनसे पूछा –

‘यह क्या किया, साहब?’

मेरे वे मित्र हकलाते थे।

उन्होंने हकलाकर उत्तर दिया, ‘क क क्या ज ज जानवर घायल हो हो हो गया?’

मैंने कहा, ‘जि जि जि जी नहीं। केवल मिट्टी का टि टि टि टीला थोड़ा सा घायल हुआ और मेरी खो खो खोपड़ी बिलकुल बच गई।’

फिर हँसी के तूफान में हम लोग उस घटना को भूल गए।

इन मित्र को सावधानी का यह पहला पाठ शायद रट-रटकर याद करना पड़ा होगा। परंतु इस बात के बतलाने में कोई हानि नहीं जान पड़ती कि वे इस पहले ‘श्रीगणेश’ को बिलकुल भूल गए।

एक बार जंगल और बेतवा की ऊबड़-खाबड़ भूमि का सपाटा भरने के बाद उन्होंने दुबारा-तिबारा घूमने का हठ किया। उनका हँस-हँसकर हकलाना और किसी भी परिस्थिति में रुष्ट न होना हमारी छोटी सी शिकार मंडली को बड़ा भला लगता था, इसलिए उनको संकटसंपन्न समझते हुए भी मैं साथ लेने लगा।

फागुन का महीना था। खरी चाँदनी रात। तय हुआ कि पत्थरों और ढोंकों के समूहों में हम लोग बिखरकर बैठें। इन पत्थरों के अगल-बगल से संध्या के उपरांत प्रायः जानवर निकल पड़ते थे। हम सब अपने चुने हुए स्थानों पर जा बैठे।

बैठे-बैठे रात के दस बज गए। साथ में खाना था और पास ही बेतवा का निर्मल जल। भूख भी लग आई थी। जानवर कतराकर निकल चुके थे। कोई आशा शिकार की न रही। मैं अपने स्थान से उठा। सीटी बजाई। अन्य मित्र मेरे पास आकर इकट्ठे हो गए; परंतु ऊँचा सुननेवाले मित्र न आए। सीटी का उनपर प्रभाव ही क्या पड़ सकता था! हम लोग उनके स्थान की ओर चले। पैर पटकते हुए, खाँसते हुए और थोड़ी सी बातें करते हुए भी। ज्यादा शोर इसलिए नहीं कर रहे थे, क्योंकि नदी ही में रात को यत्र-तत्र लेटना था – शायद सवेरे तक कोई शिकार हाथ लग जाय।

अच्छा प्रकाश था। मित्र के कान के भरोसा तो न था, पर आँख का था। आवाज न सुनेंगे तो आँख से हम लोगों को देख तो लेंगे। तो भी हम लोग डरते-डरते उनके पास पहुँचे। लगता था, कहीं जानवर समझकर बंदूक न दाग दें।

देखें तो मित्र एक पत्थर से टिके हुए खर्राटे कस रहे हैं। बंदूक दूसरे पत्थर से टिकी हुई है। मैंने चुपचाप उनकी बंदूक उठाई और एक साथी को दे दी। वे सब जरा दूर चले गए। थोड़ी देर बाद मैंने नाम लेकर उनको पुकारा। वे हड़बड़ाकर उठ बैठे। मैं उनके सामने एक पत्थर पर बैठ गया। वे उस पत्थर को नहीं देख सकते थे, जिनके सहारे थोड़ी देर पहले ही उनकी बंदूक टिकी थी।

वे समझे, उनकी नींद को मैंने नहीं भाँपा।

कुछ लोग एक आँख सबको देखते हैं; परंतु वे किसी कान भी दुनिया भर की कुछ नहीं सुनते थे – और सबको ऐसा समझते भी थे।

बोले, ‘बाट जो जो जोहते बड़ी देर हो गई। कोई भी जानवर नहीं निकला।’

मैंने कहा, ‘मेरे पास से एक जानवर निकला। मैंने बंदूक चलाई। घायल होकर इसी ओर आया है। यहीं कहीं पड़ा होगा।’

वे बारीकी से मेरे चेहरे पर शरारत ढूँढ़ने लगे। मैं बिलकुल गंभीर था। बेचारे कुछ भी न ताड़ पाए।

मैंने प्रस्ताव किया, ‘चलो न, जरा ढूँढ़ें।’

हम दोनों उठ खड़े हुए।

उन्होंने आँख बचाकर बंदूक की खोज की। बंदूक तो पहले ही खिसका दी गई थी। मैं आहट लेने के बहाने दूसरी ओर मुँह किए था।

मित्र परेशान थे – बंदूक कहाँ गई? कैसे चली गई? रहस्य देर तक छिपा नहीं रह सकता था।

मैंने कहा, ‘वह घायल जानवर तुम्हारी बंदूक लेकर चंपत हो गया है।’

वे समझ गए और हँस पड़े। उनको स्वीकार करना पड़ा, ‘मैं जरा देर के लिए झप गया था। इस बीच में आप आए और मेरी बंदूक उड़ा ले गए।’

मैंने कहा, ‘बाट जो जो जोहते बड़ी देर हो गई। यहाँ तक कि ज ज ज जानवर बंदूक ही ले भागा।’

अधमुँदे कानवालों को शिकार का साथी बनाना अनगिनत आफतों को न्योता देना है।

इसके बाद फिर शायद ही कभी वे मेरा साथ आए हों। साथ आते, परंतु मैं सदा टाला-टाली करता रहा। यह टाला-टाली उनके हित में तो शायद थी ही, हम लोगों के हित में निर्विवाद थी।

यह सब जानते हुए भी नए शिकारियों को साथ लेना ही पड़ता है; परंतु इनको आरंभ में किसी अनुभवी शिकारी के साथ लगा देना श्रेयकर है। इससे उनका कोई अपमान न होगा और शिकारियों तथा हाँकेवालों की जान विपद् में पड़ने से बची रहेगी।


4

एक जगह जमकर बैठने का शिकार काफी कष्टदायक होता है। झाँखड़ या पत्थरों के चारों ओर ओट बना लेते हैं और उसके भीतर जानवरों को अगोट पर शिकारी बैठ जाते हैं-ऐसे ठौर पर, जहाँ होकर जानवर प्रायः निकलते हों। उनके खाँद-चिन्ह-दिन में देख लिए जाते हैं। प्रतीत होता है कि संध्या के उपरांत और सूर्योदय के पूर्व यहीं होकर निकलेंगे। इस आड़-ओट की बैठक को ‘गड्ढा’ भी कहते हैं। गड्ढा कभी-कभी वास्तव में गड्ढा होता है – खोदकर बैठने योग्य बनाया हुआ; परंतु चौगिर्दा आड़-ओटवाली बैठक को भी शिकारी ‘गड्ढा’ कह देते हैं। इसमें शिकारी लगभग सुरक्षित रहता है और जानवर इसके पास से असावधान होकर निकलता है। परंतु आड़-ओटवाले गड्ढे को कभी-कभी दो-एक दिन के लिए यों ही पड़ा छोड़ देते हैं; क्योंकि जानवर एक नया बिजूका-सा देखकर कतराकर निकल जाता है। जब यह नया विघ्न उसके अभ्यास में प्रवेश पा जाता है तब वह इससे सटकर भी निकल जाता है, और तब वह शिकारी का अवसर बन जाता है।

परंतु एक ‘गड्ढे’ के निकट यदि दूसरे शिकारी का ‘गड्ढा’ हो तो बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है। सीधी सावधानी यह है कि निश्चित समय के पहले किसी भी अवस्था में शिकारी अपने गड्ढे को न छोड़े। नहीं तो मौत में बहुत कम कसर रह सकती है।

मेरा एक मुवक्किल वांडर वाल्डन नाम का था। उसके माता-पिता हॉलैंड के निवासी थे। वह हिंदुस्थान में उत्पन्न हुआ था। एक एंग्लो-इंडियन स्त्री और उसके पति के बीच में तलाक का मुकदमा चला। वांडर वाल्टन को इस मुकदमे में दिलचस्पी थी। तलाक होने के बाद उस स्त्री का पुनर्विवाह वांडर वाल्टन के साथ होने जा रहा था।

विवाह दूसरे दिन होने को था। गड्ढा बनाकर रात में शिकार के लिए बैठने का निश्चय करके वाल्टन अपने एक मित्र का साथ झाँसी के एक निकटवर्ती जंगल में गया। वाल्टन के मन में साध थी शिकार में एक जानवर हस्गत करके अपने मित्रों के विवाह के उपलक्ष्य में दावत देने की।

वे दोनों ‘गड्ढे’ बनाकर एक-दूसरे से थोड़ी दूर जा बैठे। दोनों से दूर एक जानवर निकला। वाल्टन गड्ढे में बैठे-बैठे उकता उठा था। गड्ढे से बाहर निकला और जाते हुए जानवर के आगे बढ़ा। उसके मित्र ने उसी को जानवर समझा।

‘धाँय!’ उसके मित्र ने गोली छोड़ी। वाल्टन पर वह गोली ऐसी पड़ी कि फिर वह अपने घर जीवित नहीं पहुँच पाया।

एक दुर्घटना तो हाल ही की है।

कुछ लोग बड़े चाव के साथ शिकार खेलने के लिए धसान तटवर्ती लहचूरा के जंगल में सन 1945 में गए। जंगल में जाते-जाते उनको रात हो गई। फैलपुट्ट होकर शिकार खेलने की इच्छा मन में उदय हुई और सब अलग अलग हो गए।

एक साहब के पास टॉर्च थी और दूसरे चश्मा लगाए थे। जंगल में घूम-घूमावों के कारण चाल सीधी तो रखी ही नहीं जा सकती। चश्मवाले साहब टॉर्चवाले के सामने आ गए। दबे-दबे आ ही रहे थे, टॉर्चवाले ने समझा कि कोई जानवर है। टॉर्च जलाई। उसके प्रकाश में सामनेवाले का चश्मा चमक उठा। टॉर्चवाले ने समझा, तेंदुआ है। चश्मेवाले ने सोचा होगा, इतनी रोशनी में भी क्या पहचाना न गया हूँगा! वे न बोले, चुप रहे। टॉर्चवाले ने धाड़ से गोली छोड़ दी। चश्मवाले पर गोली ऐसी चूक पड़ी कि वे उफ भी न कर पाए। धम से गिरे और उनका प्राणांत हो गया।

छोड़ा हुआ हथियार हाथ का रह ही कैसे सकता है! और फिर बंदूक की गोली!

एक बार मेरे मित्र शर्माजी मेरी गोली से बाल-बाल बचे थे।

शर्माजी एक गड्ढे में बैठे थे और मैं दूसरे में। कोई जानवर थोड़ी दूरी पर निकला। शर्माजी को चैन न पड़ा। वे अपना ठीहा छोड़कर जानवर की ओर रेंगे। मैंने उनकी आहट पर गोली छोड़ी। गोली एक पत्थर से टकराकर निकल गई।


5

हिरन वर्ग के जानवरों के लिए ढूका या ढुकाई का शिकार भी अच्छा समझा जाता है। इस शिकार में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पेट के बल रेंगते हुए भी चलना पड़ता है; पहेल ही कहा जा चुका है।

कुछ लोग बंदूक के घोड़े चढ़ाकर इस प्रकार का शिकार करते हैं। मेरी समझ में बंदूक के घोड़े चढ़ाकर चलना केवल व्यर्थ ही नहीं है, बल्कि अत्यंत संकटपूर्ण भी है। जरा से झटके से घोड़े गिर सकते हैं और फिर वे बंदूकवाले को या किसी भी सामनेवाले को, बिना किसी पक्षपात के, साफ कर सकते हैं।

एक बार हिरन के शिकार में ढूका करते-करते मैं काफी दूर निकल गया। एक परिचित मेरे साथ थे। वैसे तो वे बिलकुल साथ रहे, पर एक जगह संग छूट गया। वहीं कुछ हिरन दिखलाई पड़े। मेरे घोड़े पहेल से चढ़े थे। पेड़ की एक डाल घोड़े से उलझी। घोड़ा गिरा और बंदूक चल गई। धक्के के कारण बंदूक के घोड़े का सिरा मेरे अँगूठे की जड़ में धँस गया और वे परिचित भाग्य से बच गए।

झाँसी से दो शिकारी हिरन के शिकार के लिए बेतवा किनारे गए। इनमें से एक को बंदूक के घोड़े चढ़ाए रखने की आदत थी। पैर फिसला। बंदूक को ठोकर लगी। नाल पेट की ओर लौट पड़ी और साथ ही घोड़े को ठोकर लगी। गोली पेट पर पड़कर, रीढ़ की हड्डी को तोड़कर बाहर निकल गई। घर पर बेचारे की लाश आई।

जानवर पर बंदूक चलाने के लिए इतना काफी समय मिलता है कि खाली बंदूक भी ले चलने कोई हानि नहीं है। फुरती के साथ खाली बंदूक में कारतूस डाले जा सकते हैं, घोड़े चढ़ाए जा सकते हैं और फायर किया जा सकता है।

हिरन का शिकार गाड़ी पर बैठकर टट्टी की ओट में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। हिरन पूरे धोखे में आ जाते हैं और मारे जाते हैं। कुछ शिकारी इस प्रकार के शिकारी को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। वे कहते हैं कि यह कसाईपन है, शिकार खेलना नहीं है। परंतु जिनको जानवरों के मारने और खाने-खिलाने से ही प्रयोजन है, वे इस तरह की आलोचना की परवाह नहीं करते।

टट्टी के शिकार में कुतूहल, परिश्रम और चतुराई के होते हुए भी उक्त ‘कसाईपन’और अधिक मात्रा में है। क्योंकि शिकारी हिरन को पंद्रह-बीस कदम के फासले से सहज ही मार लेता है, चूक ही नहीं सकता।

टट्टी का शिकार प्रायः दो शिकारी मिलकर खेलते हैं। मैंने तो कभी नहीं खेला, परंतु उनका विवरण खेलने वालों से विस्तारपूर्वक सुना है।

बाँस की कमचियों या सीधी डालोंवाले किसी भी पेड़ की पतली लकड़ियों से एक हलका ढाँचा बनाया जाता है। फिर इसमें पेड़ के ताजा पत्ते खोंस लिये जाते हैं। शिकारी इसको हाथ में थामे हुए आगे बढ़ते हैं-धीरे-धीरे। हिरन समझता है कि हवा से हिलनेवाला कोई झाड़-झंखाड़ है। धोखे में आ जाता है। टट्टी में शिकार के देखने और बंदूक चलाने के लिए छेद रहते हैं। जब टट्टीवाले शिकारी हिरन के पास आ जाते हैं तब टट्टी खड़ी कर ली जाती है। हिरन अनिश्चय में उसको देखता है-और इतने में ही बंदूक चल जाती है। अनाड़ी की भी नहीं चूकती।

तीर कमानवाले टट्टी के शिकार का बुहत सहारा लेते हैं; क्योंकि उनके लिए भोजन-प्राप्ति का यह सहज उपाय है। उनके लिए अब भी वही प्राचीन युग है – जीवन और मरण के बीच का कोई भी मध्य मार्ग वे नहीं जानते।

प्राचीन काल में भी गाड़ी से हिरन का शिकार खेला जाता था। बड़े लोग रथ पर से खेलते थे।

नाटक का दुष्यंत तेजी के साथ रथ के घोड़ों को भगा सकता था; परंतु तेजी के साथ भागते हुए घोड़ों को को हिरन छुला मिली नहीं देते, क्योंकि सीधे नहीं भागते और तिरछे भागते हुए हिरन का पीछा घोड़ेवाला रथ हर जगह नहीं कर सकता। किंतु नाटक की बात और है।

कल्पना जगत् के बाहर का शिकारी, जिसका अस्तित्व यथार्थ में हो, बहुत धीरे चलनेवाली बैलगाड़ी पर बैठता है या बहुत धीरे खिसकाई जानेवाली टट्टी के पीछे-पीछे चलता है। परंतु ढुकाई के बराबर परिश्रम इन दोनों में से किसी में भी नहीं है।


6

चीतल (स्वर्णमृग) हिरन वर्ग का पशु समझा जाता है। परंतु इसके सींग फंसेदार होते हैं। यह बहुत ही सुंदर होता है। इतना सुंदर कि कभी-कभी शिकारी इसके भयानक हानि पहुँचानेवाले कृत्यों को भूल जाता है। इसकी खाल पीली खैली होती है और उसपर सफेद चित्ते होते हैं। सिर से लेकर रीढ़ तक एक काली कैरी चौड़ी रेखा होती है, जिसमें पूँछ तक दुतरपा बुंदे होते हैं। रंगों की भिन्नता पर जब उगते हुए सूर्य की किरणें रिपटती हैं तब चीतल सचमुच स्वर्णमृग जान पड़ता है।

परंतु जब रात भर ज्वार, तिली, गेहूँ और चने के खेतों को चरकर, ऊँची-ऊँची बिरवाइयों को लाँघकर चीतल अपने कूकों से घंटे-दो घंटे की नींद पाए हुए किसान को जगाता है, तब वह किसान इसको ‘स्वर्णमृग’ के नाम से नहीं पुकारता। वह जलती हुई आँखों से अपनी उजड़ी हुई खेती को देखता है और सूखे भर्राए हुए कंठ से केवल गालियाँ देकर रह जाता है।

चीतल बहुत ही चालाक और सावधान जानवर है। झुंडों में रहता है। नर झुंड के बीच में या लगभग पीछे रहता है। नेतृत्व मादा करती है। जंगलों और पहाड़ों में इस जानवर का निवास है। किसान दिन भर काम करके संध्या के बाद ही अपने खेत के ढबुए पर चली जाती है। आग सुलगाकर खेत की सुनसान मेंड़ पर रख दी और तंबाकू पीकर ढबुए में जा लेटा। दस-ग्यारह बजे तक हू-हा की, फिर झपकी आ गई। जब तक हू-हा की तब तक चीतल दबे पाँव बिरवाई के आसपास टोह लेता हुआ घूमता रहा। जैसे ही आधी रात का सन्नाटा आया, किसान ने नींद ली और चीतल ने खेत की ऊँची बिरवाई लाँघी। बहुत धीरे-धीरे खेत में आया, पीछे-पीछे सारी झुंड। फिर पड़ा खड़ी फसल पर ताबड़तोड़। झुंड सारे खेत में फैल जाता है। अँधेरी रात में तो जागते हुए किसान या शिकारी को कुछ दिखलाई ही नहीं पड़ता; उजेली रात में भी तितर-बितर झुंड आसानी से लख में नहीं बीधता।

एक रात का सताया हुआ किसान या जागा हुआ शिकारी जब दूसरी रात सावधान होकर तन-मन एक कर डालता है, तब वह झुंड उस रात उस खेत आती ही नहीं।

एक-दो अंतर दे देता है। किसान सोचता है, आई बला टल गई। परंतु बला अंतर देकर फिर आती है। जब किसान फसल गाहता है तब भाग्य को ठोंकता और कोसता है।

मैंने पचास के ऊपर तक का झुंड देखा है। गेहूँ के खेत में खुदवाँ गड्ढा बनाकर मैं रात भर बैठा। चीतल एक दिशा से खेत में आकर बिखर गए। बंदूक की मार में न आए। मौज से चरते रहे और सवेरे के पहले आराम के साथ खिसक गए। मैं अवसर की ताक ही में गड्ढे के भीतर पड़ा रहा।

बहुत से शिकारी गड्ढे के भीतर व्यर्थ नहीं पड़े रहते, उनकी बंदूक को चीतल मिल जाता है; परंतु ऐसा हमेशा नहीं होता। इसीलिए शिकारियों का शकुन-अपशकुन-विश्वास विख्यात है। जरा सा भी खुटका हुआ उनके मन में, अपशकुन का रूप धारण कर बैठता है। मार्ग में ब्राह्मण मिल जाय तो अपशकुन, खाली घड़ा, छींक, बिल्ली का रास्ता काटना, सियार क दाईं ओर से बाईं ओर निकल जाना, लोमड़ी का दुम को उठाकर भागना इत्यादि ऐसी अगणित क्रियाएँ हैं, जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि जंगली जानवर इतने चतुर होते हैं कि सहज ही हाथ नहीं आते। भरे हुए घड़े, तिलकधारी और बगल में पोथी-पत्रा दबाए हुए ब्राह्मण तथा बाईं ओर से दाईं ओर जानेवाले सियार या साँप के मिलने पर भी दिन भर भटकने के बाद शाम को खाली हाथ और सूखा मुँह लेकर लौटना पड़ता है।

चीतल का शिकार बहुत सावधानी के साथ की जानेवाली ढुकाई में हो सकता है। परंतु बाँव काटकर ढुकाई की जाय, तभी सफलता संभव हो सकती है; अन्यथा चीतल हँकाई में आसानी से मिल जाता है।

मुझको एक बार एक बड़ा और लंबे सींगोंवाला चीतल दूर से दिखलाई पड़ा। जंगल में काफी आड़ें-ओटें थीं। मेरे पास .30 बोरवाली राइफल थी। यह बोर छोटे-बड़े सब प्रकार के शिकार के लिए उपयोगी है।

मैं ढुकाई करता हुआ उस चीतल की ओर बढ़ा। काफी मेहनत की। उसका प्रमाण मेरे छिले हुए घुटने और काँटों से कुहनियों तक रुले हुए हाथ थे। मैं बाँव काटता हुआ धीरे-धीरे, चुपचाप इतनी सफाई के साथ उसके पास पहुँच गया कि मेरे-उसके बीच में केवल एक झाड़ी रह गई। गजों में अंतर दस-बारह मात्र का रह गया होगा। मैंने धीरे-धीरे साँस साधी। चीतल के चाहे जिस अंग का निशाना बना सकता था। जब साँस बिलकुल सध गई, मैं धीरे से उठा। कंधे से बंदूक जोड़ी और घोड़े की लिबलिबी दबा दी।

परंतु हुआ कुछ भी नहीं। बंदूक की नाल में कारतूस ही न था। कारतूस मैगजीन में पड़े थे और घोड़े पर ताला। ढुकाई आरंभ करने के पहले मैं नाल में कारतूस का डालना भूल गया था। मुझे चीतल ने देख लिया। वह कूका मारकर जंगल में विलीन हो गया। कुछ दूरी पर मेरा एक देहाती साथी था। उसने मुझको चीतल के पास पहुँचा हुआ देख लिया था। बंदूक का उबारना भी उसने लक्ष्य कर लिया था।

जब मैं उसके पास पहुँचा तब उसको निस्संकोच पूरी कहानी सुना दी। वह भीतर-भीतर कुढ़ा और ऊपर से हँसा। बोला, ‘इतने दिनों तो हो गए, पैसिकार कौ लच्छन न आओ!’अर्थात् इतने दिनों में भी शिकार की तमीज न आई। परंतु भरी हुई बंदूक और खुले हुए घोड़े ले चलने की अपेक्षा खाली बंदूक ले चलने का यह कुलक्षण कहीं अच्छा।

मेरी खोपड़ी दूसरी बार चटकते-चटकते बच गई।

दिन भर घूमते-घामते बीत गया था। संध्या के समय अपना सा मुँह लिये हम सब लौट रहे थे। मेरे एक सहवर्गी के कंधे पर .275 बोर की राइफल थी। नाल में कारतूस पड़ा था। घोड़ा चढ़ा हुआ और ताला खुला हुआ था। सहवर्गी मेरे आगे थे। उनकी राइफल की नाल पर मील के मार्ग मे बहुधा मेरे भेजे की ठीक सीध में हो-हो जाती थी। जब हम लोग गाँव में आए, एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। सहवर्गी ने राइफल जमीन पर टेकी और नाल आकाश की ओर कर दी। आकाश और राइफल की मुहार के बीच में पीपल की डालियाँ थीं। उन्होंने लिबलिबी पर अँगूठा रखा। आदत से लाचार थे। अँगूठा जरा दबा। लिबलिबी खट से हुई और जोर का धड़ाका हुआ। राइफल की गोली पीपल की डाल पर पड़ी। डाल हिल गई। तब जाना कि राइफल उस एक मील के मार्ग में मेरे माथे का क्या कर सकती थी।

भरी हुई बंदूक को यों ही रख देना बहुधा गजब ढाया करता है; तो भी लोग असावधानी करते हैं। मैंने भी असावधानी की है; परंतु अब सीख गया हूँ।

एक बार शिकार से लौटकर आया; परंतु दुनाली में कारतूस भरे छोड़ दिए। कुछ दिन वह वैसी ही रखी रही। कुछ दिन वह वैसी ही रखी रही। एक दिन एक मनचले ने उसे उठाया। उसको घोड़ा खींचने की सूझी। खींचा, पर वह हाथ से सटक गया। बंदूक धड़ाम हुई। नाल के सामने मेज थी और मेज के आगे कमरे की दीवार। गोली ने मेज को फोड़ दिया और फिर दीवार में जाकर धँस गई।

तब से मैं जंगल से लौटते ही बंदूक को खाली कर लेने का अभ्यासी हो गया हूँ।

हँकाई करने के समय एक गलती प्रायः की जाती है। हाँकनेवाली बेहद हो-हल्ला करते हैं। इस नियमहीन हल्ले के कारण जानवर सिर पर पैर रखकर भागते हैं। लगान पर बैठे हुए शिकारी परेशान हो उठते हैं। हाँकनेवालों और लगान पर लगे शिकारियों का श्रम अकारथ जाता है। कुछ शिकारी अपने आसनों को छोड़-छोड़कर इधर-उधर भाग खड़े होते हैं और एक-दूसरे का निशाना बनते हैं।

हाँकनेवालों के लिए दो बातें अत्यंत आवश्यक है। एक तो उनको सिवाय कंकड़ बजाने के और कोई आवाज नहीं करनी चाहिए-इसका अपवाद शेर, भालू और तेंदुए का शिकार है; क्योंकि ये जानवर देर में जंगल छोड़ते हैं। और साधरण हल्ले-गुल्ले की परवाह नहीं करते। दूसरे हाँका करनेवालों को किसी भी हालत में अपनी पाँत को छोड़कर लगानवालों की पाँत के आगे नहीं जाना चाहिए।

एक जंगल में हम कुछ लोग चीतल का शिकार हाँके के साथ करने की धुन में थे। लगान पर मैं और मेरे मित्र शर्माजी एक ही ठौर पर थे। दूसरे लगानों पर अन्य शिकारी थे। हाँका बगल से होता आ रहा था। हम लोगों के सामने जरा दूर झाड़ी में पीछे कुछ पीला-पीला से आकार के ऊपर। शर्माजी को जान पड़ा जैसे कोई लंबे सींगोंवाला चीतल हो।

‘धाँय!’ शर्माजी ने लक्ष्य बाँधकर बंदूक चलाई। उन्होंने चीतल के सिर का अनुमान करके गोली छोड़ी थी।

‘ओ मताई, मर गओ!’ चीतल के आकार की तरफ से शब्द आए।

हम दोनों को काटो तो खून नहीं। शर्माजी तो पसीने में तर हो गए। जा पड़ता था कि कोई हाँकेवाला मारा गया। दौड़कर उसके पास पहुँचे। देखा तो हाँकेवालों में से एक ‘मंटोला’ नाम का खड़ा है – सही और साबुत। हम लोगों की दम में दम आई।

मैंने पूछा, ‘कहीं लगी तो नहीं, मटोले?’

मंटोला शिकारी था, बहुत हँसमुख और बड़ा मनोरंजक साथी। बोला, ‘बारन में छू कें निकर गई, राम धई। काए पंडितजू, कब की कसर निकर रये ते?’

पंडित जी बेचारे क्या कहते। बड़ी बात हुई कि उन्होंने गोली चलाई थी, यदि छर्रा चलाते तो अवश्य उसको एक-न-एक लग जाता। यह मंटोला एक छोटे से जीवन चरित्र का अधिकारी है।

बिलकुल अऩपढ़। आयु करीब तीस साल की। बेतवा की मछली, जंगल के शिकार और खेतों की बची-खुची उपज से अपनी तथा अपने कुटुंब की गुजर करनेवाला। कठोर-से-कठोर परिस्थिति में भी उसके चेहरे पर उदासी या शिकन नहीं देखी। जंगल में वह मेरे साथ बहुत दिनों तक रहा। मैंने उसको बहुत नजदीक से देखा है।

मंटोला एक दिन तेज बुखार में चारपाई से लगा पड़ा था। मैं उसको देखने के लिए गया।

मैने पूछा, ‘मंटोले, क्या हाल है, भाई?’

उस तेज बुखार में भी हँसकर उसने उत्तर दिया, ‘जवानी चढ़ी है, बाबू साब, जवानी।’ उसके प्रति मेरे मन में श्रद्धा उमड़ी।

मैंने कहा, ‘मंटोले, इतनी पीड़ा में भी तुम हँस सकते हो!’

वह बोला, ‘सो तो बाबू साब, मैं तो मरतन-मरतन हँसते रहो।’

और वह सचमुच मरते-मरते तक हँसी को पकड़े रहा। वह अस्पतालों से दूर रहता था। उसके गाँव में दवा-दारू का कोई साधन न था। एक बार जब मैं उसके घर गया तो उसने चीतल खाने की इच्छा प्रकट की –

‘मरवे के पैलें एक बेर मोये चीतरा खुवा देओ।’

मैंने निश्चय किया। नदी के एक घाट पर गड्ढा बनाकर संध्या के पहले ही जा बैठा। रात भर जागता रहा। सवेरे के समय चीतल गड्ढे के पास से निकला। मारना बिलकुल सहज था। मैं उसे मंटोले को भेंट कर आया। फिर वह मुझको नहीं मिला। फिर वह मुझको नहीं मिला।

चीतल के विषय में कुछ शिकारियों का एक सिद्धांत है – वे छत्तीस या चौंतीस इंच से कम सींगवाले चीतलों को नहीं मारते; परंतु जिन किसानों की हरी-भरी फसल का चीतलों के झुंड विनाश करते हैं, उनको सींगों के नाप से बिलकुल मतलब नहीं रहता। वे तो बिना किसी भेद के चीतलमात्र के शत्रु है।


7

चीतलों के बाद मुझको पहला तेंदुआ सहज ही मिल गया। विंध्यखंड में जिसको ‘तेंदुआ’ कहते थे, उसकी छोटी छरेरी जाति को कहीं-कहीं ‘चीता’ का नाम दिया गया है। हिमाचल में शायद इसी को ‘बाघ’ कहते हैं।

तेंदुए की खबर पाकर मैं एक शनिवार को झाँसी से चौबीस मील दूर ‘पाँडोरी’ नामक गाँव में पहुँचा। पाँडोरी से तेंदुआ का स्थान लगभग दो मील दूर था। बेतहाशा जल्दी करके सात बजे शाम तक उस स्थान पर एक परिचित के साथ पहुँच गया। काँटों का एक गड्ढा बनवाया और बकरा बाँधकर बैठ गया।

तेंदुआ दबे पाँव आया। मेरे साथी बोले, ‘तेंदुआ आ गया।’ तेंदुआ मूर्ख नहीं था। मेरे साथी के शब्दों के साथ ही कूदकर चल दिया। हम लोग बुद्धू बने रह गए।

फिर मैं एक योजना बनाकर दूसरे दिन दुपहरी में बैठा।

जहाँ तेंदुआ की चुल थी वहाँ टौरियाँ थीं। टौरियों की तिकोन पर एक मैदान था। मैदान से कुछ घटकर एक गड़रिया अपनी भेड़-बकरियाँ चरा रहा था। मैंने गड़रिए को अपनी योजना सुनाई। गड़रिए को हफ्ते में कम-से-कम एक बकरी भेंट करनी पड़ती थी। वह मेरी योजना का हर्ष के साथ साझीदार बन गया। योजना के अनुसार काम हुआ।

गड़रिया तेंदुए की चुल के नीचेवाले मैदान में अपनी भेड़-बकरियों को चराते-चराते ले आया। मैंने एक बड़ी चट्टान के नीचे खूँटी गड़वाई। चट्टान के ऊपर और इर्द-गिर्द काफी आड़ थी। सामने खुला हुआ था। मैंने वहाँ एक छेददार ओट बना थी और मैं इस ओटवाली चट्टान पर जाकर बैठ गया। गड़रिया भेड़-बकरियों को चराते-चराते बकरे को खूँटी से बाँधकर बाकी को दूर हटा ले गया। गड़रिया ओझल हुआ था कि खूँटी से बाँधकर बाकी को दूर हटा ले गया।

गड़रिया भेड़-बकरियों को चराते-चराते बकरे को खूँटी से बाँधकर बाकी को दूर हटा ले गया। गड़रिया ओझल हुआ था कि खूँटी से बँधा बकरा मिमियाया। बकरे का पैर रस्सी से बँधा था। वह भागने के लिए उझल रहा था और ‘में-में’ का शोर कर रहा था। मेरा कलेजा धकधका रहा था। तेंदुआ चुल के बाहर आया। उस समय घड़ी में ठीक बारह बजे थे। जाडों के दिन थे। धूप कड़ी न थी। मैंने बंदूक सँभाली।

तेंदुआ तपाक के साथ बकरे पर आया। जंगली तेंदुए को उस दिन मैंने पहली बार देखा था। पीली-मटमैली भूमि पर गहरे काले, बड़े और छोटे धब्बे। बड़ी-बड़ी मूँछें, चौड़े पंजे और बहुत लचीली देह। तेंदुए को देखते ही बकरे ने सिर नीचा कर लिया। मिमियाना और उछल-कूद सब बंद।

तेंदुआ बकरे पर चढ़ गया। वह छलाँग भरकर उसे जीवित ही उठा ले जाना चाहता था; परंतु खूँटी और रस्सी मजबूत थी। मेरे पास उस समय .275 बोरवाली राइफल थी। मैंने उसके अगले कंधे का निशाना साधा; परंतु उसकी लचीली देह गति के कारण चंचल थी, इसलिए निशाना जोड़ने में दो-चार क्षण लग गए। मेरी बगल में नीचे हटकर एक शिकारी बैठा था। मुझको बिलंब करते देखकर उसकी आँख में क्षोभ आ गया। उसने एक क्षुब्ध संकेत दिया; मानो कह रहा हो, क्या कर रहे हो? क्यों देर लगा रहे हो?

