छायांकन | अर्षाद बत्तेरी

छायांकन | अर्षाद बत्तेरी – Chayankan

छायांकन | अर्षाद बत्तेरी

मैं चलते लम्हों को रोकने का काम करता हूँ। हाँ, मैं एक फोटोग्राफर हूँ। सुंदर हरकतों को रोककर उसे उससे ज्यादा सुंदर व निश्चल बनाने मात्र से ही एक फोटोग्राफर अपनी आजीविका चला सकता है। मगर हरकतों को फ्रीज कर सुरक्षित रखने वाला लाशघर है हर एक कैमरा तथा सभी तरह की हरकतों से वंचित एक समय से हम गुजर रहे हैं इत्यादि सोचों की गहराई में डूबने के बीच भीष्मा ने अपना कैमरा ऊँचा कर पकड़ा। बिल्कुल सूने पड़े प्रेस क्लब में सबसे पिछली पंक्ति की कुर्सी में बैठकर सड़क के भीड़ भरे दृश्यों की ओर कैमरा को केंद्रित किया। गाड़ियों को अनदेखा कर फुटपाथ की तरफ कैमरा को घुमाया। लेन्स में से बहते लोगों के छोटे झुंड को छोड़ कर अकेले चलने वालों पर केंद्रित किया। कोई एक आदमी लेन्स से बाहर निकल जाने पर दूसरे की ओर हाथ घुमाया। परिवेश को भूल कर और कुछ भी न करने जैसे अपने कैमरे के साथ भीष्मा समय काटता हुआ आनंद ले रहा था।

चार बजे की प्रेस बैठक के लिए अब एक घंटा बाकी है। नए अखबार में नौकरी लेने के बाद यह दूसरी बार आना हुआ है। दो साल पहले जहाँ नौकरी कर रहा था वहाँ से इस्तीफा दे दिया और गाँव लौट गया। उसके बाद कहीं गया नहीं और कोई गंभीर फोटो खींचा भी नहीं। कैमरा को पूरी तरह भूलने की स्थिति में दोस्त का बुलावा आया और नई नौकरी को स्वीकार कर लिया। पिछले दो वर्षों में जो भी समझ बनी उभर आई थी उनमें पूरी तरह नहा-धो लिया था तो एक तरह का सुख महसूस कर रहा था वह। फिर भी अखबार की नौकरी तो शत्रुता और दूसरों की बुराई की दुर्गंध वाले गड्ढे में हाथ मारना है। सीमा पर बिना किसी हथियार के दुश्मन-देश से लड़ सकेंगे। लेकिन समाचार पत्र कार्यालय में तो ऐसा नहीं हो सकता। अंदर हमेशा रोने वाले शिकार के दर्द को और कोई न जानने के लिए प्रार्थना करते हुए आया है। फिर भी एक तरह के डर ने उस प्रार्थना के ऊपर पिंजरा बना लिया है। हथेली पर पसीना निकलने पर उसे जाँघ से सटे जीन्स पर पोंछ लिया और कैमरे को ऊपर और नीचे फोकस करते हुए हाथों में गति लायी।

इस तरह कैमरे के साथ समय बिताकर कई दिन हुए। थोड़ी-सी असहजता का अहसास हुआ। अकेले चलने वालों को शूट करते हुए उसे लगा कि अपने हृदय की संघर्ष भरी जगहों में वह अकेले जा रहा है। जल्दी से उसने कैमरा नीचे रख दिया। अकेले जाने पर विभिन्न रास्तों पर चोरी-छिपे घुस कर हमलों से बचकर रहना सीख जाएँगे। अब तक दोस्तों की झुंड में रह कर, अलग-अलग दोस्त-समूह को बदल-बदल कर होटल कमरों का तीखा-खट्टा खाना लेकर जीभ पर घाव के आने का रास्ता खोल दिया था और ऊब जाने वाली चर्चाओं की तस्वीरें जल्द से छपकर निकलने वाली फोटो जैसी याद से बाहर निकला।

“हर तरह की भीड़ और उत्सवों से थोड़ा हटकर रहना है – भीड़ हमें अंधा बना देती है” – चालू कैमरे के फ्लैश बटन पर उसने जोर से हाथ दबाया।

प्रेस क्लब की कुर्सियाँ भर गईं। सबसे आगे वाली पंक्ति की केवल कुछ कुर्सियाँ खाली थीं।

“भीष्मा…?” कंधे पर गिरा हाथ किसका है देखने पर अपने बाहर आए दाँतों को दिखाते हुए हँस रहा है रंजन।

“सुना है कि तुमने ज्वाइन कर लिया। फोन नहीं कर पाया।”

“अच्छा”