मैंने तुरंत लिबलिबी दबाई। धड़ाके के साथ ही तेंदुआ सिमटा और बिजली की कौंध की तेजी के साथ अपनी चुल में चला गया। मेरा साथी शिकारी चट्टान से उतरकर बकरे के पास गया। बकरा बिलकुल बच गया था।

मेरे साथी ने कहा, ‘गोली चूक गई।’

मुझे विश्वास था कि नहीं चूकी; परंतु मैंने कहा, ‘शायद चूक गई हो।’

इसके बाद उस स्थान पर गड़रिया भी दौड़ता हुआ आया। उसको अपने बकरे की चिंता थी। जब उसने देखा कि बकरा सही-सलामत है तब उसने चैन की साँस ली। तेंदुआ मरा हो या न मरा हो, बकरा तो बच गया।

मैं भी अपने आसन से उतरा।

मैंने ठौर को टटोला। रक्त की एक बूँद दिखलाई पड़ी। साथी से कहा, ‘तेंदुए पर गोली पड़ गई है।’

चुल की ओर जरा और आगे बढ़े। खून का फव्वारा-सा लगा चला गया था। परंतु तेंदुआ चुल में घुस गया था। घायल तेंदआ बड़ी खतरनाक चीज है। गाँव के कुछ लोग आ गए और वे चुल में घुस पड़ने की चाह प्रकट करने लगे। मैंने रोक दिया।

दो घंटे के बाद लड़का चुल में घुस गया। तेंदुआ मर चुका था। परंतु उसके स्थान तक पहुँचने के लिए हिम्मत चाहिए थी, वह उस लड़के में काफी थी। लड़का तेंदुए को चुल के बाहर घसीट लाया।

गोली कंधे के जोड़ से जरा नीचे पड़ी थी, नहीं तो तेंदुआ ठौर पर न जा पाता। खाल छिलवाने पर उसके शरीर का निरीक्षण किया। जान पड़ता था जैसे लोहे के तारों से गँसा हुआ हो।

तेंदुआ बड़ा बहादुर, चालाक, तेज और कसवाला जानवर होता है। शेर की अपेक्षा कहीं अधिक फुरतीला और हिंसक।

इसी स्थान पर कुछ महीने बाद मैं फिर आया। अँधेरी रात में उसी खूँटीवाले स्थान पर खूँटी ठुँकवाकर बकरा बँधवाया। बकरा बाँधनेवाले ने उसकी गरदन में रस्सी बाँधी। मैंने मना किया, रस्सी किसी एक अगली टाँग में बाँधी जाती है। गरदन की रस्सी तो यों ही बकरे की जान उसी के झटको से ले लेगी।

रात में, उन दिनों, मुझको राइफल चलान का अभ्यास न था। दुनाली लाया था। दुनाली में कारतूस डालकर घोड़े चढ़ा लिये। थोड़ी दूर बंदूक को हाथों मे साधे रहा। भोजन कुछ अधिक कर आया था, इसलिए साँस भर रही थी। बंदूक को जाँघों पर रख लिया।

बंदूक को जाँघों पर रखा था कि तेंदुआ तड़ाक से आया। बकरे पर झपटा। मैंने बंदूक उठाई; परंतु सीधी न कर पाई थी कि तेंदुए एक झटके में रस्सी को तोड़ दिया और पलक मारते बकरे को उठा ले गया। बंदूक चलाने की नौबत ही न आ पाई। मैं लज्जा में डूबकर रह गया। अछताता-पछताता उस ठौर से नीचे उतरा।

मेरा दोष कम था, उस रस्सी का दोष ज्यादा। परंतु मैंने सारी जिम्मेदारी रस्सी की कमजोरी और बकरे को बाँधनेवाले के अविवेक पर डाली। जब गाँव में पहुँचा तब मैंने अपने बचाव में यही दलील पेश की। गाँववालों को लोग बहुत सीधा समझते हैं। मेरी दलील उनके मन में बिलकुल घर नहीं कर रही थी। वे लोग शरारत के साथ व्यंग्य करने लगे।

‘हाँ, बाबू साहब, तेंदुआ जरा बहुत ज्यादा फुरतीला जानवर होता है।’

‘बहुत से शिकारियों को उससे डर लग जाता है। हाथ कुंद हो जाता है; बंदूक चल नहीं पाती।’

‘अरे साहब, होता ही रहता है। गड़रिए के बहुत से बकरे तेंदुआयों भी पकड़ ले जाता है। एक और न सही।’

परंतु सबसे ज्यादा चुस्त व्यंग्य एक बहुत सीधे दिखनेवाले का था। उसने एक कहानी ही कह डाली। बोला, ‘कुछ दिन हुए एक अँगरेज जंट तेंदुए का शिकार खेलने आए। काँटों का एक छोटा सा परकोटा बनाकर उसके भीतर बैठ गए। चपरासी को भी साथ बिठला दिया। बकरा उस परकोटे के बाहर थोड़ी ही दूर खूँटी से बँधा था, जितनी दूर आप बँधवाकर बैठे थे। तीन तेंदुए एक साथ आ गए। साहब ने बंदूक छोड़कर अपनी पतलून सँभाली। तेंदुए मजे में बकरे को मारकर, वहीं खाकर डकार लेते चले गए। साहब ने पतलून संभाली। बंदूक चपरासी के कंधे पर रक्खी और डेरे पर चल दिए। डेरे पर पहुँचकर चपरासी से बोले, ‘काँटों की ऐसी बुरी आड़ सामने आ गई थी कि ठीक-ठीक दिखलाई ही नहीं पड़ता था।’ चपरासी नासमझ था। उसने कहा, ‘साहब, आप तो असल में डर गए।’ जंट ने बिचारे चपरासी को ठोंक डाला। बाबू साहब, बड़े आदमियों की बात कौन कहे! ‘

मुझको हँसी आ गई। उन लोगों ने कहकहे लगाए। उनकी कहानी और कहकहे का निशाना मैं ही था। रस्सी की कमजोरीवाली बात उनके मन में जरा भी जगह न पा सकी। मैं उनसे कह भी क्या सकता था! परंतु उस दिन की चूक ह्दय में छुरी की तरह चुभ गई।

शीघ्र ही कुछ दिनों बाद मैं एक छुट्टी में उसी गाँव में गया। तेंदुए के उत्पाद का समाचार मुझको झाँसी में मिलता रहता था। अब की बार मैं निश्चय करके चला था-गाँववालों को ठिठोली करने का अवसर न दूँगा। प्रबल रस्सी और गहरे गड़े हुए मजबूत खूँटे से बकरे को बँधवाऊँगा। करामत साथ था।

हम दोनों पहाड़ी के नीचे-नीचे गाँव की ओर रास्ते चले जा रहे थे। हमारे आगे-आगे सौ-डेढ़ सौ डग के अंतर पर गाँव के ढोर अपनी सारों को लौट रहे थे। सूर्यास्त नहीं हुआ था।

रास्ते के ठीक ऊपर एक चौड़ी-चकली चट्टान पर, जो रास्ते के तल से लगभग पंद्रह ऊँची थी, मैंने कुछ गोल-मटोल पदार्थ तेंदुए के सिवाय और कुछ न था। जाते हुए ढोरों को ताक रहा था। सोचता होगा, एकाध पिछड़ जाय तो दे मारूँ। जब मैं उसके बिलकुल निकट पहुँच गया तब उसने मुझको देखा। वह दुबक गया। पीछे न खिसक पाया। दुनाली में उस समय हिरनमार छर्रे के कारतूस थे। कारतूस बदलने का मौका नहीं था। मैंने तुरंत एक नाल उसपर खाली कर दी। तेंदुआ छर्रे के धक्के से पीछे उचटा और अदृश्य हो गया। मैंने इनते पास से बंदूक चलाई थी कि तेंदुआ जरा सी उचाट मारकर मेरे ऊपर आ कूदता तो कुछ पलों में ही मेरा ढेर हो जाता। परंतु करारी चोट खाकर भी तेंदुआ पीछे कैसे चला गया।

मैं इस विचार में डूबता-उतराता गाँव में आया। गांववाले मेरे ऊपर बड़ा स्नेह करते थे। मैंने उनको सुनाया। बंदूक का शब्द उन लोगों ने सुन ही लिया था। जब मैंने घटना का ब्यौरा सुनाया तब वे तो नहीं हँसे, पर मैं हँसता रहा।

मैंने कहा, ‘शायद चूक गई हो।’

उन लोगों ने प्रतिवाद किया। इतने में सूर्यास्त हो गया और रात आ गई। रात को और अधिक कुछ नहीं हो सकता था। मैं वहीं बस गया।

सवेरा होते ही तेंदुए की ढूँढ़-खोज हुई। जिस स्थान से मैंने बंदूक चलाई थी, उसके बगल में एक पुखरिया थी। उसमें पानी था। पानी के पास ही खून का बहता लगा हुआ था। हम सबको विश्वास हो गया कि तेंदुआ घायल हो गया है। परंतु उसके साथ ही इसमें भी संदेह न था कि हिरनमार छर्रे की मार खाकर भी उसमें काफी बल बना रहा और यदि उसको धुन बँध जाती तो घायल होते ही वह मेरे ऊपर टूटता और उसका जो फल होता उसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।

करामत और मैं चुल के भीतर घुसे-बंदूकें ताने हुए। वहाँ खून-ही-खून पड़ा था। परंतु तेंदुआ वहाँ न था। चुल के बाहर आकर हम लोगों ने सावधानी के साथ तेंदुए की खोज पहाड़ी के ऊपर की। जहाँ पर मैंने उसके ऊपर बंदूक चलाई थी। वहाँ से कुछ गज के फासले पर तेंदुआ मरा हुआ पड़ा मिला।

तेंदुआ इतना गाँठ-गँठीला और प्रबल पुट्ठोवाला जानवर होता है कि जब तक हिरनमार छर्रे गरदन, सिर या कंधे के जोड़ पर न पड़े, वह शीघ्र नहीं मर सकता और ऐसी हालत में उसका घायल पड़ा रहना ढोरों और मनुष्य़ों के लिए समान संकटजनक है।

तेंदुए के स्वभाव की जानकारी न रखने के कारण मैं कई बार संकट में पड़ा; परंतु मुझे मखौल भी काफी मिला।

एक बार कुछ मित्रों के साथ सारौल गया। सारौल झाँसी के लगभग बाईस मील उत्तर-पूर्व में है। ऊँची पहाड़ियाँ हैं। तेंदुओं और लकड़बग्घों के रहने के लिए उनमें काफी पोलें हैं। थोड़ी दूर पर बीजोर-बाघाट गाँव है। ‘बाघाट’ महाभारत का ‘वाकाट’ है; जैसाकि स्व. काशीप्रसादजी जायसवाल ने तय किया है। बाघाट में कई गुफा चित्र (Cave paintings) हैं, जिनकी आयु लगभग पाँच हजार वर्ष कूती जा सकती है। सारौल में भी कुछ है और एक के ऊपर अनेक रखे हुए बड़े-बड़े शिलाखंड भी। पहले मैं इनको ज्वालामुखियों के प्राचीन उपद्रवों की क्रिया समझकर संतोष कर लेता है; परंतु अब मेरा खयाल है कि ये शिलाखंड आदिम मनुष्यों ने अपने किसी महोत्सव के स्मारक में रखे हैं अथवा अपने बड़े लोगों के शवों को इनके नीचे गाड़ा है।

सारौल के पूर्व में पहाड़ियों से घिरा एक तालाब है। एक ओर उसपर चंदेली बंध है। तालाब बड़ा तो नहीं है, पर बहुत ही सुहावना है। जेठ के महीने यह बिलकुल सूख जाता है। इसमें वहाँ के कुछ लोग अस्थायी कुएँ खोदकर गरमियों में भटे-भाजी कर लेते हैं।

हम लोग सारौल पहुँचकर इसी तालाब में जा बैठे। साथ में पड़ोस के एक बड़े जमींदार भी आए थे। खाना वे बाँध लाए थे। वह बहुत थोड़ा था। इधर हम थे सबके सब पक्के सात।

खाना सारौल में बनने लगा। वहाँ आते ही खबर मिली थी कि पहाड़ियों में चार-छह तेंदुए हैं और वे रात को सूखे तालाब के उथले खोदे हुए गड्ढों में पानी पीने के लिए आते हैं। इस तरह गड्ढे तालाब में तीन-चार थे। हम सब बँट-बँटाकर इन गड्ढों पर जा बैठे या लेटनी लगा गए। मैं जमींदार साथी सहित एक गड्ढे पर जा बैठा। गड्ढे से दिन में ढेंकली से दिन में ढेंकली द्वारा भाजी-भटो को पानी दिया गया। पानी ऊपर के खदरों में भरा था। भटोहीवाले ने बतलाया कि तेंदुए आठ बजे रात के लगभग खदरों में पानी पीने आते हैं। भटोही में लोटते-पलोटते हैं और पर्याप्त मनोरंजन के उपरांत शिकार की टोह में चल देते हैं-वैसे में यदि कोई हिरन या चीतल आ गया तो उसको समेट-समाटकर चल देते हैं। मैंने सोचा, यहाँ तो तेंदुए भटे-भाजी की ही तरह सुलभ हैं। अपने जमींदार साथी की सलाह ली। देहात में रहते हुए भी वे तेंदुए के विषय में मुझसे बढ़कर अनजान थे। सलाह से तय हुआ कि पानी भरे खदरे से केवल दो-चार हाथ के अंतर पर बैठ जाना हितकर होगा। आड़-ओट का सवाल आया। वहाँ कुछ टूटे-फूटे पुराने-धुराने घड़े पड़े थे। आड़-ओट और स्वरक्षा के लिए इनको बहुत काफी समझा गया। मैंने अपने और पानी भरे खदरे के बीच में इन टूटे हुए घड़ों का एक लंबा सा अटंबर लगाया और बंदूक साधकर तेंदुओं के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

मेरी किस्मत प्रबल थी, इसलिए मेरे साथी को मुझसे भी ज्यादा भूख लग आई। वे अपनी बंदूक एक तरफ रखकर भटों की तलाश में चुपचाप हाथ फेंकने लगे।

इतने में साँभर बोला, चीतल कूके और चिड़ियाँ चहकीं। उस सुनसान स्थान में ये ध्वनियाँ मोहकता बरसाने लगीं। जेठ का महीना था, परंतु तालाब में हवा ठंडक को उड़ेल-सी रही थी। रात अँधेरी थी। तारे खुले हुए-से आकाश में चमचमा रहे थे। ऐसा लगता था कि रात भर चाहे भूखे बैठे रहें, परंतु रंग में भंग करनेवाला कोई आसपास न आवे। मेरे जमींदार साथी कुछ और सोच रहे थे – और कुछ कर भी रहे थे। उन्होंने तीन-चार बैगन तोड़े, कमीज की झोली में उनको कसा और कुछ कर भी रहे थे। उन्होंने तीन-चार बैगन तोड़े, कमीज की झोली में उनको कसा और अपने मोरचे पर जा डटे। बंदूक एक तरफ रख ली। पर उनकी सारी कारिस्तानी का पता मुझको तब लगा जब दो तेंदुए मेरे सिर पर आ गए।

तेंदुए पानी पर आए। मेरे और उनके बीच में केवल ढाई-तीन हाथ का अंतर था। मैंने सोचा, आज लिखा गया नाम पक्के शिकारियों में। यह नहीं जानता था कि बंदूक के चलते ही वे दोनों सिर पर सवार होते और कच्चे शिकारियों की सूची तक में नाम लिखे जाने की नौबत न आती। मैंने चलाने के लिए बंदूक उठाई थी कि मेरे साथ ने कड़कड़ाहट के साथ भटे चबाने-मुराने शुरू कर दिए। तेंदुओं ने सुन लिया। उनकी तेज आँखों ने मेरे साथी की डीलडौल को भी देख लिया और वे छलाँग मारकर भाग गए। मैं बच गया और मेरे साथी पकड़े गए। वे इतनी मौज और ओज के साथ भटे चबाए जा रहे थे कि हँसी के मारे नाकों दम आ गया। थोड़ी देर में खाना भी आ गया।

रात भर मजे में सोए। पौ फटने के पहले जाग पड़े। हाथ-मुँह धोकर बैठे कि तड़का हुआ। पहले पौ फटी। सामने पहाड़ी पर आँख गई तो देखा कि तेंदुआ बैठा है।

झटपट उठकर, पहाड़ी का चक्कर काटकर ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ से तेंदुआ बहुत पास पड़ता था। परंतु जब तक वहाँ जाकर खड़े हुए, तेंदुआ सामने की दूसरी पहाड़ी पर जा पहुँचा। दोनों पहाड़ियों के बीच में एक सँकरा मार्ग था। पहाड़ी दूर न थी। राइफल की मार में तेंदुआ था।

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सूर्योदय हो रहा था। तेंदुआ बाल-रवि की ओर मुँह किए हुए खड़ा था। मैं उसको देखकर मुग्ध हो गया। राइफल जोड़कर कंधे से नीची कर ली।

तेंदुए ने पूँछ हिलाई, ऊँची की और गरजना शुरू किया। मुझको उस समय वह गरज बड़ी जादू भरी लगी। गरज पहाड़ियों को गुँजा रही थी और लौट-लौटकर कहीं समा रही थी।

मेरे साथी ने धीरे से कहा, ‘कैसा आड़ा खड़ा है! पत्थर पर बंदूक साधकर चलाइए, खाँद नहीं छोड़ेगा। वहीं पड़ा हुआ अभी मिल जाएगा।’

परंतु मैं मुग्ध था। बंदूक न चला सका। कई मिनट तक तेंदुए के उस व्यवहार को देखता रहा। भ्रम हुआ कि यह अपनी बोली में सूर्य को नमस्कार कर रहा है।

तेंदुआ वहाँ से चल दिया। मेरे सब साथी मुझसे निराश हुए।

दिन भर लू चलती रही; परंतु मैं शर्माजी और करामत के साथ पहाड़ियों में घूमता रहा। एक पहाड़ी की गुफा के सामने तेंदुए के पंजों के टटके निशान मिले। मैंने बकरा मँगवाया। एक चट्टान पर आड़ बनाकर संध्या के काफी पहले बैठ गया। ऊपर से लू सेंक दे रही थी और नीचे से गरम चट्टान; परंतु शिकार की धुन में कुछ भी न खला।

संध्या का झुटपुटा होते ही तेंदुआ चुल से बाहर निकला। निकलकर बकरे झपटा नहीं, ठमठमा गया। मैंने उसको बकरे पर आने का समय नहीं दिया। छर्रेवाला कारतूस चलाने की गलती नहीं की। गोली का कारतूस चलाया। परंतु जल्दी कर दी। गोली उसके पेट पर पड़ी और पार हो गई। तेंदुआ गिरता-पड़ता जंगल की राह पकड़ गया। सवेरे तलाश किया। लगभग पौने मील पर एक नाले में अधखाया मिला।

दूसरे दिन पास के एक गाँव में एक तेंदुए की खबर मिली। वह घरों में घुसकर बच्छे-बछियों को उठा ले जाता था और गायों तक को मार देता था।

मचान बाँधकर बैठा। बकरा खूँटी से बाँध लिया। पास के एक खेत में गायें बैठी थीं। तेंदुए के आते ही गायें अपने दुश्मन पर टूट पड़ीं। तेंदुआ उनके झुंड के बीच में फँस गया। मचान के पास होते हुए भी बंदूक नहीं चलाई जा सकती थी। शायद किसी गाय को लग जाय। इसलिए मैं रह गया। तेंदुआ भी किसी तरह अपनी जान बचाकर गायों के बीच में से निकल भागा।

तेंदुए के बराबर ढीठ शायद ही कोई और जानवर होता हो।

इस घटना के कई महीने बाद मुझको एक तेंदुए की खबर मिली। वह बहुत उपद्रव करने लगा था, और इतना चालाक था कि कई शिकारियों के धोखा दे गया। इन शिकारियों ने उसकी चुल के पास मचान बनाकर बकरे बाँधे थे। वह उन बकरों पर नहीं आया।

मैंने गाँव में ही एक मकान के पीछे बेरी के पेड़ पर मचान बनवाया और संध्या के उपरांत बकरा बँधवाकर मचान पर जा बैठा। रात चाँदनी थी। तेंदुआ एक पहर रात गए आया। उस समय गाँव की चहल-पहल मंद पड़ गई थी।

जैसे ही तेंदुआ बकरे पर आया, मैंने बंदूक चलाई। निशाना खाली गया। तेंदआ भाग गया। मैंने सोचा, अब लौटकर नहीं आवेगा। परंतु सुन रखा था कि ढीठ और निडर होता है, शायद लौट पड़े।

चले हुए कारतूस को नाल से हटाकर उसमें दूसरा कारतूस डालकर सोच ही रहा था कि बैठूँ या डेरे पर जाकर लंबी तानूँ कि तेंदुआ बकरे पर फिर आ गया। उसने बकरे को छू भी न पाया था कि गोली चल गई और तेंदुआ समाप्त हो गया।

एक बार मचान पर मैं शर्माजी के साथ बैठा था। चाँदनी धुँधली थी। जब तक चाँदनी रही, बकरे पर आनेवाले तेंदुए को शर्माजी ने तीन बार निशाना बनाया और तीनों बार गोली चूकी। अँधेरा होने पर तेंदुआ फिर आया। चौथी गोली भी चूक गई। आधा घंटे बाद वह फिर आया। अब की बार शर्माजी ने उसको खत्म कर दिया।

तेंदुआ मरे हुए तेंदुए को खा जाता है। एक बार तेंदुआ घायल होकर एक टोर की ओट में जा पड़ा। रात के कारण उसको उस समय न ढूँढ़ पाया। सवेरे जो देखा तो पेट की तरफ से खा लिया गया था। पास ही धूल में उसका भक्षण करने वाले तेंदुए के पंजो के निशान थे।

तेंदुए को बँधे हुए बकरे पर प्रायः संदेह हो जाता है। यदि बहुत से चरते हुए बकरों में से एक को खूँटी से बाँध लिया जाय तो वह समझता है कि यह बकरा अकस्मात् अटक गया या भटक गया है और वह उसपर झपटने में देर नहीं लगाता। मैंने कई बार इस योजना को प्रयुक्त किया है और कभी विफल नहीं हुआ। परंतु यह साधन सदा सुलभ नहीं होता। प्रायः मचान या हँकाई का सहारा लेना पड़ता है। हँकाई तेंदुए को मारना कई उपकरणों पर निर्भर करता है। हाँकवाले अच्छे हों, जिस लगान पर शिकारी की बैठक हो वह साफ स्थान हो, तेंदुआ उछलता-कूदता न आ रहा है। और शिकारी का हाथ जरा सधा हुआ हो। परंतु मचान के शिकार में इतनी अड़चने नहीं हैं। यदि कोई अड़चन है तो यह कि तेंदुआ आवे और न आवे।

मुझको तो अनेक बार कोरी आँख सवेरा हुआ। परंतु रात भर जागते हुए, प्रतीक्षा करते हुए, असंख्य बड़े-बड़े तारों पर आँख फिसलाते हुए, विलक्षण बोलियों को सुनते हुए और अँगड़ाई हुए भी कुछ प्रमोद मिलता ही है। उस शांत एकांत में मन के न मालूम किन-किन कोनों से क्या-क्या विचार और कल्पनाएँ उठती-बैठती हैं।

मचना पर न बैठकर भूमि पर बाजे-बाजे शिकारी बैठते हैं। आड़-ओट अवश्य बना लेनी पड़ती है। इस प्रकार के शिकार में संकट और ओज दोनों ही एक-सी मात्रा में मिल सकते हैं।

मैं भी समतल भूमि पर काँटों की आड़ बनाकर कई बार तेंदुए के शिकार के लिए बैठा; परंतु सफल कभी नहीं हुआ। अनुभव निस्सेंदेह विलक्षण प्राप्त हुए।

एक बार एक अच्छी खासी आड़ बनाकर बैठ गया। आड़ के आगे एक पगडंडी थी। पगडंडी से पंद्रह फीट की दूरी पर बकरा बाँध लिया था। आड़ के मध्य में एक छोटा सा छेद बना लिया था, जिसमें होकर बकरे को और बकरे पर आनेवाले को देखा जा सके।

संध्या के पहले ही जा बैठा और सूर्यास्त के पहले तेंदुआ आ गया। परंतु वह बकरे पर नहीं गया। पगडंडी से मेरी ओट के पास से बिलकुल सटकर निकला। बंदूक नीचे रखी हुई थी। उसको उठाने का समय न मिला। तेंदुआ तीन-चार फीट के फासले पर से निकला। कुशल हुई कि मेरी ओर से हवा का रुख तेंदुए की ओर न था। रुख उलटा था। तेंदुआ इतने पास से निकला कि मैं उसकी मूँछों को गिन सकता था। उसकी आँखें प्रचंड थीं और जबड़ा नीचे को जरा लटका हुआ। धरती पर पंजा रखने के समय शब्द होता नहीं है, इसलिए जान न पड़ा कि किस दिशा से आया। मैं टकटकी लगाकर बकरे की ओर देखने लगा। कुछ पलों के बाद तेंदुआ बकरे के पास गया और बराबरी पर खड़ा हो गया। बकरा सिर नवाए था। बिलकुल गुमसुम। मैंने बंदूक सँभाली। देखूँ तो पीछे से यकायक एक डकराती हुई गाय आ रही है। शायद वह बकरे को बचाना चाहती थी; परंतु अपनी रक्षा के लिए सचेत थी। तेंदुआ वहाँ से हट गया। न तो वह गाय पर झपटा और न बकरे से बोला। तेंदुए के चले जाने पर गाय भी भाग गई। मुझकों इस समग्र व्यापार पर विस्मय था। विस्मय में पड़ा था कि बकरे के पास एक लकड़बग्घा आया।

लकड़बग्घे का अगला हिस्सा भारी होता है और पिछला पतला। दुम छोटी। मुँह बहुत बड़े कुत्ते जैसा। इसके शरीर पर धारें होती हैं। शरीर से बहुत दुर्गंधि निकलती है। यह घोड़ों, गधों और कुत्तों का परम शत्रु है; परंतु होता अत्यंत डरपोक है। एक लकड़बग्घा दूसरे लकड़बग्घे को मरी हालत में तो खा ही जाता है, अपने घायल सहवर्गी को भी नहीं छोड़ता। सड़ा-गला मांस, नई पुरानी हड्डियाँ सब चबा जाता है।

मैं इससे पहले अनेक लकड़बग्घे मार चुका था। इस लकड़बग्घे पर अपना कारतूस खराब नहीं करना चाहता था। परंतु हटाता तो किस तरह। आसपास कोई कंकड़-पत्थर भी न था कि फेंककर उसको डरवाता। उधर बकरे की जान खतरे में थी। परंतु उसका बचानेवाला वहीं छिपा था।

वह था तेंदुआ। अपनी घात में बैठा। रात होने पर बकरे पर आता; पर यह घृणास्पद लकड़बग्घा पहले ही आ गया। तेंदुए ने वहीं से छिपे-छिपे एक हलकी घुड़की दी। घुड़की के सुनते ही लकड़बग्घे के होश कूच कर गए। बेतरह भागा। परंतु भागकर भी उसने प्राण न बचा पाए। तेंदुआ उसपर झपटा-वह लकड़बग्घे को उसकी अनधिकार चेष्टा का दंड़ देना चाहता था। लकड़बग्घा थोड़ी ही दूर भाग पाया था कि तेंदुए ने उसको धर दबोचा।

फिर उन दोनों का जिस भाषा में वाद-विवाद हुआ, वह अवर्णनीय है; क्योंकि कवेल ध्वन्यात्मक थी।

घबराए हुए लकड़बग्घे की बोली फटे हुए भोंपू जैसी होती है। तेंदुए की मार के मारे वह अपनी फटा हुआ भोंपू पूरे जोर के साथ बजा रहा था और तेंदुआ हुंकार भरी हूँ-हूँ से उसका पलेथन बना रहा था। यह सब मेरे स्थान से कुछ डगों पर हो रहा था। मैं अपने काँटों में होकर अत्यंत उत्सुकता के साथ देख रहा था। सोचता था कि ये दोनों अपने अखाड़े को जरा और विस्तृत कर दें तो मेरी ओट की और मेरी भी खैर नहीं। इसपर भी मैंने बंदूक नहीं चलाई। मैं इस युद्ध का अंतिम परिणाम देखना चाहता था।

अंतिम परिणाम, जैसा कि अनिवार्य था, वैसा ही हुआ। लकड़बग्घे को तेंदुए ने चीर-फाड़कर फेंक दिया। पर खाया नहीं। लकड़बग्घे के नाखून लंबे होते हैं और पंजा बड़ा। उसके नाखून तेंदुए की तरह गद्दी के अगले भाग के भीतर छिपे नहीं रहते। यही कारण है कि जब वह चलता है, पृथ्वी पर नाखून रगड़ खाते हैं और आवाज करते हैं। लोगों को भ्रम होता है कि लकड़बग्घा अपना पिछला धड़ घसीटकर चलता है, इसीलिए शब्द होता है।

उस लकड़बग्घे ने तेंदुए को अपने लंबे नाखूनों और बड़ी-बड़ी दाढ़ों से घायल कर दिया था; परंतु बहुत नहीं, क्योंकि युद्ध थोड़ी सी देर तक ही चला था।

तेंदुआ लकड़बग्घे से निबटकर बकरे के लिए एक पीछेवाली झाड़ी में जा छिपा। वह गत युद्ध के परिश्रम के कारण हाँफ रहा था और शायद अपने घावों पर जीभ फेर रहा था-दिखलाई तो पड़ नहीं रहा था, केवल शब्द सुनाई पड़ रहा था।

रात गहरी हो गई। बकरा थक-थकाकर बैठ गया। झाड़ी के पीछे से तेंदुए की हाँफ और जीभ फेरने का शब्द काफी देर पहले बंद हो चुका था। जमीन पर बैठने के लिए मेरी गाँठ में टाट का केवल एक छोटा सा टुकड़ा था। प्रतीक्षा करते-करते अधीर हो गया। सोचा, जरा खड़े होकर देखूँ कि ओट के बाहर के जगत् का क्या हाल है। बकरे के बैठ जाने से विश्वास हो गया था कि तेंदुआ कहीं दूर चला गया है।

मैं जैसे ही खड़ा हुआ, तेंदुए ने झाड़ी के पीछे से छलाँग मारी और द्रुत गति से जंगल में भाग गया। मैंने उस स्थान पर और अधिक ठहरना व्यर्थ समझा और बकरे को बगल में दाबकर गाँव चला आया।

तेंदुए की आँख और कान बहुत तेज होते हैं। वह मूँछों के सहारे भी बहुत सी ढूँढ़-खोज कर लेता है। मचान पर बैठकर कई बार मैंने जरा सा शब्द करके अवसर को खो दिया। कभी मचान जरा सा चरमरा गया, कभी कमर पेटी थोड़ी सी चिकचिका गई और कभी जेब में पड़ा हुआ कोई कागज या चमड़े का बटुआ ही तेंदुए के खिसक जाने का कारण बन गया।

मचान पर घंटों चुपचाप बैठे रहना एक बहुत ही कष्टसाध्य प्रयास है। भरपेट भोजन करके मचान पर बैठना तेंदुए को खो देने का पूर्व निश्चय तो करा ही देता है, और भी कई दंड देता है। बार-बार प्यास लगती है। भर-भरकर साँस लेनी पड़ती है और बार-बार आसन बदलना पड़ता है। ऐसी दशा में मचान पर न बैठकर घर की चारपाई पर करवटें बदलना कहीं ज्यादा अच्छा।

तेंदुआ जंगल में छह-सात बजे और गाँव में गायरे पर ग्यारह-बारह बजे रात तक आ जाता है। यदि उसको आरंभ में दुविधा दिखलाई पड़ी तो बाद को आता है; परंतु आता अवश्य है। उसकी लंबी प्रतीक्षा शिकारी के धैर्य की कसौटी है।

संध्या होते ही पहले खरगोश दिखलाई पड़ते हैं। शिकारी इसे अपशकुन मानते हैं। अपशकुन इसलिए कि खरहे के आने की जगह तेंदुए से खाली होनी चाहिए। जहाँ कोई खुटका होगा वहाँ खरहा आने ही क्यों चला! परंतु जंगल में खरहे इतनी अधिक संख्या में होते हैं कि किसी विशेष स्थान में तेंदुआ हो या न हो, खरहा तो सूर्यास्त के समय बाहर निकलेगा ही।

मैं जब मचान के ऊपर जा बैठा और बकरा बँधवा लिया, तब आधी घड़ी बाद ही मचान के नीचे और आसपास कई खरहे आए-गए। सूर्यास्त होते-होते तेंदुआ भी आया।

तेंदुआ आकर बकरे की बगल में खड़ा हो गया। उसने बकरे को सूँघा भी। बंदूक तैयार थी, परंतु मैंने चलाई नहीं। मैं देखना चाहता था कि तेंदुआ बकरे को सूँघ-सूँघाकर फिर क्या करता है। मैं मचान पर से लगभग बारह बजे रात को उतर आया।

दूसरे दिन फिर उसी मचान पर जा बैठा। खरहे आए और चले गए। सियार भी आए। इनका इलाज मेरे पास था-मैंने मचान पर थोड़े से कंकड़ रख छोड़े थे।

तड़ाक से एक कंकड़ मैंने सियार के ऊपर छोड़ा उसको लगा। वह भाग गया। निश्चित था कि तेंदुआ उस समय वहाँ नहीं है। मैं खाली पेट था। हाँफ और साँस की कोई चिंता न थी। रात भर बैठा रहना पड़ता, तो भी न थकता।

गरमियों के दिन थे। नदी का किनारा। किनारे से लगे हुए भरके और छोटे-छोटे नाले। इनमें करौंदी का जंगल था। करौंदी फूलों से लदी हुई थी और वायु उसकी महक से लदी जान पड़ती थी। नदी के पानी के पास चकवा-चकई बोल रहे थे। वे अलग न थे। रात को भी साथ ही रहते हैं। पुराने कवियों के भ्रम में ने ही उनको अलग किया है। पानी में मछलियाँ उछल-उछलकर डूब रहीं थी। पतोखियाँ और टिटिहरियाँ बोल-बोल जाती थीं। रात बिलकुल अँधेरी थी; परंतु तारे निकल आए और झिलमिला रहे थे – निले आकाश में टँके हुए से।

थोड़ी देर बाट देखने के बाद मैंने बंदूक के नीचे अपनी टॉर्च एक रूमाल से बाँधी और बंदूक को जाँघ पर रख लिया।

एक बड़ा तारा पूर्व दिशा के भाल पर दमक रहा था। वह पेड़ के झरोखे में से साफ दिखलाई पड़ता था। करौंदी की मस्त महक और उस तारे की लुभानेवाली दमक में मुझको तेंदुए के शिकार की लालसा न रही। मैं एकटक उस अद्भुत तारे को देखने लगा।

इतने में खूँटी से बँधा हुआ बकरा चटका। उसके प्राणों की मुझको चिंता हुई। उस अँधेरी रात में मचान के नीचे की भूमि पर बकरा एक हिलता हुआ छपका दिखलाई पड़ा। मैं समझ गया कि बकरे के पास कोई आ रहा है।

एक क्षण उपरांत ही बकरेवाले छपके पर एक बड़ा और लंबा छपका जोर के साथ हिलता हुआ दिखलाई पड़ा। साथ ही बकरे की ‘में-में’ सुनाई पड़ी। उसी बड़े छपके की सीध में दुनाली हो गई। टॉर्च का बटन दबाते ही तेज प्रकाश हुआ। एक लंबा-चौड़ा तेंदुआ बकरे को दबोचे हुए था।

‘धाँय!’ गोली चली। वह तेंदुए को फोड़कर बकरे को जा लगी। तेंदुआ बकरे को छोड़कर दूर जा पड़ा थोड़ी सी हुंकारियाँ मारकर चुप हो गया। गोली लगने के कारण बकरा भी खत्म हो गया-तेंदुए से पहले ही।

कारतूस में पक्की गोली (Solid ball) थी। यदि कच्ची गोली (soft ball) होती तो वह तेंदुए के भीतर ही रह जाती और बकरा बच जाता। तेंदुए ने बकरे को ऐसा जकड़ लिया था कि मैं कुछ और कर ही नहीं सकता था।

तेंदुआ काफी लंबा-चौड़ा था। परंतु इससे एक बड़ा शर्मा जी ने मारा था। और, सबसे बड़ा तो वह था, जिसको चि. सत्यदेव ने दिन में बैलगाड़ी पर से केवल आठ-दस फीट के फासले पर चित्त कर दिया था। गोली खाते ही तेंदुआ उछला; छलाँग जरा तिरछी पड़ती तो सीधा गाड़ी पर आता। उसपर तुरंत दूसरी गोली पड़ी और वह ठंडा हो गया। नापने पर वह दो इंच कम आठ फीट लंबा था। इन जानवरों की नाप पूँछ सिरे से नाक के छोर तक ली जाती है। इस तेंदुए का रंग और उबार बहुत गहरा था। डीलडौल में छोटे शेर के बराबर जान पड़ता था।

इन जानवरों को मुलायम खालवाला जानवर कहते हैं। इनके लिए पक्की गोली उपयुक्त नहीं है। खाल इतनी लोचदार, इतनी लचीली होती है कि कभी-कभी पक्की गोली-जैसा कि कुछ लोगों का मत है-उसपर से रिपट जाती है। कच्ची गोली चकत्ता बन जानेवाली (Mushrooming) मुलायम, नोकदार गोलियाँ ही इन जानवरों के लिए ठीक हैं।

तेंदुआ साधारण तौर पर मनष्य पर हमला नहीं करता; परंतु दबे पाँव चढ़ भी बैठता है। घायल तेंदुआ तो मौत का द्वार ही है। हर साल एक-न-एक शिकारी घायल तेंदुए की दाढ़ों और नाखूनों का शिकार हो जाता है।

घायल होने के बाद तेंदुए को कई घंटे तक खोजना सावधानी का एक नियम-सा है; परंतु इस नियम की परवाह शायद ही कोई शिकारी करता हो। फल ही उसका जो अनिवार्य है, वह होता है।

तेंदआ छप्पर तोड़कर बकरवाली घरों में प्रवेश करता है। नाखून गड़ाकर दीवार पर चढ़ता है और छोटे-मोटे जानवरों को मुँह में चाँपकर ले भागता है। जो कुत्ते इसको रात-रात भर भौंककर चिढ़ाते हैं, उनको मिटा देने की यह गाँठ-सी बाँध लेता है और एक-न-एक रात मिटाकर रहता है।

मैंने अपने फॉर्म पर खेती की रखवाली के लिए जितने कुत्ते पाले, वे ज्यादा काम न करते थे तो रात को भौंकते अवश्य थे। उसने बारी-बारी से सबको समाप्त कर दिया।

परंतु तेंदुए की मुठभेड़ जब सुअर से होती है तब उसको छठी के दूध की याद आ जाती होगी। किंतु सुअर हो खीसदार। खीसदार सुअर के साथ तेंदुए की लड़ाई रात-रात भर होती है। एक तरफ से ‘हुर्र हुख’ और दूसरी तरफ से हुंकार की टंकारें होती हैं। यह लड़ाई दो में से एक की समाप्ति पर ही निबटती है। कभी-कभी तो दोनों ही मर जाते हैं। सुअर अपनी छुरी जैसी खीसों से तेंदुए के चिथड़े उड़ाता है और तेंदुआ अपने पाँचों हथियारों से सुअर की बोटियाँ बिखेरता है।

कभी-कभी ‘सेही’ से भी तेंदुए की थोड़ी देर लड़ाई हो जाती है; परंतु यह विग्रह अल्पकालीन होता है। सेही के शरीर पर-पिछले भाग पर अधिकतर लंबे-नुकीले काँटे होते हैं। यह इन काँटों को आत्मरक्षा में अपने आक्रमणकारी पर तेजी के साथ छोड़ती है। ये काँटे शरीर में से जाते हैं।

परंतु अंत में तेंदुआ सेही को मारकर खा जाता है।

मैंने एक बार एक तेंदुआ मारा। जब खाल छिलवाई तो उसके पुट्ठों में सेही के दो काँटे निकले। घाव पुर गया था, पर मांसपेशी में वे काँटे ज्यों-के-त्यों थे।

एक और तेंदुए के शरीर में से सीसे का एक छर्रा निकला था। किसी शिकारी का छर्रा खाकर भी तेंदुए का कुछ न बिगड़ा था।

कुछ लोग इसको शिकारी कुत्तों से घेरकर बरछे से मारते हैं। परंतु मार उसको तब पाते हैं जब वह एकाध कुत्ते की चटनी बना डालता है और स्वयं घायल हो जाता है या बहुत थक जाता है। इस प्रकार का शिकार काफी समय लेता है।

एक तरह से और उसको मारा जाता है; परंतु वह वध है, शिकार नहीं। खिसियाए हुए गाँववाले, जिनमें से अनेक बंदूक देखी तक नहीं, करें भी और क्या!

एक गहरा गड्ढा खोदा। उसपर गाड़ी का पहिया नाम मात्र के सहारे से रख दिया। एक ओर, चबाकर, बकरा बाँध लिया। तेंदुआ आया। उसने बकरे पर झपट लगाई। बकरा अलग, तेंदुआ गड्ढे में और पहिया जा सटा गड्ढे के ऊपर। फिर जुटे गाँववाले पत्थर और लंबे-नुकीले ले-लेकर और किया उसको ठोंक-पीटकर समाप्त।

तेंदुआ जंगल या अपनी चुल से साँझ के लगभग निकल पड़ता है और प्रातःकाल के जरा पहले लौट आता है। ठंड के दिनों में वह काफी दिन चढ़े तक घमोरी लेता है। गरमियों की ऋतु में वह शाम को किसी खुली सुरक्षित जगह में लेट जाता है। वहीं से अधमुँदी आँखों गुंताड़े लगाता रहता है-शिकार की टोह-टाप में।

तेंदुआ अपनी मादा के साथ असाढ़ और कातिक के लगभग रहता है। इनकी लड़ाई-भिड़ाई या मेल-मिलाप का समाचार इनका गर्जन-तर्जन देता है। सारा जंगल इनकी गूँजों के मारे उमग सा पड़ता है।

एक बार ऐसे ही एक गर्जन को सुनकर मैं बंदूक लेकर दौड़ा। गर्जन लगभग आधा मील दूर से आ रहा था। जब मैं पास पहुँचा तब वह दूर हट गया। झाड़ी घनी थी। रेंगते-रेंगते मैं तेंदुए के पास पहुँच गया। मैंने बंदूक नहीं सीधी कर पाई और उसने देख लिया। वह एक हुंकार के साथ विलीन हो गया। मैं पसीना बहाता हुआ अपने डेरे पर लौट आया।

रेंगते-रेंगते तेंदुए के पास पहुँचना समय नष्ट करना है। तेंदुए के कान इतने तेज होते हैं कि कोई भी इस प्रकार की आसानी के साथ उसको नहीं दबा सकता। इस रेंग-राँग के बीच वह स्वयं प्रचंड विशेषज्ञ और पारंगत है। उसकी ही जातिवाला इस तरह उसके पास पहुँच सकता है। मनुष्य के लिए तो बहुत दुष्कर है।

तेंदुए की भिन्न-भिन्न बदमाशियों के कारण कुछ लोग अपनी खीज में उसको ‘खजुहा’ कहते हैं। कोई-कोई ‘नकटा’, क्योंकि उसकी नाक बिलकुल चिपटी होती है – और कोई-कोई ‘कटना’।

जिस समय वह अपनी लोच को फैलाता और समेटता हुआ जंगल में चलता है, उस समय उसपर शान बरस बरस सी जाती है। परंतु जब उसके हत्यारेपन की याद आती है तब उसके लावण्य या सौंदर्य के साथ कोई सहानुभूति नहीं रहती।

फिर भी तेंदुए की कोई अदा मन पर एक लकीर छोड़ ही जाती है। जब कभी-कभी रात को नींद नहीं आती और मन इधर-उधर भटकता है तब कुछ ऐसी स्मृतियाँ विचलित मन और गहरी नींद को जोड़नेवाली कड़ियाँ बन जाती हैं।

अँधेरी रात थी, पर मोटर की तेज रोशनी थी। ललितपुर से टिकमगढ़ जा रहा था। मार्ग अच्छा न था। मोटर जरा धीमी चाल से जा रही थी। यकायक एक बड़ा तेंदुआ सड़क के एक छोर से दूसरे छोर को निकल गया। बड़े-बड़े गुल और चमकती हुई खाल, बड़े-बड़े पुट्ठे सब लहराते हुए, खिंचे हुए से सरपट निकल गए। आँखों के सामने बिजली सी कौंध गई।

दूसरी बार सूर्योदय के पीछे इससे भी बढ़कर अनुभव मिला। गरमियों के दिन थे। करौंदी के फूल झड़ चुके थे और करधई की पत्तियाँ भी। जंगलवर्ती एक कुएँ के पास वाले लोग दुपहरी में अपने ढोरों को इस कुएँ से खींच-खीचकर पानी पिलाते थे। उस गड्ढे में पहले दिन का बचा-खुचा पानी था। मैं इस पानी के पास एक बहुत साधारण सी झाँक-झँकीली ओट लेकर बैठा था। कल्पना थी कि सुअर आएगा।

पद्रंह मिनट बैठा था कि धूल पर गद्दी के पड़ने का हलका सा ‘धम’ शब्द हुआ। मैं समझ नहीं पाया। सोचा, धूल पर सुअर का पैर पड़ा होगा।

एक क्षण उपरांत देखा कि एक लंबा-चौड़ा तेंदुआ मजे-मजे पानी के गड्ढे के पास आ रहा है। मैं अनपी ओट में पीछे दुबका; क्योंकि वैसे तेंदुआ दूर से ही मुझको परख लेता। जब वह लगभग बीस-पच्चीस फीट की दूरी पर रह गया, किसी संदेह में तुरंत ठिठक गया। उसने वायु की ओर नथने पसारे। मैं समझ गया कि इसने बाँव ले लिया और अब दो छलाँग मारकर अदृश्य हो जाएगा। मैं तुरंत खड़ा हो गया। तेंदुए ने मुझे अच्छी तरह देख लिया और अब दो छलाँग मारकर अदृश्य हो जाएगा। मैं तुरंत खड़ा हो गया। तेंदुए ने मुझे अच्छी तरह देख लिया। भागने के लिए उसने एकदम उचाट ली। उधर उसने उचाट ली, इधर बंदूक से हिरनमार छर्रा छूटा। परंतु लगा उसको एक भी नहीं। दूसरा छूटा, वह भी बिलकुल खाली गया। तेंदुआ भाग गया।

दूसरे दिन मैं फिर उसी स्थान पर और भी जल्दी जा बैठा। जब काफी दिन चढ़े तक कुछ भी न आया तब मैंने पास की एक झाड़ी की राह पकड़ी। मटरगश्त थी आशा तो कोई थी नहीं।

मैं दबे-दबे जा रहा था। एक मोड़ से पल्लवहीन करधई के एक झकूटे के पीछे बड़ी गठरी-सी दिखलाई पड़ी। सोचा, यदि धीरे-धीरे बढ़ा तो निकट पहुँचने के पहले ही गठरी तिरोहित हो जाएगी मुझको संदेह था कि कोई जानवर सिमटा बैठा है; परंतु निश्चय न था। मैंने डग बढ़ाए।

जल्दी पास पहुँच गया। गठरी भी शीघ्र खुलकर फैली। तेंदुआ सीधा खड़ा हो गया।

यह तेंदुआ कलवाले से भी अधिक दीर्घकाय था। इसके गुल कुछ ढले हुए थे। जब तक मैंने बंदूक चलाई तब तक उसने छलाँग भरी। गोली का कोई भी प्रभाव नहीं हुआ। एक पेड़ की डाल से सटकर बल खाती हुई चली गई। तेंदुए ने और छलाँगें भरी। मैंने दूसरी गोली छोड़ी। वह भी खाली गई। तेंदुआ चला गया। परंतु मन पर गहरी छाप छोड़ गया।

एक मित्र ने इस प्रकार के जानवर के शिकार के संबंध में एक बार लालसा प्रकट की थी, ‘जानवर मरे या न मरे, जंगल के सुनसान में एक बार दिखलाई ही पड़ जाय तो उसका स्मरण खोई हुई नींद को बुलवाने का काम किया करेगा।’

परंतु शेर या तेंदुआ जब मरी हुई हालत में शिकारी को कहीं दिखलाई पड़ता है तो शायद मन में कोई स्थायी लीक नहीं बनती।

इन्हीं मित्र ने आजमगढ़ जिले की एक घटना सुनाई थी। जंगल से शेर भटककर किसानों के खेत में आ गया। गाँव भर की लाठियों और कुल्हाड़ियों ने उसको जा घेरा। वह जंगल से दूर भटक आया था, इसलिए एक खड़े खेत से दूसरे खड़े खेत में जा पहुँचता था। थक गया। भूखा-प्यासा रहा ही होगा। गाँववालों ने लाठियों और कुल्हाड़ियों से मार डाला।

उसको देखकर मन में कोई स्थायी कुतूहल न जागा।

झाँसी की कचहरी में पुरस्कार पाने के लिए कुछ गाँववाले एक मरे हुए शेर को गाड़ी पर रखकर लाए थे। उसको देखकर मेरे मन में ग्लानि उत्पन्न हुई थी।

सर्कस के शेर और तेंदुए कुछ कौतुक दे देत हैं, परंतु सुनसान एकांत में चुपचाप आनेवाले जानवर मन को जो कुछ दे जाते हैं, वह टिकाऊ होता है। परंतु उशका चरित्र खटकता है।

तेंदुआ रात को तो चोरी करता है, दिन में भी डाके डालने से नहीं चूकता। बछियों-बच्छों और गायों को तो वह बहुधा दिन में ही मिटाता है।

जब यह मनुष्यभक्षी हो जाता है तब तो मनुष्यभक्षी शेर भी इसके सामने कुछ नहीं है। इतनी हिम्मत, इतनी फुरती, इतनी ढिठाई और चालाकी शेर में नहीं होती।

तेंदुए से कहीं अधिक भयानक मादा तेंदुआ होती है; खासतौर पर उस समय जब उसके बच्चे दूध पीते हों।

जाड़ों की बात है। बेतवा नदी के बीचोबीच एक पथरीले और पेड़वाले टापू में, जिसकी जाड़ों में केवल एक ओर धार रह गई थी, एक मादा तेंदुआ ने अपनी चुल बनाई, दो बच्चे जने और वहीं रहने लगी। शिकार में एक अँगरेज का साथ हो गया। उसको तेंदुए के शिकार का अनुभव न था। वह चुल के ठीक ऊपर जा लेटा। मैंने पानी के पास बैठकर खाने की पोटली खोली। अँगरेज का खाना कई मील दूर पर रह गया था। शीघ्र भोजन प्राप्त करने का उसके पास कोई साधन न था।

मैंने सोचा, बिस्कुट-डबल रोटी खानेवाले से पूड़ी खाने की बात कहूँ ही क्यों! परंतु मनुष्यत्व या हिंदुस्थानियत ने प्रेरणा की।

मैंने पूछा, ‘पूड़ी खाओगे?’

उसने चाव के साथ स्वीकार किया। वह चट्टान पर से उतर ही रहा था कि लपककर मादा तेंदुआ आई। वह ऐसी परिस्थिति में था कि बंदूक चला ही नहीं सकता था और मेरे हाथ पूड़ी-साग के हिसाब में उलझे हुए थे। कुशल हुई कि उस मादा तेंदुए ने ज्यादा पीछा नहीं किया।

कुछ समय पीछे हम लोग चुल के पास जा टिके। मादा चुल में नहीं थी जंगल में निकल गई थी। फिर वह चुल में चली गई। खा-पीकर हम लोगों ने चुल का घेरा डाला। चुल में कई छेद थे। एक छेद से वह बाहर निकल गई थी। सावधानी के साथ बच्चों को निकाल लिया। दो थे। अँगरेज ने दोनों बच्चों को ले लेने की इच्छा प्रकट की। मुझको तो एक भी नहीं रखना था। वह दोनों को ले गया। उसकी इच्छा उन बच्चों को किसी सर्कस में दे देने की थी।

मादा तेंदुआ थोड़ी देर खड़ी-खड़ी यह सब देखती रही। परंतु हम लोग दो से कई गुने हो गए थे। बहुत हल्ला-गुल्ला कर रहे थे, और बंदूक तो हाथ में थीं ही। इसलिए उसने आक्रमण नहीं किया। हम लोग यदि बहुसंख्यक न होते तो चुल में से बच्चों निकालने का प्रयास भी न करते।

तेंदुए की दाढ़ का किया हुआ जख्म तो अच्छा भी हो जाता है, परंतु उसके नाखून का किया हुआ जक्म बहुत विषैला होता है। उसके नाखूनों की मोड़ में मारे हुए जानवरों के मांस के परमाणु चिपटे रहते हैं। वे सड़ते हैं और उसकी सड़ाँस में भयंकर विषवाले कृमि की उत्पत्ति हो जाती है। जब इनका प्रवेश मनुष्य के शरीर में हो जाता है तब वे सारे शरीर को विषाक्त कर देते हैं।

नाखूनी जानवरों के किए हुए घावों को तुरंत स्प्रिट से भिगो देना चाहिए। यदि उनको आग से दाग दिया जाए, तो भी अच्छा है।

कुछ लोगों की कल्पना है कि तेंदुए की मूँछ में विष होता है। यदि कोई भोजन में उसको खा जाए तो पेट के अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मैं समझता हूँ कि यह सही नहीं है। उसकी मूँछ या खाल के बालों में विष होता तो उनको जरूर रोगग्रस्त देखता, जो उसका मांस खा जाने से नहीं हिचकते। मैंने एक जाति विशेष को मांस खाते देखा है। यह भी देखा है कि बरसों तक उसके खानेवालों को कोई विशेष रोग नहीं हुआ। मांस के साथ उन खानेवाले ने बाल-वाल भी नहीं छोड़े थे।

तेंदुए की चरबी का उपयोग जोड़ों के दर्द पर करते देखा है, सुना है; पर मुझको मालूम नहीं कि वह इस प्रकार की पीड़ा के लिए लाभदायक है। उसकी हँसुली की हड्डी तो बहुत से अंधविश्वासों की कहानी है।

चीते और तेंदुए के अंतर पर प्रायः वाद-विवाद चला करता है। मेरी समझ में वाद-विवाद का मूल कारण चीते का तेंदुए से कुछ बातों में सादृश्य है। शरीर के चित्ते, कानों का छोटापन, सिर की बनावट, पूँछ की लंबाई चीते को तेंदुए के वर्ग का कहने के लिए प्रलोभन देती है; परंतु दो बातों में चीता तेंदुए से बिलकुल भिन्न होता है। चीता पालतू किया जा सकता है; परंतु तेंदुआ पालतू करके पिंजड़े में तो रखा जा सकता है, किंतु वह भरोसे के साथ स्वतंत्र कदापि नहीं छोड़ा जा सकता। दूसरे, तेंदुए के नाखून उसेक पंजे की गद्दी में बिलकुल छिपे रहते हैं, परंतु चीते के नाखून पंजे की गद्दी के बाहर ही रहते हैं, ठीक कुत्ते की तरह। चीता तेंदुए से काफी छोटा और कुत्ते से काफी बड़ा होता है। चीता कुत्ते की अपेक्षा अधिक बड़ी छलाँगें लेनेवाला और तेंदुए की अपेक्षा कहीं अधिक तेज दौड़नेवाला होता है। कोई-कोई राजा चीते को हिरन के शिकार के लिए पालते हैं। यह हिरन को पकड़कर अपने मालिक के सुपुर्द कर देता है। परंतु यदि यही क्रिया पालतू तेंदुए से कराई जा सकती होती, तो वह हिरन को खुद ही खाता और यदि मालिक उसके भोजन में कोई बखेड़ा उपस्थित करता तो वह मालिक पर तुरंत चढ़ बैठता।


8

खेती को नुकसान पहुँचानेवाले जानवरों से सुअर चीतल और हिरन से कहीं आगे है। मनुष्यों के शरीर को चीरने-फाड़ने में वह तेंदुए से कम नहीं है। सुअर की खीसों से मारे जानेवालों की संख्या तेंदुए की दाढ़ों और नाखूनों से मारे जानेवालों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। प्रत्येक वर्ष के औसत की कहानी है।

सुअरों की संख्या इतनी शीघ्रता के साथ बढ़ती है कि उसकी बाढ़ में किसी बड़े षड्यंत्र का हाथ सा दिखलाई पड़ता है।

दो-तीन वर्षों में ही एक जोड़ के कम से कम पचास जोड़ हो जाने की संभावना रहती है।

यह जानवर बहुत दृढ़, बड़ा कष्टसहिष्णु, विकट बहुभोजी और बहुत मार पी जानेवाला होता है। बहादुर इतनी कि इसके मुकाबले में शेर भी उतना नहीं होता। खीसें इसका हथियार हैं और बल का कोष इसकी गरदन और कंधे। और इसका सिर तो मानो पत्थर का एक ढोंका ही होता है। जिसने एक बार इस खीस का सिर की टक्कर खाई, वह उसको कभी भूल नहीं सका अर्थात् यदि उस टक्कर के कारण मर न पाया तो।

उतरती बरसात के दिन थे। सूर्यास्त होने में विलंब था। बदली छाई हुई थी और ठंडी हवा चल रही थी। मैं अपने एक मित्र के साथ जंगल की ओर चल दिया। जंगल में घुसा नहीं था कि दो छोकरे दो कुत्ते लिए हुए मिल गए। कुत्ते आगे-आगे दौड़ रहे थे और कलोलों पर थे। मैंने उन छोकरों को कुत्ते पकड़कर लौटने के लिए कहा। उन्होंने प्रयत्न करके एक कुत्ता पकड़ पाया। दूसरा जंगल का रुख पकड़ गया।

हम लोग उस कुत्ते को पकड़ने की चिंता में जंगल के सिरे पर पहुँच गए। झाड़ी शुरू हो गई थी, परंतु घनी न थी।

निदान, वह कुत्ता एक छोटी सी झाड़ी के पास जा ठिठका। हम लोग उसके पास पहुँच गए। वह झाड़ी मेरे सामने थी। दाईं और चार-पाँच कदम के अंतर पर मेरे मित्र दुनाली बंदूक लिए खड़े हो गए। एक कुत्ते को एक छोकरा साफे के छोर से बाँधे हुए बाईं ओर चार-पाँच कदम के फासले पर ओर दूसरी उसके बराबर खड़ा हो गया। मेरे मित्र दाईं ओर से हटकर जरा और सामने आए।

उस दूसरे आवारा कुत्ते ने झाड़ी में मुँह डाला। सूँघा और फूँ-फाँ की। मैंने समझा, झाड़ी में खरगोश होगा।

परंतु उस झाड़ी में से कूदकर निकला एक मझोला सुअर। वह सीधा मेरे ऊपर आया।

मैं 30 बोर का राइफल लिए था। भरी हुई थी; परंतु नाल पर ताला पड़ा था। मेरे मित्र बंदूक नहीं चला सकते थे। चलाने पर गोली या तो मुझपर पड़ती या उन दो छोकरों में से एक पर। मैं भी नही चला सकता था। मेरी गोली या तो उन मित्र पर पड़ती या किसी छोकरे पर।

उन दोनों छोकरों के मुँह से निकला, ‘ओ मताई, खा लओ!’ और वे बिना किणसी प्रत्यक्ष कारण के पोंदों के बल धम्म से गिरे। उसी क्षण सुअर मेरे ऊपर आया। क्षण के एक खंड में मैं समझ गया कि आज हड्डी पसली टूटी।

और तो कुछ कर नहीं सकती थी। मैंने सुअर के आक्रमण को बंदूक की नाल पर झेला। कंधों और हाथों को काफी कड़ा करके मैंने सुअर के आक्रमण को झेला था; परंतु उसने मेरी दाहिनी टाँग को दो छिद्दे दे ही तो दिए। ये छिद्दे घुटने के नीचे पड़े थे।

सुअर अपना थोड़ा सा परिचय देकर भागा। मैंने अपना परिचय देने के लिए उसका पीछा किया; परंतु मैं दस-पद्रंह डग से आगे न जा सका। पैर भारी हो गया और जूतों में खून भर आया। खिसियाकर रह जाना पड़ा। पैर की हड्डी टूटने से तो बच गई, परंतु मैं घायल इतना हो गया था कि लँगड़ाते-लँगड़ाते चलना भी दुष्कर हो गया।

इस स्थान से बेतवा का किनारा लगभग एक मील था। हम लोगों ने उस रात नदी के एक बीहड़ घाट पर ठहरने की सोची थी। पैर में गरमी थी, इसलिए घाट पर पहुँचने में कोई बाधा नहीं जान पड़ी। घाट पर पहुँचे तो देखा कि वहाँ बिस्तर-विस्तर कुछ नहीं। जिस गाँव में डेरा डाला था वह इस घाट के लगभग ढाई मील दूर था। परंतु ऊपर की ओर हम लोगों ने, बेतवा की ढी में, एक ठीहा और बना रखा था। सोचा, बिस्तर वहाँ रख दिए होंगे। अभी अँधेरा नहीं हुआ था, इसलिए हम लोग उस ठीहे की ओर चल पड़े। वह इस घाट से डेढ मील की दूरी पर था। पैर लँगड़ाने लगा था; परंतु मन को आशा में उलझाए हुए वहाँ पहुँच गया।

देखें तो बिस्तर वहाँ भी नहीं। घाट पर बिस्तर रखने के लिए जो शिकारी नियुक्त था, वह या तो भूल गया था या भ्रम में था कि शायद हम लोग गाँव को लौट आवें; क्योंकि सुअर की टक्कर का समाचार गाँव में पहुँच गया था।

मेरा पैर सूज गया था और घाव में पीड़ा थी। घाट पर बिना बिस्तरों के ठहर नहीं सकते थे। मेरे मित्र चिंतित थे। बोले, ‘आप गड्डे में बैठिए, मैं गाँव से बिस्तर और भोजन लेकर आता हूँ।’

मैंने कहा, ‘न, मैं भी चलता हूँ। घाव को गरम पानी से धोकर प्याज का सेंक करेंगे।’

हम दोनों गाँव की ओर चल दिए। मैं कभी मित्र का और कभी बंदूक का सहारा लेता हुआ गाँव में नौ-दस बजे तक पहुँच गया। रात को घी में भूने हुए प्याज का सेंक दिया। कुछ दिनों में घाव अच्छा हो गया। उसमें पीप नहीं पड़ी। परंतु उसके थोड़े से निशान अब भी मौजूद हैं। सुअर की चोट का घाव विषैला नहीं होता है, गाँववालों ने यह मुझको उसी रात बतलाई थी। परंतु शिकार में ऐसी चोटों का लग जाना एक साधारण बात है।

सुअर के शिकार के लोभ में एक बार जरा कड़ी चोट खाई थी।

अगोट पर बैठे-बैठे जब थक गया तो गाँव को लौटा। साथ में गाँव का पथ-प्रदर्शक था। रात काली अँधेरी थी और मार्ग जंगली पगडंडी का।

पथ-प्रदर्शक जरा आगे निकल गया। पगडंडी एक जगह बंद सी जान पड़ी। मैं समझा, आगे दूबा है और वह उसी में लुप्त हो गई है; पर वह निकला एक भरका। लगभग चौदह फीट गहरा। मैं धड़ाम से उसमें गिरा। बंदूक हाथ में लिए था। उसके बल जा सधा, नहें तो दाहिना हाथ तो टूट ही जाता जिससे लिखना सीखा था।

हाथ तो बच गया, परंतु जबड़े का धक्का कान पर लगा। वह एक कष्टदायक फोड़े के रूप में परिवर्तित हो गया। सात महीने के लिए काम और शिकार दोनों छोड़ने पड़े। इसमें से दो महीने चीर-फाड़ के सिलसिले में लखनऊ में बिताए।

जब स्वस्थ हो गया तो फिर ध्यान में सुअर आया।

सुअर का शिकार जितना ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ है उतना ही मनोरंजन और सनसनी देनेवाला भी होता है। उसके शिकार का संकट ही कदाचित मन को बढ़ावा देता है।

मैंने सुअर के सताए हुए बहुत से लोगों को देखा है किसी की जाँघ फाड़ डाली गई थी, किसी का हाथ तोड़ दिया गया था और किसी की आँतें बाहर निकाल दी गई थीं। कई तो मार भी डाले गए थे।

बेचारा मंटोला को फटी जाँघों का इलाज कराने के लिए तीन महीने अस्पताल में रहा था।

गाँव के लोग सुअर की सीध और संकट को जानते हैं, इसलिए उससे बहुत सावधान रहते हैं। ज्वार के खेत में जब अकेला सुअर आता है तब वह रखवाले की ललकार का उत्तर ढिठाई के साथ उसके पास आकर देता है। रखवाला उसके ऊपर जलते हुए कंडे और सुलगते हुए लक्कड़ फेंककर भागते-भागते जान छुटाता है।

जब सनसनाती हुई दुपहरी में मैं एक ग्रामीण के साथ पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते एक सुअर को पड़ा पा गया, तब ग्रामीण घबराकर पेड़ पर चढ़ गया। मैंने राइफल चलाई। सुअर लुढ़कता-पुढ़कता पहाड़ के नीचे गया; परंतु एक जगह सहारा पाकर ठहर गया और फिर मुझसे बदला लेने के लिए पहाड़ पर चढ़ा। इतना घायल होते हुए भी; परंतु मेरे पास राइफल और कारतूस। उसको मार खाकर फिर वापस जाना पड़ा।

एक बार तो सुअर घायल होकर लगभग सौ गज से मेरे ऊपर दौड़ आया था।

करामत मियाँ को हिरन का शिकार खेलते-खेलते सुअर मिल गया। बंदूक कारतूसी तो थी, पर थी एकनाली। सुअर पर दाग दी। सुअर घायल हुआ और आया करामत के ऊपर। बंदूक फेंककर एक पेड़ का सहारा पकड़ना पड़ा, तब प्राण बचे।

एक ठाकुर की तो गड्ढे में लाश ही पड़ी मिली थी। थोड़ी दूर पर सुअर भी मरा मिला। ठाकुर रात के पहले ही काँटेदार गड्ढे में जा बैठा। बंदूक टोपीदार थी। निशाना जोड़ पर नहीं बैठा। लोगों ने बंदूक चने की आवाज सुनी। सवेरे गड्ढे के भीतर ठाकुर को जगह-जगह फटा हुआ पाया गया और सुअर के खुरखुंद के चिह्न।

घायल सुअर का पीछा शिकारी कुत्ते बहुत अच्छा करते हैं। एक डाँग में मेरे एक साथी ने सुअर को घायल किया। उसके पास कुत्ते थे तो छोटे-छोटे, पर वे थे सीखे हुए। उसने घायल सुअर के ऊपर कुत्तों को छोड़ा। कुत्तों ने लगभग आधा मील पछिया कर सुअर को जा पकड़ा।

मैं भी दौड़ता-दौड़ता पीछे गया। जब निकट पहुँचा तो देखा कि कुछ कुत्ते उसकी पूँछ पकड़े हुए हैं, कुछ दोनों तरफ से उसके पेट से चिपटे हुए हैं और एक कान पकड़े हुए उसकी पीठ पर जमा हुआ है। वे सब एक झोर में थे। मैं झोर में उतरा। साथी ने मना किया, ‘उसके पास मत जाओ। बहुत क्रोध में है। टुकड़े कर देगा।’

मैं न माना। .30 बोर की राइफल जो हाथ में थी।

मैं आठ-दस कदम के अंतर पर जाकर खड़ा हो गया। सुअर की आँखों में से आग बरस रही थी। बिलकुल लहूलुहान था।

सुअर ने एक ‘हुर्र’ करके मेरी ओर झपट लगाने का प्रयास किया; परंतु आधे दर्जन से ज्यादा कुत्ते उसपर चिपटे थे। वह आगे न बढ़ सका। मैंने भी सोचा, इसको ज्यादा मौका न देना चाहिए। जैसे ही मैंने बंदूक के कंधे से जोड़ा, झोर के ऊपर से मेरे साथी ने पुकार लगाई, ‘बंदूक मत चलाना। कहीं किसी कुत्ते को गोली न लग जाय।’

मैं सुअर के दूसरे प्रयास के प्रतीक्षा नहीं कर सकता था – और न वहाँ से हट सकता था। वहाँ पहुँचने से कुत्तों को ढाढ़स मिल गया था, मेरे हटने से शायद वे अनुत्साहित हो जाते – अथवा सुअर कुत्तों से छूटकर मेरे ऊपर आ कूदता; तो निशाना बाँधने का भी अवसर न मिलता। मैंने उसके सिर पर गोली छोड़ दी। सुअर तुरंत समाप्त हो गया। परंतु उसकी दूसरी और चिपका हुआ एक कुत्ता भी ढेर हो गया; क्योंकि गोली सुअर को फोड़कर निकल गई थी।

कुत्ते के मालिक से मैंने क्षमा माँग ली।

सुअर जिस प्रकार खेती का विनाश करता है, वह मैंने अपनी आँखों से देखा है।

वह सावधानी के साथ ज्वार के खेत में घुसता है। अपने नीचे पेड़ को दबाता हुआ आगे बढ़ता है। पेड़ तड़ाक से टूटता है। भुट्टा उसके मुँह में आ जाता है और एक भुट्टे से भूख को प्रज्वलित करके फिर वह आगे बढ़ता है। रखवाले की झंझट की आहट लेता है और फिर अपनी विनाशकारी क्रिया को जारी करता है। रखवाले ने हल्ला-गुल्ला किया तो या तो उसपर दौड़ पड़ा या उसी जगह घड़ी-आध घड़ी के लिए चुप हो गया। सुविधा पाकर फिर वही सत्यानास।

जिस खेत में सुअरों का बगर झुंड घुस जाए, उसमें तो सब चौपट ही हो जाता है।

चनें गेहूँ, मसूर इत्यादि के खेतों को तो वह ऐसा कर देता है जैसे किसी ने घास-फूस के ढेर लगा दिए हों। किसान ढबुओं में या आग के सहारे पड़े-पड़े रात भर चिल्लाते रहते हैं, तब कुछ बचा पाते हैं। शकरकंद, ईख और आलू का तो वह ऐसा भक्षण करता है कि यदि उसका पूरा बस चले तो नाम-निशान तक न रहने दे।

मेरी आलू की खेती को तो उसने ऐसा नष्ट किया था। कि एक सेर आलू भी खाने के लिए न छोड़े। कुछ दिन रखवाली करते-करवाते एक रात चूक हो गई। वही रात सुअर का अवसर बन गई। सेवेरे जो खेत को देखा तो ऐसा दृश्य जैसे किसी ने भोंड़ेपन के साथ हल चलाए हों।

मक्का के खेत को भी वह बिछाकर ही रहता है। यों तो चिड़ियाँ भी इसको चुगते-चुगते नहीं अघातीं; परंतु सुअर नाशकारी भय के मारे मक्का की खेती ही छोड़ दी गई है। मक्का की खेती करना मनो विपद् को सिर पर बुलाना है। कई जगह ईख की भी खेती छोड़ दी गई है।

मनुष्य जाति के प्रारंभिक विकास काल में सुअर कितना भयंकर रहा होगा, इसका अनुमान किया जा सकता है। मारे डर के इसको देव, दानव और अवतार तक की पदवी मिल गई। अवतार का प्रयोग जरूर सुंदर ढंग से किय गया है; पर वह विकास के मध्य भाग की बात ही रही होगी।

सुअर का शिकार घोड़े की सवारी पर बरछे से भी होता है और यह बहुत सनसनी देनेवाला होता है। परंतु भूमि पहाड़ी और बहुत ऊबड़-खाबड़ नहीं होनी चाहिए।


9

मैं संध्या के पहले ही बेतवा किनारे ढीवाले गड्ढे में जा बैठा। राइफल में पाँच कारतूस डाल लिए। कुछ नीचे रख लिए। रातभर बैठने के लिए आया था, इसलिए ओढ़ना-बिछौना गड्ढे में था।

अँधेरा हुआ ही था कि एक छोटी सी खींसोंवाला सुअर पंद्रह बीस डग की दूरी पर गड्ढे के सामने आया। मैंने राइफल दागी। अँधेरे में निशाना तो बाँध ही नहीं सकता था, गोली उसके पेट पर पड़ी। सुअर तुरंत मेरी सीध में आया। मैंने भी जल्दी जल्दी उस पर चार फायर और किए। एक तो उसके पेट पर पड़ा, बाकी छूँछे गए। सुअर बिलकुल नहीं रुका।

गड्ढा नीचे की जमीन से छह फीट की ऊँचाई पर थी। उसपर चढ़ने के लिए पथरीली सीढ़ियाँ सी थीं। यदि सुअर बुरी तरह घायल न हुआ होता तो गड्ढे में अवश्य आ जाता। वह ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहा था, क्रोध में मुँह फाड़ रहा था और अपने बड़े-बड़े दाँत पीस रहा था।

मैं इसके पहले एक सुअर की चोट खा चुका था। सोचा, रहे-सहे हाथ-पैर आज जाते हैं।

पहला विचार जो मन में उठा वह गड्ढे में से भाग जाने का था। गड्ढे के ऊपर बेतवा के पथरीले किनारी की खड़ी चढ़ाई थी; परंतु मैं कूद-फाँदकर उस चढ़ाई की सुरक्षित चोटी पर पहुँच सकता था। किंतु उसी क्षण इस विचार को दाब दिया। चटपट नीचे रखे कारतूस उठाए और राइफल में भरे। सुअर उस समय गड्ढे में चढ़ आने का प्रयत्न कर रहा था।

जैसे ही कारतूस नाल में पहुँचा, लिबलिबी दबी, धड़ाका हुआ और सुअर के प्रयत्न की इति हो गई। मैंने सोचा, बहुत बचे। झाँसी के दक्षिण में ललितपुर उसका खंड जिला है। सागर जिले की सीमा पर ‘नारहट’ गाँव है और गाँव के पीछे ऊँचा पठार एवं घना जंगल। इस जंगल में एक पुरान तालाब है। फागुन-चैत तक इसमें कुछ पानी रहता है। इस ऋतु में संध्या के समय नाहर, तेंदुआ, रीछ, सुअर इत्यादि जानवर पानी पीने के लिए संध्या से लेकर प्रातः काल तक आते रहते हैं।

तालाब के बंध के नीचे महुए के पेड़ हैं। उस समय महुओं ने अपने फूल टपकाने आरंभ कर दिए थे।

उस स्थान पर संध्या के काफी पहले मैं अपने मित्र शर्माजी के साथ अपनी छोटी सी गाड़ी से जा पहुँचा। मार्ग बहुत था। उसपर मोटर मजे में चल सकती थी।

साथ में पूड़ियाँ थीं और आलू तथा नमक-मिर्च। लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग जलाई। आलू भूने और खा-पीकर मोटर की सीटों पर जा बैठे। ड्राइवर भी थोड़ा-बहुत शिकार खेल चुका था; परंतु बंदूकें दो ही थीं। वह मोटर में बैठा रहा, हम दोनों तालाब के किनारे गए। पानी के पास शिकारियों के खुदवाँ गड्ढे बने हुए थे। हम दोनों एक गड्ढे में बैठ गए।

सूर्यास्त नहीं हुआ था कि लगभग सौ गज के फासले पर एक सुअर आया। शर्मा जी ने बंदूक उठाई, मैंने रोक दिया। एक तो वह जरा दूर पड़ता था, दूसरे तमाशा देखने के लिए रात भर सामने थी; सूर्यास्त के पूर्व ही बंदूक का हल्ला करके क्यों जानवरों को बचकाया जावे।

उस दिन फागुन की पूर्णिमा थी। चंद्रमा अपने पूरे गौरव के साथ आकाश में आया। हमारे गड्ढे के पीछे महुए और आराम के लंबे-तगड़े पेड़ थे। उनकी छाया में हमारा गड्ढा छिपा हुआ था। पेड़ों की छाँह के बाहर चंद्रमा ने चाँदी-सी बिछा रखी थी, जो क्रमशः उजली पर उजली होती चली जा रही थी।

साढ़े सात या आठ बजे एक भारी-भरकम सुअर हमारे गड्ढे के पास से पानी पर पहुँचा। पास ही था। सहज ही मार सकते थे। परंतु प्यासे जानवर को न मारने की शिकारी परंपरा है, इसलिए उस समय राइफल नहीं चलाई।