“बैठक चार बजे है न? पुराने अभिनेता हैं तो ज्यादा कोई भीड़ नहीं होगी।” – प्रेस क्लब के नीचे फोटोग्राफरों की मोटर साइकिलों की आवाज। गले में कौए-सा कैमरा टाँगते हुए सब अंदर आ गए। इधर का सब कुछ चोंच पर लेकर दूसरी जगह की ओर उड़ने की जल्दबाजी। अचानक वहाँ पर हँसी की आवाज निकली। सब एक ही जगह की ओर देख रहे हैं। नीले और पीले रंग की डिजाइनों वाला शर्ट और खाकी पैंट पहन कर खड़े एक आदमी पर सबकी निगाहें जा पहुँचीं। घुंघराले बाल वाले, नाटे उस आदमी की मजबूती का अंदाजा उसके चौड़े शरीर से ही पता चल जा रहा था। वह अन्य किसी पर ध्यान दिए बिना मंच पर चढ़ने की सीढ़ी के पास अपना सिर थोड़ा नीचा कर खड़ा हुआ।

“देखो, सेलिब्रेटियों के ऊपर चढ़ने के रास्ते के पास खड़ा हो रहा है।”

“अरे, इससे तो हम हार गए।”- किसी दूसरे ने कहा।

“गुहेरा” – रजंन ने परिचय कराया।

भीष्मा के ललाट पर न समझने का प्रश्न चिह्न उभर आया।

“हाँ, तुम नहीं जानते हो। पिछले दो सालों में हमारे शहर में जन्म लिया एक गुहेरा है यह। आया था खुद को केशवदास तय्यिल कहकर। उसके बिना यहाँ कोई कार्यक्रम पूरा नहीं होगा।

“क्या मुसीबत है? कोई बड़ा आस्वादक हो सकता है।”

“अरे यार। तुम नहीं जानते हो। वह कोई आस्वादक नहीं है। सेलिब्रिटियों की बातचीत या कोई बैठक को हम अगर कैमरे से रिकार्ड कर रहे हैं तो पीछे उसका कद्दू जैसा सिर होगा। लाख कोशिश करें तो भी उससे बच नहीं सकते।”

हॉल की आपसी बातचीत की आवाज रुक गई और प्रेस बैठक शुरू हुई। भीष्मा की निगाहें गुहेरा पर थीं। वह मंच पर बैठे मशहूर लोगों के चेहरे पर देखते हुए मुँह खोल कर खड़ा है। लगातार कैमरा फ्लैश को देख कर वह बेचौन हो रहा है। किसी पंछी की तरह वह अपना गर्दन इधर-उधर हिला रहा है। अलग-अलग भावों को प्रस्तुत करने का प्रयास करता उसका चेहरा किसी को भी हँसा देगा। भीष्मा को भी मजा आया। फोटो खींचने के बाद वह प्रेस क्लब के नीचे झुंड बनाए खड़े फोटोग्राफरों के बीच गया।

“फोटो में गुहेरा आया कि नहीं?”

“हाँ, कुछों में आया होगा।”

“कल के अखबार निकलने तक उसको नींद नहीं आएगी।”

“टाउन हॉल में 5.30 बजे है न?” – बीच में किसी ने याद दिलाया। समय पर उधर पहुँचने के लिए सब छितराकर अलग हुए। भीष्मा जब अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट कर रहा था तो देखा कि सड़क के उस पार वह खड़ा हुआ था। वह बेचैन होकर बीच-बीच में घड़ी देखते हुए रिक्शा को हाथ दिखाकर निराश हो रहा था। उसने अपनी मोटर साइकिल उसके पास खड़ा की।

“टाउन हॉल जा रहे हो?”

“हाँ” – आवाज हल्की थी।

“मैं भी वहीं जा रहा हूँ, बैठो।”

“नहीं, मैं आ जाऊँगा” – आकस्मिक रूप से इनकार कर गंभीर होकर देखते हुए वह निकल गया। चलती मोटर साइकिल के साइड ग्लास से फुटपाथ पर उसका तेज गति से चलना दिखाई दे रहा था।

टाउन हॉल लोगों से पूरी तरह भर गया था। मंच पर चढ़ने से पहले कुछ मशहूर लोगों की फोटो खींचने के लिए भीष्मा ने कैमरे को ऊपर किया तो देखा कि उनके पीछे, अपना चेहरा स्पष्ट रूप से दिखाते हुए बैठा है वह।

“यह कब पहुँचा” – मंच पर रोशनी फैल गई। कार्यक्रम शुरू हुआ। भीष्मा ने तिरछी आँखों से उसे देखा। सीट पर कोई और बैठ गया है… मिनटों के अंदर गायब हो गया… चारों ओर ढूँढ़ा।