सुअर ने पानी में पहुँचते ही पहले धप्प से एक पलोट लगाई। वह काफी देर तक लोट-लोटकर नहाता रहा। नहाकर उसने अँगड़ाई और फुरेरू ली। फिर थोड़ा ठहरकर पेट भर पानी पिया, तब जंगल के लिए लौटा।

लौटते समय वह हमारे गड्ढे से ठीक पंद्रह डग की दूरी से निकला। जैसे ही उसका शरीर आड़ में आया, मैंने राइफल दागी। सुअर तुरंत गिर पड़ा। परंतु फिर उठा और गड्ढे की ओर आने का प्रयास करने लगा। राइफलें हम दोनों की तैयार थीं; पर चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। सुअर थोड़ी ही दूर चलकर समाप्त हो गया। हम लोगों ने गड्ढे से बाहर निकलकर दूरियों का नाप किया और फिर गड्ढे में जा बैठे।

अभी आठ बजा था। सारी रात रखी थी और इतना बड़ा जंगल आस पास था। बस्तियाँ मीलों दूर थीं। इसलिए गड्ढे में चुपचाप बैठे रहना ठीक समझा।

घंटे-डेढ़ घंटे बाद तालाब के बंध पर रीछ आए और वे तालाब के दूसरे किनारे पर पानी पीकर हमारी आँखों से ओझल हो गए। वे मोटर के आसपास घूम-घूमकर महुए बीनते खाते रहे। ड्राइवर की दम खुश्क थी। वह दबा हुआ मोटर में पड़ा रहा, हाथ में इंजन चलाने का डंडा लिए हुए। रीछों के चले जाने के बाद ही हम लोगों की मार में एक सुअर और आया। उसके मारे जाने के उपरांत एक बजे के लगभग तीसरा सुअर आया। वह घायल होकर भागा। हम लोगों ने गड्ढे से निकलकर उसका पीछा किया; परंतु सवेरे तक ढूँढ़ने के बाद हम लोग सवेरे अपने गड्ढे पर आए तो देखा, दोनों सुअर गायब।

पहले भ्रम हुआ, शायद शेर उठा ले गया हो; परंतु पास ही कुछ मनुष्यों की आहट मिला। वे सहरिए थे। उन्होंने अवसरभोगी बनकर काम किया था। सुअरों को थोड़ी दूर जा छिपाया था।

उनको जल्दी मानना पड़ा; क्योंकि बात छिपाने का बहुत कौशल गाँठ में न था। हम लोगों ने वे दोनों सुअर उन्हीं लोगों को दे दिए।

यह स्थान झाँसी से बयासी-तिरासी मील दक्षिण में है। झाँसी से सागर को जो सड़क गई है, उससे बाईं ओर। जहाँ सड़क अमझेरा की घाटी में होकर निकली है वहाँ तो जंगल का सुनसान सुहावनापन मानो मोहकता की गोद में खेलता है। सड़क के दोनों ओर घने जंगल के ऊँचे-ऊँचे मोटे पेड़ आँखें उलझाए रहते हैं। जंगल के पीछे लंबे-ऊँचे पहाड़ दृष्टि-पथ को रोक लेते हैं और अपने पीछे के स्थलों को गुदगुदी पैदा करनेवाले रहस्यों में भर देते हैं।

मैं इस बार इस स्थान पर गया हूँ; पर बार-बार जाने का मोह मन में बना रहा। एक बार तो कुछ डगों से एक शेर से बच गया था। ठीक दीवाली की रात थी। झाँसी से सीधा इस घाटी के बीचोबीच आठ बजे रात को पहुँचा। वहाँ से ‘अमझेरा’ नाम का नाला बहता हुआ निकला है। नाले पर पुलिया है। उस पार हनुमानजी का छोटा सा मंदिर और चबूतरेदार एक पक्की बारहदरी। किसी समय यह पुलिस की चौकी थी; उस समय खाली पड़ी थी।

इस बारहदारी के सामने चबूतरे पर हम लोगों ने अपना सामान रखा। खाना साथ में था, परंतु साग-भाजी पकाना चाहते थे। लकड़ी-कंडे बीन-बानकर आग सुलगाने का यत्न कर रहे थे कि मेरी बगल में कुछ डग के फासले पर गुरगुराहट का शब्द हुआ। मैं इस गुरगुराहट को पहचानता हूँ। सब शिकारी पहचानते हैं। तेंदुए की न थी, शेर की थी। पर वह वार किए बिना चला गया।

दूसरे दिन ‘नारहट’ गाँव में सुना कि दीवाली से दो दिन पहले अमझेरा घाटी में ही शेर ने एक राहगीर को सताया था।

अमझेरा घाटी झाँसी जिले के गौरवमय स्थलों में से एक है।

अमझेरा घाटी से होली की परमा को मैं घर आया और संध्या के पहले ही अपने पुराने स्थान भरतपुरा, झाँसी से बारह मील दूर बेतवा किनारे अपने मित्र शर्मा जी के साथ पहुँच गया। होली, दीवाली इत्यादि बड़े-बड़े त्योहार हम लोगों ने बरसों जंगलों में ही मनाए हैं।

हम लोग उसी गड्ढे में जा बसे, जिसमें कुछ महीने पूर्व सुअर ने मेरी मरम्मत करते करते छोड़ा था।

लगभग रात भर जागते रहे और अमझेरा घाटी के सौंदर्य एवं वैचित्र्य पर कल्पना को भटकाते रहे। न कुछ दिखलाई पड़ा और न सुनाई पड़ा। हम दोनों पहली रात के जागे थे ही, चार बजे के करीब सो गए।

साढ़े सात बजे होंगे, जब मेरी आँख यकायक खुली। देखूँ तो गड्ढे की ढी वाले किनारे की चोटी पर सुअर आ रहे हैं। पहले तो मुझको भ्रम हुआ, शायद गाँवटी सुअर हों। उसी क्षण भ्रम का निवारण हो गया। मैंने आँखें मीड़ीं। मैं गाँव में न था और न वे सुअर गाँवटी हो सकते थे।

मैं झटपट राइफल लेकर गड्ढे में बैठ गया, एक हाथ से फिर आँखें मीड़ीं। सुअर ढी के ऊपर से नीचे उतर आए थे और गड्ढे की सीध में थे। मैंने तुरंत एक पर गोली चलाई और दूसरे ही क्षण दो सुअर गड्ढे के भीतर आ गए। पहले सामने ठीक दो हाथ के फासले पर एक देखा था। उस पर राइफल उबारी। वह खिसक गया। दाहिनी तरफ आँख की तो दूसरी मेरे बिस्तरों के ऊपर ठीक एक हाथ के फासले पर।

मैं ठीक-ठाक नहीं बतला सकता कि क्या हुआ; पर हुआ यह कि मेरी राइफल उस सुअर की ओर घूम गई। उसी समय लिबलिबी पर ऊँगली की दाब पड़ी और गोली चली। सुअर के चिथड़े उड़ गए। उसका रक्त मेरे बिस्तरों में भर गया और बोटियों के टुकड़े मेरी कमीज में आ चिपटे। सुअर गड्ढे में से भागा और काफी दूर जाकर मरा। उस दिन सुअर मेरे चिथड़े-चिथड़े उड़ा सकता था। राइफल की गोली खाने के पहले और पीछे भी; परंतु मैं कैसे बच गया, यह ठीक-ठीक कभी समझ में नहीं आया।

मेरे मित्र मुझसे पहले जागकर दिशा मैदान के लिए नदी में थोड़ी दूर चले गए थे। जिस समय सुअर गड्ढे में आए, वे दातौन कर रहे थे। पहली गोली के चलने पर जैसे सुअर मेरे गड्ढे पर चढ़े, उन्होंने देख लिया था। दूसरी गोली चलने पर जैसे ही घायल सुअर भागा, वे मुझको गड्ढे की ओर दौड़ते दिखलाई पड़े। बड़ी घबराहट में थे।

मेरी बाईं टेहुनी में चोट आ गई थी। लहू निकल रहा था। परंतु वह घाव सुअर का दिया हुआ न था। भागते हुए सुअर के पीछे थोड़ा सा चलते ही फिसलकर टेहुनी के बल पत्थर पर गिरा था।

मैंने एक फुट से ज्यादा लंबाईवाली खीसें देखी हैं; परंतु कोई-कोई इसकी लंबाई दो-दो पीट तक की बतलाते हैं। कई रजवाड़ों में तो इन खीसों को चाँदी से मढ़ाकर रख लिया गया है।

खीसों की बहुत सी कहानियाँ भी बन गई हैं। एक कहानी ने तो अतिशय की सीमा ही लाँघ डाली है।

कहते हैं कि अहमदनगर की ओर पहाड़ों की घाटियों में एक बड़ा प्रचंड सुअर था। जब वह दस-बीस शिकारियों के प्राण और हथियार भी छीन चुका, तब एक छोटी सी सेना उसके मुकाबले के लिए गई। सुअर ने उस सेना का भी मँह मोड़ दिया, और शायद हथियार भी छीन लिए।

जब एक विशेष रियासत के राजा उस सुअर के मुकाबले के लिए पहुँचे, तब कहीं वह मारा जा सका। प्रमाण के लिए कहा जाता है कि उस रियासत की राजधानी में उस सुअर की लंबी खीसें चाँदी से मढ़ाई रखी हैं।

यदि इस कथन को प्रमाण का पद दे दिया जाय तो अवश्य वह सुअर छोटे से हाथी के बराबर तो होगा ही होगा।

सुअर के मारे जाने में गाँववालों की बहुत रुचि होती है। एक तो सुअर के मारे जाने से उसका एक दुश्मन कम हो जाता है, दूसरे गाँव की अधिकांश जनता उसको बड़े चाव से खाती है।

उसकी चरबी के अनेक उपयोग होते हैं। कमजोर बैलों को पिलाने से वे बलिष्ठ और तेज हो जाते हैं। बादी जोड़ों के दर्द और मूँदी चोटों पर इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। जहाँ डॉक्टर, वैद्य और हकीम कोई भी सुलभ नहीं वहाँ इसके अनेक लाभकारी और लाभहीन उपयोग किए जाते हैं।

यदि किसी को शिकार की सनसनी को आनंद प्राप्त करना है तो सुअर के शिकार से बढ़कर मैं किसी अन्य जानवर के शिकार को नहीं समझता हूँ।

घायल हो जाने के बाद भालू, तेंदुए और शेर को मैंने बहुधा भागते हुए देखा है; परंतु सुअर को घायल होने के बाद बहुत कम भागते देखा है।

अन्य बड़े जानवरों की तौल में उसका डीलडौल छोटा होता है; परंतु उस छोटे डीलडौल में कितना बल, कितना साहस और कितना पराक्रम होता है!

तेज बहनेवाली पथरीली बेतवा में मैंने सुअर को ही तीर की तरह सीधा तैरते हुए देखा है।


10

एक बार जाड़ों में पहाड़ की हँकाई की ठहरी। लगान लग गए। मैं पहाड़ की तली में बैठ गया और शर्मा जी चोटी पर। बीच में अन्य मित्र लगान पर लग गए।

हँकाई होते ही पहले साँभर हड़बड़ाकर निकल भागे। हँकाई में पहले ज्यादातर यही जानवर भाग निकलता है। उसके उपरांत थोड़ी देर तक कोई आहट नहीं मिली। प्रतीक्षा करते-करते मुझको लगा जैसे बहुत विलंब हो गया हो। लगान पर से उठ सका नहीं था; क्योंकि हँकैये अबी तक समीप नहीं आए थे।

हँकैये के समीप आते ही चोटी पर दो फायर हुए। एक के कुछ क्षण बाद दूसरा।

जब हँकैये आ गए, हम सब लोग शर्मा जी के पास पहुँचे। देखें तो एक सुअर उनकी बैठख में ढाई से तीन फीट के अंतर पर पड़ा है। उनसे मालूम हुआ कि भागते सुअर के पहली गोली पेट पर पड़ी थी। वह गोली के लगते ही सीधा शर्मा जी पर विद्युत गति से आया। दूसरी नाल तैयार थी ही; परंतु चूक सकती थी, चूकी नहीं, सुअर के खोपड़े पर पड़ी। गोली के वेग का धक्का उसपर इतना प्रचंड पड़ा कि उसकी गति रुक ही नहीं गई बल्कि वह चित होकर गिरा था।

सुअर में कितनी ताकत होती है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि पाँव में कठोर चोट लग जाने के बाद भी कितना उछल सकता है।

एक दिन झाँसी के निकट ही पाली-पहाड़ी की हँकाई की गई। मालूम था कि सुअर निकलेगा। संदेह था, शायद तेंदुआ भी निकले। तेंदुआ तो नहीं निकला, सुअर निकले।

जिस शिकारी के पास से एक सुअर निकला, उसको शिकार का अनुभव कम था। गोली चलाई। सुअर के पैर में सख्त चोट लगी; परंतु वह काफी उछला और आक्रमण करने का विकट प्रयास किया। असमर्थ हो चुका था, इसलिए वह कुछ नहीं कर पाया।

सुअर बिना घायल हुए बी घुड़की-धमकी देने की प्रवृत्ति रखता है। शिकार के बिलकुल प्रारंभिक जीवन में एक बार मैं एक छोटे से पेड़ की आड़ लेकर बैठ गया। प्रातःकाल के थोड़ी देर बाद के बड़ी खोंसवाला सुअर सामने आया। राइफल मैं एक मित्र की माँग लाया था। बड़े बोर की राइफल थी। पहले कभी न चलाई थी; परंतु चला जा सकता था। सुअर ने मुझे देख लिया, खड़ा हो गया। एक घुड़की उसने मुझको दी। राइफल मैं सुधार हुए था; परंतु गोली चलाने की साध मन में न उठ सकी। सुअर चला गया।

सुअर चालाक भी काफी होता है। सुअर की ‘सूध’ मशहूर है; परंतु कुछ लोगों के इस भ्रम के लिए कोई आधार नहीं कि वह मुड़ता नहीं है। यह सच है कि वह कभी-कभी तीर की तरह सीधा दौड़ता है; परंतु यह सच नहीं है कि उसको मुड़ पड़ने में कोई अड़चन होती है। यही बात उसकी सिधाई के बारे में कहा जा सकता है। वह सीधा-वीधा नहीं होता।

सोते हुए सुअर के पास किसी के यकायक पहुँच जाने पर वह चौंक पड़ता है; परंतु ऐसा नहीं कि वह सदा भाग खड़ा होता है। कभी-कभी वह चुपकी भी साध लेता है। सोचता होगा, बला टल जाए तो आरमा से सो जाऊँ।

एक बार मैंने एक झाड़ी में कुछ सुअर पड़े हुए देखे। एक बड़े सुअर पर ताककर गोली चलाई; परंतु निशाना खाली गया। सुअर एक किनारे से भाग गए। मैं झाड़ी में घुसा। अनुमान किया कि झाड़ी खाली होगी। देखा तो बिलकुल पैरों के पास से एक सुअर निकल भागा। खैर हुई कि उसने मेरी टाँगों को अपने सपाटे में नहीं भरा। बंदूक चलाने पर मैं तुरंत झाड़ी में घुस पड़ा था। इस सुअर को निकल भागने की सुविधा नहीं मिली, इसलिए छिपे रहने की चालाकी खेल गया।

सुअर को सूँघने की शक्ति प्रकृति ने बहुत मात्रा में दी है। जब वह सचेत होकर अपनी नाक का प्रयोग करता है तब शायद सूँगने की शक्ति में साँभर ही उसकी बराबरी कर सकता है। विंध्यखंड में लोग उसे ‘सगुनिया जानवर’ कहते हैं अर्थात् वह शकुन का विचार करके चलता है, इसलिए सहज ही शिकारी के हाथ नहीं पड़ता। वायु यदि सुअर की नाक के अनुकूल हो तो वह बड़ी दूर से सूँघ लेता है और गली काटकर निकल जाता है। उसकी नाक ही उसके शकुन लेने की शक्ति है। सुअर के गली से जरा ऊँचाई पर शिकारी बैठा हो तो सुअर शकुन-वकुन कुछ नहीं ले पाता। वायु ऊपर से निकल जाती है और सुअर को अपनी नाक से कोई सहायता नहीं मिल पाती।

परंतु जब वह झरबेरी के बेर खाने पर चिपट जाता है। तब उसकी एकाग्रता सूँघने और सुनने की शक्तियों को मानो कुंठित कर देती है। बेर के दिनों के शिकार को ‘बिरोरी’कहते हैं। सुअर बेरों को कड़कड़ाकर खाता है। रात के सुनसान में एक फर्लांग तक से सुनाई पड़ता जाता है। जब बिरोरी का शिकार खेलनेवाला शिकारी धीरे-धीरे एक-एक डग को नापता हुआ बेर कड़कड़ाने वाले सुअर के पास जाता है, तब अत्यधिक सावधानी के साथ काम लेना पड़ता है। सुअर की कड़कड़ाहट के शब्द पर ही शिकारी को अपने हर एक कदम को सँभालना पड़ता है। गोली चलान का अवसर तब मिलता है जब शिकारी सुअर से आठ-दस कदम के फासले पर रह जाता है। परंतु उसके शब्द पर ही बंदूक नहीं चलाई जा सकती। बंदूक की गोली और सुअर के बीच में झाड़-झंखाड़ की टहनियाँ होती हैं। या तो गोली इन टहनियों से रिपटकर चली जाती है या सुअर ‘हुर्र हुख’करके ऊपर आता है। भाग्य अच्छा हुआ तो भाग भी जाता है। परंतु यदि केवल घायल ही हुआ तो फिर शिकारी के प्राणों पर आ बनने की पूरी संभावना है। इसलिए शिकारी को एक ओट से दूसरी में जाने का और सुअर को पछियाने का काफी समय तक प्रयत्न करना पड़ता है। जहाँ सुअर एक झरबेरी से दूसरे की ओर आता हुआ शिकारी को दिखलाई पडा कि बस!

इसके संकट से शिकारी को जितनी सनसनी मिलती है उतनी शायद ही किसी और प्रकार से मिलती हो। न कोई मचान, न कोई आड़-ओट; अपनी अटल एकाग्रता तथा हाथ में सधी ही तैयार बंदूक और शिकारी प्रत्येक प्रकार की परिस्थिति के प्रस्तुत। यहाँ तक कि आक्रमण के लिए दपटते हुए सुअर को छलाँग मारकर कूद-फाँद जाने के लिए तैयार। जो यह न कर सके वह बिरोरी को शिकार न खेले। उसके लिए तो मचान या गड्ढा ही ठीक है।

मैंने बिरोरी का शिकार खेला है; परंतु अधिक नहीं।

कई बार सुअर के ठीक पास पहुँच गया; परंतु सुअर ने देख लिया और भाग गया। मैं बंदूक नहीं चला पाया।

एक बार ही सफल हुआ। सुअर पर छह या सात कदम के फासले पर गोली चलाई थी। राइफल की गोली थी, इसलिए सुअर तुरंत समाप्त हो गया। मुझको उजेले अँधेरे दोनों में राइफल पर बहुत भरोसा रहा है। अँधेरे में ही एक बार एक सुअर को राइफल से पचास या पचपन कदम की दूरी से मारा था।

एक बार पहाड़ की हँकाई कराई गई। कई मित्र साथ थे। उनमें से कुछ तो बहुत दूर-दूर और बड़े-बड़े शिकार खेल चुके थे। बड़े लोग, रुपये-पैसे, समय और गोली-बारूद की कोई कमी नहीं। चिड़ियों से लेकर अरने भैंसे, गैंडे, नाहर और हाथियों का शिकार तरह-तरह के बड़े जंगलों में खेल चुके थे। उस दिन की पहाड़ की हँकाई का शिकार मुझको उन्हीं मित्रों की कृपा से प्राप्त हुआ था। उन्होंने सबसे अच्छा स्थान मुझको बैठने को दिया। हँकाई शुरू हो गई।

एक बड़ा चीतल मेरे हाथ लगा। थोड़ी ही देर में एक करारा सुअर आया। उस पर मैंने 12 बोरे बंदूक की गोली चलाई। गोली पक्की (SOLID) थी। भागते हुए सुअर के पेट में लगी। उसने मुझको देखा नहीं, इसलिए घायल होकर भागा और जिधर मैं बैठा था, उसके पीछे के जंगल में चला गया।

इस हँकाई की समाप्ति पर जंगल के उस भाग की हँकाई करवाई गई, जो मेरी पीठ पर पड़ता था और जिसमें घायल सुअर चला गया था।

इस हँकाई की समाप्ति पर जंगल के उस भाग की हँकाई करवाई गई, जो मेरी पीठ पर पड़ता था और जिसमें घायल सुअर चला गया था।

हम लोगों ने आसन बदला। मैं एक मचान पर चढ़ गया; परंतु यह मचान लगान के पाँत में उलटी बैठती थी। मेरे मित्र मुझसे नीचे की तरफ आमने-सामने बैठते थे, ऐसे कि गोली चलती तो एक-दूसरे पर पड़ने की संभावना थी। मित्र ने मुझको सीटी द्वारा सचेत किया। मैं मचान से उतरकर लगान की पाँत में जा लगा।

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परंतु, मचान पर से उतरने के पहले मैंने दुनाली खाली कर ली और राइफल की नाल में से कारतूस निकाल मैगजीन में पहुँचाकर ताला डाल दिया। जहाँ मैं खड़ा था वहां एक पेड़ की आड़ थी। पेड़ से राइफल टिका दी और दुनाली हाथ में ले ली। दुनाली खाली थी।

हँकाई में वह घायल सुअर निकला। मेरे मित्र के पास आया। उन्होंने उस पर राइफल चलाई। उनकी राइफल चलने पर सुअर जरा टेढ़ा भागा, तब उसका घाव मुझको दिखलाई पड़ा। मैं समझा, उनकी राइफल की गोली से घायल हुआ है। उस समय मुझको यह नहीं मालूम हुआ कि सुअर मेरा ही घायल किया हुआ है। सुअर जंगल में विलीन हो गया। थोड़े समय उपरांत मेरे सामने, जरा ऊपर की ओर हटकर, जहाँ से हँकाई आ रही थी, सुअर का एक झुंड आया। इसको ‘दार’ कहते हैं। सुअर जब निकट आ जाए, मैंने बंदूक को कंधे से जोड़कर निशाना साधा। घोड़े ने ‘खट्ट’ का शब्द किया। कारतूस नाल में था ही नहीं, सुअर का बिगड़ ही क्या सकता था! सुअर लौट गए।

मैंने इधर-उधर आँखें फेरीं किसी ने मेरी मूर्खता को देख तो नहीं लिया है। तुरंत दोनों नालों में कारतूस डाले और घोड़े चढ़ाकर तैयार हो गया। लौटे उनकी खरभर सुन ली और दो-एक को झाँक भी लिया। सुअरों ने मुझको देख लिया था, इसलिए वे वहीं के वहीं फिर लौट पड़े और बेतहाशा भागकर, हाँकेवालों में हकर निकल गए और विलीन हो गए। हाँकेवाले पास आने लगे; परंतु वे जरा दूर थे, मुझको दिखलाई नहीं पड़े। मैंने सोचा, घोड़ों को चढ़ाए रखना व्यर्थ है। घोडों को उतारने के लिए बंदूक हाथ में कर ली और उत्सुकतावश लौटे हुए सुअरों की दिशा में देखने लगा।

उँगलियाँ बाईं नाल की लिबलिबी को दबाने के लिए पहुँच गईं; परंतु अँगूठा पहुँचा दाईं नालवाले घोड़े पर। दाईं नालवाले घोड़े को साधने के लिए अँगूठे से दबाया, जिसमें वह यकायक गिरकर कील को ठोकर न दे; परंतु उँगलियाँ थीं बाईं नाल के घोड़े ककी लिबलिबी पर और अँगूठा उसपर था नहीं। धाँय से बाईं नाल चल गई। दाईं नाल का घोड़ा गिरा नहीं, क्योंकि उसकी लिबलिबी पर दाब नहीं था; पर घोड़े का नुकीला सिरा अँगूठे की जड़ में था। बाईं नाल के चलते ही जोर धक्का लगा। कंधे पर तो बंदूक थी नहीं, जो धक्के को झेलता है। दाईं नाल के घोड़े का सिरा अँगूठे की जड़ में धँस गया।

मैंने झटपट, सावधानी के साथ, दाईं नाल के घोड़े को साधकर बिठला लिया और बंदूक पेड़ से टिका दी। अँगूठे की जड़ से खून की धार बह निकली। रूमाल से पोंछ-पाँछकर मन में मनाने लगा, कोई हँकाईवाला या लगानवाला न आ जाय, नहीं तो मूर्खता अपने पूरे रूप में प्रकट हो जाएगी। घाव पर रूमाल बाँधने की हिम्मत पड़ नहीं रही थी। मूर्खता जो पकड़ी जाती। रूमाल का वह बंधन सारी कहानी कह डालता। मैंने खूब दबा-दबाकर रक्त निकाल दिया और पोंछ-पाँछ डाला।

जब हँकाईवाले आ गए और लगानवालों को अपने स्थान छोड़ने की आजादी मिली तो मैं उन मित्र के पास पहुँचा, जिन्होंने सुअर पर राइफल दागी थी।

अपने घायल हाथ की ओर से उनका ध्यान उचटाने के लिए कहा, ‘सुअर घायल हो गया है, जरा उसका चिह्न देखिए।’

वे बोले, ‘हाँ, घायल तो अवश्य हो गया है। पता लगाता हूँ।’

वे झुके-झुके घायल सुअर के चिह्न को देखने लगा। तब तक मैंने अपना घाव पूरी तरह सुखा लिया। मूर्खता ढक गई।

घायल सुअर का चिह्न लेते-लेते मित्र ने एक पत्थर के पास देखा तो राइफल की गोली के टुकड़े पड़े हुए हैं। मैं भी उनके पास पहुँच गया। मैंने बी वे टुकड़े देखे।

वे बोले, ‘भाई, मेरी गोली तो पत्थर पड़ी है, सुअर पर नहीं पड़ी है। वह आपका घायल किया हुआ सुअर था।’

मैंने सोचा, मैं भी अपनी मूर्खता प्रकट कर दूँ। बंदूक चल पड़ने की सविस्तार कहानी सुनाकर कहा, ‘नाल जरा ऊँची थी, नहीं तो गोली किसी हँकाईवाले पर पड़ती।’

वे हँसकर बोले, ‘यार मेरे, चुप भी रहो। न किसी से मेरी कहना, न अपनी।’

हम दोनों ने अपनी झेंप पर परदा डाल लिया।

मेरे एक मित्र (अब इस दुनिया में नहीं हैं) शिकार में काफी रुचि रखते थे अर्थात् जितनी का उनके खाने से संबंध था। स्थूल इतने कि बिना हाँफ के दस कदम भी चलना एक आफत। एक दिन बड़ा दंभ किया। बोले, ‘मैं चलती मोटर में से जानवर पर बंदूक चला देता हूँ।’

मैंने सिधाई के साथ पूछा, ‘और वह जानवर को लग भी जाती है?’

उन्होंने जरा हेकड़ी के साथ उत्तर दिया, ‘नहीं तो क्या कोरे पटाखे फोड़ता हूँ!’

मैंने उस समय बात नहीं बढ़ाई, परंतु उनकी परीक्षा लेने का निश्चय कर लिया।

एक दिन अवसर मिल गया।

वे ताँगे पर बैठकर शिकार के लिए जाने को ही थे कि मैं अकस्मात् उनके घर पहुँच गया। उन्होंने मुझे साथ चलने के लिए कहा। मैं तुरंत राजी हो गया, चाहता ही था। बंदूक ले आया और साथ हो लिया।

कुछ ही मील जाने पर उनको हिरनों का एक झुंड मिल गया। गोली चलाने के लिए उन्होंने मुझसे प्रस्ताव किया। मैंने तो न चलाने का निश्चय ही कर लिया था। नाहीं कर दी।

‘आप ही चलाइए। ताँगे से ही चलाइए। हिरन पास ही तो हैं।’

‘अजी नहीं! ताँगा हिल रहा है। निशाना चूक जाएगा।’

‘पर मोटर से तो कम हिल रहा है।’

‘आप मजाक समझते हैं; चलाता, मगर घोड़ा भड़क जाएगा।’

‘तब उतर जाइए। ओट लेकर चलाइए।’

पेड़ों की आड़ के आने पर ताँगा रोक लिया गया। वे किसी तरह ताँगे से उतरे।

धोती पहने हुए थे। ढूँकते-ढाँकते वे हिरनों की ओर बढ़े। दस-पंद्रह कदम भी न गए होंगे कि चौकन्ने हिरनों ने उनको देख लिया। हिरन भागे।

वे भी हिरनों के पीछे भागने का प्रयत्न करने लगे। उधर उन्होंने गोली चलाई, इधर उनकी धोती अधखुली हो गई। हिरनों के पास गोली की हवा तक न फटकी। वे धोती सँभालते और हँसते हुए ताँगे की ओर आए। मारे हँसी के मेरे पेट में बल पड़ रहे थे।

मैंने किसी तरह हँसी को रोककर उनसे कहा, ‘यदि सुअर होता और जरा सा घायल हो जाता तो आप क्या करते?’

वे जबरदस्ती हँसी को दबाते हुए बोले, ‘यदि सुअर होता और जरा सा घायल हो जाता तो आप क्या करते?’

वे जबरदस्ती हँसी को दबाते हुए बोले, ‘क्या करते! सुअर क्या कर लेता?’

मुझको फिर हँसी आ गई। मैंने कहा, ‘क्या कर लेता, सो तो मैं ठीक-ठाक नहीं बतला सकता, परंतु इतना कह सकता हूँ कि आप धोती सँभालने की फुरसत न पाते।’

इन पर हम दोनों हँसते रहे; लेकिन उस दिन के बाद हम लोगों का साथ शिकार में न हुआ।

दो वकील मित्रों तो शिकार में मेरे साथ घूमने की लालसा हुई। मैं इनकार न कर सका। परंतु वकील मित्र कमजोर न थे। तेरह मील चलने के बाद मेरी साइकिल के चक्के में एक बेतुका छेद हो गया। तब दोनों गपशप करते हुए आठ मील पैदल गए। बेतवा किनारे ‘घुसगवाँ’ नाम का एक गाँव है। संध्या होने के पहले ही पहुँच गए। गाँववालों की सहायता से तुरंत बंदूकें लिए जंगल की ओर चल दिए।

तीन-चार सुअर मिले। मेरे मित्र की सीध में वे बैठ नहीं रहे थे, इसलिए मैंने ही बंदूक चला दी। एक गिर गया। रास्ते की रिस वकील मित्र ने मरे हुए सुअर पर निकाली। वे आमोदप्रिय भी थे, इसलिए भी उन्होंने एक दिल्लगी की।

मरे हुए सुअर पर उन्होंने धाड़ से गोली छोड़ी। चूकने की कोई बात ही न थी। गोली लगने पर हँसते हुए बोले, ‘बस जी, मैंने इसको मारा है। मेरे शिकार पर तुमने बाद में बंदूक चला दी।’

मैंने कहा, ‘बिलकुल सही, मुकदमों की सचाइयों से भी ज्यादा सच।’

फिर हम लोग बैलगाड़ी से उसी रात चिरगाँव रेलवे स्टेशन पर आए और सवेरे झाँसी पहुँचे। मित्र बहुत थक गए थे; परंतु उनकी वन-भ्रमण की कामना कम नहीं हुई। वे अनेक बार मेरे साथ जंगलों और पहाड़ों में घूमे हैं।

दूसरे साहब का अनुभव बिलकुल विपरीत रहा।

एक गाँव में अदालती काम से दूसरे वकील मित्र मेरे साथ गए। गरमियों के दिन थे। दस बजते-बजते गाँव पहुँचे। लू चलने लगी। बारह बजे तक हम लोग काम से निवृत्त हो गए। गाँव से मील-डेढ़ मील पर जंगल था। मैंने उनसे मटरगश्त के लिए प्रस्ताव किया। लू चल रही थी, इसलिए उनके उत्साह में कुछ ढिलाई आ गई थी; लेकिन बिलकुल बुझा न था। साथ चल दिए।

मील-डेढ़ मील चलने के बाद ही वकील मित्र काफी परेशान हो उठे। बोले, ‘अभी तक तो कुछ दिखा नहीं। यों मारे-मारे फिरने से क्या फायदा?’

मैंने कहा, ‘शिकार मिले या न मिले, पर चलने-फिरने के फायदे से तो तुम इनकार नहीं कर सकते। लौटकर जब चलोगे, बेभाव भूख लगेगी। रात को बेहिसाब सोओगे।’

जंगल छेलवे और हींस-मकोय का था। ऐसी जगह सुअरों के पड़े मिलने की आशा थी। इसलिए लगभग एक मील और भटके। मेरे मित्र को प्यास लग रही थी। ढुकाई के शिकार में भी दो कठिनाइयों का अनुभव कर रहा था। अपने को सँभालना और उन मित्र को दबे-छिपे ले चलना। इसलिए हम लोग लौट पड़े।

मित्र का मुँह सूख रहा था और उनसे चलते नहीं बन पा रहा था। गाँव पहुँचते ही मैंने देखा, उनके पैरों में बड़े-बड़े फफोले पड़ आए हैं। उनका कष्ट देखकर मुझको खेद हुआ और क्षोभ भी। एक प्रश्न मन में उठा क्यों नहीं स्कूलों और कॉलेजों में ही लड़कों को पक्का और कट्टर बना दिया जाता?

वकील मित्र ने कष्ट कम होने पर कहा, ‘भाड़ में जाय तुम्हारा शिकार! आगे के लिए कसम खाई।’

किसी-किसी ग्रामीण में सुअर के प्रति इतनी हिंसा होती है कि वह सबकुछ कर डालने पर उतारू हो जाता है। तब इतना निडर हो जाता है कि जान पर खेल जाता है।

भरतपुरा गाँव के पास ही एक लोधी अपने खेतों के बीच की पड़ती पर घर बनाए हुए था। जब देखो तब सुअर कुछ-न-कुछ उत्पाद खेतों में करता रहता था। उसके पास हथियार कोई था नहीं। हिंसा ने उसको एक निश्चय दिया।

लोधी का शरीर बहुत तगड़ा था, परंतु उसके आँख एक ही थी; पर थी काफी तेज।

वह एक दिन संध्या के पहले ही सुअरों की राह पर एक ओट में जा बैठा। कुल्हाड़ी साथ में थी।

सुअर बहुत धीरे-धीरे आया। आड़ से लगभग सटा हुआ निकला। लोधी ने आव देखा न ताव, जैसे ही सुअर के पीछेवाला भाग उसकी पहुँच के पास हुआ कि उसने पिछले पैर अपने दोनों हाथों से पकड़ लिए और खड़ा हो गया।

सुअर लगा करने ‘हुर्र हुख’। उसने बहुत प्रयत्न लौटकर चोट पहुँचाने का किया, बड़ा बल लोधी के फौलादी शिकंजे से निस्तार पाने के लिए लगाया; परंतु सब व्यर्थ।

लोधी अपनी लगन पर दृढ़तापूर्वक सवार था और सुअर के पैरों को इस प्रकार पकड़े था कि वह किसी तरह भी छुट्टी नहीं पा सका। कुल्हाड़ी करीब थी; परंतु लोधी उसका उपयोग नहीं कर पा रहा था।

गुल-गपाड़ा सुनकर आस-पास के किसान कुल्हाड़ियाँ और लाठियाँ लेकर दौड़े। तब सुअर से उसने छुटकारा पाया।

फिर तो सुअरों से उस लोधी का डर सदा के लिए छूट गया। उसने बड़े-बड़े सुअर लाठियों और कुल्हाड़ियों से मारे। कई बार घायल भी हुआ। सुअर के नाम से ही उसको इतनी चिढ़ थी कि वह उसकी खोज में दिन-रात, जाड़ा-बरसात कुछ नहीं देखता था। यदि उस किसान के पास बंदूक होती तो शायद वह जंगल को सुअरों से सूना कर देता।

उसने बंदूक का लाइसेंस प्राप्त करने की चेष्टा भी की; परंतु उसको लाइसेंस कौन देता! न काफी मालगुजारी देनेवाला जमींदार और न पुलिस का मुखिया; न अँगरेज शिकारियों का खुशामदी या अँगरेज का आबुर्दा।

एकांत जीवन बितानेवाला निडर, निर्भीक किसान। उसने अंत तक अपनी लाठी-कुल्हाड़ी का भरोसा किया और बंदूक की या बंदूक का लाइसेंस देनेवालों की कभी परवाह नहीं की।

सुअर के शिकार के लिए जो ‘गड्ढा’ बनाया जाय वह काँटेदार तो कम से कम होना ही चाहिए; परंतु मेरे एक साथी हेकड़ी के साथ एक रात कठजामुन के झुरमुट में जा बैठे। कठजामुन में पत्तों की भरमार थी। मोटी डालें बहुत कम थीं। उसके साथ दुर्जन कुम्हार बैठा था, नहीं तो असली बात का पता ही न चलता।

सुअर आया। उन्होंने बंदूक चलाई। सुअर घायल हो गया। उसने समझ लिया कि गोली कहाँ से आई। झुरमुज की ओर झपटा।

शिकारी और दुर्जन भागे। दुर्जन ने दूर भागकर दम ली। शिकारी लगे काटने चक्कर कठजामुन के झाड़ के। उनके साथ सुअर भी चक्कर काता रहा। सुअर बहुत घायल हो गया था, इसलिए शिकारी बच गए; नहीं तो वह अपनी खीसों से उनकी उधेड़बुन कर डालता। चाँदनी रात थी, दुर्जन सब देख रहा था।

सवेरे जब मैंने उनसे रात का वृत्त पूछा, क्योंकि एक-दूसरे का अनुभव पूछने में प्रमोद होता है, तो उन्होंने कहा, ‘सुअर घायल होकर भाग गया।’ दुर्जन हँस पड़ा। उसकी हँसी शिकारी को बहुत खली। वे अपनी झेंप को ढाँकना चाहते थे; परंतु दुर्जन की हँसी उघाड़े दे रही थी। मेरे कुरेदकर प्रश्न करने पर दुर्जन ने कहा, ‘सुअर भग गओ और जे कठजामुन को परदच्छना (प्रदक्षिणा) देत रये।’

फिर उसने सारा हाल विस्तार के साथ सुनाया।


11

साँभर और नीलगाय इसके नर को ‘रोज’ और मादा को ‘गुरायँ’ कहते हैं। खेती के ये काफी बड़े शत्रु हैं। बड़े शरीर और बड़े पेटवाले होने के कारण ये कृषि का काफी विध्वंस करते हैं।

जब गाँव के ढोर चरते-चरते जंग में पहुँच जाते हैं तब रोज-गुरायँ तो इनके साथ हिल-मिलकर चरने लगते हैं। रोज-गुरायँ मनुष्य से, अन्य जानवरों की अपेक्षा, कम छड़कता है। वह जंगल के भीतर नहीं रहता। प्रायः जंगल के प्रवेश के निकट ही मिल जाता है। इनके झुंड के झुंड होते हैं। मैंने पचास-पचास तक के झुंड देखे हैं। इनका नर जब पूरा बढ़ जाता है तब उसका रंग नीला हो जाता है। गले में घंटियाँ सी और पूँछ छोटी। सींग भी बड़े नहीं होते। यह बड़ा मजबूत होता है और दौड़ाने में बहुत तेज। कोई-कोई इसके बच्चों को पालते हैं और सवारी का काम लेते हैं – गाड़ी में जोतकर।

परंतु नाले और खाई-खड्डों को देखते ही उसको अपने पुरखों की याद आ जाती है और फिर यह नाथ, डोर, रस्सी हाँकने वाले और गाड़ी सवारी किसी की परवाह नहीं करता। बेभाव छलाँग मारता है। चाहे गाड़ी में बैठनेवाला बचे या मरे, इसकी कोई चिंता इसको नहीं रहती।

झाँसी के एक गुसाईंजी ने रोज के बच्चों की जोड़ी पाली और बड़े होने पर उनको गाड़ी में जोता। जब तक वे सीधे रास्तों पर चलाए गए तब तक उन्होंने अपनी तेज दौड़ से सबको संतोष दिया; परंतु एक दिन जब देहाती मार्ग में एक नाला और बगल में खड्ड मिला तब उनको अपनेपन की याद आ गई। विकट छलाँग भरी। गाड़ी लौट गई। गाड़ीवान घायल हो गया और गुसाईंजी को प्राणों से ही हाथ धोने पड़े।

जब तक इसके जोड़, सिर या गरदन पर गोली नहीं पड़ती तब तक घायल होने पर भी यह हाथ नहीं आता।

इस पशु में एक विलक्षणता है। यह मौका पाकर दिन में भी खेतों में घुस आता है और रात तो इन सब जानवरों की है ही।

झुंड में नर होते हुए भी अग्रणी साधारण तौर पर मादा होती है। बहुत सावधान और बड़ी तेज।

रोज-गुरायँ के चमड़े को गाँववाले परहे बनाने के काम में लाते हैं।

साँभर खुरीवाले जंगली जानवरों में सबसे अधिक सावधान है। जरा सा खुटका पाते ही ठौर छोड़कर भागता है। यह प्रायः दस-दस पंद्रह-पद्रह के झुंड में रहता है; परंतु नर अकेला भी पाया जाता है। यह जंगल के अत्यंत बीहड़ और छिपे हुए स्थानों को ढूँढ़ता है। अधिकतर लंबी घासवाले नालों और घनी झोरों में रहता है।

सिर और गरदन को खुजलाने के लिए इसको जहाँ सलैया के पेड़ मिल जाते हैं, वहाँ अधिक ठहरता है। सलैया की गोंद की सुगंधि इसके लंब फंसोंवाले सींगों की रगड़ से आस पास के वातावरण को महका देती है।

साँभर खेतों पर आधी राते के पहले बहुत कम आता है। जब आता है, बहुत धीरे-धीरे बहुत चुपके-चुपके। यह बड़ी-बड़ी बिरवाइयों को कूद-फाँद जाता है। शरीर के लंबे बालों के कारण, सुअर की तरह, इसको भी काँटों की परवाह नहीं होती। प्रायः कँटीली बिरवाइयों में इसके टूटे हुए बाल चिपके मिलते हैं। इसके खुर लंबे होते हैं और पैर बहुत लचीले। सहज ही पहाड़ों पर चढ़ जाता है।

इसका अगला धड़ बड़ा, पिछला हलका, पूँछ छोटी और आवाज रेंक सी तीखी, मोटी और ठपदार होती है। कान घंटे की तरह गोल और बड़े। ये इतने बड़े तेज होते हैं कि ढुकाई का शिकार तो इनका बहुत ही श्रमसाध्य और कठिन है।

साँभर में सूँघने की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह तीस-चालीस गज से असाधारण गंध को पाकर तुरंत मुरककर चला जाता है।

होली की छुट्टियों में भरतपुरा गया। दुर्जन ने संध्या के पहले ही नदी के एक टापू पर एक बड़े साँभर के चिह्नों का पता दिया। कठजामुन के काफी झुरमुट उन चिह्नों के पास थे। मैं दुर्जन के पास एक झुरमुट में सूर्यास्त के पहले जा बैठा। दिन में भरतपुरावाले मेरे मित्र ने जंगल में केसर-चंदन और इत्र-पान से होली मनाई थी। खस के इत्र का उनको बहुत शौक था। उन्होंने मेरे कपड़ों में पोत दिया। उन्हीं कपड़ों को पहने मैं कठजामुन के झुरमुट में दुर्जन के साथ बैठा था।

लगभग आठ बजे साँभर आहट लेता हुआ धीरे-धीरे मेरे स्थान की ओर आया। जब पच्चीस-तीस गज की दूरी पर आ गया होगा, उसने नथने फुफकारे। खस की गंध ने उसको अपने शत्रु की उपस्थिति बतला दी। उसने जोर के साथ अपनी बोली में आश्चर्य या भय प्रकट किया और भाग गया।

दुर्जन उस समय पैर लंबे किए बैठा-बैठा सो रहा था। जैसे ही साँभर ने आवाज लगाई, दुर्जन चौंक पड़ा। उसके पैर उठ गए और मेरी कनपटी से जा टकराए। मुझको बहुत हँसी आई। मैंने कहा, ‘दुर्जन, तुम्हारी नींद के खुर्राट ने साँभर को भगा दिया।’

दुर्जन बहुत सहमा; परंतु थोड़ी ही देर में बोला, ‘बाबू साब, काए खों लच्छिन लगाउत! तुमार अतर ने भगाओ साँभर खो।’

यह अगोट पर या हँकाई में सहज ही हाथ चढ़ जाता है। इसकी खाल पकाई जाने पर बहुत मुलायम और लोचदार होती है। जूते, टाँगों के टोकरे, दस्ताने, बास्कट इत्यादि बनाए जाते हैं। परंतु पानी में इसका चमड़ा लीचड़ हो जाता है। साँभर कठोर ठंड में भी रात को डुबकियाँ लगाता है; ठंडे कीचड़ में लोट लगाता है। यह जंगल से निकलकर नदी की पूरी धार को पार करके खेतों में पहुँच जात है। लौट आता है और जानवरों से दो घंटे पहले। चार बजे के बाद फिर यह खेतों में नहीं ठहरता।

जब सरूर पर होता है, तब एक नर दूसरे से बेतरह सींग खटखटाता है। यह लड़ाई मादा के पीछे या झुंड का अगुआ बनने की प्रतिद्वंदिवता में होती है। कभी कभी इतनी खटाखट होती है कि आस पास का जंगल गूँज उठता है।

साँभर पानी पीने के लिए सुनसान जंगल में दिन में ही बाहर निकल पड़ता है। वैसे इनका पानी पीने का समय संध्या के उपरांत जररा रात बीते है।

एक दिन गरमियों में मैं नदी के किनारे एक-दूसरे गड्ढे में दो-तीन घंटे दिन जा बैठा। ‘गढ़ कुंडार’ पूरा नहीं हो पाया था। झाँसी में बहुत कम समय मिलता था। छुट्टियों में शिकार के लिए जंगल की राह पकड़ लेता था; परंतु लिखने की सामाग्री साथ ले जाता था। उस दिन गड्ढे में पड़ा ‘गढ़ कुंडार’ लिख रहा था; क्योंकि सूर्यास्त के लिए काफी समय था। साथ में करामत था। मैंने उसको आहट लेते रहने के लिए कह दिया था।

सूर्यास्त होने को आ रहा था। मैं अपनी धुन में मस्त था। करामत आहट लेते-लेते और जानवरों की बाट जोहते-जोहते अलसा उठा था कि साँभरों का एक झुंड गड्ढे से पद्रंह-बीस डग की दूरी पर आया। करामत ने मुझको संकेत किया। मैंने उनको देखा। वे सब एक ही स्थान पर पानी पीने के लिए परस्पर कुश्तम-कुश्ता कर रहे थे। करामत ने बंदूक चलाने के लिए इशारा किया। साँभर मुझको इतने मोहक लग रहे थे कि मैं बंदूक न चला सका। इनकार कर दिया। जब साँभर पानी पीकर वहाँ से धीरे-धीरे चल दिए तब मैं अपनी निष्क्रियता पर थोड़ा पछताया।

साँभर जब जंगल के सुनसान को चीरता हुआ बोलता है तब जंगल की महिमा पर मुहर सी लगती है।

साँभर से बारहसिंगा छोटा होता है। उसके सींग साँभर के सींगों से भी अधिक सुंदर होते हैं। सिर पर सींगों का झाड़-सा जान पड़ता है। मंडला जिले के कान्हाकिसली नामक जंगल का मैंने थोड़ा सा भ्रमण किया है। कान्हाकिसली जंगल में शिकार खेलने की अनुमति नहीं मिलती। मुझको इस जंगल में शिकार नहीं खेलना था, खेल ही नहीं सकता था। परंतु उसकी बड़ाई बहुत सुनी थी, इसलिए कुछ मित्रों के साथ भ्रमण के लिए गया था।

हम लोगों के पहुँचने के पूर्व हॉलैंड की एक कंपनी जंगली जानवरों का चित्रपट बनाने के लिए अपनी मशीनों के साथ काफी समय तक ठहरी रही थी।

हम लोगों ने साज, सरही और सागौन के विशाल समूह तो उस जंगल में देखे ही, विंध्याचल-सतपुड़ा की विकट सम-विषम ऊँचाइयों को देखकर श्रद्धा में डूब जाना पड़ा था। और जिस मार्ग पर जाएँ उसी पर शेरों, जंगली भैसों इत्यादि के पदचिह्न दिखलाई पड़े।

उस जंगल में एक पथरीली ऊँचाई का नाम है श्रवण पहाड़ी। वही श्रवण, जिसकी कथा पुराण में प्रसिद्ध है, जिसको दशरथ ने भ्रमवश अपने बाण से वेध डाला था और इस अनजाने किए हुए पाप के बदले में भयंकर शाप पाया था। उस श्रवण पहाड़ी के नीचे एक पुराना तालाब था। लोगों ने एक लोक परंपरा बतलाई – उसी श्रवण की यह पहाड़ी है और इसी तालाब के किनारे राजा दशरथ ने अपने तीर से श्रवण का प्राण ले डाला था।

हम लोग तालाब के बंध पर चढ़े। उसमें पानी बिलकुल न था; पर पेडों की छाया में बारहसिंगों का बड़ा भारी झुंड बैठा था। उस जंगल में बंदूक न चलने के कारण और मनुष्यों के अल्प विचरण के कारण जानवर निर्बाध रहते तथा घूमते हैं। हम लोग तालाब के बंध पर कई क्षण खड़े रहे, परंतु बारहसिंगे विचलित नहीं हुए। हम लोगों ने आपस में बातचीत शुरू की तब वे दो-दो, चार-चार करके खड़े हुए। मैंने उनको गिनने की चेष्टा की- एक सौ अठ्ठारह से अधिक थे।

अब यह जानवर अन्य जंगलों में बहुत कम हो गया है।

होशंगाबदा के बाहर इटारसी सड़क पर एक पहाड़ी है। इसकी भीमकाय चट्टानों के भीतरी भाग पर कुछ प्राचीन चित्र हैं। उनमें एक जाति के जानवर का भी अंकन है, जो बारहसिंगा से कहीं बड़ा, परंतु मिलता-जुलता है। अब यह जानवर भारतवर्ष भर में कहीं भी नहीं है।

बारहसिंगा जंगल का सौंदर्य है। इसको बिलकुल न मारा जाए तो शायद कोई हानि नहीं; क्योंकि यह खेती के पासवाले जंगलों में नहीं पाया जाता।

दूसरे जानवर जो खेती को कम नुकसान पहुँचाते सुने गए हैं। चौसिंगा वन बेड़ और कोटरी है।

चौसिंगा कुछ बड़ा होता है और कोटरी एवं वन भेड़ लगभग एक ही डील-डौल के होते हैं। चौसिंगा के माथे के पिछले तथा अगले भाग पर दो-दो सींग होते हैं। पिछले भाग पर जरा लंबे और अगले भाग पर कुछ छोटे। रंग गहरा खरा। वन भेड़ इससे मिलती-जुलती है। इन दोनों की रक्षा इनकी फुरती और सावधानी में है। चिंकारे की तरह ये भी जरा से खुटके पर कूदते-फाँदते नजर आते हैं। जरा चूके कि गए।

कोटरी विलक्षण प्रकार का दबा हुआ कूका लगाती है। विंध्यखंड के जंगलों में काफी संख्या में पाई जाती है। जोड़ी के सिवाय इसके झुंड बहुत कम देखे गए हैं। घने-बेगरे दोनों प्रकार के जंगलों में पाई जाती है। कहते हैं, यह शेर के आगे-आगे चलती है। असल बात यह है कि शेर के निकल पड़ने पर जंगल में भगदड़ मच जाती है। जब कोटरी भयभीत होकर बोलती है तब लोग समझते हैं कि वह जंगल को शेर के आगमन की सूचना दे रही है।


12

एक समय था जब हिंदुस्थान में सिंह – गरदन पर बाल, अयालवाला – पाया जाता था। काठियावाड़ में सुनते हैं कि अब भी एक प्रकार का सिंह पाया जाता है। नाहर या शेर ने, जिसके बदन पर धारें होती हैं, अपना वंश बढ़ाकर इसको जंगलों से निकला बाहर कर दिया है।

ग्वालियर नरेश महाराज माधवराव ने अफ्रीका की नस्ल के कुछ सिंह शावक शिवपुरी के पास के जंगलों में छुड़वाए थे। वे बढ़े और उनकी कुछ संतानें शिवपुरी के आस पास के जंगलों में अभी भी हैं।

सिंह का अगला भाग भारी होता है। मुँह चौड़ा-चकला और खोपड़ा बड़ा। गरदन पर अयाल होने के कारण यह विशाल और भयानक प्रतीत होता है; परंतु वास्तव में धारीदार नाहर के बराबर बलवान, प्रचंड या पाजी नहीं होता। इसका शिकार धारीदार नाहर के जैसा ही खेला जाता है; परंतु मुझको एक भी नहीं मिला, इसलिए मेरा निजी अनुभव इसके विषय में बिलकुल नहीं है।

ग्वालियर राज्य के जंगल झाँसी जिले से लगे हुए हैं, इसलिए जानवरों का वहाँ से आना-जाना यहाँ बना रहता है। लगभग बाईस साल हुए, जब ग्वालियर के जंगलों से एक मनुष्यभक्षी सिंह झाँसी के जंगलों में आ धमका पहले तो ललितपुर तहसील के बाँसी नामक ग्राम के आस पास तहलका मचाता रहा। दूर-दूर से कुछ अँगरेज शिकारी उसकी टोह में आए; परंतु वह इतना चालाक था कि किसी की भी अंटी पर न चढ़ा। मैंने उन शिकारियों की असफलता का वर्णन एक अँगरेजी पुस्तक में पढ़ा है। बाँसी से टलकर यह मनुष्यभक्षी सेर बेतवा के किनारे-किनारे ओरछा के जंगल में आया और फिर वहाँ भटकता घूमता मेरे अड्डों के निकट आ गया।

मुझको हर छुट्टी में उन जंगलों में विचरण करने का अभ्यास था, जिनके निकट यह मनुष्यभक्षी आ गया था।

जब मैं छुट्टी में अपने अड्डों पर जाता तो सुनता – वह मनुष्यभक्षी सिंह अमुक गाँव में एक आदमी को उठा ले गया, फलाने गाँव में एक औरत को उठाकर खा गया। हाथ किसी के पड़ता नहीं था, इसलिए जन-परंपरा ने एक प्रेत की सृष्टि की। कहा जाने लगा कि एक जादूगर धोबी मरने के बाद नाना रूप धारण करके मनुष्य-भक्षण करने लगा है। बे-हथियारवाली जनता को विश्वास करने में देर नहीं लगी।

मैं शिकार खेलने प्रायः अपने मित्र के साथ जाया करता था। एक बार अकेला गया। सुना कि मनुष्यभक्षी प्रेत बेतवा नदीवाले गड्ढे के निकट, जिसका उपयोग मैं सदा ही करता था, आ गया है। मैंने सोचा, यदि प्रेत है तो शिकारी किसी भी भूत प्रेत से कम नहीं होता है, इसलिए कोई डर नहीं और यदि मनुष्यभक्षी सिंह है, जैसा कि मुझको विश्वास था कि है, तो देखा जाएगा। रात भर अनिमेष जागने का मुझको अभ्यास था और यह भरोसा था कि जागते हुए में मनुष्यभक्षी पशु – चाहे वह सिंह, नाहर या तेंदुआ हो मुझको सहज ही नहीं दबा पाएगा। सुनता आया कि मनुष्य को परमात्मा ने सारी सृष्टि रचने के उपरांत बनाया था।

मैं साँझ के पहले ही अपने चिर-परिचित गड्ढे में जा बैठा। जब संध्या हो गई, बिस्तरों में टॉर्च को ढूँढ़ा। उसको गाँव में ही भूल आया था और रात निपट अँधेरी थी। टॉर्च के लिए गाँव को लौटकर जाने और गड्ढे में वापस आने का अर्थ था चार मील, और यदि मार्ग में ही किसी झाड़ी की बगल से मनुष्यभक्षी सिंह ऊपर आ कूदा तो सारा शिकार बेहद किरकिरा हुआ।

बिस्तर फैलाकर गड्ढे में बैठ गया। ठंड के दिन थे। ओवरकोट पहना और कंबल से पैर ढक लिए। राइफल भरकर उसी पर रख ली और बीस कारतूसों का डिब्बा सामने रख लिया मानो मनुष्यभक्षी सिंह उनके एक अंश को भी चला लेने की मुहलत देता।

पहले तो अँधेरा बहुत बुरा लगा, फिर वह मेरा मित्र बन गया। यदि मैं मनुष्यभक्षी को बिना बहुत निकट आए नहीं देख सकता था तो वह भी तो मुझको नहीं देख सकता था। सूँघ जरूर सकता था; परंतु सूँघने के लिए उसको नाक से फूँ-फाँ करनी पड़ती, मैं सुन लेता और ‘धाँय’ करने के लिए पहले ही सावधान हो जाता। मैं सामने देखता अगल-बगल बैठे-बैठे और उझक-उझककर भी। मैंने अपने जीवन भर में इतनी चौकसी कभी नहीं की।

चौकसी करते-करते आधी रात हो गई। भय के अत्यंत निकट संसर्ग में आने के कारण मन में धुक-धुक बिलकुल न रही। राइफल हटाकर बगल में रख दी और अकड़े-सिकुड़े हए पैरों को सीधा करने के लिए लेट गया। तारों पर टकटकी जमाई।

बेतवा की धार चल रही थी। थी पतली ही। कंकड़ों से टकराकर धार एक बँधा हुआ शब्द कर रही थी। टिटिहरी बीच-बीच में बोल जाती थी। किनारे के ऊपरवाले पेड़ों पर बसेरा लिए हुए डोंके ठहर-ठहरकर टुहुक लगा जाते थे। झींगुर झनकार रहे थे। दूर जंगल से कभी चीतल का कूका और कभी साँभर की रेंक सुनाई पड़ जाती थी। कभी-कभी उल्लू और कभी चमगादड़ अपने पंख फड़फड़ाते इधर से उधर निकल जाते थे।

मुझे नींद का नाम न था।

रात का तीसरा पहर समाप्त होने को आ रहा था। मैं इस बीच में कई बार बैठ और लेट चुका था। मैं लेटा हुआ था जब पास ही छप-छप का शब्द सुनाई पड़ा। मैं तुरंत सावधानी के साथ बैठ गया। राइफल साधी और लिबलिबी पर उँगली रख दी। पानी की धार, जहाँ से छप-छप का शब्द सुनाई दिया था, मेरे गड्ढे से साठ-सत्तर फीट की दूर पर होगी। साँस रोककर प्रतीक्षा करने लगा।

गड्ढे के सामने एक आकार आया और रुका। आकार उतना लंबा और चौड़ा न था जितना मेरे अनुमान ने बना दिया था। अँधेरे में बिना निशाना लिए हुए मुझको राइफल चलाने का अभ्यास था, इसलिए मन में बहुत शंका न हुई। आकार ने फूँ-फाँ की। मुझको साफ सुनाई पड़ा। लिबलिबी का पर तुरंत उँगली दबी और जोर का ‘धाँय’ शब्द हुआ। जब तक ‘धाँय’ की गूँज दुगुन और तिगुन हुई, मैंने चटपट दूसरा कारतूस नाल में पहुँचा दिया। मैं दूसरा कारतूस भी फोड़ता, परंतु वह आकार धराशायी हो गया था, उसकी साँस जोर-जोर से चल रही थी। मुझको विश्वास हो गया कि साँसें कुछ पल की हैं। कुछ पल के बाद उसकी साँस बंद हो गई। वह समाप्त हो गया। परंतु इतना अँधेरा था कि अनुमान भी नहीं कर सकता था कि किस जानवर पर गोली चलाई है। इतना साहस नहीं कर सकता था कि गड्ढे को छोड़कर उसके पास जाता और अनुसंधान करता।

प्रातःकाल की प्रतीक्षा करने लगा।

प्रातःकाल के पहले पतले से चंद्रमा का उदय हुआ। परंतु उसके प्रकाश से कोई सहायता नहीं मिली। उसके धुँधले प्रकाश में गड्ढे के सामने पड़े हुए मृत पशु का आकार अनुमान से कुछ लंबा ही दिखता रहा।

ज्यों-ज्यों करके पौ फटी। उजाला हुआ। देखूँ तो मृत पशु लकड़बग्घा है। कारतूस को खराब करने का पछतावा नहीं हुआ। यदि वह मनुष्यभक्षी सिंह ही होता तो गोली तो ठिकाने से पड़ती लकड़बग्घे के गले से जरा हटकर जोड़ पर निशाना लगा था।

बिस्तर उठानेवाला सूर्योदय के बाद आ गया। लकड़बग्घे को देखकर वह हँसा। बोला, ‘मैं खेत पर जाग रहा था, जब बंदूक का अर्राटा हुआ। सोचा था, कोई खाने लायक जानवर मरा होगा। यह तो कुछ भी न निकला।’

मैं कुछ और सोच रहा था। मेरे साथ लगभग अनिवार्य रूप से घूमनेवाले इस शिकारी का नाम दुर्जन कुम्हार था। बहादुर, कष्टसहिष्णु और बहुत हँसोड़।

बेतवा के भरकों में घूमते हुए एक दिन हम दोनों ने एक टीले के चौरस पर कुछ विलक्षण सी गठरियाँ लुढ़कती-पुढ़कती देखीं। छिपते-छिपते हम दोनों बहुत निकट पहुँच गए। देखें तो तीन-चार लकड़बग्घे किसी जानवर का भोजन कर रहे हैं। शायद गाँव के किसी आवारा कुत्ते को मार लाए थे। मेरे गाँठ में कुल पाँच कारतूस थे। तीन हिरनमार छर्रे के और दो चार नंबर के सरसों के दानों से भी छोटे छर्रेवाले। हिरनमार छर्रे से मैंने एक लकड़बग्घे को गिरा दिया। उसके गिरते ही बाकी वहाँ से भागे नहीं, बल्कि गिरे हुए लकड़बग्घे का रक्तपान करे लगे और उसको चीर-फाड़ भी डाला। मैने एक और गिराया। तीसरा लकड़बग्घा उस गिरे हुए पर चिपट गया और अपने बीभत्स कर्म में निरत हो गया। मैंने उस पर भी बंदूक चलाई और ओट छोड़ दी। वह गिर नहीं सका, घायल होकर भागा। तब एक कोने में चौथा लकड़बग्घा दिखलाई पड़ा। वह तुरंत भागकर एक माँद में जा घुसा। घायल लकड़बग्घा भरकों के बीच के एक छोटे से नाले में जा पड़ा। मैंने उसपर चार नंबर का बारीक छर्रा चलाया। उसका कोई घातक प्रभाव नहीं पड़ा; परंतु वह नाले में दुबक गया।

दुर्जन दौड़ता हुआ उसके पास पहुँचा। उसके पास पहुँचते ही घायल जानवर ने एक उचाट ली और दर्जन की ओर बढ़ा। दुर्जन ने चक्कर काटकर नाले को फाँदना चाहा। फाँदने में दुर्जन की कमर लचक गई और रीढ़ का एक गुरिया धमक खा गया।

‘ओ मताई, खा लओ!’ चिल्लाकर दुर्जन गिर पड़ा।

मैं जिस टीले पर खड़ा था, उसके नीचे एक छोटा टीला और था। उस टीले के नीचे नाला था। दुर्जन को गिरा देखकर लकड़बग्घा डरा और मेरी ओर आया। मेरे पास सिवाय चार नंबर के एक कारतूस के और कुछ न था। जैसे ही क्रुद्ध लकड़बग्घा आठ-दस फीट रह गया, मैंने उस पर चार नंबर का कारतूस चला दिया। वह खत्म हो गया। मैं दुर्जन को उठाकर गाँव ले आया। लकड़बग्घा जरूर बहुत डरपोक होता है; परंतु घायल होने पर दबे पाँव प्राण बचाने के लिए आक्रमण कर देता है।


13

अगली छुट्टी में मैं अपने मित्र शर्मा जी के साथ उसी गड्ढे में आ बैठा। चाँदनी नौ बजे के लगभग डूब गई। अँधेरे की कोई परवाह नहीं थी। एक से दो थे और टॉर्च भी साथ थी।

जिस घाट पर हम लोग गड्ढे में बैठा करते थे उससे ऊपर की ओर लगभग डेढ़ सौ गज पर एक घाट और था। वहाँ से होकर उसपर से चिरगाँव की हाट के लिए आन-जानेवाले लोग निकला करते थे। उनको कभी ज्यादा रात भी हो जाती थी; परंतु मनुष्यभक्षी सिंह के भयानक समाचारों के संध्या के उपरांत के आवागमन को बंद कर दिया था।

अँधेरा हो जाने पर मुझे आलस्य मालूम पड़ा। मैं सो गया। शर्मा जी पहरा देते रहे। शर्मा जी की बंदूक लगभग आधी रात गए चली – ‘धाँय’। उधर से शब्द हुआ, ‘ओ मताई, मर गओ!’ मैं घबराकर उठ बैठा। कलेजा धक-धक करने लगा। टॉर्च जलाकर देखा तो एक आदमी सफेद रजाई ओढ़े हमारे गड्ढे की ओर आ रहा है। विश्वास हो गया कि मरा नहीं है; किंतु संदेह था, शायद घायल न हो। अनेक प्रश्न कर डाले। उसने कहा, ‘बहुत बचे।’

हम लोग दुनाली से छर्रा न चलाने की शपथ सी बहुत पहले ले चुके थे। अब छर्रा कारतूस की पेटी में न रखने का निश्चय कर लिया।


14

मोर, नीलकंठ, तीतर, वनमुरगी, हरियल, चंडूल और लालमुनैया जंगल, पहाड़ और नदियों के सुनसान की शोभा हैं। इनके बोलों से – जब बगुलों और सारसों, पनडुब्बियों और कुरचों की पातें की पातें ऊँघते हुए पहाड़ों के ऊपर से निकल जाती हैं। प्रकृति में उल्लास भर जाता है। नीलकंठ और बगुले का मारना कानून में निषिद्ध है। मोर गाँव के निकट नहीं मारा जा सकता; चंडूल और लालमुनैया को कोई नहीं मारता; परंतु तीतर, वनमुरगी और हरियल के लिए तो खानेवाले ललकते से रहते हैं।

इनमें से केवल मोर खेती को हानि पहुँचाता है। ऐसा सुंदर पक्षी और गंहूँ चने इत्यादि को किस बुरी तरह खानेवाला। चना का पौधा उगा नहीं कि इसने उखाड़-उखाड़कर उसका सफाया किया। किसान जब इन सबकी मार से थक जाता है तब परिस्थितिजन्य संतोष के साथ कहता है – ‘यदि इन सबसे पूरा अन्न बच जाय तो घर में रखने को जगह ही न रहे।’

सचमुच जगह न रहे, परंतु बच नहीं पाता। अधिक अन्न उत्पन्न हो जाय तो क्या किसान उसको फेंक देगा?

हरियल, पीपल, बरगद और ऊमर के पेड़ों पर अधिकतर दिखलाई पड़ता है। इसकी बारीक सीटी कभी-कभी मनुष्य की सीटी के भ्रम में डाल देती है; परंतु मनुष्य की बजाई हुई सीटी में विषमता होती है, इसकी सीटी लगातार एक सी बजती है। इसकी भूमि पर बैठा हुआ शायद ही किसी ने देखा हो; परंतु यह बैठता है – पानी पीने के लिए और दाने-चारे के लिए ही। इतना हरा-पीला होता है कि पेड़ों के हरे-हरे पत्तों में छिप जाता है। अधिकतर इसकी सीटी ही इसकी उपस्थिति का पता देती है।

तीतर सवेरे-शाम मार्गों, पकडंडियों और खुले मैदानों में, जहाँ ढोर गोबर छोड़ जाते हैं, पाया जाता है। यह ज्यादा नहीं उड़ सकता है। थोड़ी दूर उड़कर फिर तेजी के साथ पंजों के बल भागता है। तीतर दिन चढ़ते ही झाड़ी-झकूटों में जा छिपता है और संध्या के पहले लगभग चार बजे फिर अपने प्रवास से बाहर निकल पड़ता है।

इससे मिलती-जुलती एक चिड़िया भटतीतर होती है। इसका रंग मटमैला होता है। कटी हुई तिली के खेतों में बहुधा पाया जाता है। आहट पाकर खेत के कूँड़ों में यह ऐसा दबकर बैठ जाता है कि पास से भी नजर में नहीं आता। बहुत पास पहुँच जाने पर यह फड़फड़ाकर उड़ जाता है। भटतीतर बहुत ऊँची और लंबी उड़ान ले सकता है। स्वर इसका इतना तीक्ष्ण होता है कि ऊँची उड़ान पर से भी सुनाई पड़ जाता है।

वनमुरगी और पालतू मुरगी में ज्यादा अंतर नहीं है। बोली भी दोनों की लगभग एक सी होती है। पालतू मुरगी की बाँग कुछ लंबी खिंच जाती है, वनमुरगी की बाँग अधकटी सी होती है।

नीलकंठ शिकारी पक्षी है। इसका नीला रंग इतना सुंदर, इतना मोहक होता है कि वह शकुन का विषय बन गया है। पर इसकी बोली लटीफटी सी लगती है। कीड़ों-मकोड़ों का शिकार अधिकतर करता है; परंतु छोटी चिड़ियों से भी इसको कोई परहेज नहीं है – पंजे में पड़ जाय तो। चंडूल, लालमुनैया देखने में अच्छे और सुनने में तो कहना ही क्या है।

रात को तीसरे पहल जब ये पक्षी अपने मिठास भरे स्वरों का प्रवाह बहाते हैं, तब किसी भी बाजे से इनकी मोहकता की तौल नहीं की जा सकती। मैंने तो गड्ढों में बैठे-बैठे इनकी मनोहर तानों को सुनते-सुनते घंटों बिता दिए। बंदूक एक तरफ रख दी और इनके सुरीले बोलों पर ध्यान को अटका दिया। जानवर पास से निकल गए, परंतु मैंने बंदूक नहीं उठाई। ऐसा जादू पड़ गया कि मैंने कभी-कभी सोचा, खेतों की रखवाली का सारा ठेका क्या मैंने ही ले रखा है?


15

मध्य प्रदेश कहलाने वाले विंध्यखंड में ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियाँ, विशाल जंगल, विकट नदियाँ और झीलें हैं। शिकारी जानवरों की प्रचुरता में तो यह हिंदुस्थान की नाक है। किसी समय विंध्यखंड में हाथी और गैंडा भी प्राप्य थे। विष्णुगुप्त चाणक्य ने तो इनका जिक्र किया ही है। अकबर के युग में भी ये प्राप्य थे और आज से लगभग सौ वर्ष पहले तक इनकी उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं। अब तो इनका शिकार खेलने के लिए हमारे यहाँ के साधनसंपन्न शिकारियों को हिमालय की तराई और असम के जंगलों में जाना पड़ता है।

अब भी विंध्यखंड के जंगलों में जो कुछ है, कुतूहल के लिए बहुत है। बंगाल का नाहर अपने बल-विक्रम और सौंदर्य के लिए विख्यात है; परंतु मंडला, बालाघाट और बिलासपुर के जंगलों में उससे भी बड़े शेर पाए जाते हैं। शिकार संबंधी एक पुरानी पुस्तक में मैंने बारह फीट की लंबाईवाले शेरों का हाल पढ़ा है। अब भी दस-ग्यारह फीट की लंबाई वाले दुष्प्राप्य नहीं हैं। बड़े-बड़े भालू, अरने भैंसे, काले रंग के तेंदुए और जंगली कुत्ते इन जंगलों में बहुतायत से पाए जाते हैं।

बिलासपुर जिले में एक साधन के सहारे हम लोग कई मित्र एक दिन जा पहुँचे। रात को छकड़े किराए पर किए। दूसरे दिन, ‘नानबीरा’ नामक गाँव में पहुँचना था। सवेरा होने पर मार्ग में ‘सरगबुंदिया’ नाम का गाँव मिला। इस गाँव का नाम सरगबुंदिया – स्वर्गबिंदु क्यों पड़ा, मुझको इस बात की खोज करने का मोह हुआ। गाँव में दो पोखर थे। दोनों में लोग नहाते थे और उसका पानी भी पीते ते। आस पास पानी का और कोई ठिकाना न था। कम-से-कम, गरमियों की ऋतु में, मुझको नहीं दिखलाई पड़ा। गाँव खासा था और पानी के केवल दो पोखर। मैंने सोचा, स्वर्ग की ये दो बूँदें इस गाँव को सरगबुंदिया की संज्ञा प्रदान कर रही हैं।

सरगबुंदिया में अपना भोजन और उसका पानी पीकर हम लोग संध्या के पहले नानबीरा पहुँच गए। जंगलों, पहाड़ों से घिरा हुआ नानबीरा बड़ा गाँव है। वहाँ एक स्कूल भी है। ईस्टर की छुट्टियों के कारण स्कूल बंद था। हम लोगों के पास बिलासपुर जिला बोर्ड के एक कर्मचारी – श्री मानिकम् थे। उनकी कृपा से स्कूल में ठहरने की सुविधा मिल गई। जब हम लोग स्कूल के अहाते में पहुँचे, कुछ लड़के खेल रहे थे। लड़के संकोच में आकर वहाँ से खिसकने को हुए। मैंने रोक लिया। थोड़ी सी बातचीत की।

मैंने पूछा, ‘तुम लोगों ने शेर देखा है?’