“यह कहाँ चला गया।” – बाहर बरामदे के नीचे, अँधेरे में, पौधों के बीच छिपकर खड़ा था। कार्यक्रम के बाद बाहर आने वाले मशहूर लोगों के साथ की भीड़ में उसने भी अपने आपको घुसाया। उनके साथ दाएँ-बाएँ कंधों को मिलाकर चला। कईयों को धक्का देकर अपने आसपास को भूलकर आगे बढ़ा। स्वयं उछल रहा है। अपने अंदर के भाव तथा जोश को कैमरा फ्लैश की तरफ जल्दी से दिखा रहा है। कैमरा में अपनी तस्वीरें जरूरत से ज्यादा हो गई होंगी इस उम्मीद के साथ उसने अपने आपको वहाँ से बाहर निकाला। थोड़ी देर बाद, खाली बरामदे पर उसका अकेला आना – इधर-उधर नहीं देख रहा है। हाल ही में जन्मे किसी योद्धा की तरह तेजी से आत्मविश्वास के साथ सीना तानकर चल रहा है। भीष्मा ने कैमरे की शट्टर गति बढ़ाई – उँगली दबाई। वह बरामदे से आँगन की ओर कूद रहा है। आँगन पर पैर छूने तक के दृश्यों को कैमरा ने कैद कर लिया। घबराहट और घृणा भरी प्रतिक्रिया दर्ज करती आँखों के साथ वह भीष्मा के नजदीक पहुँचा।

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“क्यों… अकेले मेरी तस्वीरें खींची?” – अपनी धीमी आवाज को जितना बढ़ा सकता था उतना बढ़ा कर उसने चिल्लाकर पूछा। डर के साथ खड़े भीष्मा के पास होकर अपनी सिहरती उँगली से इशारा कर उसने कहा:

“अकेले मेरी फोटो खींचना मुझे अच्छा नहीं लगता।”- बिखरते शब्दों को बांधकर इतना कहा और वह दौड़कर गायब हो गया।

अब तक उसके बारे में सुनी बातें, धारणाएँ सब कुछ एक साथ शहर के उस कोलाहल में दब गईं। सैकड़ों कैमरों के बीच खड़े होने पर भी फिर से फोटो में आने के लिए, अपने आपको प्रदर्शित करने की लालच रखने वाले इनसान के रूप में इस शहर द्वारा परिचय कराए गए उसके विरोध से उत्पन्न आग की गर्मी से भीष्मा जल गया।

पिछले दिन की बातों को याद करते हुए भीष्मा ने कैमरा के मेमोरी कार्ड को कंप्यूटर में लगाया। मॉनिटर पर केशवदास तय्यिल का चेहरा दिखाई दिया। की बोर्ड पर उँगली दबाकर हर एक फोटो को बार-बार देखा।

सिर खड़ा कर चला आ रहा है।

हाथों को हिला कर चल रहा है।

बरामदे से एक गड्ढे में कूदने जैसा आँगन की ओर उतरते हुए उसकी कई तस्वीरें। सबमें दाँतों से होंठ काटकर एक गंभीर भाव। दाहिने कान के बिल्कुल नीचे किसी लंबे घाव का निशान। अस्वाभाविक-सा कुछ छुपाने वाला चेहरा।

“अरे, यह तो गुहेरा है न?” – ऑफिस के श्याम की हँसी।

“हाँ”

“तुमने इसकी तस्वीरें क्यों खींची हैं? कोई फीचर कर रहे हो क्या? आज के अखबारों में इसके बिना कोई भी फोटो नहीं है। काटकर चिपकाए-सा अपनी लंबी गर्दन लेकर सब कहीं भरा पड़ा है साला।”

भीष्मा ने उसकी एक फोटो चुनकर बड़ा कर मॉनिटर पर रखा। फिर अपनी आँखें उसके पास ले जाकर पूछा :

“मित्र, तुम कौन हो? मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहूँगा। इस शहर के मेरे दोस्तों के अनुसार सभी तस्वीरों में अपना चेहरा लाकर खुश होने वाले एक व्यक्ति हो तुम। लेकिन मैं तुम्हें ऐसा नहीं मान सकता। उस तरह की कोई अश्लील सोच के साथ खुशी मनाने वाले व्यक्ति का चेहरा तुम्हारा नहीं है। बताओ… तुम कौन हो? मैं अपना परिचय देता हूँ। मैं भीष्मा। इससे पहले किसी दूसरे अखबार में काम करता था। इस शहर ने मुझे जो असहनीय दर्द दिया उसके कारण मैंने नौकरी छोड़ दी थी। इधर की रातों में मैं अपनी जिंदगी को मनाते आ रहा था। सभी जगहों को मैंने अपना घर समझा। हमेशा सब कहीं अपने आपको प्रदर्शित करने की इच्छा रखने वाले गँवार का दिल मुझमें भी है। लेकिन बाद में पता चला कि हर जगह अपने आपको प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए। सबसे सब कुछ खुल कर नहीं बोलना चाहिए। इनसान को हमेशा विश्वास नहीं करने की आदत डालनी चाहिए। पहाड़ियों, पेड़ों तथा खेतों से भरे मेरे गाँव से इस शहर पहुँचने के लिए टेढ़े-मेढ़े रास्ते से उतर कर आना है। उस भयानक टेढ़े-मेढ़े रास्ते से यहाँ आकर जो भी व्यक्ति मिले सब पर विश्वास किया। बिना किसी व्यवधान के सबके पास चला गया। लेकिन जबसे अपनी राय और इच्छाएँ सबके सामने रखने लगा तो मैं मार खाने लगा। तलवार से ज्यादा धार वाले इल्जाम लगाकर मुझे काटकर गिरा दिया।