उत्तर मिला, ‘हाँ।’

‘भालू, तेंदुआ, भेड़िया?’

‘सब देखे हैं।’

‘तुम लोग मांस खाते हो?’

‘हाँ।’

‘किस-किस का?’

इस पर लड़के एक-दूसरे का मुँह ताककर हँसने लगे।

मैंने अनुरोध किया, ‘सकुचो मत। बतलाओ?’

एक लड़का बोला, ‘ये लोग चूहा और कौआ भी भी खाते हैं। हम लोग नहीं खाते।’

‘चूहा और कौआ!’ मुझको आश्चर्य हुआ।

मैंने प्रश्न किया, ‘तुम लोग कौन, जो चूहा और कौआ नहीं खाते?’

‘मुसलमान।’ उस लड़के ने उत्तर दिया।

‘और ये लोग कौन हैं, जिन्हें चूहा और कौआ भी हजम है?’ मैंने पूछा।

लड़के ने हँसकर उन लोगों की जाति बतलाई।

मैंने कहा, ‘तब तो तुम्हारे घरों में भी चूहे और जंगलों में कौए होंगे ही नहीं।’

बाकी लड़के भी वार्तालाप में भाग लेने लगे।

एक हिंदु बालक बोला, ‘चूहे तो बहुत हैं, पर जंगलों में कौए बहुत नहीं हैं।’

मुझे झाँसी जिले के कौओं की याद आ गई। कुआर के महीने में नगरों और कस्बों में तो इनकी काँव-काँव के मारे नाको दम आ ही जाता है, जंगलों में इनके झुंड़ों के मारे संध्या बेसुरे कोलाहाल के मारे बेचैन सी हो जाती है। एक झुंड में ही सैकड़ों-हजारों। बगीचों के फलों और खेतों के अनाज को नष्ट करने में ये तोतों को भी मात दे देते हैं। मैंने सोचा, या तो नानबीरा हमारे यहाँ पहुँच जाएँ या हमारे यहाँ के कौए नानबीरा की ओर पधार जाएँ तो निष्कृत मिले। परंतु इसस प्रकार तो समस्या हल होती नहीं।

रात के जागे और दिन के थके थे, इसलिए रात भर मजे में सोए।

सवेरे लगभग सौ गोंड, कोल और बैगा हम लोगों के पास आ गए। शिकार उनका जीवन और मनोरंजन है। खेती कम और जंगल अधिक सहारा है।

उनके केश सुंदर और कंघी किए हुए। शरीर दृढ़ मांसल, रग-पुट्ठे वाले- और चिकने। छोटी धोती, लँगोट या जाँघिया कसे हुए। किसी किसी के हाथ में चाँदी के चूड़े। अधिकांश तीर कमान कसे हुए। बहुतेरों के कंधे पर तेज धारवाली कुल्हाड़ी – वे उसे ‘टँगिया’ कहते थे। कुछ के हाथ में लाठियाँ और छोटे बरछे। उनमें से थोड़े से ढोल और ताशे भी लिए थे।

उनके बीच में एक मटका रखा हुआ था। मटके में महुए की शराब थी। वे थोड़ी-थोड़ी चुल्लुओं पी रहे थे। मेरे मन में आया, इनको एक व्याख्यान देकर सुधार की भावना जाग्रत करूँ। तुरंत भीतर मैंने कुछ टटोला। मैं व्याख्यान देनेवाला कौन? यदि इनको अधिक भोजन, अधिक पैसे, अधिक शिक्षा, अधिक कपड़े, दवा-दारू और अच्छी दिशा दे सकूँ तो इनका देशवासी कहलाने की पात्रता रख सकता हूँ, नहीं तो ये जैसे हैं मुझसे अच्छे हैं। चेहरे पर सहज मुस्कान है; भाव इनका सीधा, सरल, निर्भीकता से भरा हुआ है। हम इनसे कुछ ले सकते हैं, दे इन्हें क्या सकते हैं?

सुधार की भावना को ताक में रखकर मैं उनके बीच में पहुँच गया। जाग्रत मानव के सब हर्ष, समग्र ओज उनमें मौजूद थे- कठिनाइयों और पीड़ाओं, विपत्तियों और दुःखों से लड़ जाने का मनोबल उनमें प्रतीत होता है।

शहर के अधकचरे, अधबुझे हम लोग श्रद्धा के मारे झुक गए।

उनके अगुआ से शिकार के कार्यक्रम पर बातचीत होने लगी। उसने हाँके के लिए एक विशेष पहाड़ को चुना। आशा की गई कि शेर और भालू मिलेंगे।

हम लोग पहाड़ की ओर चल दिए। लगान लगानेवाले ने बंदूकवालों को यथास्थान खड़ा कर दिया। मैं अपने एक मित्र के साथ ऐसे स्थान पर खड़ा किया गया जहाँ महीने-डेढ़ महीने पहले एक अँगरेज स्त्री को शेर ने हाँके से निकलकर चबा डाला था। जगह-जगह पेड़ों पर मचान बँधी हुई थी। शेर के शिकार का अनुभव नहीं था, इसलिए हम लोग मचान पर नहीं गए, नीचे ही खड़े रहे। पहाड़ की तली में थे। पहाड़ पर से हँकाई होती आ रही थी।

ढोल, ताशों और कई प्रकार के वाद्यों का तुमुल नाद होता चला आ रहा था। हम लोग प्रतीक्षा की धुकधुकी में खड़े थे अपने-अपने स्थानों पर। मेरे अन्य मित्रों की भी यही अवस्था रही होगी।

इस हँकाई में एक सुअर के सिवाय और कुछ नहीं निकला। यह सुअर हमारे लगान के सामने उँचाई पर से निकला। ‘धाँय-धाँय!’ हम दोनों ने एक साथ बंदूकें चलाईं। सुअर के अगले जोड़ पर दोनों गोलियाँ पड़ी। दोनों मे केवल दो इंच का अतर था। हाँकेवाले उत्सुकता के साथ हम लोगों के पास आए। सुअर को पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए।

दूसरी हँकाई के लिए आध मील दूरी पर एक और पहाड़ चुना गया। अब की बार हम लोग अत्यंत असावधानी के साथ खड़े हो गए। किसी किसी ने तो केवल पेड़ की ओट ले ली। हम दोनों ने आम पेड़ के पत्ते तोड़कर आड़ बना ली ऐसी कि उसको खरहा भी तोड़ डालता।

हँकाई होने के थोड़े ही समय बाद एक और बंदूक चली, फिर एक और। सामने से दो बड़े रीछ आते हुए दिखलाई पड़े। मेरी बगल में कुछ फासले पर एक आया। मेरे साथी मित्र की पहली गोली से घायल होकर वह लौटा और वे स्थान छोड़कर उसके पीछे दौड़े। उन्होंने भागते हुए रीछ पर गोलियों की वर्षा कर दी। बारह-तेरह चलाईं; परंतु लगी एक भी नहीं। रीछ परेशान होकर एक पेड़ पर चढ़ा।

वह सीधा ही चढ़ा, बड़ी फुरती के साथ। लोगों का खयाल है कि रीछ उलटा चढ़ता है। यह गलत है। वह उलटा भी चढ़ सकता होगा, परंतु साधारणतया चढ़ता सीधा ही है।

मेरे मित्र ने एक गोली और चलाई। रीछ नीचे आ गिरा।

फिर एक हँकाई और हुई। दूसरे दिन भी हँकाईयाँ हुई; परंतु मिला कुछ नहीं। हाँ रीछों के कुछ अद्भुत किस्से जरूर सुनने को मिले। उनमें से एक विलक्षण था।

एक अँगरेज शेर के शिकार के लिए आया। मचान पर अकेला जा बैठा। नीचे किसी मरे हुए जानवर का गायरा रख लिया था। कुछ रात बीतने पर गायरे के पास एक रीछ आया। रीछ ने गायरे को सूँघा था कि झाड़ी के पीछे छिपे हुए शेर ने रीछ पर तड़प लगाई। रीछ बलबलाता हुआ भागा और पेड़ पर चढ़ गया और मचान की ओर बढ़ा, जहाँ अँगरेज शिकारी बैठा हुआ था। मारे डर के अँगरेज की जो हालत हुई होगी उसका तो अनुमान किया जा सकता है, परंतु ऐसे अप्रत्याशित स्थान पर आदमी को बैठे देखकर रीछ की जो दशा हुई उसका प्रयत्क्ष फल यह हुआ कि वह हड़बड़ाकर नीचे जा गिरा। शेर ने उसको समाप्त कर दिया। ऊपर से जो गोली पड़ी तो शेर उससे समाप्त हो गया।

जंगलों में शेर इत्यादि की जो कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। उनमें से अधिकांश का आधार सच होता है; परंतु कुछ नितांत कल्पनाप्रसूत होती हैं।

जंगल के रहनेवाले लोगों में जितने भालू के नाखूनों से घायल होते हैं उतने और किसी से नहीं। इसके नाखून पंजे की गंद्दी से बाहर निकले रहते हैं और बहुत लंबे होते हैं। यह आसानी के साथ पालतु कर लिया जाता है; परंतु जंगली अवस्था में काफी दुःखदायक होता है। शरीर का छोटा, परंतु बाल बड़े-बड़े होने के कारण विहंगम दिखलाई पड़ता है। जड़ों और फलों का प्रेमी होता है। पेड़ों पर चढ़कर आराम के साथ शहद तोड़ खाता है। मधुमक्खियाँ इसका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं, क्योंकि काटने के प्रयत्नों में उसके बालों में ही उलझ जाना पड़ता है। किसी की खाल पर जीभ को कसकर फेरे तो खून निकल आवे। कुछ लोगों की कल्पना है कि यह हाथों में लपेटकर, आदमी से चिपटकर थूक से अँधा कर देता है और उसका कचूमर निकाल देता है। इसके थूक में ऐसा कोई विष नहीं होता है, और क्रोध में सभी पशु मुँह से झाग फेंक उठते हैं। चिपट जरूर यह जाता है और नाखूनों से बेतरह चीड़-फाड़ करता है। इसको सुनाई कम पड़ता है। आँख के ऊपर बालों के लटकने के कारण देख भी अच्छी तरह नहीं पाता। जाड़ों में झोरों और लंबी घास वाले मैदानों में पड़ा रहता है। जहाँ कोई असावधान मनुष्य पास तक पहुँचा कि यह जागा और चिपट पड़ा। मनुष्य ने देख नहीं पाया। और भालू ने दूर से ही आहट नहीं ले पाई, फल भालू का घोर और विकट आलिंगन। यदि उस आलिंगन से प्राण न निकले तो कई सप्ताह अस्पताल का सेवन तो करना ही पड़ता है।

गाँवों और नगरों में जिस रीछ का पीछा बच्चे हा हा, हू-हू नहीं अघाते और वह बिलकुल नहीं चिढ़ता, जंगल का तोहफा होते हुए भी प्रकृत्ति में अपने भाईबंदों से बिलकुल अलग पड़ जाता है। इतने सीधे जानवर की ऐसी निंदा! पर वह है यथार्थ।


16

एक बार विंध्यखंड के किसी सघन वन का भ्रमण करने के बाद फिर बार-बार भ्रमण की लालसा होती है। इसलिए सन् 1934 के लगभग मैं कुछ मित्रों के साथ मंडला गया।

मंडला की रेलयात्रा स्वयं एक प्रमोद थी। पहाड़ी में होकर रेल घूमती, कतराती गई थी। गहरे-गहरे खड्ड, गरमियों में भी जल भरे नदी-नाले और कौतुकों से भरी हुई नर्मदा। मंडला जिले में ही तो कान्हाकिसली का विशाल, किंतु वर्जित जंगल है। मंडला जिले में ही छोटे से सुंदर नाम और बड़े दर्शनवाला – मोती नाला है। नाम ‘मोती नाला’ ही है, परंतु इस नाम का जंगल बड़ा और विस्तृत, विहंगम और बीहड़ है। मोती नाला के जंगल में शेर बहुतायत से पाए जाते हैं। मार्ग में ‘जगमंडल’ नाम का बड़ा वन मिलता है। सरही और सागौन के भीमकाय वृक्ष भरे पड़े हैं। जल भरे नदी नालों की कोई कमी नहीं।

जगमंडल नाम के जंगल में भी शेरों की काफी संख्या है। साँभर, चीतल, वाइसन और भैंसे भी मिलते हैं।

एक दिन तो हम लोग टोह-टाप में लगे रहे। जिस नाले में निकल जाएँ उसी में शेरों के पदचिह्न। एक नाले में दोनों किनारों से आड़ी पगडंडियाँ पड़ गई थीं। वहाँ पर रेत में शेरों के इतने निशान मिले कि हम लोग अचरज में डूब गए। झाँसी जिले के नालों में जैसे ढोरों के निशान मिलते हैं वैसे शेरों के मिले। कुशल यही रही कि नालों की घास में कोई शेर पड़ा हुआ नहीं मिला।

हम लोगों को ठहरने के लिए जंगल विभाग की एक चौकी मिल गई थी। साधन संपन्न जंगलों में डेरे तंबू लगाते हैं; परंतु इनकी टीमटाम देखकर अल्प साधनवाले मनचले शिकारी हतोत्साहित हो जाते हैं। वे सोचते हैं, न इतना साज सामान होगा, न बड़े जंगलों का भ्रमण और जंगलों का शिकार उपलब्ध होगा। मैं भी नहीं जा सकता था; परंतु मेरे एक निकट संबंधी इन जिलों में बड़े पद पर थे, इसलिए एक दरी और एक चादर लेकर झाँसी से बाहर निकल पड़ता था। उनका निषेध है, इसलिए नाम लेकर कृतज्ञतापन तक से विवश हूँ।

दूसरे दिन दुपहरी में भटक-भटककर हम लोग डेरे पर आ गए। साथ में मंडला से आटा ले आए थे; क्योंकि इस ओर गाँव में दाल-चावल और मिर्च-मसाला तो मिल जाता है, परंतु आटा दुर्लभ है। भोजन शुरू ही किया था कि एक गोंड ने आकर समाचार दिया – नाहर ने गायरा किया है। उसकी बोली में – ‘नाहर गायरा किहिस।’

पत्तल छोड़कर हम लोग उठ बैठे। उस समय तीन बजे होंगे। मचान बाँधने का सामान, रस्से, पानी का घड़ा और बिस्तर इत्यादि साथ लिए और चल दिए।

एक नाले में झाँस के नीचे एक बड़ा बैल दबा पड़ा था। उस बैल की कहानी कष्टपूर्ण थी। उस जंगल में रेलवे लाइन पर बिछाए जानेवाले शहतीर स्लीपर काटे जा रहे थे और जबलपुर के लिए ढोए जा रहे थे। जबलपुर से एक गाड़ीवाला शहतीरों को ढोने के लिए अपनी गाड़ी लाया। शहतीरों तक नहीं जा पाया था, मार्ग में एक पानीवाला नाला मिला। गाड़ीवाला ने बैल ढील दिए और पुल के नीचे एक चट्टान पर खाना बनाने लगा। बैल जरा भटककर डाँग में चले गए। उनमें से एक को सेर ने मार डाला। उसको सेर उठाकर लगभग तीन फलाँग की दूरी पर ले गया और झाँस के नीचे एक छोटे से नाले में दाब दिया। उस समय उसने बैल को बिलकुल नहीं खाया। सोचा होगा, रात आने पर सुभीते में खाएँगे।

बैल को नाले में से निकलवाया। छह आदमी उसको बाहर निकाल सके। लगभग साठ डग पर एक ऊँचा बरगद का पेड़ था। नीचे जरा हटकर आम और तेंदू के छोटे-छोटे गुल्ले थे। इनको साफ करवाकर एक पेड़ के ठूँठ की खूँटी का रूप दिया गया। बाँस के खपचे निकालकर उनसे बैल को पेड़ के ठूँठ से जकड़कर बाँध दिया गया।

मैंने बाँधनेवालों से पूछा, ‘इन खपचों को तोड़कर सेर बैल को उठा तो नहीं ले जाएगा?’

उन लोगों तान-तानकर खपचों को खींचा और आश्वासन दिया- ‘शेर इन खपचों को कैसे भी झटके से नहीं तोड़ सकेगा।’

मेरे सामने से एक बार तेंदुआ रस्सी तोड़कर बकरे को उठा ले गया था। मैं उस जगह उस अनुभव को दुहराना नहीं चाहता था।

गोंडों और कोलों के आश्वासन को मैंने मान लिया। उसका तद्विषयक अनुभव काफी था। हम लोगों को उनकी बात पर संदेह करने के लिए कोई कारण न था।

उस रात चैत की पूर्णिमा थी। दिन में गरमी रही, परंतु रात का सलोना सुहावनापन तो अनुभव के ही योग्य था। चारों ओर से महक भरे मंद झकोरे आ रहे थे। कहीं से चीतल की कूक और कहीं से साँभर की रेंक सुनाई पड़ रही थी। सियार भी कभी ‘फे’ कर जाता था।

हमारी मचान भूमि से लगभग पच्चीस फीट की ऊँचाई पर थी। मचान लंबी-चौड़ी थी, सीधे डंडों से पूरी हुई। ऊपर गद्दा और दरी। एक ओर डालों के तिफंसे में जल भरा घड़ा और कटोरा रखा था। मचान एक ओर से खुली हुई थी और तीन ओर से पत्तों से आच्छादित। उस पर केवल रीछ चढ़कर आ सकता था; शायद तेंदुआ भी – क्योंकि मैंने तेंदुए को अपनी आँखों पेड़ पर सहज गति से चढ़ते देखा है परंतु शेर चढ़कर नहीं आ सकता था। मचान के सिरहाने की तरफ मैं बैठा था, दूसरी ओर मेरे मित्र शर्माजी। मेरे सामने का भाग ज्यादा खुला था, शर्मा जी के सामने का कम।

मेरे अन्य मित्र काफी दूर अन्य मचानों पर थे।

आठ बज गए। चाँदनी खूब छिटक आई। मेरे सामने सौ गज तक खुला हुआ मैदान था, फिर घनी झाड़ी शुरू हुई थी।

आठ बजे के उपरांत इस खुले हुए मैदान में लगभग अस्सी गज की दूरी पर एक सफेद सफेद सा ढेर दिखलाई पड़ा। मैंने आँखों को गड़ाया। वह ढेर स्थित था। सोचा, आँखों का भ्रम है। कुछ मिनट बाद वह ढेर हिला और मचान की ओर थोड़ा सा बढ़ा। विश्वास हो गया कि शेर है और बंदूक की अनी पर आ रहा है। मैंने शर्मा जी को इशारा किया। उन्होंने ने भी अपने झाँके में होकर देखा। वह लगभग आधे घंटे तक ठिठकता-ठिठकता सा चला। फिर उसने उस नाले पर छलाँग भरी, जिसमें वह दिन में मारे हुए बैल को ठूँस आया था। इसके उपरांत वह दृष्टि से लोप हो गया। बाट जोहते-जोहते ग्यारह बज गए। चाँदनी निखरकर छिटक गई थी। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। शर्मा जी ने सिर और आँखों पर हाथ फेरकर नींद की विवशता प्रकट की। मेरे भी सिर में दर्द था। हम दोनों लेट गए। मैंने सोचा, गायरा प्रबल खपचों से बँधा हुआ है। शेर आकर जब बैल के उठाने का उत्कट प्रयत्न करेगा, हम लोग सोते ही न पड़े रहेंगे। लेटते ही सो गए, क्योंकि मचान पर किसी विशेष संकट की आशंका न थी।

चाँदनी ठीक ऊपर चढ़कर थोड़ी सी वक्र हो गई थी। एक बजा था, जब मुझको पेड़ के नीचे कुछ आहट मालूम पड़ी। मैं यकायक उठकर नहीं बैठा। मचान पर का जरा सा भी शब्द सुनकर यदि शेर होगा तो फिर नहीं आएगा- शायद महीने-पंद्रह दिन तक न आवे; क्योंकि शेर तेंदुए की तरह ढीठ नहीं होता। मैं बहुत धीरे-धीरे उठा। आँखें मलकर मचान के नीचे झाँका। कोई दो छोटे जानवर बरगद की सूखी पत्तियों को रौंद-रौंदकर बैल की घात लगा रहे थे। बैल को भी देखा संदेह था, कहीं उस समय शेर उसको न घसीट ले गया हो, जब सो रहे थे। बैल समूचा पड़ा था। शेर उसके पास नहीं आया था।

मैं कुछ क्षण ही इस तरह बैठा था कि सामने से शेर आता दिखलाई पड़ा। शेर के आने के पहले ही वे दोनों जानवर भाग गए। मैं जब लेटा था, मैंने अपनी राइफल का तकिया बनाया था। शर्मा जी दुनाली बंदूक छाती पर रखे हुए सो रहे थे। मैं राइफल को उठाने के लिए मुड़ नहीं सकता था। मुड़ते ही मेरी गति को शेर देख लेता और भाग जाता, सारी कमी कमाई मेहनत और लालसा व्यर्थ जाती। मैंने शर्मा जी की छाती पर से धीरे से दुनाली उठा ली। उनको जगाने का समय तो था ही नहीं। बंदूक के घोड़े चढ़े हुए थे और नालों में गोलियों के कारतूस पड़े थे। परंतु मुझे अपनी राइफल का अधिक भरोसा रहा है; लेकिन उस मौके पर राइफल उठाना मेरे लिए संभव न था। दुनाली लेकर मैंने बैल पर सीधी कर ली। झुक गया और एकाग्र दृष्टि से अपनी ओर आते हुए शेर को देखने लगा।

शेर बड़ी मस्त चाल से आ रहा था। बगल की पहाड़ी पर पतोखी बोली। अलसाते-अलसाते उठाते हुए अपने भारी पैरों को शेर ने एकदम सिकोड़ा, बिजली की तरह गरदन मरोड़ी, पीछे के पैरों को सधा और जिस पतोखी बोली थी उस ओर एकटक देखने लगा। जब वह उस ओर से निश्चिंत हो गया तब मचान की ओर बढ़ा।

खरी चाँदनी में उसकी छोहें स्पष्ट दिख रही थीं। सफेद भाल और छपके चमक रहे थे। भारी भरकम सिर की बगलों में छोटे-छोटे कान विलक्षण जान पड़ते थे। शेर जरा सा मुड़ा, तब उसके भयंकर पंजे और भयानक बाहु और कंधे दिखलाई पड़े। गरदन जबरदस्त मोटी और सिर से पीठ तक ढालू। उसके पुट्ठों को देखकर मन पर आतंक सा छा गया। सोचा, यदि बड़े-से-बड़ा खिसारा सुअर इससे भिड़ जाय तो कितनी देर ठहरेगा? परंतु सुअर इससे भिड़ जाता है और देर तक सामना भी करता है।

शेर फिर मचान के सामने सीधा हुआ। उसने मेरी ओर गरदन उठाई। चद्रंमा के प्रकाश में उसकी आँखें जल रही थीं। वह टकटकी लगाकर मेरी ओर देखने लगा और मैं तो आँख गड़ाकर उसकी ओर पहले से ही देख रहा था। एक क्षण के लिए मन चाहा कि गोली छोड़ दूँ; परंतु जंगल का शेर और इतना बड़ा जीवन में पहली बार देखा था, इसलिए मन में उसको देखते रहने का लालच उमड़ा। कभी उसके सिर और कभी उसकी छाती तो देखता था। ऐसी चौड़ी छाती जैसी किसी भी जानवर की न होती होगी।

शेर कई पल मेरी ओर देखता रहा। उसको संदेह था। वह जानना चाहता था कि मैं हूँ कौन? पर मैं अडिग और अटल था। उसको बाल बराबर भी हिलता नहीं देखा। जब शेर मेरा निरीक्षण कर चुका तब बैल के पास गया। उसने अपना भारी जबड़ा बैल के ऊपर रखा और दाढ़े गड़ाकर एक झटका दिया। एक ही झटके में कई आदमियों के बाँधे हुए बाँस के खपचे तड़ाक से टूट गए। दूसरी बार मुँह हाल कर जो उसने झटका दिया तो बैल तीन-चार हाथ की दूरी पर जा गिरा। इस समय उसकी पीठ मेरी ओर थी। उसने बैल को एक और झटका दिया। बैल चार-पाँच डग पर जाकर गिरा। मुझको लगा, अब यह चला। सवेरे जब मित्रगण इकट्ठे होंगे तब मेरी इस बात को कोई न सुनेगा कि मैं शेर की लोचों का अध्ययन कर रहा था सब कहेंगे कि मैं डर गया था। मैं मनाने लगा कि किसी तरह यह मेरे सामने अपनी छाती फेरे।

सेर ने कुछ क्षण के लिए मेरे सामने अपनी छाती की। बंदूक तो मिली हुई हाथ में थी ही। मैंने गोली छोड़ी। शेर ने काफी ऊँची उछाल लेकर गर्जन किया। शर्मा जी जाग उठे। उन्होंने भी सुना और देखा।

शेर ने नीचे गिरकर तुरंत एक तिरछी उचाट ली और आँखों से ओझल हो गया।

उसी समय मचान से उतरकर अनुसंधान करने का सवाल ही न था; क्योंकि कुछ पहले इसी प्रकार का प्रयत्न करते हुए इलाहाबाद के एक अँगरेज वकील श्री डिलन फाड़ डाले गए थे; और जैसा कि दो दिन बाद मंडला पहुँचकर हम लोगों ने सुना, कलकत्ता हाई कोर्ट के जज श्री चौधरी के भाई जो वकील थे इसी जंगल से कुछ मील दूर इसी रात इसी प्रकार के प्रयत्न में मार डाले गए थे।

हम लोग मचान से नहीं उतरे। बातें करते-करते सवेरा हो गया। हम लोगों के मचान से उतरने के पहले ही मित्र लोग वहाँ आ गए। आते ही उन्होंने भूमि का निरीक्षण किया। जहाँ गोली चली थी वहाँ खून की एक बूँद भी न थी।

एक साहब बोले, ‘गोली चूक गई।’

मैंने कहा, ‘असंभव।’

नीचे उतरकर देखा, शेर के खून की बूँदें मिलीं। जरा आगे बढ़े कि हड्डी के टुकड़े, और आगे बढ़े तो खून की धार। परंतु हड्डियों के टुकड़े और रक्त की धार लगभग आधा मील तक मिली। एक नाले में उसने पानी पिया और नाले के उस पार के जंगल की लंबी घनी घास में विलीन हो गया। कई दिन बाद उसकी लाश सड़ी हुई मिली। गोली हँसुली की हड्डी पर पड़ी थी। चोट करारी थी, परंतु फिर भी वह इतनी दूर निकल गया।

दूसरे दिन उसी मरे बैल के गायरे को बाँधकर शर्मा जी और मैं बरगद के मचान पर जा बैठे। रात भर जागते रहे, लेकिन मचान तले कोई भी नहीं आया। परंतु अन्य मित्रों को विचित्र अनुभव प्राप्त हुए।

कई मित्र मचान बाँधकर पानी के पोखरे के पास बैठे थे। शुद्ध चाँदनी रात थी। खूब दिखलाई पड़ता था। पोखरे पर पहले दो बाइसन आए। बाइसन के मारने की मनाही थी, इसलिए गोली नहीं चलाई गई। उनके उपरांत एक शेर आया। मित्र को सिगरेट पीने की थी आदत। इधर सिगरेट ने खाँसी पैदा की, उधर शेर छलाँग भरकर ओझल हो गया।

दूसरे मित्र भी एक सज्जन के साथ मचान पर बैठे थे, और यह मचान मैंने ही बँधवाई थी। मचान एक गहरे और चौड़े नाले के किनारे के एक पेड़ पर थी। नाले में पानी न था, परंतु जानवरों के निकलने का उधर होकर मार्ग था।

जब मैं नाले में खड़ा हुआ तब वह पेड़ काफी ऊँचा दिखलाई दिया। मैंने सोचा, इस पर का मचान बिलकुल सुरक्षित रहेगा। पर वह पेड़ किनारे के धरातल से केवल दस-ग्यारह फीट ही ऊँचा था।

दिन में मचान बाँधे जाने के बाद हम लोग सब अपनी-अपनी जगह जा बैठे। जब सवेरे सब लोग मिले, नाले की ढीवाले मचान के शिकारियों का अनुभव सुनकर हम सबको दंग रह जाना पड़ा। उन्होंने बतलाया –

‘नौ बजे के लगभग मचान के पास गुरगुराने की आहट मिली। हम लोग सावधान होकर उस दिशा की ओर देखने लगे, जहाँ से गुरगुराहट सुनाई पड़ी थी। कुछ ही क्षण बाद एक बड़ी शेरनी अपने दो बच्चों के साथ धीरे-धीरे झूमती-झूमती मचान के नीचे आई। बच्चे कलोल में थे और गुरगुरा रहे थे। शेरनी मचान के नीचे बैठ गई। वह जरा सी उठाल लेकर मचान पर बैठे हुए शिकारियों के नीचे पटक ला सकती थी। शेरनी के बच्चे कभी आपस में उलझते और लिपटते, तो कभी शेरनी के भारी शरीर को अपने खेल-कूद का अखाड़ा बनाते। जब दूरी से चीतल या साँभर की आवाज आती तो शेरनी अपने पंजे की मुलायम गद्दी से बच्चों को चुपका कर देती और जबड़े को जमीन से सटाकर ध्यान के साथ कुछ सुनती और देखती। चंचल बच्चे जब उसकी गहरी बगलों में से, उतावले होकर, जंगल के जगत का कारबार समझने के लिए सिर उठाते, वह पंजे की गद्दीदार ठोकर से उनको बुद्धि देने का प्रयास करती। एक बार एक बच्चा कूदने-फाँदने के लिए विकल हो गया तो शेरनी ने हलकी सी चपत जमा दी। चपत ने उस बच्चे को कुछ समझदारी दी और कुनमुनाकर अपनी माँ की बगल में सट गया। थोड़ी देर में नाले के उस पार पेड़ों की छाया में एक बड़ा आकार आया। समझ में नहीं आया, क्या था। शेरनी उस आकार को देखकर फरफराकर खड़ी हो गई और उसने अपने गले में जिस स्वर को दबाकर नाक से निकला, वह बहुत दूर से सुनाई पड़नेवाली भूकंप की सी आवाज थी। मचान पर बैठे एक शिकारी ने बंदूक पर उँगली पसारी। दूसरे शिकारी ने हाथ पकड़ लिया। बिलकुल संभव यह था कि शेरनी केवल घायल होती और निश्चित यह था कि वह घायल होकर मचानवाले किसी भी शिकारी को न छोड़ती।’

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मचान बँधवाने के समय मेरे मन में, पेड़ की ऊँचाई के विषय में, नाले की गहराई में खड़े रहने के कारण भ्रम हो गया था। वैसे वह मचान तो तेंदुए के भी शिकार के योग्य न थी।

बाहर फीट की ऊँचाईवाली मचान से तो एक बार नयागाँव छावनी के पास तिंदरी पहाड़ी के नीचे एक पेड़ पर मचान बाँधकर बैठे हुए शिकारी को घायल होते ही तेंदुए ने उछलकर नीचे पटक लिया था और उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे। फिर शेर के लिए यह मचान केवल दस-ग्यारह फीट की ही ऊँचाई पर थी। बंदूक चल जाती तो गजब हो जाता।

एक चौथी मचान और थी। उस मचान को एक बिलकुल बेढंगी सुनसान जगह में बाँधने की सूझ शिकारी को उसकी झक ने दी थी। शिकारी बिलकुल अकेले, बहुत दूर और बिलकुल बीहड़ झाड़ी में बैठना चाहते थे – शेर वहाँ आए, चाहे न आए।

शेर तो क्या, उनके मचान के पास एक चूहा भी नहीं आया। लाल आँखों सवेरा हुआ।

इसके बाद मैं अनेक बार अमरकंटक पहाड़ पर शेर के लिए गया। अमरकंटक पहाड़ के पठार के समतल पर एक छोटा सा खेत है। उसकी पश्चिमी दरार आगे चलकर नर्मदा बनी है और पूर्ववाली सोन। मजे में अपने दोनों पैर दोनों दरारों पर रखे जा सकते हैं; परंतु कुछ मील जाकर उस पठार पर से दोनों के भयंकर प्रपात हैं। अमरकंटक पर कुछ पेड़ ऐसे मिले, जिनके पत्तों से जून के महीने में रात्रि के समय बारीक फुहार झरती थी। वहीं मलिनियाँ नाम की एक बेल देखी, जिसमें लाल-लाल छोटे-छोटे फल लगे थे। हम लोगों ने फल चखे, स्वादिष्ट लगे। ग्रीष्म ऋतु में बघेलखंड के अनेक किसान अपने ढोर अमरकंटक के पठार पर चराने के लिए ले आते हैं।

पठार प्रकृत्ति के सौंदर्य का कोष है। उन दिनों जंगल में फूलों से लदे जूही के पेड़ मैंने विंध्यखंड के इसी स्थान में देखे। घूमते-घूमते एक स्थल पर पहुँचे, जिसको ‘सूमपानी’ कहते थे। सूमपानी शायद इसलिए कि पानी पहाड़ में से थोड़ा-थोड़ा करके रिसता था। इस पानी के आगे पहाड़ की एक घूम थी और मार्ग सँकरा। नीचे बड़ा भारी खड्ड। हम लोग घूम के इस सिरे पर थे, दूसरे सिरे पर कोमल कंठ निःसृत एक सामूहिक गान सुनाई पड़ा। ऐसे घने बीहड़ जंगल में यह सुरीला गान कहाँ से आया? थोड़ा आगे बढ़े तो जंगल की कुछ स्त्रियाँ और कन्याएँ रंग-बिरंगे फूलों से अपने केश सजाए, डलियाँ बगल में दाबे, फटे कपडे पहने आ रही थीं। हम लोगों को देखकर वे संकोच में मुसकाईं और गाना बंद कर दिया। हम लोग आगे बढ़ गए। मेरे मन में एक टीस उठी- हमारे देश की सुंदरता और संस्कृति ऐसी दरिद्रता में सनी हुई है।

जब पठार पर पहुँचकर नर्मदा के प्रपात को देखने गए, ऊपर की ओर बगल में एक छोटा सा बंगला देखा। उसमें शायद कोई संन्यासी या प्रवासी रहते थे। संन्यासी का अनुमान इसलिए करता हूँ कि उसमें से वनकन्या या देवकन्या के समान सौंदर्यवाली एक युवती निकली, जो गेरुए वस्त्र धारण किए हुए थी और चौड़े मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड लगाए हुए थी। यदि जीवन रोमांस है – मुझे तो बहुलता के साथ मिला है तो उस कुटी में अवश्य था।

प्रपात के नीचे हम लोग नहाने को उतरे। स्नान से निवृत्त हुए थे कि समाचार देनेवाले ने सूचना दी ‘नायरा ने गायरा किया है।’ जेबों में गुड़ और भुने हुए चने डाले और रास्ते में खाते-पीते, पहाड़ के उतार-चढ़ाव को नापते हुए सूर्यास्त के पहले पाँच मील की दूरी तय करके गायरे के पास पहुँच गए। एक खड्ड के ऊपर बड़ा पेड़ था। उसपर कलमुँहे बंदर बहुत चीं-चिख कर रहे थे। जरूर शेर वहीं कहीं छिपा होगा, हम लोगों ने निष्कर्ष निकाला। पास ही एक मारे गए भैंसे का गायरा पड़ा था।

शेर जानवर की गरदन ऊपर से पकड़ता है और तेंदुआ नीचे से। भैंसे की गरदन पर ऊपर से दाढ़ों की फाँस पड़ी थी। निश्चय ही उसको शेर ने मारा था।

परंतु मचान बनाने में इतना हो हल्ला हुआ की शेर नहीं आया। रात भर आँखें गड़ाए रहे, लेकिन सिवाय एक रीछ के और मचान के पास कोई जानवर नहीं निकला।

शेर के लिए मैंने होशंगाबाद के भी कुछ जंगलों को छाना है। जंगलों की विशालता और महानता तो देखने को मिली, परंतु शेर नहीं मिला। एक स्थान पर गायरे की खबर पाकर गए। शेर ने गाय मार डाली थी। एक ऊँची मचान बनाई। चारों ओर से उसको ढाँका। सूर्यास्त के पहले ही मचान पर आसन जमा लिया। परंतु ठीक समय न जाने कहीं से असंख्य चींटे आ गए। आफत हो गई। बड़ी कठिनाई के साथ उनसे पार पा रहे थे कि पगडंडी पर शेरनी आती हुई दिखलाई दी। मंडला जिले में जो शेर देखा था उससे छोटी थी; परंतु उससे कहीं अधिक लचीली और फुरतीली। मैं चींटा युद्ध में व्यस्त था। मचान थोड़ी-थोड़ी हिल रही थी। शेरनी ने देख लिया, वह तुरंत चल दी। एक बार अपने जिले की हद से जरा हटकर हम लोग शिकार खेलने के लिए गए। संध्या के समय ठीहे के लिए जा रहे थे कि बगल की छोटी सी झाड़ी में शेर दिखलाई पड़ा। गोल बाँधकर हम लोग उसके पीछे पड़ गए। भाग्य की बात कि वह हम लोगों से अधिक बुद्धिमान था, वह भाग गया और हम लोग अपने सिर चिथवाने से बच गए।

ठीहे के लिए आगे बढ़े। बादल घिर आए और इतनी जोर का पानी बरसा कि शिकार-विकार सब भूल गए। कपड़े, बिस्तर, हथियार – सब बिलकुल जलमग्न हो गए। जब ठौर पर पहुँचे, घंटों कपड़ों के सुखाने में लग गए। दो बजे रात को कुछ भोजन मिला और तीन बजे थोड़ी सी नींद। सवेरे एक गप्पी ने शिकार के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखलाए। कमबख्ती के मारे ऊँट चढ़े कुत्ते काटते हैं। दो दिन पहाड़ों में मारे-मारे फिरे, भूखे-प्यासे, कुछ भी न मिला। मिला क्या, दिखा तक नहीं। परंतु मसखरे साथी संग में थे, इसलिए भूख-प्यास, भटक और वह कठोर वर्षा के भी नहीं अखरी। जब लौटकर झाँसी आया तब मालूम हुआ श्री बद्रीनाथ भट्ट आए हुए हैं। भट्ट जी पुराने मित्र थे। उन दिनों अस्वस्थ थे। जलवायु परिवर्तन के लिए आए थे। झाँसी से दो मील दूर मैंने एक कृषि फॉर्म बनाया था और एक मकान खड़ा कर लिया था। एकांत स्थान और जलवायु अच्छा। भट्ट जी वहीं ठहर गए।

मुझसे बोले, ‘लोग कहते हैं कि हिंदी के लेखक होकर आप शिकार खेलते हैं।’

मैंने कहा, ‘लोगों का आरोप ठीक ही होगा, क्योंकि हिंदी के लेखक सिवाय धर्म और नीति के और किसी विषय पर लिखते ही कहाँ हैं!’