मित्र,

शहर एक तरह का कसाईखाना है। इधर के हर एक इनसान पिंजरे में बंद जानवर हैं। उन्हें दूर से देख कर लौट जाना। उनकी पकड़ में आ गए तो वे हमारे टुकड़े कर देंगे। इस शहर में तुम क्यों अपने आपको शिकार बना रहे हो? सब कहीं से दूर हट कर मौन की उस मजबूत छाँव के पीछे बचे समय जीने की कोशिश कर रहा हूँ मैं। तब हमेशा प्रत्यक्ष होकर तुम मुझे झकझोर रहे हो। किसी भी भीड़ में मैं नहीं खड़ा हो पा रहा हूँ। तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? मुझे तुमसे प्यार जैसी घृणा हो रही है।”

विभिन्न सोचों के उतार-चढ़ाव के बीच सिस्टम को बंद कर उठा। मोटर साइकिल लेकर उससे मिलने की जल्दबाजी में शहर पूरा घूमा। जहाँ-कहीं भी हो सकता है उधर ढूँढ़ने के बीच टाउन हॉल की बाहरी दीवार के पास खड़ा हुआ दिखाई दिया। मोटर साइकिल की गति बढ़ती जा रही थी तो मोबाइल बात न मानने वाले बच्चे की तरह बिना रुके आवाज करने लगा। स्क्रीन पर ‘हॉम’ दिखाई दिया।

“घर से है” – दूसरी ओर से बात सुनने के साथ-साथ भीष्मा का चेहरा सिकुड़ता गया।

“हाँ मैं जल्दी निकल रहा हूँ। हॉस्पिटल पहुँच गए क्या… डॉक्टर से मिले?”- मोटर साइकिल को घुमाते वक्त एक बार फिर टाउन हॉल के पास देखा। लेकिन उधर से वह गायब हो गया था।

“कितनी जल्दी वह गायब हो जाता है!”

घर जाने के लिए भीड़ भरी बस में अनिच्छा से बैठा। प्रसव पीड़ा की बोझ लेकर अस्पताल पहुँची पत्नी के पास मन से वह पहुँच गया। मोबाइल लेकर कीपैड पर उँगलियों को इधर-उधर दौड़ाया। आर्द्रता भरी पत्नी की आवाज सुनाई दी।

“जल्दी आइए… सह नहीं पा रही हूँ” – धरती पर आने के लिए बेचैन बच्चे की सारी हरकतों में उसे अपने शरीर को ही फाड़ने जैसा दर्द हो गया होगा। थोड़ी देर बाद फिर से फोन की आवाज सुनाई दी।

“हेलो… लड़की है क्या? मैं पहुँच गया…”

“…दिक्कत… क्या… क्या…”

अगले प्रश्न से पहले फोन कट गया।

“टॉवर भी गया…” किसी अलग नंबर पर उँगली दबाया। फिर से टॉवर चला गया। बीच-बीच में फोन को ऊपर उठाकर देख लिया। स्क्रीन पर ही देखता रहा। साँस आकर जाने वाले किसी बीमार व्यक्ति की तरह मोबाइल पर सिग्नल आ-जा रहा था। पीछे सीट पर एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। गोदी के कैमरा-शट्टर की उच्चतम तेजी से ज्यादा तेज गति में बेटी को देखने की अदम्य इच्छा हुई।

अस्पताल की सीढ़ियाँ चढ़ कर कमरे में पहुँचते समय भीष्मा हाँफ रहा था। कुछेक रिश्तेदारों के बीच, पलंग पर लेटी पत्नी के पास बच्ची नहीं थी। खाली चादर पर एक बच्चे को लिटाने का कोई निशान दिखाई नहीं दे रहा था।

“बेटी कहाँ है?”

“महीने पूरे होने से पहले का प्रसव रहा तो बच्ची को वेंटिलेटर में रखा गया है”

“देख नहीं सकता?”

“हाँ” – बाहर निकलते समय नर्स सामने आकर खडी हुई।

“बच्ची के पिता को डॉक्टर बुला रहे हैं” – उनके साथ किसी दूसरे कमरे में गया। दरवाजा बंद होने पर वह स्तब्ध हो गया। छोटे शीशे वाले पिंजरों में कई बच्चे मछलियों की तरह लेटे हुए थे।

“इनमें से मेरी बेटी कौन-सी है?” – डॉक्टर ने भीष्मा को बच्ची के पास पहुँचा दिया। अपनी छोटी नाक में छिपकाए बैंडेज के साथ बीच-बीच में आँखें खोल कर बंद करती हुई बेटी के पास भीष्मा बेसब्री से खड़ा रहा। जीवन के स्पंदनों को एकत्रित करता उसके छोटा हृदय के भीतर के दर्द को न निकाल पाने की अपनी विवशता के सामने भीष्मा का हृदय भारी हो गया।

“वजन बहुत कम है। कम से कम दो सौ बीस ग्राम तो होना चाहिए। उतना भी नहीं है। ज्यादातर अंगों का विकास भी नहीं हुआ है। साँस बीच-बीच में रुक रही है। जल्द ही किसी दूसरे अस्पताल में तबादला करना होगा। इधर सुविधाएँ कम हैं।”

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उठाकर फेंकने जैसा दूसरे अस्पताल में पहुँच गए। बेटी और ऑक्सीजन सिलिंडर दोनों एक गति में आगे बढ़े। बची हुई थोड़ी सी जिंदगी से उसने अपनी गर्दन को हिलाया। डॉक्टर ने बच्ची की छाती पर हाथ रख कर सिर पर उँगली से थपकी मारी। काट कर निकालने की तरह बच्ची को भीष्मा से अलग कर आई.सी.यू. ले जाया गया।

समय बूँद की तरह हर पल गिरता जा रहा था। सामने आकर खड़े डॉक्टर से किसी तरह बात न कर पाने की स्थिति आ गई।

“आप बच्ची के पिता है क्या?”

“जी”

“बच्ची की रेस्पिरेशन काउंट बहुत कम है। अब से चालीस या उससे ज्यादा हो जाने पर ही हम कुछ न कुछ बता सकेंगे।” डॉक्टर जो कुछ भी कहे जा रहे थे वह भीष्मा की समझ में नहीं आ रहा था। एक ही अस्पताल के दो अलग कमरों में पत्नी और बेटी। जो कुछ भी झेलना या सहना है उसे किसी दूसरे को न दे पाने में मनुष्य की विवशता और उसके सामने उसका थक कर खड़ा होना। कई सारे लेन्स होने पर भी कैमरा से चित्रित न कर पाने वाले कई पल जिंदगी में होते हैं इस बात को जानने पर आँखें किसी मैले लेन्स की तरह हो गईं। कैमरे को कई बार ऊपर और नीचा किए हाथों में एक तरह की अवज्ञा की कीलें अपने आप धँस कर दर्द करने लगीं। धुंधले दृश्य में केशव दास धूप के निकलने जैसे दिखाई देने लगा। ग्राउंड फ्लोर की भीड़ में से उसका आना देख कर भीष्मा की आँखें फ्लैश लाइट की तरह चमकीं।

“केशव दास… यह मेरे गाँव में क्यों… बिना कैमरों वाले इस अस्पताल में?” – अविश्नसनीय उस दृश्य की ओर वह बार-बार ताकता रहा। कुछ भी शूट न कर पाने की स्थिति में खड़े रहने पर केशव दास कैमरा में बहुत जल्दी चित्रित होने वाला अपना शरीर लेकर आ रहा था और उसे देखने पर भीष्मा के अंदर बिना किसी कारण के एक तरह की सिहरन पैदा हुई। भीड़ के बीच से उसका पीछा किया। दोनों पहली मंजिल के गलियारे में पहुँच गए। उसके चलने की गति बढ़ गई। एक मोड़ पर वह गायब हो गया। भीष्मा सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर की मंजिल तक पहुँच गया तो देखा कि वह कहीं एक जगह पर भीड़ से दूर खड़ा हुआ था।

“केशव दास” – भीष्मा की आवाज के पहुँचने के साथ ही उसने दौड़ कर भागने की कोशिश की।

“रुको” – अनेक वार्डों में बीमारियों से पीड़ितों के बीच से, दर्द और एकांतता के कारण अकेले हुए लोगों की मूक-चिल्लाहट ने भीष्मा को अस्पताल की विभिन्न दिशाओं तक पहुँचा दिया।

“यह मुझे इस तरह क्यों दौड़ा रहा है?” – मनुष्य जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को देखते हुए दौड़ते समय भीष्मा की थकावट पिघल गई और आत्मविश्वास जगाने वाली ताकत उसमें पैदा हुई। किसी मोड़ पर, भीड़ में फिर से वह गायब हो गया।

“इस बार भी पकड़ नहीं पाया। बेटी के बारे में सोच कर दर्द खाने वाला मुझको इन कठिन दर्द से पीड़ित लोगों के बीच में धकेल कर वह खुद कहाँ गायब हो गया?”