भट्ट जी विकट दुःख दर्द में भी हँसने हँसान में सचेष्ट रहते थे।

उन्होंने कहा, ‘देखिए, हिंदी का लेखक उनको कहना चाहिए, जो सदा सिर झुकाकर चले, इधर-उधर कुछ न देखे। और बाजार में जब कोई सौदा लेने जाय तब चार पैसे की चीज के चार आने देकर घर आवे।’

मैंने भट्ट जी को इस बार की अपनी शिकार यात्रा का विवरण सुनाया। उसमें मनोरंजन के लिए कोई सामाग्री न थी, केवल पैर तोड़नेवाली यात्रा के क्रम थए।

उस दिन की कठोर वर्षा के दुःख को तो मैं जल्दी भूल गया, परंतु उससे लड़ने में जो प्रयत्न किया था, वह सदा याद रहा।


17

जंगली कुत्ते का मैंने शिकार तो नहीं किया है, परंतु उसको देखा है। जिन्होंने इसके कृत्यों को देखा है वे इस छोटे से जानवर के नाम पर दाँतों तले उँगली दबाते हैं। रंग इसका गहरा बादामी होता है, इसलिए शायद इसको ‘सुना कुत्ता’ कहते हैं।

अकेला-दुकेला सुना कुत्ता कुछ नहीं कर सकता; परंतु यह चालीस पचास से भी अधिक संख्या के झुंड में रहता है। और जानवर तो रात में शिकार खेलते हैं, यह दिन में ही बंटाढार करता है। जिस जंगल में सुना कुत्तों का झुंड पहुँच जाता है। उस जंगल के जानवरों का या तो सर्वनाश हो जाता है या वे ठौर छोड़कर दूर जंगलों में चले जाते हैं। यहाँ तक कि शेर भी उस जंगल को छोड़कर अन्यत्र चल खड़ा होता है। जब सेर के लिए खाने को जंगल में कुछ नहीं रहता तब उसको विवश होकर निर्वासन स्वीकार करना पड़ता है। केवल भोजन की अप्राप्यता ही शेर के कष्ट का कारण नहीं है, सुना कुत्तों का झुंड शेर को घेरकर मार भी डालता है। इसलिए शेर इस शैतानी झुंड से बहुत डरता है।

अन्य जानवरों की तरह सुना कुत्तों के झुंड का भी अगुआ होता है। इनमें जासूस, हरावल नायक, पहलेवाले इत्यादि सभी होते हैं। सुना कुत्ते मनुष्य से भी नहीं डरते; परंतु वे मनुष्य पर वार तब करते हैं जब उनको जानवर खाने को नहीं मिलते या जब उनके पास एक दूसरे को खा जाने का सुभीता नहीं रहता।

इनका जासूस स्काउट भोज्य पदार्थ की खबर देता है। सारा झुंड अंगड़ाई लेकर खड़ा हो जाता है। फुरेरू ली, धरती खोदकर नाखून तेज किए, जबड़े समेट कर दाँत पीसे और सबके सब चल दिए।

परंतु ये जानवर पर अंधाधुंध धावा नहीं बोलते। इसकी योजना किसी भी चतुर सेनापति की दक्षता को चुनौती देनेवाली होती है।

पहले इनका जासूस साँभर, चीतल, रोज, गुरायँ इत्यादि जानवरों के झुंड को दूर से दिखला देता है, फिर मुखिया जासूस को साथ लेकर चारों ओर चक्कर काटकर मार्के के स्थान देखता है। इसके बाद मुखिया अपने सारे दल को टुकड़ियों में बाँटकर मोरचाबंदी करता है। मोरचे चारों ओर से बाँध लिए जाते हैं। महत्व का कोई भी स्थान संभावना के लिए नहीं छोड़ा जाता।

इतना कर लेने के उपरांत मुखिया कूका देकर मानो आक्रमण करने का बिगुल बजाता है।

घिरा हुआ जानवर चौंककर इधर-उधर देखता है। दिखलाई कुछ नहीं पड़ता। कूके सुनाई पड़ते हैं। घेरा संकीर्ण होता चला जाता है। जैसे ही जानवरों ने निकल भागने के लिए उछल-कूद की कि सुना कुत्तों का एक दल आ चिपटा; बाकी सेना भी आई और कुछ क्षणों में ही जानवर साफ।

सुना कुत्ते शेर को भी घेरकर, सताकर और थकाकर मार डालते हैं। शेर को ये दिन-रात चैन नहीं लेने देते। नोचते-काटते रहते हैं। वह खिसिया-खिसियाकर इनपर झपटता है; पर ये हाथ नहीं आते। अंत में थका-माँदा और भूखा प्यासा शेर मारा जाता है और ये उसको चट कर जाते हैं।

इसके शिकार के लिए काफी सावधानी की जरूरत है। काँटों की घनी बिरवाई करके देखने और बंदूक चलान के लिए उसमें कई ओर छेद कर लिए जाते हैं। शिकारी महुआ, आम या बाँस के पत्ते की कोमल कोंपल क ओठों में दबाकर साँभर, चीतल के त्रस्त बच्चे की रुलाई या पुकार का अनुकरण करता है। उस शब्द पर कूके लगाते हुए और घेरा डालते सुना कुत्ते आ जाते हैं। पास आते तुरंत ही छर्रे के कारतूस चलाने की आवश्यकता है। जैसे ही एक-दो मरे या घायल हुए कि बाकी उनपर टूट पड़ते हैं और खाने में संलग्न हो जाते हैं। उसी समय झुंड पर लगातार छर्रे की वर्षा करनी अनिवार्य है। जब झुंड इस छिपी बला से अनपी संख्या को काफी घटा हुआ देखता है तब भागता है। ऐसी परिस्थिति में शिकारी सुरक्षित है।

सुना कुत्ते के नाश के लिए विविध प्रांतों में विविध प्रकार के पुरस्कार नियुक्त हैं। वैसे रक्षित जंगलों में बिना अनुमति के शिकार नहीं खेला जा सकता, परंतु सुना कुत्तों को मारने के लिए कोई शिकारी रक्षित वन में घुस सकता है और उनको मारकर पुरस्कार पा सकता है।

सुना कुत्ते की भूख मानो एक दहकता हुआ अग्निकुंड है। खाता चला जाएगा और फिर भी अतृप्त रहेगा। इसकी भूख की तुलना भेड़िए की भूख से की जा सकती है। परंतु न तो उसका झुंड इतना बड़ा होता है और न इतना भयानक।


18

भेड़िया आबादी के निकट के प्रत्येक जंगल में पाया जाता है। यह जोड़ी से तो रहता ही है, इसके झुंड भी देखे गए हैं। मैंने आठ-आठ, दस-दस तक का झुंड देखा है।

भेड़िया बहुत चालाक होता है। भेड़-बकरियों और बच्छे-बच्छियों का तो यह शत्रु होता ही है, मनुष्य के बच्चों को भी उठा ले जाता है। किसान स्त्रियाँ खेतों में काम करने के समय झोंपड़ों में बच्चों को छोड़ जाती हैं। भेड़िया मौका पाकर उनको उठा ले जाता है। जब वे साथ में बच्चों को डलियों में रखकर ले जाती हैं और मेड़ पर, पेड़ के नीचे बच्चों को छोड़ जाती हैं तब लौटने पर डलियों को खाली पाती हैं। मालूम हो जाता है कि भेड़िया उठा ले गया।

यह गड़रिया के छप्पर फाड़कर भेड़-बकरियों को दाब ले जाता है। इतना ही होता तो भी कोई बात थी, परंतु दस-पाँच को तो वहीं मारकर डाल जाता है। मैंने झाँसी के पास के ही एक गाँव में कुछ समय हा तब देखा था।

भेड़-बकरियों के चरते हुए बगर में से एकाध का मुँह में दाबकर उठा ले जाना साधरण बात है; परंतु कभी-कभी दो भेड़िए एक बकरी को कान पकड़कर भगा ले जाते हैं। एक कान एक भेड़िया मुँह में दाबता है और दूसरे को दूसरा। बकरी बेचारी गुमसुम घिसटती हुई चली जाती है।

भेड़िया खिलाड़ी जानवर है। कभी-कभी मनुष्य के बच्चे को पाल भी लेता है।

भेड़िये का पाला हुआ एक बच्चा मैंने स्वयं देखा है। वह भेड़िए के साथ ओरछा के जंगल में कोहनियों के बल फिर रहा था। एक ताँगेवाले को मिला। भेड़िये को ताँगेवाले ने पत्थरों की मार से भगा दिया और बच्चे को पकड़ लिया। ताँगेवाला इस बच्चे को ताँगे पर बिठलाकर घुमाता रहता था। बच्चा कच्चा गोश्त खाता था। न तो वह किसी प्रकार की मानव भाषा बोल सकता था और न समझ सकता था। इस बच्चे को पकड़े हुए ताँगेवाले को थोड़े ही दिन हुए थे कि अकस्मात् यह ताँगा मुझको बैठन के लिए मिल गया। वह बच्चा ताँगे में बैठा था। बिलकुल नंग-धडंग। लगभग सात-आठ वर्ष का होगा। जाड़े के दिन थे। मैंने ताँगेवाले को डाँटा, ‘बच्चे को ऐसा उघाड़ा क्यो लिए फिरते हो? ठंड लग जाएगी, मर जाएगा।’

ताँगेवाले ने उत्तर दिया, ‘यह कपड़ा पहनता ही नहीं। एक कुरता पहनाया तो इसने दाँतों और हाथों से फाड़-फूड़कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।’

फिर उसने भेड़िये से बच्चे को छुटा लाने का ब्योरेवार वर्णन सुनाया।

रात थी। मैंने ताँगे को सड़क लैंप की रोशनी के निकट खड़ा करवाया और बच्चे को बारीकी के साथ देखा। बच्चे को यह अवलोकन पसंद नहीं आया। उसने अपने छोटे-छोटे सुंदर दाँत मुझको दिखलाए और आश्वासन दे का प्रयत्न किया कि यदि अवलोकन आगे बढ़ा तो काट खाऊँगा।

उन्हीं दिनों मेरे वर्ग के कुछ लोगों ने झाँसी में एक अनाथालय खोला था। सोचा, इसको अनाथालय में रख दूँ। ताँगेवाला तो उस बच्चे से पिंड छुड़ाना ही चाहता था, मैंन बच्चे को अनाथालय में रख दिया। मैं हफ्ते में कई बार उसको देखने के लिए जाता था। उस बच्चे को अँधेरी और मैली-कुचैली जगह बहुत प्रिय थी। उसको मिट्टी में पड़े रहना और पलोटें लगाना बहुत पसंद था। कपड़े पहनना और ओढ़ना तो उसको बहुत कठिनाई से सिखला पाया। उसको कोहनी और घुटने के बल चलना बहुत अच्छा लगता था। अकेले में किलकारियाँ मारता था। अनाथालय के अन्य बालकों के सामने चीख उठता था।

कई वर्षों तक वह भाषा नहीं सीख सका। अनाथालय में एक बैंड था। बैंड की ध्वनियाँ उसको अच्छी लगती थीं। वह उनको ध्यानपूर्वक सुनता था, प्रसन्न होता था और कभी-कभी किसी-किसी ध्वनि की नकल भी कर उठता था।

गंदा इतना रहता था कि कोई भी अन्य बालक उसके पास खड़ा होना तक पसंद नहीं करता था।

पाँच-छह साल बाद उसको कुछ बोलना आया। इतने दिनों में वह कपड़े भी पहनने लगा था।

पता नहीं वह किस दुःखी माता-पिता का बालक था।

एक भेड़िए की चालाकी मैंने अपनी आँखों से देखी है।

एक बार बैलगाड़ी से बाहर गया। लौटते समय संध्या हो गई। संध्या के पहले मैं गाड़ी से उतर पड़ा और गाड़ी के पीछे लगभग दो फलाँग पर रह गया। देखा कि चलते-चलते गाड़ी एक पेड़ के पास ठिठक गई। आस पास खुले हुए खेत थे। न तो कोई डाँग बीहड़ और न अन्य पेड़। सड़क के किनारे केवल एक पेड़ था। पास पहुँचा तो उस पेड़ के नीचे एक भेड़िया पड़ा है और गाड़ीवान तथा एक ग्रामीण उसके पास खड़े हैं। उन्होंने भेड़िए पर एक पत्थर फेंका था। वे समझते थे कि भेड़िया मर गया।

जब गाड़ी पेड़ के पास पहुँची थी, वह छिपने का यत्न कर रहा था। गाड़ीवान गाड़ी खड़ी करके उतरा। एक पत्थर उठाकर मारा और उसपर दौड़ पड़ा। भेड़िया गिर पड़ा और लंबायमान हो गया।

उन लोगों ने भेड़िये को उठाकर गाड़ी पर रख लिया और गाड़ी बढ़ाने को हुए। मैं टहलते हुए चलना चाहता था, इसलिए गाड़ी के पीछे था।

मुझको विश्वास नहीं था कि भेड़िया मर गया। जब उसको गाड़ी पर रखा, उसकी साँस नहीं चल रही थी। परंतु मैंने देखा, उसने अपनी आँखें खोलीं और मुझको देखते ही तुरंत झपकी सी ले ली।

मैंने गाड़ीवान से तुरंत उसको नीचे डाल देने के लिए कहा। नीचे डालते ही उसने फिर साँस साधी। मैं बंदूक तैयार लिए उसके सिर पर खड़ा था।

भेड़िये ने थोड़ी देर में साँस ली और आँखें खोलकर झटपट बंद कर लीं। वह भाग निकलने का अवसर ताक रहा था। वह पत्थर को चोट खाकर भाग न सका था। मरने का मिस करके पेड़ के नीचे पड़ गया था। गाड़ी पर पहुँचने और गाड़ी से नीचे डाले जान के समय भी वह उचाट लेकर भागने का बल प्रतीत नहीं कर रहा था, इसलिए मरने की दशा का बहाना करके चुप्पी साध गया। सोचता होगा कि अकेला रह जाऊँ तो फिर अपने झुंड में जा मिलूँगा।

जैसे ही उसने दुबारा आँखें खोलीं, मैंने उसको समाप्त कर दिया और गाड़ीवान से कहा, ‘अब ले जाओ और इनाम के दस रुपये कमा लो।’

गाड़ीवान दूसरे दिन भेड़िये की खाल कचहरी में ले गया। दस रुपये इनाम के गाँठ में किए और एक टोपीदार बंदूक का लाइसेंस भी ले आया।


19

भेड़िये को हाँक-हूँककर गड़रिए की स्त्री प्यासी हो आई। भेड़-बकरियों को लेकर नदी किनारे पहुँची। पानी के पास गई। चुल्लुओं से हाथ मुँह धोया। थोड़ी दूर पर एक मगर पानी के ऊपर उतरा रहा था। वह मगर के स्वभाव को नहीं जानती थी। उनसे पानी पिया। गरमियों के दिन थे, नहाने की इच्छा हुई। पानी में उतर पड़ी। कुछ ही क्षण ठहरी थी कि मगर पानी के ऊपर आया कि सपाटा मारकर उसको पानी के नीचे ले गया। जब उसने समझ लिया कि मर गई, पत्थरों की खोख या झाऊ की झाड़ी में ले गया और उसको समूचा खा गया।

बड़ी नदियों के किनारे ये घटनाएँ प्रायः होती रहती हैं। कहार लोग अपने जाल में छोटे मगरों को तो फाँस लेते हैं, परंतु बड़े मगर और नाके इन जालों में नहीं आते।

मगर और नाके में अंतर है। मगर चौड़ा और ऊँचा होना है, नाका लंबा। बीस फीट से अधिक लंबाई के नाके मैंने देखे हैं।

मगर अधिक घातक होता है। गाय-बैलों तक को पानी में दबोच लेता है और डुबोकर मार डालता है। भेड़, बकरी और कुत्ते तो उसके लिए कुछ भी नहीं हैं।

एक बार मैं नदी किनारे प्रातः काल हाथ-मुँह धो रहा था। जल के पास पहुँचने के पहले एक मगर वहीं पड़ा हुआ था; परंतु मैंने देख नहीं पाया। हाथ-मुँह धोते समय मुझको पास ही तली में कुछ सरकता हुआ दिखलाई पड़ा। मैं तुरंत उचट कर पीछे हटा। मगर भी लौट गया। मैं पास ही एक पत्थर की आड़ में बैठ गया।

सवेरे के समय मगर जल के पास रेत में लेटने और सोने के लिए आता है। जाड़ों में तो वह देर तक धूप लेता रहता है।

घंटे-डेढ़ घंटे की प्रतीक्षा के उपरांत मगर रेत पर आया और चने के साथ लेट गया। मुझको उसकी खुली आँखें दिखलाई पड़ रही थीं। जब उसने आँखें मूँद लीं, यह नहीं अनुमान होता था कि उसके आँखें हैं भी या नहीं।

धीरे से राइफल सँभाली, गरदन का निशाना लिया और यहाँ लिबलिबी दबी, वहाँ मगर केवल जरा सा हिला और बहुत शीघ्र समाप्त हो गया।

मर जाने पर भी उसकी देह में इतनी गरमी रहती है कि थोड़ी देर तक स्पंदन करता रहता है।

जिस स्थान पर गड़रिए की स्त्री को मगर खा गया था, मुझको उस स्थान की चिंता हुई। कई बार घंटों ताक लगाकर बैठा, परंतु मगर की श्रवण शक्ति इतनी प्रबल होती है कि जरा सी आहट पर वह पानी में खिसक जाता था। दिन-दिन भर का श्रम व्यर्थ जाता और मुझको लौटना पड़ता।

एक बार एक मित्र ने मगर के स्वभाव को पास से जाँचने की इच्छा प्रकट की और मेरे साथ बैठने का हठ किया। हम लोग पानी के पास आड़ में जा बैठे। दो घंटे के बाद मगर आकर रेत पर बैठा। मेरे मित्र ने आतुरता के साथ कहा –

‘वह आ गया मगर’

इधर मित्र का वाक्य समाप्त नहीं हो पाया था, उधर मगर पानी में गायब हो गया। वह बहुत धीमे बोले थे, परंतु मगर का कान बहुत तेज होता है।

परंतु एक दिन मगर झंझट में पड़ ही गया। मैं पथरीले किनारे पर दबे-दबे, पोले पैरों जा रहा था। एक पत्थर की ढाल पर पत्थर के रंग का सा ही कुछ दिखलाई पड़ा। मैंने जूते उतारकर एक जगह रख दिए। फिर बहुत धीरे-धीरे उस पत्थर के रंग जैसे की ओर बढ़ा। मेरा अनुमान सही निकला। वह एक भयानक मगर था।

जब मैं पंद्रह फीट के अंतर पर पहुँच गया तब उसको और अच्छी तरह देखा। बहुत ही कुरूप और भदरंग था। मैंने सिर का निशाना ताककर गोली छोड़ी। मगर पानी के बिलकुल पास था। वह जरा सा हिलकर तुरंत वहीं खत्म हो गया।

दूसरे महीने मैं अपने उन्हीं मित्रों के साथ इसी किनारे आया। रात को हम लोग अपने-अपने गड्ढे में जा बैठे। तेंदुए की खबर लगी थी। मैंने उन मित्र को सावधानी के साथ बैठने के लिए कह दिया था और तेंदुए की भयानकता के संबंध में कुछ बातें बतला दी थीं।

मेरे गड्ढे के सामने से तेंदुआ तो नहीं आया, एक भारी-भरकम विलक्षण जानवर निकला। मंद चाँदनी रात थी; परंतु वह गड्ढे के बिलकुल पास से निकला था, इसलिए पहचानने में की बाधा नहीं हुई। वह बड़ा मगर था और नदी के एक दह से दूसरे दह को कंकडों, पत्थरों और रेत में होकर जा रहा था। मेरे हाथ में उस समय 12 बोर की दुनाली बंदूक थी। नाल में टुकड़ेदार गोली (Split Bullet) वाला कारतूस था। चलाया, परंतु मगर तेजी के साथ आँखों से ओझल होकर पानी में धँस गया। सवेरे मैंने उस स्थल का निरीक्षण किया जहाँ मगर पर गोली चलाई थी, तब रेत के ऊपर गोली के टुकड़े पड़े मिले।

वास्तव में, मगर पर इस प्रकार की गोली का कोई प्रभाव नहीं होता। सिर या गरदन पर गोली पड़े तो और बात है, वैसे पीठ पर तो साधारण गोलियाँ खुजली का ही काम करती होंगी।

मैं अपने उन मित्र के गड्ढे पर गया। वे गड्ढे के पीछेवाले पेड़ पर चढ़े थे। वैसे उनमें बहुत वीरता थी; परंतु शिकार का अनुभव न होने के कारण उन्होंने पेड़ को ही आश्रय बनाना ठीक समझा था।

जब मैं पेड़ के नीचे पहुँचा, उन्होंने अपनी दुनाली बंदूक नाल की तरफ से मुझको दी। दोनों घोड़े चढ़े हुए थे और कारतूस तो नाल में थे ही। मैंने अपने प्राणों की कुशल मनाते हुए नाल को सिर से ऊँचा करके पकड़ा, साधकर घोड़े गिराए और उनसे कहा, ‘इस प्रकार घोड़े चढ़ी हुई बंदूक को नाल की तरफ से किसी को नहीं देना चाहिए।’

वे हँसकर बोले, ‘क्या परवाह!’

दूसरे दिन राइफल से एक मगर मारकर मैंने उसपर दुनाली की गोली के प्रभाव की परीक्षा करनी चाही। पक्की गोली उसकी पीठ पर चलाई। गोली उचटकर चली गई, केवल एक खरोंच छोड़ गई। उस रात मगर पर टुकड़ेदार गोली ने क्यों कोई काम नहीं कर पाया था, यह बात अब समझ में आ गई।

मगर का सिर, गरदन और पेट मार के स्थल हैं। उसकी पीठ के खपटे इतने प्रबल होते हैं कि साधारण हथियार काम नहीं कर सकते। राइफल की नुकीली गोली निस्संदेह उसपर यथेष्ठ काम करती है।

बेतवा का पाट कहीं-कहीं चार फर्लांग चौड़ा है। इस नदी में कई स्थानों पर टापू हैं। एक बार मैं दो मित्रों सहित नदी के उस पार भ्रमण कर रहा था। नदी में एक टापू उस ढी से दो फर्लांग पर था। टापू के नीचे थोड़ी सी रेत थी, बाकी पाट में पानी भरा हुआ था। हम लोग उस पार की ढी पर खड़े-खड़े ऊँचे स्वर में बातचीत कर रहे थे। टापू के नीचे एक बड़ा लंबा-चौड़ा मगर रेत पर पड़ा हुआ था। उसको हम लोगों की ओर से संकट की कोई शंका नहीं हो सकती थी, क्योंकि हम लोग बहुत दूर थे।

मेरे मित्रों ने प्रस्ताव किया – ‘मगर पर राइफल चलाओ, देखें, गोली लगती है या नहीं।’ मैंने टाला-टूली की। मुफ्त में एक कारतूस क्यों खोता। जानता था कि निशाना न लगेगा। वे लोग न माने। मैंने एक पत्थर पर राइफल रखकर निशाना साधा और ‘धाँय’ कर दी।

अकस्मात्, गोली मगर की गरदन पर पड़ी और वह हिलकर रह गया। मगर की गरदन का लक्ष्य कुछ ही इंच व्यास का होता है; परंतु उस दिन निशाने की जगह पर बैठना एक संयोग मात्र था; क्योंकि राइफल से मैंने बहुत निकट के लक्ष्य चुकाए हैं।

एक मगर जब दूसरे से लड़ता है तब नदी में तुमुल नाद होता है। मगरों की उछालों के मारे पानी फट-फटकर उत्ताल तरंगों में परिवर्तित हो जाता है और तरंगों पर झाग आ जाते हैं। मगर कभी रेल की सी सीटी बजाकर और कभी तेंदुए जैसी हुंकार भरकर एक दूसरे से टकराते, लिपटते और गुँथते हैं। डूबने का उनको कुछ डर ही नहीं, क्योंकि वे घंटों पानी के भीतर रह सकते हैं। जब एक थक जाता है तब उसका प्रबलतर प्रतिद्वंद्वी नीचे ले जाता है, फिर पकड़कर पानी के बाहर लाता है। अपने नाखूनी पंजों और विकट दाँतों से उसका पेट फाड़ डालता है।

परंतु यही मगर जलमानुस से बहुत घबराता है। जलमानुस पानी का सुना कुत्ता है। नदी के जिस बाग में पहुँच जाता है उसकी मछली, कछुए, मगर सब समाप्त कर देता है या भगा देता है।

जलमानुस होता छोटा सा ही जानवर है। पूँछ समते लगभग चार फीट लंबा और ऊँचा छोटे कुत्ते के बराबर। बहुत चिकना, बड़ा गाँठ-गँठीला और नाखूनी पंजोंवाला। वह बड़ी तेजी के साथ पानी में डुबकी लगाता है और उबरता है। झुंड में रहता है।

जब मगर से यह लड़ता है, मगर फुफकारी मारकर इसके ऊपर आता है; परंतु यह उचाट लेकर उसके सिर पर सवार हो जाता है और गरदन में अपना नाखूनी शिकंजा कसता है। मगर पानी के भीतर जाता है, परंतु जलमानुस को पानी में डूबने का तो कुछ डर ही नहीं है, मजे में चला जाता है और नीचे भी मगर के गले पर अपे पैने नाखूनों को गपाता है। मगर ऊपर आता है; परंतु वहाँ भी निस्तार नहीं, क्योंकि दूसरे जलमानुस उसके पेट के नीचे पहुँच जाते हैं और नाखून ठोंकने की उसी क्रिया को पेट पर चालू कर देते हैं। मगर रेत पर भागकर भी त्राण नहीं पाता; क्योंकि जलमानुस बंदरों की तरह भूमि पर चलते-फिरते उछलते-कूदते हैं। जलमानुस पेड़ पर भी चढ़ जाते हैं।

एक बार जब अपनी आँखों एक मगर को गाय पर सवार होते देखा, तब जलमानुस की बहुत याद आई। यदि वह इस पानी में होता तो मगर साहस न कर पाता।

दिन की बात थी। मैं 12 बोर की दुनाली लिए पानी से काफी दूर बैठा था। एक गाय किनारे पानी पीने आई। उसने पानी में मुँह डाला ही था कि मगर ने अपनी भयंकर पूँछ की पछाड़ गाय की देह पर दी। गाय रेत में जा गिरी और मगर उससे जा लिपटा। अभी तक सुना था कि मगर पानी में दबे-दबे आकर, पैर पकड़कर घसीट ले जाता है; परंतु यह व्यापार विलक्षण था। मैं तुरंत हल्ला करता हुआ दौड़ा, क्योंकि गोली नहीं चला सकता था। एक तो उसका प्रभाव मगर के ऊपर नहीं के बराबर होता, दूसरे गाय पर गोली पड़ जाने का भय था। मगर गाय को छोड़कर भाग गया। परंतु मगर की पूँछ के वार के कारण गाय इतनी घायल हो गई थी कि मुश्किल से नदी की ढी पर चढ़ पाई।

चिरगाँव से चार मील ‘भरतपुरा’ नाम का गाँव झाँसी जिले में है। बेतवा इस गाँव से लगभग एक मील की दूरी पर बहती है। उस पार के पहाड़ और जंगल बडे सुहावने दिखते हैं। कुंडार का किला इस गाँव से आठ-नौ मील दूर है। भरतपुरा के तैराक बरसात में आई हुई नदी को तो पार कर ही जाते हैं। वे आई हुई नदी में तैरते हुए कुल्हाड़ी से मगर का सामना भी करते हैं।

भरतपुरवालों की गाय-भैंसे जब उस पार जंगल में रह जाती हैं तब वे उनको लेने के लिए जाते हैं। उधर से ढोरों को लाते समय कभी कभी मगर से मुठभेड़ हो जाती है। मगर ढोर पर आ जाता है और ये एक हाथ से ढोर की पूँछ पकड़े हुए, दूसरे में कुल्हाड़ी लिए ललकारते हैं। और अपने ढोरों को बचा ले आते हैं।

मगर फागुन-चैत में अंडे देता है। अंडे इसके बड़े-बड़े होते हैं। यह उनको रेत में गहरे गाड़ता है। साधारण तौर पर यह मछलियाँ खाता है। मुँह खोल लिया, पानी फुफकारता रहा और मछलियों की निगलता रहा।


20

जंगल में शेर और तेंदुए से भी अधिक डरावने कुछ जंतु हैं – साँप, बिच्छू और पागल सियार।

अजगर का तो कुछ डर नहीं है, क्योंकि वह काटने के लिए आक्रमण नहीं करता है, भक्षण के लिए पास आता है; और जहाँ तक मैंने देखा और सुना है, मनुष्य से डरता है।

हिरन तक को निगल जानेवाले अजगर देखे गए हैं। चिरगाँव से पाँच मील दूर बेतवा किनारे एक अजगर ने हिरन को अपनी पूँछ की फटकार से पटका और लिपटकर उसके शरीर को चरमरा डाला; फिर उसको निगलना शुरू किया। पास ही किसानों के खेत थे। वे रखवाली कर रहे थे। रात का समय था। हिरन की पुकार सुनकर लाठी और कुल्हाड़ी लेकर दौड़े। उन्होंने समझा कि तेंदुए या भेड़िये ने हिरन को दबाया है। जब पास पहुँचे तब देखा, अजगर हिरन को दबाए हुए है और निगले जा रहा है।

उन्होंने लाठियों और कुल्हाड़ियों से अजगर को मार डाला और हिरन को छुटा लिया। परंतु हिरन भी मर चुका था। उन्होंने हिरन को छील-छीलकर पकाया, खाया। सबके सब बीमार पड़ गए। उनको हफ्तों दस्त लगे थे। परंतु कहा नहीं जा सकता कि अजगर के निगलने के कारण हिरन विषाक्त हो गया था या वे लोग किसी और कारण से बीमार पड़े थे।

काला, गढ़ैंत और उर्दिया साँप भयंकर विषधर हैं। उर्दिया साँप बूँदों और छपकोंदार होता है। देखने में सुंदर, परंतु काटने पर बहुत ही घातक विषवाला। यह काले से काफी बड़ा होता है। काले और गढ़ैंत को सभी जानते हैं। इन सबसे जंगल में भ्रमण करनेवालों, विशेषकर गड्ढों में बैठनेवालों को सावधान रहना चाहिए। अच्छा यह है कि मनुष्यों से डरते हैं; परंतु ये शिकार के गड्ढों में आ सकते हैं और आ जाते हैं। बैठने के पहले एक छोटे से डंडे से आस पास के स्थल को ठोंक-बजा लेने से रक्षा सुलभ हो जाती है।

बिच्छुओं से भी बचने के लिए यह प्रयोग अच्छा है। मैंने जंगलों में छह इंच लंबे तक बिच्छू देखे हैं। रंग काला, जिनको देखकर रोमांच हो आवे।

बरसात के आरंभ में हरे रंग के छोटे साँप दिखलाई पड़ते हैं। सुनते हैं कि ये भी बहुत विषैले होते हैं।

चलने-फिरने के लिए, और शिकार में वैसे भी, टाँगों मे टकोरे चढ़ा लेना बहुत अच्छा है।

साँपों को देखकर छोड़ देना दूसरे मनुष्यों या पालतू जानवरों के साथ घात करने के बराबर है।

पागल सियार भी जंगल की एक काफी बड़ी व्याधि है। पागल सियार के बराबर निर्भीक और ढीठ और कोई जंतु नहीं। इसको तो गाँववाले यथाशक्य, तुरंत ही नष्ट कर डालते हैं; क्योंकि वे उसके संहारकारी परिणाम को जानते हैं। पागल सियार जिस मनुष्य, ढोर तथा कुत्ते को काट खाता है, उसका बचना कठिन हो जाता है। पागल सियार का काटा हुआ मनुष्य यदि समय पर अस्पताली इलाज पा गया तो बच जाता है; परंतु ढोरों की बड़ी मुश्किल पड़ती है, और कुत्ते तो पागल सियार से पाए हुए विष को बाँटते से फिरत हैं।

हमारे यहाँ लोमड़ी का शिकार कोई नहीं करता और न वह खेतो को कोई बड़ा नुकसान ही पहुँचाती है। इसकी बोली रात के सन्नाटे को जब विचलित करती है तब ऐसा लगता है कि वह किसी बड़े जानवर के आने की सूचना दे रही है।


21

जंगलों में जितने भीतर और नगरों से जितनी दूर निकल जाएँ उतना ही रमणीक अनुभव प्राप्त होता है। पुराने नृत्य और गान तो जंगलों के बहुत भीतर ही सुरक्षित मिलते हैं।

अमरकंटक की यात्रा में कोलों और गोंडों का करमा नृत्य देखा। उसके कई प्रकार होते हैं। वे सब बारी-बारी से देखने को मिले।

करमा में स्त्री-पुरुष सब शामिल होते हैं। पुरुषों की एक टोली और स्त्रियों की एक टोली। पुरुष टोली एक कतार में और सामने स्त्रियों की टोली भी पाँत में। गायन और नृत्य ढोलकी के वाद्य पर होता है।

गायन सीधा और सरस होता है। गायन का साहित्य किसी प्रेमकथा या जीवन की किसी अवस्था पर मचलता है। मचल-मचलकर ही वे सब गाते हैं और बड़े मोद के साथ नाचते हैं। स्त्रियाँ घूँघट डाले रहती हैं। हम लोगों के समक्ष वे घूँघट ही डाले थीं। जब वे लोग ‘बाहरवालों’ के सामने न गाते-नाचते होंगे तब शायद घूँघट की आड़ हटा दी जाती हो।

करमा नृत्य में कला और विनोद दोनों हैं। मैंने करमा का अनुकरण शांति निकेतन की एक मंडली में देखा है। करमा स्वास्थ्य और आनंद देनेवाला नृत्य है।

बुंदेलखंड के देहातों में, विशेषकर हमीरपुर जिले के गाँवों में, विवाह के समय स्त्रियों का नृत्य देख है। इस नृत्य में एकरसता होती है। बहुत थकानेवाला और शायद कम विनोद देनेवाला होता है।

देहातों और जंगलों में जो विवाह होते हैं वे वास्तविक उत्सवों का रूप धारण करते हैं।

गोंडों और कोलों में तो विवाह एक बहुत बड़े त्योहार का रूप धारण करता है। इस त्योहार के मनाने में उनको पंडा-पुजारी की बिलकुल जरूरत नहीं पड़ती। गोंडों का सहवर्गी बेगा आता है और भाँवर पड़वा देता है। बेगा अपने को किसी भी ब्राह्मण से कम पवित्र नहीं समझता। और भोजन में चूहे-कौए को भी नहीं छोड़ता।

जब हम लोग ‘नानबीरा’ से लौटे, मार्ग में भूख लगी। साथ में दाल-चावल था, परंतु पकाने के लिए कोई बरतन न था। साथ में एक बेगा था, उससे मिट्टी का बरतन लाने को कहा। वह पास के एक गाँव से तीन-चार मटकियाँ ले आया। एक में हम लोगों ने पानी भरकर रख लिया और दूसरे में खिचड़ी चढ़ा दी।

एक कहावत है – दो मुल्लों में मुरगी हराम। इधर हम लोग थे पाँच-सात। चूल्हा जल रहा था, तो भी उसमें कोई लकड़ी निकाल-निकालकर फिर खोंस रहा है, कोई जलती हुई आग को बुझाकर फिर उसका रहा है, की हंडी में लकड़ी बार-बार डाल रहा है। मतलब यह कि न चूल्हे को चैन और न हंडी को। फल यह हुआ कि एक घंटे की इस कवायद-परेड के बाद हंडी का पानी जल गया और खिचड़ी में से जलाँध आने लगी। हमारे दलनायक ने व्यवस्था दी – ‘उतारो, हंडी को उतारो, खिचड़ी पक गई है।’

हंडी को उतार लिया और चूल्हे को बुझा दिया; क्योंकि हवा चल रही थी, गरमियों के दिन थे और घने जंगल पास लगे थे। डर लगता था कि कहीं जंगल में आग न लग जाए।

खिचड़ी के ठंडे होने के पहले ही आतुरता के साथ महुए इत्यादि के पत्तों की पत्तलें बनाईं। अपनी-अपनी समझ में सुंदर परंतु गोल के सिवाय रेखागणित के किसी भी कोण से होड़ लगानेवाली। पर स्वादिष्ट खिचड़ी के लिए अच्छी आकृतिवाली पत्तलों की अटक ही क्या!