“भीष्मा, यहाँ क्यों खड़े हो, बेटी के पास तो हम हैं न, तुम पत्नी के पास जाओ, इधर तुम्हें कुछ करना नहीं है” – रिश्तेदार के कहने पर भीष्मा मुड़ कर चला।

रात की शुरुआत में संयमित होकर पत्नी को भर्ती किए गए अस्पताल में पहुँचा। कमरे में सहनशीलता की उस काँटेदार शय्या पर लेटी पत्नी के पास बेचैन होकर खड़ा रहा। पलंग के पास रखे कैमरे की ओर देखा और जल्द ही दृष्टि को वापस लिया। अनिवार्य रूप से उनके लिए एकांतता तैयार कर रिश्तेदार सब कमरे से बाहर निकले। पलंग पर बिछी छोटी-सी चादर पर पत्नी का बायाँ हाथ हिल रहा है।

“कहाँ है मेरी बेटी?”

“शहर के अस्पताल में है। तुम हल्ला मत करो। सुबह होते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा।” – पहली बार की रुलाई या माँ के दूध की गंध से रहित उस कमरे में खाली-प्रदेश जैसे लेटी पत्नी के पास भीष्मा बैठ गया। “क्या सोच रहे हैं? – पत्नी ने पूछा।

“बीते और वर्तमान पलों के बारे में। छिप कर कहीं रह पाना एक तरह का वरदान है। रोशनी में आ जाना एक तरह की दुर्घटना।”

“मैं समझी नहीं”

“दस महीने तक तुम्हारी कोख में सुरक्षित रह रही थी हमारी यह बेटी। अब बाहर आ गई तो क्या-क्या उसे सहना पड़ रहा है। उसे अंदर ही रहना चाहिए था। मैं पिछले दो साल से अपने आपको कहीं छिपाने की कोशिश कर रहा हूँ। भीड़ से दूर रह पाना एक सौभाग्य है। इस बीच मेरा परिचय एक आदमी से हुआ जो सब कहीं दिखाई देता है। वह मुझे परेशान कर रहा है।”

“कौन है वह?”

“सबके मजाक का पात्र बनकर जीने वाला एक जोकर। लेकिन वह सचमुच ऐसा नहीं है। लाख कोशिश के बावजूद भी उसे समझ नहीं पा रहा हूँ।” – कमरे के भरे सन्नाटे में दोनों ढक गए। रोए बिना, अपने खाली पेट पर हाथ रख कर लेटी पत्नी की साँसों में भीष्मा ने मूक रोदन किया। उसे लगा कि वक्त के बढ़ने के साथ पत्नी सिमट कर अकेली होती जा रही है। हृदय के अलावा और किसी उपकरण के द्वारा कैद न कर पाने वाले मौकों में उसने बात की।

“हृदय-सा बड़ा कोई कैमरा नहीं है।”

सप्ताह के अंत में नौकरी में फिर से लौटने पर भीष्मा को चुप्पी निगली हुई थी। उसे यह विश्वास था कि वही सबसे अच्छी स्थिति है। कैमरा को एक लाश से बढ़ कर कुछ और सोच ही नहीं पाया। इच्छाहीन होकर अखबार के पन्ने पलटते वक्त देखा कि उन सबमें केशवदास की फोटो भरी पड़ी है।

“अरे यार तुम बार-बार इन फ्लैशों से मर कर लाश के रूप में अखबारों में दिखाई क्यों दे रहे हो?”

काट-कूट कर विषैले दाँतों के सहारे तैयार किए जाने वाले समाचारों की मेज से बाहर निकलकर केशवदास को लक्षित कर मोटर साइकिल स्टार्ट किया।

“अबकी बार उसे पकड़ना ही है।” रेलवे स्टेशन पार कर पुल के नीचे से निकलते समय देखा कि वह पटरियों के पास से चला आ रहा था। मोटर साइकिल को उसके पास ले गया।

“दौड़ो मत। मुझे तुमसे बात करनी है।”

“आओ” – उसने शांत स्वर में स्वागत किया। मोटर साइकिल को स्टैंड पर खड़ी कर पटरी के बाद की कच्ची सड़क पर चलने लगा।

“तुम इस तरह मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?”

“बिना जाने मैं तुम तक आ पहुँच रहा हूँ।”

“आज कैमरा नहीं लाए हो क्या?”

“कैमरा नहीं छू पा रहा हूँ। एक तरह की सुस्ती लग रही है। आज के लगभग सारे अखबारों में तुम्हारी फोटो है। देखी नहीं?”

“मैं नहीं देखता। कभी देखा भी नहीं।”

“कभी भी?” – भीष्मा अविश्वास के साथ उसके पास आकर खड़ा हुआ।

“नहीं, यह एक मजा है। कुछ न कुछ तो करना ही है। तुम सब लोग निंदा के साथ मुझे कैमरे में कैद कर रहे हो। लेकिन तुम को मिलाकर सारे लोग मुझे नहीं, मेरे द्वारा प्रस्तुत किसी अन्य व्यक्ति को कैद कर रहे हैं। यह एक तरह का बदला है। क्योंकि तुम्हारे साथ वालों में से किसी ने, हमेशा फोटो में दिखाई देने के लिए कोशिश करने वाले तुच्छ मनुष्य के रूप में मेरा नाम घोषित किया था। सब लोग उसी को दुहरा रहे हैं। मैं भी तुम लोगों के विश्वास को मजबूत करने के लिए नाच रहा हूँ। कितना मजेदार खेल है न?” केशवदास की आँखें भर आईं। अचानक एक सिसकी उसके अंदर से बाहर आ गिरी। होठों को काट कर, फिर से सिसकी आने से रोक कर उसने अपने आपको काबू में लाने की कोशिश की। एक गाड़ी उन लोगों को पार कर गई। थोड़ी देर तक रुकी बातचीत को फिर से शुरू न कर पाने की विवशता में दोनों ने आपस में देखा। भीष्मा ने उसकी हथेली को धीरे से पकड़ा।

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“कितना ठंडा है तुम्हारा हाथ, एक आदमी का हाथ इतना ठंडा हो सकता है?” उसके अंदर की ठंड ने भीष्मा को आश्चर्यचकित किया। किसी के धक्का देकर हटाने जैसे वे रेल की पटरी के पास पहुँच गए। उन लंबी पटरियों के पास से चलने पर खुद को ढूँढ़ने की खुशी में दोनों डुबकी लगाने लगे।

“इधर से थोड़ी दूर चलने पर मेरे घर पहुँच जाएँगे” – केशवदास ने कहा।

“घर इधर ही है क्या?”

“हाँ” – बीच में भीष्मा ने उसे पकड़ कर रोक दिया।

“घर पहुँचने से पहले बताओ, तुम कौन हो, ऐसी जिंदगी क्यों है?” – प्यार व जिज्ञासा मिश्रित सवाल के सामने वह रुक गया। थोड़ी देर तक रेल की पटरियों की ओर देखता रहा। उसके बाद जब भीष्मा को देखा तो उसके होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में आँसू भर आए थे। अपने अंतःकरण की बात को केशवदास ने शुरू किया :

“दोस्त, मैं एक कवि था। वर्तनीगत गलतियों वाली सामान्य किस्म की कुछ कविताएँ लिखकर इस शहर में मेरा आगमन हुआ था।”

“तुम कवि हो?”

“था। अब कुछ भी नहीं लिखता हूँ। बिल्कुल इच्छा नहीं है। कुछ छपकर भी आई थी। लेखन से ज्यादा मैं उस समय लेखकों के साथ चलता था। वह शायद एक खतरनाक कदम था। उसी बीच मैं एक कवि की ओर आकृष्ट भी हुआ था। करुणा और जीवन के बारे में हमेशा बोलने वाले उस कवि के साथ मेरी काफी गहरी मित्रता हो गई थी। वह बहुत कुछ की शुरुआत थी। मेरी बुद्धिहीनता और प्यार के साथ उसके वश में आना आदि का उसने गलत फायदा उठाया।” आवाज में प्रकट हो रही पीड़ा को दबाकर केशवदास ने बात को जारी रखा :

“दोस्त, लेखकों को कभी मित्र के रूप में न स्वीकार करना। विश्वास भी मत करना। उन्हें हमेशा सेवकों की जरूरत रहती है। जहर थूकने वाली प्रतिशोध की भावना रखने वाले स्वार्थ के रूप में उसे पहचानने पर बहुत देर हो चुकी थी। शब्दों से जो बड़प्पन दिखाते हैं, उसे कर दिखाने में ज्यादातर सक्षम नहीं होते हैं। वह आदमी भी ऐसा ही था। उसने काफी अच्छे से खेला और मुझे परास्त कर इस शहर के बीच में फेंक दिया।

मैं अपमानित हुआ।

गलत साबित हुआ।

मुझे सताया गया।

केशवदास का उच्छ्वास मांस के जलने की गंध के साथ बाहर आया। मंच पर शब्दों को बढ़ा चढ़ा कर बोलने वाले लोगों के मन को ही हर एक फोटो के माध्यम से इसने प्रस्तुत किया था?