जब खिचड़ी परोसी और मुँह में डाली तब बिलकुल कच्ची। बेगा हम लोगों की झेंप और निराशा पर हँस रहा था। हंडी में काफी खिचड़ी रखी थी। बेगा भूखा था। हम लोगों ने बेगा से कहा कि पानी डालकर, इसको फिर से पकाककर खा लो। उसने बिलकुल नाहीं कर दी। वह हम लोगों का छुआ हुआ पानी तक नहीं पी सकता था इसलिए वह मटके लाया था। उसने एक मटका अलग से भरा। अलग ही अपनी खिचड़ी पकाई औऔर मजे में खा गया।

नगरों में रहनेवाले लोगों का खयाल है कि गाँवों में रहनेवाले लोग अपने बाहर के संसार से अंजान रहते हैं। इससे बढ़कर और कोई भूल नहीं हो सकती।

गाँववालों को अभी तक इतना सताया गया है, उनकी इतनी अहवेलना को गई है कि सिधाई और अज्ञान को उन्होंने अपना आवरण बना लिया है। वे उस आवरण को डाले हुए शत्रु और मित्र, दोनों के समाने एक समान भावना से आते हैं। जब वे समझ लेते हैं कि मित्र के रूप में बाहर से आया मनुष्य उनका वास्तविक मित्र या हितचिंतक है तब वे उस आवरण को हटा देते हैं। उस समय उनका सच्चा स्वरूप दिखलाई पड़ता है। उसकी ठोस बुद्धि, उनका दृढ़ स्वभाव और उनकी तत्परता उस समय पहचानने में आती है।

मैं एक बार एक कंधे पर बंदूक और दूसरे पर अपने थोड़ से बिस्तर लिए जंगल के गड्ढे में बैठने के लिए जा रहा था। गड्ढा दो-ढाई मील की दूरी पर था। मेरे पीछे एक गड़रिया आ रहा था। उसका मार्ग गड्ढे के पास होकर पड़ता था। गड़रिया मुझको पहचानता था। आगे बढ़ा और उसने मेरे बिस्तर अपने कंधे पर टाँगने का अनुरोध किया। मैंने नाहीं की, परंतु उसने बिस्तर छीनकर अपने कंधे पर रख लिया। मैंने सोचा, मैं इसकी क्या सेवा करूँ? मैंने वार्तालाप आरंभ किया। मैंने पूछा, ‘कहो भाई, गाँव में क्या हो रहा है?’

उसने उत्तर दिया, ‘और तो सब ठीक है, पर जमींदार जान खाए जाते हैं।’

‘क्यों? कैसे?’

‘जंगल में भेड़-बकरी नहीं चरने देते। कहते हैं, लगान दो। हम लोगों ने लगान पहले कभी नहीं दिया। हर साल दो कंबल देते चले आए हैं, सो अब भी देने को तैयार हैं; परंतु वे लोग कंबलों के अलावा लगान भी माँगते हैं। हम लोगों ने पहले बेगार कभी नहीं की। अब वे पुलिस और तहसील की बेगार भी कराना चाहते हैं।’

मैंने कहा, ‘लड़ाई का जमाना है, इसलिए पुलिस, तहसील जमींदार सभी की बन पडी है। सबके सब अंधे हो गए हैं और आगा-पीछा न देखकर लालच में अंधाधुंध पड़ गए हैं। तो भी मैं कल आकर तुम्हारे जमींदारों को समझाऊँगा। वे लोग मुझको जानते हैं। मेरे समझाने से मान जाएँगे।’

गड़रिए को आश्वासन मिला। अब वह खुला। उसने अपने अभ्यस्त आवरण को हटाया। बोला, ‘लड़ाई का क्या हाल चाल है?’

मैंने सोचा, इसको क्या बतलाऊँ। जो लोग भूगोल से थोड़ा सा परिचय रखते हैं, वे ही लड़ाई में भाग लेनेवाले देशों का नाम जानते हैं और वे ही लड़ाई के संबंध की कुछ बातें समझ सकते हैं। मैंने गोल-मटोल उत्तर देने की चेष्टा की।

लड़ाई के प्रारंभिक काल की बात थी, जर्मनी और इंग्लैंड की पैंतरेबाजी चल रही थी; परंतु अभी मुठभेड़ नहीं हुई थी।

मैंने कहा, ‘अभी जर्मनी से अँगरेजों की झपटा-झपटी नहीं हुई है। दूसरे देशों में युद्ध हो रहा है। अपने देश से बहुत दूर-दो हजार कोस पर।’

वह मुसकराकर बोला, ‘जर्मनी ने पोलैंड को तो जीत लिया है, अब फ्रांस को रौंदने वाला है।’

मैं इस वाक्य को सुनकर दंग रह गया। जंगलों और पहाड़ों में भेड़-बकरी चरानेवाला गड़रिया पोलैंड और फ्रांस के नाम जानता है, और यह भी जानता है कि जर्मनी ने पोलैंड को जीत लिया है और फ्रांस को रौंदना चाहता है। मैंने कुतूहल के साथ पूछा, ‘रूस देश का नाम सुना है?’

उसने उत्तर दिया, ‘सुना है वहाँ किसानों और मजदूरों की पंचायत का राज है।’

मैंने कहा, ‘अपने देश में भी किसानों और मजदूरों का राज होगा। वह दिन जल्दी आ रहा है।’

गड़रिया बिना किसी बनावट के बोला, ‘पर अपने यहाँ किसान-मजदूर जमींदारों और साहूकारों का खून बहाकर पंचायत नहीं बनाएँगे।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि हम लोग राक्षस नहीं हैं।’

मुझको तुरंत अपने दरिद्र कहलानेवाले, परंतु महा गौरवमय, देश के उस तपस्वी की याद आ गई, जिसको इग्लैंड के एक मानवद्रोही घमंडी ने ‘नंगा फकीर’ कहा था, परंतु जिसको उसके देशवाले ‘महात्मा’ और ‘बापू’ कहते हैं।

बापू की निर्भीक अहिंसा की नींव देश की वह संस्कृति है, जो इस अनपढ़ गड़रिए के भीतर से उन शब्दों में होकर अनायास निकल पड़ी थी।

मैंने पूछा, ‘तुम्हारे गाँव में भी झंडा उठाया गया?’

उसने उत्तर दिया, ‘हाँ-हाँ, तिरंगा झंडा। कई बार उठाया गया और हम लोगों ने कई बार गाया ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’।’

मैं उस दिन गड्ढे में नहीं बैठा। सीधा उसके गाँव में गया। जमींदारों को समझाया। उन्होंने ‘हाँ-हाँ’ तो कर दी और कुछ महीनों गड़रियों को तंग भी नहीं किया; परंतु वह प्रथा, वह प्रणाली ऐसी है कि उनकी हाँ-हाँ बहुत दिनों तक नहीं चली।


22

शिकार के साथ यदि हँसोड़ न हों और चुप भी रहना न जानते हों तो सारी यात्रा किरकिरी हो जाती है। मुझको सौभाग्यवश हँसोड़ या चुप्प साथी बहुधा मिले।

संगीताचार्य आदिल खाँ वह अपने को कभी-कभी ‘परोफेसर’ कहते हैं – काफी हँसोड़ भी हैं। शिकार में दो-एक बार मेरे साथ गए। जंगल में तो उन्होंने नहीं गाया, गाने की धुन में तो उनको तबले-तँबूरे की अटक ही नहीं रहती, परंतु शिकार से लौटने पर उन्होंने तानों की वर्षा कर दी।

जब शिकार के मोरचों पर नहीं होते तब बातें भी काफी करते हैं।

एक बार यात्रा करते हुए लौट रहे थे। गाड़ी के पीछे सामान रखा था, बीच में मेरे जूते रखे हुए थे। उस्ताद लखनऊ संबंधी अपने कुछ अनुभव सुना रहे थे।

कहते जाते थे ‘एक बार मैं लखनऊ की एक रईसी दावत में फँस गया। खानेवालों के सामने सजा-सजाया बढ़िया खाना, पर थोड़ा-थोड़ा ही। इसपर भी इतना तकल्लुफ कि जो देखो, सो परोसनेवाले से कहे – अजी बस, अजी बस। यही पड़ा रह जावेगा, ज्यादा मत परोसो। मैंने सोचा, इनको तकतल्लुफ में भी मात देना पड़ेगा। मैंने ग्रास उठाया, सूँघा और रख दिया, सूँघा और रख दिया। मेरी कार्रवाई को देखकर लखनऊ के एक साहब ने कहा – ‘उस्ताद, आप तो कुछ भी नहीं खा रहे हैं, यह क्या? मैंने जवाब दिया, ‘साहब, मैं तो खुशबू से ही पेट भरनेवालों में हूँ।’ जब दावत समाप्त हो गई, आँतें कुलबुला उठीं। मैंने बहाना लेकर बाजार का रास्ता पकड़ा और एक दूकान पर जाकर अपने बुंदेलखंडी पेट को डाटकर भरा।’

उस्ताद ने हँसते हुए एक दूसरी कहानी छेड़ी – ‘लखनऊ से एक साहब शिकार के सिलसिले में झाँसी आए। विकट बीहड़ जंगल पहुँचे। मुझसे बोले, ‘मियाँ, आपकी बंदूक गोली बरसाती है और हमारा मुँह ही गोले छोड़ देता है।’ मैं जवाब देने के लिए परेशान हो रहा था कि एक जगह साँभर की लेंड़िया का ढेर दिखलाई दिया। मैंने लखनऊवाले मेहमान से कहा, ‘जनाब, जरा उस ढेर को देखिए। हमारे यहाँ के जानवर लोहे की लेंड़ियाँ करते हैं।’ मेहमान मारे पसीने के तर हो गए।’

उस्ताद की गप खत्म हुई थी कि गाड़ी के पीछे की तरफ आँख गई। सब सामान, बिस्तरे-विस्तरे गायब। दुपहरी का समय था, परंतु गपशप में सामान का खिसक जाना मालूम ही न पड़ा। सामान के साथ मेरे जूते भी चल दिए थे। सामान और बिस्तरे उस्ताद के ही थे, इसलिए वे सारी गपशप भूल गए।

बेचारे गाड़ी पर से उतरे। काफी लंबी दौड़धूप की। सामान मार्ग में पड़ा मिल गया। मेरे जूते खो गए।

परंतु कभी-कभी ऐसे साथी भी मिल जाते हैं कि त्राहि-त्राहि करनी पड़ती है।

तंदुए या शेर के लिए जो मचान बाँधी जाय, उसपर अकेले बैठना सबसे अच्छा। कोई साथ में बैठे तो पहली शर्त यह है कि बातचीत बिलकुल न करे और दूसरी यह कि खाँसता न हो।

यदि जरा सी भी आहट हो गई तो चाहे मचान पर कोई दिन-रात बैठा रहे, शेर तो आवेगा नहीं; तेंदुआ शायद दुबारा आ जाए, क्योंकि वह बहुत ढीठ होता है।


23

शेर के संबंध में शिकारियों के अनुभव विविध प्रकार के हैं। सब लोगों का कहना है कि मनुष्यभक्षी शेर के सिवाय सब शेर मनुष्य की आवाज से डरते हैं। जब शेर की हँकाई होती है और ऐसे जंगल की हँकाई प्रायः की जाती है, जिसमें उसने गायरा किया हो- क्योंकि गायरा करके वह आस पास ही कहीं छिप जाता है। तब लगानवालों को पूरी चुप्पी साधकर बैठना पड़ता है। शेर को लगानवालों के पास भेजने के लिए पेड़ पर कुछ लोग बैठ जाते हैं; यदि सेर भटककर उनकी ओर आता है तो वे कंकड़ बजा देते हैं और शेर मुड़कर लगानवालों की ओर चला जाता है।

कुछ लोगों का अनुभव है कि शेर आदमियों के बीच से ढोर को पकड़ ले ताजा है; परंतु ऐसे लोगों का यह भी कहना है कि आदमियों के हल्ला-गुल्ला करने पर शेर डरकर, छोड़कर भाग जाता है।

अनेक शिकार यह कहते हैं कि घायल होने पर ही शेर शेर बनता है; वैसे तो वह डरपोक जानवर है। सदा अपनी रक्षा की चिंता में रहता है।

एक अँगरेज शिकारी ने घायल शेर के रोमांचकारी पराक्रम का वर्णन किया।

अँगरेज और उसकी पत्नी दोनों शिकार खेलने गए। वे निकट मचानों पर पृथक-पृथक बैठे। हँकाई हुई। शेर पहले पुरुषवाले की मचान के पास आया। वह अपनी पत्नी को शिकार खिलाना चाहता था, इसलिए उसने बंदूक नहीं चलाई। शेर उसकी पत्नी की मचान के पास पहुँचा। उसने बंदूक चलाई। शेर घायल हो गया। घायल शेर ने उस स्त्री को देख लिया। शेर मचान पर पहुँचने के लिए पेड़ पर चढ़ा। स्त्री ने बंदूक की गोलियाँ खर्च कर डाली, परंतु शेर न मुड़ा।

उसका पति यह सब देखकर बहुत घबराया। शेर स्त्री के निकट पहुँचता चला जा रहा था। अँगरेज पत्नी को चोट पहुँचने के भय से बंदूक नहीं चला रहा था। वह अपने मचान से उतरा। शेर झपट मारकर स्त्री पर टूटना ही चाहता था कि उसने अपनी पत्नी को बरकाते हुए गोली चलाई। स्त्री डर के मारे मचान से नीचे जा गिरी और घायल शेर गोली खाकर जमीन पर लुढ़का। स्त्री बच गई। शेर मर गया। शेर संबंधी और अनेक मनोरंजक घटनाएँ हैं।

शेर का मेरा अनुभव यद्यपि अन्य शिकारियों की अपेक्षा अधिक विस्तृत नहीं है, तथापि समकक्ष अवश्य होगा।

अप्रैल सन् 1946 की बात है। मैं ओरछा राज्य (श्यामसी) वाले फॉर्म पर था। इस फॉर्म के निकट ही राज्य का रक्षित वन है। जानवर तो उसमें कम हैं, परंतु जंगल पर्वतमय होने के कारण सुंदर है।

मेरे पास शिकार खेलने का लाइसेंस था। एक दिन पहले तक काफी परिश्रम कर चुकने के कारण सोचा कि जंगल की सैर कर आऊँ। बैलगाड़ी पर गया।

मेरा फॉर्म प्रबंधक बिंदेश्वरी गाड़ी हाँक रहा था। गाड़ी में मेरे पास एक बुड्ढा और बैठा था। फॉर्म से गाड़ी लगभग साढ़े छह बजे सुबह चली। चार-पाँच फर्लांग चलने के उपरांत सूरज ऊपर चढ़ आया।

फॉर्म और रक्षित वन के बीच सिंगा नाला है। नाले की चढ़ाई साधारण है। चढ़ाई पार करते ही सघन वन मिलता है। उसी स्थान पर छोटा सा नाला ऊपर आकर उस नाले में दाईं ओर मिला है। नाले पर हिंस, मकोय, करधई, नेगड़ और पलाश के छुटपुट पेड़ हैं।

मैं आगे की ओर मुँह किए था, एक बुड्ढा बगल में। बैल मट्ठर थे और धीमे-धीमे चल रहे थे।

बुड्ढे ने मेरी बगल में धीरे से कुहनी से स्पर्श किया और कहा, ‘नाले के ऊपर और पत्तों के बीच चीतल पड़ा है।’

मैंने तुरंत उस ओर देखा। गाड़ी खड़ी करवा दी। पत्तों के पीछे शेर खड़ा था। खरी छौहोंवाला दीर्घकाल पूरा शेर। बुड्ढे ने पहले कभी शेर न देखा था, इसलिए उसे चीतल का भ्रम हआ।

मैंने बिंदेश्वरी और बुड्ढे से कहा, ‘नाहर है।’ वे दोनों उत्सुकता के साथ उसे देखने लगे। बंदूक मेरी तैयार थी, परंतु लाइसेंस में शेर के शिकार की अनुमति न होने के कारण बंदूक चलाने का लालच तक मन में न आया। परंतु मुझको एक कल्पना सूझी।

लोग कहते हैं कि मनुष्य की आवाज पर सेर भाग जाता है, परंतु वह अडिग रहा, और मैंने जोर के साथ बातचीत की थी, तो भी वह नहीं हटा था। मैंने शेर की हुंकार-गर्जन का अभिनय अपने कंठ से किया। मैं कम से कम पच्चीस बार गरजा।

फिर भी शेर वहाँ से न हिला।

मैंने सोचा, इतना खेल काफी है। गाड़ी आगे बढ़वाई। मुश्किल से चालीस-पचास कदम बढ़ी होगी कि शेर दाईं ओर से चलता हुआ बिलकुल आड़ा आ खड़ा हुआ। हम लोगों के और उसके बीच कोई आड़ नहीं थी; न एक पत्ता और न एक सींक। इस बार गोली चलाने का लोभ मन में हुआ; परंतु लाइसेंस की बाधा के कारण रुक गया।

शेर पूर्व की दिशा की ओर था। उसके ऊपर से सूर्य की किरणें रिपट रही थीं। गाड़ी से वह पचास-साठ डग के अंतर पर होगा। मुझको फिर शरारत सूझी। और मैंने फिर उसके गर्जन की नकल की। अव की बार शेर ने अपना जबड़ा जरा नीचे को लटकाया और अगला पंजा लगभग एक इंच जमीन से उठाकर फिर रखा- मानो सोच रहा हो कि इस अभद्रता का क्या उत्तर दूँ। मुझको भी संदेह हुआ। दाल में काला समझकर मैंने गाड़ी हँकवाई।

मार्ग में एक मोड़ था, लगभग पचास गज का। इस मोड़ से शेर नहीं दिखलाई पड़ रहा था; परंतु जैसे ही मोड़ साफ हुआ, देखा कि शेर गाड़ी के पीछे-पीछे आ रहा है।

मैं समझ गया कि शेर चिढ़ गया है और उसकी नियत में फर्क है, शायद आक्रमण करेगा।

मैंने बिंदेश्वरी से कहा, ‘गाड़ी तेज चलाओ।’

उसने बहुत प्रयत्न किया, यहाँ तक कि बैल को ठोकर मारते-मारते एक पैर का जूता खिसककर गिर गया; परंतु बैल मट्ठे थे, इसलिए न बढ़े। बैलों ने शेर को नहीं देखा था, और पश्चिम का पवन होने के कारण उन्होंने सेर की गंध भी नहीं पाई थी, नहीं तो गाड़ी को फेंक-फाँककर भाग जाते।

शेर के मार्ग में जूता आया। उसने एक छोटी सी छलाँग मारकर इस अपशकुन को पार किया।

बिंदेश्वरी चुप्पा बहादुर है। उसका धीरज उसकी गाँठ में था; परंतु बुड्ढे के चेहरे पर मैंने घबराहट के लक्षण देखे। वह पीछे बैठा था। डर लगता था, कहीं वहीं का वहीं न टपक जाए। मैंने अपने दोनों साथियों को चिल्लाकर ढाढ़स दिया।

मैंने शेर पर गोली न चलाने का निश्चय कर लिया था, क्योंकि मैं ओरछा नरेश के सौजन्य का अपमान नहीं करना चाहता था।

परंतु इधर अकेले मेरे ही नहीं, मेरे दो साथियों के प्राणों पर आ बनी थी, जिसमें बिंदेश्वरी तो मेरे कुटुंब का एक अंग सा ही था।

गाड़ी अपनी गति से चली जा रही थी। शेर मानो नाप-नापकर अपने और गाड़ी के बीच के अंतर को कम करता चला आ रहा था।

मैंने पूरे जोर के साथ चिल्लाना शुरू किया, ‘हट जा, भाग जा, कमबख्त! अभागे हट जा, भाग जा।’

मैं इतना चिल्लाया कि अंत में मेरा गला बैठने लगा। सुनसान जंगल में मेरी चिल्लाहट गूँज-गूँज जा रही थी। चिल्लाहट के कारण मेरे कान सनसना रहे थे; परंतु हम लोग भयभीत नहीं हुए थे।

जब जब मैं चिल्लाहट को और अधिक कठोर और भीषण बनाता, तब-तब शेर जरा सा, बहुत जरा सा सहमता जान पड़ता; परंतु वह रुका नहीं। उत्तरोत्तर अपने और गाड़ी के अंतर को कम करता चला आ रहा था।

उसके पंजों से नाखून निकल-निकल पड़ रहे थे। मूँछें खड़ी थीं। बड़ी-बड़ी आँखें जल रही थीं।

दो फर्लांग चलने के बाद अंतर केवल पच्चीस-तीस कदम का रह गया था।

चिल्लाते-चिल्लाते मेरा गला लगभग बैठ गया था। शेर को केवल दो लंबी छलाँगें मारने की कसर थी कि हम तीनों की हड्डी पसली एक हो जाती। यदि भागनेवाले तेज बैल होते, तो भी पार नहीं पा सकते थे; क्योंकि शेर भी उसी अनुपात में अपना डग बढ़ाता।

अब केवल एक विकल्प कल्पना में आ रहा था – या तो शेर गाड़ी पर कूदकर हम लोगों को चबाता है या फिर उसपर राइफल चलाकर उसकी गति को कुंठित करना चाहिए।

परंतु इस विकल्प में एक बड़ी बाधा थी – पहाड़। ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर गाड़ी चल रही थी। शेर उलटा-सीधा हम लोगों की ओर बिना रुके हुए चला आ रहा था। निशाना नहीं बाँधा जा सकता था। ऐसी परिस्थिति में वह शायद घायल ही होता और फिर घायल शेर वास्तव में शेर होता है। फिर वह किसी हालत में भी हम लोगों को न छोड़ता।

तब एक और उपाय सूझा। मैंने सोचा, शेर के आगे जरा अंतर पर गोली छोड़नी चाहिए। शायद बंदूक की आवाज और गोली से उडी धूल के कारण डरकर लौट जाय। शायद गोली से उचटी हुई धूल उसकी आँखों में पड़ जाय। तब तक हम लोग, मंथर गति से ही सही, जान बचा ले जाएँगे। और यदि यह उपाय विफल हुआ तो एक अंतिम संकल्प वही था – ताककर सेर के सिर पर गोली चलाना। फिर लगे कहीं भी।

मैंने तुरंत बढ़ते हुए शेर के सामने गोली चलाई, ऐसी कि उसके फुट या दो फुट आगे पड़े। गोली चलते ही अर्राट का शब्द हुआ। उसके सामने धूल भी उड़ी। शेर की हिम्मत डिग गई।

वह लौट पड़ा और जंगल में विलीन हो गया। हम लोग अपने प्राणों की कुशल मनाते हुए घर लौट आए।


24

लौटने पर किसी ने कहा तलवार पास रखनी चाहिए, किसी ने कहा छुरी।

तलवार और छुरी का उपयोग शिकार में हो सकता है; परंतु मैं तलवार से छुरी को ज्यादा पसंद करूँगा और छुरी से भी बढ़कर लाठी को, और लाठी से बढ़कर कुल्हाड़ी को। लाठी और छुरी का विवाद बहुत पुराना है। सटकर लड़ने में छुरी बहुत काम दे सकती है। परंतु अच्छी लाठी लाठी ही है। तो भी पास में एक अच्छी लंबी छुरी या अच्छी कुल्हाड़ी का रखना उपादेय।

हथियारों के विकल्प के विषय पर बहुत विषाद है। कोई कुछ कहता है और कोई कुछ। जिनके पास अटूट साधन और समय है और जिनको अपना जीवन शिकार के अंचल में भेंट करना है, वे भिन्न बोरों की दर्जनों बंदूकें रखते हैं; परंतु मेरी समझ में एक 12 बोर दुनाली और एक प्रबल राइफल अल्प साधन और स्वल्प अवकाशवाले के लिए काफी हैं। राइफल के बोरों में मुझको तो 30 बोर अच्छा जान पड़ता है। इसकी मुहारी गति (Muzzle velocity) और मुहारी शक्ति (muzzle energy) संतुलित होती है। यदि बड़े शिकार के लिए प्रबलतर बंदूक ही वांछित हो तो 500 या 450-400 बोरवाली राइफल बहुत अच्छी है। अमेरिका संयुक्त राज्य के प्रधान प्रेसीडेंट प्रथम रुजवेल्ट नामी शिकारी थे। उनको अफ्रीका के सिंहों के मारने का बहुत शौक था – उन्होंने मारे भी बहुत थे। उनकी सम्मति में 405 बोर विंचैस्टर राइफल सिंह की औषध थी (medicine gun for lions); परंतु बात अपने-अपने पसंद की है। और वास्तव में अच्छा हथियार वह है, जो अपने हाथ को लग जाए।

दूसरा प्रश्न कारतूसों का है। 12 बोर की बंदूक के लिए बिलकुल पास (लगभग पंद्रह फीट के अंतर पर) चलाने के लिए एल जी (हिरनमार छर्रा) बहुत अच्छा है; परंतु सुअर इत्यादि विकट जानवरों के लिए तो टूटी गोली (split bullet) वाला कारतूस ज्यादा अच्छा। राइफल के लिए नरम नोकवाला कारतूस (soft nosed bullet) ही काम का है। पक्की गोली (hard ball) प्रायः निराशा और दुर्घटना का प्रत्यक्ष कारण बनती है।

कुछ लोग पिस्तौल या रिवाल्वर के भरोसे शिकार खेलने की इच्छा करते हैं। ये हथियार नजदीक से आत्मरक्षा के बड़े अच्छे साधन हैं; परंतु शिकार के लिए तो बहुत कम उपयोगी हो सकते हैं।


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यदि गाँववालों को शिकारी की सहायता नहीं करनी होती है तो वे कह देते हैं कि जंगल में जानवर हैं तो जरूर, पर उनका एक जमाने से पता नहीं है। सहायता वे उन लोगों की नहीं करते, जिनसे उनको कोई भय या आशंका होती है। जिन शिकारियों को वे अपने अनुकूल समझते हैं, उनके साथ बरताव बिलकुल उलटा होता है। उनसे कहेंगे, ‘ढेरों जानवर हैं, मुल्कों गाड़ियों, खीटों!’

जब शिकारी इन ‘असंख्य’ जानवरों की तलाश में निकलता है, तब मिलता है उसको कुछ भी नहीं। कभी-कभी ऐसा हो जाता है।

असल में जानवर कुसमय या अनुपयुक्त स्थान पर नहीं मिलते, चाहे जैसे बड़े जंगल में कोई चला जाय।

मुझको प्रतिकूल वातावरण में जाने का बहुत कम अवसर मिला है। परंतु अनुकूल ग्रामों में भी काफी निराशाएँ पल्ले पड़ी हैं। दोष गाँववालों या जानवरों का नहीं है। कई मौकों पर तो सारा दोष शिकारी या शिकारी के सहयोगियों के ही मत्थे जाना चाहिए और गया।

यही शिकारियों की गपबाजी के विषय में भी दो शब्द कहना अनुपयुक्त न होगा। जब शिकारी की गोली चूक जाती है तो बहुधा उसको मालूम हो जाता है कि निशाना खाली गया; परंतु वह प्रायः कहता यही है – जानवर को लग गई, घायल भाग गया है। जब जानवर के घायल होने चिह्न चाक ढूँढ़ा जाता है तब जंगल में उसका कुछ पता नहीं लगता। निस्संदेह कभी-कभी घायल जानवर के शरीर से बिलकुल रक्त नहीं निकलता, परंतु सभी खाली निशानों के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता।

शायद शिकारी योजना बनाकर झूठ नहीं कहता। आत्मगौरव या गर्व उसके अचेतन मन में झूठ बोलने के लिए पहले से ही जगह बनाए रहता है। ऐसा निशाना खाली जाने पर, जो जानवर के बिलकुल नजदीक से चूका हो, तुरंत ही शिकारी के मन में एक धारणा उत्पन्न करता – ‘निशाना लग गया होगा’, ‘निशाना लगने का शब्द तो हुआ था।’ परंतु जब थोडी देर में उसको विश्वास हो जाता है, चूक हुई है तब भी वह सच्ची बात नहीं बतलाता।

अधिकांश शिकारियों को मैंने क्रोधी नहीं पाया। परंतु जब हँकाई में कोई जानवर न मिलता तब भरतपुरावेल मेरे मित्र बहुत खिसिया जाते थे। हँकैयों को डाँटते या किसी न किसी को फटकारते।

उन्होंने ने छुटपन में बहुत कुश्ती कसरत की थी – इतनी कि वे जिले के नामी पहलवानों में थे। परंतु बहुत दिनों से व्यायाम छोड़ देने के कारण स्थूल हो गए थे और अधिक दौड़धूप में उनको हाँफ आ जाती थी, इसलिए जब शिकार में उनको कुछ न मिलता तो मेहनत आँस जाती थी।

एक बार जब क्रोध खर्च करने के लिए उनको सामने कोई न मिला, तब मकान के सामने एक चारपाई पर लेट गए। आस पास कुत्ते थे ही, उन्होंने अपने क्रोध और गालियों के खजाने को कुत्तों पर लेटे लेटे ही बरसा डाला।

हमारी भाषा में गालियों की यों भी कोई कमी नहीं है; उन्होंने नई-नई भी अनेक बनाई, जो कुत्तों की कई पीढ़ियों को ही अपने चक्कर में घसीट नहीं लाईं। बल्कि उनके कल्पित या वास्तविक मालिकों के पुरखों और सगोत्रजों तक को अपनी कठोर कृपा से वंचित न रख सकीं।

मेरे ये मित्र निरामिषभोजी थे, परंतु शिकार के व्यसनी। ऐसे भी लोगों का संग हुआ है, जिन्होंने कभी शिकार नहीं खेला।

एक बार मेरे एक जैन मित्र मेरे साथ घूमने के लिए गए। उनका विचार शिकार खेलने का न था और न इस प्रयोजन से मैंने अपने साथ उनको लिया ही था। कुछ हिरन देखकर उन्होंने कहा, ‘इनका मारना अनुचित है। ये किसी को हानि नहीं पहुँचाते।’

मुझको बहस नहीं करनी चाहिए थी; क्योंकि जो लोग प्रत्येक प्रकार की हिंसा से दूर रहना चाहते हैं, उनको शिकार वृत्ति में उपनीत करने का मेरा या किसी भी शिकारी का काम नहीं है। मुझको चुप देखकर वे स्वयं कहने लगे, ‘परंतु यदि तंदुआ या शेर मिले तो अवश्य बंदूक चलाऊँ।’

मुझको भी कुछ कहना पड़ा, ‘क्यों? तेंदुए या शेर ने आपका क्या ले लिया है?’

उत्तर मिला – ‘ये हिंस्र पशु हैं। इनको मारने में मन को कोई बाधा प्रतीत नहीं होती।’

मुझको किसी पक्ष के समर्थन करने का आग्रह नहीं था, तो भी मेरे मुँह से निकल पड़ा – ‘हाँ, ये हिरनों को खाते हैं और हिरन मनुष्यों की खेती को खाते हैं।’

एक दूसरे जैन मित्र ने तेंदुए का शिकार खेल ही डाला। मचान पर बैठने के पाव घंटे बाद तेंदुआ आया। उनको बंदूक चलाने का अभ्यास बहुत कम था। चलाई, परंतु खाली गई। तेंदुआ भाग गया।

कुछ लोगों को अपने शिकार के स्मारकों से घर भरने का बड़ा शौक होता है। यदि इनके लिए कुछ अपना भी खून बहाया गया तो उन स्मारकों में खेल की कुछ छलछलाहट मिलेगी; परंतु यदि वे शिकार के सहयोगियों के रक्त में सने हुए हैं, तो मन में ग्लानि उत्पन्न होती है।

झाँसी के पड़ोस में ही एक रियासत के राजा शिकार के बहुत व्यसनी हैं। शेर तो उन्होंने इतने मारे हैं कि अपने महल के एक बड़े कमरे में उसी की खालें फर्श और दीवारों पर हैं। मुझे आश्चर्य था कि छत को क्यों खाली से नहीं मढ़ा गया है!

इनका शिकार अधिकतर हँकाई का होता है। इनकी मचान के पास से शेर को हाँकने का प्रयत्न किया जाता है। फिर शेर का मारा जाना हाथ की सफाई और बंदूक की शक्ति पर निर्भर है। उनके एक हाँके में शेर निकला और गोली से घायल होकर जंगल में घुस गया। राजा के एक जागीरदार को घायल शेर की खोज के लिए जाना पड़ा। शेर काफी घायल हो गया था, परंतु उसमें बदला लेने के लिए अभी बल बाकी था।

घायल शेर जागीरदार पर टूट पड़ा। उसने अपनी झपट से उनका कंधा फाड़ दिया और एक आँख को खरोंच डाला। वे नीचे पड़ गए और शेर ऊपर हो गया। वह उनको तुरंत खत्म कर देता, परंतु पास ही एक शिकारी और था। उसने बिलकुल पास आकर ऐसे अंदाज के साथ गोली चलाई कि नीचे पड़े हुए जागीरदार बच जाएँ और शेर मारा जाए। ऐसा ही हुआ।

कंधे और आँख के इलाज में महीनों लग गए; परंतु वे बच गए। जिस आँख को शेर ने खरोंचा था उस आँख से उनको दिखलाई तो पड़ा, परंतु उसका स्थान बदल गया। यह घटना एक मित्र की आँख की देखी है।

इन्हीं की एक आँख देखी घटना और है, परंतु उसका अंत भंयकर हुआ।

एक बड़े शिकारी हाँके के शिकार में बिना मचान के शिकार खेलने लगे। वे शेर की दाब में आ गए। चित गिर पड़े। शेर ने दोनों पंजे उनकी कमर के ऊपरी भाग पर रखे और उनके मुँह के पास हुंकार भरी और छोड़कर चला गया। इतनी ही दबोच के कारण उनका फेफड़ा फट गया और मुँह, आँखों तथा नाक से खून आ गया। थोड़ी देर बाद उनका देहांत हो गया।

मैं भी हँकाई के शिकार में शेर के लिए कई बार धरती पर ही खड़ा रहा हूँ। परंतु शेर ऐसी स्थिति में कभी नहीं मिला। मैं मन में अवश्य यह मानता रहा हूँ कि शेर न निकले तो बहुत अच्छा, पर निकलता तो शायद बंदूक चलाता – फिर जो कुछ होता।

जानवरों की खाल या सिर को स्मरण के हेतु रक्षित रखने के लिए खाल को साफ करवाकर धरती पर फैला देना चाहिए। खाल सिकुड़ने न पावे, इसके लिए उसके सिरों पर छोटी-छोटी खूँटियों का गाड़ देना अच्छा है। फिर बारीक पिसा हुआ नमक मलकर खाल को सूखा लिया जाय। कुछ लोग फिटकरी काम में लाते हैं। परंतु गाँवों में हर जगह फिटकरी प्राप्त नहीं होती। नमक सुलभ है और अच्छा भी है।

इसके बाद खाल को किसी कारीगर के हाथ में दे देना ठीक होगा। इस प्रकार की कारीगरी करनेवाली कई कंपनियों बंबई, मद्रास इत्यादि में हैं; परंतु बड़े खर्च का नखरा राजा-रईसों के लिए है।

जिस महल के कमरे की सजावट का ऊपर वर्णन किया गया है, उसमें एक लाख रुपये से अधिक खर्च हो गया होगा। उस कमरे में घुसते ही सौंदर्य कम और बीभत्स अधिक दिखलाई पड़ता है।

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