“किसलिए तुम्हें? – भीष्मा की आवाज मुश्किल से बाहर निकली।

“वह सब अब कहने से क्या फायदा। लेखक अच्छे पात्रों का सृजन अपने अंदर के उस नीच जानवर को छुपाने के लिए ही करते हैं। मैंने कहा, सेवक न होने का अहसास दिलाना ही मेरी गलती थी। साथ ही साथ मैंने यह भी खोज निकाला कि वह उतना बड़ा इनसान नहीं है। और फिर, मेरा छोटा-मोटा लेखन भी” – केशवदास के हाथों को जबरन पकड़कर भीष्मा रोया।

“भीष्मा क्यों रो रहे हो?”

“मेरी जिंदगी के बारे में तुम कह रहे हो। मैं भी इस शहर में इसी तरह का एक अहेर था। अब अपने आपको कहीं-न-कहीं छिपाने की कोशिश कर रहा हूँ मैं।” – केशवदास ने भीष्मा को अपने पास पकड़ा। थोड़ी देर उसी तरह खड़े रहने के बाद केशवदास पटरियों के बीच से चलने लगा। पटरियों के बाहर से भीष्मा भी।

“उससे अभी भी गुस्सा रखते हो?”

“यह दुआ करता हूँ कि आमने-सामने न मिले…। अंदर की वह आग खत्म भी न हो।”

“अभी कुछ लिखते नहीं हो?” – भीष्मा ने थोड़ी-सी शंका के साथ पूछा।

“नहीं। हमारी लिखी हुई रचनाओं को वैयक्तिक तौर पर अच्छा कह नहीं पा रहे हैं तो हम हारे हुए लेखक व इनसान हैं। इसलिए मैं कुछ भी नहीं लिखता हूँ।”

भीष्मा को यह अहसास हुआ है कि रेल की पटरियाँ सब कुछ खत्म करने की जगह नहीं है, बल्कि बहुत कुछ शुरू करने की राह है। केशवदास अचानक मुड़ कर खड़ा हुआ।

“भीष्मा, झगड़कर जाने वाला दोस्त ही सबसे बड़ा दुश्मन होता है। जानते हो, उसका सामना कैसे करना है?”

“नहीं”

“कोई भी मित्र हो उसे कहाँ रखना है – पता है?”

“नहीं”

“जानते हो – भीड़ को कैसे पहचानना है?” प्रश्न के साथ ही रेलगाड़ी की आवाज पास आई।

“गाड़ी आ रही है” – गाड़ी के पास आने पर केशवदास बाईं ओर कूदा। पटरी के दोनों तरफ खड़े उन लोगों के बीच पर्दा बन कर गाड़ी जल्दी से चली गई। अंतिम डिब्बे के निकलने पर तीन भारी-भरकम सवाल अपने ऊपर डालने वाले केशवदास को भीष्मा जल्दबाजी में ढूँढ़ने लगा। लेकिन दूसरी ओर वह नहीं था।

“यह कहाँ गायब हो गया?” – भीष्मा ने थोड़ी दूर चलकर देखा। फिर वापस आया और अपनी ओर आने वाले दो लोगों के सामने खड़ा हुआ।

“अभी कोई उधर गया है क्या?”

“नहीं”

“मेरे साथ एक आदमी था। अचानक वह गायब हो गया।”

“नहीं तुम्हारे साथ तो कोई नहीं था। हम देख रहे थे कि तुम अकेले बात करते आ रहे थे। बड़ी देर से तुम बात करते हुए इस रास्ते पर चल रहे हो।”

“मेरे साथ एक आदमी था।”

“नहीं, तुम अकेले थे। तुम्हारा इस तरह अकेले चलते हुए बात करना देख कर उस चौराहे के लोग हँस रहे हैं।”

भीष्मा उन लोगों को छोड़ कर आगे की ओर दौड़ने लगा तो गिर जाने के लिए तैयार एक कुटिया देखी।

“यही घर होगा” – उसने अंदर घुसने पर देखा जमीन पर सजाकर बिछाए गए विभिन्न अखबारों के पन्ने। उसके बीच पृथ्वी पर ईश्वर के एकमात्र रूप – अनेकों बच्चों में से एक – कलंकरहित होकर हँस रहा था।

“यह आदमी कहाँ चला गया? तीन अनिवार्य बातों पर कुछ कहकर, उम्मीद जगाकर उसने इस बच्चे के पास मुझे क्यों पहुँचाया? यह किसी बात की शुरुआत है? मुझसे यह दर्द सहा नहीं जा रहा है। अकेलेपन का दर्द सहा नहीं जा सकता।” – केशवदास की फोटो एक भी अखबार में नहीं थी। खत्म हुई उम्मीद और अकेलेपन की नीरवता के साथ दोनों हाथों को ऊपर कर छाती फाड़ते हुए उसने पूछा।

“हे भगवान, तुमने दर्द को काट कर अलग करने का कोई औजार हमें क्यों नहीं दिया?”

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छायांकन – Chayankan

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